प्रथमः पाठः विद्ययाऽमृतमश्नुते

(1) संस्कृतभाषाया उत्तरं लिखत ।

(क ) ईशावास्योपनिषद् कस्याः संहिताया: भागः ?

उत्तर – ईशावास्योपनिषद् यजुर्वेदस्य संहितायाः भागः ।

( ख ) जगत्सर्वं कीदृशम् अस्ति: ?

उत्तर – जगत्सर्वं ईशावास्यम् अस्तिः ।

( ग ) पदार्थभोगः कथं करणीयः ?

उत्तर – पदार्थभोगः त्यागभावेन करणीय ।

( घ ) शतं समाः कथं जिजीविषेत् ?

उत्तर – शत समाः कर्माणिकुर्वण विजीविशेत।

(ङ) आत्महनो जनाः कीदृशं लोकं गच्छन्ति ?

उत्तर – आत्मनो जनाः असूर्यानाम् लोकं गच्छन्ति ।

( च ) मनसोऽपि वेगवान् कः?

उत्तर – मनसोऽपि वेगवान् आत्मा अस्ति ।

( छ ) तिष्ठनपि कः धावतः अन्यान् अत्येति ?

उत्तर – तिष्ठन्नपि परमात्मा धातवः अन्यान् अत्येति ।

( ज ) अन्धन्तम: के प्रविशन्ति ?

उत्तर – ये अविद्यां उपासते ते अन्धन्तम: प्रविशन्ति ।

( झ) धीरेभ्यः ऋषय किं श्रुतवन्त: ?

उत्तर – धीरेभ्य: ऋषयः चत विद्यया अन्यतम् फलम् भवति ।

( ञ) अविद्यया किं तरति ?

उत्तर – अविद्यया मृत्युं तरति ।

(ट) विद्यया किं प्राप्नोति? उत्तर – विद्यया अमृतं प्राप्नोति । 

( 2 ) ‘ईशावास्यम् ……. कस्यस्विद्धनम् ‘ इत्यस्य भावं सरलसंस्कृतभाषाया विशदयत ।

उत्तर – सर्वम् इंद जगत् परमात्मानाः आच्छादितम् अतः हे नर: ! जगतः पदार्थान् त्यागेन् उपभुञ्जीथा: ।

कस्यस्वितद् धनस्य लालसा: मा कुरु ।

( 3 ) ‘ अन्धन्तम: प्रविशति ……. विद्यायां रताः ‘ इति मन्त्रस्य भावं हिन्दीभाषया आंग्लभाषया वा विशदयत ।

उत्तर – प्रस्तुत मंत्र हमारी संस्कृत पाठ्यपुस्तक शाश्वती भाग 2 के प्रथम पाठ विद्ययाऽमृतमश्नुते से ली गई हैं । यह पाठ ईशावास्योपनिषत् से संकलित हैं। यह उपनिषत् यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का भाग है। इस मंत्र का भाव यह स्पष्ट होता है कि जो लोग अविद्या की उपासना करते है वे घोर अंधकार में प्रवेश करते है, और जो विद्या में ही रमण करते है वे मानो उससे भी अधिक घोर अंधकार में प्रवेश करते है । इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी मनुष्य को व्यवहारिक ज्ञान और अध्यात्मिक ज्ञान दोनों से परिपूर्ण होना अतिआवश्यक है ।

( 4 ) ‘ विद्यां चाविद्यां च …….ऽ मृतमश्नुते ‘ इति मन्त्रस्य तात्पर्यं स्पष्ट्यत ।

उत्तर – जो विद्या और अविद्या इन दोनों को ही एक साथ जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार कर विद्या से अमरत्व को प्राप्त कर लेता है ।

 ( 5 ) रिक्तस्थानानि पूरयत ।

( क) इदं सर्वं जगत् ईशावास्यम् ।

( ख ) मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ।

(ग) शतं समाः कर्माणि कुर्वन् जिजीविशेत् ।

(घ) असुर्या नाम लोका अन्धेन् तमसा आवृता: ।

(ड) अविद्योपासका: अन्धतमः प्रविशन्ति ।

( 6 ) अधोलिखितानां सप्रसङ्ग हिंदीभाषाया व्याख्या कार्या – 

( क ) तेन त्यक्तेन म भुञ्जीथा: ।

व्याख्या – प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्य पुस्तक शाश्वती भाग दो के प्रथम पाठ विद्याऽमृतमश्नुते से ली गई है । प्रस्तुत पाठ ईशावास्योपनिषत् से संकलित है। यह उपनिषत् यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40 वॉ अध्याय है जिसमें 18 मंत्र है । इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि सभी को ईश्वर की देन समझकर उसका त्याग भाग से भोग करना चाहिए । यह परमात्मा के द्वारा यह संसार व्याप्त है । इस संसार का स्वामी परमात्मा है। संसार मे जो भी पदार्थ है परमात्मा द्वारा ही अच्छादित है । 

(ख) न कर्मं लिप्यते नरे ।

व्याख्या – प्रसुत पंक्ति हमारी पाठ्य पुस्तक शाश्वती भाग दो के प्रथम पाठ विद्यायाऽमृतमश्नुते से ली गई है । प्रस्तुत पाठ ईशावास्योपनिषत् से संकलित है । यह उपनिषत् यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40 वॉ अध्याय है जिसमे 18 मंत्र है । इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि अगर मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति से अपना कर्म करता है तो वह कर्म के बंधन में लिप्त नहीं रहता है। जिस प्रकार मनुष्य को अपना कर्म करते रहना चाहिए बैठकर अपना समय पार नहीं करना चाहिए ।

(ग) तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ।

व्याख्या – ( भूमिका ) परमात्मा में ही वायु जल को धारण करता है । 

( घ ) अविद्यया मृत्युं तीत्वां विद्ययाऽमृतमश्नुते ।

व्याख्या – ( भूमिका ) – मनुष्य अविद्यया के द्वारा मृत्यु को पार करता है और विद्या के द्वारा अमृत को प्राप्त कर लेता है ।

(ङ) एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति ।

व्याख्या – (भूमिका ) जो मनुष्य अपने कत्तव्यों द्वारा अपना कर्म करता है । उसे अनाशक्ति भाव से कर्म करना चाहिए । उस प्रकार जीवन मुक्त हो जाता है । इस इस प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए इसके सिवा और कोई मार्ग नहीं है।

( च ) तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ।

व्याख्या – ( भूमिका) – जो कोई भी आत्मा का हनन करते हैं वे आत्मघाती जीव मरने के अनतर उन्हीं लोको में यानी असुर संबंधी लोकों में जाते है । आत्मा के विरुद्ध आचरण करने वाले वह निश्चित रूप से प्रेत लोक में जाते है ।

( छ ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्वेवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।

व्याख्या – ( भूमिका ) – यह जो परमात्मा है वह कम्पन् रहित है इन्द्रिया भी उसे प्राप्त नहीं कर सकता है क्योंकि उन सबसे पहले गाया गया है।

( 8 ) प्रकृतिं प्रत्ययं च योजयित्वा पदरचनां कुरुत –

त्यज +क्तः = व्यक्तः ( छोड़ दिया )

कृ +शतृ = कुर्वन् ( करते हुए )

तत् + तर्सिल् = ततः ( उसके बाद )

(9) प्रकृतिप्रत्ययविभाग: क्रियताम् –

प्रेत्य = प्र+ इ (धातु) , ल्यप् प्रत्यय

तीर्त्वा = त्री + कत्वा

धावतः = धाव + शतृ

तिष्ठत् = शता + शतृ

जवीय = जव न इयशुन

(10) अधोलिखितानि पदानि आश्रित्य वाक्यरचनां कुरुत –

जगत्यां = जगत्यां अनेक ग्रहाः उपग्रहाः च सन्ति ।

धनम् = कस्यस्विद् धनम् मा गृध ।

भुञ्जीथा: = जगतः भोगान् त्यागभावेन भुञ्जीथाः ।

शतम् = कमार्णि कुर्वन शतम् समा जिजीविशेत् ।

कर्माणि = सदा शुभानि कर्माणि एव कुर्यात् ‘

तमसा = एतत् कोपम् तमसा आवृतम् अस्ति ।

त्वयि = त्वयि कः स्नेहति ।

विद्यायाम् = प्राय: योगिनः विद्यायाम् एव रताः भवन्ति ।

भूयः = सः आगत्य: भूयः गच्छत ।

समाः = समाः वर्षाणि सवाचारिणः जनाः शतं समाः जिवन्ति ।

( 11 ) सन्धिं सन्धिविच्छेदं वा कुरुत ।

(क ) ईशावास्यम् = ईश + आवास्यम्

( ख) कुर्वन्नेवेह = कुर्वन + एव + ईह

( ग) जिजीविषेत + शतं = जिजीविषेतछतं

(घ) तत् + धावतः = तदधावतः

(ङ) अनेजत् + एकं = अनेजदकं

(च ) आहु: + अविद्यया = आयुर्विद्यया

( छ ) अन्यथेतः = अन्यथा + इतः

( ज ) तांस्ते = तान + ते

( 12 ) अधोलिखितानां समुचितं योजनं कुरुत –

                धनम———- वित्तम्

                समाः——— वर्षाणि

                असुर्या: ——तमसाऽऽवृताः

                आत्महनः——– आत्मानं ये घ्नन्ति

                मातरिश्वा——– वायुः

                शुश्रुम———– श्रुतवन्तः स्म

                अमृतम् ——– अमरतां

(13) अधोलिखितानां पदानां पर्यायपदानि लिखत –

                   नरे – मनुष्ये

                   ईश: – परमात्मा

                   जगत् – संसार

                   कर्म – कार्यम्

                   धीराः – विध्वास:

                  विद्या – अध्यात्मिक विद्या

                  अविधा – व्यवहारिक विद्या

( 14 ) अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि लिखत –

                    एकम – अनेकम्

                    तिष्ठत् – धावत

                     तमसा – प्रकाशेन

                    उभयम् – एकम्

                     जवीयः – धीरे – धीरे

                     मृत्युम् – अमृतम्

                                 इति

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