प्रश्न-अभ्यास

नौबतखाने में इबादत

1. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है?

उत्तर अमीरुद्दीन अर्थात् बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डुमराँव, बिहार के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। शहनाई और डुमराँव दोनो एक-दूसरे के पर्याय

हैं। शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है। रीड अंदर से पोली होती है, जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। यह रीड डुमराँव में सोन नदी के तट पर पाया जाता है। डुमराँव का महत्त्व इस कारण है कि यहाँ शहनाई जैसा वाद्य बजता है। फिर हम सबके प्रिय अमीरुद्दीन यानि उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ हैं। उनका जन्म-स्थान भी डुमराँव है। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव निवासी थे। बिस्मिल्ला खाँ उस्ताद पैगंबर बख्श खाँ और मिट्टन के छोटे साहबजादे हैं।

  1. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?

उत्तर शहनाई मंगल ध्वनि का वाद्य है। बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक कहा जाता है। वे सुरों के सच्चे साधक थे। अस्सी बरस की सुर साधना के बाद भी उनको लगता रहता था कि अभी उनके शहनाई वादन में कुछ कमी रह गई है। वे साधना में इतने लीन हो जाते थे कि अपनी सुध-बुध खो देते थे। उनके सुरों में वो जादू था कि सुनने वाले मदहोश हो जाते थे। वे काशी के विश्वनाथ, बालाजी मंदिर में शहनाई पर मंगल ध्वनि बजाते थे और खुदा से भी ऐसे सुर की प्रार्थना करते थे, जिससे लोगों का जीवन मंगलकारी हो।

3. सुषिर वाद्यों से क्या अभिप्राय है? शहनाई को 'सुषिर वाद्यों में शाह' की

 उपाधि क्यों दी गई होगी?

उत्तर सुषिर वाद्यों से अभिप्राय है-ऐसे वाद्य जिन्हें मुँह से पूँककर बजाया जाता है। यह वाद्य छेद वाला तथा अंदर से खोखला होता है।

शहनाई को सुषिर वाद्य माना जाता है क्योंकि इसे भी मुँह से फूँककर बजाया जाता है। इस वाद्य में रीड (नरकट) होती है। इसी के सहारे शहनाई को फूँका जाता है।

शहनाई को 'शाहेनय' अर्थात् 'सुषिर वाद्यों में शाह' की उपाधि दी गई है। यह वाद्य सुषिर वाद्यों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

4. आशय स्पष्ट कीजिए

(क) 'फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।'

(ख) 'मेरे मालिक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।'

उत्तर (क) जब एक शिष्या ने उस्ताद बिरिमल्ला खाँ को फटी लुंगी (तहमद)

पहनकर लोगों से मिलने पर टोका, तब उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ने कपड़ों को महत्त्व न देकर सुर की महत्ता दर्शायी। वे खुदा से यही विनती करते थे कि उन्हें फटा सुर न दे। फटा सुर होगा तो संगीत के क्षेत्र में कोई पूछने वाला नहीं। फटा कपड़ा तो सिल सकता है परंतु फटा सुर नहीं। आज गरीबी है तो कल समृद्धि हो जाएगी परंतु शहनाई की कला में कमी नहीं आनी चाहिए।

(ख) सुरों में वह ताकत होती है कि व्यक्ति इतना भाव-विभोर हो जाता है कि उसकी आँखों से आँसू निकल आते हैं। ये आँसू सच्चे मोती की तरह होते हैं। इनके निकल आने पर सुर की परीक्षा हो जाती है। बिस्मिल्ला खाँ नमाज के बाद सजदे में खुदा से ऐसे सुर की ही माँग करते हैं। वे सुर को खुदा की नेमत मानते थे। उनके लिए सुरों से बढ़कर कोई चीज कीमती नहीं।

5. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?

उत्तर काशी में पुरानी परंपराएँ लुप्त हो रही हैं। खान-पान की पुरानी चीजें और विशेषताएँ नष्ट होती जा रही हैं। मलाई बरफ वाले लुप्त हो गए हैं। कुलसुम की छन्न करती संगीतात्मक कचौड़ी और देशी घी की जलेबी आज नहीं रही। न ही संगीत, साहित्य और अदब का वैसा मान रह गया है। हिन्दू और मुसलमानों का पहले जैसा मेलजोल अब नहीं रहा, उनकी एकता को भंग करने के षड्यंत्र चलते रहते हैं। अब गायकों के मन में संगीतकारों के लिए वैसा मान नहीं रहा। ये सब बातें बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करती हैं।

6. पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि

(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।

(ख) वे वास्तविक अर्थों में सच्चे इंसान थे।

उत्तर (क) बिस्मिल्ला खाँ को मुस्लिम धर्म, उत्सवों एवं त्योहारो में गहरी आस्था थी। वे पाँचों समय नमाज अदा करते थे और मुहर्रम बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते थे। लेकिन इन सबके बावजूद वे जीवन-भर काशी, विश्वनाथ एवं बालाजी के मंदिर में शहनाई बजाते रहे। काशी से बाहर रहते हुए भी वे बालाजी के मंदिर की ओर मुँह करके प्रणाम किया करते थे। दोनों धर्मों के प्रति उनकी सच्ची एवं गहरी आस्थापूर्ण भावना के कारण कहा जा सकता है कि वे मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।

(ख) बिस्मिल्ला खाँ ने कभी धार्मिक कट्टरता, क्षुद्रता एवं तंगदिली नहीं दिखाई। वे काशी में रहकर काशी की परंपराओं को निभाते रहे। उन्होंने कभी खुदा से धन-समृद्धि नहीं माँगी। वे जीवन भर फटेहाल सरल एवं नेकदिल बने

रहे। ऊँचे-से-ऊँचे सम्मान पाकर भी वे हमेशा सरल बने रहे और स्वयं को सामान्य इंसान समझा। उन्होंने हमेशा मानव मात्र की भावनाओं का सम्मान किया।

  1. बिस्मिल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्ध किया।

उत्तर बिस्मिल्ला खाँ के संगीत-जीवन को निम्नलिखित लोगों ने समृद्ध किया

रसूलनबाई, बतूलनबाई, मामूजान, अली बख्श खाँ, नाना, कुलसुम हलवाइन, अभिनेत्री सुलोचना इत्यादि।

रसूलनबाई और बतूलनबाई की गायिकी ने उन्हें संगीत की ओर खींचा। उनके द्वारा गायी गई ठुमरी, टप्पे और दादरा सुनकर उनके मन में संगीत की ललक जागी। वे ही उनकी प्रारम्भिक प्रेरिकाएँ थीं। बाद में वे अपने नाना को मधुर स्वर में शहनाई बजाते देखते थे, तो वे उनकी शहनाई को खोजा करते थे। मामूजान जब शहनाई बजाते-बजाते 'सम' पर आ जाते थे तो बिस्मिल्ला खाँ धड़ से एक पत्थर जमीन में मारा करते थे। इस प्रकार उन्होंने संगीत में दाद देना सीखा।

बिस्मिल्ला खाँ कुलसुम की कचौड़ी तलने की कला में भी संगीत का आरोह-अवरोह देखा करते थे। अभिनेत्री सुलोचना की फिल्मों ने भी उन्हें समृद्ध किया।

बालाजी के मंदिर में शहनाई बजाना उनकी संगीत-साधना का अहम पहलू है। अस्सी बरस तक संगीत-साधना करने के बाद भी वे खुदा से यही इबादत करते थे कि खुदा उन्हें सुर बख्शे। यह इबादत उनके लिए जन्नत से बढ़कर थी।

रचना और अभिव्यक्ति

  1. बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की कौन-कौन-सी विशेषताओं ने आपको प्रभावित किया?

उत्तर बिस्मिल्ला खाँ के व्यक्तित्व की निम्नलिखित विशेषताओं ने हमें प्रभावित किया

धार्मिक सौहार्द बिस्मिल्ला खाँ सच्चे मुसलमान थे। वे पाँचों समय नमाज पढ़ते थे। मुहर्रम का उत्सव पूरे शौक से मनाते थे। फिर भी वे हिंदुओं की पवित्र नदी गंगा को मैया कहते थे। बाबा विश्वनाथ और बालाजी के मंदिर में नित्य शहनाई बजाया करते थे। काशी-विश्वनाथ की कल्पना बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई के बिना नहीं हो सकती। उनका यह धार्मिक सौहार्द हमें सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

प्रभु के प्रति आस्थावान बिस्मिल्ला खाँ के हृदय में खुदा के प्रति सच्ची गहरी आस्था थी। वे नमाज पढ़ते हुए खुदा से सच्चे सुर की कामना करते थे। वे अपनी शहनाई की प्रशंसा को भी खुदा को समर्पित कर देते थे।

सरलता और सादगी बिस्मिल्ला खाँ को भारत रत्न प्राप्त हुआ। भारत के अनेक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ दीं। अन्य अनेक सम्मान मिले। फिर भी उन्हें गर्व और अभिमान छू नहीं पाया। वे सरलता, सादगी और गरीबी की जिंदगी जीते रहे। यहाँ तक कि वे फटी तहमद पहने रहते थे। उन्हें ऊपरी दिखावा अच्छा नहीं लगता था।

रसिक और विनोदी स्वभाव बिस्मिल्ला खाँ बचपन से रसिक स्वभाव के थे। वे रसूलनबाई और बतूलनबाई की गायिकी के रसिया थे। जवानी में वे कुलसुम हलवाइन और सुलोचना के प्रति आकृष्ट थे। वे जलेबी और कचौड़ी के बहुत शौकीन थे।

वे बात करने में कुशल थे। जब उनकी शिष्या ने भारत रत्न का हवाला देकर उन्हें फटी तहमद न पहनने के लिए कहा, तो फट से बोले "ई भारत रत्न शहनईया पर मिला है, लुंगिया पर नहीं।"

9. मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान हजरत इमाम हुसैन एवं उनके वंशजों के प्रति शोक मनाते थे। पूरे दस दिनों तक शोक मनाया जाता है। इन दिनों में खाँ साहब शहनाई नहीं बजाते थे, न कोई मंगलवाद्य और न ही कोई राग-रागिनी ही। आठवें दिन दालमंडी से चलने वाले मुहर्रम के जुलूस में पूरे उत्साह के साथ आठ किलोमीटर रोते हुए नौहा बजाते चलते थे।

पूरे दस दिनों तक शोक मनाया जाता। खाँ साहब की आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवारजनों की शहादत में नम रहती थीं।

  1. बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर बिस्मिल्ला खाँ कला के अनन्य उपासक थे। वे अस्सी वर्षों तक लगातार शहनाई बजाते रहे। वह इसे कला की साधना मानते थे। गंगा घाट पर बैठकर घंटों रियाज करते थे तथा अपनी कला को उपासना की चीज मानते थे। वे अंत तक खुदा से सच्चे सुर की माँग करते रहे कि शायद अब भी उन्हें कोई सच्चा सुर देगा, जिसे पाकर वे श्रोताओं की आँखों में आँसू ला देंगे। उन्होंने अंत तक अपने आप को पूर्ण नहीं माना। उन्होंने कभी भी अपनी कला को कमाई का जरिया नहीं बनाया। उन्होंने जीवन भर अभ्यास साधना जारी रखी।

भाषा-अध्ययन

  1. निम्नलिखित मिश्र वाक्यों के उपवाक्य छाँटकर भेद भी लिखिए

(क) यह जरूर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं।

(ख) रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है।

(ग) रीड नरकट से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।

(घ) उनको यकीन है, कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा।

(ङ) हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाई है।

(च) खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।

उत्तर

(क) 1. यह जरूर है।

(प्रधान उपवाक्य)

  1. शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं।

(संज्ञा उपवाक्य)

(ख) 1. रीड अंदर से पोली होती है।
(प्रधान वाक्य)

  1. जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। (विशेषण उपवाक्य)

(ग) 1. रीड नरकट से बनाई जाती है। (प्रधान उपवाक्य)

  1. जो डुमराँव में मुख्यतः सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है।

(विशेषण उपवाक्य)

(घ) 1. उनको यकीन है। (प्रधान उपवाक्य)

  1. कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा। (संज्ञा उपवाक्य)

(ङ) 1. हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है।

(प्रधान उपवाक्य)

  1. जिसकी गमक उसी में समाई है।

(विशेषण उपवाक्य)

(च) 1. खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है। (प्रधान उपवाक्य)

  1. पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा। (संज्ञा उपवाक्य)
  2. निम्नलिखित वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिए

(क) इसी बालसुलभ हँसी में कई यादें बंद हैं।

(ख) काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है।

(ग) धत्! पगली ई भारतरत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।

(घ) काशी का नायाब हीरा हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।

उत्तर

(क) यही वह बालसुलभ हँसी है जिसमे कई यादें बंद हैं।

(ख) काशी की यह प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है कि यहाँ संगीत आयोजन होते हैं।

(ग) धत्! पगली ई भारतरत्न जो हमको मिला है, ऊ शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।

(घ) यह काशी का नायाब हीरा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस मे भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा।

पाठेतर सक्रियता

  1. कल्पना कीजिए कि आपके विद्यालय में किसी प्रसिद्ध संगीतकार के शहनाई वादन का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की सूचना देते हुए बुलेटिन बोर्ड के लिए नोटिस बनाइए।

उत्तर सभी विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि कल दिनांक 10 अगस्त, 2012 को विद्यालय के मुख्य हॉल में प्रसिद्ध संगीतकार उस्ताद अली खाँ का शहनाईवादन कार्यक्रम सायं 6 बजे होगा। सभी विद्यार्थी, अध्यापक एवं कर्मचारी इसमें सादर आमंत्रित हैं।

  1. आप अपने मनपसंद संगीतकार के बारे में एक अनुच्छेद लिखिए। उत्तर छात्र स्वयं करें।
  2. हमारे साहित्य, कला, संगीत और नृत्य को समृद्ध करने में काशी (आज के वाराणसी) के योगदान पर चर्चा कीजिए।

उत्तर काशी यानि आज का वाराणसी हमेशा से संगीत, साहित्य एवं कला का प्रसिद्ध केंद्र रहा है। यह शिक्षा का भी बहुत महत्वपूर्ण केन्द्र है क्योंकि मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी यानि बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय यहीं है। इस विश्वविद्यालय से नामवर सिंह एवं काशीनाथ सिंह जैसे साहित्यकार निकले। शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसे विश्व प्रसिद्ध संगीतकार काशी की मिट्टी की ही उपज हैं।

  1. काशी का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने काशी की बहुत-सी चीजें उभरने लगती हैं, वे कौन-कौन सी हैं?

उत्तर छात्र स्वयं करें।

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