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बाजार दर्शन

जैनंद्र कुमार

बाजार दर्शन

अभ्यास

  1. बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?

उत्तर बाजार का जादू चढ़ने पर प्रभाव जिस प्रकार चुंबक लोहे को अपनी ओर खींचता है, उसी प्रकार बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य उसकी ओर आकर्षित होता है। उसे लगता है कि मैं यह सामान ले लूँ, वह भी ले लूँ। उसे सभी वस्तुएँ अनिवार्य तथा आराम बढ़ाने वाली मालूम होती हैं।

बाजार का जादू उतरने पर प्रभाव मनुष्य पर बाजार के जादू के उतरने का प्रभाव यह पड़ता है कि फैंसी चीजों की बहुतायत प्रायः आराम में मदद नहीं देती, बल्कि खलल ही डालती हैं। उसे लगने लगता है कि इससे थोड़ी देर गर्व जरूर महसूस होता है, पर इससे अभिमान की गिल्टी को और खुराक ही मिलती है।

  1. बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है?

उत्तर बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनकी आत्म-संतुष्टि के माध्यम से सामने आता है। यह अपनी इस जीवन दृष्टि के बल पर केवल आवश्यकतानुसार वस्तुओं का क्रय करते हैं। ऐसे व्यक्ति पर बाजार की चकाचौंध अपना प्रभाव नहीं डाल सकती है। वह खुली आँख, तुष्ट मन और भग्न भाव से चौक-बाजार में से चले जाते हैं। उनको जीरा और काला नमक खरीदना है, अतः पंसारी की दुकान पर रुकते हैं। उनके व्यक्तित्व का यह सशक्त पहलू पाठ में उजागर हुआ है। निश्चय ही उनका आचरण बाजार में शांति स्थापित करने में

मददगार हो सकता है। ऐसे आचरण वाले व्यक्ति बाजार से लाभ उठा सकते हैं और बाजार को सच्चा लाभ भी दे सकते हैं। अधिक से अधिक सामान जोड़ने की भावना समाज में अशांति उत्पन्न करती है। आवश्यकतानुसार खरीदने पर असंतोष नहीं उभरता। इससे आपसी सद्भावना बढ़ती और परस्पर मानवीय गुणों का विकास होता है।

  1. 'बाजारूपन' से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?

उत्तर 'बाजारूपन' से अर्थ बाजारूपन का तात्पर्य ऊपरी चमक-दमक एवं दिखावे की प्रवृत्ति से है, जो कपट को बढ़ाता है। इसके बढ़ने से परस्पर सद्भावना में कमी आ जाती है। इससे मनुष्य आपस में भाई-भाई, मित्र या पड़ोसी नहीं रह जाते। वे आपस में केवल ग्राहक और विक्रेता की भाँति व्यवहार करते हैं। बाजारूपन में एक की हानि को दूसरा अपना लाभ समझता है। बाजारूपन में शोषण अधिक और आवश्यकताओं का आदान-प्रदान कम होता है।

बाजार की सार्थकता लेखक के विचार से वे व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं जो अपनी आवश्यकताओं को ठीक-ठीक समझकर बाजार का उपयोग करते हैं। यदि हम उसकी चमक-दमक में फँस गए तो वह असंतोष, तृष्णा एवं ईर्ष्या से घायल कर बेकार बना डालती है। बाजार की सार्थकता इसी में है कि वहाँ भगत जी जैसे ग्राहक आएँ जो अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुएँ खरीदने निश्चित स्थान पर ही जाते हैं।

  1. बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता, वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर सामाजिक समता से अभिप्राय सभी धर्मों और संप्रदायों की समानता या बराबरी है। बाजार में सभी जाति, धर्म व लिंग के व्यक्ति आते हैं। सभी अपने प्रयोजन की वस्तुएँ खरीदते हैं। हमारे देश में जाति, धर्म, भाषा, प्रदेश आदि के भेद विद्यमान रहते हुए भी सामाजिक और सांस्कृतिक समानता है। सभी लोगों को समान अधिकार प्राप्त हैं। व्यक्ति की महत्ता उसकी क्रय शक्ति पर निर्भर करती है। विक्रेता उसी ग्राहक को महत्त्व देता है जो अधिक खरीददारी करता है। इस दृष्टि से जाति-धर्म का भेद मिटाकर बाजार सामाजिक समरसता की रचना करता है। लेखक के इस मत से हम सहमत हैं, क्योंकि समाज के अन्य क्षेत्रों में कहीं-कहीं अवरोध दिखाई देता है; जैसे-मंदिरों में कुछ जातियों को पूजा से रोका जाता है। मुसलमानों में भी विभेद हैं। यह विभाजन सामाजिक क्षमता को कम करने वाला है। इस दृष्टि से

बाजार सामाजिक समता की रचना करते हैं। यहाँ जाति, लिंग, धर्म के आधार पर कोई भेद नहीं होता।

  1. आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें

(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।

(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।

उत्तर (क) बम्बई जैसे महानगर में मेरी बहन ने मकान खरीदा और अब जब वह कहीं भी जाती है तो सब यह सुनकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि उसके पास फ्लैट नहीं अपना मकान है। अब वह सामाजिक दृष्टि से संपन्न लोगों में गिनी जाती है।

(ख) जब इंदिरा गाँधी जी को आतंकवादियों ने गोल मार दी तब अपार धन-दौलत होते हुए भी उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सका।

पाठ के आस-पास

  1. 'बाजार दर्शन' पाठ में बाजार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का जिक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए

(क) मन खाली हो

(ख) मन खाली न हो

(ग) मन बंद हो

(घ) मन में नकार हो

उत्तर (क) मेरी जेब भरी थी और मन खाली था, तब मैंने बिना सोचे समझे खरीददारी की। इस प्रकार की खरीददारी से मैंने अनेक अनावश्यक वस्तुएँ भी खरीदीं।

(ख) जब मन खाली नहीं होता तब हम आवश्यकता की वस्तुएँ ही खरीदते हैं, जो हमारे लिए उपयोगी होती हैं। इस प्रकार समय और पैसा दोनों की बचत एवं सदुपयोग होता है।

(ग) मन बंद होने की स्थिति में भरे बाजार के बीच में से निकलने पर भी कुछ लेने का विचार नहीं आता।

(घ) मन में नकार होने की स्थिति में कुछ भी चीज आकर्षित नहीं करती। व्यक्ति प्रत्येक चीज में शंका करता है क्योंकि उनका दृष्टिकोण नकारात्मक रहता है। ऐसी स्थिति में घर से बाहर जाने की इच्छा समाप्त हो जाती है।

  1. नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान देते हुए उन्हें पढ़िए

(क) निर्बल ही धन की ओर झुकता है।

(ख) लोग संयमी भी होते हैं।

(ग) सभी कुछ तो लेने को जी होता था।

ऊपर दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश 'ही', 'भी', 'तो' निपात हैं जो अर्थ पर बल देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वाक्य में इनके होने-न-होने और स्थान क्रम बदल देने से वाक्य के अर्थ पर प्रभाव पड़ता है; जैसे-

मुझे भी किताब चाहिए। (मुझे महत्त्वपूर्ण है।)

मुझे किताब भी चाहिए। (किताब महत्त्वपूर्ण है।)

आप निपात (ही, भी, तो) का प्रयोग करते हुए तीन-तीन वाक्य बनाइए। साथ ही ऐसे दो वाक्यों का भी निर्माण कीजिए जिसमें ये तीनों निपात एक साथ आते हों।

उत्तर छात्र स्वयं करें।

औपचारिक वाक्य

अनौपचारिक वाक्य

  1. पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं, जहाँ लेखक अपनी बात कहता है तथा कुछ वाक्य ऐसे हैं जहाँ वह पाठक-वर्ग को संबोधित करता है। सीधे तौर पर पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए और सोचिए कि ऐसे संबोधन पाठक से रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं?

उत्तर छात्र स्वयं करें।

  1. नीचे दिए वाक्यों को पढ़िए

(क) पैसा पावर है।

(ख) पैसे की उस पर्चेंज़िग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है।

(ग) मित्र के सामने मनीबैग फैला दिया।

(घ) पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते।

ऊपर दिए गए इन वाक्यों की संरचना तो हिंदी भाषा की है लेकिन वाक्यों में एकाध शब्द अंग्रेजी भाषा से आए हैं इस तरह के प्रयोग को कोड मिक्सिंग कहते हैं। एक भाषा के शब्दों के साथ दूसरी भाषा के शब्दों का मेलजोल! अब तक आपने जो पढ़े उसमें से ऐसे कोई पाँच उदाहरण चुनकर लिखिए। यह भी बताइए कि आगत शब्दों की जगह उनके हिंदी पर्यायों का ही प्रयोग किया जाए तो संप्रेषणीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर प्रत्येक भाषा के शब्द की अपनी अलग पहचान होती है। दूसरी भाषा में उसके पर्यायवाची शब्द तो मिलेंगे लेकिन अभिव्यक्ति की सटीकता में अंतर आ जाता है। इसीलिए रचनाकार भावों की सटीक अभिव्यक्ति एवं संप्रेषणीयता के लिए विभिन्न भाषा के उपयुक्त शब्दों का चयन करता है।

उदाहरण

  1. 'स्त्री माया न जोड़े', यहाँ 'माया' शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?

उत्तर माया शब्द का अर्थ है सांसारिक आराम पहुँचाने वाली वस्तुएँ। जो हमारे सुख-भोग और विलासिता की परिचायक होती हैं। स्त्रियों की प्रकृति सौंदर्य के प्रति आकर्षित होने की होती है। वे घर को सुंदर बनाने, साजो-समान जोड़ने का कार्य करती हैं। सामाजिक स्तर और परिस्थितियाँ भी उनके इस गुण में वृद्धि करते हैं। अपने भविष्य व अपने बच्चों के भविष्य को सँवारने के प्रति भी वे सदैव सजग रहती हैं।

विज्ञापन की दुनिया

  1. अपने सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए आज किन-किन तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है? उदाहरण सहित उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए। आप स्वयं किस तकनीक या तौर-तरीके का प्रयोग करना चाहेंगे जिससे बिक्री भी अच्छी हो और उपभोक्ता गुमराह भी न हो।

उत्तर अपना सामान बेचने के लिए आजकल कई तरीकों को अपनाया जा रहा है; जैसे-सेल्समेन की नियुक्ति। ये सेल्समेन घर-घर जाकर उत्पादों को दिखाते हैं और उनकी विशेषताएँ बताते हैं।

समाचार पत्रों में विज्ञापन अपने उत्पादों का आकर्षक विज्ञापन देते हैं।

समाचार पत्रों में पैंफ्लेट रखते हैं।

रेडियो एवं टी वी पर विज्ञापन देते हैं।

मोबाइल फोन पर मैसेज के माध्यम से अपने उत्पादों की विशेषताएँ बताते हैं।

घरेलू फोन पर सेल्समेन योजनाओं से परिचित कराते हैं।

आजकल उत्पादों के प्रचार-प्रसार के लिए होटलों में सभा के माध्यम से विज्ञापन किया जाता है।

भाषा की बात

  1. विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है कभी औपचारिक रूप में आती है तो कभी अनौपचारिक रूप में । पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।

उत्तर जिन वाक्यों में वाक्य-विन्यास का पालन किया जाता है उन्हें औपचारिक वाक्य कहते हैं और जिन वाक्यों में वाक्य-विन्यास में परिवर्तन कर दिया जाता है, उन्हें अनौपचारिक वाक्य कहा जाता है।

  1. बाजार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?

उत्तर इस पाठ में लेखक ने अनेक प्रकार के ग्राहकों की बात की है। इनमें से कुछ को अपने पैसे का घमंड होता है, वे केवल अपनी पर्चेजिंग पावर दिखाने के लिए खरीददारी करते हैं। कुछ ग्राहकों में आत्मसंयम होता है, वे देखभाल कर ही खरीददारी करते हैं। कुछ ग्राहक अपनी आवश्यकता के अनुसार ही खरीददारी करते हैं। मैं अपने आप को अंतिम श्रेणी के ग्राहक के रूप में स्वीकार करता हूँ। क्योंकि मैं बाजार जाने से पहले अपनी आवश्यक वस्तुओं की सूची बनाता हूँ और उसी के अनुसार खरीददारी करता है।

  1. आप बाजार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाजार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? 'पर्चेजिंग पावर' आपको किस तरह के बाजार में नजर आती है?

उत्तर बड़े-बड़े आलीशान मॉल, उनमें जगमग करती सुंदर और आकर्षक वस्तुएँ इन सब पर पहले उच्चवर्गीय लोगों तक की ही पहुँच थी। परंतु अब मध्यमवर्गीय लोगों ने मॉल संस्कृति को अपनाना शुरू कर दिया है। आज की भागदौड़ की जिंदगी में लोग सामान्य बाजार और हाट आदि में जाकर अलग-अलग जगह से अलग-अलग वस्तुएँ खरीदकर अपना समय नष्ट करना नहीं चाहते। क्योंकि इतना समय व मोलभाव करने के बाद भी चीज सही ही हो, इसकी प्रामाणिकता नहीं होती। जबकि मॉल में कई प्रकार की लुभाने वाली आकर्षक योजनाएँ भी होती हैं जो ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। इसके साथ-साथ मॉल की भव्यता, साफ-सफाई भी ग्राहकों को लुभाती है। इस कारण हमें पर्चेजिंग पावर मॉल में ही नजर आती है। लोग अपनी जेब में रखे रुपयों के हिसाब से ही खरीददारी करते हैं।

  1. लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाजार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर कभी-कभी बाजार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। मैं इस कथन से पूरी तरह सहमत हूँ। क्योंकि जब विक्रेता को यह पता चल जाता है कि ग्राहक को अमुक वस्तु की बहुत आवश्यकता है तो वह उस वस्तु का अभाव दिखाने का प्रयास करेगा और उस वस्तु को दुर्लभ एवं अनुपलब्ध बताकर ज्यादा दाम वसूलने का प्रयास करेगा। दुकानदारों की यही मानसिकता कालाबाजारी को बढ़ाती है और आम जनता के प्रति उनकी असह्दयता की भावना प्रदर्शित करती है।

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