पहलवान की ढोलक

लेखक परिचय

जीवन परिचय-हिंदी-साहित्य में आंचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च, 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले (अब अररिया) के औराही हिंगना में हुआ था। इन्होंने 1942 ई० के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में बढ़-चढ़कर भाग लिया और सन 1950 में नेपाली जनता को राजशाही दमन से मुक्ति दिलाने के लिए भरपूर योगदान दिया। इनकी साहित्य-साधना व राष्ट्रीय भावना को मद्देनजर रखते हुए भारत सरकार ने इन्हें पदमश्री से अलंकृत किया। 11 अप्रैल, 1977 को पटना में इनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ-हिंदी कथा-साहित्य में रेणु का प्रमुख स्थान है। इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
उपन्यास-मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, कितने चौराहे ।
कहानी-संग्रह-ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप।
संस्मरण-ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध, श्रुत-अश्रुत पूर्व।
रिपोतज-नेपाली क्रांति कथा। इनकी तमाम रचनाएँ पाँच खंडों में ‘रेणु रचनावली’ के नाम से प्रकाशित हैं।
साहित्यिक विशेषताएँ-हिंदी साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु आंचलिक साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं। इन्होंने विभिन्न राजनैतिक व सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय भागीदारी की। इनकी यह भागीदारी एक ओर देश के निर्माण में सक्रिय रही तो दूसरी ओर रचनात्मक साहित्य को नया तेवर देने में सहायक रही।

1954 ई० में इनका उपन्यास ‘मैला आँचल’ प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने हिंदी उपन्यास विधा को नयी दिशा दी। हिंदी जगत में आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श ‘मैला आँचल’ से ही प्रारंभ हुआ। आंचलिकता की इस अवधारणा ने उपन्यासों और कथा-साहित्य में गाँव की भाषा-संस्कृति और वहाँ के लोक-जीवन को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। लोकगीत, लोकोक्ति, लोक-संस्कृति, लोकभाषा एवं लोकनायक की इस अवधारणा ने भारी-भरकम चीज एवं नायक की जगह अंचल को ही नायक बना डाला। उनकी रचनाओं में अंचल कच्चे और अनगढ़ रूप में ही आता है। इसलिए उनका यह अंचल एक तरफ शस्य-श्यामल है तो दूसरी तरफ धूल-भरा और मैला भी।

आजादी मिलने के बाद भारत में जब सारा विकास शहरों में केंद्रित होता जा रहा था तो ऐसे में रेणु ने अंचल की समस्याओं को अपने साहित्य में स्थान दिया। इनकी रचनाएँ इस अवधारणा को भी पुष्ट करती हैं कि भाषा की सार्थकता बोली के साहचर्य में ही है। भाषा-शैली-रेणु की भाषा भी अंचल-विशेष से प्रभावित है। इन्होंने आम बोलचाल की भाषा को अपनाया है। मिश्रित शब्दावली का प्रयोग है। गंभीर विषयों पर भाषा संस्कृतनिष्ठ हो जाती है। भाषा में चित्रात्मकता बहुत मिलती है। भाव-प्रवाह के अनुसार वाक्य छोटे हो जाते हैं। विशेषणों का सुंदर प्रयोग है।

पाठ का प्रतिपादय एवं सारांश

प्रतिपादय-पहलवान की ढोलक’ कहानी व्यवस्था के बदलने के साथ लोक-कला और इसके कलाकार के अप्रासंगिक हो जाने की कहानी है। राजा साहब की जगह नए राजकुमार का आकर जम जाना सिर्फ़ व्यक्तिगत सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि जमीनी पुरानी व्यवस्था के पूरी तरह उलट जाने और उस पर सभ्यता के नाम पर एकदम नयी व्यवस्था के आरोपित हो जाने का प्रतीक है। यह ‘भारत’ पर ‘इंडिया’ के छा जाने की समस्या है जो लुट्टन पहलवान को लोक-कलाकार के आसन से उठाकर पैट-भरने के लिए हाय-तौबा करने वाली निरीहता की भूमि पर पटक देती है।

ऐसी स्थिति में गाँव की गरीबी पहलवानी जैसे शौक को क्या पालती? फिर भी, पहलवान जीवट ढोल के बोल में अपने आपको न सिर्फ़ जिलाए रखता है, बल्कि भूख व महामारी से दम तोड़ रहे गाँव को मौत से लड़ने की ताकत भी प्रदान करता है। कहानी के अंत में भूख-महामारी की शक्ल में आए मौत के षड्यंत्र जब अजेय लुट्टन की भरी-पूरी पहलवानी को फटे ढोल की पोल में बदल देते हैं तो इस करुणा/त्रासदी में लुट्टन हमारे सामने कई सवाल छोड़ जाता है। वह पोल पुरानी व्यवस्था की है या नई व्यवस्था की ? क्या कला की प्रासंगिक व्यवस्था की मुखापेक्षी है अथवा उसका कोई स्वतंत्र मूल्य भी है? मनुष्यता की साधना और जीवन-सौंदर्य के लिए लोक-कलाओं को प्रासंगिक बनाए रखने हेतु हमारी क्या भूमिका हो सकती है? यह पाठ ऐसे कई प्रश्न छोड़ जाता है।

सारांश-सर्दी का मौसम था। गाँव में मलेरिया व हैजे का प्रकोप था। अमावस्या की ठंडी रात में निस्तब्धता थी। आकाश के तारे ही प्रकाश के स्रोत थे। सियारों व उल्लुओं की डरावनी आवाज से वातावरण की निस्तब्धता कभी-कभी भंग हो जाती थी। कभी किसी झोपड़ी से कराहने व कै करने की आवाज तथा कभी-कभी बच्चों के रोने की आवाज आती थी। कुत्ते जाड़े के कारण राख के ढेर पर पड़े रहते थे। सायं या रात्रि को सब मिलकर रोते थे। इस सारे माहौल में पहलवान की ढोलक संध्या से प्रात:काल तक एक ही गति से बजती रहती थी। यह आवाज मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती थी।

गाँव में लुट्टन पहलवान प्रसिद्ध था। नौ वर्ष की आयु में वह अनाथ हो गया था। उसकी शादी हो चुकी थी। उसकी विधवा सास ने उसे पाला। वह गाय चराता, ताजा दूध पीता तथा कसरत करता था। गाँव के लोग उसकी सास को तंग किया करते थे। लुट्टन इनसे बदला लेना चाहता था। कसरत के कारण वह किशोरावस्था में ही पहलवान बन गया। एक बार लुट्टन श्यामनगर मेला में ‘दंगल’ देखने गया। पहलवानों की कुश्ती व दाँव-पेंच देखकर उसने ‘शेर के बच्चे’ को चुनौती दे डाली। ‘शेर के बच्चे’ का असली नाम था-चाँद सिंह। वह पहलवान बादल सिंह का शिष्य था। तीन दिन में उसने पंजाबी व पठान पहलवानों को हरा दिया था। वह अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए बीच-बीच में दहाड़ता फिरता था। श्यामनगर के दंगल व शिकार-प्रिय वृद्ध राजा साहब उसे दरबार में रखने की सोच रहे थे कि लुट्टन ने शेर के बच्चे को चुनौती दे दी।

दर्शक उसे पागल समझते थे। चाँद सिंह बाज की तरह लुट्टन पर टूट पड़ा, परंतु वह सफ़ाई से आक्रमण को सँभालकर उठ खड़ा हुआ। राजा ने लुट्टन को समझाया और कुश्ती से हटने को कहा, किंतु लुट्टन ने लड़ने की इजाजत माँगी। मैनेजर से लेकर सिपाहियों तक ने उसे समझाया, परंतु लुट्टन ने कहा कि इजाजत न मिली तो पत्थर पर माथा पटककर मर जाएगा। भीड़ में अधीरता थी। पंजाबी पहलवान लुट्टन पर गालियों की बौछार कर रहे थे। दर्शक उसे लड़ने की अनुमति देना चाहते थे। विवश होकर राजा साहब ने इजाजत दे दी। बाजे बजने लगे। लुट्टन का ढोल भी बजने लगा था। चाँद ने उसे कसकर दबा लिया था। वह उसे चित्त करने की कोशिश में था। लुट्टन के समर्थन में सिर्फ़ ढोल की आवाज थी, जबकि चाँद के पक्ष में राजमत व बहुमत था।

लुट्टन की आँखें बाहर निकल रही थीं, तभी ढोल की पतली आवाज सुनाई दी’धाक-धिना, तिरकट-तिना, धाक-धिना, तिरकट-तिना।’ इसका अर्थ था-दाँव काटो, बाहर हो जाओ। लुट्टन ने दाँव काटी तथा लपक कर चाँद की गर्दन पकड़ ली। ढोल ने आवाज दी-चटाक्-चट्-धा अर्थात उठाकर पटक दे। लुट्टन ने दाँव व जोर लगाकर चाँद को जमीन पर दे मारा। ढोलक ने ‘धिना-धिना, धिक-धिना।’ कहा और लुट्टन ने चाँद सिंह को चारों खाने चित्त कर दिया। ढोलक ने ‘वाह बहादुर!” की ध्वनि की तथा जनता ने माँ दुर्गा की, महावीर जी की, राजा की जय-जयकार की। लुट्टन ने सबसे पहले ढोलों को प्रणाम किया और फिर दौड़कर राजा साहब को गोद में उठा लिया। राजा साहब ने उसे दरबार में रख लिया।

पंजाबी पहलवानों की जमायत चाँद सिंह की आँखें पोंछ रही थी। राजा साहब ने लुट्टन को पुरस्कृत न करके अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया। राजपंडित व मैनेजर ने लुट्टन का विरोध किया कि वह क्षत्रिग्र नहीं है। राजा साहब ने उनकी एक न सुनी। कुछ ही दिन में लुट्टन सिंह की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। उसने सभी नामी पहलवानों को हराया। उसने ‘काला खाँ’ जैसे प्रसिद्ध पहलवान को भी हरा दिया। उसके बाद वह दरबार का दर्शनीय जीव बन अर्था। लुट्टन सिंह मेलों में घुटने तक लंबा चोंगा पहने, अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मतवाले हाथी की तरह झूमता चलता। हलवाई के आग्रह पर दो सेर रसगुल्ला खाता तथा मुँह में आठ-दस पान एक साथ दूँस लेता। वह बच्चों जैसे शौक रखता था। दंगल में उससे कोई लड़ने की हिम्मत नहीं करता। कोई करता तो उसे राजा साहब इजाजत नहीं देते थे। इस तरह पंद्रह वर्ष बीत गए। उसके दो पुत्र हुए। उसकी सास पहले ही मर चुकी थी और पत्नी भी दो पहलवान पैदा करके स्वर्ग सिधार गई। दोनों लड़के पहलवान थे। दोनों का भरण-पोषण दरबार से हो रहा था।

पहलवान हर रोज सुबह उनसे कसरत करवाता। दिन में उन्हें सांसारिक ज्ञान भी देता। वह बताता कि उसका गुरु ढोल है, और कोई नहीं। अचानक राजा साहब स्वर्ग सिधार गए। नए राजकुमार ने विलायत से आकर राजकाज अपने हाथ में ले लिया। उसने पहलवानों की छुट्टी कर दी। लुट्टन ढोलक कंधे से लटकाकर अपने पुत्रों के साथ गाँव लौट आया। गाँव वालों ने उसकी झोपड़ी बना दी तथा वह गाँव के नौजवानों व चरवाहों को कुश्ती सिखाने लगा। खाने-पीने का खर्च गाँव वालों की तरफ से बँधा हुआ था। गरीबी के कारण धीरे-धीरे किसानों व मजदूरों के बच्चे स्कूल में आने बंद हो गए। अब वह अपने लड़कों को ही ढोल बजाकर कुश्ती सिखाता।

लड़के दिनभर मजदूरी करके कमाकर लाते थे। गाँव पर अचानक संकट आ गया। सूखे के कारण अन्न की कमी हो गई तथा फिर मलेरिया व हैजा फैल गया। घर के घर खाली हो गए। प्रतिदिन दो-तीन लाशें उठने लगीं। लोग एक-दूसरे को ढाँढ़स देते तथा शाम होते ही घरों में घुस जाते। लोग चुप रहने लगे। ऐसे समय में केवल पहलवान की ढोलक ही बजती थी जो गाँव के अद्र्धमृत, औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में संजीवनी शक्ति भरती थी। एक दिन पहलवान के दोनों बेटे भी चल बसे। पहलवान सारी रात ढोल पीटता रहा। दोनों पेट के बल पड़े हुए थे। उसने लंबी साँस लेकर कहा-दोनों बहादुर गिर पड़े। उस दिन उसने राजा श्यामानंद की दी हुई रेशमी जाँघिया पहनी और सारे शरीर पर मिट्टी मलकर थोड़ी कसरत की फिर दोनों पुत्रों को कंधों पर लादकर नदी में बहा आया। इस घटना के बाद गाँव वालों की हिम्मत टूट गई।

रात में फिर पहलवान की ढोलक बजने लगी तो लोगों की हिम्मत दुगुनी बढ़ गई। चार-पाँच दिनों के बाद एक रात ढोलक की आवाज नहीं सुनाई पड़ी। सुबह उसके शिष्यों ने देखा कि पहलवान की लाश ‘चित’ पड़ी है। शिष्यों ने बताया कि उसके गुरु ने कहा था कि उसके शरीर को चिता पर पेट के बल लिटाया जाए क्योंकि वह कभी ‘चित’ नहीं हुआ और चिता सुलगाने के समय ढोल जरूर बजा देना ।

शब्दार्थ

पृष्ठ-108
अमावस्या-
चाँद रहित रात। भयात-भय से पीड़ित। सन्नाटा-चुप्पी। साम्राज्य-राज्य। निस्तब्धता-गतिहीनता। चेष्टा-कोशिश। ज्योति-प्रकाश। शोष होना-खत्म होना। क्रदन-विलाप, रोना। येचक-उल्लू। कै-उल्टी। टेर-पुकार। कठ-गला। बाधा-रुकावट। ताड़ना-भाँपना। घूरा-गंदगी का ढेर। मन मारना-उदास होना, इच्छा को समाप्त करना। भीषणता-भयंकरता। ताल ठोकना-चुनौती देना। ललकारना-लड़ने का निमंत्रण देना। सजीवनी-जीवन देने वाली।

पृष्ठ-110
अनुसरण करना-पीछे-पीछे चलना। थारोष्ण-दुधारू पशु के थनों से निकला ताजा दूध। किशोरावस्था-10 से 15 वर्ष की आयु। मांसल-जिस पर मांस चढ़ गया हो। दाँव-पेंच-तौर-तरीके, तकनीक। बिजली उत्यन्न करना-तेजी से जगा देना। चुनौती-ललकार। गिरोह-समूह। यट्ठा-पहलवान। टायटिल-पदवी। किलकारी भरना-खुशी प्रकट करने के लिए गले से आवाजें निकालना। दुलकी लगाना-उछल-उछल कर खेलना। किंचित-शायद। स्यथf-मुकाबला। खलबली मचना-हड़कंप मचना।

पृष्ठ-111
गोश्त-मांस। दुहाई-विनती। अधीर-व्याकुल। जमायत-सभा। बौछार करना-अत्यधिक देना। यक्ष-समर्थन। प्रतिदवदवी-मुकाबला करने वाला। विवश-मजबूर। हलुआ होना-पूरी तरह कुचला जाना। चित्त करना-जमीन पर पीठ लगाना, हराना।

पृष्ठ– 112
सीमा न रहना-बहुत अधिक होना। जनमत-लोगों का समर्थन। जय-eवनि-जय-जयकार। सन जाना-भर जाना, लथपथ हो जाना। गदगद होना-खुश होना। लाज रखना-सम्मान बचाना। पुरस्कृत-इनाम देना। मुंह बिचकाना-घृणा भाव व्यक्त करना। संकुचित-सिकुड़ा हुआ। कीर्ति-यश। स्नेह-दूष्टि-प्यार की नजर। चार चाँद लगाना-शान को अधिक बढ़ा देना। आसमान दिखाना-हरा देना। टूट पड़ना-हमला करना। लकवा मारना-पंगु होना।

पृष्ठ–113
दर्शनीय-देखने योग्य। अस्त-व्यस्त-बिखरा हुआ। मतवाला-मस्त। चुहल-शरारत। उदरस्थ-पेट में डालकर। हुलिया-रूपसज्जा। अबरख-रंगीन चमकीला कागज। वृदधि-बढ़ोतरी। देह-शरीर, तन। अजय-जिसे जीता न जा सके। अनायास-बिना प्रयास के। प्रताय-शक्ति।

पृष्ठ-114
पानी फिरना-समाप्त होना। शिथिलता-ढिलाई। चपेटाघात-लपेट में लेकर आघात करना। टैरिबुल-भयानक। हरिबुल-महाभयंकर। साफ जवाब मिलना-इन्कार कर देना। चरवाहा-पशु चराने वाला। वज्रयात-वज्र गिरना। अनावृष्टि-अकाल, सूखा पड़ना। कलरव-मंद और मधुर स्वर। हाहाकार-चीख-पुकार। प्रभा-ज्योति, प्रकाश। दूष्टिगोचर होना-दिखाई देना। काँखते-कूंखते-सूखी खाँसी खाँसते हुए। आत्मीय-अपने। ढाँढ़स-तसल्ली।

पृष्ठ-115
विभीषिका-भयानक दशा। अदधमृत-अधमरा। यथ्य-इलाज। संजीवनी शक्ति-जीवन देने वाली शक्ति। स्यंदन-शक्तिशून्य-धड़कन की शक्ति से रहित। स्नायु-नसें । सवनाश-सब कुछ नष्ट करना। अख मूदना-मृत्यु होना। क्रूर काल-कठोर मृत्यु। असहय वेदना-जिस कष्ट को सहा न जा सके। निस्यद-भावनाहीन, चेतनाहीन। दंग रहना-हैरान रहना। हिम्मत टूटना-निराश होना। सतयत-दुखी। डेढ़ हाथ का कलेजा-सहनशील। दिलेर-बहादुर। रुग्ण-बीमार।

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न

निम्नलिखित गदयांशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

1. जाड़े का दिन। अमावस्या की रात-ठंडी और काली। मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव भयात्र्त शिशु की तरह थर-थर काँप रहा था। पुरानी और उजड़ी बाँस-फूस की झोपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य! आँधेरा और निस्तब्धता !

प्रश्न

(क) लेखक किस तरह के मौसम का वर्णन कर रहा है?
(ख) गाँव किससे पीड़ित है?
(ग) गाँव किसके समान काँप रहा है?
(घ) गद्यांश के आधार पर गाँव की आर्थिक दशा का चित्रण कीजिए।

उत्तर –

(क) लेखक सर्दी के दिनों का वर्णन कर रहा है। अमावस्या की रात है। भयंकर ठंड है तथा चारों तरफ अँधेरा है।
(ख) गाँव हैजे व मलेरिया की बीमारी से पीड़ित है।
(ग) गाँव मलेरिया व हैजे से पीड़ित है तथा वह भयभीत शिशु की तरह थर-थर काँप रहा है।
(घ) गद्यांश से ज्ञात होता है कि गाँव की आर्थिक दशा दयनीय थी। घर के नाम पर टूटी-फूटी झोपड़ियाँ थीं जिनमें खुशी का नामोनिशान तक नहीं था।

2. अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी। निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी। आकाश में तारे चमक रहे थे। पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं। आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।

प्रश्न

(क) गाँव में ऐसा क्या हो गया था कि आँधेरी रात चुपचाप असू बहा रही थी?
(ख) कहानी में वातावरण-निमणि के लिए लेखक औधरी रात के स्थान पर चाँदनी रात को चुनता तो क्या अंतर आ जाता? स्पष्ट करें।
(ग) उक्त गद्यांश के आधार पर लेखक की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।
(घ) ‘निस्तब्धता’ किसे कहते हैं? उस रात की निस्तब्धता क्या प्रयत्न कर रही थी और क्यों?

उत्तर –

(क) गाँव में हैजे व मलेरिया का प्रकोप था। इसके कारण घर-घर में मौतें हो रही थीं। चारों ओर मौत का सन्नाटा था। इसी कारण अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी।
(ख) कहानी में वातावरण निर्माण के लिए लेखक चाँदनी रात को चुनता तो भाव में अंतर आ जाता। चाँदनी रात प्रेम व संयोग को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। इससे मनुष्य की व्यथा एवं दयनीय दशा का सफल चित्रण न हो पाता।
(ग) इस गद्यांश में लेखक ने चित्रात्मक व आलंकारिक भाषा का प्रयोग किया है। रात का मानवीकरण किया गया है। वह मानव की तरह शोक प्रकट कर रही है। मिश्रित शब्दावली है। खड़ी बोली में सशक्त अभिव्यक्ति है।
(घ) ‘निस्तब्धता’ का अर्थ है-मौन या गतिहीनता। रात के अँधेरे में सब कुछ शांत हो जाता है। उस रात की निस्तब्धता करुण सिसकियों व आहों को बलपूर्वक दबाने की कोशिश कर रही थी क्योंकि दिन में मौत का तांडव रहता था तथा हर तरफ चीख-पुकार होती थी।

3. रात्रि अपनी भीषणताओं के साथ चलती रहती और उसकी सारी भीषणता को ताल ठोककर ललकारती रहती थी-सिर्फ पहलवान की ढोलक! संध्या से लेकर प्रात:काल तक एक ही गति से बजती रहती-‘चट्-धा, गिड़-धा, ’ चट्-धा, गिड़ धा!’ यानी ‘आ जा भिड़ जा, आ जा, भिड़ जा!” ’ बीच-बीच में-‘चटाक्-चट्-धा, ‘चटाक्-चट्-धा!’ यानी ‘उठाकर पटक दे! उठाकर पटक दे!!’
यही आवाज मृत गाँव में संजीवनी भरती रहती थी।

प्रश्न

(क) रात्रि की भीषणताएँ कैसी  थीं ?
(ख) पहलवान की ढोलक किसको ललकारती थी?
(ग) पहलवान की ढोलक के बजने का क्या समय था?
(घ) ढोलक की कौन – सी आवाज क्या असर दिखाती थी?

उत्तर –

(क) लेखक ने रात्रि की भीषणताओं के बारे में बताते हुए कहता है कि जाड़े की अमावस्या की रात थी। मलेरिया व हैजे का प्रकोप था। चारों तरफ निस्तब्धता थी।
(ख) पहलवान की ढोलक रात्रि की भीषणता को ताल ठोककर ललकारती थी। वह एक ही गति से बजती रहती थी।
(ग) पहलवान की ढोलक बजने का समय संध्या से प्रात:काल तक का था।
(घ) ढोलक की आवाज थी-चट्-धा, गिड़-धा यानी आ जा भिड़ जा। बीच-बीच में ‘चटाक्-चट्-धा’ यानी ‘उठाकर पटक दे!’ की आवाज आती थी। यह आवाज मृत गाँव में जीवन-आशा का संचार करती थी।

4. लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। सौभाग्यवश शादी हो चुकी थी, वरना वह भी माँ-बाप का अनुसरण करता। विधवा सास ने पाल-पोसकर बड़ा किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूध पीता और कसरत किया करता था। गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ़ दिया करते थे; लुट्टन के सिर पर कसरत की धुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी।

प्रश्न

(क) लुट्टन कौन था? उसका नाम क्यों फैला था?
(ख) नौ वर्ष की उम्र में विवाह हो जाना लुदृटन का सौभाग्य क्यों था?
(ग) ‘धारोष्ण दूध’ से क्या तात्पर्य है? बचपन में लुदृटन और क्या- क्या काम किया करता था?
(घ) कसरत करके पहलवान बनने की इच्छा उसके मन में क्यों पैदा हुई थी?

उत्तर –

(क) लुट्टन वह बालक था जिसके माँ-बाप उस समय मर गए थे जब वह मात्र नौ बरस का था। उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने किया। उसने चाँद सिंह जैसे प्रसिद्ध पहलवान को हराकर राज पहलवान बनने का गौरव प्राप्त किया था। इस कारण उसका नाम फैला था।
(ख) लुट्टन का विवाह नौ वर्ष की आयु में हो गया था। लेखक इसे उसका सौभाग्य कहता है क्योंकि इस आयु में उसके माँ-बाप गुजर चुके थे। उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। वह भी मौत के आगोश में समा जाता। विवाह होने के कारण उसकी विधवा सास ने उसे पाला-पोसा।
(ग) इसका अर्थ है-धार का गरम दूध। बचपन में लुट्टन गाय चराता था तथा कसरत करता था।
(घ) लुट्टन की सास को गाँव के लोग तरह-तरह की तकलीफें देते थे। वह उनसे बदला लेना चाहता था इसलिए कसरत करके पहलवान बनने की इच्छा उसके मन में पैदा हुई।

5. एक बार वह ‘दंगल’ देखने श्यामनगर मेला गया। पहलवानों की कुश्ती और दाँव-पेंच देखकर उससे नहीं रहा गया। जवानी की मस्ती और ढोल की ललकारती हुई आवाज ने उसकी नसों में बिजली उत्पन्न कर दी। उसने बिना कुछ सोचे-समझे दंगल में ‘शेर के बच्चे’ को चुनौती दे दी। ‘शेर के बच्चे’ का असल नाम था चाँद सिंह। वह अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ पंजाब से पहले-पहल श्यामनगर मेले में आया था। सुंदर जवान, अंग-प्रत्यंग से सुंदरता टपक पड़ती थी। तीन दिनों में ही पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उम्र के सभी पट्ठों को पछाड़कर उसने ‘शेर के बच्चे’ की टायटिल प्राप्त कर ली थी। इसलिए वह दंगल के मैदान में लैंगोट लगाकर एक अजीब किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। देशी नौजवान पहलवान उससे लड़ने की कल्पना से भी घबराते थे। अपनी टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए ही चाँद सिंह बीच-बीच में दहाड़ता फिरता था।

प्रश्न

(क) प्रथम पंक्ति में ‘वह’ कौन है? वह कहाँ गया और उस पर क्या प्रभाव पडा?
(ख) ‘बिजली उत्पन्न होना’ का आशय बताइए। इसका कारण क्या था?
(ग) शेर का बच्चा कौन था? उसने यह टायटल कैसे प्राप्त किया?
(घ) चाँद सिंह अपने टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए क्या करता था?

उत्तर –

(क) ‘वह’ लुट्टन पहलवान है। वह श्यामनगर मेले में दंगल देखने गया। वहाँ पहलवानों की कुश्ती व दाँव-पेंच देखकर उसमें जोश भर गया।
(ख) ‘बिजली उत्पन्न होना’ का अर्थ है-प्रबल जोश उत्पन्न होना। जवानी की मस्ती व ढोल की ललकारती हुई आवाज ने लुट्टन की नसों में जोश भर दिया।
(ग) ‘शेर का बच्चा” पहलवान बादल सिंह का शिष्य चाँद सिंह था। वह पंजाब से आया था। उसने तीन दिन में ही पंजाबी व पठान पहलवानों की टोली में अपनी जोड़ी व उम्र के पहलवानों को हराकर यह टायटिल प्राप्त किया।
(घ) चाँद सिंह दंगल के मैदान में लैंगोट बाँधकर अजीब किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। वह बीच-बीच में दहाड़ता भी था।

6. शांत दर्शकों की भीड़ में खलबली मच गई-‘पागल है पागल, मरा-ऐं! मरा-मरा !’’ पर वाह रे बहादुर! लुट्टन बड़ी सफाई से आक्रमण को सँभालकर निकलकर उठ खड़ा हुआ और पैंतरा दिखाने लगा। राजा साहब ने कुश्ती बंद करवाकर लुट्टन को अपने पास बुलवाया और समझाया। अंत में, उसकी हिम्मत की प्रशंसा करते हुए, दस रुपये का नोट देकर कहने लगे-‘जाओ, मेला देखकर घर जाओ!’”

प्रश्न

(क) शांत दर्शकों में खलबली मचने का क्या कारण था?
(ख) लुट्टन पर किसने आक्रमण किया? उसने क्या प्रतिक्रिया जताई?
(ग) राजा साहब ने कुश्ती बीच में क्यों रुकवा दी?
(घ) राजा साहब ने लुट्टन को क्या नसीहत दी?

उत्तर –

(क) लुट्टन ने मेले के मशहूर पहलवान चाँद सिंह को चुनौती दी थी। चाँद सिंह को चुनौती देना तथा उससे कुश्ती लड़ना हँसी-खेल न था इसलिए शांत दर्शकों की भीड़ में खलबली मच गई।
(ख) लुट्टन पर चाँद सिंह ने आक्रमण किया। लुट्टन बड़ी सफ़ाई से आक्रमण को सँभालकर उठ खड़ा हुआ और पैंतरा दिखाने लगा।
(ग) राजा साहब चाँद सिंह की कुश्ती के बारे में जानते थे। वह पहले ही ‘शेर के बच्चे’ की उपाधि प्राप्त कर चुका था। लुट्टन पहली बार दंगल लड़ा था, इसलिए राजा साहब ने कुश्ती बीच में रुकवा दी।
(घ) राजा साहब ने लुट्टन को दस रुपये का नोट दिया, उसकी हिम्मत की प्रशंसा की तथा मेला देखकर घर जाने के की नसीहत दी।

7. भीड़ अधीर हो रही थी। बाजे बंद हो गए थे। पंजाबी पहलवानों की जमायत क्रोध से पागल होकर लुट्टन पर गालियों की बौछार कर रही थी। दर्शकों की मंडली उत्तेजित हो रही थी। कोई-कोई लुट्टन के पक्ष से चिल्ला उठता था-“उसे लड़ने दिया जाए!”

प्रश्न

(क) भीड़ की अधीरता का क्या कारण था?
(ख) लुट्टन पर गालियों की बौछार कौन कर रहा था? क्यों?
(ग) दशकों की मंडली उत्तेजित क्यों हो रही थी?
(घ) लुट्टन के पक्ष में एक-दो दशक ही क्यों चिल्ला रहे थे?

उत्तर –

(क) लसिक इंग्लक चुीद थी भी नोक कुश्त देना वाहता थी इसाल वाहअर रही थी।
(ख) शिकार-प्रिय वृद्ध राजा साहब पंजाब के पहलवान चाँद सिंह की ख्याति से प्रभावित होकर उसे अपने दरबार में रखने की बात सोच रहे थे। इसीलिए पंजाबी पहलवानों का वर्ग लुट्टन की चाँद सिंह को दी गई चुनौती की प्रतिक्रियास्वरूप लुट्टन पर गालियों की बौछार कर रहा था। लुट्टन की चुनौती से उनके हाथ से मौका निकल सकता था इसलिए वे क्रोधित होकर उसे गालियाँ दे रहे थे।
(ग) दर्शकों की मंडली इसलिए उत्तेजित हो रही थी क्योंकि लुट्टन नया पहलवान था जबकि चाँद सिंह प्रसिद्ध पहलवान था। असमान मुकाबले को देखने के लिए दर्शकों में उत्सुकता थी।
(घ) लुट्टन पहलवानी के क्षेत्र में अपरिचित नाम था। उसे कोई-कोई ही जानता था, इसलिए एक-दो लोग ही उसका उत्साहवर्धन कर रहे थे।

8. पंजाबी पहलवानों की जमायत चाँद सिंह की आँखें पोंछ रही थी। लुट्टन को राजा साहब ने पुरस्कृत ही नहीं किया, अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया। तब से लुट्टन राज-पहलवान हो गया और राजा साहब उसे लुट्टन सिंह कहकर पुकारने लगे। राज-पंडितों ने मुँह पिचकाया-‘हुजूर! जाति का – – – – – सिंह – – – – A ” मैनेजर साहब क्षत्रिय थे। ‘क्लीन-शेव्ड’ चेहरे को संकुचित करते हुए, अपनी शक्ति लगाकर नाक के बाल उखाड़ रहे थे। चुटकी से अत्याचारी बाल को रगड़ते हुए बोले-‘हाँ सरकार, यह अन्याय है!” राजा साहब ने मुसकुराते हुए सिर्फ इतना ही कहा-‘उसने क्षत्रिय का काम किया है।’ उसी दिन से लुट्टन सिंह पहलवान की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। पौष्टिक भोजन और व्यायाम तथा राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्ध में चार चाँद लगा दिए। कुछ वर्षों में ही उसने एक-एक कर सभी नामी पहलवानों को मिट्टी सुंघाकर आसमान दिखा दिया।

प्रश्न

(क) कौन किसकी आँखें पोंछ रहा था और क्यों?
(ख) लुट्टन सिंह का विरोध किसने किया और क्यों?
(ग) लुट्टन के विरोध से तत्कालीन समाज की किस बुराई का पता चलता हैं?
(घ) लुट्टनं की कfifर्तं दूर-दूर तक कैसे फैलfi?

उत्तर –

(क) पंजाबी पहलवानों की जमात चाँद सिंह की आँखें पोंछ रही थी क्योंकि चाँद सिंह को लुट्टन ने हरा दिया था। इस हार के कारण उसे राज-पहलवान का दर्जा नहीं मिला। फलत: वह दुखी था।
(ख) लुट्टन सिंह का विरोध राज-पंडितों और मैनेजर ने किया। ये दोनों उच्च जाति के थे तथा लुट्टन नीच जाति का था। वे क्षत्रिय या ब्राहमण को राज-पहलवान बनाना चाहते थे।
(ग) लुट्टन का विरोध करने से पता चलता है कि उस समय क्षेत्रवाद के साथ-साथ जाति-प्रथा जोरों पर थी। निम्न जाति के व्यक्ति को सरकारी पद व लाभ से दूर रखा जाता था।
(घ) लुट्टन ने चाँद सिंह जैसे प्रसिद्ध पहलवान को हरा दिया। राज-दरबार में रहकर उसने एक-एक करके सभी नामी पहलवानों को चित कर दिया। इससे उसकी प्रसिद्ध दूर-दूर तक फैल गई।

9. मेलों में वह घुटने तक लंबा चोंगा पहने, अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मतवाले हाथी की तरह झूमता चलता। दुकानदारों को चुहल करने की सूझती। हलवाई अपनी दुकान पर बुलाता-‘पहलवान काका! ताजा रसगुल्ला बना है, जरा नाश्ता कर लो!’ पहलवान बच्चों की-सी स्वाभाविक हँसी हँसकर कहता-‘अरे तनी-मनी काहे! ले आव डेढ़ सेर।’ और बैठ जाता।

प्रश्न

(क) मेले में लुट्टन सिंह क्या पहनता था?
(ख) दुकानदार उसके साथ क्या करते थे?
(ग) हलवाई उसे क्यों बुलाता था?
(घ) हलवाड़ के बुलाने पर लुट्टन की क्या प्रतिक्रिया होती?

उत्तर –

(क) मेले में लुट्टन सिंह घुटने तक लंबा चोंगा पहनकर अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मस्त हाथी की तरह झूमता चलता था।
(ख) दुकानदार उसके साथ चुहलबाजी करते थे।
(ग) हलवाई उसे दुकान पर बुलाता और उसे ताजे रसगुल्ले का नाश्ता करने के लिए कहता था।
(घ) हलवाई द्वारा नाश्ते का निमंत्रण पाकर लुट्टन बच्चों की तरह खुश होता और थोड़ा नहीं बल्कि डेढ़ सेर रसगुल्ले लेकर खाने बैठ जाता।

10. दोनों ही लड़के राज-दरबार के भावी पहलवान घोषित हो चुके थे। अत: दोनों का भरण-पोषण दरबार से ही हो रहा था। प्रतिदिन प्रात:काल पहलवान स्वयं ढोलक बजा-बजाकर दोनों से कसरत करवाता। दोपहर में, लेटे-लेटे दोनों को सांसारिक ज्ञान की भी शिक्षा देता-“समझे! ढोलक की आवाज पर पूरा ध्यान देना। हाँ, मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है, समझे! ढोल की आवाज के प्रताप से ही मैं पहलवान हुआ। दंगल में उतरकर सबसे पहले ढोलों को प्रणाम करना, समझे!” ऐसी ही बहुत-सी बातें वह कहा करता। फिर मालिक को कैसे खुश रखा जाता है, कब कैसा व्यवहार करना चाहिए, आदि की शिक्षा वह नित्य दिया करता था।

प्रश्न

(क) पहलवान के बटों का भरण-पोषण राज-दरबार से क्यों होता था?
(ख) पहलवान अपने पुत्रों को क्या शिक्षा दिया करता था?
(ग) लुट्टन किस अपना गुरु मानता था और क्यों?
(घ) आज गाँवों में अखाड़ समाप्त हो रहे हैं, इसके क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तर –

(क) पहलवान के बेटों का भरण-पोषण राज-दरबार से इसलिए होता था क्योंकि लुट्टन राज-पहलवान घोषित हो चुका थो। उसने चाँद पहलवान को हराकर राजा का दिल जीत लिया था।
(ख) पहलवान अपने पुत्रों को शिक्षा देता था कि ढोल की आवाज पर पूरा ध्यान देना। दंगल में उतरकर सबसे पहले ढोल को प्रणाम करना। इसके अलावा वह मालिक को खुश रखने का उपाय भी बताता था।
(ग) लुट्टन अपना गुरु ढोल को इसलिए मानता था क्योंकि उसने जो भी धन, प्रतिष्ठा और प्रसिद्ध पाई थी उसमें ढोल का बड़ा योगदान था।
(घ) आज गाँवों में पहलवानों को आदर सत्कार न मिलना, लोगों के पास समयाभाव होना, कुश्ती को आदर-सम्मान न देना तथा अखाड़ों से अच्छी आय का साधन न बन पाने के कारण गाँवों से अखाड़े समाप्त हो रहे हैं।

11. किंतु उसकी शिक्षा-दीक्षा, सब किए-किराए पर एक दिन पानी फिर गया। वृद्ध राजा स्वर्ग सिधार गए। नए राजकुमार ने विलायत से आते ही राज्य को अपने हाथ में ले लिया। राजा साहब के समय शिथिलता आ गई थी, राजकुमार के आते ही दूर हो गई। बहुत-से परिवर्तन हुए। उन्हीं परिवर्तनों की चपेटाघात में पड़ा पहलवान भी। दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने लिया। पहलवान तथा दोनों भावी पहलवानों का दैनिक भोजन-व्यय सुनते ही राजकुमार ने कहा-“टैरिबुल!” नए मैनेजर साहब ने कहा ‘ ” पहलवान को साफ जवाब मिल गया, राज-दरबार में उसकी आवश्यकता नहीं। उसको गिड़गिड़ाने का भी मौका नहीं दिया गया।

प्रश्न

(क) पहलवान के किए-कराए पर पानी क्यों फिरा?
(ख) सस्ता परिवर्तन के क्या परिणाम हुए?
(ग) पहलवान को राज्याश्रय क्यों नहीं मिला?
(घ) मैनेजर ने लुट्टन को कैसे निकाला2

उत्तर –

(क) पुराने राजा ने लुट्टन को राज-पहलवान बनाया था। यहाँ पर लुट्टन पंद्रह वर्ष से अपने लड़कों को शिक्षा-दीक्षा देकर भावी पहलवान बनाना चाहता था, परंतु राजा की मृत्यु होते ही उसकी सारी योजना फेल हो गई। नए राजा ने उसे निकाल दिया।
(ख) सत्ता-परिवर्तन होते ही नए राजकुमार ने विलायती ढंग से शासन शुरू किया। उसने पहलवानी की जगह घोड़े की रेस को बढ़ावा दिया, प्रशासनिक शिथिलता को दूर किया और राज-पहलवान को राज-दरबार से हटा दिया।
(ग) पहलवान व उसके भावी पहलवानों का दैनिक भोजन-व्यय अधिक था। दूसरे, नए राजा की रुचि दंगल में नहीं थी। इसलिए पहलवान को राज्याश्रय नहीं मिला।
(घ) मैनेजर नीच जाति के लुट्टन से पहले ही चिढ़ते थे। नए राजा को पहलवानों का शौक नहीं था। अत: जब उसने पहलवानों के व्यय पर एतराज जताया तो मैनेजर ने उनकी बात का समर्थन तथा उनके खर्च को ‘हौरीबुल’ बताकर पहलवानों को दरबार से हटवा दिया।

12. रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर चुनौती देती रहती थी। पहलवान संध्या से सुबह तक, चाहे जिस खयाल से ढोलक बजाता हो, किंतु गाँव के अद्र्धमृत, औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी। बूढ़े-बच्चे-जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। स्पंदन-शक्तिशून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। अवश्य ही ढोलक की आवाज में न तो बुखार हटाने का कोई गुण था और न महामारी की सर्वनाश शक्ति को रोकने की शक्ति ही, पर इसमें संदेह नहीं कि मरते हुए प्राणियों को आँख मूंदते समय कोई तकलीफ़ नहीं होती थी, मृत्यु से वे डरते नहीं थे।

प्रश्न

(क) गद्यांश में रात्रि की किस विभीषिका की चर्चा की गई है? ढोलक उसको किस प्रकार की चुनौती देती थी।
(ख) किस प्रकार के व्यक्तियों को ढोलक से राहत मिलती थी? यह राहत कैसी थी?
(ग) ‘दंगल के दृश्य’ से लेखक का क्या अभिप्राय है? यह दृश्य लोगों पर किस तरह का प्रभाव डालता था?
(घ) पहलवान को ढोलक की आवाज कैसे लोगों में संजीवनी-शक्ति भरती थी?

उत्तर –

(क) गद्यांश में महामारी की विभीषिका की चर्चा की गई है। ढोलक की आवाज मन में उत्साह पैदा करती थी जिससे मनुष्य महामारी से निपटने को तैयार होता था।
(ख) ढोलक से महामारी के कारण अद्र्धमृत, औषधि और उपचार विहीन लोगों को राहत मिलती थी। उसकी आवाज सुनकर उनके शरीरों में दंगल जीतने का दृश्य साकार हो उठता था।
(ग) लुट्टन ढोलक की आवाज के बल पर ही दंगल जीता था। उस दृश्य को याद करके लोग उत्साह से भर उठते थे। वह उन्हें बीमारी से लड़ने की प्रेरणा देता था।
(घ) पहलवान को ढोलक की आवाज गाँव के अद्र्धमृत औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में संजीवनी शक्ति।

13. उस दिन पहलवान ने राजा श्यामानंद की दी हुई रेशमी जाँघिया पहन ली। सारे शरीर में मिट्टी मलकर थोड़ी कसरत की, फिर दोनों पुत्रों को कंधों पर लादकर नदी में बहा आया। लोगों ने सुना तो दंग रह गए। कितनों की हिम्मत टूट गई। किंतु, रात में फिर पहलवान की ढोलक की आवाज प्रतिदिन की भाँति सुनाई पड़ी। लोगों की हिम्मत दुगुनी बढ़ गई। संतप्त पिता-माताओं ने कहा-‘दोनों पहलवान बेटे मर गए, पर पहलवान की हिम्मत तो देखो, डेढ़ हाथ का कलेजा है!” चार-पाँच दिनों के बाद। एक रात को ढोलक की आवाज नहीं सुनाई पड़ी। ढोलक नहीं बोली। पहलवान के कुछ दिलेर, किंतु रुग्ण शिष्यों ने प्रात:काल जाकर देखा-पहलवान की लाश ‘चित’ पड़ी है। आँसू पोंछते हुए एक ने कहा-‘गुरु जी कहा करते थे कि जब मैं मर जाऊँ तो चिता पर मुझे चित नहीं, पेट के बल सुलाना। मैं जिंदगी में कभी ‘चित ‘नहीं हुआ। और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजा देना।’ वह आगे बोल नहीं सका।

प्रश्न

(क) पहलवान ने अपने बच्चों का अतिम सस्कार कैसे किया2
(ख) लोग पहलवान की किस बात पर हैरान थे2
(ग) पहलवान की ढोलक बजनी बद क्यों हो गई?
(घ) पहलवान की अंतिम इच्छा क्या थी?

उत्तर –

(क) बीमारी से पहलवान के दोनों लड़के चल बसे। उस दिन उसने राजा श्यामानंद की दी हुई रेशमी जाँघिया पहनी, सारे शरीर पर मिट्टी मलकर थोड़ी कसरत की तथा फिर दोनों पुत्रों को कंधों पर लादकर नदी में बहा आया।
(ख) लोग पहलवान की आत्मशक्ति देखकर हैरान थे। दोनों जवान पुत्रों की मृत्यु पर भी वह हिम्मत नहीं हारा था। उसने रोज की तरह रात भर ढोलक बजाई। लोगों ने उसके कलेजे को डेढ़ हाथ का बताया। वे उसकी हिम्मत की दाद देते थे।
(ग) एक रात पहलवान के ढोलक की आवाज नहीं सुनाई दी। शिष्यों ने सुबह जाकर देखा तो पहलवान की मृत्यु हो चुकी थी।
(घ) पहलवान की अंतिम इच्छा थी कि मरने के बाद उसे चिता पर पेट के बल लिटा दिया जाए क्योंकि वह जीवन में कभी ‘चित’ नहीं हुआ। इसके अलावा चिता सुलगाने के समय ढोलक बजाया जाए।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

पाठ के साथ
प्रश्न 1:
कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज़ आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।
उत्तर –
कुश्ती के समय जब ढोल बजती थी तो लुट्टन की रगों में अजीब-सी हलचल पैदा हो जाती थी। उसका खून हर थाप पर उबलने लगता था। उसे ढोल की थाप प्रेरणा देती थी। उनके दाँव-पेंचों में अचानक फुरती और गति बढ़ जाती थी। पाठ में कई ध्वन्यात्मक शब्दों का उल्लेख भी कहानीकार ने किया है। ये शब्द हमारे मन को रंजित करते हैं, साथ ही हमें यह प्रेरणा भी देते प्रतीत होते हैं। इन शब्दों से मन में कुछ करने की लालसा जोर मारने लगती है। परोक्ष रूप से ये शब्द शक्ति देते हैं।

प्रश्न 2:
कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवतन आए?
उत्तर –
कहानी में अनेक मोड़ ऐसे हैं जहाँ पर लुट्टन के जीवन में परिवर्तन आते हैं। वे निम्नलिखित हैं-

  1. बचपन में नौ वर्ष की आयु में उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई और उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने किया। सास पर हुए अत्याचारों को देखकर बदला लेने के लिए वह पहलवानी करने लगा।
  2. किशोरावस्था में उसने श्यामनगर दंगल में चाँद सिंह नामक पहलवान को हराया तथा ‘राज-पहलवान’ का दर्जा हासिल किया। उसने ‘काला खाँ’ जैसे प्रसिद्ध पहलवानों को जमीन सुंघा दी तथा अजेय पहलवान बन गया।
  3. वह पंद्रह वर्ष तक राज-दरबार में रहा। उसने अपने दोनों बेटों को भी पहलवानी सिखाई। राजा साहब के अचानक स्वर्गवास के बाद नए राजा ने उसे दरबार से हटा दिया। वह गाँव लौट आया।
  4. गाँव आकर उसने गाँव के बाहर अपना अखाड़ा बनाया तथा ग्रामीण युवकों को कुश्ती सिखाने लगा।
  5. अकस्मात सूखा व महामारी से गाँव में हाहाकार मच गया। उसके दोनों बेटे भी इस महामारी की चपेट में आ गए। वह उन्हें कंधे पर लादकर नदी में बहा आया।
  6. पुत्रों की मृत्यु के बाद वह कुछ दिन अकेला रहा और अंत में चल बसा।

प्रश्न 3:
लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि ‘मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं यहींढोल है’?

अथवा

‘पहलवान की ढोलक’ पाठ के आधार बताइए कि लुट्टन सिंह ढोल को अपना गुरु क्यों मानता था?
उत्तर –
वास्तव में, लुट्न पहलवान का कोई गुरु नहीं था। जब पहली बार वह दंगल देखने गया तो वहाँ ढोल की थाप पर दांव-पेंच चल रहे थे। पहलवान ने इन थापों को ध्यान से सुना और उसमें अजीब-सी ऊर्जा भर गई। उसने चाँद सिंह को ललकारा और उसे चित कर दिया। ढोल की थाप ने उसे दंगल लड़ने की प्रेरणा दी और वह जीत गया। इसीलिए उसने कहा होगा कि उसका गुरु कोई पहलवान नहीं बल्कि यही ढोल है।

प्रश्न 4:
गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?
उत्तर –
गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल बजाता रहा। इसका कारण था-गाँव में निराशा का माहौल। महामारी व सूखे के कारण चारों तरफ मृत्यु का सन्नाटा था। घर-के-घर खाली हो गए थे। रात्रि की विभीषिका में चारों तरफ सन्नाटा होता था। ऐसे में उस विभीषिका को पहलवान की ढोलक ही चुनौती देती रहती थी। ढोल की आवाज से निराश लोगों के मन में उमंग जगती थी। उनमें जीवंतता भरती थी। वह लोगों को बताना चाहता था कि अंत तक जोश व उत्साह से लड़ते रहो।

प्रश्न 5:
ढोलक की आवाज का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?

अथवा

पहलवान की ढोलक की उठती-गिरती आवाज बीमारी से दम तोड़ रह ग्रामवासियों में सजीवनी का सचार कैसे करती है? उत्तर दीजिए।

अथवा

पहलवान की ढोलक साधनहीन गाँव वालों के प्रति क्या भूमिका निभाती थी? कैसे?
उत्तर –
ढोलक गाँववालों के लिए संजीवनी का काम करती थी। उनके मन में छाई उदासी को दूर करने में सहायक थी। उनके मन में जिजीविषा पैदा हो जाती थी। ढोल की हर थाप से उनके मन में चेतना आ जाती थी। बूढे, बच्चे जवानों की आँखों में अचानक चमक भर जाती थी। स्पंदनहीन और शक्तिहीन रगों में अचानक बिजली की तरह खून दौड़ने लगता था।

प्रश्न 6:
महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूयस्ति के दूश्य में क्या अंतर होता था?
उत्तर –
सूर्योदय का दूश्य-महामारी फैलने की वजह गाँव में सूर्योदय होते ही लोग काँखते-कूंखते, कराहते अपने घरों से निकलकर अपने पड़ोसियों व आत्मीयों को ढाँडस देते थे। इस प्रकार उनके चेहरे पर चमक बनी रहती थी। वे बचे हुए लोगों को शोक न करने की बात कहते थे। सूर्यास्त का दृश्य-सूर्यास्त होते ही सभी लोग अपनी-अपनी झोपड़ियों में घुस जाते थे। उस समय वे चूँ तक नहीं करते थे। उनके बोलने की शक्ति भी जाती रहती थी। यहाँ तक कि माताओं में दम तोड़ते पुत्र को अंतिम बार ‘बेटा!” कहकर पुकारने की हिम्मत भी नहीं होती थी। ऐसे समय में पहलवान की ढोलक की आवाज रात्रि की विभीषिका को चुनौती देती रहती थी।

प्रश्न 7:
कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शोक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था-
(क) ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं हैं?
(ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है?
(ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या काय किए जा सकते हैं?
उत्तर –
(क) अब न तो राजा रहे और न ही वे पहलवान। वास्तव में पहलवानी बहुत खर्चीला खेल है। फिर इसके लिए अभ्यास की नियमित आवश्यकता है। आज कल लोगों के पास इतना समय नहीं कि वे दिन में 18-20 कसरत करें फिर बदले में मिलता भी कुछ नहीं है। केवल नाम के सहारे पेट नहीं पल सकता।

(ख) कुश्ती की जगह अब घुड़सवारी, फुटबाल, क्रिकेट, टेनिस, बॉलीबाल, बेसबॉल आदि खेलों ने ली है। इन खेलों में पैसा और शोहरत दोनों हैं। फिर खेल से रिटायर होने के बाद भी जीविका बनी रहती है।

(ग) कुश्ती को यदि फिर से प्रिय खेल बनाना है तो इसके लिए राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को योजना बनानी चाहिए। व्यायामशालाएँ होनी चाहिए ताकि पहलवान कसरत कर सकें। अन्य खेलों की तरह ही जीतने वाले पहलवान को अच्छी खासी रकम इनाम में दी जानी चाहिए। यदि कोई पहलवान रिटायर हो जाए या दुर्घटना में उसे चोट लग जाए तो जीवनभर उसके लिए रोटी का प्रबंध किया जाना चाहिए।

प्रश्न 8:
अक्षय स्पष्ट करें –
आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।
उत्तर –
लेखक अमावस्या की रात की विभीषिका का चित्रण करता है। महामारी के कारण गाँव में सन्नाटा है। ऐसी स्थिति में कोई भावुक तारा आकाश से टूटकर अपनी रोशनी गाँव वालों को देना चाहे तो भी उसकी चमक व शक्ति रीस्ते में ही खत्म हो जाती है। तारे धरती से बहुत दूर हैं। भावुक तारे की असफलता पर अन्य तारे खिलखिलाकर हँसने लगते हैं। दूसरे शब्दों में, स्थिर तारे चमकते हुए लगते हैं तथा टूटा हुआ तारा समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 9:
पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया हैं। पाठ में से ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
(क) “अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी। निस्तब्धता सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी।”
गाँव में छाई मायूसी को देखकर लगता था मानो अँधेरी रात भी रो रही है। ऐसा लगता था कि खाली पड़े आकाश में करुण कराहें वह अपने मन में दबा लेना चाहती हो ताकि गाँव का दुख कम हो सके।

(ख) “रात्रि अपने भीषणताओं के साथ चलती रही।”
यद्यपि गाँव का परिवेश भयानक और उदासी से भरपूर था। अतः रात भी इस मायूसी को समेटे अपनी गति से बीतती रही।

(ग) “रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर चुनौती देती रहती थी।”
रात जो बहुत ही भयानक प्रतीत होती थी। अपने स्वाभाविक शोर से वह सभी को भयभीत कर देती थी। लेकिन पहलवान की ढोलक की थाप ने इस भयानकता को चुनौती दे डाली।

पाठ के आस-पास
प्रश्न 1:
पाठ में मलेरिया और हैजे से पीडित गाँव की दयनीय स्थिति को चित्रित किया गया है। आप ऐसी किसी अन्य आपद स्थिति की कल्पना करें और लिखें कि आप ऐसी स्थिति का सामना कैसे करेंगे/करेंगी?
उत्तर –
पिछले दिनों हमारे प्रदेश के एक कस्बे में डेंगू का प्रकोप फैल गया। हमारे कस्बे में 7-8 हजार लोग रहते हैं। देखते ही देखते डेंगू का कहर पूरे कस्बे पर छाने लगा। लोगों को आनन-फानन में सरकारी और गैर-सरकारी अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। शाम होते-होते यह डेंगू तेरह लोगों को लील चुका था जिनमें तीन बच्चे भी थे। ऐसी स्थिति से सामना होते ही हमने मरीजों को तुरंत नजदीक के अस्पताल में भर्ती करवाया। घर की साफ़-सफ़ाई के बारे में प्रत्येक व्यक्ति को बताया। साथ ही कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं के लोगों से संपर्क किया। वे कुछ ही देर में हमारे गाँव (कस्बे) में आ गए। उन्होंने जी जान से लोगों की सेवा की। वे कई दिनों तक हमारे कस्बे में रहे। इस प्रकार हमने डेंगू से जान माल की ज्यादा क्षति नहीं होने दी।

प्रश्न 2:
ढोलक की थाप मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति मरती रहती थी-कला से जीवन के संबंध को ध्यान में रखते हुए चर्चा कीचिए।
उत्तर –
कला का जीवन से प्रत्यक्ष संबंध है। संगीत व काव्य की श्रेष्ठता तो जग-प्रसिद्ध है। ये दोनों निराश मनों में उत्साह का संचार करते हैं। युद्ध में गीत व संगीत से जवानों में मर मिटने का जोश उत्पन्न हो जाता है। हास्य-व्यंग्य की कविताएँ सुनकर भ्रष्टाचारी तिलमिलाकर रह जाते हैं। इसी तरह पेंटिंग, नृत्य, अभिनय-ये तभी सफलता व प्रसिद्ध को प्राप्त करते हैं जब वे जीवन से जुड़ते हैं। संगीत पर हजारों व्यक्तियों को एक साथ झूमते देखा जा सकता है।

प्रश्न 3:
चचा करें- कलाओं का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज नहीं हैं।
उत्तर –
कला अपने बूते पर जीवित रहती है। कोई इसे मिटाना चाहे तो भी यह जीवित रहती है। फिर चाहे इसका रूप ही क्यों न बदल जाए। व्यवस्थाएँ कला को विकासशील बना सकती है लेकिन कला उन पर आश्रित बिलकुल नहीं। कई बार तो कला ही व्यवस्था को सुव्यवस्थित कर देती है। कला एक अमर और शाश्वत सत्य है जिसे निराश्रित नहीं किया जा सकता।

भाषा की बात
प्रश्न 1:
हर विषय, क्षेत्र, परिवेश आदि के कुछ विशिष्ट शब्द होते हैं। पाठ में कुश्ती से जुड़ी शब्दावली का बहुतायत प्रयोग हुआ है। उन शब्दों की सूची बनाइए। साथ हा नीचे दिए गए क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले कोई पाँच-पाँच शब्द बताइए-

उत्तर –

प्रश्न 2:
पाठ में अनेक अंश ऐसे हैं जो भाषा के विशिष्ट प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत करते है। भाषा का विशिष्ट प्रयोग न केवल भाषाई सर्जनात्मकता की बढावा देता है बल्कि कथ्य को भी प्रभावी बनाता हैं। यदि उन शब्दों, व्यक्यंशों के स्थान पर किन्हीं अन्य का प्रयोग किया जाए तो संभवतः वह अर्थगत चमत्कार और भाषिक सौंदर्य उद्घाटित न हो सके। कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं-

उत्तर –
रामपुर में दंगल हो रहा था। वहाँ ‘शेर का बच्चा’ दूसरों को ललकार रहा था। तभी मानसिंह ने चुनौती दी। यह सुनकर शेर का बच्चा उस पर बाज की तरह टूट पड़ा। मानसिंह ने दाँव काटा तथा उसे जमीन सुंघा दी। राजा साहब उसकी बहादुरी पर प्रसन्न हुए तथा उन्होंने उसे दरबार में रख लिया। राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्ध में चार चाँद लगा दिया। मानसिंह ने सारे राज्य में नाम कमाया किंतु पहलवान की स्त्री दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई।

प्रश्न 3:
जैसे क्रिकेट की कमेंट्री की जाती है, वैसे ही इसमें कुश्ती की कमेंट्री की गई है? आपको दोनों में क्या समानता और अंतर दिखाई पड़ता है?
उत्तर –
समानता

  1. दोनों में खिलाड़ियों का परिचय दिया जाता है।
  2. दोनों में हार-जीत बताई जाती है।
  3. दोनों में खेल की स्थिति का वर्णन किया जाता है।

असमानता
पाठ के आधार पर यही कहा जा सकता है कि कहानीकार ने क्रिकेट की तरह ही कुश्ती की भी कमेंट्री की है। इसीलिए प्रारंभिक रूप से इन दोनों खेलों की कमेंट्री में कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता। क्रिकेट की तरह ही कुश्ती के खेल में भी अंपायर रूपी रेफरी मैच (कुश्ती) को आरंभ करता है। यदि कोई पहलवान रूपी क्रिकेटर पंक्ति से बाहर जाता है तो उसे फाउल रूपी वाईडबॉल की तरह बाहर का इशारा किया जाता है। किंतु यदि दोनों खेलों के नियमों को देखें तो इनमें अंतर भी दिखाई देता है। क्रिकेट में वाइडबॉल के अलावा नो बॉल, स्टंपड, क्लीन बोल्ड आदि होते हैं जबकि कुश्ती में ऐसा नहीं है। क्रिकेट में ग्यारह खिलाड़ी खेलते हैं जबकि कुश्ती में दो।

अन्य हल प्रश्न

बोधात्मक प्रशन
प्रश्न 1:
‘ढोल में तो जैसे पहलवान की जान बसी थी -‘पहलवान की ढोलक’ पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर –
लुट्टन सिंह जब जवानी के जोश में आकर चाँद सिंह नामक मैंजे हुए पहलवान को ललकार बैठा तो सारा जनसमूह, राजा और पहलवानों का समूह आदि की यह धारणा थी कि यह कच्चा किशोर जिसने कुश्ती कभी सीखी नहीं है, पहले दाँव में ही ढेर हो जाएगा। हालाँकि लुट्टन सिंह की नसों में बिजली और मन में जीत का जज्बा उबाल खा रहा था। उसे किसी की परवाह न थी। हाँ, ढोल की थाप में उसे एक-एक दाँव-पेंच का मार्गदर्शन जरूर मिल रहा था। उसी थाप का अनुसरण करते हुए उसने ‘शेर के बच्चे’ को खूब धोया, उठा-उठाकर पटका और हरा दिया। इस जीत में एकमात्र ढोल ही उसके साथ था। अत: जीतकर वह सबसे पहले ढोल के पास दौड़ा और उसे प्रणाम किया।

प्रश्न 2:
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी के प्रारंभ में चित्रित प्रकृति का स्वरूप कहानी की भयावहता की ओर संकेत करता है। इस कथन पर टिप्पणी र्काजिए।
उत्तर –
कहानी के प्रारंभ में प्रकृति का स्वरूप कहानी की भयावहता की ओर संकेत करता है। रात के भयावह वर्णन में बताया गया है कि चारों तरफ सन्नाटा है। सियारों का क्रदन व उल्लू की डरावनी आवाज निस्तब्धता को कभी-कभी भंग कर देती थी। गाँव की झोपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज सुनाई पड़ती थी। बच्चे भी कभी-कभी निर्बल कंठों से ‘माँ-माँ’ पुकारकर रो पड़ते थे। इससे रात्रि की निस्तब्धता में बाधा नहीं पड़ती थी।

प्रश्न 3:
पहलवान लुट्टन के सुख-चैन भरे दिनों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर –
पहलवान लुट्टन के सुख-चैन के दिन तब शुरू हुए जब उसने चाँद सिंह को कुश्ती में हराकर अपना नाम रोशन किया। राजा ने उसे दरबार में रखा। इससे उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। पौष्टिक भोजन व राजा की स्नेह-दृष्टि मिलने से उसने सभी नामी पहलवानों को जमीन सुंघा दी। अब वह दर्शनीय जीव बन गया। मेलों में वह लंबा चोंगा पहनकर तथा अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मस्त हाथी की तरह चलता था। हलवाई उसे मिठाई खिलाते थे।

प्रश्न 4:
लुट्टन के राज-पहलवान बन जाने के बाद की दिनचय पर प्रकाश डालिए।
उत्तर –
लुट्टन जब राज-पहलवान बन गया तो उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। पौष्टिक भोजन मिलने से वह राज-दरबार का दर्शनीय जीव बन गया। ठाकुरबाड़े के सामने पहलवान गरजता-‘महावीर’। लोग समझ लेते पहलवान बोला। मेलों में वह घुटने तक लंबा चोंगा पहनकर तथा अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मतवाले हाथी की तरह चलता था। मेले के दंगल में वह लैंगोट पहनकर, शरीर पर मिट्टी मलकर स्वयं को साँड़ या भैंसा साबित करता रहता था।

प्रश्न 5:
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी का प्रतिपाद्य बताइए।
उत्तर –
पाठ का प्रतिपाद्य देखिए ।

प्रश्न 6:
लुट्टन पहलवान का चरित्र-चित्रण र्काजिए।

अथवा

‘पहलवान की ढोलक’ पाठ के आधार पर लुट्टन का चरित्र- चित्रण र्काजिए।
उत्तर –
लुट्टन पहलवान के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  1. व्यक्तित्व-लुट्टन सिंह लंबा-चौड़ा व ताकतवर व्यक्ति था। वह लंबा चोंगा पहनता था तथा अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधता था। वह इकलौती एवं अनाथ संतान था। अत: उसका पालन-पोषण उसकी विधवा सास ने किया था।
  2. भाग्यहीन-लुट्टन का भाग्य शुरू से ही खराब था। बचपन में माता-पिता गुजर गए। पत्नी युवावस्था में ही चल बसी थी। उसके दोनों लड़के महामारी की भेंट चढ़ गए। इस प्रकार वह सदैव पीड़ित रहा।
  3. साहसी-लुट्टन साहसी था। उसने अपने साहस के बल पर चाँद सिंह जैसे पहलवान को चुनौती दी तथा उसे हराया। उसने ‘काला खाँ’ जैसे पहलवान को भी चित कर दिया। महामारी में भी वह सारी रात ढोल बजाता था।
  4. संवेदनशील-लुट्टन में संवेदना थी। वह अपनी सास पर हुए अत्याचारों को सहन नहीं कर सका और पहलवान बन गया। गाँव में महामारी के समय निराशा का माहौल था। ऐसे में वह रात में ढोल बजाकर लोगों में जीने के प्रति उत्साह पैदा करता था।

प्रश्न 7:
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी का प्रतीकार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी व्यवस्था के बदलने के साथ लोक-कला और इसके कलाकार के अप्रासंगिक हो जाने को रेखांकित करती है। राजा साहब के मरते ही नयी व्यवस्था ने जन्म लिया। पुराने संबंध समाप्त कर दिए गए। पहलवानी जैसा लोकखल समाप्त कर दिया गया। यह ‘भारत’ पर ‘इंडिया’ के छा जाने का प्रतीक है। यह व्यवस्था लोक-कलाकार को भूखा मरने पर मजबूर कर देती है।

प्रश्न 8:
‘लुट्टन को गाँव वापस क्यों आना पडा?
उत्तर –
तत्कालीन राजा कुश्ती के शौकीन थे, परंतु उनकी मृत्यु के बाद विलायत से शिक्षा प्राप्त करके आए राजकुमार ने सत्ता संभाली। उन्होंने राजकाज से लेकर महल के तौर-तरीकों में भी परिवर्तन कर दिए। मनोरंजन के साधनों में कुश्ती का स्थान घुड़-दौड़ ने ले लिया। अत: पहलवानों पर राजकीय खर्च का बहाना बनाकर उन्हें जवाब दे दिया गया। इस कारण लुट्टन को गाँव वापस आना पड़ा।

प्रश्न 9:
पहलवान के बेटों की मृत्यु पर गाँव वालों की हिम्मत क्यों टूट गई?
उत्तर –
पहलवान के दोनों बेटे गाँव में फैली महामारी की चपेट में आकर चल बसे। इस घटना से गाँव वालों की हिम्मत टूट गई क्योंकि वे पहलवान को अपना सहारा मानते थे। अब उन्हें लगा कि पहलवान अंदर से टूट जाएगा तथा उनकी सहायता करने वाला कोई नहीं रहेगा।

प्रश्न 10:
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में किस प्रकार पुरानी व्यवस्था और नई व्यवस्था के टकराव से उत्पन्न समस्या को व्यक्त किया गया है?लिखिए।
उत्तर –
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में पुरानी व्यवस्था और नई व्यवस्था के टकराव से उत्पन्न समस्या यह है-

  1. पुरानी व्यवस्था में कलाकारों और पहलवानों को राजाओं का आश्रय एवं संरक्षण प्राप्त था। वे शाही खर्च पर जीवित रहते थे, पर नई व्यवस्था में ऐसा न था।
  2. पुरानी व्यवस्था में राज-दरबार और जनता द्वारा इन कलाकारों को मान-सम्मान दिया जाता था, पर नई व्यवस्था में उन्हें सम्मान देने का प्रचलन न रहा।

स्वयं करें

  1. लुट्टन कौन था? वह राज-पहलवान कैसे बना?
  2. “प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी मनुष्य को प्रसिद्ध के शिखर पर पहुँचा देती हैं।” इस आलोक में बताइए कि लुट्टन के मन में पहलवान बनने की इच्छा क्यों हुई?
  3. चाँद सिंह कौन था? वह किस नाम से प्रसिद्ध था और क्यों?
  4. चाँद सिंह पर विजय पाते ही लुट्टन की दशा और दिशा दोनों बदल गए, कैसे?
  5. यही आवाज मृत गाँव में संजीवनी भरती रहती थी। ‘पहलवान की ढोलक’ पाठ के आधार पर बताइए कि
    1. कौन-सी आवाज किस प्रकार संजीवनी का काम करती थी?
    2. गाँव को मृत क्यों कहा गया है?
  6. सत्ता-परिवर्तन के बाद पहलवान के जीवन में क्या-क्या बदलाव आए?
    अथवा
    “सत्ता-परिवर्तन के बाद सबसे अधिक परिवर्तन लुट्टन के जीवन में आया।” ‘पहलवान की ढोलक’ पाठ के आधार पर लिखिए।
  7. लुट्टन के चरित्र से हमें किस प्रकार और क्या प्रेरणा मिलती है?
  8. निम्नलिखित गद्याशों को बढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
    (अ) रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर चुनौती देती रहती थी। पहलवान संध्या से सुबह तक, चाहे जिस खयाल से ढोलक बजाता हो, किंतु गाँव के अद्र्धमृत, औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी। बूढ़े-बच्चे-जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। स्पंदन शक्ति-शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी।
    (क) किन कारणों से गाँव में रात्रि की विभीषिका इतनी बढ़ गईथी?
    (ख) महामारी के चलते ग्रामीण इतने असहाय-निरुपाय क्यों हो जाते हैं कि उन्हें ढोलक से शक्ति लेनी पड़ती हैं?
    (ग) मृतप्राय रोगियों पर ढोलक का क्या प्रभाव पड़ता था?
    (घ) पहलवान की ढोलक से क्या ग्रामीणों को सचमुच कोई लाभ होता था? आप क्या सोचते हैं?

(ब) अकस्मात गाँव पर यह वज्रपात हुआ। पहले अनावृष्टि, फिर अन्न की कमी, तब मलेरिया और हैजे ने मिलकर गाँव को भूनना शुरू कर दिया। गाँव प्राय: सूना हो चला था। घर के घर खाली पड़ गए थे। रोज दो-तीन लाशें उठने लगीं। लोगों में खलबली मची हुई थी। दिन में तो कलरव, हाहाकार तथा हृदय-विदारक रुदन के बावजूद भी लोगों के चेहरे पर कुछ प्रभा दृष्टिगोचर होती थी, शायद सूर्य के प्रकाश में सूर्योदय होते ही लोग काँखते-कूंखते-कराहते अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर अपने पड़ोसियों और आत्मीयों को ढाँढ़स देते थे।

(क) गाँव पर कैसा वज्रपात हुआ?
(ख) गाँव में खलबली क्यों मच गई
(ग) भयंकर बीमारी से ग्रस्त गाँव का दृश्य हृदयविदारक था। कैसे?
(घ) दिन में गाँव के कुछ चेहरों पर प्रभा क्यों दिखाई देती थी?

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