अपठित गद्यांश-बोध

अपठित गदयांश क्या है?
वह गद्यांश, जिसका अध्ययन विद्यार्थियों ने पहले कभी न किया हो, उसे अपठित गद्यांश कहते हैं। अपठित गद्यांश देकर उस पर भाव-बोध संबंधी प्रश्न पूछे जाते हैं ताकि विद्यार्थियों की भावग्रहण-क्षमता का मूल्यांकन हो सके।

अपठित गदयांश हल करते समय ध्यान देने योग्य बातें-

  1. अपठित गद्यांश का बार-बार मूक वाचन करके उसे समझने का प्रयास करें।
  2. इसके पश्चात प्रश्नों को पढ़ें और गद्यांश में संभावित उत्तरों की रेखांकित करें।
  3. जिन प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट न हों, उनके उत्तर जानने हेतु गद्यांश को पुन: ध्यान से पढ़ें।
  4. प्रश्नों के उत्तर अपनी भाषा में दें।
  5. उत्तर संक्षिप्त एवं भाषा सरल और प्रभावशाली होनी चाहिए।
  6. यदि कोई प्रश्न शीर्षक देने के संबंध में हो तो ध्यान रखें कि शीर्षक मूल कथ्य से संबंधित होना चाहिए।
  7. शीर्षक गद्यांश में दी गई सारी अभिव्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए।
  8. अंत में अपने उत्तरों को पुन: पढ़कर उनकी त्रुटियों को अवश्य दूर करें।

उदाहरण

निम्नलिखित गदयांशों तथा इन पर आधारित प्रश्नोत्तरों को ध्यानपूर्वक पढ़िए-

1. भारतीय धर्मनीति के प्रणेता नैतिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक थे। उनकी यह धारणा थी कि नैतिक मूल्यों का दृढ़ता से पालन किए बिना किसी भी समाज की आर्थिक व सामाजिक प्रगति की नीतियाँ प्रभावी नहीं हो सकतीं। उन्होंने उच्चकोटि की जीवन-प्रणाली के निर्माण के लिए वेद की एक ऋचा के आधार पर कहा कि उत्कृष्ट जीवन-प्रणाली मनुष्य की विवेक-बुद्ध से तभी निर्मित होनी संभव है, जब सब लोगों के संकल्प, निश्चय, अभिप्राय समान हों; सबके हृदय में समानता की भव्य भावना जाग्रत हो और सब लोग पारस्परिक सहयोग से मनोनुकूल कार्य करें। चरित्र-निर्माण की जो दिशा नीतिकारों ने निर्धारित की, वह आज भी अपने मूल रूप में मानव के लिए कल्याणकारी है। प्राय: यह देखा जाता है कि चरित्र और नैतिक मूल्यों की उपेक्षा वाणी, बाहु और उदर को संयत न रखने के कारण होती है। जो व्यक्ति इन तीनों पर नियंत्रण रखने में सफल हो जाता है, उसका चरित्र ऊँचा होता है।

सभ्यता का विकास आदर्श चरित्र से ही संभव है। जिस समाज में चरित्रवान व्यक्तियों का बाहुल्य है, वह समाज सभ्य होता है और वही उन्नत कहा जाता है। चरित्र मानव-समुदाय की अमूल्य निधि है। इसके अभाव में व्यक्ति पशुवत व्यवहार करने लगता है। आहार, निद्रा, भय आदि की वृत्ति सभी जीवों में विद्यमान रहती है, यह आचार अर्थात चरित्र की ही विशेषता है, जो मनुष्य को पशु से अलग कर, उससे ऊँचा उठा मनुष्यत्व प्रदान करती है। सामाजिक अनुशासन बनाए रखने के लिए भी चरित्र-निर्माण की आवश्यकता है। सामाजिक अनुशासन की भावना व्यक्ति में तभी जाग्रत होती है, जब वह मानव प्राणियों में ही नहीं, वरन सभी जीवधारियों में अपनी आत्मा के दर्शन करता है।

प्रश्न –

(क) हमारे धर्मनीतिकार नैतिक मूल्यों के प्रति विशेष जागरूक क्यों थे?
(ख) चरित्र मानव-जीवन की अमूल्य निधि कैसे है? स्पष्ट कीजिए।
(ग) धर्मनीतिकारों ने उच्चकोटि की जीवन-प्रणाली के संबंध में क्या कहा?
(घ) प्रस्तुत गद्यांश में किन पर नियंत्रण रखने की बात कही गई है और क्यों?
(ड) कैसा समाज सभ्य और उन्नत कहा जाता है?
(च) सामाजिक अनुशासन की भावना व्यक्ति में कब जाग्रत होती है?
(छ) ‘उत्कृष्ट’ और ‘प्रगति’ शब्दों के विलोम तथा ‘बाहु’ और ‘वाणी’ शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए।
(ज) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) हमारे धर्मनीतिकार नैतिक मूल्यों के प्रति विशेष जागरूक थे। इसका कारण यह था कि नैतिक मूल्यों का पालन किए बिना किसी भी समाज की आर्थिक व सामाजिक प्रगति की नीतियाँ प्रभावी नहीं हो सकतीं।
(ख) चरित्र मानव-जीवन की अमूल्य निधि है, क्योंकि इसके द्वारा ही मनुष्य व पशु में अंतर होता है। चरित्र सामाजिक अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
(ग) धर्मनीतिकारों ने उच्चकोटि की जीवन-प्रणाली के संबंध में यह कहा कि परिष्कृत जीवन-प्रणाली मनुष्य के विवेक-बुद्ध से ही निर्मित हो सकती है। हालाँकि यह तभी संभव है, जब संपूर्ण मानव-जाति के संकल्प और उद्देश्य समान हों। सबके अंतर्मन में भव्य भावना जाग्रत हो और सभी लोग पारस्परिक सहयोग से मनोनुकूल कार्य करें।
(घ) इस गद्यांश में वाणी, बाहु तथा उदर पर नियंत्रण रखने की बात कही गई है, क्योंकि इन पर नियंत्रण न होने से चारित्रिक व नैतिक पतन हो जाता है।
(ड) यह सर्वमान्य तथ्य है कि सभ्यता का विकास आदर्श चरित्र से ही संभव है। आदर्श चरित्र के अभाव में सभ्यता का विकास असंभव है। अत: जिस समाज में चरित्रवान लोगों की बहुलता होती है, उसी समाज को सभ्य और उन्नत कहा जाता है।
(च) ‘व्यापकता ही जागरण का प्रतीक है।’ अत: किसी व्यक्ति में अनुशासन की भावना का जाग्रत होना तभी संभव हो पाता है, जब वह व्यापक स्वरूप ग्रहण करता है, यानी समस्त जीवधारियों में अपनी आत्मा के दर्शन करता है।
(छ) विलोम शब्द-

उत्कृष्ट × निकृष्ट
प्रगति × अवगति

पर्यायवाची शब्द-

बाहु – भुजा
वाणी – वचन

(ज) शीर्षक-चरित्र-निर्माण।

2. वैदिक युग भारत का प्राय: सबसे अधिक स्वाभाविक काल था। यही कारण है कि आज तक भारत का मन उस काल की ओर बार-बार लोभ से देखता है। वैदिक आर्य अपने युग को स्वर्णकाल कहते थे या नहीं, यह हम नहीं जानते; किंतु उनका समय हमें स्वर्णकाल के समान अवश्य दिखाई देता है। लेकिन जब बौद्ध युग का आरंभ हुआ, वैदिक समाज की पोल खुलने लगी और चिंतकों के बीच उसकी आलोचना आरंभ हो गई। बौद्ध युग अनेक दृष्टियों से आज के आधुनिक आदोलन के समान था। ब्राहमणों की श्रेष्ठता के विरुद्ध बुद्ध ने विद्रोह का प्रचार किया था, बुद्ध जाति-प्रथा के विरोधी थे और वे मनुष्य को जन्मना नहीं, कर्मणा श्रेष्ठ या अधम मानते थे।

नारियों को भिक्षुणी होने का अधिकार देकर उन्होंने यह बताया था कि मोक्ष केवल पुरुषों के ही निमित्त नहीं है, उसकी अधिकारिणी नारियाँ भी हो सकती हैं। बुद्ध की ये सारी बातें भारत को याद रही हैं और बुद्ध के समय से बराबर इस देश में ऐसे लोग उत्पन्न होते रहे हैं, जो जाति-प्रथा के विरोधी थे, जो मनुष्य को जन्मना नहीं, कर्मणा श्रेष्ठ या अधम समझते थे। किंतु बुद्ध में आधुनिकता से बेमेल बात यह थी कि वे निवृत्तिवादी थे, गृहस्थी के कर्म से वे भिक्षु-धर्म को श्रेष्ठ समझते थे। उनकी प्रेरणा से देश के हजारों-लाखों युवक, जउन बाक समाजक भण-पण कनेके हायक थे सन्यास होगए संन्यासक संस्था समाज विधिी सस्था हैं।

प्रश्न –

(क) वैदिक युग स्वर्णकाल के समान क्यों प्रतीत होता है?
(ख) जाति-प्रथा एवं नारियों के विषय में बुद्ध के विचारों को स्पष्ट कीजिए।
(ग) बुद्ध पर क्या आरोप लगता है और उनकी कौन-सी बात आधुनिकता के प्रसंग में ठीक नहीं बैठती?
(घ) ‘संन्यास’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि इससे समाज को क्या हानि पहुँचती है।
(ड) बौद्ध युग का उदय वैदिक समाज के शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए किस प्रकार हानिकारक था?
(च) बौद्ध धर्म ने नारियों को समता का अधिकार दिलाने में किस प्रकार से योगदान दिया?
(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. उपसर्ग और मूल शब्द अलग-अलग करके लिखिए विद्रोह, संन्यास।
  2. मूल शब्द और प्रत्यय अलग-अलग करके लिखिए आधुनिकता, विरोधी।

(ज) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) वैदिक युग भारत का स्वाभाविक काल था। हमें प्राचीन काल की हर चीज अच्छी लगती है। इस कारण वैदिक युग स्वर्णकाल के समान प्रतीत होता है।
(ख) बुद्ध जाति-प्रथा के विरुद्ध थे। उन्होंने ब्राहमणों की श्रेष्ठता का विरोध किया। मनुष्य को वे कर्म के अनुसार श्रेष्ठ या अधम मानते थे। उन्होंने नारी को मोक्ष की अधिकारिणी माना।
(ग) बुद्ध पर निवृत्तिवादी होने का आरोप लगता है। उनकी गृहस्थ धर्म को भिक्षु धर्म से निकृष्ट मानने वाली बात आधुनिकता के प्रसंग में ठीक नहीं बैठती।
(घ) ‘संन्यास’ शब्द ‘सम् + न्यास’ शब्द से मिलकर बना है। ‘सम्’ यानी ‘अच्छी तरह से’ और ‘न्यास’ यानी ‘त्याग करना’। अर्थात अच्छी तरह से त्याग करने को ही संन्यास कहा जाता है। संन्यास की संस्था से देश का युवा वर्ग उत्पादक कार्य में भाग नहीं लेता। इससे समाज की व्यवस्था खराब हो जाती है।
(ड) बौद्ध युग का उदय वैदिक युग की कमियों के प्रतिक्रियास्वरूप हुआ था। वस्तुत: वैदिक युगीन समाज के शीर्ष पर ब्राहमण वर्ग के कुछ स्वार्थी लोग विराजमान थे। ये लोग जन्म के आधार पर अपने-आप को श्रेष्ठ मानते थे और शेष समाज को भी श्रेष्ठ मानने के लिए मजबूर करते थे। ऐसे में बौद्ध धर्म के सिद्धांत शोषित समाज धात अधिकार देकर यह सिद्ध किया कि मोक्ष केवल पुरुषों के ही निमित्त नहीं है। इस पर नारियों का भी हक है। यह नारियों को समता का अधिकार दिलाने में काफी प्रभावी कदम साबित हुआ।
(छ)

  1. उपसर्ग-वि, सम्
    मूल शब्द-द्रोह, न्यास
  2. मूल शब्द-आधुनिक, विरोध।
    प्रत्यय-ता, ई।

(ज) शीर्षक-बुद्ध की वैचारिक प्रासंगिकता।

3. तत्ववेत्ता शिक्षाविदों के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है। प्रथम वह, जो हमें जीवन-यापन के लिए अर्जन करना सिखाती है और द्रवितीय वह, जो हमें जीना सिखाती है। इनमें से एक का भी अभाव जीवन को निरर्थक बना देता है। बिना कमाए जीवन-निर्वाह संभव नहीं। कोई भी नहीं चाहेगा कि वह परावलंबी हो-माता-पिता, परिवार के किसी सदस्य, जाति या समाज पर। पहली विद्या से विहीन व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है, वह दूसरों के लिए भार बन जाता है। साथ ही विद्या के बिना सार्थक जीवन नहीं जिया जा सकता। बहुत अर्जित कर लेनेवाले व्यक्ति का जीवन यदि सुचारु रूप से नहीं चल रहा, उसमें यदि वह जीवन-शक्ति नहीं है, जो उसके अपने जीवन को तो सत्यपथ पर अग्रसर करती ही है, साथ ही वह अपने समाज, जाति एवं राष्ट्र के लिए भी मार्गदर्शन करती है, तो उसका जीवन भी मानव-जीवन का अभिधान नहीं पा सकता। वह भारवाही गर्दभ बन जाता है या पूँछ-सींगविहीन पशु कहा जाता है।

वर्तमान भारत में दूसरी विद्या का प्राय: अभावे दिखाई देता है, परंतु पहली विद्या का रूप भी विकृत ही है, क्योंकि न तो स्कूल-कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त करके निकला छात्र जीविकार्जन के योग्य बन पाता है और न ही वह उन संस्कारों से युक्त हो पाता है, जिनसे व्यक्ति ‘कु’ से ‘सु’ बनता है; सुशिक्षित, सुसभ्य और सुसंस्कृत कहलाने का अधिकारी होता है। वर्तमान शिक्षा-पद्धति के अंतर्गत हम जो विद्या प्राप्त कर रहे हैं, उसकी विशेषताओं को सर्वथा नकारा भी नहीं जा सकता। यह शिक्षा कुछ सीमा तक हमारे दृष्टिकोण को विकसित भी करती है, हमारी मनीषा को प्रबुद्ध बनाती है तथा भावनाओं को चेतन करती है, किंतु कला, शिल्प, प्रौद्योगिकी आदि की शिक्षा नाममात्र की होने के फलस्वरूप इस देश के स्नातक के लिए जीविकार्जन टेढ़ी खीर बन जाता है और बृहस्पति बना युवक नौकरी की तलाश में अर्जियाँ लिखने में ही अपने जीवन का बहुमूल्य समय बर्बाद कर लेता है।

जीवन के सर्वागीण विकास को ध्यान में रखते हुए यदि शिक्षा के क्रमिक सोपानों पर विचार किया जाए, तो भारतीय विद्यार्थी को सर्वप्रथम इस प्रकार की शिक्षा दी जानी चाहिए, जो आवश्यक हो, दूसरी जो उपयोगी हो और तीसरी जो हमारे जीवन को परिष्कृत एवं अलंकृत करती हो। ये तीनों सीढ़ियाँ एक के बाद एक आती हैं, इनमें व्यतिक्रम नहीं होना चाहिए। इस क्रम में व्याघात आ जाने से मानव-जीवन का चारु प्रासाद खड़ा करना असंभव है। यह तो भवन की छत बनाकर नींव बनाने के सदृश है। वर्तमान भारत में शिक्षा की अवस्था देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने ‘अन्न’ से ‘आनंद’ की ओर बढ़ने को जो ‘विद्या का सार’ कहा था, वह सर्वथा समीचीन ही था।

प्रश्न –

(क) प्रस्तुत गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) व्यक्ति किस परिस्थिति में मानव-जीवन की उपाधि नहीं पा सकता?
(ग) विद्या के कौन-से दो रूप बताए गए हैं?
(घ) वर्तमान शिक्षा पद्धति के लाभ व हानि बताइए।
(ड) विद्याहीन व्यक्ति की समाज में क्या दशा होती है?
(च) शिक्षा के क्रमिक सोपान कौन-कौन-से हैं?
(छ) शिक्षित युवकों को अपना बहुमूल्य समाज क्यों बर्बाद करना पड़ता है?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. संधि-विच्छेद कीजिए-परावलबी, जीविकोपार्जन।
  2. विलोम शब्द लिखिए-सार्थक, विकास।

उत्तर –

(क) शीर्षक-शिक्षा के सोपान।
(ख) जीवन-यापन के लिए काफी धन अर्जित करने के बावजूद व्यक्ति का जीवन सुचारु रूप से नहीं चल पाता, क्योंकि उनके पास वह जीवन-शक्ति नहीं होती, जो स्वयं के जीवन को सत्पथ की ओर अग्रसर करती है और साथ-ही-साथ समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करती है। इस परिस्थिति में व्यक्ति मानव-जीवन की उपाधि नहीं पा सकता।
(ग) विद्या के दो रूप बताए गए हैं

  1. वह विद्या जो जीवन-यापन के लिए अर्जन करना सिखाती है।
  2. वह विद्या जो जीना सिखाती है।

(घ) आधुनिक शिक्षा-पद्धति हमारी बुद्ध विकसित करती है, भावनाओं को चेतन करती है, परंतु जीविकोपार्जन के लिए कुछ नहीं कर पाती।
(ड) विद्याहीन व्यक्ति न तो जीवन-यापन के लिए अर्जन करना जानता है और न ही वह जीने की कला से परिचित होता है। उसका जीवन निरर्थक हो जाता है। वह आजीवन परावलंबी होता है।
(च) शिक्षा के क्रमिक सोपान हैं-विद्यार्थी की आवश्यकता, शिक्षा की उपयोगिता और जीवन को परिष्कृत तथा अलकृत करना।
(छ) वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में कला, शिल्प एवं प्रौद्योगिकी आदि की शिक्षा नाममात्र की होने के फलस्वरूप शिक्षित युवकों का जीविकोपार्जन टेढ़ी खीर बन गया है। उन्हें अपना अधिकांश समय नौकरी की तलाश में अर्जियाँ लिखने में बर्बाद करना पड़ता है।
(ज)

  1. संधि-विच्छेद—
    परावलंबी :
     पर + अवलंबी।
    जीवकोपार्जन : जीविका + उपार्जन।
  2. विलोम शब्द : सार्थक × निरर्थक।
    विकास × हास।

4. प्रजातंत्र के तीन मुख्य अंग हैं-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। प्रजातंत्र की सार्थकता एवं दृढ़ता को ध्यान में रखते हुए और जनता के प्रहरी होने की भूमिका को देखते हुए मीडिया (दृश्य, श्रव्य और मुद्रित) को प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में देखा जाता है। समाचार-माध्यम या मीडिया को पिछले वर्षों में पत्रकारों और समाचार-पत्रों ने एक विश्वसनीयता प्रदान की है और इसी कारण विश्व में मीडिया एक अलग शक्ति के रूप में उभरा है।

कार्यपालिका और विधायिका की समस्याओं, कार्य-प्रणाली और विसंगतियों की चर्चा प्राय: होती रहती है और सर्वसाधारण में वे विशेष चर्चा के विषय रहते ही हैं। इसमें समाचार-पत्र, रेडियो और टी०वी० समाचार अपनी टिप्पणी के कारण चर्चा को आगे बढ़ाने में योगदान करते हैं, पर न्यायपालिका अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद उसके बारे में चर्चा कम ही होती है। ऐसा केवल अपने देश में ही नहीं, अन्य देशों में भी कमोबेश यही स्थिति है।

स्वराज-प्राप्ति के बाद और एक लिखित संविधान के देश में लागू होने के उपरांत लोकतंत्र के तीनों अंगों के कर्तव्यों, अधिकारों और दायित्वों के बारे में जनता में जागरूकता बढ़ी है। संविधान-निर्माताओं का उद्देश्य रहा है कि तीनों अंग परस्पर ताल-मेल से कार्य करेंगे। तीनों के पारस्परिक संबंध भी संविधान द्वारा निर्धारित , फिर भी समय के साथ-साथ कुछ समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। आज लोकतंत्र यह महसूस करता है कि न्यायपालिका | भी अधिक पारदर्शिता हो, जिससे उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान बढ़े। ‘जिस देश में पंचों को परमेश्वर मानने की परंपरा, वहाँ न्यायमूर्तियों पर आक्षेप दुर्भाग्यपूर्ण है।’

प्रश्न –

(क) लोकतंत्र के तीनों अंगों का नामोल्लेख कीजिए। चौथा अंग किसे माना जाता है?
(ख) लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
(ग) अत्यंत महत्वपूर्ण अंग होने के बावजूद न्यायपालिका के बारे में मीडिया में कम चर्चा क्यों होती है?
(घ) जनता में अधिकारों और दायित्वों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में किसका योगदान है? कैसे?
(ड) ‘पारदर्शिता’ से क्या तात्पर्य है? लोकतंत्र न्यायपालिका में अधिक पारदर्शिता क्यों चाहता है?
(च) आशय स्पष्ट कीजिए-‘जिस देश में पंचों को परमेश्वर मानने की परंपरा हो, वहाँ न्यायमूर्तियों पर आक्षेप दुर्भाग्यपूर्ण है।’
(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. विशेषण बनाइए—विश्व, प्रतिष्ठा
  2. वाक्य में प्रयोग कीजिए-मर्यादा, विसंगति

(ज) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) लोकतंत्र के तीन मुख्य अंग हैं-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। चौथा अंग मीडिया को माना जाता है। इसमें दृश्य, श्रव्य व मुद्रित मीडिया होते हैं।
(ख) लोकतंत्र में मीडिया की अह भूमिका है। यह कार्यपालिका व विधायिका की समस्याओं, कार्य-प्रणाली तथा विसंगतियों की चर्चा करती है, पर न्यायपालिका पर किसी प्रकार की टिप्पणी करने से बचती है।
(ग) न्यायपालिका प्रजातंत्र का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, परंतु इसकी चर्चा मीडिया में कम होती है, क्योंकि उसमें पारदर्शिता अधिक होती है। दूसरे, न्यायपालिका अपने विशेषाधिकारों के प्रयोग से मीडिया को दबा देती है।
(घ) जनता में अधिकारों और दायित्वों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मीडिया का योगदान है। यह सरकार द्वारा बनाई गई नई-नई नीतियों को जनता तक पहुँचाती है तथा उन नीतियों के अंतर्गत दिए गए अधिकारों के प्रति जागरूक बनती है। साथ-ही-साथ यह दायित्वबोध कराने में भी अपनी अह भूमिका अदा करती है।
(ड) ‘पारदर्शिता’ का अर्थ है-आर-पार दिखाई देना या संदेह में न रखना। न्यायपालिका लोकतंत्र की रक्षिका है, परंतु न्यायाधीशों पर आक्षेप लगने लगे हैं। अत: लोकतंत्र न्यायपालिका में पारदर्शिता चाहता है।
(च) इसका अर्थ यह है कि भारत में पहले न्यायाधीशों को ईश्वर के बराबर का दर्जा दिया जाता था, क्योंकि वे पक्षपातपूर्ण निर्णय नहीं देते थे आजकल न्यायाधीशों के निर्णयों व कार्य-प्रणालियों पर आरोप लगाए जाने लगे हैं। यह गलत परंपरा की शुरुआत है।
(छ)

  1. विशेषण-वैश्विक, प्रतिष्ठित
  2. हर व्यक्ति को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए।
    सरकार ने वेतन-विसंगति दूर करने का वायदा किया।

(ज) शीर्षक-मीडिया और लोकतंत्र। अथवा, प्रजातंत्र के अंग।

5. संस्कृतियों के निर्माण में एक सीमा तक देश और जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्राय: सभी सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा तक समान रहते हैं, किंतु बाहय उपादानों में अंतर अवश्य आता है। राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परंपरा से संपृक्त बनाती है, अपनी रीति-नीति की संपदा से विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिलन के अवसर अति सुलभ हो गए हैं, संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव हमारे देश पर पड़ रहे हैं, जिनके आतंक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति संशयालु बना दिया है। हमारी आस्था डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल है।

अपनी संस्कृति को छोड़, विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुँच रही है, वह किसी राष्ट्रप्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं है। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अत: आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी भी विदेशी संस्कृति के जीवंत तत्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे, किंतु अपनी सांस्कृतिक निधि की उपेक्षा करके नहीं। यह परावलंबन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोकप्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवनशक्ति मिले, किंतु अपनी जमीन और अपनी जड़ों के बिना कोई पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही पर्याय है।

प्रश्न –

(क) आधुनिक युग में संस्कृतियों में परस्पर संघर्ष प्रारंभ होने का प्रमुख कारण बताइए।
(ख) हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु क्यों हो गए हैं?
(ग) राष्ट्रीय संस्कृति की हमारे प्रति सबसे बड़ी देन क्या है?
(घ) हम अपनी सांस्कृतिक संपदा की उपेक्षा क्यों नहीं कर सकते?
(ड) हम विदेशी संस्कृति से क्या ग्रहण कर सकते हैं तथा क्यों?
(च) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

प्रत्यय बताइए-जातीय, सांस्कृतिक।
पर्यायवाची बताइए-देश, सूर्य।

(छ) गद्यांश में युवाओं के किस कार्य को राष्ट्र की गरिमा के अनुकूल नहीं माना गया है तथा उन्हें क्या संदेश दिया गया है?
(ज) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) आधुनिक युग में संस्कृतियों में परस्पर संघर्ष प्रारंभ होने का प्रमुख कारण यह है कि भिन्न संस्कृतियों के निकट आने के कारण अतिक्रमण एवं विरोध स्वाभाविक है।
(ख) हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु इसलिए हो गए हैं, क्योंकि नई पीढ़ी ने विदेशी संस्कृति के कुछ तत्वों को स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया है।
(ग) राष्ट्रीय संस्कृति की हमारे प्रति सब्से बड़ी देन यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परंपरा और रीति – नीति से जोड़े रखती है।
(घ) हम अपनी सांस्कृतिक संपदा की उपेक्षा इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने से हम जडविहीन पौधे के समान हो जाएँगे।
(ड) हम विदेशी संस्कृति के जीवंत तत्वों को ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि भारतीय संस्कृति में त्याग व ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है।
(च) प्रत्यय-ईय, इक।
पर्यायवाचीदेश-राष्ट्र, राज्य।
सूर्य-रवि, सूरज।
(छ) गद्यांश में युवाओं द्वारा विदेशी संस्कृति का अविवेकपूर्ण अंधानुकरण करना राष्ट्र की गरिमा के अनुकूल नहीं माना गया है। साथ-ही-साथ युवाओं के लिए यह संदेश दिया गया है कि उन्हें भारतीय संस्कृति की अवहेलना करके विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।
(ज) शीर्षक-भारतीय संस्कृति का वैचारिक संघर्ष।

6. परियोजना शिक्षा का एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंग है। इसे तैयार करने में किसी खेल की तरह का ही आनंद मिलता है। इस तरह परियोजना तैयार करने का अर्थ है-खेल-खेल में बहुत कुछ सीख जाना। यदि आपको कहा जाए कि दशहरा पर निबंध लिखिए, तो आपको शायद उतना आनंद नहीं आएगा। लेकिन यदि आपसे कहा जाए कि अखबारों में प्राप्त जानकारियों के अलावा भी आपको देश-दुनिया की बहुत सारी जानकारियाँ प्रदान करती है। यह आपको तथ्यों को जुटाने तथा उन पर विचार करने का अवसर प्रदान करती है। इससे आप में नए-नए तथ्यों के कौशल का विकास होता है। इससे आपमें एकाग्रता का विकास होता है। लेखन संबंधी नई-नई शैलियों का विकास होता है।

आपमें चिंतन करने तथा किसी पूर्व घटना से वर्तमान घटना को जोड़कर देखने की शक्ति का विकास होता है। परियोजना कई प्रकार से तैयार की जा सकती है। हर व्यक्ति इसे अलग ढंग से, अपने तरीके से तैयार कर सकता है। ठीक उसी प्रकार जैसे हर व्यक्ति का बातचीत करने का, रहने का, खाने-पीने का अपना अलग तरीका होता है। ऐसा निबंध, कहानी कविता लिखते या चित्र बनाते समय भी होता है। लेकिन ऊपर कही गई बातों के आधार पर यहाँ हम परियोजना को मोटे तौर पर दो भागों में बाँट सकते हैं-एक तो वे परियोजनाएँ, जो समस्याओं के निदान के लिए तैयार की जाती हैं और दूसरी वे, जो किसी विषय की समुचित जानकारी प्रदान करने के लिए तैयार की जाती हैं।

समस्याओं के निदान के लिए तैयार की जाने वाली परियोजनाओं में संबंधित समस्या से जुड़े सभी तथ्यों पर प्रकाश डाला जाता है और उस समस्या के निदान के लिए भी दिए जाते हैं। इस तरह की परियोजनाएँ प्राय: सरकार अथवा संगठनों  द्वारा किसी समस्या पर कार्य – योजना तैयार करते समय बनाई जाती हैं। इससे उस समस्या के विभिन्न पहलुओं पर कार्य करने में आसानी हो जाती हैं।
किंतु दूसरे प्रकार की परियोजना को आप आसानी से तैयार कर सकते हैं। इसे ‘शैक्षिक परियोजना’ भी कहा जाता है। इस तरह की परियोजनाएँ तैयार करते समय आप संबंधित विषय पर तथ्यों को जुटाते हुए बहुत सारी नई-नई बातों से अपने-आप परिचित भी होते हैं।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) परियोजना क्या है? इसका क्या महत्व है?
(ग) शैक्षिक परियोजना क्या है?
(घ) परियोजना हमें क्या-क्या प्रदान करती है?
(ड) परियोजना किस प्रकार तैयार की जा सकती है? यह कितने प्रकार की होती है?
(च) समस्या का निदान करने वाली परियोजना कैसी होनी चाहिए?
(छ) फोटो-फीचर परियोजना से आप क्या समझते हैं?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1.  विशेषण बनाइए-शिक्षा, संबंध
  2. सरल वाक्य में बदलिए—
    ‘इस तरह से न केवल आपने चित्र काटे और चिपकाए, बल्कि कई शहरों में मनाए जाने वाले दशहरे के तरीके को भी जाना।”

उत्तर –

(क) शीर्षक-परियोजना का स्वरूप।
(ख) गद्यांश के आधार पर हम कह सकते हैं कि परियोजना नियमित एवं व्यवस्थित रूप से स्थिर किया गया विचार एवं स्वरूप है। इसके द्वारा खेल-खेल में ज्ञानार्जन तथा समस्या-समाधान आदि की तैयारी की जाती है।
(ग) शैक्षिक परियोजना में संबंधित विषय पर तथ्यों को जुटाते हुए, चित्र इकट्ठे करके एक स्थान पर चिपकाए जाते हैं। इनसे नई-नई बातों की जानकारी दी जाती है।
(घ) परियोजना हमें हमारी समस्याओं का निदान प्रदान करती है तथा देश-दुनिया की बहुत सारी जानकारियाँ प्रदान करती है। साथ-ही-साथ यह हमको नए-नए तथ्यों को जुटाने तथा उन पर विचार करने का अवसर भी प्रदान करती है।
(ड) परियोजना कई प्रकार से तैयार की जाती है। हर व्यक्ति इसे अपने ढंग से तैयार कर सकता है। परियोजनाएँ दो प्रकार की होती हैं

  1. समस्या का निदान करने वाली परियोजना, तथा
  2. विषय की समुचित जानकारी देने वाली परियोजना।

(च) समस्या का निदान करने वाली परियोजना में संबंधित समस्या से जुड़े सभी तथ्यों पर प्रकाश डालना चाहिए और समस्या-निदान के सुझाव भी दिए जाने चाहिए।
(छ) फोटो-फीचर परियोजना समस्या-निदान और ज्ञानार्जन दोनों के लिए हो सकती है। इसके अंतर्गत फोटो-फीचर के माध्यम से देश-दुनिया की जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं या किसी समस्या के निदान हेतु एक निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचा जाता है।
(ज)

  1. विशेषण-शैक्षिक, संबंधित।
  2. सरल वाक्य-इस तरह आपने चित्र काटना, चिपकाना और विभिन्न शहरों में मनाए जाने वाले दशहरे को जाना।

7. सुचारित्र्य के दो सशक्त स्तंभ हैं-प्रथम सुसंस्कार और द्रवितीय सत्संगति। सुसंस्कार भी पूर्व जीवन की सत्संगति व सत्कर्मों की अर्जित संपत्ति है और सत्संगति वर्तमान जीवन की दुर्लभ विभूति है। जिस प्रकार कुधातु की कठोरता और कालिख पारस के स्पर्श मात्र से कोमलता और कमनीयता में बदल जाती है, ठीक उसी प्रकार कुमार्गी का कालुष्य सत्संगति से स्वर्णिम आभा में परिवर्तित हो जाता है। सतत सत्संगति से विचारों को नई दिशा मिलती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छे कार्यों में प्रेरित करते हैं।

परिणामत: सुचरित्र का निर्माण होता है। आचार्य हजारीप्रसाद विवेदी ने लिखा है-‘महाकवि टैगोर के पास बैठने मात्र से ऐसा प्रतीत होता था, मानो भीतर का देवता जाग गया हो।’ वस्तुत: चरित्र से ही जीवन की सार्थकता है। चरित्रवान व्यक्ति समाज की शोभा है, शक्ति है। सुचारित्र्य से व्यक्ति ही नहीं, समाज भी सुवासित होता है और इस सुवास से राष्ट्र यशस्वी बनता है। विदुर जी की उक्ति अक्षरश: सत्य है कि सुचरित्र के बीज हमें भले ही वंश-परंपरा से प्राप्त हो सकते हैं, पर चरित्र-निर्माण व्यक्ति के अपने बलबूते पर निर्भर है।

आनुवंशिक परंपरा, परिवेश और परिस्थिति उसे केवल प्रेरणा दे सकते हैं, पर उसका अर्जन नहीं कर सकते; वह व्यक्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं होता। व्यक्ति-विशेष के शिथिल-चरित्र होने से पूरे राष्ट्र पर चरित्र-संकट उपस्थित हो जाता है, क्योंकि व्यक्ति पूरे राष्ट्र का एक घटक है। अनेक व्यक्तियों से मिलकर एक परिवार, अनेक परिवारों से एक कुल, अनेक कुलों से एक जाति या समाज और अनेकानेक जातियों और समाज-समुदायों से मिलकर ही एक राष्ट्र बनता है। आज जब लोग सूचित्र-नमाण की बात कते हैं तब वे स्वायं इसराष्ट्र के एक आवक घट्क हैं-इस बात को विस्तक देते हैं।

प्रश्न –

(क) सत्संगति कुमार्गी को कैसे सुधारती है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
(ख) चरित्र के बारे में विदुर के क्या विचार हैं?
(ग) व्यक्ति-विशेष का चरित्र समूचे राष्ट्र को कैसे प्रभावित करता है?
(घ) व्यक्ति के चरित्र-निर्माण में किस-किस का योगदान होता है तथा व्यक्ति सुसंस्कृत कैसे बनता है?
(ड) संगति के संदर्भ में पारस के उल्लेख से लेखक क्या प्रतिपादित करना चाहता है?
(च) किसी व्यक्ति-विशेष के शिथिल-चरित्र होने से राष्ट्र की क्या क्षति होती है?
(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. विलोम शब्द लिखिए-दुर्लभ, निर्माण।
  2. मिश्र वाक्य में बदलिए-
    ‘सतत सत्संगति से विचारों को नई दिशा मिलती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छे कार्यों में प्रेरित करते हैं।”

(ज) प्रस्तुत गद्यांश के लिए एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) सत्संगति से विचारों को नई दिशा मिलती है और अच्छे विचार मनुष्य को अच्छे कार्यों में प्रेरित करते हैं। इससे कुमार्गी व्यक्ति उसी तरह सुधर जाता है, जैसे पारस के संपर्क में आने से लोहा सोना बन जाता है।
(ख) चरित्र के बारे में विदुर का विचार है कि अच्छे चरित्र के बीज वंश-परंपरा से मिल जाते हैं, परंतु चरित्र-निर्माण व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है। सुचरित्र कभी उत्तराधिकार में नहीं मिलता।
(ग) यदि व्यक्ति-विशेष का चरित्र कमजोर हो, तो पूरे राष्ट्र के चरित्र पर संकट उपस्थित हो जाता है, क्योंकि व्यक्ति पूरे राष्ट्र का एक आचरक घटक होता है।
(घ) व्यक्ति के चरित्र के निर्माण में सुसंस्कार, सत्संगति, परिवार, कुल, जाति, समाज आदि का योगदान होता है। व्यक्ति में अच्छे संस्कारों व सत्संगति से अच्छे गुणों का विकास होता है। इस कारण व्यक्ति सुसंस्कृत बनता है।
(ड) संगति के संदर्भ में लेखक ने पारस का उल्लेख किया है। पारस के संपर्क में आने से हर किस्म का लोहा सोना बन जाता है, इसी तरह अच्छी संगति से हर तरह का बुरा व्यक्ति भी अच्छा बन जाता है।
(च) किसी व्यक्ति-विशेष के शिथिल-चरित्र होने पर संपूर्ण राष्ट्र के चरित्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि व्यक्तियों के समूह से ही किसी राष्ट्र का निर्माण होता है। इस प्रकार व्यक्ति राष्ट्र का एक आचरक घटक है। अत: राष्ट्रीय चरित्र किसी राष्ट्र के संपूर्ण व्यक्तियों के चरित्र का समावेशित रूप है। निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि किसी एक व्यक्ति के शिथिल-चरित्र होने पर राष्ट्रीय चरित्र की क्षति होती है।
(छ)

  1. विलोम शब्द-सुलभ, विध्वंस।
  2. मिश्र वाक्य-जब सतत सत्संगति से विचारों को नई दिशा मिलती है, तब अच्छे विचार मनुष्य को अच्छे कार्यों में प्रेरित करते हैं।

(ज) शीर्षक-चरित्र-निर्माण और सत्संगति।

8. जाति-प्रथा को यदि श्रम-विभाजन मान लिया जाए, तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित है। कुशल व्यक्ति या सक्षम श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि हम व्यक्ति की क्षमता इस सीमा तक विकसित करें, जिससे वह अपने पेशे या कार्य का चुनाव स्वयं कर सके। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धांत यह है कि इससे मनुष्य के प्रशिक्षण अथवा उसकी निजी क्षमता का विचार किए बिना, दूसरे ही दृष्टिकोण, जैसे माता-पिता के सामाजिक स्तर, के अनुसार पहले से ही अर्थात गर्भधारण के समय से ही मनुष्य का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।

जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती, बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है, भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्राय: आती है, क्योंकि उद्योग-धंधे की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत है। इस प्रकार पेशा-परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

प्रश्न –

(क) कुशल श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए क्या आवश्यक है?
(ख) जाति-प्रथा के सिद्धांत को दूषित क्यों कहा गया है?
(ग) “जाति-प्रथा पेशे का न केवल दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण करती है, बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे से बाँध देती है।”-कथन पर उदाहरण सहित टिप्पणी कीजिए।
(घ) भारत में जाति-प्रथा बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण किस प्रकार बन जाती है?
(ड) जाति-प्रथा के दोषपूर्ण पक्ष कौन-कौन-से हैं?
(च) जाति-प्रथा बेरोजगारी का कारण कैसे बन जाती है?
(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. गद्यांश में से ‘इक’ और ‘इत’ प्रत्ययों से बने शब्द छाँटकर लिखिए।
  2. समस्तपदों का विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए श्रम-विभाजन, माता-पिता।

(ज) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) कुशल या सक्षम श्रमिक-समाज का निर्माण करने के लिए आवश्यक है कि हम जातीय जड़ता को त्यागकर प्रत्येक व्यक्ति को इस सीमा तक विकसित एवं स्वतंत्र करें, जिससे वह अपनी कुशलता के अनुसार कार्य का चुनाव स्वयं करे। यदि श्रमिकों को मनचाहा कार्य मिले तो कुशल श्रमिक-समाज का निर्माण स्वाभाविक है।
(ख) जाति-प्रथा का सिद्धांत इसलिए दूषित कहा गया है, क्योंकि वह व्यक्ति की क्षमता या रुचि के अनुसार उसके चुनाव पर आधारित नहीं है। वह पूरी तरह माता-पिता की जाति पर ही अवलंबित और निर्भर है।
(ग) जाति-प्रथा व्यक्ति की क्षमता, रुचि और इसके चुनाव पर निर्भर न होकर, गर्भाधान के समय से ही, व्यक्ति की जाति का पूर्वनिर्धारण कर देती है, जैसे-धोबी, कुम्हार, सुनार आदि।
(घ) उद्योग-धंधों की प्रक्रिया और तकनीक में निरंतर विकास और परिवर्तन हो रहा है, जिसके कारण व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की जरूरत पड़ सकती है। यदि वह ऐसा न कर पाए तो उसके लिए भूखे मरने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह पाता।
(ड) जाति-प्रथा के दोषपूर्ण पक्ष निम्नलिखित हैं —
— पेशे का दोषपूर्ण निर्धारण।
— अक्षम श्रमिक-समाज का निर्माण।
— देश-काल की परिस्थिति के अनुसार पेशा–परिवर्तन पर रोका
(च) जाति प्रथा बेरोजगारी का कारण तब बन जाती है, जब परंपरागत ढंग से किसी जाति-विशेष के द्वारा बनाए जा रहे उत्पाद को आज के औद्योगिक युग में नई तकनीक द्वारा बड़े पैमाने पर तैयार किया जाने लगता है। ऐसे में उस जाति-विशेष के लोग नई तकनीक के मुकाबले टिक नहीं पाते। उनका परंपरागत पेशा छिन जाता है, फिर भी उन्हें जाति-प्रथा पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती। ऐसे में बेरोजगारी का बढ़ना स्वाभाविक है।
(छ)

  1. प्रत्यय—इक, इत प्रत्यययुक्त शब्द-स्वाभाविक, आधारित।
  2. समस्तपद         समास-विग्रह          समास क्रा नाम
    श्रम-विभाजन     श्रम का विभाजन       तत्पुरुष समास
    माता-पिता         माता और पिता         द्वंद्व समास

(ज) शीर्षक-जाति-प्रथा।

9. जहाँ भी दो नदियाँ आकर मिल जाती हैं, उस स्थान को अपने देश में ‘तीर्थ’ कहने का रिवाज है। और यह केवल रिवाज की ही बात नहीं है; हम सचमुच मानते हैं कि अलग-अलग नदियों में स्नान करने से जितना पुण्य होता है, उससे कहीं अधिक पुण्य संगम स्नान में है। किंतु, भारत आज जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें असली संगम वे स्थान, वे सभाएँ तथा वे मंच हैं, जिन पर एक से अधिक भाषाएँ एकत्र होती हैं।

नदियों की विशेषता यह है कि वे अपनी धाराओं में अनेक जनपदों का सौरभ, अनेक जनपदों के आँसू और उल्लास लिए चलती हैं और उनका पारस्परिक मिलन वास्तव में नाना के आँसू और उमंग, भाव और विचार, आशाएँ और शंकाएँ समाहित होती हैं। अत: जहाँ भाषाओं का मिलन होता है, वहाँ वास्तव में विभिन्न जनपदों के हृदय ही मिलते हैं, उनके भावों और विचारों का ही मिलन होता है तथा भिन्नताओं में छिपी हुई एकता वहाँ कुछ अधिक प्रत्यक्ष हो उठती है। इस दृष्टि से भाषाओं के संगम आज सबसे बड़े तीर्थ हैं और इन तीर्थों में जो भी भारतवासी श्रद्धा से स्नान करता है, वह भारतीय एकता का सबसे बड़ा सिपाही और संत है।

हमारी भाषाएँ जितनी ही तेजी से जगेंगी, हमारे विभिन्न प्रदेशों का पारस्परिक ज्ञान उतना ही बढ़ता जाएगा। भारतीय कि वे केवल अपनी ही भाषा में प्रसिद्ध होकर न रह जाएँ, बल्कि भारत की अन्य भाषाओं में भी उनके नाम पहुँचे और उनकी कृतियों की चर्चा हो। भाषाओं के जागरण का आरंभ होते ही एक प्रकार का अखिल भारतीय मंच आप-से-आप प्रकट होने लगा है। आज प्रत्येक भाषा के भीतर यह जानने की इच्छा उत्पन्न हो गई है कि भारत की अन्य भाषाओं में क्या हो रहा है, उनमें कौन-कौन ऐसे लेखक हैं, हैं तथा कौन-सी विचारधारा वहाँ प्रभुसत्ता प्राप्त कर रही है।

प्रश्न –

(क) लेखक ने आधुनिक संगम-स्थल किसको माना है और क्यों?
(ख) भाषा-संगमों में भारत की किन विशेषताओं का संगम होता है?
(ग) दो नदियों का मिलन किसका प्रतीक है?
(घ) अलग-अलग प्रदेशों में आपसी ज्ञान किस प्रकार बढ़ सकता है?
(ड) स्वराज-प्राप्ति के उपरांत विभिन्न भाषाओं के लेखकों में क्या जिज्ञासा उत्पन्न हुई?
(च) लेखक ने सबसे बड़ा सिपाही और संत किसको कहा है और क्यों?
(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. समानार्थी शब्द बताइए – सौरभ, आकांक्षा।
  2. विपरीतार्थक शब्द बताइए – भिन्नता, प्रत्यक्ष।

(ज) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) लेखक ने आधुनिक संगम-स्थल उन सभाओं व मंचों को माना है, जहाँ पर एक से अधिक भाषाएँ एकत्रितहोती हैं। ये भा षाएँ विभिन्न जनपदों में बसने वाली जानता की भावनाएँ लेकर आती हैं।
(ख) किसी भी भाषा के भीतर उस भाषा को बोलने वाली जनता के आँसू और उमंग, भाव और विचार, आशाएँ और शंकाएँ समाहित होती हैं। फलत: जहाँ भाषाओं का संगम होता है, वहाँ विभिन्न भाषा-भाषी लोगों के भावों और विचारों का संगम होता है।
(ग) नदियाँ अपनी धाराओं के साथ मार्ग में आने वाले जनपदों के हर्ष एवं विषाद की कहानी लेकर बहती हैं। अत: उनका मिलन विभिन्न जनपदों के मिलन का ही प्रतीक है।
(घ) भाषाएँ ही लाखों वर्षों तक ज्ञान-विज्ञान को सुरक्षित रखती हैं तथा ज्ञान का प्रचार-प्रसार करती हैं। अत: हम कह सकते हैं कि अलग-अलग प्रदेशों में आपसी ज्ञान तभी बढ़ सकता है, जब भारतीय भाषाएँ जागेंगी।
(ड) स्वराज-प्राप्ति के उपरांत विभिन्न भाषाओं के लेखकों में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि भारत की अन्य भाषाओं में क्या हो रहा है। वे अन्य भाषाओं में भी अपनी प्रसिद्ध चाहने लगे तथा वे अन्य भाषाओं के कवियों एवं उनकी कृतियों के प्रति जिज्ञासु हो उठे।
(च) लेखक ने भाषाओं के संगम में गोता लगाने वाले श्रद्धालुओं को सबसे बड़ा सिपाही और संत कहा है। उसका मानना है कि भाषाओं का संगम, विभिन्न भाषा-भाषियों के भावों और विचारों का संगम होता है। वहाँ विभिन्नता में छिपी एकता मूर्त रूप लेती है और दर्शन करने वाला कोई देशभक्त सिपाही हो सकता है या संत।
(छ)

  1. समानार्थी शब्द-खुशबू, इच्छा।
  2. विपरीतार्थक शब्द-अभिन्नता, परोक्ष।

(ज) शीर्षक-भाषा-संगम : एकता का सूत्र।

10. विद्वानों का यह कथन बहुत ठीक है कि विनम्रता के बिना स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं। इस बात को सब लोग मानते हैं कि आत्मसंस्कार के लिए थोड़ी-बहुत मानसिक स्वतंत्रता परमावश्यक है-चाहे उस स्वतंत्रता में अभिमान और नम्रता दोनों का मेल हो और चाहे वह नम्रता ही से उत्पन्न हो। यह बात तो निश्चित है कि जो मनुष्य मर्यादापूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसके लिए वह गुण अनिवार्य है, जिससे आत्मनिर्भरता आती है और जिससे अपने पैरों के बल खड़ा होना आता है।

युवा को यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि वह बहुत कम बातें जानता है, अपने ही आदर्श से वह बहुत नीचे है और उसकी आकांक्षाएँ उसकी योग्यता से कहीं बढ़ी हुई हैं। उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह अपने बड़ों का सम्मान करे, छोटों और बराबर वालों से कोमलता का व्यवहार करे, ये बातें आत्ममर्यादा के लिए आवश्यक हैं। यह सारा संसार, जो कुछ हम हैं और जो कुछ हमारा है-हमारा शरीर, हमारी आत्मा, हमारे भोग, हमारे घर और बाहर की दशा, हमारे बहुत-से अवगुण और थोड़े गुण-सब इसी बात की आवश्यकता प्रकट करते हैं कि हमें अपनी आत्मा को नम्र रखना चाहिए।

नम्रता से मेरा अभिप्राय दब्बूपन से नहीं है, जिसके कारण मनुष्य दूसरों का मुँह ताकता है, जिससे उसका संकल्प क्षीण और उसकी प्रज्ञा मंद हो जाती है; जिसके कारण वह आगे बढ़ने के समय भी पीछे रहता है और अवसर पड़ने पर चट-पट किसी बात का निर्णय नहीं कर सकता। मनुष्य का बेड़ा उसके अपने ही हाथ में है, उसे वह चाहे जिधर ले जाए। सच्ची आत्मा वही है, जो प्रत्येक दशा में, प्रत्येक स्थिति के बीच अपनी राह आप निकालती है।

प्रश्न –

(क) ‘विनम्रता के बिना स्वतंत्रता का. कोई अर्थ नहीं।’ इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ख) मर्यादापूर्वक जीने के लिए किन गुणों का होना अनिवार्य है और क्यों?
(ग) नम्रता और दब्बूपन में क्या अंतर है?
(घ) दब्बूपन व्यक्ति के विकास में किस प्रकार बाधक होता है? स्पष्ट कीजिए।
(ड) आत्ममर्यादा के लिए कौन-सी बातें आवश्यक हैं? इससे व्यक्ति को क्या लाभ होता है?
(च) आत्मा को नम्र रखने की आवश्यकता किनकी-किनकी होती है?
(छ) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. नम्रता, अनिवार्य का विलोम लिखिए।
  2. ‘अभिमान’ और ‘संकल्प’ में प्रयुक्त उपसर्ग एवं मूल शब्द लिखिए।

(ज) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

उत्तर –

(क) किसी भी व्यक्ति में स्वतंत्रता का भाव आते ही उसके मन में अहकार आ जाता है। इस अहकार के कारण वह अपनी मनुष्यता खो बैठता है। इससे व्यक्ति के आचरण में इतना बदलाव आ जाता है कि वह दूसरों को खुद से हीन समझने लगता है। ऐसे में स्वतंत्रता के साथ विनम्रता का होना आवश्यक है, अन्यथा स्वतंत्रता अर्थहीन हो जाएगी।
(ख) मर्यादापूर्वक जीवन जीने के लिए मानसिक स्वतंत्रता आवश्यक है। इस स्वतंत्रता के साथ नम्रता का मेल होना आवश्यक है। इससे व्यक्ति में आत्मनिर्भरता आती है। आत्मनिर्भरता के कारण वह परमुखापेक्षी नहीं रहता। उसे अपने पैरों पर खड़ा होने की कला आ जाती है।
(ग) दब्बूपन में व्यक्ति का संकल्प व बुद्ध क्षीण होती है, वह त्वरित निर्णय नहीं ले सकता। वह अपने छोटे-छोटे कार्यों तथा निर्णय लेने के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है। इसके विपरीत, नम्रता में व्यक्ति स्वतंत्र होता है। वह नेतृत्व करने वाला होता है। वह अपने निर्णय खुद लेता है और दूसरे का मुँह देखने के लिए विवश नहीं होता।
(घ) दब्बूपन व्यक्ति के विकास में बाधक होता है क्योंकि इसके कारण वह दूसरे का मुँह ताकता है। वह निर्णय नहीं ले पाता। वह अपने संकल्प पर स्थिर नहीं रह पाता। उसकी बुद्ध कमजोर हो जाती है। इससे मनुष्य आगे बढ़ने की बजाय पीछे रह जाता है।
(ड) आत्ममर्यादा के लिए अपने बड़ों का सम्मान करना, छोटों और बराबर वालों से कोमलता का व्यवहार करना आवश्यक है। इससे व्यक्ति को यह लाभ होता है कि वह आत्मसंस्कारित होता है, विनम्र और मर्यादित जीवन जीता है तथा उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद मिलती है।
(च) आत्ममर्यादा के लिए आत्मा को नम्र रखने की आवश्यकता है। इस सारे संसार के लिए, जो कुछ हम हैं और जो कुछ हमारा है, आदि सभी इसी बात की आवश्यकता प्रकट करते हैं। अर्थात हमारा शरीर, हमारी आत्मा, हम जो कुछ खाते-पीते हैं, हमारे घर और बाहर की दशा, हमारे बहुत-से अवगुण यहाँ तक कि कुछ गुण भी आत्मा को नम्र रखने की आवश्यकता प्रकट करते हैं।
(छ)

  1. शब्द विलोम नम्रत उद्दंडता अनिवार्य ऐच्छिक
  2. शब्द उपसर्ग मूल शब्द अभिमान ওলমি मान संकल्प सम् क्रलप

(ज) शीर्षक-विनम्रता का महत्व।

11. राष्ट्रीय भावना के अभ्युदय एवं विकास के लिए भाषा भी एक प्रमुख तत्व है। मानव-समुदाय अपनी संवेदनाओं, भावनाओं एवं विचारों की अभिव्यक्ति हेतु भाषा का साधन अपरिहार्यत: अपनाता है, इसके अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। दिव्य-ईश्वरीय आनंदानुभूति के संबंध में भले ही कबीर ने ‘गूँगे केरी शर्करा’ उक्ति का प्रयोग किया था, पर इससे उनका लक्ष्य शब्द-रूपा भाषा के महत्व को नकारना नहीं था, प्रत्युत उन्होंने भाषा को ‘बहता नीर’ कहकर भाषा की गरिमा प्रतिपादित की थी।

विद्वानों की मान्यता है कि भाषा तत्व राष्ट्रहित के लिए अत्यावश्यक है। जिस प्रकार किसी एक राष्ट्र के भूभाग की भौगोलिक विविधताएँ तथा उसके पर्वत, सागर, सरिताओं आदि की बाधाएँ उस राष्ट्र के निवासियों के परस्पर मिलने-जुलने में अवरोधक सिद्ध हो सकती हैं, उसी प्रकार भाषागत विभिन्नता से भी उनके पारस्परिक संबंधों में निबांधता नहीं रह पाती। आधुनिक विज्ञान युग में यातायात एवं संचार के साधनों की प्रगति से भौगोलिक बाधाएँ अब पहले की तरह बाधित नहीं करतीं। इसी प्रकार यदि राष्ट्र की एक संपर्क भाषा का विकास हो जाए तो पारस्परिक संबंधों के गतिरोध बहुत सीमा तक समाप्त हो सकते हैं।

मानव-समुदाय को एक जीवित जाग्रत एवं जीवंत शरीर की संज्ञा दी जा सकती है और उसका अपना एक निश्चित व्यक्तित्व होता है। भाषा अभिव्यक्ति के माध्यम से इस व्यक्तित्व को साकार करती है, उसके अमूर्त, मानसिक, वैचारिक स्वरूप को मूर्त एवं बिंबात्मक रूप प्रदान करती है। मनुष्यों के विविध समुदाय हैं, उनकी विविध भावनाएँ हैं, विचारधाराएँ हैं, संकल्प एवं आदर्श हैं, उन्हें भाषा ही अभिव्यक्त करने में सक्षम होती है। साहित्य, शास्त्र, गीत-संगीत आदि में मानव-समुदाय अपने आदशों, संकल्पनाओं, अवधारणाओं एवं विशिष्टताओं को वाणी देता है, पर क्या भाषा के अभाव में काव्य, साहित्य, संगीत आदि का अस्तित्व संभव है?

वस्तुत: ज्ञानराशि एवं भावराशि का अपार संचित कोश, जिसे साहित्य का अभिधान दिया जाता है, शब्द-रूप ही तो है। अत: इस संबंध में वैमत्य की किंचित गुंजाइश नहीं है कि भाषा ही एक ऐसा साधन है, जिससे मनुष्य एक-दूसरे के निकट आ सकते हैं, उनमें परस्पर घनिष्ठता स्थापित हो सकती है। यही कारण है कि एक भाषा बोलने एवं समझने वाले लोग परस्पर एकानुभूति रखते हैं, उनके विचारों में ऐक्य रहता है। अत: राष्ट्रीय भावना के विकास के लिए भाषा तत्व परम आवश्यक है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) भाषा मानव-समुदाय के लिए आवश्यक क्यों है?
(ग) कबीर ने ‘गूँगे केरी शर्करा’ के माध्यम से क्या कहना चाहा था? उन्होंने भाषा की महत्ता किस तरह प्रतिपादित की थी?
(घ) राष्ट्रहित में भाषागत एकता की महत्ता स्पष्ट कीजिए।
(ड) ‘भाषा मनुष्य के व्यक्तित्व को साकार करती है।’ स्पष्ट कीजिए।
(च) साहित्य संगीत के अस्तित्व को बनाए रखने में भाषा किस प्रकार सहायक है?
(छ) ‘भाषा मनुष्यों में निकटता लाती है।’ इससे आप कितना सहमत हैं?
(ज) भौगोलिक बाधाओं के बावजूद आज भाषिक एकता किस प्रकार स्थापित की जा सकती है?

उत्तर –

(क) शीर्षक-राष्ट्रीयता और भाषा-तत्व।
(ख) भाषा मानव-समुदाय के लिए इसलिए आवश्यक है क्योंकि मनुष्य भाषा के माध्यम से ही अपने भाव-विचार दूसरों तक पहुँचाता है और भाषा के माध्यम से ही वह दूसरों के विचारों से अवगत होता है। इस प्रकार भाषा मानव-समाज में एकता बनाए रखने का सशक्त माध्यम है।
(ग) ‘गूँगे केरी शर्करा’ के माध्यम से कबीर ने कहना चाहा था कि आनंद की अनुभूति के लिए भाषा आवश्यक नहीं है, क्योंकि गूंगा गुड़ का आनंद लेकर भी उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर पाता। संत कबीर ने भाषा को ‘बहता नीर’ कहकर उसकी महत्ता प्रतिपादित की है।
(घ) राष्ट्रहित के लिए भाषागत एकता परमावश्यक तत्व है। जिस प्रकार किसी राष्ट्र की भौगोलिक विविधताएँ, वहाँ के पर्वत, सागर, सरिताएँ आदि बाधाएँ राष्ट्र के लोगों के परस्पर मिलन में बाधक सिद्ध होती हैं, उसी प्रकार विभिन्न भाषाएँ भी एकता में बाधक सिद्ध होती हैं। अत: राष्ट्र के लिए भाषागत एकता आवश्यक है।
(ड) मानव-समाज को एक जीवित, जाग्रत एवं जीवंत शरीर कहा जा सकता है। उसका अपना एक निश्चित व्यक्तित्व होता है। भाषा इस समाज के अमूर्त, मानसिक, वैचारिक स्वरूप को मूर्त एवं बिंबात्मक रूप प्रदान करती है। भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, जो मानव-समाज के व्यक्तित्व को साकार करती है।
(च) साहित्य, शास्त्र, गीत-संगीत आदि वे साधन हैं, जिनके माध्यम से मानव-समुदाय अपने आदशों, संकल्पनाओं, अवधारणाओं और विशिष्टताओं को मुखर रूप देता है। भाषा के अभाव में काव्य, साहित्य, संगीत आदि अस्तित्वविहीन हो जाते हैं। इस प्रकार साहित्य संगीत के अस्तित्व को बनाए रखने में सहायक है।
(छ) भाषा वह साधन है, जिसके माध्यम से मनुष्य एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं। उनमें परस्पर घनिष्ठता बढ़ती है। वे परस्पर एकानुभूति रखते हैं, उनके विचारों में एकता विद्यमान रहती है। इस प्रकार भाषा मनुष्यों में एकता बढ़ाती है। इससे मैं पूर्णतया सहमत हूँ।
(ज) पर्वत, सागर, नदी तथा अन्य भौगोलिक बाधाओं के बावजूद इस विज्ञान युग में यातायात और संचार के साधनों की उन्नति के कारण भौगोलिक बाधाएँ छोटी पड़ गई हैं, जिससे भाषिक एकता आसानी से स्थापित की जा सकती है।

12. शिक्षा के क्षेत्र में पुनर्विचार की आवश्यकता इतनी गहन है कि अब तक बजट, कक्षा-आकार, शिक्षक-वेतन और पाठ्यक्रम आदि के परंपरागत मतभेद आदि प्रश्नों से इतनी दूर निकल गई है कि इसको यहाँ पर विवेचित नहीं किया जा सकता। द्रवितीय तरंग दूरदर्शन तंत्र की तरह (अथवा उदाहरण के लिए धूम्र भंडार उद्योग) हमारी जनशिक्षा-प्रणालियाँ बड़े पैमाने पर प्राय: लुप्त हैं।

बिलकुल मीडिया की तरह शिक्षा में भी कार्यक्रम विविधता के व्यापक विस्तार और नए मार्गों की बहुतायत की आवश्यकता है। केवल आर्थिक रूप से उत्पादक भूमिकाओं के लिए ही निम्न विकल्प पद्धति की जगह उच्च विकल्प पद्धति को अपनाना होगा, यदि नई थर्ड वेव सोसायटी में शिष्ट जीवन के लिए विद्यालयों में लोग तैयार किए जाते हैं।

शिक्षा और नई संचार-प्रणाली के छह सिद्धांतों-पारस्परिक क्रियाशीलता, गतिशीलता, परिवर्तनीयता, संयोजकता, सर्वव्यापकता और सार्वभौमिकरण-के बीच बहुत ही कम संबंध खोजे गए हैं। अब भी भविष्य की शिक्षा-पद्धति औपिक संवार प्रल के बचसंधक उपेवा करना उना शिवार्थियों को धख देता है,जिक निमाणदनों से होना है। सार्थक रूप से शिक्षा की प्राथमिकता अब मात्र माता-पिता, शिक्षकों एवं मुट्ठी भर शिक्षा-सुधारकों के लिए ही नहीं है, बल्कि व्यापार के उस आधुनिक क्षेत्र के लिए भी प्राथमिकता में है, जब से वहाँ सार्वभौम प्रतियोगिता और शिक्षा के बीच संबंध को स्वीकारने वाले नेताओं की संख्या बढ़ रही है। दूसरी प्राथमिकता कप्यूटर वृद्ध, सूचना तकनीक और विकसित मीडिया के त्वरित सार्वभौमिकरण की है।

कोई भी राष्ट्र 21वीं सदी के इलेक्ट्रॉनिक आधारिक संरचना, एंब्रेसिंग कप्यूटर्स, डाटा संचार और अन्य नवीन मीडिया के बिना 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था का संचालन नहीं कर सकता। इसके लिए ऐसी जनसंख्या की आवश्यकता है, जो इस सूचनात्मक आधारिक संरचना से परिचित हो, ठीक उसी प्रकार जैसे कि समय के परिवहन तंत्र और कारों, सड़कों, राजमार्गों, रेलों से सुपरिचित है। वस्तुत: सभी को टेलीकॉम इंजीनियर अथवा कप्यूटर विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है, जैसा कि सभी को कार मैकेनिक होने की आवश्यकता नहीं है, परंतु संचार-प्रणाली का ज्ञान कंप्यूटर, फ़ैक्स और विकसित दूरसंचार को सम्मिलित करते हुए, उसी प्रकार आसान और मुफ़्त होना चाहिए, जैसा कि आज परिवहन-प्रणाली के साथ है।

अत: विकसित अर्थव्यवस्था चाहने वाले लोगों का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए कि सर्वव्यापकता के नियम की क्रियाशीलता को बढ़ाया जाए–वह है, यह निश्चित करना कि गरीब अथवा अमीर सभी नागरिकों को मीडिया की व्यापक संभावित पहुँच से अवश्य परिचित कराया जाए। अंतत: यदि नई अर्थव्यवस्था का मूल ज्ञान है, तब सतही बातों की अपेक्षा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ‘का लोकतांत्रिक आदर्श सर्वोपरि राजनीतिक प्राथमिकता बन जाता है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) लेखक पुनर्विचार की आवश्यकता कहाँ महसूस कर रहा है और क्यों?
(ग) शिक्षा के क्षेत्र में मीडिया का उदाहरण क्यों दिया गया है?
(घ) शिक्षा और नई संचार-प्रणाली के सिद्धांत लिखिए और बताइए कि इसे धोखा क्यों कहा गया है?
(ड) शिक्षा की प्राथमिकता के क्षेत्र में आए बदलावों का उल्लेख कीजिए।
(च) 21वीं शताब्दी में किस तरह की जनसंख्या की जरूरत होगी और क्यों?
(छ) विकसित अर्थव्यवस्था चाहने वालो का लक्ष्य क्या होना चाहिए?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. ‘विकल्प’, ‘शिक्षा’ में ‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्द बनाइए।
  2. (ii) विलोम बताइए-लोकतंत्र, व्यापक।

उत्तर –

(क) शीर्षक-शिक्षा पर पुनर्विचार की आवश्यकता।
(ख) लेखक शिक्षा के क्षेत्र में पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस कर रहा है, क्योंकि वर्तमान में शिक्षा बजट, कक्षा आकार, शिक्षक-वेतन और पाठ्यक्रम आदि के परंपरागत मतभेद आदि के प्रश्नों से पर्याप्त आगे निकल चुकी है। समय के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने के लिए शिक्षा में भी पुनर्विचार की आवश्यकता है।
(ग) वर्तमान में मीडिया का स्तर और पर्याप्त ऊँचा तथा विस्तार व्यापक हुआ है। मीडिया की तरह ही शिक्षा का स्तर ऊँचा करने, उसका विस्तार करने और जन-जन तक पहुँचाने के लिए नए-नए मार्गों और साधनों की आवश्यकता है, इसलिए शिक्षा में मीडिया का उदाहरण दिया गया है।
(घ) शिक्षा और नई संचार-प्रणाली के छह सिद्धांत हैं-पारस्परिक क्रियाशीलता, गतिशीलता, परिवर्तनीयता, संयोजकता, सार्वभौमिकता और सर्वव्यापकता। इनके बीच संबंधों की बहुत कम खोज हुई है। इसे धोखा इसलिए कहा गया है, क्योंकि भविष्य की शिक्षा-पद्धति और भविष्य की संचार-प्रणाली के बीच संबंधों को महत्व नहीं दिया गया।
(ड) अब तक शिक्षा की प्राथमिकता माता-पिता, शिक्षक एवं मुट्ठी पर शिक्षा सुधारकों के लिए ही थी, पर जब से व्यापार में सार्वभौम प्रतियोगिता और शिक्षा के बीच संबंध स्वीकारने वाले नेताओं की संख्या बढ़ी है, तब से व्यापार का क्षेत्र भी शिक्षा की प्राथमिकता में आ गया है।
(च) 21वीं सदी में सूचनात्मक आधारिक संरचना से परिचित जनसंख्या की आवश्यकता होगी, क्योंकि एंब्रेसिंग कंप्यूटर्स, डाटा संचार और नवीन मीडिया के बिना 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था का संचालन नहीं किया जा सकता।
(छ) विकसित अर्थव्यवस्था चाहने वालो का निम्नलिखित लक्ष्य होना चाहिए

  1. संचार-प्रणाली, कंप्यूटर, फ़ैक्स, विकसित दूरसंचार आसान और सर्वसुलभ हों।
  2. अमीर-गरीब सभी नागरिकों को मीडिया की पहुँच से परिचित कराएँ।

(ज)

  1. विकल्प + इक = वैकल्पिक, शिक्षा + इक = शैक्षिक।
  2. शब्द            विलोम
    लोकतंत्र       राजतत्र
    व्यापक        अव्यापक

13. तुलसी जैसा कवि काव्य की विशुद्ध, मनोमयी, कल्पना-प्रवण तथा श्रृंगारात्मक भावभूमियों के प्रति उत्साही नहीं हो सकता। उनका संत-हृदय परम कारुणिक राम के प्रति ही उन्मुख हो सकता है, जो जीवन के धर्ममय सौंदर्य, मर्यादापूर्ण शील और आत्मिक शौर्य के प्रतीक हैं।

विजय-रथ के रूपक में उन्होंने संत जीवन की रूपरेखा उभारी है और अपनी रामकथा को इसी संतत्व की चरितार्थता बना दिया है। उनका काव्य भारतीय जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा मर्यादित जीवन-चर्या अथवा ‘संत-रहनि’ को वाणी देता है। धर्ममय जीवन की आकांक्षा भारतीय संस्कृति का वैशिष्ट्य है। तुलसी के काव्य में धर्म का अनाविल, अनावरित और अक्षुण्ण रूप ही प्रकट हुआ है।

मध्ययुग की आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व करते हुए भी उनका काव्य भारतीय आत्मा के चिरंतन सौंदर्य का प्रतिनिधि है, जो सत्य, तप, करुणा और मैत्री में ही आरोहण के देवधर्मी मूल्यों को अनावृत करता है। उनके काव्य में हमें श्रेष्ठ कवित्व ही नहीं मिलता, उसके आधार पर हम संत-कवित्व की रूपरेखा भी निर्धारित कर सकते हैं। भक्ति उनके संतत्व की आंतरिक भाव-साधना है। इस भाव-साधना की वाणी की अप्रतिम क्षमता देकर उन्होंने निष्कंप दीपशिखा की भाँति अपनी काव्य-कला को नि:संग और निवैयक्तिक दीप्ति से भरा है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक बताइए।
(ख) कवि तुलसी में किसके प्रति उत्साह नहीं है? तुलसी के काव्य की विशेषता का उल्लेख कीजिए
(ग) गद्यांश में तुलसी के राम की क्या विशेषताएँ बताई गई हैं?
(घ) ‘संत-रहनि’ का आशय स्पष्ट करते हुए भारतीय जीवन में इसकी महत्ता स्पष्ट कीजिए।
(ड) तुलसी के काव्य में देवधर्मी मूल्य किस प्रकार अनावृत हुए हैं?
(च) तुलसी की भक्ति-साधना पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
(छ) तुलसी के काव्य में धर्म किस रूप में प्रकट हुआ है? स्पष्ट कीजिए।
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. पर्यायवाची बताइए-संत, वाणी।
  2. मूल शब्द और प्रत्यय अलग-अलग करके लिखिए-कारुणिक, मर्यादित।

उत्तर –

(क) शीर्षक-संत कवि तुलसीदास।
(ख) तुलसी के काव्य में विशुद्ध मन की उपज, काल्पनिकता की अधिकता तथा श्रृंगारिक भावभूमियों के प्रति अत्यधिक लगाव नहीं है। उनके काव्य में राम के प्रति उन्मुखता है। तुलसी के संत हृदय का असर उनके काव्य पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
(ग) गद्यांश में तुलसी के राम को आदर्श पुरुष बताते हुए उन्हें ‘धर्ममय सौंदर्ययुक्त’ कहा गया है। उनका शील मर्यादापूर्ण है। तथा उनमें वीरता एवं करुणा कूट-कूटकर भरी है।
(घ) ‘संत-रहनि’ का आशय है-संतों जैसी जीवन-शैली या संतों जैसा जीवन जीना। भारतीय जीवन में संतों जैसी मर्यादित जीवन-चर्या की आकांक्षा की गई है। ऐसी जीवन-चर्या भारतीय संस्कृति की विशेषता एवं धर्ममय रही है।
(ड) तुलसी के काव्य में आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व है, जिसमें भारतीय काव्य-आत्मा के चिरंतन सौंदर्य के दर्शन होते हैं। इसमें निहित सत्य, तप, करुणा और मित्रता के आरोहण में देवधर्मी मूल्यों का आरोहण किया गया है।
(च) तुलसी के काव्य में उनके संतत्व और भक्ति-साधना का मणिकांचन योग है। इसी भक्ति-साधना की वाणी को अद्वतीय क्षमता से युक्त करके तुलसी ने उसे उस दीपशिखा के समान प्रज्वलित कर दिया है, जिसकी लौ युगों-युगों तक प्रकाश रहेगी।
(छ) तुलसी के काव्य में धर्म अपने पंकरहित, निष्कलंकित, खुले रूप में, अक्षुण्ण या अपने संपूर्ण रूप में प्रकट हुआ है। काव्य में धर्म का जो रूप है, उसके मूल में लोक-कल्याण की भावना भी समाहित किए हुए है।
(ज)

  1. शब्द पर्यायवाची
    संत साधु, अवधूत
    वाणी वचन, वाक्शक्ति
  2. शब्द मूल शब्द प्रत्यय
    कारुणिक करुणा इक
    मर्यादित मर्यादा इत

14. आज हम इस असमंजस में पड़े हैं और यह निश्चय नहीं कर पाए हैं कि हम किस ओर चलेंगे और हमारा ध्येय क्या है? स्वभावत: ऐसी अवस्था में हमारे पैर लड़खड़ाते हैं। हमारे विचार में भारत के लिए और सारे संसार के लिए सुख और शांति का एक ही रास्ता है और वह है-अहिंसा और आत्मवाद का। अपनी दुर्बलता के कारण हम उसे ग्रहण न कर सके, पर उसके सिद्धांतों को तो हमें स्वीकार कर ही लेना चाहिए और उसके प्रवर्तन का इंतजार करना चाहिए। यदि हम सिद्धांत ही न मानेंगे तो उसके प्रवर्तन की आशा कैसे की जा सकती है। जहाँ तक मैंने महात्मा गांधी के सिद्धांत को समझा है, वह इसी आत्मवाद और अहिंसा के, जिसे वे सत्य भी कहा करते थे, मानने वाले और प्रवर्तक थे। उसे ही कुछ लोग आज गांधीवाद का नाम भी दे रहे हैं।

यद्यपि महात्मा गांधी ने बार-बार यह कहा था-“वे किसी नए सिद्धांत या वाद के प्रवर्तक नहीं हैं और उन्होंने अपने जीवन में प्राचीन सिद्धांतों को अमल कर दिखाने का यत्न किया।” विचार कर देखा जाए, तो जितने सिद्धांत अन्य देशों, अन्य-अन्य कालों और स्थितियों में भिन्न-भिन्न नामों और धर्मों से प्रचलित हुए हैं,सभी अंतिम और मार्मिक अन्वेषण के बाद इसी तत्व अथवा सिद्धांत में समाविष्ट पाए जाते हैं। केवल भौतिकवाद इनसे अलग है।

हमें असमंजस की स्थिति से बाहर निकलकर निश्चय कर लेना है कि हम अहिंसावाद, आत्मवाद और गांधीवाद के अनुयायी और समर्थक हैं, न कि भौतिकवाद के। प्रेय और श्रेय में से हमें श्रेय को चुनना है। श्रेय ही हितकर है, भले ही वह कठिन और श्रमसाध्य हो। इसके विपरीत, प्रेय आरंभ में भले ही आकर्षक दिखाई दे, उसका अंतिम परिणाम अहितकर होता है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) आज का मनुष्य असमंजस में क्यों पड़ा है?
(ग) लेखक के अनुसार, विश्व में सुख-समृद्ध और शांति कैसे स्थापित हो सकती है?
(घ) अहिंसा के बारे में लेखक का विचार स्पष्ट कीजिए।
(ड) आज गांधीवाद की संज्ञा किसे दी जा रही है?
(च) भौतिकवाद को छोड़कर अन्य सिद्धांतों और धर्मों में समानता है, कैसे? स्पष्ट कीजिए।
(छ) भौतिकवाद से क्या अभिप्राय है? मनुष्य को किसका समर्थक बनना चाहिए?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. उपसर्ग, मूल शब्द और प्रत्यय पृथक कीजिए-दुर्बलता।
  2. विशेषण बनाइए-सिद्धांत, निश्चय।

उत्तर –

(क) शीर्षक-श्रेय या प्रेय।
(ख) आज का मनुष्य असमंजस में इसलिए पड़ा हुआ है, क्योंकि वह दिग्भ्रमित है और यह निश्चय नहीं कर पा रहा है कि उसका जीवन-लक्ष्य क्या है और वह किस ओर चले। ऐसी स्थिति में मनुष्य के कदम उसका साथ नहीं दे पाते और वह कोई फैसला नहीं कर पाता।
(ग) लेखक के अनुसार विश्व में सुख-शांति और समृद्ध के लिए आवश्यक है कि लोग हिंसा का रास्ता त्याग दें और मन-वचन तथा कर्म से अहिंसा का पालन करें और आत्मवाद का मार्ग अपनाकर औरों की सुख-शांति के लिए सोचें।
(घ) अहिंसा के बारे में लेखक का विचार है कि अपनी कमजोरी के कारण हम भारतीय अहिंसा को न अपना सके, पर हमें अहिंसा के सिद्धांतों को स्वीकार कर लेना चाहिए और उसके प्रवर्तन का इंतजार करना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हम उसके सिद्धांत को मानें।
(ड) गांधी जी आत्मवाद और अहिंसा का पालन करते थे। इसी अहिंसा और आत्मवाद को वे मानते थे और उसका प्रवर्तन किया तथा इसे ही सत्य का नाम देते थे। उसी को आज गांधीवाद की संज्ञा दी जा रही है।
(च) भौतिकवाद को छोड़कर अन्य सिद्धांतों और धर्मों में समानता है, क्योंकि वे दूसरे देशों में अलग-अलग समय और परिस्थितियों में भले ही अलग-अलग नामों और धर्मों से प्रचलित हुए हैं, उन सभी में अंतिम और मार्मिक खोज के बाद सत्य और अहिंसा समाविष्ट पाए गए हैं।
(छ) भौतिकवाद से अभिप्राय उस सिद्धांत से है, जिसमें सांसारिक सुख-साधनों की प्रधानता रहती है। इन्हीं सुख-साधनों का अधिकाधिक प्रयोग ही जीवन का लक्ष्य मान लिया जाता है। मनुष्य को अहिंसावाद, आत्मवाद और सत्य का समर्थक बनना चाहिए, भौतिकवाद का बिलकुल भी नहीं।
(ज)

  1. शब्द उपसर्ग मूल शब्द प्रत्यय
    दुर्बलता दुर् बल ता
  2. शब्द विशेषण
    सिद्धांत सैद्धांतिक
    निश्चय निश्चित

15. संस्कृति ऐसी चीज नहीं, जिसकी रचना दस-बीस या सौ–पचास वर्षों में की जा सकती हो। हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है; यहाँ तक कि हमारे उठने- ने, घूमने-फिरने और रोने-हँसने से भी हमारी संस्कृति की पहचान होती है, यद्यपि हमारा कोई भी एक काम हमारी संस्कृति का पर्याय नहीं बन सकता।

असल में, संस्कृति जीने का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से हम जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं। इस लिए, जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जिस समाज से मिलकर हम जी रहे हैं, उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है; यद्यपि अपने जीवन में हम जो संस्कार जमा कर रहे हैं, वे भी हमारी संस्कृति के अंग बन जाते हैं और मरने के बाद हम अन्य वस्तुओं के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोड़ जाते हैं।

इसलिए संस्कृति वह चीज मानी जाती है, जो हमारे सारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। यही नहीं, बल्कि संस्कृति हमारा पीछा जन्म-जन्मातर तक करती है। अपने यहाँ एक साधारण कहावत है कि जिसका जैसा संस्कार है, उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है। जाब हम किसी बालक या बालिका को बहुत तेज पाते है, तब अचानक कह देते हैं कि वह पूर्वजन्म का संस्कार है। संस्कार या संस्कृति, असल में, शरीर का नहीं, आत्मा का गुण है; और जबकि सभ्यता की मामांग्रेयों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है, तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक बताइए।
(ख) संस्कृति के बारे में लेखक क्या बताता है?
(ग) स्पष्ट कीजिए कि संस्कृति जीने का एक तरीका है।
(घ) संस्कृति एवं सभ्यता में अंतर स्पष्ट कीजिए।
(ड) संस्कृति पूर्वजन्म का संस्कार है। इसे बताने के लिए लेखक ने क्या उदाहरण दिया है?
(च) संस्कृति की रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है-स्पष्ट कीजिए।
(छ) संस्कृति जीने का तरीका क्यों है?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. संस्कृति जीने का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है।-मिश्र वाक्य बनाइए।
  2. विलोम बताइए—छाया, जीवन।

उत्तर –

(क) शीर्षक-सभ्यता और संस्कृति।
(ख) संस्कृति के बारे में लेखक बताता है कि इसकी रचना दस-बीस या सौ-पचास साल में नहीं की जा सकती। इसके बनने में सदियाँ लग जाती हैं। इसके अलावा हमारे दैनिक कार्य-व्यवहार में हमारी संस्कृति की झलक मिलती है।
(ग) मनुष्य के अत्यंत साधारण से काम, जैसे-उठने-बैठने, पहनने-ओढ़ने, घूमने-फिरने और रोने-हँसने के तरीके में भी उसकी संस्कृति की झलक मिलती है। यद्यपि किसी एक काम को संस्कृति का पर्याय नहीं कहा जा सकता, फिर भी हमारे कामों से संस्कृति की पहचान होती है, अत: संस्कृति जीने का एक तरीका है।
(घ) संस्कृति और सभ्यता का मूल अंतर यह होता है कि संस्कृति हमारे सारे जीवन में समाई हुई है। इसका प्रभाव जन्म-जन्मांतर तक देखा जा सकता है। इसका संबंध परलोक से है, जबकि सभ्यता का संबंध इसी लोक से है। इसका अनुमान व्यक्ति के जीवन-स्तर को देखकर लगाया जाता है।
(ड) संस्कृति पूर्वजन्म का संस्कार है, इसे बताने के लिए लेखक ने यह उदाहरण दिया है कि व्यक्ति का पुनर्जन्म भी उसके संस्कारों के अनुरूप ही होता है। जब हम किसी बालक-बालिका को बहुत तेज पाते हैं, तो कह बैठते हैं कि ये तो इसके पूर्वजन्म के संस्कार हैं।
(च) व्यक्ति अपने जीवन में जो संस्कार जमा करता है, वे संस्कृति के अंग बन जाते हैं। मरणोपरांत व्यक्ति अन्य वस्तुओं के अलावा इस संस्कृति को भी छोड़ जाता है, जो आगामी पीढ़ी के सारे जीवन में व्याप्त रहती है। इस तरह उसकी रचना और विकास में सदियों के अनुभवों का हाथ होता है।
(छ) व्यक्ति के उठने-बैठने, जीने के ढंग उस समाज में छाए रहते हैं, जिसमें वह जन्म लेता है। व्यक्ति अपने समाज की संस्कृति को अपनाकर जीता है, इसलिए संस्कृति जीने का तरीका है।
(ज)

  1. संस्कृति जीने का वह तरीका है, जो सदियों से जमा होकर समाज में छाया रहता है।
  2. शब्द विलोम
    छाया धूप
    जीवन मरण

16. विज्ञापन कला जिस तेजी से उन्नति कर रही है, उससे मुझे भविष्य के लिए और भी अंदेशा है। लगता है ऐसा युग आने वाला है, जब शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और साहित्य आदि का केवल विज्ञापन कला के लिए ही उपयोग रह जाएगा। वैसे तो आज भी इस कला के लिए इनका खासा उपयोग होता है। बहुत-सी शिक्षण संस्थाएँ हैं, जो सांप्रदायिक संस्थाओं का विज्ञापन हैं।

अपनी पीढ़ी के कई लेखकों की कृतियाँ लाला छगनलाल, मगनलाल या इस तरह के नाम के किसी और लाल की स्मारक निधि से प्रकाशित होकर लाला जी की दिवंगत आत्मा के प्रति स्मारक होने का फ़ज़ अदा कर रही हैं, मगर आने वाले युग में यह कला दो कदम आगे बढ़ जाएगी। विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय के दीक्षांत महोत्सव पर जो डिग्रियाँ दी जाएँगी, उनके निचले कोने में छपा रहेगा-“आपकी शिक्षा के उपयोग का एक ही मार्ग है, आज ही आयात-निर्यात का धंधा प्रारंभ कीजिए। मुफ्त सूचीपत्र के लिए लिखिए।”

हर नए आविष्कारक का चेहरा मुस्कराता हुआ टेलीविजन पर जाकर कुछ इस तरह निवेदन करेगा-“मुझे यह कहते हुए हार्दिक प्रसन्नता है कि मेरे प्रयत्न की सफलता का सारा श्रेय रबड़ के टायर बनाने वाली कंपनी को है, क्योंकि उन्हीं के प्रोत्साहन और प्रेरणा से मैंने इस दिशा में कदम बढ़ाया था ’” विष्णु के मंदिर खड़े होंगे, जिनमें संगमरमर की सुंदर प्रतिमा के नीचे पट्टी लगी होगी-“याद रखिए, इस मूर्ति और इस भवन के निर्माण का श्रेय लाल हाथी के निशान वाले निर्माताओं को है।

वास्तुकला संबंधी अपनी सभी आवश्यकताओं के लिए लाल हाथी का निशान कभी मत भूलिए।” और ऐसे-ऐसे उपन्यास हाथ में आया करेंगे, जिनकी सुंदर चमड़े की जिल्द पर एक ओर बारीक अक्षरों में लिखा होगा-‘साहित्य में अभिरुचि रखने वालों को इक्का माक साबुन वालों की एक और तुच्छ भेंट।” और बात बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक पहुँच जाएगी कि जब एक दूल्हा बड़े अरमान से दुल्हन ब्याहकर घर आएगा और घूंघट हटाकर उसके रूप की प्रसन्नता में पहला वाक्य कहेगा तो दुल्हन मधुर भाव से आँख उठाकर हृदय का सारा दुलार शब्दों में उड़ेलती हुई कहेगी-“रोज सुबह उठकर नौ सौ इक्यावन नंबर के साबुन से नहाती हूँ।”

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) भविष्य के लिए लेखक को किस बात की आशंका हो रही है और क्यों?
(ग) आज शिक्षण संस्थाओं की क्या स्थिति है?
(घ) विज्ञापन ने अपनी पहुँच मंदिरों और भगवान के चरणों तक बना ली है। कैसे?
(ड) इस गद्यांश के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
(च) कुछ लेखकों की कृतियाँ किसी व्यक्ति-विशेष की स्मारक बन जाती हैं, कैसे?
(छ) आने वाले समय में विश्वविद्यालय की डिग्रियों की स्थिति क्या होगी? और क्यों?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. “बहुत-सी शिक्षण संस्थाएँ हैं, जो सांप्रदायिक संस्थाओं का विज्ञापन हैं”-उपवाक्य और उसका भेद लिखिए।
  2. संधि-विच्छेद कीजिए-दीक्षांत, महोत्सव।

उत्तर –

(क) शीर्षक-विज्ञापन युग।
(ख) लेखक को भविष्य के लिए इस बात की आशंका बढ़ती जा रही है कि ऐसा समय आने वाला है, जब शिक्षा विज्ञान, संस्कृति और साहित्य का प्रयोग केवल विज्ञापन कला भर के लिए ही रह जाएगा। उसका कारण यह है कि विज्ञापन कला निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर है।
(ग) आज शिक्षण संस्थाएँ सांप्रदायिक संस्थाओं का विज्ञापन बन चुकी हैं। उनके नाम को पढ़ते ही किसी धर्म, संप्रदायविशेष से उनका जुड़ाव प्रकट होने लगता है। ऐसा लगता है कि उनकी स्थापना उसी संप्रदाय-विशेष के हित के लिए की गई है। कुछ संस्थाओं के संचालन का जिम्मा कुछ ट्रस्टों की कृपा पर आश्रित होकर रह गया है।
(घ) विज्ञापन का प्रचार-प्रसार इतना बढ़ चुका है कि देवालय जैसे स्थान भी इसकी पहुँच से दूर नहीं रहे हैं। आज मंदिरों और देवालयों में भी तरह-तरह के विज्ञापन सरलता से देखे जा सकते हैं। दीवारों और मंदिर की मूर्तियों पर उनके दानदाता का नाम कुछ विज्ञापित करता दिखाई देता है।
(ड) इस गद्यांश के माध्यम से लेखक यह कहना चाहता है कि वर्तमान में विज्ञापन का बोलबाला है। इसने मानवजीवन को कदम-कदम पर प्रभावित किया है। शिक्षालय, देवालय, विद्यार्थियों की डिग्रियाँ भी किसी-न-किसी व्यक्ति या वस्तु का विज्ञापन करती नजर आती हैं। भविष्य में इसके बढ़ते रहने की प्रबल संभावना है।
(च) जब कुछ लेखकों की कृतियाँ धनाभाव में प्रकाशित नहीं हो पाती हैं, तब किसी लाला छगनलाल, मगनलाल की सहायता राशि से प्रकाशित होती हैं, परंतु उस पर सहायक व्यक्ति या संस्था का नाम लिखा जाता है। इस प्रकार वह कृति उस व्यक्ति-विशेष की स्मारक बन जाती है।
(छ) आगामी समय में विश्वविद्यालय की डिग्रियाँ व्यक्ति की योग्यता का प्रमाण-पत्र कम, विज्ञापन का साधन अधिक होंगी, क्योंकि उन पर शिक्षार्थी की योग्यता के उल्लेख के साथ-साथ विज्ञापन संबंधी वाक्य भी होंगे, जो आयात-निर्यात के धंधे और सूची-पत्र पाने की जगह के बारे में बताएँगे।
(ज)

  1. उपवाक्य-जो सांप्रदायिक संस्थाओं का विज्ञापन हैं। भेद-विशेषण उपवाक्य।
  2. शब्द संधि-विच्छेद
    दीक्षांत दीक्षा + अंत
    महोत्सव महा + उत्सव

17. साहित्य की शाश्वतता का प्रश्न एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या साहित्य शाश्वत होता है? यदि हाँ, तो किस मायने में? क्या कोई साहित्य अपने रचनाकाल के सौ वर्ष बीत जाने पर भी उतना ही प्रासंगिक रहता है, जितना वह अपनी रचना के समय था? अपने समय या युग का निर्माता साहित्यकार क्या सौ वर्ष बाद की परिस्थितियों का भी युग-निर्माता हो सकता है। समय बदलता रहता है, परिस्थितियाँ और भावबोध बदलते हैं, साहित्य बदलता है और इसी के समानांतर पाठक की मानसिकता और अभिरुचि भी बदलती है।

अत: कोई भी कविता अपने सामयिक परिवेश के बदल जाने पर ठीक वही उत्तेजना पैदा नहीं कर सकती, जो उसने अपने रचनाकाल के दौरान की होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि एक विशेष प्रकार के साहित्य के श्रेष्ठ अस्तित्व मात्र से वह साहित्य हर युग के लिए उतना ही विशेष आकर्षण रखे, यह आवश्यक नहीं है। यही कारण है कि वर्तमान युग में इंगला-पिंगला, सुषुम्ना, अनहद, नाद आदि पारिभाषिक शब्दावली मन में विशेष भावोत्तेजन नहीं करती।

साहित्य की श्रेष्ठता मात्र ही उसके नित्य आकर्षण का आधार नहीं है। उसकी श्रेष्ठता का युगयुगीन आधार हैं, वे जीवन-मूल्य तथा उनकी अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्तियाँ जो मनुष्य की स्वतंत्रता तथा उच्चतर मानव-विकास के लिए पथ-प्रदर्शक का काम करती हैं। पुराने साहित्य का केवल वही श्री-सौंदर्य हमारे लिए ग्राह्य होगा, जो नवीन जीवन-मूल्यों के विकास में सक्रिय सहयोग दे अथवा स्थिति-रक्षा में सहायक हो। कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता को अस्वीकार करते हैं।

वे मानते हैं कि साहित्यकार निरपेक्ष होता है और उस पर कोई भी दबाव आरोपित नहीं होना चाहिए। किंतु वे भूल जाते हैं कि साहित्य के निर्माण की मूल प्रेरणा मानव-जीवन में ही विद्यमान रहती है। जीवन के लिए ही उसकी सृष्टि होती है। तुलसीदास जब स्वांत:सुखाय काव्य-रचना करते हैं, तब अभिप्राय यह नहीं रहता कि मानव-समाज के लिए इस रचना का कोई उपयोग नहीं है, बल्कि उनके अंत:करण में संपूर्ण संसार की सुख-भावना एवं हित-कामना सन्निहित रहती है। जो साहित्यकार अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को व्यापक लोक-जीवन में सन्निविष्ट कर देता है, उसी के हाथों स्थायी एवं प्रेरणाप्रद साहित्य का सृजन हो सकता है।

प्रश्न –

(क) प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) पुराने साहित्य के प्रति अरुचि का क्या कारण है?
(ग) जीवन के विकास में पुराने साहित्य का कौन-सा अंश स्वीकार्य है और कौन-सा नहीं?
(घ) साहित्य की शाश्वतता का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि यह शाश्वत होता है या नहीं।
(ड) सामयिक परिवेश बदलने का कविता पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्यों?
(च) साहित्य की श्रेष्ठता के आधार क्या हैं?
(छ) कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता अस्वीकारने की भूल किस तरह करते हैं? यह किस तरह अनुचित है?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए

  1. ‘भावोत्तेजना’, ‘समानांतर’ शब्दों का संधि-विच्छेद कीजिए।
  2. ‘जीवन-मूल्य’, ‘साहित्यकार’ शब्दों का विग्रह करके समास का नाम बताइए।

उत्तर –

(क) शीर्षक-साहित्य की प्रासंगिकता।
(ख) वर्तमान युग में पुराने साहित्य के प्रति अरुचि हो गई है, क्योंकि पाठक की अभिरुचि बदल गई है और वर्तमान युग में पुराने साहित्य को वह अपने लिए प्रासंगिक नहीं पाता। इसके अलावा देशकाल और परिस्थिति के अनुसार साहित्य की प्रासंगिकता बदलती रहती है।
(ग) जीवन के विकास में पुराने साहित्य का केवल वही अंश स्वीकार्य है, जो नवीन जीवन-मूल्यों के विकास में सक्रिय सहयोग दे। पुराने साहित्य का वह अंश अस्वीकार कर दिया जाता है, जो अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खो चुका है तथा जीवन-मूल्यों से असंबद्ध हो चुका होता है।
(घ) साहित्य की शाश्वतता का तात्पर्य है-हर काल एवं परिस्थिति में अपनी उपयोगिता बनाए रखना एवं प्रासंगिकता को कम न होने देना। साहित्य को शाश्वत इसलिए नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह समय के साथ अपनी प्रासंगिकता खो बैठता है। इसके अलावा रचनाकार अपने काल की परिस्थितियों के अनुरूप ही साहित्य-सृजन करता है।
(ड) सामयिक परिवेश के बदलाव का कविता पर बहुत प्रभाव पड़ता है। परिवेश बदलने से कविता पाठक के मन में वह उत्तेजना नहीं उत्पन्न कर पाती, जो वह अपने रचनाकाल के समय करती थी। इसका कारण है-समय, परिस्थितियाँ और भावबोध बदलने के अलावा पाठकों की अभिरुचि और मानसिकता में भी बदलाव आ जाना।
(च) साहित्य की श्रेष्ठता के आधार हैं वे जीवन-मूल्य तथा उनकी अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्तियाँ, जो मनुष्य की स्वतंत्रता तथा उच्चतर मानव-विकास के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य करती हैं।
(छ) कुछ लोग साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता अस्वीकारने की भूल यह मानकर करते हैं कि साहित्य निरपेक्ष होता है तथा उस पर दबाव नहीं होना चाहिए। चूँकि साहित्य मानव-जीवन के सापेक्ष होता है और जीवन के लिए ही उसकी सृष्टि की जाती है, अत: कुछ लोगों द्वारा साहित्य को निरपेक्ष मानना अनुचित है।
(ज)

  1. शब्द संधि-विच्छेद
    भावोत्तेजना भाव + उत्तेजना
    समानांतर समान + अंतर
  2. शब्द विग्रह समास का नाम
    जीवन-मूल्य जीवन के मूल्य संबंध तत्पुरुष
    साहित्यकार साहित्य को रचना करने वाला कर्मधारय समास

18. भारतीय मनीषा ने कला, धर्म, दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में नाना भाव से महत्वपूर्ण फल पाए हैं और भविष्य में भी महत्वपूर्ण फल पाने की योग्यता का परिचय वह दे चुकी है। परंतु भिन्न कारणों से समूची जनता एक ही धरातल पर नहीं है और सबकी चिंतन-दृष्टि भी एक नहीं है। जल्दी ही कोई फल पा लेने की आशा में अटकलपच्चू सिद्धांत कायम कर लेना और उसके आधार पर कार्यक्रम बनाना अभीष्ट सिद्ध में सब समय सहायक नहीं होगा।

विकास की अलग-अलग सीढ़ियों पर खड़ी जनता के लिए नाना प्रकार के कार्यक्रम आवश्यक होंगे। उद्देश्य की एकता ही विविध कार्यक्रमों में एकता ला सकती है, परंतु इतना निश्चित है कि जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरंभ किया जाए, वह फलदायक नहीं होगा।

बहुत-से हिंदू- एकता को या हिंदू-संगठन को ही लक्ष्य मानकर उपाय सोचने लगते हैं। वस्तुत: हिंदू-मुस्लिम एकता साधन है, साध्य नहीं। साध्य है, मनुष्य को पशु समान स्वार्थी धरातल से ऊपर उठाकर ‘मनुष्यता’ के आसन पर ।

हिंदू और मुस्लिम अगर मिलकर संसार में लूट-खसोट मचाने के लिए साम्राज्य स्थापित करने निकल पड़े, तो हिंदू-मुस्लिम मिलन से मनुष्यता काँप उठेगी। परंतु हिंदू-मुस्लिम मिलन का उद्देश्य है-मनुष्य को दासता, जड़ता, , कुसंस्कार और परमुखापेक्षिता से बचाना; मनुष्य को क्षुद्र स्वार्थ और अहमिका की दुनिया से ऊपर उठाकर सत्य, और दुनिया में ले जाना; मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को हटाकर परस्पर सहयोगिता के पवित्र धन में बाँधना। मनुष्य का सामूहिक कल्याण ही हमारा लक्ष्य हो सकता है। वही मनुष्य का सर्वोत्तम प्राप्य है।

आर्य, नाग, आभीर आदि जातियों के सैकड़ों वर्षों के संघर्ष के बाद हिंदू दृष्टिकोण बना है। नए सिरे से भारतीय दृष्टिकोण बनाने के लिए इतने ही लंबे अरसे की जरूरत नहीं है। आज हम इतिहास को अधिक यथार्थ ढंग से समझ सकते हैं और तदनुकूल अपने विकास की योजना बना सकते हैं। धैर्य हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। इतिहास-विधाता समझकर ही हम अपनी योजना बनाएँ, तो सफलता की आशा कर सकते हैं।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) गद्यांश के आधार पर भारतीय मनीषा की विशेषताएँ लिखिए।
(ग) जनता के विकास के लिए किस तरह के कार्यक्रम की आवश्यकता होती है? और क्यों?
(घ) ‘हिंदू-मुस्लिम एकता भी साधन है, साध्य नहीं’ का क्या अर्थ है? यहाँ लेखक क्या ध्यान रखना चाहता है?
(ड) हिंदू-मुस्लिम ऐक्य किस तरह मानवता के लिए घातक हो सकता है?
(च) हिंदू-मुस्लिम एकता का उद्देश्य क्या है?
(छ) मनुष्य का सर्वोत्तम प्राप्य क्या है? इस प्राप्य के लिए हिंदू दृष्टिकोण कैसे विकसित हुआ है?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. “हम इतिहास को अधिक यथार्थ ढंग से समझकर तद्नुकूल अपने विकास की योजना बना सकते हैं” मिश्र वाक्य में बदलिए।
  2. विलोम बताइए-एकता, पवित्र।

उत्तर –

(क) शीर्षक-हमारा लक्ष्य-मानव-कल्याण।
(ख) भारतीय मनीषा ने कला, धर्म, दर्शन और साहित्य आदि इस बात का भी प्रमाण दिया है कि भविष्य में भी वह P जनता न तो एक धरातल पर है और न सभी की चिंतन दृष्टि में समानता है।
(ग) जनता के विकास के लिए ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता होती है, जिसमें

  1. विविधता हो अर्थात् जिससे सभी की आवश्यकताएँ पूरी हो सकें।
  2. फल पाने की जल्दी में काल्पनिक सिद्धांत के लिए जगह न हो। ऐसा इसलिए आवश्यक है, क्योंकि जनता विकास की अलग-अलग सीढ़ियों पर खड़ी है।

(घ) इसका अर्थ यह है कि मात्र हिंदू-मुस्लिम ऐक्य स्थापित करना ही हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे मानव-कल्याण का उद्देश्य पाने का साधन भी समझना चाहिए। हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हिंदू-मुस्लिम की यह एकता अपने उद्देश्य से भटककर मानवता-विरोधी कार्य में न संलग्न हो जाए।
(ड) हिंदू-मुस्लिम एकता मानवता के लिए तब घातक हो सकती है, जब दोनों संप्रदाय आपस में मिलकर नया राज्य स्थापित करना चाहें अर्थात यह एकता मानव-कल्याण के उद्देश्य से भटक जाए।
(च) हिंदू-मुस्लिम एकता का उद्देश्य है-मनुष्य को दासता, जड़ता, मोह, कुसंस्कार और अपने कार्यों के लिए दूसरों का मुँह ताकने से बचाते हुए क्षुद्र स्वार्थ की भावना का त्याग करना। इसके अलावा मनुष्य को न्याय और उदारता की दुनिया में ले जाना तथा मनुष्य को मनुष्य के शोषण से बचाकर परस्पर सहयोग के बंधन में बाँधना है।
(छ) मनुष्य का सर्वोत्तम प्राप्य है-मनुष्य का सामूहिक कल्याण करने का लक्ष्य। इस प्राप्य के लिए हिंदू दृष्टिकोण आर्य, द्रविड़, शक, नाग, आभीर आदि जातियों के सैकड़ों वर्षों के संघर्ष के बाद बना है।
(ज)

  1. जब हम इतिहास को अधिक यथार्थ ढंग से समझेंगे तब तदनुकूल अपने विकास की योजना बना सकते हैं।
  2. शब्द विलोम
    एकता अनेकता
    पवित्र अपवित्र

19. स्वतंत्र व्यवसाय की अर्थनीति के नए वैश्चिक वातावरण ने विदेशी पूँजी-निवेश की खुली छूट है रखी है, जिसके कारण दूरदर्शन में ऐसे विज्ञापनों की भरमार हौ गई है, जो उन्मुक्त वासना, हिंसा, अपराध, लालच और ईर्ष्या जैसे मानव की हीनतम प्रवृस्तिओं को आधार मानकर चल रहै हैं। अत्यंत खेद का विषय है कि राष्टीय दूरदर्शन ने भी उनकी भौंडी नकल कौ ठान ली हैं।

आधुनिकता के नाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, सुनाया जा रहा है, उससे भारतीय जीवन-मुख्या का दूर का भी रिश्ता नहीं है, वे सत्य से भी कोसों दूर हैं। नई पीढी, जो स्वयं में रचनात्मक गुणों का विकास करने की जगह दूरदर्शन के सामने बैठकर कुछ सीखना, जानना और मनोरंजन करना चाहती है, उसका भगवान ही मालिक है।

जो असत्य है, वह सत्य नहीं हो सकता। समाज को शिव बनाने का प्रयत्न नहीं होगा तो समाज शव बनेगा ही। आज यह मज़बूरी हो गई है कि दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले वासनायुक्त, अश्लील दृश्यों से चार पीढ़ियाँएक साथ आँखें चार कर रही हैं। नतीजा सामने हैं। बलात्कार, अपहरण, छोटी बच्चियों के साथ निकट संबंधियों द्वारा शर्मनाक यौनाचार की घटनाओं में वृदूधि।

ठुमक कर चलते शिशु दूरदर्शन पर दिखाए और सुनाए जा रहे स्वर और भंगिमाओं, पर अपनी कमर लचकाने लगे हैं। ऐसे कार्यक्रम न शिव हैं, न समाज को शिव बनाने को शक्ति है इनमें। फिर जी शिव नहीं, वह सुंदर जैसे हो सकता है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) नई आर्थिक व्यवस्था से भारतीय दूरदर्शन किस तरह प्रभावित है?
(ग) नई आर्थिक नीति ने मानवीय मूल्यों को किस तरह प्रभावित किया है?
(घ) ‘अर्थनीति के नए वैश्विक वातावरण’ से लेखक का क्या तात्पर्य है?
(ड) लेखक ने कहा है कि ‘नई पीढ़ी का भगवान ही मालिक है।’ उसने ऐसा क्यों कहा होगा?
(च) ‘समाज को शिव बनाने का प्रयत्न नहीं होगा तो समाज शव बनेगा ही।’ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
(छ) दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रम उपयोगी क्यों नहीं हैं?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. संधि-विच्छेद कीजिए-अत्यंत, उन्मुक्त।
  2. विलोम बताइए-स्वतंत्र, सत्य।

उत्तर –

(क) शीर्षक-भारतीय दूरदर्शन की अनर्थकारी भूमिका।
(ख) नई आर्थिक व्यवस्था से भारतीय दूरदर्शन बुरी तरह प्रभावित है। इसके कारण दूरदर्शन पर जो विज्ञापन और कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, उनमें हिंसा, यौनाचार, बलात्कार, अपहरण आदि मानव की हीनतम वृत्तियों की बाढ़-सी आ गई है। इससे समाज पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
(ग) नई आर्थिक नीति के कारण दूरदर्शन पर जो कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, उनके आधुनिक होने का दावा किया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों ने भारतीय जीवन-मूल्यों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इनमें पाश्चात्य जीवन-मूल्यों का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है और भारतीय जीवन-मूल्यों को हासिए पर डालने का कार्य किया जा रहा है।
(घ) इसका अर्थ यह है कि आर्थिक नीति में राष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाकर उसका उदारीकरण करना, जिससे कोई देश अन्य किसी देश में व्यवसाय करने, उद्योग लगाने आदि आर्थिक कार्यक्रमों में स्वतंत्र हो।
(ड) लेखक के अनुसार, ‘नई पीढ़ी का भगवान ही मालिक है।’ उसने ऐसा इसलिए कहा है, क्योंकि बाल्यावस्था एवं युवावस्था जीवन-निर्माण का काल होता है। इसी काल में रचनात्मक गुण विकसित होते हैं। इसके लिए पिजवना-मृत्य हिता एवं सय से कस दू वाले कर्यक्म देक सखना जाना औरमोजना करता चाहती है।
(च) इस कथन के माध्यम से लेखक यह कहना चाहता है कि दूरदर्शन पर ऐसे कार्यक्रम प्रसारित किए जाने चाहिए, जिनसे भारतीय जीवन-मूल्य संबंधित हों। इससे समाज शिव अर्थात सुंदर बनेगा। यदि इसके लिए सही प्रयास किया गया, तो समाज में हिंसा, अपहरण, यौनाचार जैसी घटनाएँ बढ़ेगीं और समाज शव की भाँति विकृत एवं घृणित हो जाएगा।
(छ) दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों में आधुनिकता की नकल है। इस आधुनिकता के दिखाया-सुनाया जा रहा है, वे भारतीय मूल्यों से संबंधित नहीं हैं। ये कार्यक्रम सत्य नहीं होते। पीढ़ी में रचनात्मक गुणों का विकास नहीं करते, इसलिए ये उपयोगी नहीं हैं।
(ज)

  1. शल्द संधि-विच्छेद
    अत्यत अति + अंत
    उन्मुक्त उन् + मुक्त
  2. शब्द विलोम
    स्वतंत्र परतत्र
    सत्य असत्य

20. संस्कृति और सभ्यता-ये दो शब्द हैं और उनके अर्थ भी अलग-अलग हैं। सभ्यता मनुष्य का वह गुण है, जिससे वह अपनी बाहरी तरक्की करता है। संस्कृति वह गुण है, जिससे वह अपनी भीतरी उन्नति करता है, करुणा, प्रेम और परोपकार सीखता है। आज रेलगाडी , मोटर और हवाई जहाज, लंबी-चौही सड़कें और बड़े-बड़े मकान, अच्छा भोजन और अच्छी पोशाक, ये सभ्यता की पहचान है और जिस देश में इनकी जितनी ही अधिकता है, उस देश को हम उतना ही सभ्य मानते हैं। मगर संस्कृति इन सबसे कहीं बारीक चीज है।

वह मोटर नहीं, मोटर बनाने की कला है, मकान नहीं, मकान बनाने की रुचि डै। संस्कृति धन नहीं, गुण है। संस्कृति ठाठ-बाट नहीँ, विनय और विनम्रता है। एक कहावत है कि सभ्यता वह चीज है, जो हमारे पास है, लेकिन संस्कृति वह गुण है, जो हममें छिपा हुआ है। हमारे पास घर होता है कपडे-लत्ते होते हैं, मगर ये सारी चीजे हमारी सभ्यता के सबूत हैं, जबकि संस्कृति इतने मोटे तौर पर दिखाई नहीं देती, वह बहुत ही सूक्ष्म और महीन चीज है और वह हमारी हर पसंद, हर आदत में छिपी रहती है।

मकान बनाना सभ्यता का काम है, लेकिन हम मकान का कौन-सा नक्शा पसंद करते है-यह हमारी संस्कृति बताती है। आदमी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर-ये छह विकार प्रकृति के दिए हुए हैं। परंतु अगर ये विकार बेरोके छोड़ दिए जाएँ, तो आदमी इतना गिर जाए कि उसमें और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाएगा। इसलिए आदमी इन विकारों पर रोक लगाता है। इन दुर्गिणों पर जो आदमी जितना ज्यादा काबू कर याता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊँची समझी जाती है।

संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान रने बढती है। जब दो देशों या जातियों के लोग आपस में मिलते हैं तब उन दोनों की संस्कृतियाँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। इसलिए संस्कृति को दृष्टि से वह जाति या वह देश बहुत ही धनी समझा जाता है, जिसने ज्यादा-रपे-ज्यादा देशों या जातियों को संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास किया हो।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) सभ्य व्यक्ति की पहचान कैसे की जा सकती है?
(ग) सभ्यता से संस्कृति किस प्रकार भिन्न है?
(घ) ‘संस्कृति व्यक्ति की भीतरी उन्नति करती है।’-स्पष्ट कीजिए।
(ड) मनुष्य में कौन-कौन-से विकार पाए जाते हैं? इन पर रोक न लगाने का क्या दुष्परिणाम होगा?
(च) किसी देश की सभ्यता के मापदंड क्या-क्या हैं?
(छ) संस्कृति का स्वभाव बताइए तथा स्पष्ट कीजिए कि देश की सांस्कृतिक समृद्ध इससे किस तरह प्रभावित होती है?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. ‘संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है।’-उपवाक्य तथा उसका भेद बताइए।
  2. उपसर्ग पृथक कर मूल शब्द बताइए—उन्नति, संस्कृति।

उत्तर –

(क) शीर्षक-सभ्यता और संस्कृति।
(ख) जिस व्यक्ति में बाहरी तरक्की करने का गुण है, उसे ‘सभ्य’ कहते हैं। उस व्यक्ति की बाहरी तरक्की की पहचान उसके आस-पास मौजूद भौतिक साधनों के माध्यम से की जाती है। मोटर-गाड़ी, अच्छा मकान, सुख-सुविधा के पूना, अछा भजना, अच्छी पेशक आद जिके पास हैं.उसी पहावान साथ व्यिक्त के रूप मेंक जाती है।
(ग) सभ्यता और संस्कृति में एक नहीं, अनेक भिन्नताएँ हैं। सभ्यता बाहरी दिखावे की वस्तु है, जबकि संस्कृति व्यक्ति का आतरिक गुण है। सभ्यता के माध्यम से व्यक्ति भौतिक सुख-साधनों की वृद्ध करता है, जबकि संस्कृति उसकी भीतरी उन्नति में सहायक होती है। यह अत्यंत सूक्ष्म एवं महीन होती है।
(घ) संस्कृति व्यक्ति में छिपा एक मानवीय गुण है। संस्कृति के प्रभाव से व्यक्ति प्रेम, करुणा और परोपकार का पाठ सीखता है। इन मानवीय गुणों के बिना के जीवन की सार्थकता नहीं होती। ये मानवीय गुण बाहर से दिखाई देने की वस्तु नहीं होते, अत: स्पष्ट है कि संस्कृति व्यक्ति की भीतरी उन्नति करती है।
(ड) मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर-ये छह विकार पाए जाते हैं, जो प्रकृति प्रदत्त हैं। इन न लगाने का दुष्परिणाम यह होगा कि मनुष्य भी पशुओं जैसा आचरण करना शुरू कर देगा। के कार्य-व्यवहार में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।
(च) किसी देश की सभ्यता के मापदंड वहाँ विद्यमान रेलगाड़ियाँ, मोटर, वायुयान, लंबी-चौड़ी सड़कें, बड़े-बड़े मकान, अच्छा भोजन, अच्छी पोशाकें, स्वास्थ्य सुविधाएँ आदि हैं। इनसे उस देश के सभ्य होने का पता चलता है। जिस देश में ये सब जितना अधिक पाए जाते हैं, उस देश को उतना ही सभ्य कहते हैं।
(छ) यह संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। दो देशों तथा जातियों के लोगों के मिलन से दोनों की संस्कृतियाँ प्रभावित होती हैं। जो देश जो अधिकाधिक देशों की संस्कृतियों से लाभ उठाकर अपनी संस्कृति का विकास करते हैं, वे सांस्कृतिक रूप से उतने ही समृद्ध कहलाते हैं।
(ज)

  1. उपवाक्य-वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। भेद-संज्ञा उपवाक्य।
  2. शब्द उपसर्ग मूल शब्द
    उन्नति उत् नति
    संस्कृति सम् कृति

21. विधाता-रचित इस सृष्टि का सिरमौर है-मनुष्य, उसकी कारीगरी का सर्वोत्तम नमूना। मानव को ब्रहमांड का लघु रूप मानकर भारतीय दार्शनिकों ने ‘यत् पिंडे तत् ब्रहमडे’ की कल्पना की थी। उनकी यह कल्पना मात्र कल्पना नहीं थी, प्रत्युत यथार्थ में जो विचारना के रूप में घटित होता है, उसी का कृति रूप ही तो सृष्टि है। मन तो मन, मानव का शरीर भी अप्रतिम है। देखने में इससे भव्य, आकर्षक एवं लावण्यमय रूप सृष्टि में अन्यत्र कहाँ है? अद्भुत एवं अद्वतीय है-मानव-सौंदर्य। साहित्यकारों ने इसके रूप-सौंदर्य के वर्णन के लिए कितने ही अप्रस्तुतों का विधान किया है करने के लिए अनेक काव्य-सृष्टियाँ रच डाली हैं।

साहित्यशास्त्रियों ने भी इसी हुए अनेक रसों का निरूपण किया है। परंतु वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाए, तो मानव-शरीर को एक जटिल यंत्र से उपमित किया जा सकता है। जिस प्रकार यंत्र के एक पुर्जे में जाने यंत्र गड़बड़ा जाता है, बेकार हो जाता है, उसी प्रकार मानव-शरीर के विभिन्न अवयवों में से बिगड़ जाता है, तो उसका प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है। इतना ही नहीं, गुर्दे जैसे कोमल एवं नाजुक हिस्से के खराब हो जाने से यह गतिशील वपुर्यत्र एकाएक अवरुद्ध हो सकता है, व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है।

एक अंग के विकृत होने पर सारा शरीर दंडित हो, वह कालकवलित हो जाए-यह विचारणीय है। यदि किसी यंत्र के पुर्जे को बदलकर उसके स्थान पर नया पुर्जा लगाकर यंत्र को पूर्ववत सुचारु एवं व्यवस्थित रूप से क्रियाशील बनाया जा सकता है तो शरीर के विकृत अंग के स्थान पर नव्य निरामय अंग लगाकर शरीर को स्वस्थ एवं सामान्य क्यों नहीं बनाया जा सकता?

शल्य-चिकित्सकों ने इस दायित्वपूर्ण चुनौती को स्वीकार किया तथा निरंतर अध्यवसायपूर्ण साधना के अनंतर अंग-प्रत्यारोपण के क्षेत्र में सफलता प्राप्त की। अंग-प्रत्यारोपण का उद्देश्य यह है कि मनुष्य दीर्घायु प्राप्त कर सके। यहाँ यह ध्यातव्य है कि मानव-शरीर हर अंग को उसी प्रकार स्वीकार नहीं करता, जिस प्रकार हर किसी का रक्त उसे स्वीकार्य नहीं होता।

रोगी को रक्त देने से पूर्व रक्त-वर्ग का परीक्षण अत्यावश्यक है तो अंग-प्रत्यारोपण से पूर्व ऊतक-परीक्षण अनिवार्य है। आज का शल्य-चिकित्सक गुर्दे, यकृत, आँत, फेफड़े और हृदय का प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक कर रहा है। साधन-संपन्न चिकित्सालयों में मस्तिष्क के अतिरिक्त शरीर के प्राय: सभी अंगों का प्रत्यारोपण संभव हो गया है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) मानव को सृष्टि का लघु रूप क्यों कहा गया है?
(ग) मानव शरीर के प्रति लेखकों और कवियों का क्या दृष्टिकोण रहा है?
(घ) मानव शरीर को ‘मशीन’ की संज्ञा क्यों दी गई है?
(ड) शल्य चिकित्सकों ने किस चुनौती को स्वीकारा? इसे स्वीकारने का ध्येय स्पष्ट कीजिए।
(च) शरीर द्वारा अन्य किसी का अंग स्वीकारने के संबंध में रक्त और अंग में समानता स्पष्ट कीजिए।
(छ) ‘मानव को दीघार्यु बनाने में विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।’ गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. विलोम बताइए—यथार्थ, मृत्यु।
  2. उपसर्ग बताइए—अवरुद्ध, संपन्न। उत्तर

उत्तर –

(क) शीर्षक-मानव अंग प्रत्यारोपण।
(ख) मानव को सृष्टि का लघु रूप इसलिए कहा गया है, क्योंकि भारतीय दार्शनिकों ने मानव को ब्रहमांड का लघु रूप मानकर ‘यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे’ की कल्पना की थी। उनकी कल्पना में यथार्थ भी था, क्योंकि मानव-मन में जो विचारना के रूप में घटित होता था, वही सृष्टि में घटित होता था।
(ग) लेखकों ने मानव-शरीर को अप्रतिम माना है। वे सृष्टि में इसकी भव्यता, आकर्षण और लावण्यमयता अतुलनीय मानते हैं। उन्हें इसका शरीर अद्भुत एवं अद्वतीय लगता है। कवियों ने मानव-शरीर की सौंदर्य-राशि को लेकर अनेक रचनाएँ की हैं। उन्हें भी इसका सौंदर्य मनभावन लगता था।
(घ) वैज्ञानिकों द्वारा मानव-शरीर को एक जटिल यंत्र की संज्ञा इसलिए दी गई है, क्योंकि जिस प्रकार मशीन के किसी एक पुर्जे में गड़बड़ी आ जाने पर सारा यंत्र बेकार हो जाता है, उसी प्रकार मानव-शरीर के एक अंग में दोष आ जाने पर उसका प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है।
(ड) किसी एक अंग के खराब होने मात्र से व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है। मशीन के खराब पुर्जे को बदलकर जिस तरह काम के योग्य बना लिया जाता है, उसी प्रकार शरीर के खराब अंग को बदलने की चुनौती को शल्य-चिकित्सकों ने स्वीकारा। शल्य-चिकित्सा संबंधी इस चुनौती को स्वीकारने का उद्देश्य था-मानव को स्वस्थ शरीर और चिरायु प्रदान करना।
(च) शरीर द्वारा अन्य किसी का अंग स्वीकारने के संबंध में रक्त और अंग के संबंध में यह समानता है कि जिस प्रकार शरीर हर तरह के रक्त को नहीं स्वीकारता, उसी प्रकार वह हर किसी के अंग को भी नहीं स्वीकारता। सिलहकू चबाने से पूर्वरक्ता-पक्षण किया जाता है. इस प्रकर अंगप्रत्यारोण से पूर्व तक पक्षण किया जाता है।
(छ) विज्ञान ने अंग-प्रत्यारोपण द्वारा मानव को दीर्घायु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अंगों के प्रत्यारोपण से उसके शरीर के विभिन्न अंग-गुर्दा, यकृत, आँत, फेफड़े, हृदय आदि-पुन: लगाए जा सकते हैं। विभिन्न परीक्षणों के बाद लगाए गए इन अंगों को शरीर स्वीकार करके मनुष्य को दीर्घायु बनाता है।
(ज)

  1. शब्द विलोम
    यथार्थ काल्पनिक
    मृत्यु जन्म
  2. अव, सम्।

22. हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जनसंख्या-वृद्ध रोकना है। इस क्षेत्र में हमारे सभी प्रयत्न निष्फल रहे हैं। ऐसा क्यों है? यह इसलिए भी हो सकता है कि समस्या को देखने का हर एक का एक अलग नजरिया है। जनसंख्याशास्त्रियों के लिए यह आँकड़ों का अंबार है। अफ़सरशाही के लिए यह टागेंट तय करने की कवायद है। राजनीतिज्ञ इसे वोट बैंक की दृष्टि से देखता है। ये सब अपने-अपने ढंग से समस्या को सुलझाने में लगे हैं।

अत: अलग-अलग किसी के हाथ सफलता नहीं लगी। पर यह स्पष्ट है कि परिवार के आकार पर आर्थिक विकास और शिक्षा का बहुत प्रभाव का मतलब पाश्चात्य मतानुसार भौतिकवाद नहीं, जहाँ बच्चों को बोझ माना जाता है। हमारे यह सम्मानपूर्वक जीने के स्तर से संबंधित है। यह मौजूदा संपत्ति के समतामूलक विवरण पर ही निर्भर नहीं है, वरन ऐसी शैली अपनाने से संबंधित है, जिसमें अस्सी करोड़ लोगों की ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल हो सके। इसी प्रकार स्त्री-शिक्षा भी है।

यह समाज में एक नए प्रकार का चिंतन पैदा करेगी, जिससे सामाजिक और आर्थिक विकास के नए आयाम खुलेंगे और साथ ही बच्चों के विकास का नया रास्ता भी खुलेगा। अत: जनसंख्या की समस्या सामाजिक है। यह अकेले सरकार नहीं सुलझा सकती। केंद्रीयकरण से हटकर इसे ग्राम-ग्राम, व्यक्ति-व्यक्ति तक पहुँचाना होगा। जब तक यह जन-आंदोलन नहीं बन जाता, तब तक सफलता मिलना संदिग्ध है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता क्या है? इसमें सफलता क्यों नहीं मिल रही है?
(ग) जनसंख्या के प्रति अधिकारियों और नेताओं के दृष्टिकोण किस तरह भिन्न हैं?
(घ) परिवार के आकार को कौन-कौन प्रभावित करते हैं, और कैसे?
(ड) जनसंख्या की समस्या को ‘सामाजिक समस्या’ क्यों कहा गया है?
(च) जनसंख्या नियंत्रण के ठोस उपाय क्या हो सकते हैं? सुझाइए।
(छ) आर्थिक विकास के प्रति भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण में क्या अंतर है?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. ‘सर्वोच्च’ और ‘निष्फल’ में संधि-विच्छेद कीजिए।
  2. ‘स्त्री-शिक्षा’, ‘ग्राम-ग्राम’ शब्दों का विग्रह करके समास का नाम लिखिए।

उत्तर –

(क) शीर्षक-जनसंख्या पर नियंत्रण।
(ख) हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता जनसंख्या-वृद्ध को रोकना है। इस क्षेत्र में सफलता न मिलने का कारण है-जनसंख्यावृद्ध की समस्या को देखने का दृष्टिकोण एक-सा न होना। इससे इसका प्रभावी हल नहीं निकल पा रहा है।
(ग) जनसंख्या के प्रति अधिकारीगण यह दृष्टिकोण रखते हैं कि जनसंख्या उनके लिए एक नियमावली है, जो उन्हें तरह-तरह के आँकड़े बनाने में मदद करती है। इसके विपरीत, नेतागण इसे अपना वोट बैंक समझकर इसका बँटवारा जाति-धर्म के आधार पर करके अगला चुनाव जीतने का साधन समझते हैं।
(घ) परिवार के आकार को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं-आर्थिक विकास और शिक्षा। हमारे देश में लोग चाहते हैं कि हमारे परिवार का ऐसा आकार हो कि वे खुशहाल जिंदगी जी सकें। इसके अलावा शिक्षा भी परिवार का अकल क्ले में माहवर्ण भूमाक निभाती है। प्रय देता गया है कि क्ति लोगों के पिरवार का आक्र छोटा होता हैं।
(ड) जनसंख्या की समस्या को ‘सामाजिक समस्या’ इसलिए कहा गया है, क्योंकि इसका जुड़ाव सीधे-सीधे जनता और समाज से है। इस समस्या को बढ़ाने में किसी एक व्यक्ति या सरकार का योगदान नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। इसी प्रकार इस समस्या का दुष्प्रभाव सरकार और समाज दोनों पर पड़ रहा है। इसका हल भी सरकार के साथ-साथ हर व्यक्ति के सहयोग से ही खोजा जा सकता है।
(च) जनसंख्या नियंत्रण के लिए स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। लोगों को अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए। सरकार को ठोस कदम उठाना चाहिए। इसके अलावा गाँव-गाँव, प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचकर उनमें जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिए। इसके लिए सरकार के साथ-साथ लोगों को मिल-जुलकर प्रयास करना चाहिए।
(छ) पाश्चात्य दृष्टिकोण में आर्थिक विकास का अर्थ भौतिकवाद है, जहाँ बच्चों को बोझ माना जाता है, जबकि भारतीय दृष्टिकोण में बच्चों को कभी बोझ नहीं माना जाता। भारत में यह सम्मानपूर्वक जीने के स्तर से संबंधित माना जाता है।
(ज)

  1. शब्द संधि-विच्छेद
    सर्वोच्चा सर्व + उच्च
    निष्फल नि: + फल
  2. शब्द विग्रह समास का नाम
    स्त्री-शिक्षा स्त्रियों के लिए शिक्षा संप्रदान तत्पुरुष
    ग्राम-ग्राम प्रत्येक गाँव तक अव्ययीभाव समास

23. प्रकृति वैज्ञानिक और कवि दोनों की ही उपास्या है। दोनों ही उससे निकटतम संबंध स्थापित करने की चेष्टा करते हैं, किंतु दोनों के दृष्टिकोण में अंतर है। वैज्ञानिक प्रकृति के बाहय रूप का अवलोकन करता है और सत्य की खोज करता है, परंतु कवि बाहय रूप पर मुग्ध होकर भावों का तादात्म्य स्थापित करता है। वैज्ञानिक प्रकृति की जिस वस्तु का अवलोकन करता है, उसका सूक्ष्म निरीक्षण भी करता है।

चंद्र को देखकर उसके मस्तिष्क में अनेक विचार उठते हैं। इसका तापक्रम क्या है, कितने वर्षों में यह पूर्णत: शीतल हो जाएगा। ज्वार-भाटे पर इसका क्या प्रभाव होता है, किस प्रकार और किस गति से यह सौर-मंडल में परिक्रमा करता है और किन तत्वों से इसका निर्माण हुआ है।

वह अपने सूक्ष्म निरीक्षण और अनवरत चिंतन से इसको एक लोक ठहराता है और उस लोक में स्थित ज्वालामुखी पर्वतों तथा जीवनधारियों की खोज करता है। इसी प्रकार वह एक प्रफुल्लित पुष्प को देखकर उसके प्रत्येक अंग का विश्लेषण करने को तैयार हो जाता है। उसका प्रकृति-विषयक अध्ययन वस्तुगत होता है। उसकी दृष्टि में विश्लेषण और वर्गविभाजन की प्रधानता रहती है।

वह सत्य और वास्तविकता का पुजारी होता है। कवि की कविता भी प्रत्यक्षावलोकन से प्रस्फुटित होती है। वह प्रकृति के साथ अपने भावों का संबंध स्थापित करता है। वह उसमें मानव-चेतना का अनुभव करके उसके साथ अपनी आतरिक भावनाओं का समन्वय करता है। वह तथ्य और भावना के संबंध पर बल देता है। वह नग्न सत्य का उपासक नहीं होता। उसका वस्तु-वर्णन हृदय की प्रेरणा का परिणाम होता है, वैज्ञानिक की भाँति मस्तिष्क की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) प्रकृति के उपासक किन्हें कहा गया है? वे यह उपासना किस रूप में करते हैं?
(ग) प्रकृति के प्रति कवि तथा वैज्ञानिक के दृष्टिकोणों में क्या भिन्नता है?
(घ) वैज्ञानिक द्वारा पुष्प को देखने से उसके स्वभाव की किस विशेषता का ज्ञान होता है?
(ड) चाँद के अवलोकन संबंधी कवि एवं वैज्ञानिक के दृष्टिकोण स्पष्ट कीजिए।
(च) कवि जब प्रकृति का प्रत्यक्षावलोकन करता है, तब कविता प्रकट होती है।-स्पष्ट कीजिए।
(छ) गद्यांश के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण की चार विशेषताएँ लिखिए।
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. उपसर्ग और मूल शब्द बताइए-प्रस्फुटित, संबंध।
  2. “कवि प्रकृति के बाहय रूप पर मुग्ध होकर भावों का तादाम्य स्थापित करता है।”-मिश्र वाक्य में बदलिए।

उत्तर –

(क) शीर्षक-प्रकृति, कवि और वैज्ञानिक। अथवा, कवि और वैज्ञानिक दृष्टि में प्रकृति।
(ख) प्रकृति के उपासक वैज्ञानिक और कवि को कहा गया है। ये दोनों ही यह उपासना करने के क्रम में प्रकृति के करीब जाते हैं और उससे निकटतम संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
(ग) प्रकृति के प्रति कवि और वैज्ञानिक के दृष्टिकोणों में यह अंतर है कि वैज्ञानिक प्रकृति के बाहय रूप का सूक्ष्म हुआ सत्य की खोज करता है। इसके विपरीत, कवि प्रकृति के बाहय रूप को देखकर खुश होता है और प्रकृति के साथ अपने मनोभावों का तादात्म्य स्थापित करता है।
(घ) वैज्ञानिक जब किसी खिले फूल को देखता है, तो उसके प्रत्येक अंग का विश्लेषण करता है। उसका प्रकृति विषयक अध्ययन वस्तुगत होता है। वह सूक्ष्म दृष्टि से उसका निरीक्षण करता है। इससे पता चलता है कि वह सत्य और वास्तविकता का पुजारी होता है।
(ड) कवि एवं वैज्ञानिक दोनों ही चाँद को देखते हैं, पर उनके दृष्टिकोणों में अंतर होता है। कवि चाँद के बाहय रूप पर मुग्ध होकर भावों का तादात्म्य स्थापित करता है जबकि वैज्ञानिक चाँद का सूक्ष्म निरीक्षण कस्ते हुए उसके तापमान , ज्वार-भाटे पर प्रभाव, उसकी गति, सौरमंडल की परिक्रमा तथा उसके तत्त्वों को खोजता फिरता है।
(च) कवि जब प्रकृति का प्रत्यक्षावलोकन करता है तो वह उसके साथ भावों का तादात्म्य स्थापित करता है। उसे प्रकृति में मानव-चेतना की अनुभूति होती है और वह उसके साथ अपने भावों को संबद्ध करता है। इस प्रकार से तथ्य और भावों पर बल देने से कविता प्रकट होती है।
(छ) गद्यांश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की निम्नलिखित विशेषताओं का ज्ञान होता है

  1. वैज्ञानिक तथ्यों पर बल देता है, भावना पर नहीं।
  2. वैज्ञानिक सत्य का अन्वेषक होता है।
  3. वैज्ञानिक द्वारा किया गया वस्तु का वर्णन मस्तिष्क की उपज होती है, हृदय की नहीं।
  4. वैज्ञानिक किसी वस्तु का अत्यंत सूक्ष्म निरीक्षण करता है।

(ज)

  1. शब्द उपसर्ग मूल शब्द
    प्रस्फुटित प्र स्फुटित
    संबंध सम् बंध
  2. जब कवि प्रकृति के बाहय रूप पर मुग्ध होता है तब वह भावों का तादाम्य स्थापित करता है।

24. मृत्युजय और संघमित्र की मित्रता पाटलिपुत्र के जन-जन की जानी बात थी। मृत्युंजय जन-जन द्वारा ‘धन्वंतरि’ की उपाधि से विभूषित वैद्य थे और संघमित्र समस्त उपाधियों से विमुक्त ‘भिक्षु’। मृत्युजय चरक और सुश्रुत को समर्पित थे तो संघमित्र बुद्ध के संघ और धर्म को।

प्रथम का जीवन की संपन्नता और दीर्घायुष्य में विश्वास था तो द्रवितीय का जीवन के निराकरण और निर्वाण में। दोनों ही दो विपरीत तटों के समान थे, फिर भी उनके मध्य बहने वाली स्नेह-सरिता उन्हें अभिन्न बनाए रखती थी। यह आश्चर्य है, जीवन के उपासक वैद्यराज को उस निर्माण के लोभी के बिना चैन ही नहीं था, पर यह परम आश्चर्य था कि समस्त रोगों को मलों की तरह त्यागने में विश्वास रखने वाला भिक्षु भी वैद्यराज के मोह में फेंस अपने निर्वाण को कठिन-से-कठिनतर बना रहा था।

वैद्यराज अपनी वार्ता में संघमित्र से कहते-निर्वाण (मोक्ष) का अर्थ है आत्मा की मृत्यु पर विजय। संघमित्र हँसकर कहते-देह द्वारा मृत्यु पर विजय मोक्ष नहीं है। देह तो अपने-आप में व्याधि है। तुम देह की व्याधियों को दूर करके कष्टों से छुटकारा नहीं दिलाते, बल्कि कष्टों के लिए अधिक सुयोग जुटाते हो। देह व्याधि से मुक्ति तो भगवान की शरण में है।

वैद्यराज ने कहा-मैं तो देह को भगवान के समीप जीते जी बने रहने का माध्यम मानता हूँ। पर दृष्टियों का यह विरोध उनकी मित्रता के मार्ग में कभी बाधक नहीं हुआ। दोनों अपने कोमल हास और मोहक स्वर से अपने-अपने विचारों को प्रस्तुत करते रहते।

प्रश्न –

(क) मृत्युजय कौन थे? उनकी विचारधारा क्या थी?
(ख) जीवन के प्रति संघमित्र की दृष्टि को समझाइए।
(ग) लक्ष्य-भिन्नता होते हुए भी दोनों की गहन निकटता का क्या कारण था?
(घ) दोनों को ‘दो विपरीत तट’ क्यों कहा गया है?
(ड) देह के विषय में संघमित्र ने किस बात पर बल दिया है?
(च) देह-व्याधि के निराकरण के बारे में संघमित्र की अवधारणा के विषय में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
(छ) विचारों की भिन्नता/विपरीतता के होते हुए भी दोनों के संबंधों की मोहकता और मधुरता क्या संदेश देती है?
(ज) गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक सुझाइए।
(झ) उपसर्ग, मूल शब्द और प्रत्यय अलग कीजिए
समर्पित अथवा विभूषित
(ञ) रचना की दृष्टि से वाक्य का प्रकार बताइए—
‘प्रथम का जीवन की संपन्नता और दीर्घायुष्य में विश्वास था तो द्रवितीय का जीवन के निराकरण और निर्वाण में।”

उत्तर –

(क) मृत्युजय लोगों के बीच ‘धनवंतरि’ वैद्य के नाम से लोकप्रिय थे। उनकी विचारधारा यह थी कि लोगों का जीवन सुखी एवं संपन्न हो। “वे नीरोगी तथा दीर्घायु होकर स्वस्थ जीवन का लाभ उठाएँ।
(ख) संघमित्र बौद्ध धर्म के प्रचारक भिक्षु थे। उनकी विचारधारा पर महात्मा बुद्ध का प्रभाव था। वे जीवन के निराकरण और निर्वाण में विश्वास रखते हैं। वे बुराइयों से दूर रहकर सादगी से जीवन जीते हुए निर्वाण प्राप्त करने की जीवन का लक्ष्य मानते थे।
(ग) लक्ष्य भिन्नता होते हुए भी दोनों की गहन निकटता का कारण था-मनुष्यमात्र के कल्याण की उच्च एवं पवित्र भावना।
(घ) दोनों को ‘दो विपरीत तट’ इसलिए कहा गया है क्योंकि मृत्युंजय जीवन को नीरोग बनाकर आनंदपूर्वक जीने और दीर्घायु रहकर भोग-उपभोग का आनंद उठाने को महत्व देते थे जबकि संघमित्र सादगीपूर्वक जीने तथा निर्वाण प्राप्त करने को महत्व देते थे। इस प्रकार दोनों के सिद्धांत एकदम विपरीत थे।
(ड) देह (शरीर) के विषय में संघमित्र ने बल दिया है कि देहरूपी व्याधि से मुक्ति पाना है तो ईश्वर की शरण में जाना ही होगा।
(च) देह व्याधि के निराकरण के बारे संघमित्र की अवधारणा थी कि बिना ईश्वर की शरण में गए इससे मुक्ति नहीं पाई जा सकती। ऐसा वे बौद्ध भिक्षु होने और बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण कहते थे। मेरा विचार ऐसा नहीं है। मैं देह को व्याधि नहीं मानता, बल्कि स्वस्थ रहकर अच्छे कर्म करने और प्रभु के निकट जाने का साधन मानता हूँ।
(छ) विचारों की भिन्नता या विपरीतता होते हुए भी दोनों के संबंधों की मोहकता और मधुरता यह संदेश देती है कि हमें स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त रहते हुए सादगीपूर्वक जीना चाहिए और मानवता के लिए कल्याणकारी कार्य करना चाहिए तथा अच्छे कर्मों के माध्यम से प्रभु की निकटता पाने का प्रयास करना चाहिए।
(ज) शीर्षक-जीवन के प्रति मृत्युंजय और संघमित्र के दृष्टिकोण।
(झ) शब्द उपसर्ग मूल शब्द प्रत्यय
समर्पित सम् अर्पण इत
विभूषित वि भूषण इत
(ञ) संयुक्त वाक्य।

25. बड़ी चीजें बड़े संकटों में विकास पाती हैं, बड़ी हस्तियाँ बड़ी मुसीबतों में पलकर दुनिया पर कब्जा करती हैं। अकबर ने तेरह साल की उम्र में अपने पिता के दुश्मन को परास्त कर दिया था जिसका एकमात्र कारण यह था कि अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था और वह भी उस समय, जब उसके पिता के पास एक कस्तूरी को छोड़कर और कोई दौलत नहीं थी।

महाभारत में देश के प्राय: अधिकांश वीर कौरवों के पक्ष में थे। मगर फिर भी जीत पांडवों की हुई, क्योंकि उन्होंने लाक्षागृह की मुसीबत झेली थी, क्योंकि उन्होंने वनवास के जोखिम को पार किया था। विंस्टन चर्चिल ने कहा है कि जिंदगी की सबसे बड़ी सिफ्त हिम्मत है। आदमी के और सारे गुण उसके हिम्मती होने से ही पैदा होते हैं।

जिंदगी की दो ही सूरतें हैं। एक तो यह कि आदमी बड़े-से-बड़े मकसद के लिए कोशिश कुरे, जगमगाती हुई जीत पर पंजा डालने के लिए हाथ बढ़ाए और अगर असफलताएँ कदम-कदम पर जोश की रोशनी के साथ अँधियाली का जाल बुन रहीं हो, तब भी वह पीछे को गाँव न हटाए। दूसरी सूरत यह है कि उन गरीब आत्माओं का हमजोली बन जाए जो न तो बहुत अधिक सुख पाती हैं और न जिन्हें बहुत अधिक दुख पाने का ही संयोग है, क्योंकि वे आत्माएँ ऐसी गोधूलि में बसती है जहाँ न तो जीत हँसती है और न कमी हार के रोने की आवाज सुनाई देती डै।

इस गोधूलि वाली दुनिया के लोग बँधे हुए घाट का पानी पीते है, वे जिंदगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते। और कौन कहता है कि पूरी जिन्दगी को दाँव पर लगा देने में कोई आनंद नहीं है? अगर रास्ता आगे की निकल रहा डो तो फिर असली मजा तो पाँव बढाते जाने में ही है।

साहस की जिंदगी सबसे बड़ी जिंदगी होती है। ऐसी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह बिलकुल निडर, बिलकुल बेखौफ़ होती है। साहसी मनुष्य की पहली पहचान यह है कि वह इस बात की चिंता नहीं करता कि तमाशा देखने वाले लोग उसके बारे में क्या सोच रहे हैं। जनमत की उपेक्षा करके जीने वाला आदमी दुनिया की असली ताकत होता है और मनुष्यता को प्रकाश भी उसी आदमी से मिलता है।

अड़ोस-पड़ोस को देखकर चलना, यह साधारण जीव का काम है। क्रांति करने वाले लोग अपने उद्देश्य की तुलना न तो पड़ोसी के उद्देश्य से करते हैं और न ही अपनी चाल को ही पड़ोसी की चाल देखकर मद्धम बनाते हैं।

प्रश्न –

(क) गद्यांश में अकबर का उदाहरण क्यों दिया गया है?
(ख) पांडवों की विजय का क्या कारण था?
(ग) आशय स्पष्ट कीजिए “जहाँ न तो जीत हँसती है और न कभी हार के रोने की आवाज सुनाई देती है।”
(घ) साहस की जिंदगी को सबसे बड़ी ज़िंदगी क्यों कहा गया है?
(ड) दुनिया की असली ताकत किसे कहा गया है और क्यों?
(च) क्रांतिकारियों के क्या लक्षण हैं?
(छ) ज़िंदगी की कौन-सी सूरत आपको अच्छी लगती है और क्यों?
(ज) गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(झ) ‘निडर” और ‘बेखौफ़’ में प्रयुक्त उपसर्ग बताइए।
(ञ) मिश्र वाक्य में बदलिए-‘साहस की जिंदगी सबसे बड़ी जिंदगी होती है।”

उत्तर –

(क) गद्यांश में अकबर का उदाहरण विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेने और उन पर विजय पाने के लिए दिया गया है। अकबर का जन्म रेगिस्तान में हुआ था जहाँ सुख-सुविधा के साधन न थे, फिर भी वह मात्र तेरह वर्ष की अल्पायु में अपने पिता के दुश्मन को हराने में सफल रहा था। वह संकटों में पल-बढ़कर बड़ा हुआ था।
(ख) पांडवों की विजय इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने वनवास की कठिनाइयों को सफलतापूर्वक सहन किया था और लाक्षागृह की जानलेवा मुसीबत को जीतने में सफल रहे थे।
(ग) “जहाँ न तो जीत हँसती है और न कभी हार के रोने की आवाज सुनाई देती है”-का आशय यह है कि बहुत से लोग बँधे-बँधाए रास्ते पर जिंदगी जीते हैं। वे जिस हाल में होते हैं उसी हाल में खुशी महसूस करते हैं। वे इस अनेक खरा नाहीं उताते। इन लोगों को उपाधियों न तो खुश कर पाती हैं और न असाफलता दुखी करती है।
(घ) साहस की जिंदगी को सबसे बड़ी जिंदगी इसलिए कहा गया है क्योंकि ऐसी जिंदगी जीवन-पर्थ पर चलते हुए जोखिम उठाने का साहस करती है। साहस से भरी जिंदगी निडर होती है। इसी निडरता के कारण वह आगे ही आगे बढ़ती जाती है, चाहे उसके साथ चलने वाला कोई हो या न हो।
(ड) दुनिया की असली ताकत उस मनुष्य को कहा गया है जो जीवन-पथ पर आगे बढ़ते हुए जनमत की उपेक्षा करके अपना अलग लक्ष्य बनाता है। वह दूसरों की परवाह नहीं करता कि लोग उसकी आलोचना करेंगे या शु,ऐसे लोग मानता के कल्याण के लिए कुछ नया करजते हैं और वे इसों के लिए मार्गर्शक बना जाते हैं।
(च) क्रांतिकारी लोग अपने उद्देश्य की तुलना दूसरों से नहीं करते और दूसरों का साथ पाने की प्रतीक्षा किए बिना मार्ग पर बढ़ जाते हैं।
(छ) मुझे जिंदगी की पहली सूरत पसंद है जिसमें आदमी बड़े-से-बड़े उद्देश्य को पाने के लिए कोशिश करता रहता है। उस उद्देश्य को पाने के लिए निरंतर प्रयास करता रहता है और मार्ग में आने वाली कठिनाइयों पर विजय पाते हुए लक्ष्य की प्राप्ति करता है। ऐसा करते हुए भी यदि सफलता हाथ नहीं लगती तो वह असफलता से घबराकर अपने कदम वापस नहीं खींचता।
(ज) शीर्षक-साहस की जिंदगी।
(झ) निडर – नि (उपसर्ग)
बेखौफ़ – बे (उपसर्ग)
(ञ) साहस की जो जिंदगी होती है वही सबसे बड़ी जिंदगी होती है।

26. विषमता शोषण की जननी है। समाज में जितनी विषमता होगी, सामान्यतया शोषण उतना ही अधिक होगा। चूँकि हमारे देश में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक असमानताएँ अधिक हैं जिनकी वजह से एक व्यक्ति एक स्थान पर शोषक तथा वही दूसरे स्थान पर शोषित होता है। चूँकि जब बात उपभोक्ता संरक्षण की हो तब पहला प्रश्न यह उठता है कि उपभोक्ता किसे कहते हैं? या उपभोक्ता की परिभाषा क्या है?

सामान्यत: उस व्यक्ति या व्यक्ति-समूह को ‘उपभोक्ता’ कहा जाता है जो सीधे तौर पर किन्हीं भी वस्तुओं अथवा सेवाओं का उपयोग करते हैं। इस प्रकार सभी व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में शोषण का शिकार अवश्य होते हैं।

हमारे देश में ऐसे अशिक्षित, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से दुर्बल, अशक्त लोगों की भीड़ है जो शहर की मलिन बस्तियों में, फुटपाथ पर, सड़क तथा रेलवे लाइन के किनारे, गंदे नालों के किनारे झोंपड़ी डालकर अथवा किसी भी अन्य तरह से अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। वे दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश की समाजोपयोगी ऊध्र्वमुखी योजनाओं से वंचित हैं, जिन्हें आधुनिक सफ़ेदपोशों, व्यापारियों, नौकरशाहों एवं तथाकथित बुद्धजीवी वर्ग ने मिलकर बाँट लिया है। सही मायने में शोषण इन्हीं की देन है।

‘उपभोक्ता’ शोषण का तात्पर्य केवल उत्पादकता व व्यापारियों द्वारा किए गए शोषण से ही लिया जाता है जबकि इसके क्षेत्र में वस्तुएँ एवं सेवाएँ दोनों ही सम्मिलित हैं, जिनके अंतर्गत डॉक्टर, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी, वकील सभी आई सबानेशषणके क्षेत्रमेंजकर्तमान बनाए वे वास्ता में निजबुकऑफ़ वर्ल्ड किईसा मेंदर्डक ने लायक ह।

प्रश्न –

(क) गद्यांश का समुचित शीर्षक लिखिए।
(ख) ‘विषमता’ शब्द से मूल शब्द तथा प्रत्यय छाँटकर लिखिए।
(ग) “ऊध्र्वमुखी योजनाओं से वंचित है”-वाक्य का आशय समझाइए।
(घ) ‘विषमता शोषण की जननी है”-कैसे? स्पष्ट कीजिए।
(ड) ‘समाज में जितनी विषमता होगी, सामान्यत: शोषण उतना ही अधिक होगा।” वाक्य-भेद लिखिए।
(च) ‘उपभोक्ता शोषण’ से क्या आशय है? इसकी सीमाएँ कहाँ तक हैं?
(छ) देश की समाजोपयोगी योजनाओं से कौन-सा वर्ग वंचित रह जाता है और क्यों?
(ज) ‘उपभोक्ता’ किसे कहते हैं? उपभोक्ता शोषण का मुख्य कारण क्या है?
(झ) सामान्यत: शोषण का दोषी किसे कहा जाता है और क्यों?

उत्तर –

(क) शीर्षक-उपभोक्ता शोषण।
(ख) उपसर्ग – वि मूल शब्द – सम प्रत्यय – ता।
(ग) ‘ऊध्र्वमुखी योजनाओं से वंचित हैं”-वाक्य का आशय यह है कि समाज के एक वर्ग, जो अशिक्षित, सामाजिकआर्थिक रूप से कमजोर है तथा गंदे स्थानों पर रहता है, को उठाने के लिए योजनाएँ बनाई जाती हैं पर उसे उन योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता।
(घ) हमारे समाज में जहाँ अत्यंत गरीब, अनपढ़, लाचार और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़े लोग हैं, वहीं अत्यंत धनी, पढ़े-लिखे, शक्ति एवं साधन-संपन्न लोग भी हैं। इस प्रकार समाज में विषमता का बोलबाला है। यही ध औ साधना से सापना लोगोंकोंगोवाक अतिफ़याउलो हैं इसप्रका वपाता। शणक जननी है।
(ड) मिश्र वाक्य।
(च) ‘उपभोक्ता शोषण’ से तात्पर्य है-उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों से वंचित करना। इसकी सीमाएँ वस्तुओं के उत्पादन, उन तक पहुँचने और व्यापारियों द्वारा कम वस्तुएँ देने से लेकर डॉक्टर, इंजीनियर सफ़ेदपोश, नौकरशाह और बुद्धजीवियों की सोच तक हैं।
(छ) देश की समाजोपयोगी योजनाओं से गरीब, लाचार, अशिक्षित और कमजोर अर्थात वह वर्ग वंचित रह जाता है, जिसकी जरूरत उसे सर्वाधिक है। यह वर्ग इन योजनाओं से इसलिए वंचित रह जाता है क्योंकि हमारे समाज के कि सफ़ेदोश व्यापारी नकशह तथा तथाकथिता बुद्धजी वर्ग मल्कर आपास में बंरक्ट क लेते हैं।
(ज) ‘उपभोक्ता’ वह व्यक्ति होता है जो वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग करता है। उपभोक्ताओं के शोषण का कारण है-उनका जागरूक न होना तथा सफ़ेदपोश, व्यापारी, नौकरशाह और तथाकथित बुद्धजीवी वर्ग की नीयत में खोट होना, जिससे वे सारी योजनाओं को अपनी समझकर उनका अनुचित लाभ उठाते हैं।
(झ) सामान्यत: शोषण का दोषी उन लोगों को कहा जाता है, जिनके हाथों प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ताओं को सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। इस वर्ग में व्यापारी और उत्पादक आते हैं। यह वर्ग कभी कम मात्रा में वस्तुएँ देकर, कभी वस्तुओं का दाम अधिक वसूल करके शोषण करता है। इसके अलावा, उत्पादक जब उपभोक्ता वर्ग के श्रम से वस्तुएँ उत्पादित करता है तब उन्हें बहुत कम मजदूरी देकर प्रत्यक्ष रूप से शोषण करता है।

27. जो अनगढ़ है, जिसमें कोई आकृति नहीं, ऐसे पत्थरों से जीवन को आकृति प्रदान करना, उसमें कलात्मक संवेदना जगाना और प्राण-प्रतिष्ठा करना ही संस्कृति है। वस्तुत: संस्कृति उन गुणों का समुदाय है, जिन्हें अनेक प्रकार की शिक्षा द्वारा अपने प्रयत्न से मनुष्य प्राप्त करता है। संस्कृति का संबंध मुख्यत: मनुष्य की बुद्ध एवं स्वभाव आदि मनोवृत्तियों से है।

संक्षेप में, सांस्कृतिक विशेषताएँ मनुष्य की मनोवृत्तियों से संबंधित हैं और इन विशेषताओं का अनिवार्य संबंध जीवन के मूल्यों से होता है। ये विशेषताएँ या तो स्वयं में मूल्यवान होती हैं अथवा मूल्यों के उत्पादन का साधन। प्राय: व्यक्तित्व में विशेषताएँ साध्य एवं साधन दोनों ही रूपों में अर्थपूर्ण समझी जाती हैं। वस्तुत: संस्कृति सामूहिक उल्लास की कलात्मक अभिव्यक्ति है। संस्कृति व्यक्ति की नहीं, समष्टि की अभिव्यक्ति है।

डॉ० संपूर्णानंद ने कहा है-“संस्कृति उस दृष्टिकोण को कहते हैं, जिसमें कोई समुदाय विशेष जीवन की समस्याओं पर दृष्टि निक्षेप करता है।” संक्षेप में वह समुदाय की चेतना बनकर प्रकाशमान होती है। यही चेतना प्राणों की प्रेरणा है और यही भावना प्रेम में प्रदीप्त हो उठती है। यह प्रेम संस्कृति का तेजस तत्व है, जो चारों ओर परिलक्षित होता है। प्रेम वह तत्व है, जो संस्कृति के केंद्र में स्थित है। इसी प्रेम से श्रद्धा उत्पन्न होती है, समर्पण जन्म लेता है और जीवन भी सार्थक लगता है।

प्रश्न –

(क) संस्कृति एक निष्प्राण पत्थर को किस प्रकार जीवंत बना सकती है?
(ख) संस्कृति का संबंध मनुष्य की मनोवृत्तियों से क्यों है?
(ग) व्यक्तित्व की विशेषताएँ किस रूप में मूल्यवान समझी जाती हैं?
(घ) संस्कृति समष्टि की अभिव्यक्ति क्यों है?
(ड) डॉ० संपूर्णानंद ने संस्कृति को किस प्रकार का दृष्टिकोण कहा है?
(च) संस्कृति किस तरह प्रकाशमान होती है?
(छ) प्रेम को संस्कृति का तेजस तत्व क्यों कहा गया है?
(ज) प्रेम से समर्पण किस प्रकार जन्म लेता है?
(झ) इस गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए। :
(अ) सामुदायिक चेतना को संस्कृति का प्राण क्यों कहा गया है?

उत्तर –

(क) संस्कृति एक निष्प्राण पत्थर को निम्नलिखित उपायों द्वारा जीवंत बना सकती है

  1. कलात्मक आकार प्रदान करके।
  2. उसमें संवेदना जगाकर। “

(ख) संक्कर्ष मानुयक मोतियों से इसिलए है क्योंकि मानुयक मोतियों शिवा गुण औरप्रयों से निर्मित होती हैं।
(ग) व्यक्तित्व की विशेषताएँ दो रूपों में मूल्यवान समझी जाती हैं

  1. साध्य रूप में
  2. साधन रूप में।

(घ) संस्कृति समष्टि की अभिव्यक्ति इसलिए है, क्योंकि यह सामूहिक उल्लास है।
(ड) डॉ० संपूर्णानंद ने संस्कृति को उस तरह का दृष्टिकोण कहा है, जिसमें कोई समुदाय जीवन की विशेष समस्याओं पर अपनी दृष्टि डालता है, उसे समझता है।
(च) संस्कृति किसी समुदाय की चेतना बन जाती है, इस प्रकार वह प्रकाशमान होती है।
(छ) प्रेम को संस्कृति का तेजस तत्व इसलिए कहा गया है, क्योंकि

  1. प्रेम के कारण ही आत्मा का विकास होता है।
  2. प्रेम के कारण ही जीवन सार्थक लगता है।

(ज) प्रेम चारों ओर फैलकर श्रद्धा एवं समर्पण को जन्म देता है।
(झ) शीर्षक-संस्कृति और समाज।
(ज) सामुदायिक चेतना को संस्कृति का प्राण इसलिए कहा गया है, क्योंकि चेतना प्रेरणा बनकर प्रेम में परिवर्तित हो जाती है और सामूहिकता उत्पन्न करती है।

28. राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत होती है जो हमें अपने पूर्वजों से परंपरा के रूप में प्राप्त होती है। जिसमें हम बड़े होते हैं, शिक्षा पाते हैं और साँस लेते हैं-हमारा अपना राष्ट्र कहलाता है और उसकी पराधीनता व्यक्ति की परतंत्रता की पहली सीढ़ी होती है। ऐसे ही स्वतंत्र राष्ट्र की सीमाओं में जन्म लेने वाले व्यक्ति का धर्म, जाति, भाषा या संप्रदाय कुछ भी हो, आपस में स्नेह होना स्वाभाविक है। राष्ट्र के लिए जीना और काम करना, उसकी स्वतंत्रता तथा विकास के लिए काम करने की भावना ‘राष्ट्रीयता’ कहलाती है।

जब व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से धर्म, जाति, कुल आदि के आधार पर व्यवहार करता है तो उसकी दृष्टि संकुचित हो जाती है। राष्ट्रीयता की अनिवार्य शर्त है-देश को प्राथमिकता, भले ही हमें ‘स्व’ को मिटाना पड़े। महात्मा गांधी, तिलक, सुभाषचंद्र बोस आदि के कार्यों से पता चलता है कि राष्ट्रीयता की भावना के कारण उन्हें अनगिनत कष्ट उठाने पड़े किंतु वे अपने निश्चय में अटल रहे। व्यक्ति को निजी अस्तित्व कायम रखने के लिए पारस्परिक सभी सीमाओं की बाधाओं को भुलाकर कार्य करना चाहिए तभी उसकी नीतियाँ-रीतियाँ राष्ट्रीय कही जा सकती हैं।

जब-जब भारत में फूट पड़ी, तब-तब विदेशियों ने शासन किया। चाहे जातिगत भेदभाव हो या भाषागत-तीसरा व्यक्ति उससे लाभ उठाने का अवश्य यत्न करेगा। आज देश में अनेक प्रकार के आदोलन चल रहे हैं। कहीं भाषा को लेकर संघर्ष हो रहा है तो कहीं धर्म या क्षेत्र के नाम पर लोगों को निकाला जा रहा है जिसका परिणाम हमारे सामने है। आदमी अपने अह में सिमटता जा रहा है। फलस्वरूप राष्ट्रीय बोध का अभाव परिलक्षित हो रहा है।

प्रश्न –

(क) गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(ख) ‘अस्तित्व’ एवं ‘अनिवार्य’ से प्रत्यय और उपसर्ग छाँटकर लिखिए।
(ग) “जब व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से धर्म, जाति, कुल आदि के आधार पर व्यवहार करता है तो उसकी दृष्टि संकुचित हो जाती है।” रचना के आधार पर वाक्य का प्रकार लिखिए।
(घ) ‘स्व’ से क्या तात्पर्य है? उसे मिटाना क्यों आवश्यक है?
(ड) आशय स्पष्ट कीजिए-“राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा ही नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत भी है।”
(च) ‘राष्ट्रीयता’ से लेखक का क्या आशय है? गद्यांश में चर्चित दो राष्ट्रभक्तों के नाम लिखिए।
(छ) राष्ट्रीय बोध का अभाव किन-किन रूपों में दिखाई देता है?
(ज) राष्ट्र के उत्थान में व्यक्ति का क्या स्थान है? उदाहरण सहित लिखिए।
(झ) व्यक्तिगत स्वार्थ एवं राष्ट्रीय भावना परस्पर विरोधी तत्व हैं। कैसे? तर्क सहित उत्तर लिखिए।

उत्तर –

(क) शीर्षक-राष्ट्रीयता की भावना।
(ख) अस्तित्व—त्व (प्रत्यय)
अनिवार्य-अ (उपसर्ग)
(ग) मिश्र वाक्य।
(घ) ‘स्व’ का अर्थ है-स्वार्थ की भावना अर्थात् अपना हित पूरा करने में लगा रहना, जिसके कारण व्यक्ति दूसरों के हित के बारे में नहीं सोच पाता। इसे मिटाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि इसके कारण हम अन्य व्यक्तियों, समाज तथा राष्ट्र के हित के लिए कुछ नहीं सोच पाते और संकुचित दृष्टिकोण बना लेते हैं।
(ड) आशय-हमारा राष्ट्र, हम जहाँ रहते हैं, केवल जमीन का टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि इससे हमारा पोषण होता है। यहाँ की परंपरा, रीति-रिवाज, मान्यताएँ सब हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। इन परंपराओं में हजारों वर्ष का अनुभव छिपा होता है। यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग भी होता है।
(च) ‘राष्ट्रीयता’ से लेखक का आशय है-जाति, धर्म, प्रांतीयता, भाषा आदि की सीमा संबंधी बाधाओं से ऊपर उठकर कार्य करना तथा राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देना। गद्यांश में आए दो चर्चित देशभक्त हैं-

  1. महात्मा गांधी,
  2. लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक।

(छ) राष्ट्रीय बोध का अभाव हमें अनेक रूपों में दिखाई देता है; जैसे

  1. किसी दूसरे व्यक्ति से उसके धर्म, जाति, कुल, भाषा के आधार पर व्यवहार करना।
  2. क्षेत्रीयता, सांप्रदायिकता जैसी कट्टरता रखना तथा अपने प्रांत, धर्म, संप्रदाय को सर्वोपरि समझते हुए दूसरे के प्रांत, धर्म, संप्रदाय को हीन समझना।

(ज) राष्ट्र के उत्थान में व्यक्ति का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है। व्यक्ति यदि अपने ‘स्व’ को मिटाकर देशहित को प्राथमिकता दे, दूसरे व्यक्ति के धर्म, भाषा, जाति, संप्रदाय का आदर करे और क्षेत्र के नाम पर मरने-मिटने की संकीर्ण भावना का त्याग कर दे तो राष्ट्र में सुख-शांति, भाई-चारा, सद्भाव बढ़ जाएगा और संघर्ष समाप्त होगा जिससे राष्ट्र उन्नति के पथ पर अग्रसर हो जाएगा।
(झ) व्यक्तिगत स्वार्थ के वशीभूत होकर व्यक्ति ‘स्व’ की भावना से काम करता है। उसे अपना प्रांत, अपनी भाषा, धर्म नीतियाँ आदि के सामने दूसरे का कुछ हीन नजर आने लगता है। उसका दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है। उसके विपरीति राष्ट्रीयता, राष्ट्र के सभी लोगों के धर्म, जाति, भाषा क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर कार्य करने का नाम है। इस प्रकार दोनों परस्पर विरोधी तत्व हैं।

स्वयं करें

निम्नलिखित गदयांशों को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

1. ‘अनुशासन’ का अर्थ है-अपने को कुछ नियमों से बाँध लेना और उन्हीं के अनुसार कार्य करना। कुछ व्यक्ति अनुशासन की व्याख्या ‘शासन का अनुगमन’ करने के अर्थ में करते हैं, परंतु यह अनुशासन का संकुचित अर्थ है। व्यापक रूप में अनुशासन सुव्यवस्थित ढंग से उन आधारभूत नियमों का पालन ही है, जिनके द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के मार्ग में बाधक बने बिना व्यक्ति अपना पूर्ण विकास कर सके।

अनुशासन में रहने का भी एक आनंद है, लेकिन आज व्यक्तियों में अनुशासनहीनता की भावना बढ़ रही है। समाचार-पत्रों में हमेशा यही पढ़ने को मिलता है कि आज अमुक नगर में दस दुकानें लूटी गई, बसों में आग लगा दी गई, दो गिरोहों में लाठियाँ चल गई आदि। ये बातें आए दिन पढ़ने को मिलती हैं। यदि किसी भी कर्मचारी को कोई गलत काम करने से रोका जाए, तो वह अपने साथियों से मिलकर काम बंद करा देगा। बहुत दिनों तक हड़तालें चलती रहेंगी। कारखानों और कार्यालयों में काम बंद हो जाएगा।

अनुशासन के अभाव में समाज में अराजकता और अशांति का साम्राज्य होता है। वन्य पशुओं में अनुशासन का कोई महत्व नहीं है, इसी कारण उनका जीवन अरक्षित, आतंकित एवं अव्यवस्थित रहता है। सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ-साथ जीवन में अनुशासन का महत्व भी बढ़ता गया। आज के वैज्ञानिक युग में तो अनुशासन के बिना मनुष्य का कार्य ही नहीं हो सकता। कुछ व्यक्ति सोचते हैं कि अब मानव सभ्य और शिक्षित हो गया है, उस पर किसी भी प्रकार के नियमों का बंधन नहीं होना चाहिए।

वह स्वतंत्र रूप से जो भी करे, उसे करने देना चाहिए। लेकिन यदि व्यक्ति को यह अधिकार दिया जाए तो चारों तरफ वन्य जीवन जैसी अव्यवस्था आ जाएगी। मानव, मानव ही है, देवता नहीं। उसमें सुप्रवृत्तियाँ और कुप्रवृत्तियाँ दोनों ही होती हैं। मानव सभ्य तभी तक रहता है, जब तक वह अपनी सुप्रवृत्तियों की आज्ञा के अनुसार कार्य करे। इसलिए मानव के पूर्ण विकास के लिए कुछ बंधनों और नियमों का होना आवश्यक है।

अनुशासनबद्धता मानव-जीवन के मार्ग में बाधक नहीं, अपितु उसको पूर्ण उन्नति तक पहुँचाने के लिए अनुकूल अवसर प्रदान करती है। अनुशासन के बिना तो मानव-जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

विद्यार्थी जीवन में तो अनुशासन का बहुत महत्व है। आज अनुशासनहीनता के कारण साल में छह महीने विश्वविद्यालयों में हड़तालें हो जाती हैं। तोड़-फोड़ करना तो विद्यार्थी का कर्तव्य बन गया है। छोटी-छोटी बातों में मारपीट हो जाती है।अत: हर मनुष्य का कर्तव्य है कि अनुशासन का उल्लंघन न करे। यह विचित्र होते हुए भी कितना सत्य है कि अनुशासन एक प्रकार का बंधन है, परंतु मनुष्य को स्वच्छद रूप से अपने अधिकारों का पूरा सदुपूयोग करने का अवसर भी प्रदान करता है। वह एक ओर बंधन है, तो दूसरी ओर मुक्ति भी।

प्रश्न –

(क) मानव-विकास के लिए अनुशासन क्यों आवश्यक है?
(ख) वन्य जीव असुरक्षित क्यों होते हैं? इसका क्या परिणाम होता है?
(ग) विद्यार्थी-जीवन में अनुशासन का महत्व क्यों है?
(घ) “अनुशासनहीनता देश की प्रगति में बाधक सिद्ध होती है।” स्पष्ट कीजिए।
(ड) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(च) “मानव, मानव ही है, देवता नहीं।” स्पष्ट कीजिए।
(छ) ‘अनुशासन एक ओर बंधन है, तो दूसरी ओर मुक्ति।।” स्पष्ट कीजिए।
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. “अनुशासन के अभाव में समाज में अराजकता और अशांति का साम्राज्य होता है।” मिश्र वाक्य में बदलिए।
  2. विलोम शब्द लिखिए-बंधन, शिक्षित। .

2. ‘हम कमजोर वर्गों का उत्थान करना चाहते हैं। इसके लिए हम कुछ विशेष योजनाएँ बनाएँ। उन योजनाओं के कार्यान्वयन से उनकी हालत सुधर जाएगी।’ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ‘करो पहिले, कहो पीछे’ वाले आहवान को ताक पर रखकर दिए जाने वाले ऐसे आश्वासन पिछले सात दशकों से हम हर सत्ताधारी पार्टी के कर्णधारों के मुँह से सुनते आ रहे हैं।

हर पार्टी ने अपने शासनकाल में कई प्रकार के बहुसूत्रीय कार्यक्रम भी बनाए, जिनके तहत करोड़ों रुपये का प्रावधान किया गया। सरकार स्वयं जानती है कि ऐसी रकम का बहुत थोड़ा अंश कमजोर वर्गों तक पहुँच पाता है। शेष रकम बीच में मध्यस्थ राजनेताओं, ठेकेदारों और हाकिमों की जेब में चली जाती है। जैसे जीर्ण पाइप लाइन से बहता पानी बीच-बीच में छेदों से होकर चू जाता है।

पूर्व प्रधानमंत्रियों और अन्य कर्णधारों के नामों पर चलाई गई इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के कार्यान्वयन के बाद भी हमारे समाज के कमजोर वगों के सदस्यों की निरंतर वृद्ध ही होती आ रही है, कमी नहीं। वे गरीबी की रेखा से नीचे धंसे जा रहे हैं, उभरते नहीं।

‘कमजोर’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, कम जोर। यानी जिस वर्ग के सदस्यों में जोर कम है, वह वर्ग कमजोर परिवार और समूह नए ढंग से विद्योपार्जन से विमुख रहे हैं या विद्या से वंचित रह गए हैं, वे नीचे गिरते गए हैं, भले ही उन्होंने किसी सीधे या कुत्सित मार्ग से थोड़ा-बहुत धन अर्जित किया हो। विद्याविहीन के हाथ आया धन वैसे ही निरुपयोगी है, जैसे बंदर के हाथ आया पुष्पहार।

इसलिए जो भी राजनीतिक दल भारतीय समाज के कमजोर वर्ग में उत्थान की शक्ति भर देना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि जहाँ आवश्यक व संभव हो, उदारमना उद्योगपतियों और औद्योगिक उपक्रमों का यथोचित सहयोग लेते हुए ऐसा वातावरण बनाएँ, जिससे कमजोर वर्ग का हर बालक-बालिका, हर किशोर अपनी बौद्धक क्षमता के अनुरूप, अपनी जन्मजात रुचि के अनुरूप कोई-न-कोई जीवनोपयोगी विद्या अर्जित कर सके। ‘विदयाधनं सर्वधनात् प्रधानम्’ जीवन भर सीखते रहने की अभिलाषा पा सके।

विद्योपार्जन के लिए अक्षर ज्ञान अनिवार्य है या नहीं? इस पर शिक्षाविदों में मतभेद है। कुछ विद्वानों का मानना है कि बिना अक्षरज्ञान पाए भी ज्ञान-ग्रहण किया जा सकता है। वे कबीर जैसे ज्ञानियों का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कलम-दवात हाथ से छुए बिना उच्च कोटि का ज्ञान पाया। पर ये तो कुछ अपवाद मात्र हैं। साधारण नियम नहीं। अक्षर को ज्ञान-भंडार की कुंजी मानते हैं तो कमजोर वर्गों का उत्थान करने की इच्छा रखने वाले राजनैतिक ऐसी योजनाएँ बनाएँ, जो कमजोर वर्ग को निरक्षरता से और अशिक्षा से मुक्त कर सकें।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) नेताओं के कौन-से आश्वासन लोग सुनते आ रहे हैं? इन नेताओं और गांधी जी की कार्यशैली में क्या अंतर था?
(ग) जनता के विकास के लिए जारी पैसा सही रूप में जनकल्याण के कार्य में क्यों नहीं लग पाता?
(घ) महत्वाकांक्षी योजनाएँ गरीबों के उत्थान में कितनी कारगर सिद्ध हुई?
(ड) ‘विद्याधन सर्वधनात् प्रधानम्’ का अर्थ बताइए तथा जीवन के लिए इसकी उपयोगिता लिखिए।
(च) गद्यांश में ‘पूँजी’ किसे कहा गया है? कमजोर वर्गों का उत्थान करने में आप इसे कितना सहायक मानते हैं?
(छ) राजनीतिक दल समाज के कमजोर वर्गों का उत्थान कैसे कर सकते हैं? इस वर्ग के लिए योजनाएँ बनाते समय क्या ध्यान रखना चाहिए?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. पर्याय लिखिए-हाकिम, उदारमना।
  2. “जीर्ण पाइप लाइन से बहता पानी बीच-बीच में छेदों से होकर चू जाता है” मिश्र वाक्य में बदलिए।

3. मुझे लगता है ‘बरसात’ के भी पहले के किसी चित्रपट का वह कोई गाना था, तब से लता निरंतर गाती चली आ रही है और मैं भी उसका गाना सुनता आ रहा हूँ। लता के पहले प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का चित्रपट-संगीत में अपना जमाना था। परंतु उसी क्षेत्र में बाद में आई हुई लता उससे कहीं आगे निकल गई। कला के क्षेत्र में ऐसे चमत्कार कभी-कभी दिखपड़ते हैं। जैसे प्रसिद्ध सितारवादक विलायत खाँ अपने सितारवादक पिता की तुलना में बहुत आगे निकल गए।

मेरा स्पष्ट मत है कि भारतीय गायिकाओं में लता के जोड़ की गायिका हुई ही नहीं। लता के कारण चित्रपट-संगीत को विलक्षण लोकप्रियता प्राप्त हुई है, लता के स्वरों में कोमलता और मुग्धता है। ऐसा दिखता है कि लता का जीवन की ओर देखने का जो दृष्टिकोण है, वही उसके गायन की निर्मलता में झलक रहा है। हाँ, संगीत दिग्दर्शकों ने उसके स्वर की इस निर्मलता का जितना उपयोग कर लेना चाहिए था, उतना नहीं किया। मैं स्वयं संगीत दिग्दर्शक होता, तो लता को बहुत जटिल काम देता, ऐसा कहे बिना रहा नहीं जाता।

लता के गाने की एक और विशेषता है, उसका नादमय उच्चारण। उसके गीत के किन्हीं दो शब्दों का अंतर स्वरों की आस द्वारा बड़ी सुंदर रीति से भरा रहता है और ऐसा प्रतीत होता है कि वे दोनों शब्द विलीन होते-होते एक-दूसरे में मिल जाते हैं। यह बात पैदा करना कठिन है, परंतु लता के साथ यह बात अत्यंत सहज और स्वाभाविक हो बैठी है।

ऐसा माना जाता है कि लता के गाने में करुण रस विशेष प्रभावशाली रीति से व्यक्त होता है, पर मुझे खुद यह बात नहीं जैचती। मेरा अपना मत है कि लता ने करुण रस के साथ उतना न्याय नहीं किया है। बजाय इसके, मुग्ध श्रृंगार की अभिव्यक्ति करने वाले मध्य या द्रुतलय के गाने लता ने बड़ी उत्कटता से गाए हैं। मेरी दृष्टि से उसके गायन में एक और कमी है, तथापि यह कहना कठिन होगा कि इसमें लता का दोष कितना है और संगीत दिग्दर्शकों का दोष कितना। लता का गाना सामान्यत: ऊँची पट्टी में रहता है। गाने में संगीत दिग्दर्शक लता से अधिकाधिक ऊँची पट्टी में गवाते हैं और इससे अकारण ही चिल्लवाते हैं।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) ‘कला के क्षेत्र में ऐसे चमत्कार कभी-कभी दिखते हैं।” लेखक ने चमत्कार किसे कहा है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
(ग) चित्रपट-संगीत की दुनिया में लता का योगदान स्पष्ट कीजिए।
(घ) लता के गाने की विशेषताएँ गद्यांश के आधार पर लिखिए।
(ड) लेखक को लता के गायन में कौन-सी विशिष्टता और कौन-सी कमजोरी नजर आती है? लिखिए।
(च) लता के गानों पर क्या दोष लगाया जाता है? लेखक उनका खंडन कैसे करता है?
(छ) लेखक संगीत निर्देशक होता, तो क्या करता? और क्यों?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. पित होता है कि शेंगें शद विलोनहते हो एक दूसे में लिजते हैं-उपवाक्य औरउक बताइए।
  2. उपसर्ग/प्रत्यय पृथक करके मूल शब्द लिखिए-निर्मलता, अत्यंत।

4. एक ओर नारी उत्पीड़न को रोकने के उद्देश्य से नए कानून बनाए जा रहे हैं। दूसरी ओर नारी उत्पीड़न की अत्यंत क्रूर घटनाओं का खुलासा होता जा रहा है। अभी की बात है, केरल की ‘संध्या’ नामक सत्रह-वर्षीय टेलीविजन सीरियलों एवं विज्ञापन अभिनेत्री के साथ हुए उत्पीड़नकी करुण कथा मलयालम समाचार-पत्र ‘मातृभूमि’ के कुछ अंकों में आई है। समाचारों का संक्षेप यही है कि संध्या एक हफ़्ते पूर्व घर से गायब हो गई थी। उससे विवाह करने का वचन देकर कोई युवक उसे भगा ले गया था।

रास्ते में उसे कई स्थानों पर पुरुषों का उत्पीड़न सहना पड़ा। पुलिस ने कुछ व्यक्तियों से पूछताछ की, पर अपराधियों को पकड़ नहीं पाई। लड़की ने संत्रस्त होकर अपने ही घर में खुदकुशी कर डाली। स्थानीय नेताओं ने माँग की कि चूँकि उसकी मृत्यु संदेहास्पद परिस्थिति में हुई है, इसलिए इस घटना की जाँच की जानी चाहिए। राज्य सरकार ने क्राइम ब्रांच द्वारा घटना की जाँच कराने का निर्णय लिया है।

अब विस्तार से जाँच होगी। संभव है, अपराधियों को कैद करने में पुलिस कामयाब होगी। यह भी संभव है कि यदि अपराधियों में कोई राजनेता या अन्य वी०आई०पी० भी जुड़े हों, तो जाँच-कर्मियों को पूरी सफलता न मिले। जो भी हो सत्रह वर्ष की छोटी आयु में ही एक भारतीय नारी को पुरुषों के क्रूर उत्पीड़नों के कारण अपनी जीवनलीला समाप्त करनी पड़ी। यह हमारे लिए शर्म और ग्लानि की बात है।

इस प्रकरण को एक दूसरी दृष्टि से भी देखने का प्रयत्न करें। हमारे समाज में कन्याओं के विवाह के लिए अठारह वर्ष की आयु ही उचित मानी जाती है। उससे पहले विवाह करना शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से और सामाजिक हित की दृष्टि से आपत्तिजनक माना जाता है। ऐसी स्थिति में सत्रह वर्ष की एक कन्या के मन में विवाह का मोह उत्पन्न हो जाए और विवाह का वचन मात्र मिलने पर, विवाह के पूर्व किसी पुरुष के साथ घर से निकल पड़ने के लिए प्रेरित हो जाए, तो इसके लिए हम किसे दोषी ठहराएँ?

क्या हमारा समाज बालिकाओं को उचित जीवन-मूल्यों का संदेश देने में असफल हो रहा है? अब इसी मामले पर एक और दृष्टि से भी विचार करें। क्या हमारी औपचारिक शिक्षा हमारी किशोरियों में कोई ऐसा मूल्य स्थापित करती है, जो उन्हें इस प्रकार के प्रलोभन में फस जाने के लिए प्रेरित करता है?

इसी उधेड़बुन में मैंने एक कहानी-संग्रह पढ़ना प्रारंभ किया। कहानी-संग्रह का नाम है ‘कथा धारा’ जो यशस्वी कथाकार मार्कडेय द्वारा संपादित है और केरल विश्वविद्यालय की बी०ए० परीक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

उसमें संकलित एक कहानी पर मेरी नजर पड़ी। शीर्षक है-‘यही सच है”। लेखिका हैं-मन्नू भंडारी। कहानी की नायिका दीपा एक शोध छात्रा है, जो अपने नए प्रेमी संजय के बारे में सोचती है-“संजय अपने बताए हुए समय से घंटे दो घंटे देरी करके आता है …….उसी क्षण से प्रतीक्षा करने लगती हूँ……… किसी काम में अपना मन नहीं लगा पाती ’ संजय, विवाह के पहले कोई लड़की किसी को इन सबका अधिकार नहीं देती………पर मैंने दिया…….तुम्हारा मेरा प्यार ही सच है……..वही नायिका कुछ ही दिन बाद अपने पुराने प्रेमी निशीथ के साथ टैक्सी में यात्रा करती है तो सोचती है–”जितनी द्रुत गुी टैक्स चीज रहा है मुनेलता हैउन द्वागत से मैंभ बीज रहा हैं.अनुक्त अवात दियाओं की ओर।
” तो यह भी सच है कि ऐसी पाठ्य-सामग्री हमारी किशोरियों को अवांछित दिशा की ओर खींच सकती है।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) ‘मातृभूमि’ क्या है? उसमें किसका जिक्र है?
(ग) शिक्षा और मूल्यों में क्या संबंध हैं? हमारी शिक्षा इसमें कितनी सफल हो रही है?
(घ) क्राइम ब्रांच द्वारा जाँच कराने के निर्णय से भी लेखिका के मन में क्या-क्या आशंकाएँ उठ रही हैं और क्यों?
(ड) भारतीय समाज में कन्या के विवाह की आयु 18 वर्ष क्यों मानी गई है?
(च) जाँचकर्मियों की जाँच की राह में कौन-कौन-सी बाधाएँ आती हैं?
(छ) ‘यही सच है” जैसी कहानियाँ किशोर छात्र-छात्राओं के पाठ्यक्रम हेतु आप कितना उपयुक्त समझते हैं? अपने विचार लिखिए।
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. “ऐसी पाठ्य-सामग्री हमारी किशोरियों को अवांछित दिशा की ओर खींच सकती है।”-मिश्र वाक्य में बदलिए।
  2. पर्यायवाची लिखिए-निशीथ, संत्रस्त। .

5. परिश्रम को सफलता की कुंजी माना गया है। जीवन में सफलता पुरुषार्थ से ही प्राप्त होती है। कहा भी है-उद्योगी पुरुषसिंह को लक्ष्मी वरण करती है। जो भाग्यवादी हैं, उन्हें कुछ नहीं मिलता। वे हाथ-पर-हाथ धरे रह जाते हैं। अवसर उनके सामने से निकल जाता है। भाग्य कठिन परिश्रम का ही दूसरा नाम है।

प्रकृति को ही देखिए। सारे जड़-चेतन अपने कार्य में लगे रहते हैं। चींटी को भी पल-भर चैन नहीं। मधुमक्खी जाने कितनी लंबी यात्रा कर बूंद-बूंद मधु जुटाती है। मुरगे को सुबह बाँग लगानी ही है। फिर मनुष्य को बुद्ध मिली है, विवेक मिला है। वह निठल्ला बैठे, तो सफलता की कामना करना व्यर्थ है।

विश्व में जो देश आगे बढ़े हैं, उनकी सफलता का रहस्य कठिन परिश्रम ही है। जापान को दूसरे विश्व-युद्ध में मिट्टी में मिला दिया गया था। उसकी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी। दिन-रात जी-तोड़ श्रम करके वह पुन: विश्व का प्रमुख औद्योगिक देश बन गया। चीन को शोषण से मुक्ति भारत से देर में मिली, वह भी श्रम के बल पर आज भारत से आगे निकल गया है। जर्मनी ने भी युद्ध की विभीषिकाएँ झेलीं, पर श्रम के बल पर सँभल गया। परिश्रम का महत्व वे जानते हैं, जो स्वयं अपने बल पर आगे बढ़े हैं। संसार के अनेक महापुरुष परिश्रम के प्रमाण हैं। कालिदास, तुलसी, टैगोर और गोकीं परिश्रम से ही अमर हुए। संसार के इतिहास में अनेक चमकते सितारे केवल परिश्रम के ही प्रमाण हैं।

बड़े-बड़े धन-कुबेर निरंतर श्रम से ही असीम संपत्ति के स्वामी बने हैं। फ़ोर्ड साधारण मैकेनिक था। धीरू भाई अंबानी शिक्षक थे। लगन और दृढ़ संकल्प परिश्रम को सार्थक बना देते हैं। गरीबी के साथ परिश्रम जुड़ जाए, तो सफलता मिलती है और अमीरी के साथ श्रमहीनता या निठल्लापन आ जाए, तो असफलता मुँह बाये खड़ी रहती है।

भारतीय कृषक के परिश्रम का ही फल है कि देश में हरित क्रांति हुई। अमेरिका के सड़े गेहूँ से पेट भरने वाला देश आज गेहूँ का निर्यात कर रहा है। कल-कारखाने रात-दिन उत्पादन कर रहे हैं। हमारे वस्त्र के बाजारों में . बिकते हैं। उन्नत औद्योगिक देश भी हमसे वैज्ञानिक उपकरण खरीद रहे हैं। किसी क्षेत्र में हम पिछड़े हैं, तो उसका कारण है, यहाँ परिश्रम का अभाव। विद्यार्थी जीवन तो परिश्रम की पहली पाठशाला है। यहाँ से परिश्रम की आदत पड़ जाए तो ठीक, अन्यथा जाने कहाँ-कहाँ की ठोकरें खानी पड़े। एडीसन से किसी ने कहा-आपकी सफलता का कारण आपकी प्रतिभा है। एडीसन ने झटपट सुधारा-प्रतिभा के माने एक औस बुद्ध और एक टन परिश्रम।

प्रश्न –

(क) परिश्रम के संदर्भ में प्रकृति से कौन-कौन-से उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं?
(ख) परिश्रम के बल पर कौन-कौन-से देश किस प्रकार आगे बढ़ गए हैं?
(ग) भारत किस प्रकार उन्नति कर रहा है?
(घ) परिश्रम द्वारा विद्यार्थी किस प्रकार सफलता प्राप्त कर सकता है?
(ड) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक लिखिए।
(च) ‘भाग्य कठिन परिश्रम का दूसरा नाम है।”-स्पष्ट कीजिए।
(छ) एडीसन ने अपनी सफलता का श्रेय किसे दिया और कैसे?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. श्रमहीनता, औद्योगिक-इन शब्दों के मूल शब्द और प्रत्यय अलग-अलग लिखिए।
  2. विलोम बताइए—भाग्यवादी, कठिन।

6. तेजी से बदलते हुए हमारे जीवन-मूल्यों का एक दुखद परिणाम यह है कि यदि बस में कोई बूढ़ा किसी-न-किसी प्रकार धक्का खाकर चढ़ भी जाए, तो किसी सीट पर बैठ नहीं पाएगा। करीब आधी से अधिक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। उन सीटों पर तो उनका मौलिक अधिकार है ही, पर शेष सीटों पर भी वे कब्जा कर लेती हैं। बची-खुची सारी सीटों पर या तो किशोर छात्राएँ या युवक और मध्य वयस्क यात्री अपना अधिकार जमा लेंगे। बेचारे बूढ़ों को खड़े-खड़े यात्रा करनी होगी।

केरल जैसे कुछ राज्यों में हर बस में बाई तरफ की एक सीट विकलांग लोगों के लिए आरक्षित होती है और एक सीट सीनियर सिटीजन के लिए। कोई विकलांग यात्री आ जाए, तो कंडक्टर आरक्षित सीट पर उसे तुरंत बैठा लेगा। पर कोई बूढ़ा यात्री आ जाए, तो कंडक्टर अनदेखी करता है। बूढ़ों के लिए आरक्षित सीट पर बैठा किशोर या युवक हटने का नाम भी नहीं लेता।

अभी हाल ही की बात है। सुबह आठ बजे मैं घर से निकला। एक पुस्तक खरीदने रेलवे स्टेशन के पास तक बस से जाना था। डीजल-पेट्रोल के दाम में हुई वृद्ध के अनुपात में बस-भाड़े में वृद्ध करने की माँग को लेकर निजी बस सेवाएँ हड़ताल पर थीं। अत: सरकारी परिवहन निगम की बसों में यात्रियों की भरमार थी।

घर के निकट के बस स्टॉप पर आधे घंटे तक इंतजार करने पर भी मैं किसी बस में चढ़ नहीं पाया। सभी के दरवाजों से छात्र लटके हुए जा रहे थे। फिर एक किलोमीटर चलकर दूसरे बस डिपो पहुँचा। वहाँ भी यात्रियों की बड़ी भीड़ थी। किसी-न-किसी तरह एक बस में घुस गया। पिछले आधे भाग में स्त्रियाँ बैठी थीं और अगले भाग में किशोर युवक और मध्य वयस्क पुरुष। बूढ़ों के लिए आरक्षित सीट पर एक हट्टा-कट्टा जवान बैठा था। देखते-देखते यात्री इतने घुस आए कि खड़े रहने तक की जगह नहीं मिल रही थी। बस चलने लगी तो मुझे लगा कि साँस लेना भी कठिन लग रहा है। मैं यात्रियों से बुरी तरह घिर गया था।

मेरा सिर पसीने से तर होने लगा। लगा कि मेरी सारी मांसपेशियाँ शिथिल हो रही हैं। हथेलियाँ ठडी हो रही थीं। मेरे बाएँ हाथ में एक थैला था। वह हाथ से छूट गया। मुझे लगा कि मैं अब गिर जाऊँगा। एक महिला ने मेरी विवशता समझ ली और मुझे बैठने को थोड़ी जगह दी।

रेलवे स्टेशन का स्टॉप आ गया। मैं किसी प्रकार से उतर पड़ा। सामने जो पी०सी०ओ० था, उसके सामने पहुँचकर मैंने काउंटर पर बैठी महिला से अनुरोध किया-मुझे चक्कर आ रहा है। जरा फ़र्श पर लेटने दें। कहते-कहते मैं फ़र्श पर चित्त लेट गया। महिला घबरा गई और पास की दुकान से दो पुरुषों को बुला लिया। करीब दस मिनट तक मैं वैसे ही पड़ा रहा। सोचा-अंतिम घड़ी आ गई है। भगवान की कृपा से थोड़ी देर बाद मेरी शिथिलता जाती रही। मित्रो, बूढ़े यात्रियों को बस में बैठने दें, ताकि उन्हें मेरे जैसी विपदा न भोगनी पड़े।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) विकलांग और बूढ़ों के प्रति कंडक्टर का व्यवहार कैसा होता है?
(ग) लेखक को सरकारी बस में यात्रा क्यों करनी पड़ी? उसकी यह यात्रा कैसी रही?
(घ) बसों में बूढ़ों को खड़े-खड़े यात्रा क्यों करनी पड़ती है?
(ड) लेखक बस में चढ़ पाने में असमर्थ क्यों था? उसे सीट न मिल पाने से समाज की किस मानसिकता का बोध होता है?
(च) महिलाएँ बस में अपने मौलिक अधिकार का किस प्रकार दुरुपयोग करती हैं?
(छ) घबराई महिला ने पास की दुकान से लोगों को क्यों बुला लिया होगा?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. गद्यांश से एक मुहावरा छाँटकर अर्थ लिखिए और वाक्य-प्रयोग कीजिए।
  2. आरक्षित, मौलिक शब्दों में से उपसर्ग और प्रत्यय पृथक कीजिए तथा मूल शब्द लिखिए।

7. भारतीय समाज में नारी की स्थिति सचमुच विरोधाभासपूर्ण रही है। संस्कृति पक्ष से उसे ‘शक्ति’ माना गया है तो लोकपक्ष से उसे ‘अबला’ कहा गया है। सदियों के संस्कारों की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें न तो कुछ वर्षों की शैक्षणिक प्रगति खोद सकती है, न कुछेक आंदोलनों से उन्हें हिलाया जा सकता है। अत: स्थिति पूर्ववत ही बनी रहती है। यह स्थिति कई मामलों में अब भी उलझी हुई है और दिशा अस्पष्ट है, क्योंकि यहाँ हर प्रश्न को पश्चिमी आईने में देखा गया।

तटस्थ समाजशास्त्रीय दृष्टि इस बारे में नहीं रही। हमारे यहाँ विभिन्न समाजों में स्त्रियों की स्थिति और प्रगति बहुत कुछ स्थानीय, सामुदायिक व जातीय परंपराओं पर आधारित है। एक ही धर्म और एक ही भौगोलिक स्थिति के भीतर (केरल में) कहीं मातृसत्तात्मक परिवार में स्त्री ही मुखिया है और उसे अधिकार प्राप्त हैं, कहीं मातृसत्तात्मक परिवार में भी उनका सम्मान नहीं रहा, तो कहीं पितृसत्तात्मक परिवार में भी उनकी स्थिति सम्मानजनक रही।

समाजशास्त्रीय दृष्टि इन विभिन्नताओं को रेखांकित करती है। हमारा दुर्भाग्य यह रहा है कि हम पश्चिमी देशों के अंधानुकरण को अपनी प्रगति मान बैठे हैं। ‘वीमेंसलिब’ का अतिवाद पश्चिमी देशों को परिवारवाद की ओर लौटा रहा है। तीसरी दुनिया के हमारे जैसे देश बुनियादी समस्याएँ भूल आगे होकर उसी मुक्ति आंदोलन को अपनाने की होड़ में लगे हैं।

यह सब दिशाहीन यात्रा है। स्थानीय और राष्ट्रीय परंपराओं और स्थितियों के अनुरूप कोई लक्ष्य, कोई स्पष्ट दिशा निर्धारित किए बिना, बिना इस बात पर गंभीरता से विचार किए कि ‘स्त्रीवाद’ का अर्थ परिवार तोड़ना या सामाजिक विघटन लाना नहीं है और न ही आजाद होने का मतलब यह है कि औरत औरत न रहे, हम अपने यहाँ इस आदोलन को चला रहे हैं।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) भारत में नारी की स्थिति में सुधार क्यों नहीं हो पाया?
(ग) हमारे देश में नारी मुक्ति आंदोलन की दिशा अभी तक स्पष्ट क्यों नहीं हो पाई?
(घ) समाज में नारी की स्थिति सुधारने के लिए जो-जो आंदोलन चलाए जा रहे हैं, उनमें किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
(ड) “एक ही स्थिति में नारी की स्थितियाँ अलग-थलग हैं।”-स्पष्ट कीजिए।
(च) गद्यांश में दिशाहीन यात्रा किसे कहा गया है? और क्यों?
(छ) लेखक ने अपना दुर्भाग्य किसे कहा है, और क्यों?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. तटस्थ, आईना-पर्यायवाची लिखिए।
  2. स्थानीय, विघटन-विपरीतार्थक लिखिए। .

8. वीरता की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से होती है। लड़ना-मरना, खून बहाना, तोप-तलवार के सामने न झुकना ही नहीं, कर्ण की भाँति याचक को खाली हाथ न लौटाना या बुद्ध की भाँति गूढ़ तत्वों की खोज में सांसारिक सुख त्याग देना भी वीरता ही है। वीरता तो एक अंत:प्रेरणा है। वीरता देश-काल के अनुसार संसार में जब भी प्रकट हुई, तभी अपना एक नया रूप लेकर आई और लोगों को चकित कर गई। वीर कारखानों में नहीं ढलते, न खेतों में उगाए जाते हैं। वे तो देवदार के वृक्ष के समान जीवन रूपी वन में स्वयं उगते हैं, बिना किसी के पानी दिए, बिना किसी के दूध पिलाए बढ़ते हैं। वीर का दिल सबका दिल और उसके विचार सबके विचार हो जाते हैं। उसके संकल्प सबके संकल्प हो जाते हैं। औरतों और समाज का हृदय वीर के हृदय में धड़कता है।

प्रश्न –

(क) वीरता की अभिव्यक्ति किन-किन रूपों में हो सकती है?
(ख) आशय स्पष्ट कीजिए-‘वीर कारखानों में नहीं ढलते।”
(ग) वीरों की तुलना देवदार के वृक्ष से क्यों की गई है?
(घ) गद्यांश में कर्ण और बुद्ध का उल्लेख क्यों किया गया है?
(ड) गद्यांश में स्थापित मानदंडों के आधार पर क्या गांधी जी को वीर माना जा सकता है? पक्ष या विपक्ष में दो तर्क दीजिए।
(च) उपर्युक्त गद्यांश का एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(छ) वीर के संकल्प सबके संकल्प क्यों बन जाते हैं?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. पर्यायवाची बताइए-याचक, गूढ़।
  2. ‘विचार, और हृदय’ शब्दों में ‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्द बनाइए।

9. संसार में दो अचूक शक्तियाँ हैं-वाणी और कर्म। कुछ लोग वचन से संसार को राह दिखाते हैं और कुछ लोग कर्म से। शब्द और आचार दोनों ही महान शक्तियाँ हैं। शब्द की महिमा अपार है। विश्व में साहित्य, कला, विज्ञान, शास्त्र सब शब्द-शक्ति के प्रतीक प्रमाण हैं। पर कोरे शब्द व्यर्थ होते हैं, जिनका आचरण न हो। कर्म के बिना वचन की, व्यवहार के बिना सिद्धांत की कोई सार्थकता नहीं है।

निस्संदेह शब्द-शक्ति महान है, पर चिरस्थायी और सनातनी शक्ति तो व्यवहार है। महात्मा गांधी ने इन दोनों की कठिन और अद्भुत साधना की थी। महात्मा जी का संपूर्ण जीवन इन्हीं दोनों से युक्त था। वे वाणी और व्यवहार में एक थे। जो कहते थे, वही करते थे। यही उनकी महानता का रहस्य है। कस्तूरबा ने शब्द की अपेक्षा कृति की उपासना की थी, क्योंकि कृति का उत्तम व चिरस्थायी प्रभाव होता है।

‘बा’ ने कोरी शाब्दिक, शास्त्रीय, सैद्धांतिक शब्दावली नहीं सीखी थी। वे तो कर्म की उपासिका थीं। उनका विश्वास शब्दों की अपेक्षा कमों में था। वे जो कहा करती थीं, उसे पूरा करती थीं। वे रचनात्मक कर्मों को प्रधानता देती थीं। इसी के बल पर उन्होंने अपने जीवन में सार्थकता और सफलता प्राप्त की थी।

प्रश्न –

(क) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ख) सज्जन व्यक्ति संसार के लिए क्या-क्या करते हैं? और कैसे?
(ग) गांधी जी महान क्यों थे?
(घ) संसार की कौन-सी अचूक शक्तियाँ हैं? इनमें एक के बिना दूसरी अधूरी क्यों है?
(ड) कस्तूरबा के व्यक्तित्व की किन-किन विशेषताओं को आप अपनाना चाहेंगे?
(च) कस्तूरबा ने किसकी उपासना की और क्यों?
(छ) ‘कर्म के बिना वचन की, व्यवहार के बिना सिद्धांत की कोई सार्थकता नहीं है”-स्पष्ट कीजिए।
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. ‘साहित्य’ और ‘प्रमाण’ शब्दों के विशेषण बनाकर लिखिए।
  2. प्रत्यय बताइए-सार्थकता, शाब्दिक।

10. वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता ने मनुष्य की बुद्ध का अपूर्व विकास कर दिया है। द्रवितीय महायुद्ध में एटम-बम की शक्ति ने कुछ क्षणों में ही जापान की अजेय शक्ति को पराजित कर दिया। इस शक्ति की युद्धकालीन सफलता ने अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस आदि सभी देशों को ऐसे शस्त्रास्त्रों के निर्माण की प्रेरणा दी कि सभी भयंकर और सर्वविनाशकारी शस्त्र बनाने लगे।

अब सेना को पराजित करने तथा शत्रु-देश पर पैदल सेना द्वारा आक्रमण करने के लिए शस्त्र-निर्माण के स्थान पर देश का विनाश करने की दिशा में शस्त्रास्त्र बनने लगे हैं। इन हथियारों का प्रयोग होने पर शत्रु-देशों की अधिकांश जनता और संपत्ति थोड़े समय में ही नष्ट की जा सकेगी। चूँकि ऐसे शस्त्रास्त्र प्राय: सभी स्वतंत्र देशों के संग्रहालयों में कुछ-न-कुछ आ गए हैं, अत: युद्ध की स्थिति में उनका प्रयोग भी अनिवार्य हो जाएगा।

अत: दुनिया का सर्वनाश या अधिकांश नाश, तो अवश्य हो ही जाएगा। इसीलिए नि:शस्त्रीकरण की योजनाएँ बन रही हैं। शस्त्रास्त्रों के निर्माण में जो दिशा अपनाई गई, उसी के अनुसार आज इतने उन्नत शस्त्रास्त्र बन गए हैं, जिनके प्रयोग से व्यापक विनाश आसन्न दिखाई पड़ता है। अब भी परीक्षणों की रोकथाम तथा बने शस्त्रों के प्रयोग को रोकने के मार्ग खोजे जा रहे हैं। इन प्रयासों के मूल में एक भयंकर आतंक और विश्व-विनाश का भय कार्य कर रहा है।

प्रश्न –

(क) इस गद्यांश का मूल कथ्य संक्षेप में लिखिए।
(ख) उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
(ग) बड़े-बड़े देश आधुनिक विनाशकारी हथियार क्यों बना रहे हैं?
(घ) आधुनिक युद्ध भयंकर व विनाशकारी क्यों होते हैं?
(ड) ‘नि:शस्त्रीकरण’ से क्या तात्पर्य है? इसके लिए योजनाएँ क्यों बनाई जा रही हैं?
(च) एटम-बम के आविष्कार से विश्व-विनाश का भय दिखने लगा है। इसमें विज्ञान का कितना दोष है?
(छ) शस्त्रास्त्र निर्माता राष्ट्रों के दृष्टिकोण में अब क्या परिवर्तन आ गया है? इसके कारण क्या-क्या हैं?
(ज) निर्देशानुसार उत्तर दीजिए—

  1. “वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता ने मनुष्य की बुद्ध का अपूर्व विकास कर दिया है।”-मिश्र वाक्य में परिवर्तित कीजिए।
  2. विलोम बताइए-विकास, अनिवार्य। ,·