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Chapter 8 लौहतुला

पाठ-परिचय – प्रस्तुत पाठ विष्णुशर्मा द्वारा रचित ‘पञ्चतन्त्रम्’ नामक कथा-ग्रन्थ के ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र से सङ्कलित है। इसमें विदेश से लौटकर जीर्णधन नामक व्यापारी अपनी धरोहर (तराजू) को सेठ से माँगता है। ‘तराजू चूहे खा गये हैं’ ऐसा सुनकर जीर्णधन उसके पुत्र को स्नान के बहाने नदी तट पर ले जाकर गुफा में छिपा देता है। सेठ द्वारा अपने पुत्र के विषय में पूछने पर जीर्णधन कहता है कि ‘पुत्र को बाज उठा ले गया है।’ इस प्रकार विवाद करते हुए दोनों न्यायालय पहुँचते हैं जहाँ धर्माधिकारी उन्हें समुचित न्याय प्रदान करते हैं।

पाठ का सप्रसंग हिन्दी-अनुवाद एवं संस्कृत-व्याख्या –

  1. आसीत् कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्रः। स च विभवक्षयाद्देशान्तरं गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत् –

यत्र देशेऽथवा स्थाने भोगा भुक्ताः स्ववीर्यतः।
तस्मिन् विभवहीनो यो वसेत् स पुरुषाधमः॥

तस्य च गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुलासीत्। तां च कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः। ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरमागत्य तं श्रेष्ठिनमुवाच “भोः श्रेष्ठिन्! दीयतां मे सा निक्षेपतुला।” स आह-“भोः! नास्ति सा, त्वदीया तुला मूषकैर्भक्षिता” इति।

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कठिन-शब्दार्थ :

अधिष्ठाने = स्थान पर।
वणिक्पुत्रः = व्यापारी, बनिया का पुत्र।
विभवक्षयात् = धन के अभाव के कारण।
देशान्तरं = दूसरे देश में।
गन्त-मिच्छन = जाने की इच्छा करता हुआ।
व्यचिन्त-स्ववीर्यतः = अपने पराक्रम से।
भुक्ताः = भोगे गये।
विभवहीनः = धन से रहित (दरिद्रः)।
वसेत् = रहता है।
पुरुषाधमः = अधम (नीच) मनुष्य।
लौहघटिता = लोहे से बनी हुई।
पूर्वपुरुषोपार्जिता = पूर्वजों द्वारा अर्जित।
तुला = तराजू।
श्रेष्ठिनः = सेठ के।
निक्षेपभूताम् = धरोहर-स्वरूप।
प्रस्थितः = चला गया।
सुचिरम् = अत्यधिक।
भ्रान्त्वा = पर्यटन करके।
स्वपुरमागत्य = अपने नगर में आकर।
उवाच = बोला।
दीयताम् = दीजिए।
मूषकैः = चूहों द्वारा।
प्रसंग – प्रस्तुत कथांश हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ (प्रथमोभागः) के ‘लौहतुला’ नामक पाठ से उद्धृत किया गया है। मूलतः यह पाठ संस्कृत के सुप्रसिद्ध कथा-ग्रन्थ ‘पञ्चतन्त्रम्’ के ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र से संकलित किया गया है। इस अंश में नष्ट हुए धन वाले किसी व्यापारी द्वारा धन कमाने हेतु दूसरे देश में जाते समय अपनी पुस्तैनी लोहे की तराजू को धरोहर रूप में रखने का तथा वापस आकर माँगने पर सेठ द्वारा बहाना बनाकर तुला लौटाने से मना करने का वर्णन हुआ है।

हिन्दी-अनुवाद : किसी स्थान पर जीर्णधन नाम का कोई व्यापारी (बनिया का पुत्र) रहता था। धन के नष्ट हो जाने के कारण दूसरे देश में जाने की इच्छा करते हुए उसने सोचा कि जिस देश अथवा स्थान पर अपने पराक्रम द्वारा अत्यधिक ऐश्वर्य का भोग किया हो, उसी स्थान पर जो मनुष्य धनहीन होकर रहता है तो वह अधम (नीच) मनष्य माना जाता है।

और उसके घर में पूर्वजों द्वारा अर्जित एक लोहे से बनी हुई तराजू थी। और उस तराजू को किसी सेठ के घर में धरोहर के रूप में रखकर वह दूसरे देश में चला गया। इसके बाद बहुत समय तक दूसरे देश में इच्छानुसार भ्रमण करके वह फिर से अपने नगर में आकर सेठ से बोला – “हे सेठजी ! मेरी वह धरोहर रूप में रखी हुई तराजू दीजिए।” वह बोला-“अरे! वह तराजू तो नहीं है, तुम्हारी तराजू को चूहे खा गए।”

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सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्गः – प्रस्तुतकथांशः अस्माकं पाठ्य-पुस्तकस्य ‘शेमुषी-प्रथमो भागः’ इत्यस्य ‘लौहतुला’ इति शीर्षकपाठाद् उद्धृतः। मूलतः पाठोऽयं पं. विष्णुशर्माविरचितस्य ‘पञ्चतन्त्रम्’ इति कथाग्रन्थस्य ‘मित्रभेद’ इति तन्त्रात् सङ्कलितः।

अंशेऽस्मिन् निर्धनजीर्णधनस्य वणिक्पुत्रस्यः आत्मग्लानिपूर्णविचाराणां, स्वस्य लौहतुलां कस्यचिद् श्रेष्ठिनः पार्वे निक्षेपं कृत्वा देशान्तरं गमनस्य प्रत्यावर्तनानन्तरं लोभविष्टेन श्रेष्ठिना असत्यकथनस्य च वर्णनं वर्तते।

संस्कृत-व्याख्या – कुत्रचित् स्थाने जीर्णधनाभिधः व्यापारिसुतः अवर्तत। असौ च धनाभावात् अन्यस्थानं प्रयातुकामः चिन्तितवान् यस्मिन् स्थाने स्वपराक्रमेण भोग्यानि वस्तूनि उपभुक्तानि तस्मिन् एव स्थाने धनाभावपीडितः भूत्वा यो वसति असौ नीचः जनः भवंति।

तस्य जीर्णधनस्य च निकेतने पूर्वजैः समुपार्जिता लौहनिर्मिता तुला आसीत्। तां च तुलां सः कस्यचित् धनिकस्य आवासे न्यासरूपेण धृत्वा अन्यस्मिन् देशे प्रस्थानम् अकरोत्। तदनन्तरं विदेशे बहुकालं स्वेच्छया भ्रमणं कृत्वा भूयः स्वस्य ग्राममागत्य सः जीर्णधनः तं धनिकम् अवदत्’हे धनिक ! मदीया सा न्यासरूपा तुलां ददातु।” सः श्रेष्ठी अवदत् “अरे ! सा तुला तु न वर्तते, यतोहि तव लौहतुला मूषकैः खादिता” इति।

व्याकरणात्मक टिप्पणी

आसीत् – अस् धातु, लङ्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
गन्तुम् – गम् + तुमुन्।
इच्छन् – इष् + शत।
व्यचिन्तयत् – विचिन्त्य् धातु, लङ्लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन।
भुक्ताः – भुज् + क्त, बहुवचन।
पुरुषाधमः – पुरुष + अधमः (दीर्घ सन्धि)।
प्रस्थितः – प्र + स्था + क्त।
यथेच्छया – यथा + इच्छया (गुण सन्धि)।
आगत्य – आ + गम् + ल्यप्।
नास्ति – न + अस्ति (दीर्घ सन्धि)।

  1. जीर्णधन अवदत्-“भोः श्रेष्ठिन्! नास्ति दोषस्ते, यदि मूषकैक्षितेति। ईदृगेवायं संसारः। न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति। परमहं नद्यां स्नानार्थं गमिष्यामि। तत् त्वमात्मीयं शिशुमेनं धनदेवनामानं मया सह स्नानोपकरणहस्तं प्रेषय” इति।
    स श्रेष्ठी स्वपुत्रमुवाच-“वत्स! पितृव्योऽयं तव, स्नानार्थं यास्यति, तद् गम्यतामनेन सार्धम्” इति।
    अथासौ वणिक्शिशुः स्नानोपकरणमादाय प्रहृष्टमनाः तेन अभ्यागतेन सह प्रस्थितः। तथानुष्ठिते स वणिक् स्नात्वा तं शिशुं गिरिगुहायां प्रक्षिप्य, तदद्वारं बृहच्छिलयाच्छाद्य सत्त्वरं गृहमागतः।

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कठिन-शब्दार्थ :

अवदत् = कहा।
ईदृगेव = इसी प्रकार का ही।
नद्याम् = नदी में।
आत्मीयम् = अपना।
शिशुम् = बालक को।
स्नानोपकरणहस्तम् = स्नान की सामग्री से युक्त हाथ वाला।
प्रेषय = भेज दीजिए।
पितृव्यः = पिता-तुल्य, चाचा।
यास्यति = जायेगा।
सार्धम् = साथ।
प्रहृष्टमनाः = प्रसन्न मन से।
आदाय = लेकर।
अभ्यागतेन = अतिथि के।
प्रस्थितः = चला गया।
तथानुष्ठिते = वैसा होने पर।
स्नात्वा = स्नान करके।
गिरि गुहायाम् = पर्वत की गुफा में।
प्रक्षिप्य = फेंककर।
सत्वरं = शीघ्र ही।
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ (प्रथमोभागः) के ‘लौहतुला’ नामक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस अंश में लोहे की तराजू को चूहों द्वारा खाया जाना बताकर सेठ द्वारा लौटाने से मना करने पर जीर्णधन द्वारा बुद्धि-बल से बिना किसी विकार को प्रकट करके उस सेठ के पुत्र को अपने साथ स्नान हेतु नदी तट पर ले जाने का तथा वहाँ पर्वत की गुफा में उस बालक को छिपा देने का वर्णन किया गया है।

हिन्दी-अनुवाद : जीर्णधन बोला-“हे सेठजी ! तुम्हारा दोष नहीं है, यदि चूहों के द्वारा तराजू को खा लिया गया है तो। यह संसार इसी प्रकार का ही है। यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है। किन्तु मैं नदी पर स्नान करने के लिए ज। इसलिए तुम अपने इस पुत्र धनदेव नाम वाले को मेरे साथ स्नान की सामग्री के साथ भेज दीजिए।”
वह सेठ अपने पुत्र से बोला “पुत्र! तुम्हारे चाचा स्नान के लिए जायेंगे, इसलिए तुम भी इनके साथ जाओ।”
इसके बाद वह व्यापारी का पुत्र स्नान की सामग्री को हाथ में लिए हुए प्रसन्न मन से उस अतिथि के साथ चला गया। वैसा ही होने पर उस व्यापारी ने स्नान करके उस बालक को पर्वत की गुफा में फेंककर (छोड़कर), उसके दरवाजे को एक बड़े शिलाखण्ड से ढककर शीघ्र ही वह घर आ गया।

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –
प्रसङ्गः – प्रस्तुतगद्यांशः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘शेमुषी’ (प्रथमो भागः) इत्यस्य ‘लौहतुला’ इति शीर्षकपाठाद् उद्धृतः। अस्मिन् अंशे लौहतुला मूषकैक्षितेति श्रेष्ठिनः कथनस्य समर्थनं कृत्वा जीर्णधनः तस्य श्रेष्ठिनः पुत्रं स्नानव्याजेन नदीतटं प्रति नयति, तत्र च तं शिशं गिरिगहायां प्रक्षिप्य गृहं प्रत्यागच्छतीति वर्णितम्।
संस्कृत-व्याख्या – जीर्णधनः अवदत्-हे धनिक! तव अपराधः न वर्तते, चेत् लौहतुलां आखुभिः खादितेति। एतत् भुवनं एतादृशमेव वर्तते। अत्र न किमपि स्थिरं वर्तते। किन्तु अधुना अहं स्नानाय सरितातटे यास्यामि। तस्मात् भवान् स्वस्य इमं बालकं धनदेवाभिधानं मया साकं स्नानसामग्रीहस्तं प्रेषयतु।” इति।

सः धनिकः स्वसुतम् अकथयत्-“पुत्र! एषः पितृतुल्यः त्वदीयः, स्नानाय गमिष्यति, तस्मात् अनेन जीर्णधनेन सह गच्छ।”
अनन्तरं सः धनिकपुत्रः स्नानसामग्री गृहीत्वा प्रसन्नचेतः तेन आगन्तुकेन जीर्णधनेन सार्धं प्रस्थानं करोति। तथैव कृते सति सः वणिक् जीर्णधनः स्नानं कृत्वा तं बालं पर्वतकन्दरायां निक्षिप्य, तस्याः गुहायाः द्वारं विशालशिलाखण्डेन आच्छाध शीघ्रमेव निकेतनमागतवान्।

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व्याकरणात्मक टिप्पणी –

दोषस्ते – दोषः + ते (विसर्ग-सत्व सन्धि)।
भक्षितेति – भक्षिता + इति (गुण सन्धि)।
ईदृक् + एव (व्यंजन सन्धि)।
नद्याम् – नदी शब्द, सप्तमी विभक्ति, एकवचन।
यास्यति – या धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
अनेन सह – इदम् शब्द, पुल्लिंग, तृतीया विभक्ति ‘सह’ के योग में प्रयुक्त है।
आदाय – आ + दा + ल्यप्।
प्रक्षिप्य – प्र + क्षिप् + ल्यप्।

  1. सः श्रेष्ठी पृष्टवान्-“भोः! अभ्यागत! कथ्यतां कुत्र मे शिशुर्यस्त्वया सह नदीं गतः”? इति।
    स आह – “नदीतटात्स श्येनेन हृतः” इति। श्रेष्ठ्याह-“मिथ्यावादिन्! किं क्वचित् श्येनो बालं हर्तुं शक्नोति? तत् समर्पय मे सुतम् अन्यथा राजकुले निवेदयिष्यामि।” इति।
    स आह – “भोः सत्यवादिन्! यथा श्येनो बालं न नयति, तथा मूषका अपि लौहघटितां तुलां न भक्षयन्ति। तदर्पय मे तुलाम्, यदि दारकेण प्रयोजनम्।” इति।
    एवं विवदमानौ तौ द्वावपि राजकुलं गतौ। तत्र श्रेष्ठी तारस्वरेण प्रोवाच-“भोः! अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! मम शिशुरनेन चौरेणापहृतः” इति।

कठिन-शब्दार्थ :

पृष्टवान् = पूछा।
अभ्यागतः = अतिथि।
त्वया सह = तुम्हारे साथ।
श्येनेन = बाज पक्षी के द्वारा।
हतः = ले गया।
मिथ्यावादिन् = झूठ बोलने वाले।
बालम् = बालक को।
हर्तुम् = हरण करने में।
सुतम् = पुत्र को।
समर्पय = दीजिए।
लौहघटिताम् = लोहे से बनी हुई।
न भक्षयन्ति = नहीं खाते हैं।
दारकेण = पुत्र से।
विवदमानौ = झगड़ा करते हुए।
तारस्वरेण = जोर से, उच्च स्वर से।
प्रोवाच = बोला।
अब्रह्मण्यम् = घोर अन्याय।
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ (प्रथमोभागः) के ‘लौहतुला’ नामक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ ‘पञ्चतन्त्र’ के ‘मित्रभेद’ नामक तन्त्र से संकलित किया गया है। लोहे की तराजू को देने से मना करने पर अतिथि (व्यापारी) सेठ के पुत्र को नदी तट पर स्नान कराने के बहाने से ले जाकर पर्वत की गुफा में छिपा देता है, लौटने पर जब सेठ अपने पुत्र के विषय में पूछता है तो वह उसे बाज पक्षी द्वारा उठा ले जाने की बात कहता है, जिस पर सेठ विश्वास नहीं करता एवं दोनों झगड़ा करते हुए राजदरबार में पहुँच जाते हैं, इसी घटना का प्रस्तुत अंश में वर्णन किया गया है –

हिन्दी-अनुवाद : और उस व्यापारी ने पूछा – “हे अतिथि! कहो, मेरा पुत्र कहाँ है, जो कि तुम्हारे साथ नदी पर गया था?”
वह बोला, “नदी के तट से उसे बाज पक्षी हरण करके (उठाकर) ले गया।” सेठ बोला-“अरे झूठे! क्या
तक का हरण कर सकता है? इसलिए मेरे पत्र को लौटा दो. अन्यथा मैं राजदरबार में निवेदन करूँगा।” वह बोला – ‘”हे सत्यवादि! जिस प्रकार बाज बालक को नहीं ले जाता है, उसी प्रकार चूहे भी लोहे से बनी हुई तराजू को नहीं खाते हैं। इसलिए मेरी तराजू लौटा दीजिए यदि तुम्हें पुत्र से कोई प्रयोजन है तो।”
इस प्रकार झगड़ा करते हुए वे दोनों ही राजदरबार में चले गये। वहाँ सेठ जोर से बोला-“अरे! घोर अन्याय, घोर अन्याय ! मेरे बालक का इस चोर ने अपहरण कर लिया है।”

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्गः – प्रस्तुतगद्यांशः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘शेमुषी’ (प्रथमो भागः) इत्यस्य ‘लौहतुला’ इति शीर्षकपाठाद् उद्धृतः। अस्मिन् अंशे श्रेष्ठिनः स्वस्य पुत्रविषये जीर्णधनस्य च लौहतुलाविषये विवादं वर्णितम्।

संस्कृत-व्याख्या – तेन श्रेष्ठिना जीर्णधनम् अपृच्छत् – ‘भोः! आगन्तुक! वदतु, कुत्र मम बालः, यः भवता साकं सरितां स्नानाय गतवान्?” इति।
सः जीर्णधनः अवदत्-“तं शिशुं तु सरितातटात् श्येनः इति पक्षिविशेषः अपहृतवान्।” धनिकः अकथयत् “अरे असत्यवक्ता! किं कुत्रापि श्येनः पक्षि :विशेषः शिशो: अपहरणं कर्तुं शक्यते? तस्मात् मम पुत्र अर्पय, अन्यथा राजद्वारे (न्यायालये) निवेदनं करिष्यामि।”
सः जीर्णधनः अवदत्-“हे सत्यवक्ता! येन प्रकारेण श्येनखग-विशेषः बालकं नेतुं न शक्नोति, तेनैव प्रकारेण लौहनिर्मितां तुलामपि मूषकाः खादयितुं न शक्नुवन्ति। तस्मात् मदीयां तुलां ददातु, चेत् स्वपुत्रं वाञ्छति।”
एनेन प्रकारेण विवादं कुर्वन्तौ तौ धनिकजीर्णधनौ द्वावपि राजकुलं (न्यायालयं) अगच्छताम्। तत्र राजकुले धनिकः उच्चस्वरेण अवदत्-“अरे! अन्यायरूपम् अनुचितम्! अन्यायम्! मदीयबालकस्य अनेन चौरेण जीर्णधनेन अपहरणं कृतम्।”

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व्याकरणात्मक टिप्पणी –

पृष्टश्च – पृष्ट: + च (विसर्ग-सत्व सन्धि)। पृष्ट: – पृच्छ् + क्त।
वणिजा-वणिक् शब्द, तृतीया विभक्ति, एकवचन।
शिशुर्यस्त्वया – शिशुः + य: त्वया (विसर्ग-रुत्व व सत्व सन्धि)।
हृतः – हृ + क्त।
निवेदयिष्यामि – नि + वेद धातु, लुट्लकार, उत्तम पुरुष, एकवचन।
द्वावपि – द्वौ + अपि (अयादि सन्धि)।
राजकुलम् – राज्ञः कुलम् इति (षष्ठी तत्पुरुष समास)।

  1. अथ धर्माधिकारिणस्तमूचुः-“भोः! समर्म्यतां श्रेष्ठिसुतः”।
    स आह-“किं करोमि? पश्यतो मे नदीतटाच्छ्येनेन अपहृतः शिशुः”। इति। तच्छ्रुत्वा ते प्रोचुः भोः! न सत्यमभिहितं भवता-किं श्येनः शिशुं हर्तुं समर्थो भवति?
    स आह-भोः भोः! श्रूयतां मद्वचः –
    तलां लौहसहस्त्रस्य यत्र खादन्ति मषकाः।
    राजन्तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः॥
    ते प्रोचुः-“कथमेतत्”।।
    ततः स श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदितः सर्व वृत्तान्तं निवेदयामास। ततस्तैर्विहस्य द्वावपि तौ परस्परं संबोध्य तुला-शिशु-प्रदानेन तोषितवत्।

कठिन-शब्दार्थ :

ऊचुः = बोले।
श्रेष्ठिसुतः = सेठ के पुत्र को।
आह = बोला।
अपहृतः = अपहरण कर लिया गया।
तच्छ्रुत्वा = यह सुनकर।
अभिहितम् = कहा गया है।
श्रूयताम् = सुनिए।
मद्वचः = मेरी बातें।
हरेत् = हरण करने योग्य।
ततः = इसके बाद।
आदितः = आरम्भ से।
वृत्तान्तं = घटना, समाचार।
निवेदयामास = निवेदन किया।
विहस्य = हँसकर।
संबोध्य = समझा-बुझाकर।
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प्रसंग – प्रस्तुत कथांश हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी’ (प्रथमोभागः) के ‘लौहतुला’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है, जो मूलतः पञ्चतन्त्र’ के ‘मित्रभेद’ से संकलित किया गया है। इस अंश में व्यापारी और सेठ दोनों के द्वारा कलह करते हुए राजकुल में पहुँच कर एक-दूसरे पर आरोप लगाने का तथा व्यापारी की उक्ति से यथार्थ जानकर धर्माधिकारी द्वारा व्यापारी को उसकी लोहे की तराजू तथा सेठ को उसका पुत्र लौटाकर सन्तुष्ट किये जाने का वर्णन हुआ है।

हिन्दी-अनुवाद – इसके बाद न्यायाधीशों ने उस व्यापारी से कहा कि-‘अरे! इस सेठ का पुत्र दे दीजिए।’ वह बोला-‘मैं क्या करता? मेरे देखते-देखते नदी के किनारे से बाज बालक को उठा ले गया।’ – यह सुनकर वे न्यायाधीश बोले-अरे! आपने सत्य नहीं कहा है, क्या बाज बालक का अपहरण करने में समर्थ होता है?

वह बोला-हे सभ्यजनो! मेरी बातें सुनिए –
जहाँ एक टन (हजार किलोग्राम) की लोहे की तराजू को चूहे खा सकते हैं, हे राजन् ! वहाँ पर बाज भी बालक का अपहरण कर सकता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
वे बोले-“यह कैसे सम्भव है?”
इसके बाद उस सेठ (व्यापारी पुत्र) ने धर्माधिकारियों के सामने आरम्भ से लेकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया। तब उन धर्माधिकारियों ने हँसते हुए उन दोनों को आपस में समझाकर तथा परस्पर में तुला एवं बालक को प्रदान करके सन्तुष्ट कर दिया।

सप्रसङ्गः संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्गः – प्रस्तुतगद्यांशः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘शेमुषी’ (प्रथमो भागः) इत्यस्य ‘लौहतुला’ इति शीर्षकपाठाद् उद्धृतः। अस्मिन् अंशे धनिकस्य पुत्रविषये जीर्णधनस्य च लौहतुलाविषये विवादस्य, राजकले च तयोः निर्णयस्य वर्णन रोचकतया वर्तते।

संस्कृत-व्याख्या – एतदनन्तरं न्यायाधिकारिणः तं जीर्णधनं प्रति अवदत् “अरे! अस्य धनिकस्य पुत्रः अर्पयताम्।” स जीर्णधनः अवदत् “किं करोमि? मम अवलोकयतः सरितातटाद् श्येनः पक्षिविशेषः बालकस्य अपहरणं कृतवान्।”
तस्य वचनमाकर्ण्य ते अवदन् – अरे! त्वया असत्यं कथितम्, किं श्येनः पक्षिविशेषः बालकस्य अपहरणं कर्तुं समर्थः भवति?
असौ जीर्णधनः अवदत्-रे! मम वचनानि आकर्ण्य –
दशशतलौहनिर्मितं तोलनयन्त्रं यस्मिन् स्थाने आखवः भक्षयन्ति, तस्मिन् स्थाने श्येनः शिशुं नयेत् नास्मिन् सन्देहः वर्तते।
ते न्यायाधिकारिणः अवदन-“इदं केन प्रकारेण?”
तदनन्तरं तेन जीर्णधनेन तेषां धर्माधिकारिणां सम्मुखे प्रारम्भतः सकलं घटनाचक्रं यथार्थतया वर्णितम्। तत्पश्चात् यथार्थ ज्ञात्वा तैः धर्माधिकारिभिः हसित्वा तौ धनिकजीर्णधनौ द्वावपि मिथः संबोध्य तथा जीर्णधनाय तस्य लौहतुलां प्रदाय, धनिकाय च तस्य पुत्र प्रदाय सन्तुष्टौ कृतवन्तौ।

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व्याकरणात्मक टिप्पणी –

धर्माधिकारिण: – धर्म + अधिकारिणः (दीर्घ सन्धि)।
पश्यतः – दृश् + शत, षष्ठी विभक्ति, एकवचन।
अपहृतः – अप + ह + क्त।
तच्छ्रुत्वा – तत् + श्रुत्वा (व्यंजन सन्धि)।
हर्तुम – ह + तुमुन्।
निवेदयामास – नि + वेद् + णिच्, लिट्लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन।
विहस्य – वि + हस् + ल्यप्।
संबोध्य – सम् + बुध + णिच् ल्यप्।

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