जूझ

लेखक परिचय

जीवन परिचय-आनंद यादव का जन्म सन 1935 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। इनका पूरा नाम आनंद रतन यादव है। इन्होंने मराठी एवं संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। ये बहुत समय तक पुणे विश्वविद्यालय में मराठी विभाग में कार्यरत रहे। इनकी लगभग पच्चीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्होंने उपन्यास, कविता व समालोचनात्मक विधाओं पर लेखन-कार्य किया है। इनकी ‘नटरंग’ पुस्तक बहुत चर्चित रही। ‘जूझ’ उपन्यास पर इन्हें सन 1990 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

पाठ का सारांश

यह अंश लेखक के बहुचर्चित आत्मकथात्मक उपन्यास का है। यह एक किशोर के देखे और भोगे हुए गाँवई जीवन के खुरदरे यथार्थ और उसके रंगारंग परिवेश की विश्वसनीय जीवंत गाथा है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास में जीवन का मर्मस्पर्शी पिईईई अत-व्रत अल्मत निमाध्ययग्रमण समाज औरलते-जूते किसानमष्ट्रों के संर्ष को भ अनूठी झाँकी है।
इस अंश में हर स्थिति में पढ़ने की लालसा लिए धीरे-धीरे साहित्य, संगीत और अन्य विषयों की ओर बढ़ते किशोर के कदमों की आकुल आहट सुनी जा सकती है।

लेखक के पिता ने उसे पाठशाला जाने से रोक दिया तथा खेती के काम में लगा दिया। उसका मन पाठशाला जाने के लिए तड़पता था, परंतु वह पिता से कुछ कहने की हिम्मत नहीं रखता था। उसे पिटाई का डर था। उसे विश्वास था कि खेती से कुछ नहीं मिलने वाला क्योंकि क्रमश: इससे मिलनेवाला लाभ घट रहा है। पढ़ने के बाद नौकरी लगने पर उसके पास कुछ पैसे आ जाएँगे। दीवाली के बाद ईख पेरने के लिए कोल्हू चलाया जाता था क्योंकि उसके पिता को सबसे पहले गुड़ बेचना होता था ताकि ओधिक कीमत मिल सके। हालाँकि पहले ईख काटने से उसमें रस कम निकलता था। इस वर्ष भी लेखक के पिता ने जल्दी कार्य शुरू किया।

अत: ईख पेरने का काम सबसे पहले संपन्न हो गया। एक दिन लेखक धूप में कंडे थाप रही थी और वह बाल्टी में पानी भर-भरकर उसे दे रहा था। अच्छा मौका देखकर लेखक ने माँ से पढ़ाई की बात की माँ ने अपनी लाचारी प्रकट करते हुए कहा कि तेरी पढ़ाई-लिखाई की बात करने पर वह बरहेला सुअर की तरह गुर्राता है। लेखक ने सुझाव दिया कि वह दत्ता जी राव सरकार से उसकी पढ़ाई के बारे में बात करे। माँ तैयार हो गई। वह बच्चे की तड़पन समझती थी। अत: रात को लेखक की पढ़ाई के संबंध में बात करने के लिए दत्ता जी राव देसाई के पास गई और उनसे सारी बात बताई।

उसने यह भी बताया कि दादा सारे दिन बाजार में रखमाबाई के पास गुजार देता है। वह खेती का काम नहीं करता। उसने बच्चे की पढ़ाई इसलिए बंद कर दी ताकि वह सारे गाँव भर में आजादी के साथ घूमता रहे। यह बात सुनकर देसाई चिढ़ गए। चलते-चलते लेखक ने यह भी कहा कि यदि वह अब भी कक्षा में पढ़ने लगे तो दो महीने में पाँचवीं पास कर लेगा और इस तरह उसका साल बच जाएगा। पहले ही उसका एक साल खराब हो चुका था। राव ने लेखक से कहा कि घर आने पर दादा को मेरे पास भेज देना और घड़ी भर बाद तुम भी आ जाना। माँ-बेटा ने राव  को सचेत किया कि हमारे आने की बात उसे मत बताना। राव ने उन्हें निर्भय होकर जाने को कहा। रात को दादा घर पर मालिक दिखाई नहीं दिया। खेत से आ जाने पर इधर भेजना।

यह सुनकर दादा सम्मान की बात समझकर तुरंत चला गया। आधा घंटे बाद लेखक उन्हें खाने के लिए बुलाने चला गया। राव ने लेखक से पूछा कि कौन-सी कक्षा में पढ़ता है रे तू? लेखक ने बताया कि वह पाँचवीं में था, पर अब स्कूल नहीं जाता क्योंकि दादा ने मना कर दिया। उन्हें खेतों में पानी लगाने वाला चाहिए था। राव ने दादा से पूछा तो उसने लेखक के कथन को स्वीकार कर लिया। देसाई ने दादा को खूब फटकार लगाई और कहा कि तुम्हारा ध्यान खेती में नहीं है। बीवी-बच्चों को खेत में जोतकर खुले साँड़ की तरह घूमता है तथा अपनी मस्ती के लिए लड़के के जीवन की बलि चढ़ा रहा है। उसने लेखक को कहा कि तू सवेरे पाठशाला जा तथा मन लगाकर पढ़। यदि यह मना करे तो मेरे पास आना। मैं तुझे पढ़ाऊँगा। लेखक के पिता ने उस पर गलत आदतों का आरोप लगाया-कंडे बेचना, चारा बेचना, सिनेमा देखना या जुआ खेलना, खेती व घर के काम पर ध्यान न देना आदि। लेखक ने अपने उत्तर से उन्हें संतुष्ट कर दिया।

देसाई ने पूछा कि कभी नापास  तो नहीं हुआ। लेखक के मना करने पर उसे पाठशाला जाने का आदेश देकर घर भेज दिया। बाद में उसने रतनाप्पा को समझाया। दादा ने भी पाठशाला भेजने की हामी भर दी। घर आकर दादा ने लेखक से यह वचन ले लिया कि दिन निकलते ही खेत पर जाना और वहीं से पाठशाला पहुँचना। । पाठशाला से छुट्टी होते ही घर में बस्ता रखकर सीधे खेत पर आकर घंटा भर ढोर चराना और खेतों में ज्यादा काम होने पर पाठशाला से गैर-हाजिर रहना होगा। लेखक ने सभी शतें स्वीकार कर लीं। लेखक पाँचवीं कक्षा में जाकर बैठने लगा। कक्षा के दो लड़कों को छोड़कर सभी नए बच्चे थे। वह बाहरी-अपरिचित जैसा एक बेंच के एक सिरे पर कोने में जा बैठा। वह पुरानी किताबों को ही थैले में भर लाया। कक्षा के शरारती लड़के ने उसका मजाक उड़ाया और उसका गमछा छीनकर मास्टर की मेज पर रख दिया। फिर उसे सिर पर लपेटकर मास्टर की नकल उतारनी शुरू की। तभी मास्टर जी आ गए।

लेखक ने उसे सब कुछ बता दिया। बीच की छुट्टी में लड़कों ने उसकी धोती खोलने की कोशिश की, परंतु असफल रहे। वे उसे तरह-तरह से परेशान करते रहे। उसका मन उदास हो गया। उसने माँ से नयी टोपी व दो नाड़ी वाली चड्ढी मैलखाऊ रंग की मैंगवा ली। धीरे-धीरे लड़कों से परिचय बढ़ गया। मंत्री नामक मास्टर आए। वे छड़ी का उपयोग नहीं करते थे। वे लड़के की पीठ पर घूसा लगाते थे। शरारती लड़के उनसे बहुत डरते थे। वे गणित पढ़ाते थे।

इस कक्षा में वसंत पाटील नाम का कमजोर शरीर वाला व होशियार लड़का था। वह शांत स्वभाव का था तथा हमेशा पढ़ने में लगा रहता था। मास्टर ने उसे कक्षा मॉनीटर बना दिया था। लेखक भी उसकी तरह पढ़ने में लगा रहा। वह अपनी कापी-किताबों को व्यवस्थित रखने लगा। शीघ्र ही वह गणित में होशियार हो गया। दोनों में दोस्ती हो गई। मास्टर लेखक को ‘आनंदा’ कहने लगे। अब उसका मन पाठशाला में लगने लगा। न०वा० सौंदलगेकर मास्टर मराठी पढ़ाते थे। पढ़ाते समय वे स्वयं रम जाते थे। सुरीले कंठ, छद व रसिकता के कारण वे कविता बहुत अच्छी पढ़ाते थे। उन्हें मराठी व अंग्रेजी की अनेक कविताएँ याद थीं। वे कविता के साथ ऐसे जुड़े थे कि अभिनय करके भावबोध कराते थे। वे स्वयं भी कविता रचते थे।

लेखक उनसे बहुत प्रभावित था। खेत पर पानी लगाते समय या ढोर चराते समय वह मास्टर के अनुसार ही कविताएँ गाता था। वह उन्हीं की तरह अभिनय करता। उसी समय उसे अनुभव हुआ कि अन्य कविताएँ भी इसी तरह पढ़ी जा सकती हैं। लेखक को महसूस हुआ कि पहले जिस काम को करते हुए उसे अकेलापन खटकता था, अब वह समाप्त हो गया। उसे एकांत अच्छा लगने लगा। एकांत के कारण वह ऊँचे स्वर में कविता गा सकता था, नृत्य कर सकता था। उसने कविता गाने की अपनी पद्धति विकसित की। वह अभिनय के साथ गाने लगा तथा अब उसके चेहरे पर कविता के भाव आने लगे। मास्टर को लेखक का गायन अच्छा लगा और उससे छठी-सातवीं कक्षा के बालकों के सामने गवाया। पाठशाला के एक समारोह में भी उससे गवाया। मास्टर स्वयं कविता रचते थे। उनके पास मराठी कवियों के काव्य-संग्रह थे। वे उन कवियों के संस्मरण भी सुनाते थे। इस कारण अब वे कवि उसे ‘आदमी’ लगने लगे थे। सौंदलगेकर स्वयं कवि थे।

इस कारण लेखक को यह विश्वास हुआ कि कवि भी उसकी तरह ही हाड़-मांस का व क्रोध-लोभ का मनुष्य होता है। लेखक को लगा कि वह स्वयं भी कविता कर सकता है। मास्टर के दरवाजे पर छाई हुई मालती की बेल पर एक कविता लिखी। लेखक ने मालती लता व कविता दोनों ही देखी थी। इससे उसे लगा कि वह अपने आस-पास, अपने गाँव, खेतों आदि पर कविता बना सकता है।

भैंस चराते-चराते वह फसलों व जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। वह उन्हें जोर से गुनगुनाता तथा मास्टर को दिखाता। कविता लिखने के लिए वह कागज व पेंसिल रखने लगा। उनके न होने पर वह लकड़ी के छोटे टुकड़े से भैंस की पीठ पर रेखा खींचकर लिखता या पत्थर की शिला पर कंकड़ से लिख लेता। कंठस्थ हो जाने पर उसे पोंछ देता। वह अपनी कविता मास्टर को दिखाता था। कभी-कभी वह रात को ही मास्टर के घर जाकर कविता दिखाता। वे उसे कविता के शास्त्र के बारे में समझाते। वे उसे छद, अलंकार, शुद्ध लेखन, लय का ज्ञान कराते। वे उसे पुस्तकें व कविता-संग्रह भी देते थे। उन्होंने उसे कविता करने के अनेक ढरें सिखाए। इस प्रकार लेखक को मास्टर की निकटता मिलती और उसकी मराठी भाषा में सुधार आने लगा। शब्दों का महत्व उसकी समझ में आने लगा।

शब्दार्थ

गड्ढे में धकेलना – पतन की ओर ले जाना। कोल्हू – गन्ने का रस निकालने वाला यंत्र। बहुतायत – अत्यधिक। भाव नीचे उतरना – सस्ता होना, मंदी आना। जन – मनुष्य। कडे –पशुओं के गोबर से बने उपले। मन रखना – ध्यान देना। तड़पन – पीड़ा। जोत देना – लगा देना। बाड़ा – अहाता। जीमने – खाना खाने। राह देखना – इंतजार करना। जिरह –बहस। हजामत बनाना – फटकारना। श्रम – मेहनत। लागत – खर्च। नायास – अनुत्तीर्ण। बालिस्टर – बैरिस्टर, वकील। रोते-थोते – जैसे-तैसे। अपरिचित – अनजान। द्वतजार –प्रतीक्षा। खिल्ली उड़ाना – मजाक बनाना। पोशाक – वस्त्र। मटमैली – गंदी। गमछा – पतले कपड़े का तौलिया। काछ – धोती का छोर जिसे जाँघों के बीच से पीछे ले जाकर खोंसते हैं। चोंच मार-मारकर घायल करना – बार-बार पीड़ा  देना। निबाह – निर्वाह। उमग – उत्साह। मैलखाऊ – जिसमें मैल दिखाई न दे। दहशत – डर, भय। ठोंक देना – पिटाई करना। पसीना छूटना – भयभीत होना। मुनासिब – उचित। व्यवस्थित – ठीक तरह से। एकाग्रता – ध्यान की अवस्था। कठस्थ – जबानी याद होना। अभिनय – नाटक करना। संस्मरण – पुरानी बातों की याद। भान – आभास। दम रोककर – तन्मय होकर। यति-गति – कविता में रुकने व आगे बढ़ने के नियम। आरोह-अवरोह – स्वर को भावानुसार कम या ज्यादा करना। खटकाना – महसूस करना। अयेक्षा – तुलना। तुकबदी – छदबद्ध सामान्य कविता। महफिल – सभा। ढरों – शैली। सूक्ष्मता – बारीकी।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

पाठ के साथ

प्रश्न 1:
‘जूझ’ शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथा नायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता हैं।
उत्तर –
जूझ का साधारण अर्थ है जूझना अथवा संघर्ष करना। यह उपन्यास अपने नाम की सार्थकता को सिद्ध करता है। उपन्यास का कथानायक भी जीवनभर स्वयं से और अपनी परिस्थितियों से जूझता रहता है। यह शीर्षक कथानायक के संघर्षशील वृत्ति का परिचय देता है। हमारे कथानायक में संघर्ष की भावना है। वह संघर्ष करने के लिए मजबूर है लेकिन उसका यह संघर्ष ही उसे एक दिन पढ़ा-लिखा इंसान बना देता है। इस संघर्ष में भी उसने आत्मविश्वास बनाए रखा है। यद्यपि परिस्थितियाँ उसके विरुद्ध होती हैं तथापि वह अपने आत्मविश्वास के बल इस प्रकार की परिस्थितियों से जूझने में सफल हो जाता है। वास्तव में कथानक की संघर्षशीलता ही उसकी चारित्रिक विशेषता है। उपन्यास के शीर्षक से यही केंद्रीय विशेषता उजागर होती है।

प्रश्न 2:
स्वय कविता रच लेने का आत्मविश्वास लखक के मन में कैस पैदा हुआ?
उत्तर –
लेखक की पाठशाला में मराठी भाषा के अध्यापक न०बा० सौंदलगेकर कविता के अच्छे रसिक व मर्मज्ञ थे। वे कक्षा में सस्वर कविता-पाठ करते थे तथा लय, छद, गति-यति, आरोह-अवरोह आदि का ज्ञान कराते थे। लेखक इनकी देखकर बहुत प्रभावित हुआ। इससे पहले उसे कवि दूसरे लोक के जीव लगते थे। सौंदलगेकर ने उसे अन्य कवियों के बारे में बताया। वह स्वयं भी कवि थे। इसके बाद आनंद को यह विश्वास हुआ कि कवि उसी की तरह आदमी ही होते हैं। एक बार उसने देखा कि उसके अध्यापक ने अपने घर की मालती लता पर ही कविता लिख दी, तब उसे लगा कि वह अपने आस-पास के दृश्यों पर कविता बना सकता है। इस प्रकार उसके मन में स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास पैदा हुआ।

प्रश्न 3:
श्री सोंदलगकर के अध्यापन की उन विशषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई।

अथवा 

सौंदलगकर के व्यक्तित्व के आधार पर किसी अध्यापक के लिए आवश्यक जीवन-मूल्यों  पर प्रकाश डालिए।
उत्तर –
श्री सौंदलगेकर मराठी भाषा के अध्यापक थे। वे मराठी भाषा का अध्यापन बड़े ही सुरुचि ढंग से करवाते थे। उनके पढ़ाने का तरीका सबसे अलग था। पढ़ाते समय वे पूरी तरह पढ़ाई में ही रम जाया करते थे। छंद की बढ़िया चाल और सुरों का ज्ञान उन्हें था। उस पर मीठा गला। वे गा-गाकर कविता पाठ करवाते थे। वे सबसे पहले कविता गाकर सुनाते थे फिरबैठे-बैठे ही अभिनय करते हुए कविता के भावों को ग्रहण करते थे।

प्रश्न 4:
कविता के प्रति लगाव से पहल और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की धारणा में क्या बदलाव आया?
उत्तर –
कविता के प्रति लगाव से पहले लेखक को ढोर चराते हुए, पानी लगाते हुए, दूसरे काम करते हुए अकेलापन बहुत खटकता था। उसे ऐसा लगता था कि कोई-न-कोई हमेशा साथ में होना चाहिए। उसे किसी के साथ बोलते हुए, गपशप करते हुए, हँसी-मजाक करते हुए काम करना अच्छा लगता था। कविता के प्रति लगाव के बाद उसे अकेलेपन से ऊब नहीं होती। अब वह स्वयं से ही खेलना सीख गया। पहले की अपेक्षा अब उसे अकेला रहना अच्छा लगने लगा। इस स्थिति में वह ऊँची आवाज़ में कविता गा सकता था। वह अभिनय भी कर सकता था। वह थुई-थुई करके नाच भी सकता था। इस तरह अब उसे अकेलापन आनंद देने लगा था।

प्रश्न 5:
आपके खयाल से पढ़ाई-लिखाई के सबध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था या लखक के पिता का2 तक सहित उत्तर दें।
उत्तर –
मेरे खयाल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ताजी राव का रवैया बिलकुल सही था क्योंकि लेखक को पढ़ने की इच्छा थी जिसे दत्ताजी राव ने सही पहचाना। उसकी प्रतिभा के बारे में दत्ताजी ने पूरी तरह जान लिया था। वैसे भी लेखक को पढ़ाने के पीछे दत्ताजी राव का कोई स्वार्थ नहीं था जबकि लेखक के पिता का पढ़ाई-लिखाई के बारे में रवैया बिलकुल गलत था। वास्तव में लेखक का पिता अपने स्वार्थ के लिए अपने बेटे को नहीं पढ़ाना चाहता था। उसे पता था कि यदि उसका बेटा स्कूल जाने लगा तो उसे ऐश करने के लिए समय नहीं मिलेगा। न ही वह टखमाबाई के पास जा सकता था। इसलिए हमें दत्ताजी राव और लेखक का रवैया पढ़ाई के संबंध में बिलकुल ठीक लगता है।

प्रश्न 6:
दत्ता जी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि झूठ का सहारा न लेना पड़ता तो आगे का घटनाक्रम क्या होता?
उत्तर –
अनुमान लगाएँ। दत्ता जी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि दोनों ने झूठ का सहारा नहीं लिया. होता तो दत्ता जी राव उसके पिता पर दबाव नहीं दे पाते। लेखक पिता द्वारा दिए गए ही काम करता। उसकी पढ़ाई-लिखाई नहीं हो पाती। वह सारा जीवन खेती में ही लगा रहता। इस झूठ के बिना हमें यह प्रेरणादायक कहानी भी नहीं मिल पाती। इस तरह कभी-कभी एक झूठ भी मनुष्य व समाज का विकास करने में सक्षम साबित होता है।

अन्य हल प्रश्न

I. बोधात्मक प्रशन

प्रश्न 1:
पाँचवीं कक्षा में दुबारा पढ़ने आए लखक की किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?’ ‘जूझ’ कहानी के आधार पर लिखिए।
उत्तर –
जो लड़के चौथी पास करके कक्षा में आए थे, लेखक उनमें से गली के दो लड़कों के सिवाय और किसी को जानता तक नहीं था। जिन लड़कों को वह कम अक्ल और अपने से छोटा समझता था, उन्हीं के साथ अब उसे बैठना पड़ रहा था। वह अपनी कक्षा में पुराना विद्यार्थी होकर भी अजनबी बनकर रह गया। पुराने सहपाठी तो उसे सब तरह से जानते-समझते थे, मगर नए लड़कों ने तो उसकी धोती, उसका गमछा, उसका थैला आदि सब चीजों का मजाक उड़ाना आरंभ कर दिया। उसके मन में यह दुख भी था कि इतनी कोशिश करके पढ़ने का अवसर मिला तो उसके आत्मविश्वास में भी कमी आ गई।

प्रश्न 2:
‘जूझ’ कहानी में पिता को मनाने के लिए माँ और दत्ता जी राव की सहायता से एक चाल चली गई हैं। क्या ऐसा कहना ठीक है?
उत्तर –
‘जूझ’ कहानी में पिता को मनाने के लिए माँ और दत्ता जी राव की सहायता से एक चाल चली गई है। यह कहना बिलकुल ठीक है। लेखक के पिता उसे पढ़ाना नहीं चाहते थे। वे खुद ऐयाशी करने के लिए बच्चे को खेती के काम में लगाना चाहते थे। पढ़ने की बात करने पर वे जंगली सुअर की तरह गुर्राते थे। उन पर दत्ता जी राव का दबाव ही काम कर सकता था। अत: लेखक की माँ व दत्ता जी राव ने मिलकर उन्हें मानसिक तौर पर घेरा तथा आगे पढ़ने की स्वीकृति ली। यदि यह उपाय नहीं किया जाता तो लेखक कभी शिक्षित नहीं हो पाता।

प्रश्न 3:
‘जूझ’ कहानी में चित्रित ग्रामीण जीवन का सांक्षप्त वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर –
‘जूझ’ कहानी में ग्रामीण जीवन का यथार्थपरक चित्रण किया गया है। गाँव में किसान, जमींदार आदि कई वर्ग हैं। लेखक स्वयं कृषिकार्य करता है। उसके पिता बाजार में गुड़ के ऊँचे भाव पाने के लिए गन्ने की पेराई जल्दी करा देते हैं। गाँव में पूरा परिवार कृषि-कार्य में लगा रहता है, चाहे बच्चे हों, महिलाएँ हों या वृद्ध। कुछ बड़े जमींदार भी होते हैं जिनका गाँव पर काफी प्रभाव होता है। गाँव में कृषक बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर कम ध्यान देते हैं। ग्रामीण स्कूलों में बच्चों के पास कपड़े भी पर्याप्त नहीं होते। बच्चों को घर व पाठशाला का काम करना पड़ता था।

प्रश्न 4:
‘लेखक की माँ उसके पिता की आदतों से वाकिफ थी।”-लेखक की माँ न लेखक का साथ किस प्रकार दिया?
उत्तर –
लेखक की माँ अपने पति के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ़ थी। वह जानती थी कि वह अपने लड़के को पढ़ाना नहीं चाहता। पढ़ाई की बात से ही वह बरहेला सुअर की तरह गुर्राता है। इसके बावजूद वह लेखक का साथ देती है और दत्ता जी राव के पास जाकर अपने पति के बारे में सारी बातें बताती है। अंत में, वह देसाई को अपने आने की बात पति को न बताने के लिए भी कहती है।

प्रश्न 5:
मत्री नामक अध्यापक पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर –
मंत्री नामक अध्यापक गणित पढ़ाते थे। वे प्राय: छड़ी का उपयोग नहीं करते थे। काम न करने वाले बच्चों की गरदन हाथ से पकड़कर उनकी पीठ पर घूसा लगाते थे। इस प्रकार से बच्चों के मन में दहशत थी। शरारती बच्चे भी शांत रहने लगे थे। ये पढ़ने वाले बच्चों को प्रोत्साहन देते थे। अगर किसी का सवाल गलत हो जाता तो वे उसे समझाते थे। एकाध लड़कों द्वारा मूर्खता करने पर उन्हें वहीं ठोंक देते थे। उनके डर से सभी बच्चे घर से पढ़ाई करके आने लगे।

प्रश्न 6:
वसंत पाटिल कौन है? लेखक ने उससे दोस्ती क्यों व कैसे की?
उत्तर –
वसंत पाटिल दुबला-पतला, परंतु होशियार लड़का था। वह स्वभाव से शांत था तथा हर समय पढ़ने में लगा रहता था। वह घर से पूरी तैयारी करके आता था तथा उसके सभी सवाल ठीक होते थे। वह दूसरों के सवालों की जाँच करता था। उसे कक्षा का मॉनीटर बना दिया गया था। लेखक भी उसकी देखा-देखी मेहनत करने लगा। उसने बस्ता व्यवस्थित किया, किताबों पर अखबारी कागज का कवर चढ़ाया तथा हर समय पढ़ने लगा। उसके सवाल भी ठीक निकलने लगे। वह भी वसंत पाटील की तरह लड़कों के सवाल जाँचने लगा। इस तरह दोनों दोस्त बन गए तथा एक-दूसरे की सहायता से कक्षा के अनेक काम करने लगे।

प्रश्न 7:
लेखक का पाठशाला में विश्वास कैसे बढ़ा? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर बताइए।
उत्तर –
जब लेखक को वसंत पाटिल के साथ दूसरे लड़कों के सवाल जाँचने का काम मिला, तब उसकी वसंत से दोस्ती हो गई। अब ये दोनों एक-दूसरे की सहायता से कक्षा के अनेक काम निपटाने लगे। सभी अध्यापक लेखक को ‘आनंदा’ कहकर बुलाने लगे। यह संबोधन भी उसके लिए बड़ा महत्वपूर्ण था। मानो पाठशाला में आने के कारण ही उसे स्वयं का नाम सुनने को मिला। ‘आनंदा’ की कोई पहचान बनी। एक तो वसंत की दोस्ती, दूसरा अध्यापकों का व्यवहार-इस कारण लेखक का अपनी पाठशाला में विश्वास बढ़ने लगा।

प्रश्न 8:
सौदलगेकर कौन थे? उनमें क्या विशेषता थी।
उत्तर –
न०वा० सौंदलगेकर लेखक के गाँव के स्कूल में मराठी पढ़ाने वाले अध्यापक थे। वे कविता बहुत अच्छे ढंग से पढ़ाते थे। पढ़ाते समय वे स्वयं रम जाते थे। उनके पास सुरीला गला, छद की बढ़िया चाल और रसिकता थी। उन्हें पुरानी व नयी मराठी कविताओं के साथ-साथ अंग्रेजी कविताएँ भी कंठस्थ थीं। उन्हें छदों की लय, गति, ताल इत्यादि अच्छी तरह आते थे। वे स्वयं भी कविता रचते थे तथा उन्हें सुनाते थे।

प्रश्न 9:
‘दत्ता जी राव की सहायता के बिना ‘जूझ’ कहानी का ‘मैं’ पात्र वह सब नहीं पा सकता था जो उसे मिला।”-टिप्पणी कीजिए।
उत्तर –
यह बात बिलकुल सही है कि दत्ता जी राव की सहायता के बिना लेखक पढ़ नहीं सकता था। यदि दत्ता जी राव लेखक के पिता को नहीं समझाते तो लेखक को कभी स्कूल नसीब न होता। वह अर्धशिक्षित ही रह जाता तथा गीत, कविता, उपन्यास न लिख पाता। उच्च शिक्षा के अभाव में उसे अपने खेतों में मजदूर की तरह आजीवन काम करना पड़ता। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उसे जमींदार के खेतों में काम भी करना पड़ता। वस्तुत: उसका जीवन ही अंधकारमय हो जाता।

प्रश्न 10:
‘जूझ’ के लेखक के मन में यह विश्वास कब और कैसे जन्मा कि वह भी कविता की रचना कर सकता है?

अथवा

‘जूझ’ कहानी के लेखक में कविता-रचना के प्रति रुचि कैसे उत्पन्न हुई?

अथवा

‘जूझ’ के लखक के कवि बनने की कहानी का वर्णन कीजिए।
उत्तर –
लेखक मराठी पढ़ाने वाले अध्यापक न.वा सौंदगलेकर की कला व कविता सुनाने की शैली से बहुत प्रभावित हुआ। उसे महसूस हुआ कि कविता लिखने वाले भी हमारे जैसे मनुष्य ही होते हैं। कवियों के बारे में सुनकर तथा कविता सुनाने की कला-ध्वनि, गति, चाल आदि सीखने के बाद उसे लगा कि वह अपने आस-पास, अपने गाँव, अपने खेतों से जुड़े कई दृश्यों पर कविता बना सकता है। वह भैंस चराते-चराते फसलों या जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। वह हर समय कागज व पेंसिल रखने लगा। वह अपनी कविता अध्यापक को दिखाता। इस प्रकार उसके मन में कविता-रचना के प्रति रुचि उत्पन्न हुई।

प्रश्न 11:
दादा ने मन मारकर अपने बच्चे को पाठशाला भेजने की बात मान तो ली, पर खेती-बाड़ी के बारे में उससे क्या-क्या वचन लिए? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर उत्तर दीजिए।

अथवा

बालक आनद यादव के पिता ने किन शतों पर उसे विद्यालय जाने दिया?
उत्तर –
दादा ने मन मारकर अपने बच्चे को स्कूल भेजने की बात मान तो ली, पर खेती-बाड़ी के बारे में उन्होंने निम्नलिखित वचन लिए

  1. पाठशाला जाने से पहले ग्यारह बजे तक खेत में काम करना होगा तथा पानी लगाना होगा।
  2. सबेरे खेत पर जाते समय ही बस्ता लेकर जाना होगा।
  3. छुट्टी होने के बाद घर में बस्ता रखकर सीधे खेत पर आकर घंटा भर ढोर चराना होगा।
  4. अगर किसी दिन खेत में ज्यादा काम होगा तो उसे पाठशाला नहीं जाना होगा।

प्रश्न 12:
‘जूझ’ कहानी की कौन-सी बात आपको सवाधिक प्रेरक लगती हैं?
उत्तर –
‘जूझ’ कहानी में हमें ‘आनंदा’ का जुझारूपन सर्वाधिक प्रेरक लगता है। वह पढ़ना चाहता है, परंतु पिता बाधक है। पिता को किसी तरह दबाव डलवाकर मनाया जाता है तो आर्थिक समस्या व काम का बोझ बाधा उत्पन्न करता है। पाठशाला का अजनबी परिवेश भी उसे परेशान करता है। लेखक इन सभी विपरीत परिस्थितियों पर जुझारूपन से नियंत्रण पाता है और स्वयं को होशियार बच्चों की पंक्ति में खड़ा पाता है।

प्रश्न 13:
कविता के प्रति रुचि जगाने में शिक्षक की भूमिका पर ‘जूझ’ कहानी के आधार पर प्रकाश डालिए।
उत्तर –
‘जूझ’ कहानी में लेखक के मन में कविताएँ रचने का प्रेरणा-स्रोत उसका शिक्षक सौंदलगेकर रहे हैं। वस्तुत: शिक्षक का दायित्व बड़ा होता है। कविता रस, लय, छद के आधार पर पढ़ाई व गाई जाती है। यदि शिक्षक का गला सुरीला है तथा उसे छद, अलंकार, लय व ताल आदि का ज्ञान होता है तो बच्चों में कविता सुनने व रचने की इच्छा जाग्रत होती है। यदि कोई बच्चा तुकबंदी करके कविता बनाता है तो शिक्षक उसे प्रोत्साहित कर सकता है। उसे कविता के संबंध में तकनीकी जानकारी दे सकता है तथा उसकी कमियों को दूर करने का सुझाव दे सकता है। अत: कविता के प्रति रुचि जगाने में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

प्रश्न 14:
‘जूझ हैं कहानी के शीर्षक काँ सार्थकता पर टिप्पर्णा लिखिए।
उत्तर –
‘जूझ‘ कहानी का शीर्षक पूर्णत : उपयुक्त है। इसमें एक किशोर के देखे और भोगे हुए गँवई जीवन के खुरदरे यथार्थ और उसके रंगारंग परिवेश क्री अत्यंत विश्वसनीय गाथा है। इसमें निम्नमध्यवर्गीय ग्रामीण समाज और लडते–जूझते किसान–मज़दूरों के संघर्ष की भी अनूठी झाँस्फी है। कहानी का नायक हर कदम पर संघर्ष करता हैं। वह बचपन में स्कूल में दाखिले के लिए संघर्ष करता है, फिर कक्षा में बच्चों को शरारतों से संघर्ष करता है तथा स्कूल में स्वय को स्थापित करने के लिए मेहनत करता है। साथ ही वह घर तथा खेत के सभी जायं करता है। इन लिब कार्यो को अपनी जुझारूपन की प्रवृन्ति रने वह कर पाता है। कविता लिखने में भी वह संघर्ष करता है। अत: यह शीर्षक लेखक के जुझारूपन को व्यक्त करता है।

II. निबंधस्ताक प्रश्न

प्रश्न 1:
किस घटना रने पता चलता है कि लेखक की माँ उसके मन काँ पांड़। समझ रही थी? ‘जूझ‘ कहानी के अमर पर बताईए।
उत्तर –
लेखक पढ़ना चाहता था और उसके पिता उसे पढाने के बजाय उससे खेत का काम, पशु चराने का काम कराना चाहते थे। पिता ने अपनी इच्छा क्रो ध्यान में रखकर ही लेखक की पकाई छुड़वा दी श्री। इसी बात रने लेखक बहुत ही परेशान रहता था। उसका मन दिन–रात अपनी पढाई जारी रखने की योजनाएँ बनाता रहता था इसी योजना के अनुसार लेखक ने अपनी माँ रने दस्ता जी राव सरकार के घर चलकर उनकी मदद रने अपने पिता को राजी करने की बात कही। भी ने लेखक का साथ देने की बात को तुरत आकार कर लिया अपने बटे की पढाई के बारे में वह दस्ताश्लेजी राब से जाकर बात भी करती है और पति रने इस बात को छिपाने का आग्रह भी करती है। इससे स्पष्ट होता है कि वह लेखक के मन की पीड़। को समझती थी।

प्रश्न 2:
‘जूझ‘ कहानी के आधार पर दस्ता जी राव की भूमिका पर प्रकाश डालिए।

अथवा

दस्ता जी राव ने लेखक की पढाई काँ समस्या का समाधान किस प्रकार किया?
उत्तर –
‘जूझ‘ कहानी में दस्ता जी राव देसाई की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। वे गाँव के जमीदार है तथा नेकदिल व उदार हैं। बच्चों व महिलाओँ पर उनका विशेष स्नेह है। वे हरेक की सहायता करते हैं। लेखक व उसकी माँ ने उम्हें अपनी पीड़। बताई तो वे पिघल गए तथा निर्णय लिया कि वे लेखक के दादा की खरी–खनैटी सुनाकर सीधे रास्ते पर लाएँगे। वे साम…दाम–दंड–भेद किसी भी तरीके से अपनी बात मनवाना चाहते के उन्होंने दादा के आने पर हाल–चाल पूल तथा बच्चे की पढाई के सबंध में बात खुलने पर उसे खूब फटकार लगाई। उनकी डाँट से दादा की विधि, बैध गई तथा उसने आनंद की पढाई के लिए सहमति दे दी।

प्रश्न 3:
कहानीकार के शिक्षित होने के सघर्ष में दस्ता जाँ राव देसाई के योगदान की ‘जूझा कहानी के आधार पर स्पष्ट किजिए।
उत्तर –
दत्ता जी राव देसाई गाँव के सम्मानित जमींदार हैं। ने नेकदिल, उदार व रोबीले हैं। कभी लेखक के पिता उन्हों के खेतों में काम करते थे। लेखक के दादा राव साहब का सम्मान करते के लेखक ने अपनी भी के साथ राव देसाई को अपनी पकाई तथा पिता के रवैये के बारे में बताया। राव साहब ने उनकी बात सुनी तथा दादा को भेजने को कहा। जैसे ही दादा घर आए, लेखक की भी ने उम्हें राव साहब के पास जाने का संदेश दिया। वहाँ पर राव साहब ने उसे खुब डाँटा। इस बीच दादा ने लेखक पर आवारागर्दी के आरोप लगाए जिनका उसने हिम्मत रने जवाब दिया राव साहब ने दादा को बच्चे को स्कूल भेजने के लिए कहा, साथ ही यह चेतावनी भी दी कि अगर वह उसे नहीं पढाएगा तो वे स्वय उसको पढ़ने का खर्चा देगे। इस पवार लेखक की पकाई में दस्ता का बहुत योगदान है।

प्रश्न 4:
‘जूझ‘ कहानी के माध्यम से लेखक ने क्या सीख दी हैं?
उत्तर –
हमारा लेखक प्रतिमा…संपन्न था, मगर छोर चराने और खेत में यानी देने तथा उपले बनाने में अपनी सारी शक्ति लगा रहा था। पढने की इच्छा भीतर–हीं–भीतर कुलबुलाती रहती थी। सभी उसे छोरे कहकर बुलाते। वह पशुओ जैसा जीवन जी रहा था जब पड़ने का अवसर मिला तो उसने कविता–पाठ करने में सबको पीछे छोड़ दिया । गणित के सवाल हल करने मैं भी उसने पा कक्षा को पीछे छोड़ दिया। सभी अध्यापक उसे ‘आनंदा‘ कहकर पुकारते थे, उरने मानो अपनी स्वय को पहचान मिल गई । उसे लगा उसके मख निकल आए हैं। वह बहुत ही खुश रहने लगा। मनुष्य के चौवन में शिक्षा का बहुत महत्त्व है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशु के समान हनैता है। इस कहानी के माध्यमसे लेखक ने यहीं सीख दी है।

प्रश्न 5:
‘जूझ‘ आत्मकथात्मक उपन्यास के मुख्य पात्र के स्वभाव की तीन विशपताआं‘ का उल्लेख र्काजिए।
उत्तर –
‘जूझ‘ कहानी का मुख्य पात्र है आनंदा‘ है। उसके स्वभाव की विशेषताएँ निम्नलिखित है –

  1. यढ़ने को इच्छा…वह पिछले डेढ वर्ष से स्कूल नहीं जा रहा था क्योकि पिता ने आगे पढाने से मना कर दिया था। इसके बावजूद उसके मन में पढ़ने की बहुत इच्छा थी। वह अपने मन की बात भी रनै कहता है तथा इस काम में दस्ता जी राव देसाई को मदद लेता है।
  2. परिश्रमी-आख्या बेहद परिश्रमी है। वह सुबह खेत पर जाता, वहाँ हैं स्कूल जाता और घर लौटकर फिर छोर चराने जाता है। वह सारा दिन काम करता है।
  3. लगनशील-आनंदा हर कार्य को तन्मयता से करता है। वह छह माह के बाद स्कूल जाता है तथा मेहनत के यल पर शीघ्र ही कक्षा के होशियार बच्चे में गिना जाता है। अपनी लगन के करण ही वह कविता भी लिखने लगता हैं।

प्रश्न 6:
” ‘जूझ‘ में गँवई जीवन के यथार्थ से जूझने का जीवंत चित्रण हैं।“-ड़स कथन पर तकेसम्मत टिप्पणी र्काजिए।
उत्तर –
‘जूझ‘ कहानी में गोई के जीवन का यथार्थ वर्णन है। पाँव के बच्चे जीवन में अनेक संघर्ष करते हैं। इस कहानी का पात्र ‘आनंदा‘ भी अपनी पकाई जारी रखने के लिए संघर्ष करता है। उसका पिता खेत के काम को पढाई रने जादा महत्त्व देता है और वह आनंदा को स्कूल में पढने नहीं भेजता। आख्या के मन में पढ़ने को ललक श्री। वह पढ़–लिखकर नौकरी पना चाहता था म परंतु पिता के डर से वह कुछ नहीं कह पाता। वह माँ को अपनी पोड़। बताता है। माँ उसकी सलाह पर गॉव के जमींदार दत्ता जी राव सरकार रने बात करती है। दस्ता जी ने आनंद के पिता को बुलाकर डॉटा तथा बच्चे क्रो पढाने के लिए कहा। पिता ने अनेक कठोर शर्तों के साथ पढाई करने की इजाजत है दी। इस तरह आनंद को सुबह से शाम तक स्कूल व खेत में काम करना पढा। वह हर कदम पर यथार्थ से जूझता रहा। अंतत: उसने सफलता प्राप्त का ली।

प्रश्न 7:
‘जूझ‘ कहानी में आपकी किस पात्र ने सबसे अधिक प्रभावित किया और क्यप्रे‘? उसकाँ चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

अथवा

‘जूझ‘ पात के आधार पर राव साहब का चरित्रडवित्रण र्काजिए।
उतार –
‘जूझ‘ कहानी में मुझे सबसे अधिक दस्ता जी राव देसाई ने प्रभावित किया उनके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं…

  1. व्यक्तिव – राव निब गाँव के सम्मानित जमींदार हैं। वे उदार, नेकदिल व रोबीले हैँ। बच्चे व महिलाओं के साथ सदूव्यवहार करते हैं।
  2. समझदार – राव साहब बेहद समझदार हैं। वे हर बात को ध्यान से सुनते है तथा फिर उसका समाधान करते हैं। लेखहुँ व उसकी भी को समस्या को सुनकर ही वे ‘दादा‘ को बुलाकर उसे बेटे को पकाने की बात समझाते ।
  3. व्यवहारिक – राव साहब व्यवहारिक हैं। वे लियम–दाम–क–मेद की नीति जानते हैं। लेखक की पढाई के बारे में खोजना के तहत उसके पिता को बुलाकर आम बातें करते हैँ। लेखक के बीच में आने पर वे उसकी पढाई के बारे में पूछते हैं। फिर सारी कहानी सुनकर उसके पिता को डाँटते भी है तथा समझाते भी जा इस तरह वे लेखक की पढाई के लिए उसे तैयार करते हैं।
  4. तर्कशील – राव साहब बेहद तर्कशील हैं। उसके तर्कों के सामने लेखक का पिता निरुत्नर हो जाता है।

प्रश्न 8:
पाठशाला पहुँचकर लेखक को किन–किन परेशानियों का सामना करना पडा?
उतार –
राव साहब के दबाव के कारण लेखक को दुबारा पढ़ने की इजाज़त मिली वह पाठशालं। पहुंचा, परंतु वहाँ उसकी गली के दो लड़को के अलावा सब अपरिचित थे। लेखक जिन्हें अपने से चुद१धहीन समझता था, अब उन्हों के साथ बैठने के लिए विवश था। उसके कपडे भी कक्षा के अनुरूप नहीं थे। उसे अपने अध्यापक का भी नहीं पता था। वह लटूठं के बने थैले में पुरानी किताबे व कापियों भरकर लाया था। यह बालुगड्री की लाल माटी के रंग में मटमैली हुई धोती और गमछा पहनकर आया था तथा अकेला या शरारती लड़के ने उसका मजाक उडाया तथा उसका गमछा छीनकर अपने सिर पर लपेटकर मास्टर की नकल करने लगा। उसने गमछा टेबल पर रख दिया । मास्टर ने गमछा देखकर पूछा कि यह किसका है? लेखक ने उसे उठाया मास्टर ने उसके बारे में पूछताछ कौ। बीच की छुटूटी में शरारती लड़के ने लेखक की छोती की काछ दी बार निकालने की कोशिश की, परंतु वह दीवार को तरफ मीठ करके छुटूटी होने तक बैठा रहा। घर जाते समय वह सीच रहा था कि लड़के उसकी खिल्ली उड़ते हैं, छोती खींचते है, गमछा खींचते हैं, ऐसे में वह केसे महँगा? इससे अच्छा है कि वह पाठशाला न जाए और खेत में ही काम करता रहे। सबेरे उठते ही वह फिर पाठशाला चला गया। औरे–धीरे उसका आत्मविश्वास और सहपाठियों रने परिचय बढ़ गया।

प्रश्न 9:
‘जूझ‘ के कथानायक का मन पाठशाला जाने के लिए वयो‘ तड़पता था? उसे की का काम अच्छा क्यों नहीं लगता आ, तकपूण‘ उतार दीजिए।
उतार –
“जूझ हैं के कथानायक का मन पाठशाला जाने के लिए इसलिए तड़पता था क्योंकि उसे शिक्षा से अत्यंत गहरा लगाव था। उसे पता था कि शिक्षा मनुष्य का सर्वागीण विकास करती है। शिक्षा रने ही व्यक्ति अपनी उन्नति के बारे में सीच सकता है तथा वह समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिक्षा व्यक्ति की उन्नति का दूवार खेलती है। उसे खेती का काम इसलिए अच्छा नहीं लगता था क्योकि उसे यह विश्वास था कि जन्म–भर खेत में काम करते रहने पर भी हाथ कुछ नहीं लगेगा। जो बाबा के समय था, वह दादा के समय नहीं रहा। यह खेती हमें गडूढे में धकेल रही है। पद जाऊँगा तो नौकरी लग जाएगी, चार पैसे हाथ में रहेंगे, विठोबा आपणा को तरह कुछ धंधा–कारोबार किया जा सकेगा ।

प्रश्न 10:
‘जूझ‘ कहानी आधुनिक किशीर–किशांरियां” की जिन जॉवन–मूल्यां” की प्रेरणा दं सकती हैं? सांदाहरण स्पष्ट कांजिए।
उतार –
‘हैँजूझ‘ कहानी आज के किशोर–किशोरियों को कई जीवन–मूल्यों की प्रेरणा है सकती हैँ। उनमें से कुछ निम्नलिखित

  1. संघर्षशीलता – किसी कार्य में सफलता माने के लिए संघर्षशील बहुत आवश्यक है। आज के किशोर– किशोरियों शॉर्टकट रास्ते पर चलकर सफलता पना चाहते हैं ताकि उन्हें कम–री–कम परिश्रम और संघर्ष करना पहुँ जबकि ‘जूझ‘ कहानी के नायक को जगह–जगह संघर्ष करना पडा।
  2. दूरवशिता – ” जूझ‘ कहानी का नायक आनंदा दूरदशी है। वह अपनी दूरदर्शिता के यल पर अपने पित्ता को राव साहब के पास भेजने में सफल हो जाता है और अपने पिता के क्रोध रने बचते हुए उन्हें अपनी पकाई के लिए राजी कर लेता है। आधुनिक किशोर–किशोरियों को भी दूरदर्शी बनना चाहिए।
  3. परिअमक्रलता – आधुनिक किशोर–किशोरियों को आनंदा के समान परिश्रमी बनना चाहिए। आनंदा पकाई के साथ खेल में कठोर परिश्रम करता है और सफलता अजित करता है।
  4. लग-शीलता – परिश्रम के अलावा किसी काम में सफलता याने के लिए लगन होना भी आवश्यक है। आख्या डंढ़ साल बाद विदूयालय जाता है और अपनी लगन रने कक्षा के होशियार बच्चों में गिना जाने लगता है। आधुनिक विहार-किशोरियों को भी लगनशील बनना चाहिए।

प्रश्न 11:
जूझा कहानी का नायक किन परिस्थितियाँ में अपनी पढाई जारी रख पाता हैं? अगर उसर्का जगह आप हांर्त तो उन विषम परिस्थितियों में किस प्रकार अपने सपने कां जीवित रख पाते?
उतार –
‘जूझ है कहानी का नायक आनंदा अर्थात लेखक की छात्रावस्था में परिस्थितियों अत्यंत विपरीत थीं। उसके पिता के लिए खेती ही सब कुछ थी। पदा–लिखाई के प्रति उसकी सोच अच्छी न थी। वे लेखक से खेती का काम करवाने के अलावा पशु चराने का काम भी करवाना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने आनंदा की पढाई छुडवा दी थी। आनंदा उनसे पकाई की बात कहते हुए भी डरता था। उसे डर था कि वे पढाई का नाम सुनते ही हद्धूडी–पसली एक कर देगे। दस्ता जी राव सरकार के समझाने पर उन्होंने आनंदा को स्कूल भेजने की स्वीकृति तो है बी, पर यह भी शर्त रख दी कि प्रतिदिन शाम को खेत पर काम करने जरूर आएगा। “हाँ यहि नहीं आया किसी दिन तो देख, गाँव मेंजहाँ मिलेगा यहीं कुचलता हूँ कि नहीं, तुझे। तेरे उपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है, बालिस्टर नहीं होने वाला है तू?” इसके अलावा लेखक का दाखिल पाँचवीं कक्षा में हुआ, जहाँ दो लड़कों को छोड़कर बाकी सारे लड़के नए थे। उनमें शरारती लड़के उसका मजाक उडाते थे और उसका गमछा छीनकर अध्यापक की मेज़ यर रख देते के मध्यातर की छुटूटी में बच्चों ने उसकी धोती खेलकर उसे तंग करने का प्रयास किया, फिर भी लेखक अत्यंत परिश्रम से अपनी पढाई के पति समर्पित रहा। यदि लेखक को जगह मैं होता तो इन परेशानियों और विपरीत परिस्थितियों के बांच मैं भी लेखक की तरह अडिग रहता और अपनी पढाई के प्रति कठिन मेहनत करते हुए अपने सपनों को जीवित रखने का हरसंभव प्रयास करता और सफलता प्राप्त करना।

III. मूल्यपरक प्रश्न 

प्रश्न 1:
निम्नलिखित गतूया‘शों तथा इनपर खाद्यारित प्रश्नोत्नरों को ध्यानपूर्वक पढिए –

(अ) पाठशाला जाने के लिए मन तड़पता था। लेकिन दादा के सामने खहै होकर यह कहने को हिम्मत नहीं होती कि “मैं पढ़ने जाऊँगा।” डर लगता था कि हडूडी–पसली एक कर देगा। इसलिए मैं इस ताक में रहता कि कोई दादा को समझा दे। मुझे इसका विश्वास था कि जन्म–भर खेत में काम करते रहने पर भी हाथ कुछ नहीं लगेगा। जो बाबा के समय था, वह पापा के समय नहीं रहा। यह खेती हमें गइढे में धकेल रही है। पढ़ जाऊँगा तो नौकरी लग जाएगी, चार पैसे हाथ में रहेगें, विठोबा आपणा की तरह कुछ धंधा–कारोबार किया जा सकेगा। अंदर…ही–अंदर इस तरह के विचार चलते रहते।
प्रश्न:

  1. पढाई के प्रति दादा की सांच और व्यवहार कां उम कितना उक्ति मानते की उनके इस व्यवहार से बच्चे में मूल्यां” का कितना विकास हो सकेगा?
  2. “जो बाबा के समय था, वह दादा के अभय नहीं रहा। “-ड़सके आलांक में बताइए वि, इस परिवत‘न से हमारे मृत्य कितने प्रभावित हुए हँ?
  3. अमर लेखक की जगह होते तो क्या करने? क्या आप भी अपनी पढाई पर एसा हो जवार देने?

उतार –

  1. पढाई के प्रति दादा की सोच और व्यवहार को मैं एकदम अनुचित मानता हूँ। पढाई की बात करते ही वे बच्चे की बुरी तरह मिटाई कर दिया करते के इस प्रकार के व्यवहार से बच्चों में भय, कुटा, चिड़चिकापन आदि बढेगा जिससे मूल्यों का विकास नहीं, हास होगा।
  2. परिवर्तन का प्रभाव हमारे आस-पास को प्रत्येक वस्तु पर पइ। है, फिर मानवीय मूल्य ही इससे अछूते केसे रहते। इसका प्रभाव यह है कि हमारे मूल्यों में गिरावट आई है।
  3. मैं लेखक की जगह होता तो अपने पिता से विनम्रतापूर्वक पकाई करने को अनुमति माँगता। उन्हें अच्छा व प्रसन्न देखकर पढाई के लाभ बताता और पाठशाला जाने का हर संभव प्रयास करता। मैं ऐसा इसलिए करता क्योकिहैशिक्षा से मानवीय मूल्यों, जैसे–सच्चई सख्या, सत्यवादिता, दृढ़ता अरि–का उदय एवं विकास होता ।

(ब) उठते-उठते मैंने भी दत्ता जी राव से कहा, ‘अब जनवरी का महीना है। अब परीक्षा नजदीक आ गई है। मैं यदि अभी भी कक्षा में जाकर बैठ गया और पढ़ाई की दुहराई कर ली तो दो महीने में पाँचवीं की सारी तैयारी हो जाएगी और मैं परीक्षा में पास हो जाऊँगा। इस तरह मेरा साल बच जाएगा। अब खेती में ऐसा कुछ काम नहीं है। मेरा पहले ही एक वर्ष बेकार में चला गया है।”“ठीक है, ठीक है। अब तुम दोनों अपने घर जाओ-जब वह आ जाए तो मेरे पास भेज देना और उसके पीछे से घड़ी भर बाद में तू भी आ जाना रे छोरा।” “जी!” कहकर हम खड़े हो गए। उठते-उठते हमने यह भी कहा कि “हमने यहाँ आकर ये सभी बातें कही हैं, यह मत बता देना, नहीं तो हम दोनों की खैर नहीं है। माँ अकेली साग-भाजी देने आई थी। यह बता देंगे तो अच्छा होगा।”
प्रश्न:

  1. लखक और उसकी माँ का दत्ता जी के पास जाने को आप कितना उचित मानते हैं? इससे लेखक के किन-किन मूल्य के बारे में पता चलता है?
  2. एक ओर पति से चोरी और दूसरी ओर बच्चे की शिक्षा। ऐसे में माँ द्वारा बच्चे की शिक्षा चुनने को आप कितना उचित मानते हैं और क्यों?
  3. पिता की पिटाई से बचने के लिए बच्चे ने झूठ का सहारा लिया। उसकी जगह आप होते तो कैसे बचते? ऐसा करने के लिए आप किन-किन मूल्यों का सहारा लेते?

उत्तर –

  1. लेखक और उसकी माँ का दत्ता जी के पास जाने को मैं पूरी तरह से उचित मानता हूँ क्योंकि उनके इसी कदम पर बच्चे का भविष्य निर्भर था। उनके इस निर्णय से लेखक की लगन, दृढ़निश्चय, साहस, स्पष्टवादिता जैसे मूल्यों का पता चलता है।
  2. लेखक की माँ का लेखक के साथ दत्ता राव के पास अपने पति को बिना बताए जाने को मैं एकदम सही मानता हूँ क्योंकि शिक्षा से बच्चे का भविष्य उज्ज्वल बनता तथा उसमें अनेक मूल्यों का विकास होता।
  3. पिता की पिटाई से बचने के लिए बच्चे ने जो झूठ का सहारा लिया था, मैं वैसा न करता। मैं दत्ता राव की सहायता से पिता जी को यह समझाने का प्रयास करता कि पढ़ाई के द्वारा ही हमारा और आपका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। इसके लिए मैं साहस, ईमानदारी, सच्चाई जैसे जीवन-मूल्यों का सहारा लेते हुए दत्ता राव से सच-सच बताने की कहता।

(स) “हाँ, यदि नहीं आया किसी दिन तो देख, गाँव में जहाँ मिलेगा वहीं कुचलता हूँ कि नहीं, तुझे। तेरे ऊपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है, बालिस्टर नहीं होने वाला है तू?” दादा बार-बार कुर-कुर कर रहा था-मैं चुपचाप गरदन नीची करके खाने लगा था। रोते-धोते पाठशाला फिर से शुरू हो गई। गरमी-सरदी, हवा-पानी, वर्षा, भूख-प्यास आदि का कुछ भी खयाल न करते हुए खेती के काम की चक्की में, ग्यारह से पाँच बजे तक पिसते रहने से छुटकारा मिल गया। उस चक्की की अपेक्षा मास्टर की छड़ी की मार अच्छी लगती थी। उसे मैं मजे से सहन कर लेता था। दोपहरी-भर की कड़क धूप का समय पाठशाला की छाया में व्यतीत हो रहा था-गरमी के दो महीने आनंद में बीत गए।
प्रश्न:

  1. ‘बालिस्टर होने वाला नहीं हैं तू’-आपके विचार से दादा ने ऐसा क्यों कहा होगा? आप उनके कथन से कितना सहमत हैं?
  2. लखक की जगह आप होते तो पढ़ाई के प्रति आपका क्या दूष्टिकोण होता और क्यों?
  3. लखक के विचार आज के सदर्भ में कितने प्रासगिक हैं, बताइए। इनकी पुष्टि में किसका, योगदान था?

उत्तर –

  1. ‘बालिस्टर होने वाला नहीं है तू-ऐसा लेखक के दादा ने इसलिए  कहा होगा, ताकि लेखक अपने मन से पढ़ाई का विचार बिल्कुल निकाल दे। उनके इस विचार से मैं बिलकुल सहमत नहीं हूँ क्योंकि इससे बच्चों के मानवीय मूल्यों में प्रगाढ़ता नहीं आती बल्कि उनका विकास बाधित होता है।
  2. यदि मैं लेखक की जगह होता तो मैं भी दृढ़ इच्छा-शक्ति, लगन और विश्वास के साथ पढ़ाई के बारे में सोचता और पढ़ाई आगे बढ़ाता। क्योंकि शिक्षा से मनुष्य योग्य एवं समाजोपयोगी बनता है।
  3. शिक्षा के बारे में लेखक का जो विचार हैं वे आज के समय में और भी प्रासंगिक हैं। आज बच्चे शिक्षा से मुँह मोड़ रहे हैं। यह जीवन-मूल्यों के विकास की दृष्टि से अच्छा नहीं है। लेखक में ऐसे विचार पुष्ट करने में दत्ता जी का योगदान था।

प्रश्न 2:
लेखक के दादा का पढ़ाई के प्रति जो दृष्टिकोण था उसे आप कितना उपयुक्त पाते हैं? ऐसे लोगों के दृष्टिकोण में बदलाव लाने के लिए आप क्या प्रयास कर सकते हैं?
उत्तर –
लेखक चाहता था कि वह भी अन्य बच्चों के साथ पाठशाला जाए, पढ़ाई करे और अच्छा आदमी बने। पाठशाला जाने के लिए उसका मन तड़पता था, पर उसके दादा का पढ़ाई के प्रति दृष्टिकोण स्वस्थ न था। वे चाहते थे कि लेखक पढ़ाई करने की बजाय खेती में काम करे और जानवरों को चराए। किसी दिन खेत में काम करने के लिए न जाने पर वे लेखक को बुरी तरह डाँटते। एक बार वे लेखक से कह रहे थे, “हाँ, यदि नहीं आया किसी दिन तो देख, गाँव में जहाँ मिलेगा, वही कुचलता हूँ कि नहीं, तुझे। तेरे ऊपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है, बालिस्टर नहीं होने वाला है तू?” बच्चे को पढ़ाई से विमुख करने वाला, बच्चों की शिक्षा में बाधक बनने वाला ऐसा दृष्टिकोण किसी भी कोण से उपयुक्त नहीं है। ऐसे लोगों का दृष्टिकोण बदलने के लिए मैं निम्नलिखित प्रयास करूंगा –

  1. लेखक के दादा जैसे लोगों को शिक्षा का महत्त्व बताऊँगा।
  2. शिक्षा से वंचित बच्चे मजदूर बनकर रह जाते हैं। यह बात उन्हें समझाऊँगा।
  3. शिक्षा व्यक्ति के जीविकोपार्जन में साधन का कार्य करती है। इस तथ्य से उन्हें अवगत कराऊँगा।
  4. पढ़े-लिखे सभ्य लोगों के उन्नत जीवन का उदाहरण ऐसे लोगों के सामने प्रस्तुत करूंगा।

प्रश्न 3:
आज भी समाज को दत्ता जी राव जैसे व्यक्तित्व की आवश्यकता है। इससे आप कितना सहमत हैं और क्यों?
उत्तर –
यदि आप दत्ता जी राव की जगह होते तो क्या करते? उत्तर दत्ता जी राव नेक दिल, उदार एवं गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वे बच्चों एवं महिलाओं से विशेष स्नेह करते थे। वे हरेक व्यक्ति की सहायता करते थे। लेखक और उसकी माँ ने जब उनको अपनी पीड़ा बताई तो शिक्षा के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण रखने वाले दत्ता राव जी ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया और लेखक के दादा को बुलवाया। जब वे राव जी के पास गए तो उन्होंने बच्चे को स्कूल न भेजने के लिए दादा जी को खूब डाँटा-फटकारा। उन्होंने बच्चे का भविष्य खराब करने की बात कहकर बच्चे को स्कूल भेजने का वायदा ले लिया और स्कूल न भेजने पर लेखक को पढ़ाने का जिम्मा स्वयं लेने की बात कही। राव जी की डाँट से लेखक के दादा कुछ न कह सके और पढ़ाई के लिए स्वीकृति दे दी। इसके बाद लेखक स्कूल जाने लगा। आज भी बहुत-से बच्चे विभिन्न कारणों से स्कूल का मुँह देखने से वंचित हो जाते हैं या पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए राव जी जैसे व्यक्तित्व की आज भी आवश्यकता है। इससे मैं पूर्णतया सहमत हूँ। इसका कारण यह है कि इससे बच्चे पढ़-लिखकर योग्य और समाजोपयोगी नागरिक बन सकेंगे। वे पढ़-लिखकर देश की उन्नति में अपना योगदान दे सकेंगे। यदि मैं दत्ता जी राव की जगह होता तो लेखक को स्कूल भेजने के लिए हर संभव प्रयास करता और फिर भी उसके दादा उसे स्कूल भेजने के लिए न तैयार होते तो मैं लेखक को अपने पास रखकर पढ़ाता और उसकी हर संभव मदद करता।

प्रश्न 4:
सौंदलगेकर के व्यक्तित्व ने लेखक को किस प्रकार प्रभावित किया? आप उनके व्यक्तित्व की कौन-कौन-सी विशेषताएँ अपनाना चाहेंगे?
उत्तर –
सौंदलगेकर एक अध्यापक थे जो लेखक के गाँव में मराठी पढ़ाया करते थे। वे कविताओं को बहुत अच्छी तरह से पढ़ाते थे और कथ्य में खो जाते थे। उनके सुरीले कंठ से निकली कविता और भी सुरीली हो जाती थी। उन्हें मराठी के अलावा अंग्रेजी कविताएँ भी जबानी याद थीं। वे स्वयं कविता की रचना करते थे और छात्रों को सुनाया करते थे। लेखक उनकी इस कला और कविता सुनाने की शैली से बहुत प्रभावित हुआ। इससे पहले लेखक कवियों को किसी दूसरी दुनिया का जीव मानता था पर सौंदलगेकर से मिलने के बाद जाना कि इतनी अच्छी कविता लिखने वाले भी हमारे-उसके जैसे मनुष्य ही होते हैं। अब लेखक को लगा कि वह भी उनकी जैसी कविता गाँव, खेत आदि से जुड़े दृश्यों पर बना सकता है। वह भैंस चराते-चराते फसलों और जानवरों पर तुकबंदी करने लगा। वह राह चलते तुकबंदी करता और उसे लिखकर अध्यापक को दिखाता। बाद में निरंतर अभ्यास से वह कविता लिखना सीख गया। इस प्रकार लेखक को सौंदलगेकर के व्यक्तित्व ने बहुत प्रभावित किया और उसमें कविता-लेखन की रुचि उत्पन्न कर दी। मैं सौंदलगेकर के व्यक्तित्व की अपने कार्य के प्रति समर्पित रहने, दूसरों को प्रोत्साहित करने, यथासंभव दूसरों की मदद करने जैसी विशेषताएँ अपनाना चाहूँगा।

स्वयं करें

प्रश्न:

1.निम्नलिखित गदयांशों को पढ़कर पूछे गए मूल्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

(अ) सवेरे बैठे हो जाने पर मैं उमंग में था-फिर से पाठशाला चला गया। माँ के पीछे पड़कर एक नयी टोपी और दो नाड़ी वाली चड्डी मैलखाऊ रंग की आठ दिन में मैंगवा ली। चड्डी पहनकर पाठशाला में और धोती पहनकर खेत पर जाना शुरू हुआ। धीरे-धीरे लड़कों से परिचय बढ़ गया। मंत्री नामक मास्टर कक्षा-अध्यापक के रूप में बीच में आए। वे प्राय: छड़ी का उपयोग नहीं करते थे। हाथ से गरदन पकड़कर पीठ पर घूसा लगाते थे। पीठ पर एक जोर का बैठते ही लड़का हूक भरने लगता। लड़कों के मन में उनकी दहशत बैठी हुई थी। इसके कारण ऊधम करने वाले लड़कों को प्राय: मौका नहीं मिलता था। पढ़ने वाले लड़कों को शाबाशी मिलने लगी। मंत्री मास्टर गणित पढ़ाते थे। एकाध सवाल गलत हो जाता तो उसे वे अपने पास बुलाकर समझा देते। एकाध लड़के की कोई मूर्खता दिखाई दी तो वे उसे वहीं ठोंक देते। इसलिए सभी का पसीना छूटने लगता। सभी लड़के घर से पढ़ाई करके आने लगे।

  1. लेखक के उन जीवन-मूल्यों का उल्लेख कीजिए जिनके कारण सताए जाने पर भी उसने विद्यालय जाना बद नहीं किया।
  2. मत्री नामक मास्टर के पढ़ाने के ढग को आप कितना सही मानते हैं? आपके विचार से पढ़ाई को आकर्षक बनाने के और कौन-कौन-से तरीके हो सकते थे?
  3. यदि लेखक की जगह आप होते तो क्या करते-पढ़ाई जारी रखते या छोड़ देते? इसके लिए आप अध्यापक कं व्यवहार की कितना उत्तरदायी मानते?

(ब) कभी-कभी वसंत पाटील के साथ-साथ, एक तरफ़ से वह तो दूसरी तरफ़ से मैं लड़कों के सवाल जाँचने लगा। इसके कारण मेरी और वसंत की दोस्ती जम गई। एक-दूसरे की सहायता से कक्षा में हम अनेक काम करने लगे। मास्टर मुझे ‘आनंदा’ कहकर बुलाने लगे। मुझे पहली बार किसी ने ‘आनंदा’ कहकर पुकारा। माँ कभी ‘आनंदा’ कहती, परंतु बहुत कम। मास्टरों के इस अपनेपन के व्यवहार के कारण और वसंता की दोस्ती के कारण पाठशाला में मेरा विश्वास बढ़ने लगा। न०वा० सौंदलगेकर मास्टर मराठी पढ़ाने आते थे। पढ़ाते समय वे स्वयं रम जाते थे। विशेषत: वे कविता बहुत ही अच्छे ढंग से पढ़ाते थे। सुरीला गला, छंद की बढ़िया चाल और उसके साथ ही रसिकता भी उनके पास। पुरानी-नयी मराठी कविताओं के साथ-साथ उन्हें अनेक अंग्रेजी कविताएँ कंठस्थ थीं। अनेक छदों की लय, गीत, ताल उन्हें अच्छी तरह आते थे। पहले वे एकाध कविता गाकर सुनाते थे-फिर बैठे-बैठे अभिनय के साथ कविता का भाव ग्रहण कराते। उसी भाव की किसी अन्य कवि की कविता भी सुनाकर दिखाते। बीच में कवि यशवंत, बा०भ० बोरकर, भा०रा० ताँबे, गिरीश, केशव कुमार आदि के साथ अपनी मुलाकात के संस्मरण सुनाते। वे स्वयं भी कविता करते थे।

  1. किसी को मित्र बनाने में हमारे मानवीय मूल्यों का कितना योगदान होता है? आपके विचार से लेखक और वसत की दोस्ती क्यों जम गई होगी?
  2. उन कारणों का उल्लेख कीजिए जिनसे लखक का मन पाठशाला में लगने लगा। आप अपना मन पाठशाला
    में लगाने के लिए क्या करते हैं?
  3. यदि आप सौंदलगकर की जगह होते तो अपने शिक्षण को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए क्या-क्या उपाय अपनाते? किन्हीं दो का उल्लेख कीजिए।

2.अपनी पढ़ाई के संबंध में लेखक अपने पिता से बात क्यों नहीं कह पाता था?
3.पढ़ाई के बारे में लेखक की क्या सोच थी?
4.लेखक के पिता कोल्हू जल्दी क्यों चलाना चाहते थे?
5. लेखक की क्या प्रतिक्रिया थी?
6. दत्ता के पिता ने उसकी पढ़ाई रोकने के कौन-कौन-से कारण दत्ता जी राव को बताए?
7. लेखक को मास्टर की छड़ी की मार अच्छी क्यों लगती थी?
8. लेखक को कविता करने के पंख कब निकले?
9. ‘जूझ’ पाठ के दत्ता जी राव का पढ़ाई-लिखाई के प्रति क्या दृष्टिकोण था? स्पष्ट कीजिए।
10. लेखक के दादा के स्वभाव का वर्णन ‘जूझ’ पाठ के आधार पर कीजिए।