📖 1. समाधान: पाठगत एवं पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
राजस्थान बोर्ड कक्षा 10 विज्ञान — सभी पाठगत (In-text) एवं अभ्यास (Exercise) प्रश्नों के सटीक एवं संपूर्ण हल।
पाठगत प्रश्न
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प्रश्न 1. डी.एन.ए. प्रतिकृति का प्रजनन में क्या महत्व है?
उत्तर- डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनना प्रजनन की मूल घटना है। डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाने के लिए कोशिकाएँ रासायनिक अभिक्रियाएँ करती हैं। इससे जनन कोशिका में डी.एन.ए. की दो प्रतिकृतियाँ बनती हैं। डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनने के
विज्ञान कक्षा-X 209
साथ-साथ दूसरी कोशिकीय संरचनाओं का सृजन भी होता रहता है। इसके बाद डी.एन.ए. की प्रतिकृतियाँ अलग होकर दो कोशिकाओं का निर्माण करती हैं। इस प्रकार प्रजनन में दो कोशिकाओं को बनाने के लिए डी.एन.ए. प्रतिकृति आवश्यक है।
डी.एन.ए. प्रतिकृति द्वारा आनुवंशिक गुण जनक से संतति में जाते हैं। कभी-कभी डी.एन.ए. प्रतिकृति बनते समय उसमें कुछ विभिन्नताएँ भी आ जाती हैं अतः संतति कोशिकाएँ समान होते हुए भी किसी न किसी रूप में एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। यह विभिन्नता जैव विकास का आधार है तथा स्पीशीज की उत्तरजीविता बनाये रखने में उपयोगी है।
प्रश्न 2. जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए तो लाभदायक है परन्तु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है, क्यों?
उत्तर- जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए लाभदायक होती है परन्तु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है कि लाभदायक ही हो। जनन में किसी स्पीशीज के सदस्यों में कुछ विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं वे उन्हें विशिष्ट निकेत के योग्य बनाती हैं। निकेत में अनेक परिवर्तन आ सकते हैं। यदि किसी स्पीशीज की समष्टि अपने निकेत के अनुकूल है तथा निकेत में कुछ उग्र परिवर्तन आते हैं तो ऐसी अवस्था में समष्टि का समूल विनाश हो सकता है। किन्तु यदि समष्टि के जीवों में कुछ विभिन्नता होगी तो उनके जीवित रहने की भी कुछ सम्भावना होगी। यदि वैश्विक ऊष्मीकरण के कारण जल का ताप बढ़ जाता है तो शीतोष्ण जल में पाये जाने वाले जीवाणुओं की समष्टि के अधिकतर जीवाणु व्यष्टि मर जायेंगे परन्तु उष्ण प्रतिरोधी क्षमता वाले कुछ परिवर्त जीवित रहेंगे तथा वृद्धि भी करेंगे। अतः विभिन्नता स्पीशीज की उत्तरजीविता बनाये रखती है।
परन्तु व्यष्टि की विभिन्नता यदि पर्यावरण के अनुकूल होगी तो वह जीवित रहेगा अन्यथा मर जायेगा।
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प्रश्न 1. द्विखण्डन, बहुखण्डन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर- द्विखण्डन व बहुखण्डन में भिन्नता
क्र.सं. | द्विखण्डन (Binary Fission) | बहुखण्डन (Multiple Fission) |
1. | यह प्रजनन प्राय: अनुकूल परिस्थितियों में होता है। | यह प्रजनन प्राय: प्रतिकूल परिस्थितियों में होता है। |
2. | इसमें केन्द्रक दो पुत्री केन्द्रकों में विभाजित होता है। | इसमें केन्द्रक अनेक संतति केन्द्रकों में विभाजित होता है। |
3. | मातृ कोशिका का केन्द्रक केवल एक बार विभाजित होकर दो पुत्री कोशिकाओं का निर्माण करता है। | इसमें मातृ कोशिका का केन्द्रक बार-बार विभाजित होकर कई सारे पुत्री केन्द्रकों का निर्माण करते हैं। |
4. | कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) का विभाजन प्रत्येक केन्द्रीय विभाजन (nuclear division) के बाद होता है। | कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) का विभाजन सभी केन्द्रकों के विभाजित होने के बाद होता है। |
5. | उदाहरण-अमीबा, कालाजार का रोगाणु लेस्मानिया आदि। | उदाहरण-प्लैज्मोडियम। |
प्रश्न 2. बीजाणु द्वारा जनन से जीव किस प्रकार लाभान्वित होता है?
अथवा
अगर कोई जीव बीजाणु द्वारा प्रजनन करता है, तो उसे क्या फायदा होगा? उदाहरण द्वारा समझाइए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2026)
उत्तर- बीजाणुजनन प्राय: पौधों में पाया जाता है। बीजाणुओं के ऊपर एक मोटा रक्षी आवरण होता है, जो इनकी प्रतिकूल पर्यावरण में रक्षा करता है। हल्के होने के कारण वायु द्वारा इनका प्रकीर्णन सरल होता है। अनुकूल परिस्थितियाँ (उचित ताप, नमी, भोजन आदि) मिलने पर बीजाणु अंकुरण करके नये जीव को जन्म देते हैं। जैसे-राइजोपस, म्यूकर आदि में।
प्रश्न 3. क्या आप कुछ कारण सोच सकते हैं जिससे पता चलता हो कि जटिल संरचना वाले जीव पुनरुद्भवन द्वारा नई संतति उत्पन्न नहीं कर सकते।
उत्तर- जटिल बहुकोशिक जीवों में कोशिकाएँ कार्यों के लिए विशिष्टीकृत होती हैं। ये कोशिकाएँ मिलकर ऊतक,
अंग, अंगतन्त्र तथा जीव शरीर का निर्माण करती हैं। इनमें केवल लैंगिक कोशिकाओं (नर तथा मादा युग्मक) के मिलने से ही नया जीव उत्पन्न होता है। इन जीवों की किसी अन्य कोशिका या ऊतक में नई संतति उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती।
इसके विपरीत कुछ सरल बहुकोशिकीय जीवों, जैसे-स्पंजों, हाइड्रा आदि में पुनरुद्भवन द्वारा नई संतति बनाने की क्षमता होती है। इस प्रक्रिया में जीव का कोई कटा हुआ भाग नये जीव का निर्माण कर लेता है। जटिल संरचना वाले जीवों में पुनरुद्भवन की क्षमता केवल घाव भरने तक सीमित रह जाती है।
प्रश्न 4. कुछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग क्यों किया जाता है?
अथवा
कुछ प्रकार के पादपों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का अभ्यास क्यों किया जाता है? उदाहरण भी लिखिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2026)
उत्तर— कायिक प्रवर्धन का उपयोग निम्न कारणों से किया जाता है—
(1) प्राकृतिक रूप से बीज नहीं बनने वाले पादपों जैसे केला, संतरा, अंगूर की बीज रहित किस्में तथा गुलाब आदि पौधों की किस्मों को बनाये रखने तथा इनकी व्यावसायिक स्तर पर उपलब्धता के लिए कायिक जनन ही एकमात्र विधि है।
(2) बीज द्वारा उत्पन्न पादपों से फल तथा पुष्प प्राप्त होने में काफी समय लगता है तथा सभी बीजों के अंकुरण एवं पादप बनने की निश्चितता नहीं होती जबकि कायिक जनन सुनिश्चित होता है तथा इससे कम समय में ही पुष्प एवं फल प्राप्त हो जाते हैं।
(3) कायिक जनन से प्राप्त पुष्प एवं फल गुणों में मातृ पादप से पूर्णतः समान होते हैं जिससे वांछित गुण पीढ़ी दर पीढ़ी बने रहते हैं जबकि बीजों से उत्पन्न पादपों के गुण निम्न स्तर के हो जाते हैं।
(4) कायिक जनन से उत्पन्न पादपों की उत्पादन क्षमता अधिक होती है।
(5) यह एक सस्ती विधि है।
प्रश्न 5. डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक क्यों है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2025-26)
उत्तर— विभिन्न जीवों की अभिकल्प, आकार एवं आकृति समान होने के कारण ही वे सदृश प्रतीत होते हैं। शरीर का अभिकल्प समान होने के लिए उनका ब्लूप्रिंट भी समान होना चाहिए। अतः अपने आधारभूत स्तर पर जनन, जीव के अभिकल्प का ब्लूप्रिंट तैयार करता है। कोशिका के केन्द्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों के के अणुओं में आनुवंशिक गुणों का संदेश होता है जो जनक से संतति पीढ़ी में आता है। कोशिका के केन्द्रक के में प्रोटीन संश्लेषण हेतु सूचना निहित होती है। इस संदेश के भिन्न होने की अवस्था में बनने वाली प्रोटीन भी भिन्न होगी। विभिन्न प्रोटीन के कारण अंततः शारीरिक अभिकल्प में भी भिन्नता होगी। इसीलिए की प्रतिकृति बनाई जाती है जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी प्रजाति के लक्षण तथा शारीरिक अभिकल्प समान बना रहे।
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प्रश्न 1. परागण क्रिया निषेचन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर— परागण क्रिया एवं निषेचन में भिन्नता
क्र.सं. | परागण (Pollination) | निषेचन (Fertilization) |
1. | परागकणों (Pollengrains) का एक पुष्प के परागकोश से उसी जाति के उसी पुष्प अथवा किसी दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र (Stigma) तक पहुँचने की क्रिया को परागण (Pollination) कहते हैं। | बीजाण्ड (ovule) में स्थित भ्रूणकोष (embryosac) में अण्ड कोशिका (egg cell) तथा नर युग्मक के संलयन को निषेचन (fertilization) कहते हैं। |
2. | यह क्रिया निषेचन से पहले होती है। | यह क्रिया परागण के पश्चात् होती है। |
3. | इस क्रिया को पूर्ण करने में किसी न किसी बाहरी माध्यम जैसे कीट, जल, वायु आदि की आवश्यकता होती है। | इस क्रिया में बाहरी माध्यम प्रयोग में नहीं आता है। |
4. | यह क्रिया पुष्प के बाह्य भाग में सम्पन्न होती है अतः यह बाह्य क्रिया है। | यह क्रिया पुष्प के भीतर होती है अतः यह आन्तरिक क्रिया है। |
प्रश्न 2. शुक्राशय एवं प्रोस्टेट ग्रन्थि की क्या भूमिका है?
अथवा
मानव के नर जनन तंत्र में पाए जाने वाले दो अंगों के कार्य समझाइए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
उत्तर- शुक्राशय तथा प्रोस्टेट ग्रन्थि नर जनन तंत्र के भाग हैं। शुक्राशय के द्वारा एक पीले रंग का चिपचिपे पदार्थ का स्रावण किया जाता है। यही तरल पदार्थ वीर्य का अधिकांश भाग बनाता है।
कार्य- तरल पदार्थ क्षारीय होने के कारण यह स्राव योनि मार्ग की अम्लीयता को समाप्त कर शुक्राणुओं की सुरक्षा करता है।
प्रोस्टेट ग्रन्थि- ग्रन्थि का स्राव विशेष गंध युक्त सफेद एवं हल्का क्षारीय होता है जो वीर्य का 25-30 प्रतिशत भाग बनाता है।
कार्य- इस ग्रन्थि का स्राव (प्रोस्टेटिक स्राव) शुक्राणुओं को सक्रिय बनाता है एवं वीर्य के स्कंदन को रोकता है।
प्रश्न 3. यौवनारम्भ के समय लड़कियों में कौनसे परिवर्तन दिखाई देते हैं?
उत्तर- यौवनारम्भ के समय लड़कियों में निम्न परिवर्तन दिखाई देते हैं-
(1) स्तन के आकार में वृद्धि होने लगती है तथा स्तनाग्र की त्वचा का रंग भी गहरा होने लगता है।
(2) लड़कियों में रजोधर्म होने लगता है।
(3) आवाज महीन एवं मधुर हो जाती है।
(4) काँख एवं जाँघों के मध्य जननांगी क्षेत्र में बाल निकल आते हैं तथा उनका रंग भी गहरा हो जाता है।
(5) त्वचा अक्सर तैलीय हो जाती है तथा कभी-कभी मुँहासे भी निकल आते हैं।
(6) श्रोणि भाग चौड़ा एवं नितम्ब भाग भारी हो जाता है। शरीर में वसा का संचय हो जाता है।
(7) गर्भाशय, योनि, अण्डवाहिनियों तथा भग के आकार में वृद्धि होने लगती है।
(8) लड़कों (नर) की तरफ मनोवैज्ञानिक आकर्षण होने लगता है।
प्रश्न 4. माँ के शरीर में गर्भस्थ शिशु भ्रूण को पोषण किस प्रकार प्राप्त होता है?
उत्तर- भ्रूण को माँ के रुधिर से पोषण मिलता है, इसके लिए एक विशेष संरचना होती है, जिसे प्लैसेंटा (Placenta) कहते हैं। यह एक तश्तरीनुमा संरचना है जो गर्भाशय की भित्ति में धँसी होती है। इसमें भ्रूण की ओर के ऊतक में प्रवर्ध होते हैं। माँ के ऊतकों में रिक्तस्थान होते हैं जो प्रवर्ध को आच्छादित करते हैं। यह माँ से भ्रूण को ग्लूकोज, ऑक्सीजन एवं अन्य पदार्थों के स्थानांतरण हेतु एक वृहद क्षेत्र प्रदान करते हैं।
विकासशील भ्रूण द्वारा अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न होते जिनका निपटान उन्हें प्लैसेंटा के माध्यम से माँ के रुधिर में स्थानांतरण द्वारा होता है।
प्रश्न 5. यदि कोई महिला कॉपर-टी का प्रयोग कर रही है तो क्या यह उसकी यौन-संचारित रोगों से रक्षा करेगा?
उत्तर- यदि कोई महिला कॉपर-टी का प्रयोग कर रही है तो उसकी यौन-संचारित रोगों से कोई सुरक्षा नहीं होगी क्योंकि कॉपर-टी मात्र गर्भधारण को रोकने का एक साधन है।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्न
प्रश्न 1. अलैंगिक जनन मुकुलन द्वारा होता है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2025-26; प्रश्न बैंक)
उत्तर-(b) यीस्ट।
प्रश्न 2. निम्न में से कौनसा मानव में मादा जनन तन्त्र का भाग नहीं है?
उत्तर-(c) शुक्रवाहिका।
प्रश्न 3. परागकोश में होते हैं- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2025-26)
उत्तर-(d) परागकण।
प्रश्न 4. अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के क्या लाभ हैं?
उत्तर- अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के अग्र लाभ हैं-
(1) लैंगिक जनन द्वारा संतति में विभिन्नताएँ आती हैं जिनका विकास के लिए बहुत महत्व है।
(2) नई जाति की उत्पत्ति में लैंगिक जनन महत्वपूर्ण कार्य अदा करता है।
(3) लैंगिक जनन से उत्पन्न जीवों में श्रेष्ठ गुणों का समावेश होता है।
(4) इनमें संकर ओज अधिक होता है।
प्रश्न 5. मानव में वृषण के क्या कार्य हैं?
उत्तर- मानव में वृषण के कार्य निम्न हैं-
(1) वृषण के द्वारा नर हार्मोन टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) का निर्माण किया जाता है जिसके कारण पुरुषों/लड़कों में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास होता है।
(2) शुक्राणुओं का निर्माण भी वृषण के द्वारा ही होता है।
(3) यह हार्मोन शुक्राणुओं के उत्पादन को नियंत्रित करता है।
प्रश्न 6. ऋतुस्राव क्यों होता है?
अथवा
ऋतुस्राव (रजोधर्म) होने का कारण समझाइए तथा इसकी अवधि लिखिए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
उत्तर- भ्रूण का विकास गर्भाशय में होता है इसलिए निषेचित अंड की प्राप्ति हेतु गर्भाशय प्रति माह तैयारी करता है। इसलिए इसकी अंत: भित्ति मांसल एवं स्पंजी हो जाती है। यह अंड के निषेचन होने की अवस्था में उसके पोषण के लिए आवश्यक है। परंतु निषेचन न होने की अवस्था में इस परत की भी आवश्यकता नहीं रहती। अतः यह परत धीरे-धीरे टूट कर योनि मार्ग से रुधिर एवं म्यूकस के रूप में निष्कासित होती है जिसे ऋतुस्राव कहते हैं।
इसकी अवधि 2 से 8 दिन तक की होती है और प्रत्येक 28-30 दिन तक की होती है।
प्रश्न 7. पुष्प की अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाइए। (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2022-23)
उत्तर- पुष्प की अनुदैर्ध्य काट तथा इसके विभिन्न भागों के नामांकित चित्र-
[पुष्प की अनुदैर्ध्य काट (Longitudinal section of a flower showing Stamen, Pistil, Petals, Sepals)]

चित्र-पुष्प की अनुदैर्ध्य काट
प्रश्न 8. गर्भनिरोधक की विभिन्न विधियाँ कौनसी हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
अथवा
गर्भधारण को रोकने की कोई चार युक्तियों को लिखिए। (प्रश्न बैंक)
उत्तर- गर्भनिरोधक की विभिन्न विधियाँ निम्न हैं-
(1) एक तरीका यांत्रिक अवरोध का है जिससे शुक्राणु अंडकोशिका तक न पहुँच सके। शिश्न को ढकने वाले कंडोम अथवा योनि में रखने वाली अनेक युक्तियों का उपयोग किया जा सकता है।
(2) दूसरा तरीका शरीर में हार्मोन संतुलन के परिवर्तन का है, जिससे अंड का मोचन ही नहीं होता अतः निषेचन नहीं हो सकता। ये दवाएँ सामान्यतः गोली के रूप में ली जाती हैं। परंतु ये हार्मोन संतुलन को परिवर्तित करती हैं अतः उनके कुछ विपरीत प्रभाव भी हो सकते हैं।
(3) गर्भधारण रोकने के लिए कुछ अन्य युक्तियाँ जैसे कि लूप अथवा कॉपर-टी को गर्भाशय में स्थापित करके भी किया जाता है।
(4) यदि पुरुष की शुक्रवाहिकाओं को अवरुद्ध कर दिया जाए तो शुक्राणुओं का स्थानान्तरण रुक जाएगा। यदि स्त्री की अंडवाहिनी अथवा फेलोपियन नलिका को अवरुद्ध कर दिया जाए तो अंड (डिंब) गर्भाशय तक नहीं पहुँच सकेगा दोनों ही अवस्थाओं में निषेचन नहीं हो पाएगा। शल्य क्रिया तकनीक द्वारा इस प्रकार के अवरोध उत्पन्न किए जा सकते हैं।
प्रश्न 9. एककोशिक एवं बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में क्या अन्तर है?
उत्तर-
एककोशिक एवं बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में अन्तर
क्र.सं. | एककोशिक जीवों में जनन | बहुकोशिक जीवों में जनन |
1. | एककोशिक जीवों में अलैंगिक जनन होता है। | बहुकोशिक जीवों में प्रायः लैंगिक प्रकार से जनन होता है। |
2. | एककोशिक जीवों में जनन के लिए कोई विशिष्ट भाग नहीं होता है। | बहुकोशिक जीवों में जनन के लिए विशिष्ट कोशिकाएँ एवं ऊतक होते हैं। |
3. | एककोशिक जीवों में द्विविभाजन, बहुखण्डन, मुकुलन आदि के द्वारा अलैंगिक जनन होता है। | यह प्रायः अर्धसूत्री विभाजन द्वारा होता है। |
4. | एक कोशिक जीवों में जनन विधि सरल होती है। | जबकि इनमें जनन विधि जटिल होती है। |
प्रश्न 10. जनन किसी स्पीशीज की समष्टि के स्थायित्व में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर- अपनी जनन क्षमता का उपयोग कर जीवों की समष्टि परितंत्र में स्थान अथवा निकेत ग्रहण करते हैं। जनन के दौरान डी.एन.ए. प्रतिकृति का अविरोध जीव की शारीरिक संरचना एवं डिजाइन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो उसे विशिष्ट निकेत के योग्य बनाती है। अतः किसी प्रजाति (स्पीशीज) की समष्टि के स्थायित्व का संबंध जनन से है।
प्रश्न 11. गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर-गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के निम्न कारण हो सकते हैं-
(i) यौन क्रिया में प्रगाढ़ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित होते हैं। अतः लैंगिक संचरण रोग जैसे जीवाणु जनित (गनेरिया एवं सिफलिस) एवं वाइरस जनित (मस्सा तथा एड्स) आदि रोगों से गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाकर बचा जा सकता है।
(ii) गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने से जनसंख्या पर नियंत्रण किया जा सकता है।
(iii) इन युक्तियों के द्वारा गर्भधारण (pregnancies) को रोका जाता है। जल्दी-जल्दी गर्भधारण से माता के शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः गर्भ-निरोधक युक्तियाँ अपनाकर माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखा जा सकता है।
(iv) इसके द्वारा अवांछित संतान से बचा जा सकता है।
📝 2. नोट्स: पाठ सार (Key Concepts & Summary)
महत्वपूर्ण परिभाषाएं, रासायनिक समीकरण, नियम, सूत्र एवं सम्पूर्ण अध्याय का सारांश।
पाठ सार
(1) हमें विभिन्न जीव इसीलिए दृष्टिगोचर होते हैं क्योंकि वे जनन करते हैं। यदि वह जीव एकल होता है तथा कोई भी जनन द्वारा अपने सदृश व्यष्टि नहीं करता, तो सम्भव है कि हमें उनके अस्तित्व का पता भी नहीं चलता। किसी स्पीशीज में पाए जाने वाले जीवों की विशाल संख्या ही हमें उसके अस्तित्व का ज्ञान कराती है।
(2) जनन-किसी जीवधारी द्वारा अपने जैसे प्रतिरूप अथवा संतान का उत्पन्न करना जनन कहलाता है।
(3) जनन में एक कोशिका द्वारा ही प्रतिकृति का निर्माण तथा अतिरिक्त कोशिकीय संगठन का सृजन होता है। कोशिका के केन्द्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों के के अणुओं में आनुवंशिक गुणों का संदेश होता है जो जनक से संतति पीढ़ी में जाता है।
(4) जनन की मूल घटना की प्रतिकृति बनाना है।
(5) जनन के दौरान प्रतिकृति का अविरोध जीव की शारीरिक संरचना एवं डिजाइन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है जो उसे विशिष्ट निकेत के योग्य बनाती है। अतः किसी प्रजाति (स्पीशीज) की समष्टि के स्थायित्व का सम्बन्ध जनन से है।
(6) विभिन्न जीवों द्वारा अपनाए जाने वाली जनन की प्रणाली उनके शारीरिक अभिकल्प पर निर्भर करती है।
(7) विखण्डन-एक कोशिक जीवों में कोशिका विभाजन अथवा विखण्डन द्वारा नए जीवों की उत्पत्ति होती है। अमीबा (प्रोटोजोआ) जैसे जीवों में कोशिका विभाजन किसी भी तल में हो सकता है। परन्तु लेस्मानिया जैसे जीवों में द्विखंडन एक निर्धारित तल से होता है।
(8) बहुखण्डन-मलेरिया परजीवी प्लैज्मोडियम जैसे अन्य एक कोशिक जीव एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाते हैं जिसे बहुखण्डन कहते हैं।
(9) द्विखण्डन-कुछ एककोशिकीय जीवों जैसे-अमीबा, पैरामीशियम आदि में कोशिका दो भागों में बंट जाती हैं। प्रत्येक भाग नये जीव का निर्माण कर लेता है। इस क्रिया को द्विखण्डन कहते हैं।
(10) पुनरुद्भवन-यदि किसी कारणवश पूर्णरूपेण विभेदित जीव क्षत-विक्षत हो जाता है अथवा कुछ टुकड़ों में टूट जाता है तो इसके अनेक टुकड़े वृद्धि कर नये जीव में विकसित हो जाते हैं। इस क्रिया को पुनरुद्भवन कहते हैं। उदाहरण-हाइड्रा एवं प्लेनेरिया।
(11) मुकुलन-इस प्रकार के जनन में वयस्क के शरीर पर एक कलिका उत्पन्न होती है उसे मुकुल कहते हैं। मुकुल जनन इकाई का कार्य करता है। यह कलिका पूर्ण वृद्धि करके पैतृक शरीर से पृथक् हो जाती है एवं स्वतन्त्र जीव बन जाता है। उदाहरण-हाइड्रा।
(12) कायिक जनन-वह जनन जिसमें पौधे के किसी भी कायिक भाग से जैसे पत्ती, स्तम्भ अथवा जड़ से नया पौधा बन जाता, कायिक जनन कहलाता है। ब्रायोफिलम की पत्तियों की कोर पर कुछ कलिकाएँ विकसित होकर मृदा में गिर जाती हैं तथा नए पौधे में विकसित हो जाती हैं।
(13) प्राकृतिक रूप से बीज नहीं बनने वाले पादपों जैसे केला, सन्तरा, अंगूर की बीजरहित किस्में तथा गुलाब आदि पौधों की किस्मों को बनाये रखने के लिए कायिक जनन ही एकमात्र विधि है।
(14) ऊतक संवर्धन-ऊतक संवर्धन तकनीक द्वारा किसी एकल पौधे से अनेक पौधे संक्रमण-मुक्त परिस्थितियों में उत्पन्न किए जा सकते हैं। इस तकनीक का उपयोग सामान्यतः सजावटी पौधों के संवर्धन में किया जाता है।
(15) बीजाणु समासंघ-राइजोपस कवक के ऊर्ध्व तन्तुओं पर गोल रचना पाई जाती है जिसे बीजाणुधानी कहते हैं, जो जनन में भाग लेती है। बीजाणुधानी में बीजाणुओं (spores) का निर्माण होता है। परिपक्व बीजाणुधानी फट जाती है एवं बीजाणु बाहर निकल आते हैं। यह अनुकूल परिस्थितियों में नम सतह के सम्पर्क में आने पर वृद्धि करने लगते हैं।
(16) लैंगिक जनन—लैंगिक जनन वह जनन है जिसमें शुक्राणु तथा अण्डाणु का संलयन होता है तथा युग्मनज का निर्माण होता है। इस प्रकार का प्रजनन करने वाले जन्तुओं में कुछ विशेष प्रकार के अंग (वृषण तथा अण्डाशय) पाये जाते हैं जो शुक्राणु व अण्डाणु का निर्माण करते हैं।
(17) लैंगिक जनन के आधारीय लक्षण—
लैंगिक जनन में संतति उत्पादन हेतु दो जीव भाग लेते हैं-
(i) संतान का उत्पादन अण्डे तथा शुक्राणु के संलयन (fusion) से होता है। ये संरचनाएँ लैंगिक कोशिकाएँ अथवा युग्मक होती हैं।
(ii) निषेचन होने पर नर और मादा युग्मक समेकित होकर एक युग्मनज (zygote) बनाते हैं जो परिवर्धित होकर एक परिपक्व जीव बन जाता है।
(iii) इसके परिणामस्वरूप दो जनकों का आनुवंशिक पदार्थ संयोजित हो जाता है।
(18) डी.एन.ए. प्रतिकृति की तकनीक से विभिन्नता उत्पन्न होती है जो स्पीशीज के अस्तित्व के लिए लाभप्रद है। लैंगिक जनन द्वारा अधिक विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं।
(19) पुष्प के विभिन्न भाग एवं कार्य—
(20) एकलिंगी पुष्प—जब पुष्प में पुंकेसर अथवा स्त्रीकेसर में से कोई एक जननांग उपस्थित होता है तो पुष्प एकलिंगी कहलाते हैं। उदाहरण-पपीता एवं तरबूज।
(21) उभयलिंगी पुष्प—जब पुष्प में पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर दोनों उपस्थित होते हैं तो उसे उभयलिंगी पुष्प कहते हैं। उदाहरण-गुड़हल एवं सरसों।
(22) मादा जननांग (स्त्रीकेसर) के तीन भाग होते हैं जिन्हें क्रमशः वर्तिकाग्र, वर्तिका एवं अण्डाशय कहते हैं। अण्डाशय में बीजाण्ड होते हैं। प्रत्येक बीजाण्ड में एक अण्डकोशिका होती है। परागकण द्वारा उत्पादित नर युग्मक अण्डाशय की अण्डकोशिका (मादा युग्मक) से संलयित हो जाता है। जनन कोशिकाओं के इस युग्मन अथवा निषेचन से युग्मनज बनता है जिसमें नये पौधे का निर्माण होता है।
(23) नर जननांग—को पुंकेसर कहते हैं। पुंकेसर के भी तीन भाग होते हैं-
(24) परागण—परागण वह प्रक्रिया है जिसमें परागकोष से निकले परागकण किसी फूल के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। यह दो प्रकार का होता है-
(i) स्वपरागण—यदि परागकणों का स्थानान्तरण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर होता है तो यह स्वपरागण कहलाता है।
(ii) परपरागण—एक पुष्प के परागकण दूसरे पुष्प पर स्थानान्तरित होते हैं तो उसे परपरागण कहते हैं। यह वायु, जल या किसी प्राणी द्वारा होता है।
(25) निषेचन के बाद पुष्प में निम्न परिवर्तन आते हैं—
(i) बीजाण्ड में भ्रूण विकसित होता है तथा बीजाण्ड बीज में बदल जाता है।
(ii) अण्डाशय की भित्ति फल भित्ति में बदल जाती है तथा अण्डाशय फल का निर्माण करता है।
(iii) बाह्यदल, दल, पुंकेसर, वर्तिका एवं वर्तिकाग्र झड़ जाते हैं।
बीज उपयुक्त परिस्थिति में अंकुरित होकर नये पादप का निर्माण करते हैं।
(26) यौवनारम्भ—मानव (नर एवं मादा) में अपरिपक्व जनन अंगों का परिपक्वन होकर जनन क्षमता का विकास होना यौवनारम्भ कहलाता है। नर की अपेक्षा मादा में यौवनारम्भ पहले प्रारम्भ होता है।
(27) यौवनारंभ में शरीर में अनेक परिवर्तन आते हैं, उदाहरण के लिए लड़कियों में स्तन का विकास तथा लड़कों के चेहरे पर नए बालों का आना, लैंगिक परिपक्वता के चिन्ह हैं।
(28) नर जनन तन्त्र- जनन कोशिका उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान तक पहुँचाने वाले अंग संयुक्त रूप से नर जनन तन्त्र बनाते हैं। ये अंग निम्न हैं-
(i) वृषण (ii) शुक्रवाहिनियाँ (iii) मूत्रमार्ग (iv) शिश्न (v) शुक्राशय (vi) प्रोस्टेट ग्रन्थि।
(29) मादा जनन तन्त्र- मादा (स्त्रियों) में निम्न जननांग पाये जाते हैं-
(i) अण्डाशय (ii) अण्डवाहिनी (iii) गर्भाशय (iv) योनि।
(30) मैथुन के समय शुक्राणु योनि मार्ग में स्थापित होते हैं जहाँ से ऊपर की ओर यात्रा करके वे अण्डवाहिका तक पहुँच जाते हैं, जहाँ अण्डकोशिका से मिल सकते हैं। निषेचित अंडा विभाजित होकर कोशिकाओं की गेंद जैसी संरचना या भ्रूण बनता है।
(31) प्लैसेन्टा- भ्रूण को माँ के रुधिर से ही पोषण मिलता है, इसके लिए एक विशेष संरचना होती है जिसे प्लैसेन्टा कहते हैं। यह एक तश्तरीनुमा संरचना होती है जो गर्भाशय की भित्ति में धंसी होती है। प्लैसेन्टा भ्रूण को पोषण, श्वसन एवं अन्य कार्यिकी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
(32) रजोधर्म अथवा ऋतु स्राव- निषेचन की क्रिया फैलोपियन नलिका (अण्डवाहिनी) में होती है। निषेचन न होने पर गर्भाशय की आन्तरिक मोटी भित्ति रक्तवाहिनियों के साथ टूटकर रक्त स्राव के रूप में बाहर निकलती है, इसे रजोधर्म कहते हैं। इसकी अवधि से दिन तक होती है तथा प्रत्येक दिन के अन्तराल पर रजोधर्म होता है। इस प्रकार इसे ऋतु स्राव चक्र कहते हैं।
(33) यौन संचारित रोग- लैंगिक सम्पर्क से होने वाले रोगों को यौन संचारित रोग (STD) कहते हैं। यौन संचारित रोग निम्न हैं-गोनेरिया, सिफलिस, मस्सा एवं एड्स।
(34) यौन संचारित रोगों से बचने के उपाय-
(i) मैथुन के समय हमेशा निरोध (कंडोम) का उपयोग करना चाहिये।
(ii) किसी अनजान व्यक्ति से अथवा बहुत व्यक्तियों के साथ यौन संबंध नहीं रखना चाहिए।
(iii) समलैंगिकता को नकारा जाना चाहिए।
(35) गर्भनिरोधी युक्तियाँ- गर्भनिरोधी युक्तियाँ अपनाकर गर्भधारण रोका जा सकता है। कंडोम, गर्भनिरोधी गोलियाँ, कॉपर टी या लूप तथा अन्य युक्तियाँ इसके उदाहरण हैं।
(36) गोलियाँ (पिल्स)- महिलाओं के द्वारा खाया जाने वाला गर्भनिरोधक प्रोजेस्ट्रोन और एस्ट्रोजन का संयोजन है। जिसे मुंह द्वारा लिया जाता है। यह पिल्स के नाम से लोकप्रिय है। यह अण्डोत्सर्जन और रोपण को रोकने का कार्य करती है।
(37) वैसेक्टोमी- नर में शुक्रवाहिनी को धागे से बाँध दिया जाता अथवा काट दिया जाता है। इस क्रिया को वैसेक्टोमी कहते हैं।
(38) ट्यूबेक्टोमी- मादा में अण्डवाहिनी को धागे से बाँध दिया जाता अथवा काट दिया जाता है। इस क्रिया को ट्यूबेक्टोमी कहते हैं।
(39) बढ़ती मादा भ्रूणहत्या की कानूनी रोक के लिए उल्ब वेधन (ऐमीनोसेंटेसिस) जाँच (वर्धनशील भ्रूण के चारों ओर उल्ब तरल में गुणसूत्री प्रतिरूप के आधार पर) भ्रूणीय लिंग निर्धारण/लिंग परीक्षण पर वैधानिक प्रतिबंध है।
⭐ 3. अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Important Questions)
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs), अतिलघूत्तरात्मक, लघूत्तरात्मक एवं निबंधात्मक परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर।
अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न
बहुविकल्पीय प्रश्न-
1. कौन-से जीव में, द्विखंडन द्वारा नए जीव की उत्पत्ति हो सकती है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2026)
2. अलैंगिक जनन में कितने जीव भाग लेते हैं? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2026)
3. पुष्प के स्त्रीकेसर के मध्य भाग को कहते हैं-
4. माँ के शरीर में गर्भ को विकसित होने में लगभग कितने दिन का समय लगता है?
5. यदि अण्डकोशिका का निषेचन नहीं हो तो यह लगभग कितने दिन तक जीवित रहती है?
6. प्रोस्टेट तथा शुक्राशय अपने स्राव को किसमें डालते हैं?
7. दोनों अण्डवाहिकाएँ संयुक्त होकर एक लचीली थैलेनुमा रचना का निर्माण करती हैं, जिसे कहते हैं—
प्रश्न 9. ब्रायोफिलम के पौधे में कायिक जनन किससे होता है?
प्रश्न 11. अमीबा में जनन की विधि है- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
प्रश्न 13. पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) द्वारा जनन होता है-
अथवा
कौनसे जीव में, पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) द्वारा नए जीव की उत्पत्ति हो सकती है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
प्रश्न 15. कायिक प्रवर्धन के लिए सत्य है-
प्रश्न 16. प्रोस्टेट ग्रन्थि सम्बन्धित है- (प्रश्न बैंक)
प्रश्न 18. एकलिंगी पुष्प का उदाहरण है-
प्रश्न 20. मानव में शुक्राणुओं का निर्माण होता है-
प्रश्न 22. लैंगिक संचारित रोग (STD) का उदाहरण नहीं है-
प्रश्न 24. वृषण की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है-
26. अण्ड कोशिकाओं का निर्माण होता है-
28. जब पुष्प में पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर दोनों उपस्थित होते हैं, तो पुष्प कहलाते हैं- (माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2024)
30. परागकण द्वारा उत्पादित नर युग्मक अण्डाशय की निम्न में किस कोशिका के साथ संलयित होता है?
32. पुष्प में नरजनन भाग का नाम क्या होता है? (माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2023-24)
34. पुष्पीय पादप में निषेचन के बाद भ्रूण का विकास कहाँ होता है? (प्रश्न बैंक)
36. उभयलिंगी पुष्प है- (प्रश्न बैंक)
38. वृषण उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में स्थित होते हैं क्योंकि शुक्राणु उत्पादन के लिए आवश्यक ताप शरीर के ताप से- (प्रश्न बैंक)
(d) मुकुलन— यीस्ट कोशिका से छोटे मुकुल उभरकर कोशिका से अलग हो जाते हैं तथा स्वतंत्र रूप से वृद्धि करते हैं।
प्रश्न 13. प्लेनेरिया में पुनरुद्भवन को चित्र सहित समझाइए।
(प्रश्न बैंक)
उत्तर— प्लेनेरिया को यदि कई टुकड़ों में काट दिया जाए तो प्रत्येक टुकड़ा विकसित होकर पूर्णजीव का निर्माण कर लेता है। इसे पुनरुद्भवन कहते हैं। पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा सम्पादित होता है। इन कोशिकाओं के क्रमप्रसरण से अनेक कोशिकाएँ बन जाती हैं। कोशिकाओं के इस समूह से परिवर्तन के दौरान विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ एवं ऊतक बनते हैं। यह परिवर्तन बहुत व्यवस्थित रूप एवं क्रम से होता है, जिसे परिवर्धन कहते हैं।
[प्लेनेरिया में पुनरुद्भवन]

प्रश्न 14. गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के कारणों को समझाइए तथा कोई एक गर्भनिरोधक युक्ति का नाम लिखिए।
(माध्य. शिक्षा बोर्ड, 2025)
उत्तर— गर्भनिरोधक युक्तियाँ अपनाने के कारण—
उत्तर हेतु पाठ्यपुस्तक के प्रश्न सं. 11 का उत्तर देखें।
गर्भनिरोधक युक्ति— 'कॉपर-टी'।
प्रश्न 15. पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन के समय वर्तिकाग्र पर परागकणों के अंकुरण को समझाइए। चित्र बनाइए।
(प्रश्न बैंक)
उत्तर— जब परागकण उपयुक्त वर्तिकाग्र पर पहुँच जाते हैं तो परागकण में स्थित नर युग्मक को अण्डाशय में स्थित मादा युग्मक तक पहुँचाने के लिए परागकण से एक नलिका विकसित होती है। इसे परागकण का अंकुरण कहते हैं। विकसित नलिका को परागनली कहते हैं जो वर्तिका से होती हुई बीजाण्ड तक पहुँचती है।
[वर्तिकाग्र पर परागकणों का अंकुरण]

चित्र : वर्तिकाग्र पर परागकणों का अंकुरण
प्रश्न 16. नर जनन तंत्र का चित्र बनाइए व इसके विभिन्न भागों को समझाइए।
(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2025-26)
उत्तर- नर जनन तंत्र (Male Reproductive System)- जनन कोशिका (शुक्राणु) उत्पादित करने वाले अंग एवं जनन कोशिकाओं को निषेचन के स्थान पर पहुँचाने वाले अंग संयुक्त रूप से जनन तंत्र बनाते हैं। मानव के नर जनन तंत्र में निम्न अंग होते हैं-
(1) वृषण (Testis)- मानव में वृषण दो होते हैं। इनका रंग गुलाबी तथा आकृति में अण्डाकार होते हैं। दोनों वृषण उदरगुहा के बाहर एक थैली में स्थित होते हैं जिसे वृषण कोष कहते हैं। वृषण में पाई जाने वाली नलिकाओं को शुक्रजनन नलिका कहते हैं। जो वृषण की इकाई है। वृषण में शुक्राणुओं का निर्माण होता है। इसके अतिरिक्त नर हार्मोन (टेस्टेस्टेरोन) भी वृषण में बनता है। जो लड़कों में यौवनावस्था के लक्षणों का नियंत्रण करता है।
(2) शुक्रवाहिनी (Vas deference)- वृषण में उत्पादित शुक्राणुओं का मोचन शुक्रवाहिनियों के द्वारा होता है। प्रत्येक ओर की अधिवृषण से एक लम्बी शुक्रवाहिनी निकलती है। जो उदरगुहा में आकर मूत्राशय के समीप मूत्र मार्ग में खुलती है।
(3) मूत्रमार्ग (Urethra)- शुक्राणुओं एवं मूत्र दोनों के प्रवाह के उभयमार्ग है। यह मार्ग आगे जाकर शिश्न के शिखर भाग पर मूत्रजनन छिद्र (Urinogenital aperture) द्वारा बाहर खुलता है। देखिए चित्र में।
(4) शिश्न (Penis)- पेशियों से बने इस भाग में लम्बा मूत्रमार्ग स्थित रहता है जो एक छिद्र द्वारा शरीर से बाहर खुलता है। मैथुन के समय शुक्राणु (वीर्य) इसी मूत्र मार्ग से होकर निकलता है। इसी छिद्र से मूत्र निकलता है। अतः इसे मूत्र जनन छिद्र कहते हैं।
(5) शुक्राशय (Seminal Vesicles)- यह मूत्राशय के पश्च सतह एवं मलाशय के बीच स्थित होता है। यह शुक्र तरल बनाता है जो शुक्राणुओं को ले जाने के लिए एक माध्यम के रूप में कार्य करता है। शुक्रवाहक के भीतर शुक्राणु निष्क्रिय बने रहते हैं। इस तरल के साथ मिलने पर ये सक्रिय हो जाते हैं। शुक्राशय अपने तरल को शुक्रवाहिनी में स्थानांतरित करता है।
(6) प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostategland)- यह मूत्रमार्ग के आधार भाग पर स्थित होती है। यह मूत्र मार्ग में एक क्षारीय स्राव छोड़ती है जो मूत्र की अम्लता को उदासीन कर शुक्राणुओं को सुरक्षा प्रदान करती है।
[मानव का नर जनन तंत्र]

प्रश्न 17. मादा जनन तंत्र का चित्र बनाइए व इसके विभिन्न भागों को समझाइए।
(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2025-26)
उत्तर- मादा जनन तंत्र (Female Reproductive System)- स्त्रियों में निम्नलिखित प्रजनन अंग होते हैं-
(1) अण्डाशय (Ovary)- मादा (स्त्रियों) में अण्डाशयों की संख्या दो होती है। जिसकी आकृति बादाम के समान होती है। ये उदरगुहा के वृक्क के नीचे पृष्ठ भाग में स्थित होते हैं। अण्डाशयों में अण्डजनन प्रक्रिया के द्वारा अण्डे बनते हैं। अण्डाशय द्वारा मादा हार्मोन एस्ट्रोजन का स्राव किया जाता है जो मादा में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का नियमन करता है।
(2) अण्डवाहिनी (Oviduct)- प्रत्येक अण्डाशय के समीप एक पतली नली अण्डवाहिनी होती है। प्रत्येक अण्डवाहिनी के सामने वाला सिरा कीपाकार होता है। यह
[मानव का मादा जनन तंत्र]

अंडाशय से निकले अंडों को अपने में ले लेता है। अंडवाहिनी की भित्ति कुंचनशील व रोमयुक्त होती है। यह अंडा अंडवाहिनी के फैलोपियन भाग में आता है। जहाँ अंडे का निषेचन होता है।
(3) गर्भाशय (Uterus)- गर्भाशय एक माँसल रचना है जिसका ऊपरी भाग चौड़ा तथा निचला भाग संकरा होता है। दोनों ओर की अंडवाहिनियाँ गर्भाशय के चौड़े भाग में ऊपर की ओर खुलती हैं। निषेचित अण्ड गर्भाशय की भीतरी भित्ति में निर्मित सूक्ष्मांकुरों में रोपित होता है तथा शिशु के जन्म तक भ्रूण का विकास इसी में होता है।
(4) योनि (Vagina)- गर्भाशय का निचला भाग एक संकरी एवं लचीली माँसल नलिका में खुलता है जिसे योनि (Vagina) कहते हैं। मैथुन के समय पुरुष का वीर्य इसी नलिका में स्खलित होता है और गर्भाशय मुखिका से होते हुए शुक्राणु फैलोपियन नलिका में पहुँचता है।
निबन्धात्मक प्रश्न-
प्रश्न 1. पुष्प के अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाइए एवं इसके विभिन्न भागों की विशेषता एवं कार्य का वर्णन कीजिए।
अथवा
आवृत्तबीजी पुष्प के अनुदैर्ध्य काट का नामांकित चित्र बनाते हुए इसके विभिन्न भागों को समझाइए।
(माध्य. शिक्षा बोर्ड, मॉडल पेपर, 2024-25)
उत्तर- पुष्प की अनुदैर्ध्य काट का चित्र
[पुष्प की अनुदैर्ध्य काट (Longitudinal section of a flower)]

चित्र-पुष्प की अनुदैर्ध्य काट
पुष्प के विभिन्न भागों की विशेषताएँ एवं उनके कार्य का वर्णन निम्न प्रकार से है-
क्र.सं. | पुष्प के भाग | विशेषता | कार्य |
1. | पुष्प वृन्त | पुष्पवृन्त डण्ठलनुमा होता है। | पुष्प को पौधे से जोड़ता है। |
2. | पुष्पासन | सामान्यतः चपटा व फूला हुआ होता है। | पुष्प के अन्य भागों को आधार प्रदान करता है। |
3. | बाह्यदलपुंज | फूल का सबसे बाहरी भाग है, जो हरी पत्तियों के रूप में होता है। | पुष्प की कलिका अवस्था में आंतरिक अंगों की रक्षा करता है। |
4. | दलपुंज | बाह्यदलपुंज के भीतरी भाग को दलपुंज कहते हैं। प्रत्येक अंग दल या पंखुड़ी कहलाता है। इसका रंग विभिन्न फूलों में अलग-अलग होता है। | परागण हेतु कीटों व पक्षियों को आकर्षित करते हैं। |
5. | पुंकेसर | यह पुष्प का नर जनन भाग है। इसके मुख्यतः दो भाग होते हैं- पराग सूत्र एवं तंतु। पराग सूत्र योजी द्वारा परागकोश से जुड़ा होता है। परागकोश के अन्दर परागकण होते हैं। | यहाँ परागकोशों में परागकणों का निर्माण होता है। |
6. | स्त्रीकेसर | यह पुष्प का मादा जनन भाग है। प्रायः इनकी संख्या एक होती है। इसके तीन भाग होते हैं- वर्तिकाग्र, वर्तिका एवं अण्डाशय। अण्डाशय के अन्दर बीजाण्ड होते हैं। | अण्डाशय से फल एवं बीजाण्ड से बीज का निर्माण होता है। |
प्रश्न 2. (i) क्या जीव पूर्णतः अपनी प्रतिकृति का सृजन करते हैं? कारण सहित समझाइए।
अथवा
संतति में जनक की तुलना में विभिन्नताएँ किस प्रकार उत्पन्न हो जाती हैं? समझाइए।
(ii) लैंगिक जनन व अलैंगिक जनन में कोई दो अन्तर लिखिए।
उत्तर—(i) विभिन्न जीवों की डिजाइन, आकार एवं आकृति समान होने के कारण ही वे सदृश प्रतीत होते हैं। शरीर का अभिकल्प समान होने के लिए उनका ब्लूप्रिंट भी समान होना चाहिए। अतः अपने आधारभूत स्तर पर जनन, जीव के डिजाइन का ब्लूप्रिंट तैयार करता है। कोशिका के केंद्रक में पाए जाने वाले गुणसूत्रों के डी.एन.ए. के अणुओं में आनुवंशिक गुणों का संदेश होता है जो जनक से संतति पीढ़ी में जाता है।
कोशिका के केंद्रक के डी.एन.ए. में प्रोटीन संश्लेषण हेतु सूचना निहित होती है। इस संदेश के भिन्न होने की अवस्था में बनने वाली प्रोटीन भी भिन्न होगी। विभिन्न प्रोटीन के कारण अंततः शारीरिक डिजाइन में विविधता आ जाएगी।
अतः जनन की मूल घटना डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाना है। डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाने के लिए कोशिकाएँ विभिन्न रासायनिक क्रियाओं का उपयोग करती हैं। परन्तु कोई भी जैव-रासायनिक प्रक्रिया पूर्णरूपेन विश्वसनीय नहीं होती। अतः यह अपेक्षित है कि डी.एन.ए. प्रतिकृति की प्रक्रिया में कुछ विभिन्नता आएगी। परिणामतः बनने वाली डी.एन.ए. प्रतिकृतियाँ एकसमान तो होंगी, परन्तु मौलिक डी.एन.ए. का समरूप नहीं होंगी। हो सकता है कि विभिन्नताएँ इतनी उग्र हों कि डी.एन.ए. की नयी प्रतिकृति अपने कोशिकीय संगठन के साथ समायोजित नहीं हो पाए। इस प्रकार की संतति कोशिका मर जाती है। دوسری ओर डी.एन.ए. प्रतिकृति की अनेक विभिन्नताएँ इतनी उग्र नहीं होतीं। अतः संतति कोशिकाएँ समान होते हुए भी किसी न किसी रूप में एक दूसरे से भिन्न होती हैं। जनन में होने वाली यह विभिन्नताएँ जैव-विकास का आधार हैं।
(ii) लैंगिक व अलैंगिक जनन में अन्तर—
क्र.सं. | लैंगिक जनन | अलैंगिक जनन |
1. | इसमें युग्मक संलयन होता है। | इसमें युग्मक संलयन नहीं होता है। |
2. | इसमें उत्पन्न संतति में आनुवंशिक विभिन्नताएँ पाई जाती है। | उत्पन्न संतति में आनुवंशिक विभिन्नताएँ नहीं पाई जाती है। संतति जनक के समान होती है। |
प्रश्न 3. अंकुरण किसे कहते हैं? चने के बीज की संरचना का सचित्र वर्णन संक्षेप में कीजिए।
उत्तर—बीज में भावी पौधा अथवा भ्रूण होता है, जो उपयुक्त परिस्थितियों में नवोद्भिद् में विकसित हो जाता है। इस प्रक्रम को अंकुरण कहते हैं।
[चने के बीज का अंकुरण और संरचना दिखाने वाला चित्र]

चने के बीज की संरचना—चने के बीज की संरचना जानने के लिए चने के कुछ बीजों को एक रात जल में भिगोते हैं। इसके पश्चात् इन भीगे बीजों को कपड़े से ढककर एक दिन के लिए रख देते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि बीज सूखने न पायें।
अब भीगे हुए बीजों का छिलका हटाते हैं—इस छिलके को बीजावरण कहते हैं। बीजावरण को हटाने पर उपस्थित दो पत्रों के समान रचना दिखाई देती है जिसे बीजपत्र कहते हैं। जिनमें खाद्य पदार्थ संचित होता है। बीज पत्रों के बीच में भ्रूण होता है।
बीज के अंकुरण के समय मूलांकुर से मूल (जड़) तथा प्रांकुर से प्ररोह (तना) बनता है।
बीज पत्रों में भोजन संचित रहता है जो अंकुरण के समय भ्रूण को पोषण प्रदान करता है। जिन बीजों में दो बीजपत्र पाए जाते हैं, उन्हें द्विबीजपत्री कहते हैं अतः उक्त बीज द्विबीजपत्री है।
प्रश्न 4. पुष्पी पादपों में निषेचन, बीज एवं फल बनने की विधि का वर्णन कीजिए। वर्तिकाग्र पर परागकणों के अंकुरण को चित्र की सहायता से प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर—परागकणों के उपयुक्त, वर्तिकाग्र पर पहुँचने के पश्चात् नर युग्मक को अंडाशय में स्थित मादा युग्मक तक पहुँचना होता है। इसके लिए परागकण से एक नलिका विकसित होती है तथा वर्तिका से होती हुई बीजाण्ड तक पहुँचती है। बीजाण्ड के भीतर भ्रूणकोश में अण्डकोशिका (Egg cell) होती है। परागनली का अगला सिरा फट जाता है जिसके कारण
दो नर युग्मक मुक्त हो जाते हैं। एक नर युग्मक अण्ड के साथ संलयित होकर युग्मनज (Zygote) का निर्माण करता है। इस संलयन को निषेचन कहते हैं।
दूसरा नर युग्मक द्विगुणित (डिप्लाइड) द्वितीयक केन्द्रक के साथ संलयित हो जाता है और भ्रूणपोष (Endosperm nucleus) केन्द्रक बनाता है।
निषेचन के पश्चात्, युग्मनज में अनेक विभाजन होते हैं तथा बीजाण्ड में भ्रूण विकसित होता है। बीजाण्ड से एक कठोर आवरण विकसित होता है तथा यह बीज में बदल जाता है। अण्डाशय तीव्रता से वृद्धि करता है तथा परिपक्व होकर फल बनाता है। इस अंतराल में बाह्यदल, पंखुड़ी, पुंकेसर, वर्तिका एवं वर्तिकाग्र प्राय: मुरझाकर गिर जाते हैं।
बीज के भीतर एक भावी पौधा अथवा भ्रूण होता है जो उपयुक्त परिस्थितियों में नवोद्भिद् में विकसित हो जाता है।
[वर्तिकाग्र पर परागकणों का अंकुरण]

चित्र-वर्तिकाग्र पर परागकणों का अंकुरण
प्रश्न 5. अलैंगिक जनन किसे कहते हैं? इसकी प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- जनन का वह प्रकार जिसमें संतति का निर्माण बिना युग्मक संलयन के एकल जीव द्वारा होता है अलैंगिक जनन कहलाता है। अलैंगिक जनन अनेक प्रकार से हो सकता है। जैसे-
(1) विखंडन- एक कोशिक जीवों में कोशिका विभाजन अथवा विखंडन द्वारा नए जीवों की उत्पत्ति होती है। अनेक जीवाणु तथा प्रोटोजोआ की कोशिका विभाजन द्वारा सामान्यतः दो बराबर भागों में विभक्त हो जाती है। अमीबा जैसे जीवों में कोशिका विभाजन किसी भी तल से हो सकता है।
(2) खंडन- सरल संरचना वाले बहुकोशिक जीवों में जनन पाया जाता है। इसमें जीव विकसित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित हो जाता है। यह टुकड़े अथवा खंड वृद्धि कर नए जीव में विकसित हो जाते हैं जैसे-स्पाइरोगाइरा में यह जनन पाया जाता है।
(3) पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) द्वारा जनन- पूर्णरूपेण विभेदित जीवों में अपने कायिक भाग से नए जीव के निर्माण की क्षमता होती है अर्थात् यदि किसी कारणवश जीव क्षत-विक्षत हो जाता है अथवा कुछ टुकड़ों में टूट जाता है, तो इसके अनेक टुकड़े वृद्धि कर नए जीव में विकसित हो जाते हैं। जैसे-हाइड्रा एवं प्लेनेरिया जीव।
पुनरुद्भवन विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा सम्पादित होता है। इन कोशिकाओं के क्रमप्रसरण से अनेक कोशिकाएँ बन जाती हैं। कोशिकाओं के इस समूह से परिवर्तन के दौरान विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ एवं ऊतक बनते हैं। यह परिवर्तन बहुत व्यवस्थित रूप एवं क्रम में होता है, जिसे परिवर्धन कहते हैं। परन्तु पुनरुद्भवन जनन के समान नहीं होता क्योंकि प्रत्येक जीव के किसी भी भाग को काट कर सामान्यतः नया जीव उत्पन्न नहीं होता।
[प्लेनेरिया में पुनरुद्भवन]

चित्र-प्लेनेरिया में पुनरुद्भवन
(4) मुकुलन द्वारा जनन- इस प्रकार के जनन में वयस्क के शरीर पर एक कलिका उत्पन्न होती है उसे मुकुल कहते हैं। यह कलिका पूर्ण वृद्धि करके पैतृक से पृथक् हो जाती है। इस प्रकार के जनन को मुकुलन कहते हैं। हाइड्रा जैसे कुछ प्राणी पुनर्जनन की क्षमता वाली कोशिकाओं का उपयोग मुकुलन के लिए करते हैं। हाइड्रा में कोशिकाओं के नियमित विभाजन के कारण एक स्थान पर उभार विकसित हो जाता है। यह उभार (मुकुल) वृद्धि करता हुआ नन्हे जीव में बदल जाता है तथा पूर्ण विकसित होकर जनक से अलग होकर स्वतंत्र जीव बन जाता है।
[हाइड्रा में मुकुलन (Budding in Hydra)]

चित्र-हाइड्रा में मुकुलन
(5) कायिक प्रवर्धन द्वारा जनन- ऐसे बहुत से पौधे हैं, जिनमें कुछ भाग जैसे जड़, तना तथा पत्तियाँ उपयुक्त परिस्थितियों में विकसित होकर नया पौधा उत्पन्न करते हैं। अधिकतर एकल पौधे इस क्षमता का उपयोग जनन की विधि के रूप में करते हैं। जैसे-अदरक के प्रकन्द, आलू के कन्द, ब्रायोफिलम की पर्ण कलिका आदि। कृत्रिम रूप से कायिक जनन परतन, कलम अथवा रोपण आदि विधियों द्वारा कराया जाता है, जैसे-गुलाब, अंगूर, गन्ना आदि में।
प्रश्न 6. पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन की क्रियाविधि को सचित्र समझाइए। (प्रश्न बैंक)
उत्तर- आवृतबीजी पादपों के जननांग पुष्प में अवस्थित होते हैं। पुंकेसर एवं स्त्रीकेसर पुष्प के जनन भाग हैं, जिनमें जनन कोशिकाएँ होती हैं। पुंकेसर नर जननांग है, जो परागकण बनाते हैं। स्त्रीकेसर पुष्प के केन्द्र में अवस्थित होता है तथा यह पुष्प का मादा जननांग है। यह तीन भागों से बना होता है। आधार पर उभरा-फूला भाग अण्डाशय, मध्य में लम्बा भाग वर्तिका तथा शीर्ष भाग में प्राय: चिपचिपा होता है वर्तिकाग्र कहलाता है। अण्डाशय में बीजाण्ड होते हैं तथा प्रत्येक बीजाण्ड में एक अण्ड-कोशिका होती है।
परागकण विभिन्न वाहकों के माध्यम से पुंकेसर से वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित होते हैं जिसे परागण कहते हैं। परागकण में नर युग्मक उत्पादित होता है जो परागकण से विकसित एक नलिका द्वारा अण्डाशय में स्थित अण्डकोशिका (मादा युग्मक) तक पहुँच कर उससे संलयित हो जाता है। इस प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं। जनन कोशिकाओं के इस युग्मन से युग्मनज बनता है। युग्मनज में अनेक विभाजन होते हैं जिससे यह भ्रूण में विकसित होता है। भ्रूण बीजाण्ड में स्थित होता है। बीजाण्ड में एक कठोर आवरण विकसित होता है जिससे यह बीज में परिवर्तित हो जाता है। अण्डाशय तीव्रता से वृद्धि करता है तथा परिपक्व होकर फल बनाता है।
बीज में स्थित भ्रूण उपयुक्त परिस्थितियों में नवोद्भिद में विकसित हो जाता है।
[पुष्प की अनुदैर्ध्य काट (Longitudinal section of flower)]

[वर्तिकाग्र पर परागकणों का अंकुरण (Germination of pollen grains on stigma)]

चित्र : पुष्प की अनुदैर्ध्य काट | चित्र : वर्तिकाग्र पर परागकणों का अंकुरण