बाजार दर्शन

Textbook Questions and Answers
पाठ के साथ –

प्रश्न 1.
बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?
उत्तर :
बाजार का जादू चढ़ने पर व्यक्ति अधिक से अधिक वस्तु खरीदना चाहता है। तब वह सोचता है कि बाजार में बहुत कुछ है और उसके पास कम चीजें हैं। वह लालच में आकर गैर-जरूरी चीजों को भी खरीद लेता है। परन्तु जब बाजार का जादू उतर जाता है, तो उसे वे वस्तुएँ अर्थात् अपने द्वारा खरीदी गई वस्तुएँ अनावश्यक, निरर्थक एवं आराम में खलल डालने वाली लगती हैं। ‘

प्रश्न 2.
बाजार में भगतजी के व्यक्तित्व का कौनसा सशक्त पहलू उभर कर आता है? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शान्ति स्थापित करने में मददगार हो सकता है?
उत्तर :
भगतजी बाजार में आँखें खोलकर चलते हैं, लेकिन बाजार की चमक-दमक देखकर वे भौंचक्के नहीं होते। उन पर बाजार का जादू नहीं चलता, कोई असमंजस नहीं होता। वे वहाँ सन्तुलित रहकर सब कुछ देखते रहते हैं, परन्तु उनके मन में कोई अप्रीति या प्रीति का भाव नहीं आता है। वे खुली आँख, सन्तुष्ट मन और प्रसन्न हृदय से चौक बाजार में चले जाते हैं। उन्हें काला नमक और जीरा खरीदना है। इसलिए वे पंसारी की दुकान जाकर जरूरी सामान खरीद कर लौट आते हैं। इस तरह बाजार के प्रति उनका व्यक्तित्व निर्लिप्त दिखाया गया है।

तजी का ऐसा आचरण निश्चय ही समाज में शान्ति स्थापित करने में सहायक हो सकता है। समाज में अधिक-से-अधिक सामान जोड़ने की भावना, दिखावे की प्रतिस्पर्धा से अशान्ति उत्पन्न होती है। इसमें फिजूलखर्ची और महँगाई भी बढ़ती है। इच्छाओं का दमन न होने से असन्तोष पनपता है, घृणा-द्वेष बढ़ता है। भगतजी के समान आचरण से समाज में शान्ति स्थापित हो सकती है।

प्रश्न 3.
‘बाजारूपन’ से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?
उत्तर :
‘बाजारूपन’ का आशय है – ऊपरी चमक-दमक और कोरा दिखावा अर्थात् व्यवहार का सस्तापन, जिसके लिए व्यक्ति किसी भी स्तर पर उतर आता है। इसी तरह व्यापारी बेकार की चीजों को आकर्षक बनाकर ग्राहकों को ठगने लगते हैं, तो वहाँ बाजारूपन आ जाता है। ग्राहक भी जब क्रय-शक्ति के गर्व में अपने पैसे से गैर-जरूरी चीजों को भी खरीद कर विनाशक शैतानी-शक्ति को बढ़ावा देते हैं, तो वहाँ भी बाजारूपन बढ़ता है। इस प्रवृत्ति से न हम बाजार से लाभ उठा पाते हैं और न बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं।

जो लोग बाजार की चकाचौंध में न आकर अपनी आवश्यकता की ही वस्तुएँ खरीदते हैं, इसी प्रकार दुकानदार भी ग्राहकों को उचित मूल्य पर आवश्यकतानुसार चीजें बेचते हैं, उन्हें लोभ-लालच में रखकर ठगते नहीं हैं, इसमें भी बाजार की सार्थकता है।

प्रश्न 4.
बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय-शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर :
बाजार का काम है-वस्तुओं का विक्रय करना। बाजार को तो ग्राहक चाहिए। उसे इस बात से कोई. मतलब नहीं है कि वह ग्राहक कौन है, किस जाति या धर्म का है, पुरुष या स्त्री है। वह तो सभी को ग्राहक के रूप में देखता है तथा उसकी क्रय-शक्ति से ही मतलब रखता है। जो व्यक्ति चीजें खरीदने की शक्ति नहीं रखता है, बाजार के लिए वह ग्राहक निरर्थक है।

इस रूप में देखा जाए तो हम लेखक के इस मत से सहमत हैं कि बाजार जाति, धर्म, लिंग आदि का भेद मिटाकर सामाजिक समता की भी रचना करता है। परन्तु हम एक बात से पूरे सहमत नहीं हैं, क्योंकि क्रय-शक्ति न रखने वाला व्यक्ति स्वयं को दूसरों से हीन समझता है तथा उसमें कुछ निराशा का भाव आ जाता है। बाजार में अमीर और गरीब ग्राहकों में भेदभाव बढ़ता है, समता की हानि होती है तथा असन्तुष्टि तथा असंतोष का भाव उत्पन्न होता है।

प्रश्न 5.
आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें
(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।
(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आयी।
उत्तर :
‘पैसा पावर है’ यह कथन आज के युग में सत्य प्रतीत होता है। पैसे में काफी शक्ति है और वह व्यक्ति की अनेक कामनाओं की पूर्ति करने का साधन है। समाज में पैसे की शक्ति के उदाहरण आये दिन देखे जाते हैं।
(क) जिनके पास काफी पैसा है, उनके बच्चे कीमती मोटर-कारों में स्कूल जाते हैं, अधिकाधिक फीस देकर प्रसिद्ध पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं और डोनेशन के बल पर डाक्टर-इंजीनियर बन जाते हैं। लेकिन गरीबों के बच्चे फटेहाल, पैदल ही चलकर टाट-पट्टी से मोहताज साधारण स्कूलों में मुश्किल से पढ़ पाते हैं। इससे पैसे की शक्ति का परिचय सहज में मिल जाता है। असमानता का स्तर इस तरह बढ़ते ही जाता है।

(ख) जयपुर शहर के एक प्रसिद्ध व्यवसायी एवं धन्नासेठ के जवान बेटे को कैंसर हो गया। उसके उपचार में पानी की तरह पैसा खर्च किया गया और बड़े-बड़े डाक्टरों से महँगा इलाज करवाया गया, परन्तु वह नहीं बचाया जा सका। इस तरह उसकी जीवन-रक्षा में पैसे की शक्ति काम नहीं आयी।

पाठ के आसपास –

प्रश्न 1.
‘बाजार दर्शन’ पाठ में बाजार जाने या न जाने के सन्दर्भ में मन की कई स्थितियों का जिक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए
(क) मन खाली हो।
(ख) मन खाली न हो
(ग) मन बन्द हो
(घ) मन में नकार हो।
उत्तर :
(क)मन खाली हो-मैं बाजार की चौंधियाती सजावट को देखकर अटक जाता हूँ और अनावश्यक चीजों की चमक से आकृष्ट होकर उन्हें खरीद लाता हूँ। उदाहरण के लिए मैं एक बार रिमोट से उड़ने वाला एक खिलौना जहाज खरीद लाया। वह घर पर एक दिन चला भी, परन्तु दूसरे दिन वह खराब हो गया। इस तरह उसे खरीदने में पैसा व्यर्थ ही खर्च कर डाला।

(ख) मन खाली न हो-मन खाली न होने से व्यक्ति बाजार की चकाचौंध से आकृष्ट नहीं होता है तथा फिजूल की चीजें भी नहीं खरीदता है। जैसे मैं प्रतिदिन केवल सब्जी खरीदने जाता हूँ और केवल सब्जियाँ खरीद कर ही लौट आता हूँ। मैं बाजार की अन्य चीजों को देखता तक नहीं।

(ग) मन बन्द हो-जब मन बन्द हो, तो कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती है। जैसे मिठाई का मधुर स्वाद अरुचिकर लगता है, बाजार की सजावट एवं रोशनी फीकी लगती है, कोई भी वस्तु आकर्षक नहीं लगती है। तब वह व्यक्ति बाजार से तुरन्त लौट आता है।

(घ) मन में नकार हो-मन में नकारात्मक भाव रखने से बाजार पूरी तरह छल-कपट वाला लगता है। उदाहरण के लिए मावे की मिठाई में नकली मावे का मिश्रण लगता है, आईसक्रीम सेक्रीन मिली लगती है, फैशन के कपड़े बेढंगे लगते हैं और सारे व्यापारी ठग लगते हैं।

प्रश्न 2.
‘बाजार दर्शन’ पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?
उत्तर :
‘बाजार दर्शन’ पाठ में मुख्य रूप से निम्न चार प्रकार के ग्राहकों का उल्लेख हुआ है –

  1. संयमी और बुद्धिमान ग्राहक,
  2. आवश्यकतानुसार खरीदने वाले ग्राहक,
  3. बाजारूपन बढ़ाने वाले ग्राहक,
  4. पर्चेजिंग पावर का प्रदर्शन करने वाले ग्राहक।

वैसे कोई भी व्यक्ति सदा एक ही प्रकार का ग्राहक नहीं रहता है। समय और आवश्यकता के अनुसार ग्राहकों में परिवर्तन आ जाता है। मैं अपने आपको आवश्यकतानुसार वस्तुएँ खरीदने वाला ग्राहक मानता हूँ। मैं उसी वस्तु को खरीदना पसन्द करता हूँ, जिसकी जरूरत हो। गैर-जरूरी एवं फालतू चीजों को खरीदना मैं फिजूलखर्ची मानता हूँ और इसी बात का सदा ध्यान रखता हूँ।

प्रश्न 3.
आप बाजार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाजार और हाट की संस्कृति में आप क्या अन्तर पाते हैं? पर्चेजिंग पावर आपको किस तरह के बाजार में नजर आती है?
उत्तर :
हम बाजार की भिन्न-भिन्न संस्कृतियों से अच्छी तरह परिचित हैं। मॉल की संस्कृति चकाचौंध और दिखावे की होती है। बड़ी-बड़ी कम्पनियों के टैग के नाम पर वहाँ पर दो सौ रुपये की चीज पाँच सौ में मिलती है। फिर भी पर्चेजिंग पावर वाले लोग बड़ी शान से वहाँ आकर चीजें खरीद लाते हैं। वस्तुतः मॉलं में उच्च वर्ग के लोग अपनी जरूरतों के मुताबिक नहीं, क्रय-शक्ति के हिसाब से खरीददारी करते हैं।

सामान्य हाट-बाजार में वस्तुएँ वाजिब मूल्य पर मिलती हैं। वहाँ सामान्य लोग ग्राहक होते हैं और पर्चेजिंग पावर का दुरुपयोग नहीं होता है। वे अपनी जेब का ध्यान रख कर उचित मोल-भाव करके जरूरी वस्तुएँ खरीदते हैं।

प्रश्न 4.
लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाजार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर :
हम लेखक के इस मत से सहमत हैं। बाजार की शक्तियाँ अर्थात् मांग अधिक और पूर्ति कम होने से व्यापारी मूल्य-वृद्धि कर देते हैं। इस तरह माँग अधिक होने से दुकानदार शोषण और लूट पर उतर आते हैं। उदाहरण के लिए बाजार में चीनी, प्याज एवं दालों के दाम आसमान छू रहे हैं, फिर भी कम मिल रहे हैं। इसका मूल कारण लोगों की आवश्यकता या माँग की अधिकता है। जो शोषण का ही रूप है।

प्रश्न 5.
‘स्त्री माया न जोड़े’ यहाँ ‘माया’ शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति-प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौनसी परिस्थितियाँ होंगी जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?
उत्तर :
स्त्री को घर-गृहस्थी चलानी होती है, उसे घर की सुविधाओं एवं जरूरतों का ध्यान रखना पड़ता है। ‘माया’ शब्द से धन-सम्पत्ति तथा सांसारिक आकर्षण की ओर संकेत हुआ है। घर-गृहस्थी की जरूरतों की पूर्ति को लेकर पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ कुछ अधिक ही सचेष्ट रहती हैं। माया जोड़ना या साधन-सुविधाओं का विस्तार करना प्रत्येक व्यक्ति चाहता है, यह प्रकृति-प्रदत्त गुण है, परन्तु कभी-कभी परिस्थितिवश भी ऐसा करना पड़ता है।

जैसे स्त्रियाँ स्वयं को सुन्दर, सजी-धजी एवं सम्पन्न दिखाने की इच्छा रखती हैं। इस कारण वे क्रीम-पाउडर आदि प्रसाधन सामग्री, घर का सजावटी सामान तथा नये कपड़े आदि के साथ आभूषणों की खरीद करती हैं। इस तरह की प्रवृत्तियों के कारण वे माया को जोड़ने में विवश हो जाती हैं।

आपसदारी –

प्रश्न 1.
‘जरूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है’-भगतजी की इस सन्तुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए-
चाह गई चिंता गई मनुआँ बेपरवाह
जाके कछु न चाहिए सोइ सहंसाह।

प्रश्न 2.
विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’ (जिस पर ‘पहेली’ फिल्म बनी है) के अंश को पढ़ कर आप देखेंगे कि भगतजी की सन्तुष्ट जीवन-दृष्टि की तरह ही गड़रिए की जीवन-दृष्टि है, इससे आपके भीतर क्या भाव जगते हैं?
गड़रिया बगैर कहे ही उसके दिल की बात समझ गया, पर अंगूठी कबूल नहीं की। काली दाढ़ी के बीच पीले दाँतों की हँसी हँसते हुए बोला-‘मैं कोई राजा नहीं हूँ जो न्याय की कीमत वसूल करूँ। मैंने तो अटका काम निकाल दिया। और यह अंगूठी मेरे किस काम की। न यह अंगुलियों में आती है, न तड़े में। मेरी भेड़ें भी मेरी तरह गँवार हैं। घास तो खाती हैं, पर सोना सूंघती तक नहीं। बेकार की वस्तुएँ तुम अमीरों को ही शोभा देती हैं।’ – विजयदान देथा
उत्तर :
विद्यार्थी विजयदान देथा की यह कहानी पढ़ें और ‘पहेली’ फिल्म देखें। गड़रिए की जीवन-दृष्टि से हमारे हृदय में यह भाव जागता है कि आवश्यकताओं को सीमित रखने से ही जीवन में सुख-शान्ति मिलती है। अतः लोभ लालच के आकर्षण में कभी नहीं आना चाहिए।

प्रश्न 3.
बाजार पर आधारित लेख ‘नकली सामान पर नकेल जरूरी’ का अंश पढ़िए और नीचे दिए गए बिन्दुओं पर कक्षा में चर्चा कीजिए।
(क) नकली सामान के खिलाफ जागरूकता के लिए आप क्या कर सकते हैं?
(ख) उपभोक्ताओं के हित को मद्देनजर रखते हुए सामान बनाने वाली कम्पनियों के क्या नैतिक दायित्व
(ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे छिपी मानसिकता को उजागर कीजिए।

नकली सामान पर नकेल जरूरी

अपना क्रेता वर्ग बढ़ाने की होड़ में एफएमसीजी यानी तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कम्पनियाँ गाँव के बाजारों में नकली सामान भी उतार रही हैं। कई उत्पाद ऐसे होते हैं जिन पर न तो है और न ही उस तारीख का जिक्र होता है जिससे पता चले कि अमक सामान के इस्तेमाल की अवधि समाप्त हो चकी है। आउटडेटेड या पुराना पड़ चुका सामान भी गाँव-देहात के बाजारों में खप रहा है। ऐसा उपभोक्ता मामलों के जानकारों का मानना है। नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिडेसल कमीशन के सदस्य की मानें तो जागरूकता अभियान में तेजी लाए बगैर इस गोरखधंधे पर लगाम कसना नामुमकिन है।

.उपभोक्ता मामलों की जानकार पुष्पा गिरि माँजी का कहना है, “इसमें दो राय नहीं कि गाँव-देहात के बाजारों में नकली सामान बिक रहा है। महानगरीय उपभोक्ताओं को अपने शिकंजे में कसकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, खासकर ज्यादा उत्पाद बेचने वाली कम्पनियाँ, गाँव का रुख कर चुकी हैं। वे गाँव वालों की अज्ञानता और उनके बीच जागरूकता के अभाव का पूरा फायदा उठा रही हैं। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कानून जरूर हैं लेकिन कितने लोग इनका सहारा लेते हैं यह बताने की जरूरत नहीं। गुणवत्ता के मामले में जब शहरी उपभोक्ता ही उतने सचेत नहीं हो पाए हैं तो गाँव वालों से कितनी उम्मीद की जा सकती है।”

इस बारे में नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन के सदस्य जस्टिस एस.एन. कपूर का कहना है, “टीवी ने दूर-दराज के गाँवों तक में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को पहुँचा दिया है। बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ विज्ञापन पर तो बेतहाशा पैसा खर्च करती हैं लेकिन उपभोक्ताओं में जागरूकता को लेकर वे चवन्नी खर्च करने को तैयार नहीं हैं। नकली सामान के खिलाफ जागरूकता पैदा करने में स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी मिलकर ठोस काम कर सकते हैं। ऐसा कि कोई प्रशासक भी न कर पाए।”

बेशक, इस कड़वे सच को स्वीकार कर लेना चाहिए कि गुणवत्ता के प्रति जागरूकता के लिहाज से शहरी समाज भी कोई ज्यादा सचेत नहीं है। यह खुली हुई बात है कि किसी बड़े ब्रांड का लोकल संस्करण शहर या महानगर का मध्य या निम्न मध्य वर्गीय उपभोक्ता भी खुशी-खुशी खरीदता है। यहाँ जागरूकता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि वह ऐसा सोच-समझकर और अपनी जेब की हैसियत को जानकर ही कर रहा है। फिर गाँववाला उपभोक्ता ऐसा क्यों न करे। पर फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि यदि समाज में कोई गलत काम हो रहा है तो उसे रोकने के जतन न किए जाएँ। यानी नकली सामान के इस गोरखधंधे पर विराम लगाने के लिए जो कदम या अभियान शुरू करने की जरूरत है वह तत्काल हो।

(ख) उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखकर सामान बनाने वाली कम्पनियों का यह दायित्व है कि वे घटिया एवं नकली सामान नहीं बेचें। पुराने पड़े माल को या समयावधि समाप्त हुए माल को नया बनाकर बाजार में न भेजें। माल उचित मूल्य पर तथा उच्च कोटि का तैयार करना कम्पनियों का नैतिक दायित्व बनता है।

(ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे यह मानसिकता रहती है कि उसे अच्छी गुणवत्ता वाली माना जाता है। ब्रांडेड वस्तु महँगी भी होती है, परन्तु क्रय-शक्ति रखने वाले लोग उन्हें खरीदना अपनी शान समझते हैं। यह उनकी दिखावे की प्रवृत्ति होती है।

प्रश्न 4.
प्रेमचन्द की कहानी ‘ईदगाह’ के हामिद और उसके दोस्तों का बाजार से क्या सम्बन्ध बनता है? विचार करें।
उत्तर :
‘ईदगाह’ कहानी में हामिद के दोस्त खिलौने एवं मिठाइयाँ खरीदते हैं। वे बाजार के आकर्षण में आकर कम उपयोगी सामान खरीद लेते हैं। वे भरी जेब खाली मन वाले ग्राहकों की श्रेणी में आते हैं। हामिद अपनी दादी के कष्ट का ध्यान रखकर चिमटा खरीदता है। वह खाली जेब भरे मन वाले ग्राहक की तरह बाजार के आकर्षण में न आकर नितान्त उपयोगी चीज खरीद कर अपनी समझदारी दिखाता है।

विज्ञापन की दुनिया –

प्रश्न 1.
आपने समाचारपत्रों, टी.वी. आदि पर अनेक प्रकार के विज्ञापन देखे होंगे जिनमें ग्राहकों को हर तरीके से लुभाने का प्रयास किया जाता है। नीचे लिखे बिन्दुओं के सन्दर्भ में किसी एक विज्ञापन की समीक्षा कीजिए और यह भी लिखिए कि आपको विज्ञापन की किस बात ने सामान खरीदने के लिए प्रेरित किया –

  1. विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु
  2. विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य
  3. विज्ञापन की भाषा।
    उत्तर :
  4. दूरदर्शन एवं समाचारपत्रों में टूथ ब्रश एवं टूथ पाउडर के अनेक कम्पनियों के विज्ञापन आते हैं, उन्हें देखिए।
  5. ऐसे विज्ञापनों में जो डॉक्टर दिखाया जाता है, वह असली नहीं होता है, जो चमकदार दाँत एवं मसूड़े दिखाये जाते हैं, वे भी किसी स्वस्थ आदमी के न होकर नकली होते हैं।
  6. विज्ञापन की भाषा प्रभावपूर्ण होती है। स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करें, मुँह को स्वच्छ-सुगन्धित रखें, दाँतों से सड़न भगायें इत्यादि वाक्यों से विज्ञापन की भाषा रोचक बनायी जाती है।

प्रश्न 2.
अपने सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए आज किन-किन तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है? उदाहरण सहित उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए। आप स्वयं किस तकनीक या तौर-तरीके का प्रयोग करना चाहेंगे जिससे बिक्री भी अच्छी हो और उपभोक्ता गुमराह भी न हो।
उत्तर :
उत्पादक एवं व्यापारी अपना सामान बेचने के लिए अनेक तरीकों का प्रयोग करते हैं। जैसे –

अपने एजेंट रखना, जो घर-घर जाकर सामान दिखाकर प्रचार करें।
दूरदर्शन एवं समाचार-पत्रों में विज्ञापन देना।
पोस्टर चिपकाना या पैम्फलेट छपवाकर वितरित करना।
दामों की कटौती की घोषणा कर सेल लगाना।
माल का मूल्य किस्तों में लेना या एक्सचेंज की सुविधा देना।
उपभोक्ता को आकृष्ट करने के सभी तरीके अच्छे हैं, किन्तु हम ऐसा तरीका अपनाना चाहेंगे कि उपभोक्ता गुमराह . न हो, उसके साथ धोखाधड़ी न हो और उसका शोषण भी न हो। इसलिए हम सही या वाजिब मूल्य रखने एवं सामान प्रचार करेंगे और इस बात पर पूरी ईमानदारी दिखायेंगे।

भाषा की बात –

प्रश्न 1.
विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है कभी औपचारिक रूप में आती है तो कभी अनौपचारिक रूप में। पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।
उत्तर :
औपचारिक वाक्य –

  1. लोग संयमी होते हैं।
  2. चूरन वाले भगतजी पर बाजार का जादू नहीं चल सकता।
  3. एक बार की बात

अनौपचारिक वाक्य –

  1. उसकी महिमा का मैं कायल हूँ।
  2. बाजार है कि शैतान का जाल है।
  3. वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है।

प्रश्न 2.
पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं, जहाँ लेखक अपनी बात कहता है, कुछ वाक्य ऐसे हैं जहाँ वह पाठक वर्ग को सम्बोधित करता है। सीधे तौर पर पाठक को सम्बोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए और सोचिए कि ऐसे सम्बोधन पाठक से रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं।
उत्तर :
नोट – पाठ से ऐसे पाँच वाक्य स्वयं छाँटिए। वस्तुतः ऐसे वाक्य पाठकों को रचना पढ़ने में रुचिवर्द्धक होते हैं। इनसे सम्प्रेषणीयता भी बढ़ती है, नाटकीयता आ जाती है तथा आम बोलचाल की भाषा का परिष्कार भी होता है। इससे कथ्य में रोचकता आ जाती है।

प्रश्न 3.
नीचे दिए गए वाक्यों को पढ़िए –
(क) पैसा पावर है।
(ख) पैसे की उस पर्चेजिंग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है।
(ग) मित्र ने सामने मनीबैग फैला दिया।
(घ) पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते।
ऊपर दिए गए इन वाक्यों की संरचना तो हिन्दी भाषा की है लेकिन वाक्यों में एकाध शब्द अंग्रेजी भाषा के आए हैं। इस तरह के प्रयोग को कोड मिक्सिंग कहते हैं। एक भाषा के शब्दों के साथ दूसरी भाषा के शब्दों का मेलजोल! अब तक आपने जो पाठ पढ़े उसमें से ऐसे कोई पाँच उदाहरण चुनकर लिखिए। यह भी बताइए कि आगत शब्दों की जगह उनके हिन्दी पर्यायों का ही प्रयोग किया जाए तो सम्प्रेषणीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
उत्तर :
पाँच उदाहरण –

  1. मित्र बाजार गये थे कोई मामूली चीज लेने, पर लौटे तो एकदम बहुत-से बण्डल उनके पास थे।
  2. राह में बड़े-बड़े फैंसी स्टोर पड़ते हैं।
  3. सफ़िया फर्स्ट क्लास के वेटिंग रूम में बैठी थी।
  4. वह तत्त्व है मनीबैग, अर्थात् पैसे की गरमी या एनर्जी।
  5. परन्तु इस उदारता के डाइनामाइट ने क्षणभर में उन्हें उड़ा दिया।

ऊपर दिये गये वाक्यों की रचना हिन्दी भाषा की है। इनमें प्रयुक्त अंग्रेजी एवं उर्दू शब्दों के हिन्दी पर्याय मिल जाते हैं, परन्तु वाक्य में अभिव्यक्ति की सहजता, प्रखरता एवं सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से इस तरह के भाषागत मिश्रित प्रयोग उचित रहते हैं।

प्रश्न 4.
नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान देते हुए उन्हें पढ़िए –
(क) निर्बल ही धन की ओर झुकता है।
(ख) लोग संयमी भी होते हैं।
(ग) सभी कुछ तो लेने को जी होता था।
ऊपर दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ निपात हैं जो अर्थ पर बल देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वाक्य में इनके होने-न-होने और स्थान क्रम बदल देने से वाक्य के अर्थ पर प्रभाव पड़ता है, जैसे
मुझे भी किताब चाहिए। (मुझे महत्त्वपूर्ण है।) मुझे किताब भी चाहिए।(किताब महत्त्वपूर्ण है।)
आप निपात (ही, भी, तो) का प्रयोग करते हुए तीन-तीन वाक्य बनाइए। साथ ही ऐसे दो वाक्यों का भी निर्माण कीजिए जिसमें ये तीनों निपात एक साथ आते हों।
उत्तर :
ही – 1. राम ही यह काम करेगा।

  1. लड़कियाँ ही समझदार होती हैं।
  2. स्वयं को ही मूर्ख मत मानो।

भी – 1. वह कल भी आयेगा।

  1. रामू को भी काम करना पड़ेगा।
  2. विद्यार्थी भी काफी चतुर हैं।

तो – 1. पुस्तक तो उठाओ।

  1. चलो तो सही।
  2. पर उसने तो अनर्थ कर दिया।

तीनों का एक-साथ प्रयोग –

  1. वह तो जा ही रहा था, पर वे भी उसके साथ चल पड़े।
  2. आम जनता ही नहीं नेता भी कर्तव्यपालन करें तो देश की प्रगति होगी। चर्चा करें

प्रश्न 1.
पर्चेजिंग पावर से क्या अभिप्राय है?
बाजार की चकाचौंध से दूर पर्चेजिंग पावर का सकारात्मक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? आपकी मदद के लिए संकेत दिया जा रहा है –
(क) सामाजिक विकास के कार्यों में।
(ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में..।
उत्तर :
पर्चेजिंग पावर से अभिप्राय है- क्रय-शक्ति, अर्थात् इच्छित वस्तुओं की खरीद पाने की क्षमता।
(क) पर्चेजिंग पावर का सकारात्मक उपयोग करने के लिए उन वस्तुओं का अधिकाधिक क्रय करना चाहिए, जिनसे सामाजिक विकास के कार्यों को बढ़ावा मिले।
(ख) ग्रामीण क्षेत्रों में लघु-कुटीर उद्योगों के द्वारा उत्पादित वस्तुओं को अधिकाधिक खरीदने से उनकी आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ होगी। ग्रामीण हाट-बाजारों में उचित मूल्य की वस्तुएँ खरीदने से पर्चेजिंग पावर का सदुपयोग भी हो जायेगा।

RBSE Class 12 बाजार दर्शन Important Questions and Answers
लघूत्तरात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
लेखक ने बाजार से ढेर-सा सामान खरीद कर लाने तथा खाली हाथ लौटने वाले दोनों मित्रों के चिन्तन में क्या अन्तर बताया है?
उत्तर :
दोनों मित्रों के चिन्तन में कुछ अन्तर है। पहला मित्र थोड़ा-सा सामान लेने गया, परन्तु बाजार से ढेर सारा सामान खरीद लाया। उसकी जेब भरी हुई और मन खाली था। दूसरा मित्र बाजार से खाली आया। उसका मन दुविधाग्रस्त था। उसे बाजार की वस्तुओं ने ललचाया, परन्तु सभी कुछ लेने के चक्कर में कुछ भी नहीं ले सका। दोनों ही दुविधाग्रस्त थे।

प्रश्न 2.
‘बाजार दर्शन’ निबन्ध के आधार पर ‘बाजार के जादू’ को स्पष्ट करते हुए इससे बचने के उपाय लिखिए।
उत्तर :
‘बाजार के जादू’ का आशय बाजार में सुसज्जित अनेक चीजों के प्रति आकर्षण होना और उन्हें खरीदने के लिए लालायित रहना है। बाजार के जादू से बचने के लिए उपयोगी और निश्चित चीज ही खरीदनी चाहिए तथा व्यर्थ की लालसा और दिखावे की प्रवृत्ति से मुक्त रहना चाहिए।

प्रश्न 3.
“जो लोग बाजार से लाभ नहीं उठा सकते और न ही बाजार को सच्चा लाभ दे सकते हैं, वे लोग बाजार का बाज़ारूपन ही बढ़ाते हैं।” कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
जो लोग पर्चेजिंग पावर या क्रय-शक्ति के गर्व में बाजार से अनावश्यक वस्तुओं को खरीद लाते हैं, वे बाजार को विनाशक व्यंग्य-शक्ति देते हैं। ऐसे लोगों की वजह से बाजार में छल-कपट, मूल्य वृद्धि आदि प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं। इससे बाजार को सच्चा लाभ नहीं होता है, उसमें सद्भाव की कमी और लूट-खसोट आदि की वृद्धि होती है।

प्रश्न 4.
“वे लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं”- ‘बाजार-दर्शन’ अध्याय के आधार पर बताइये कि ‘वे लोग’ किसके लिए कहा गया है और वे बाजारूपन कैसे बढ़ाते हैं?
उत्तर :
‘वे लोग’ का आशय है – क्रय-शक्ति से सम्पन्न व्यक्ति। इस तरह के लोग अपनी क्रय-शक्ति से अनावश्यक वस्तुओं की भी खरीददारी करते हैं। इस कारण बाजारवाद, छल-कपट, मनमाना मूल्य लेना आदि प्रवृत्तियों को बल मिलता है। अतः असीमित पर्चेजिंग पावर रखने वाले लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं। .

प्रश्न 5.
“बाजार में एक जादू है।” लेखक के अनुसार बाजार का जादू किस पर नहीं चलता है? बताइये।
उत्तर :
जिन लोगों की क्रय-शक्ति होने पर भी मन भरा हुआ हो, अर्थात् उसमें किसी चीज को लेने का निश्चित. .. लक्ष्य हो, उपयोगी सामान खरीदने की जरूरत हो और अन्य कोई लालसा न हो, ऐसे लोगों पर बाजार का जादू नहीं चलता है।

प्रश्न 6.
“बाजार जाओ तो खाली मन न हो।” इससे लेखक का क्या आशय है?
उत्तर :
इसका आशय यह है कि मन में अमुक चीज लेने का लक्ष्य हो, मन उसी चीज तक सीमित हो तथा बाजार में फैली हुई नाना चीजों के प्रति कोई आकर्षण न हो। आवश्यकता की चीजें खरीदना, बाजार के आकर्षण से बचना और क्रय-शक्ति का दुरुपयोग न करना-इसी में बाजार की असली उपयोगिता है।

प्रश्न 7.
“ऐसे बाजार मानवता के लिए विडम्बना हैं।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
लेखक बताता है कि. जिसमें लोग आवश्यकता से अधिक सब कुछ खरीदने का दम्भ भरते हैं, अपनी पर्चेजिंग पावर से बाजार को पैसे की विनाशक शक्ति देते हैं, ऐसे बाजार में छल-कपट, लूट-खसोट और मनमाना व्यवहार बढ़ता है। लेखक ने ऐसे बाजार को मानवता के लिए विडम्बना बताया है।

प्रश्न 8.
“मन खाली नहीं रहना चाहिए।” इससे लेखक क्या कहना चाहता है? ‘बाजार-दर्शन’ में इसका क्या प्रभाव रहता है?
उत्तर :
इससे लेखक कहना चाहता है कि बाजार जाते समय मन में किसी निश्चित वस्तु को खरीदने का लक्ष्य रखना चाहिए। प्रायः देखा जाता है कि बाजार की चकाचौंध में पड़कर लोग व्यर्थ की वस्तुएँ भी खरीद लेते हैं। अतः मन भरा होने से बाजार के दोषों से बचा जा सकता है और धन का दुरुपयोग भी नहीं होता है।

प्रश्न 9.
चूरन वाले भगतजी पर बाजार का जादू क्यों नहीं चलता था?
उत्तर :
भगतजी का चूरन प्रसिद्ध था और हाथों-हाथ बिक जाता था। वे एक दिन में छह आने से अधिक नहीं कमाते थे और इतनी कमाई होते ही बाकी चूरन बच्चों में मुफ्त बाँट देते थे। वे बाजार से काला नमक और जीरा खरीदने जाते, तो सीधे पंसारी के पास जाकर खरीद लाते थे। उन पर चौक बाजार का न कोई आकर्षण रहता था और न कोई लालच। बाजार की चकाचौंध से मुक्त रहने से ही उन पर उसका जादू नहीं चलता था।

प्रश्न 10.
लेखक ने किस अर्थशास्त्र को मायावी तथा अनीतिशास्त्र कहा है?
उत्तर :
धन एवं व्यवसाय में उचित सन्तुलन रखने और विक्रय-लाभ आदि में मानवीय दृष्टिकोण रखने से अर्थशास्त्र को उपयोगी माना जाता है, परन्तु जब बाजार का लक्ष्य अधिक-से-अधिक लाभार्जन करने, तरह-तरह के विज्ञापन एवं प्रदर्शन द्वारा ग्राहकों को गुमराह करने और छलने का हो जाता है, तब उस अर्थशास्त्र को मायावी और अनीतिशास्त्र कहा है।

प्रश्न 11.
पर्चेजिंग-पावर का रस किन दो रूपों में प्राप्त होता है? ‘बाजार दर्शन’ पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर :
पर्चेजिंग-पावर का रस –

  1. तरह-तरह की चीजें खरीदने, मकान, कार आदि सुख-विलास की चीजें खरीदने में प्राप्त होता है।
  2. कुछ लोग ऐसी चीजें खरीद लेते हैं, जिनकी उन्हें जरूरत नहीं रहती है, परन्तु बाजार पर अपना रौब जमाने के लिए अथवा स्वयं को सम्पन्न बताने के लिए काफी कुछ खरीद लाते हैं और पर्चेजिंग-पावर के कारण गर्व एवं आनन्द का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 12.
“शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है।” लेखक ने ऐसा किस उद्देश्य से कहा है?
उत्तर :
लेखक ने ऐसा मनुष्य और परमात्मा में अन्तर बताने के लिए कहा है। परमात्मा सनातन भाव से सम्पूर्ण है, इसमें कोई इच्छा शेष नहीं है, जबकि मनुष्य अपूर्ण है। उसके मन में इच्छाओं का उठना स्वाभाविक है। मनुष्य का मन बन्द नहीं रह सकता, यदि उसका मन बन्द हो जायेगा, तो वह शून्य हो जायेगा। मनुष्य के द्वारा सभी इच्छाओं का निरोध कदापि सम्भव नहीं है।

प्रश्न 13.
मन को बन्द रखने या वश में रखने के सम्बन्ध में लेखक ने क्या विचार व्यक्त किये हैं?
उत्तर :
इस सम्बन्ध में लेखक का विचार है कि मन को बन्द रखने पर वह शून्य हो जायेगा। उस दशा में उसका सोचना, चिन्तन करना, इच्छा-पूर्ति की लालसा करना आदि सब बन्द हो जायेगा। ऐसा करना हठयोग कहलाता है और इससे मन जड़ हो जायेगा। मनुष्य के लिए इस तरह का आचरण न तो ठीक है और न सम्भव ही है। वैसे भी इससे मनुष्य के सांसारिक प्रयोजन सिद्ध नहीं होते हैं।

प्रश्न 14.
पैसे की व्यंग्य-शक्ति को लेखक ने क्या बताया है? ‘बाजार-दर्शन’ अध्याय के अनुसार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
लेखक ने पैसे की व्यंग्य-शक्ति को दारुण तथा मन में दुर्भावना बढ़ाने वाली बताया है। पैसे की अधिकता से व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगता है और स्वार्थी बन जाता है। पैसे के अभाव में व्यक्ति सोचता है कि मैं मोटरवालों के, धनपतियों और वैभवशालियों के घर में क्यों पैदा नहीं हुआ। इस तरह पैसे की व्यंग्य-शक्ति व्यक्ति में ईर्ष्या-द्वेष एवं हीन-भावना बढ़ाती है। इस तरह दोनों ही परिस्थितियों में पैसे की व्यंग्य शक्ति मनुष्य के लिए अहितकर होती है।

प्रश्न 15.
‘बाजार दर्शन’ निबन्ध का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘बाजार दर्शन’ निबन्ध में लेखक ने आधुनिक काल के बाजारवाद और उपभोक्तावाद का चिन्तन कर इसके मूल तत्त्व को समझाने का प्रयास किया है। इसका प्रतिपाद्य यह है कि ब्यक्ति को बाजार के आकर्षण से बचना चाहिए, अपनी पर्चेजिंग पावर का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए तथा मन में आवश्यकताओं का निश्चय करके ही बाजार जाना चाहिए। तभी उसे बाजार का लाभ मिलेगा।

निबन्धात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘बाजार में एक जादू है’ इस कथन में ‘बाजार दर्शन’ पाठ के आधार पर लेखक के विचार व्यक्त . कीजिए।
उत्तर :
‘बाजार एक जादू है’ यह कथन इस बात को बताता है कि बाजार में एक सम्मोहन है, आकर्षण है जो ग्राहकों को अपनी ओर खींचता है तथा उसे किसी न किसी भाँति फाँस कर उसके पैसे खर्च करवा ही देता है। बाजार में सजी वस्तुएँ अपने आकर्षण से उसे खरीदने को मजबूर कर ही देती हैं। यह जादू उन लोगों पर ज्यादा प्रभाव डालता है, जिनका मन खाली हो अर्थात् जिन्हें अपनी जरूरतों का पता नहीं होता और जेब भरी होती है।

उन्हें बाजार में जो अच्छा लगता है उसे वे खरीद लेते हैं ये जाने बिना कि उन्हें उनकी कितनी जरूरत है। इस जादू के उतरने पर उन्हें पता चलता है कि ज्यादा चीजें सुख नहीं देतीं बल्कि उसमें बाधा डालती हैं, जैसे-लेखक के मित्र मामूली चीज लेने गए थे और अनेक सामानों से भरे बण्डल ले आये। यह बाजार का जादू ही था जिसने उनकी जेब खाली करवा दी।

प्रश्न 2.
‘बाजार-दर्शन’ पाठ में चित्रित भगतजी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए। .
उत्तर :
चूरन वाले भगत जी बाजार के आकर्षण से दूर तथा भरे मन वाले व्यक्ति हैं। जिनके मन में तुष्टता का अर्थात् प्रसन्नता का भाव निहित है। वे अपना लक्ष्य व उद्देश्य सदैव साथ लेकर चलते हैं। वे बाजार-चौक की भव्यता एवं सजावट से मोहित नहीं होते हैं। कोई असमंजस नहीं होता है। उनके मन में बाजार के प्रति कोई अप्रीति का भाव नहीं है। वे बाज़ारूपन की प्रवृत्ति से सदैव दूर रहते हैं इसलिए ग्राहक और विक्रेता का कपटीपन उनके हृदय में प्रवेश भी नहीं पा सकता है।

वे सदैव छः आने का चूरन बेचते और बच जाने पर बच्चों में मुफ्त बाँट देते हैं। अनेक फैन्सी स्टोर के सामने से गुजरते वक्त भी उनका मन नहीं ललचाता। उनका कार्य पंसारी की दुकान से होता जहाँ से वह जीरा व काला नमक खरीद कर वापस आ जाते। वे खुली आँख, संतुष्ट मन व प्रसन्नचित्त हृदय वाले व्यक्ति हैं। वे जरूरत-भर को अपना सामान खरीद बाजार को कृतार्थता प्रदान करते हैं।

प्रश्न 3.
बाजार के जादू से बचने का सीधा-सरल उपाय लेखक जैनेन्द्र कुमार ने कौनसा बताया है? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
लेखक जैनेन्द्र कुमार के अनुसार बाजार के जादू से किस प्रकार बचा जा सकता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
पाठ ‘बाजार-दर्शन’ में लेखक ने बताया है कि बाजार के जादू की जकड़ से बचने का सीधा उपाय है कि जब भी बाजार जाओ तब मन खाली मत रखो, मन का खाली होना अर्थात् उद्देश्य या लक्ष्य से भटकना है। बिना आवश्यकता, बिना जरूरत बाजार जाना व्यर्थ है। जिस प्रकार गर्मियों में लू से बचने के लिए पानी पीकर जाना अर्थात् पेट का भरा होना लू से बचाता है उसी प्रकार मन का रिक्त होना मन को उलझाता है तथा निरर्थक खरीदारी को प्रोत्साहित करता है। इसलिए लेखक ने मन को लक्ष्य से भरा, सन्तष्टि व प्रसन्नता से भरा होने पर जोर दिया है। इन सबके भरे होने से मन पर बाजार का जादू निष्क्रिय है, बेकार-व्यर्थ है।

प्रश्न 4.
पैसे की व्यंग्य शक्ति’ से लेखक का क्या अभिप्राय है और यह किस प्रकार प्रभावित करती है?
उत्तर :
‘पैसे की व्यंग्य शक्ति’ मन से खाली अर्थात् मन से कमजोर व्यक्ति पर अपना प्रभाव डालती है। लेखक ने एक उदाहरण द्वारा बताया है कि जैसे कोई पैदल चल रहा है और उसके पास से धूल उड़ाती मोटर पैदल चलते व्यक्ति को अपनी शक्ति बताती है। यही व्यंग्य शक्ति है कि पैदल चलते व्यक्ति के मन में हीनता के भाव उत्पन्न होते हैं। वह सोचने को विवश हो जाता है कि उसने अमीर के घर जन्म क्यों नहीं लिया? पैसे की शक्ति अपने सगों के प्रति कृतघ्न बना देती है।

उसे उसका जीवन विडम्बना से पूर्ण बताती है कि तुम मुझसे वंचित हो और तुम इसीलिए दुःखी व परेशान हो। यह पैसे की व्यंग्य शक्ति मन से कमजोर व्यक्ति को ही विचलित करती है ‘भगतजी’ जैसे व्यक्तियों को नहीं, जिनके मन में बल है, शक्ति है, जो पैसे के तीखे व्यंग्य के आगे अजेय ही नहीं रहता वरन् उस व्यंग्य की क्रूरता को पिघला भी देता है।

प्रश्न 5.
बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता, वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर :
बाजार का कार्य है-वस्तुओं का विक्रय करना। बाजार को अपनी वस्तुओं को बेचने को ग्राहक की जरूरत है। उसे किसी के लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र से कोई मतलब नहीं है। उसे सिर्फ क्रय-शक्ति को देखना है। इस मत से देखा जाये तो लेखक का कथन सत्य है कि बाजार का यह व्यवहार सामाजिक समता की रचना करता है।

लेकिन इसमें भी क्रेता की सम दृष्टि साबित होती है, विक्रेता की नहीं। क्योंकि क्रय-शक्ति से हीन व्यक्ति स्वयं को औरों के समक्ष कमजोर व दुर्बल समझता है। हीनता की भावना उसकी गरीबी का मजाक उड़ाती-सी प्रतीत होती है इसलिए यह बात सिर्फ एक ही पक्ष पर लागू होती है। दूसरे पक्ष को इस अन्तर की वेदना व असमानता सदैव भोगनी पड़ती है।

रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न –

प्रश्न 1.
जैनेन्द्र कुमार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय संक्षेप में दीजिए।
उत्तर :
लेखक जैनेन्द्र कुमार का जन्म 1905 ई. में अलीगढ़ में हुआ था। बचपन में पिता का देहान्त होने पर मामा द्वारा लालन-पालन हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर के गुरुकुल तथा उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हुई। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ परख, अनाम, स्वामी, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, जयवर्द्धन, मुक्तिबोध (उपन्यास); संग्रह वातायन, एक रात, दो चिड़िया, फाँसी, नीलम देश की राजकन्या, पाजेब (कहानी-संग्रह); प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार (निबनध संग्रह) आदि हैं। इन्होंने अपने उपन्यासों एवं कहानियों के माध्यम से एक सशक्त मनोवैज्ञानिक कथा-धारा की शुरुआत की। साहित्य रचना के दौरान इन्हें पद्मविभूषण, भारत-भारती तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इनका देहान्त सन् 1990 में हुआ था।

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