आत्म-परिचय, एक गीत

Textbook Questions and Answers
कविता के साथ –

प्रश्न 1.
कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर ‘मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हैं’-विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
उत्तर :
प्रस्तुत कविता में कवि स्वयं को जग से जोड़ने और उससे अलग रहने की बात भी करता है। वह संसार की चिन्ताओं एवं व्यथाओं के प्रति सजग है। इस तरह वह संसार की निन्दा-प्रशंसा की चिन्ता न करके उससे प्रेम कर उसका हित साधना चाहता है।

प्रश्न 2.
‘जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं’-कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर :
इसमें ‘दाना’ स्वार्थपरता, लोभ-लालच, सांसारिकता एवं चेतना का प्रतीक है। संसार में ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही तरह के लोग सत्य को खोज रहे हैं, परन्तु स्वार्थ की चिन्ता करने वाले लोग अज्ञानी हैं। जो दाने के लोभ में फँस , जाते हैं वे स्वाभाविक रूप से नादान व सांसारिक षड्यंत्र के प्रति भोले होते हैं।

प्रश्न 3.
‘मैं और, और जग और, कहाँ का नाता’-पंक्ति में ‘और’ शब्द की विशेषता बताइये।
उत्तर :
यहाँ’और’ शब्द का प्रयोग तीन बार तीन अर्थों में हुआ है। इसमें ‘मैं और’ का आशय है कि मैं अन्य लोगों से हटकर हूँ। ‘जग और’ का तात्पर्य है कि यह संसार भिन्न प्रकार का है। इन दोनों वाक्यों के मध्य में आया ‘और’ योजक अव्यय रूप में प्रयुक्त हुआ है। इससे यमक अलंकार का चमत्कारी प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 4.
‘शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर :
‘शीतल वाणी में आग होने’ का आशय यह है कि कवि का स्वभाव और स्वर भले ही कोमल हैं, परन्तु उसके हृदय तथा विचारों में विद्रोह एवं जोश की कमी नहीं है। वह हृदयगत जोश से प्रेम-रहित संसार को अपनी शीतल वाणी में दुत्कारता है, फिर भी अपना होश नहीं खोता है। इस तरह कवि अपने शीतल उद्गारों के पीछे हृदय के जोश, बल, शक्ति की बात कहते हैं।

प्रश्न 5.
बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे?
उत्तर :
बच्चे इस बात की आशा में नीड़ों से झांक रहे होंगे कि उनके माता-पिता उनके लिए दाना-चुग्गा (भोजन), लेकर आ रहे होंगे। बच्चों को खाने की प्रतीक्षा होगी, साथ ही उनसे ढेर सारा प्यार भी मिलने के लिए वे उत्सुक होंगे।

प्रश्न 6.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’-की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर :
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ पंक्ति की आवृत्ति गीत की ‘टेक’ है, इससे कविता की गेयता तथा श्रुति-मधुरता की विशेषता व्यक्त हुई है। कविता में इस आवृत्ति से यह व्यंजित हुआ है कि जीवन का समय कम है और काम बहुत है। मनुष्य को लक्ष्य प्राप्त करने में जल्दी करनी चाहिए।

कविता के आस-पास –

प्रश्न 1.
संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?
उत्तर :
संसार में सुख और दुःख दोनों मिलते हैं, परन्तु इसमें दुःख एवं कष्ट अधिक सहने पड़ते हैं। फिर भी व्यक्ति को चाहिए कि वह अनेक कष्टों को सहते हुए उनके ही बीच से खुशी और मस्ती का वातावरण तैयार करे, कुछ करने की चाह रखे और सबसे प्रेम-व्यवहार बढ़ाये, ऐसा प्रयास करने पर जीवन में खुशी और मस्ती का माहौल बनाया जा सकता है।

आपसदारी –

प्रश्न :
जयशंकर प्रसाद की ‘आत्मकथ्य’ कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। क्या पाठ में दी गई ‘आत्मपरिचय’ कविता से इस कविता का आपको कोई सम्बन्ध दिखाई देता है? चर्चा करें।
आत्मकथ्य –
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
× × ×
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
-जयशंकर प्रसाद
उत्तर :
दोनों ही कविताएँ व्यक्तिवादी अर्थात् व्यक्तिगत प्रेम-भाव पर आधारित हैं। जयशंकर प्रसाद ‘आत्मकथ्य’ कविता में निराशा के कारण अपने प्रेम को मौन-व्यथा से दबाए रखना चाहते हैं, जबकि ‘आत्मपरिचय’ कविता में बच्चन अपने प्रेम को खुलकर प्रकट करते हैं। दोनों के प्रेम-कथन और अभिव्यक्ति में अन्तर है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘मैं निज उर के उद्गार लिये फिरता हूँ’ पंक्ति से बच्चनजी का क्या आशय है?
उत्तर :
इसमें कवि का आशय है कि वह स्वयं के हृदय के उद्गार अर्थात् भावनाएँ, जो दुःख-सुख, निराशा, संवेदना, वेदना, निस्सारता, संसार की नश्वरता आदि से जुड़ी हैं उन्हें अपने हृदय तक ही सीमित रखते हैं। उन्हें साथ लिये वे अपना जीवन यापन करते हैं।

प्रश्न 2.
“है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता” कवि को यह संसार अपूर्ण क्यों लगता है?
उत्तर :
मानव-जीवन में प्रेम का सर्वोपरि महत्त्व है तथा जीवन की सरलता, सरसता सब प्रेम पर ही टिकी होती है। कवि को ऐसा कोई प्रेमी हृदय नहीं मिला जिससे वह अपनी भावनाएं व्यक्त कर सके, इसलिए उन्हें यह संसार अपूर्ण लगता है।

प्रश्न 3.
“मैं सपनों का संसार लिये फिरता हूँ।” से कवि का क्या आशय है?
उत्तर :
कवि-मन संवेदनशील होता है इसलिए वह अधिकतर सुन्दर कल्पनाओं में विचरण करता है। उसकी मधुर कल्पनाएँ प्रेम पूरित होती हैं, इसलिए कवि ने कहा कि मैं सपनों की अर्थात् कल्पनाओं की दुनिया में विचरण करता हूँ।

प्रश्न 4.
‘आत्मपरिचय’ कविता का प्रतिपाद्य बताइये।
उत्तर :
‘आत्मपरिचय’ कविता का प्रतिपाद्य अपने को जानने से है, जो कि दुनिया को जानने से कहीं अधिक कठिन है। समाज से व्यक्ति का नाता खट्टा-मीठा होता है। जीवन से पूरी तरह अलग रहना संभव नहीं होता है। फिर भी कवि की दुनिया उसी अपनी अस्मिता, अपनी पहचान और अपना परिवेश ही होता है। फिर भी दुनिया या संसार से सामंजस्य रखते हुए कवि जीवन में मस्ती, आनंद अपनाने का संदेश देता है।

प्रश्न 5.
‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि ने जग-जीवन के विषय में क्या कहा है?
उत्तर :
कवि ने जग-जीवन के विषय में कहा है कि इससे पूरी तरह कट कर या अलग रह कर जीवन जीना संभव नहीं है। दुनिया अपने व्यंग्य-बाण तथा शासन-प्रशासन से चाहे कितना भी कष्ट दे, उनके साथ चलकर ही इस जीवन का भार हमें हल्का करना है।

प्रश्न 6.
“मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ।” इस कथन से कवि ने क्या व्यंजना की है?
उत्तर :
‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि ने प्रेम की मस्ती के साथ अवसाद भी व्यक्त किया है, क्योंकि कवि को यौवन-काल में ही अपनी प्रियतमा का वियोग प्राप्त हुआ। कविता में ‘हाय’ शब्द से वियोग-व्यथा की व्यंजना की गई है।

प्रश्न 7.
‘नादान वही है, हाय’-कवि ने किसे नादान कहा है? और क्यों कहा है?
उत्तर :
कवि ने ‘आत्मपरिचय’ कविता की इस पंक्ति में सांसारिकता के दाने चुगने में उलझे हुए व्यक्ति को नादान कहा है। क्योंकि जो व्यक्ति निरा भोगी और पेट की खातिर स्वार्थी होता है, वह नादान होता है तथा उसे सत्य का ज्ञान नहीं होता है।

प्रश्न 8.
“मैं और, और जग और, कहाँ का नाता” इस कथन से.कवि का क्या आशय है?
उत्तर :
कवि का आशय है कि संसार के लोग स्वार्थी हैं, वे धन-वैभव के लिए लालायित रहते हैं। इसलिए कवि कहते हैं कि कहाँ मैं, जो निरपेक्ष स्वार्थ-रहित जीवन जीता हूँ और कहाँ ये संसार, जहाँ कदम-कदम पर स्वार्थी लोग हैं। उनसे मेरा रिश्ता भला कैसे हो सकता है।

प्रश्न 9.
कवि किस प्रकार के जग बना-बनाकर रोज मिटाता है?
उत्तर :
कवि अपनी कल्पना के अनुसार रोज नये-नये संसार की रचना करता है। उस रचना में उसे जब कोई दोष या कमी नजर आती है, भावनाओं की कमी रहती है, प्रेम की कमी रहती है तो वह उसे अस्वीकार कर मिटा देता है।

प्रश्न 10.
“मैं वह खण्डहर का भाग लिये फिरता हूँ”-‘आत्मपरिचय’ कविता की इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
इसका आशय यह है कि यौवन में प्रिया के बिछुड़ जाने से कवि का हृदय उसकी मधुर यादों का खण्डहर जैसा बन गया है। वह अपने खण्डित हृदय में कोमल भावनाओं और मस्ती को लिये फिरता है। अर्थात् अपनी प्रियतमा के यादों के खण्डहर को लिये घूमते हैं।

प्रश्न 11.
“मैं भव-मौजों पर मस्त बहा करता हूँ”-‘आत्मपरिचय’ कविता की इस पंक्ति का क्या आशय है?
उत्तर :
इस पंक्ति का आशय है कि संसार में तटस्थ मन:स्थिति में रहकर ही आनन्द प्राप्त होता है। संसार-सागर की लहरों के विरुद्ध संघर्ष करने की बजाय उनके साथ बहना तैरने में सहायक होता है। इसलिए कवि संसार रूपी सागर की मस्त लहरों में अपनी हृदयानुभूति के साथ मस्त होकर बहते हैं।

प्रश्न 12.
‘आत्मपरिचय’ कविता से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
उत्तर :
‘आत्मपरिचय’ कविता हमें हमारी अस्मिता, हमारी पहचान तथा हमारे परिवेश से अवगत कराती है। और यही प्रेरणा देती है कि हमें जीवन की समस्याओं से जूझते हुए भी जीवन में स्नेह-प्रेम की धारा अनवरत रूप से बहानी चाहिए तथा सुख-दु:ख को समान भाव से ग्रहण करते हुए मस्त रहना चाहिए।

प्रश्न 13.
कवि बच्चन रचित ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ गीत का प्रतिपाद्य बताइये।
उत्तर :
इस गीत का प्रतिपाद्य यह है कि समय निश्चित गति से चलता है। पथिक को भी अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए गतिशील रहना चाहिए। जीवन में कुछ कर गुजरने का उत्साह, साहस एवं लगन रखनी चाहिए।

प्रश्न 14.
दिन का थका पंथी क्या सोचकर जल्दी-जल्दी चलता है?
उत्तर :
दिन का थका पंथी यह सोचता है कि उसके प्रियजन उसकी प्रतीक्षा में होंगे, वे उससे मिलने के लिए उत्सुक होंगे। मंजिल तक पहुंचने में कहीं रात न हो जावे, ऐसा विचार करके वह जल्दी-जल्दी चलता है।

प्रश्न 15.
पक्षियों के परों में चंचलता आने का कारण क्या बताया गया है?
उत्तर :
पक्षियों में भी ममता होती है। वे अपने घोंसलों की ओर लौटते समय सोचते हैं कि उनके बच्चे उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे, दाने-चुग्गे की लालसा कर रहे होंगे। इसी से पक्षियों के परों में चंचलता आने का कारण बताया गया है।

प्रश्न 16.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ गीत में प्रेमाभिव्यक्ति किस तरह हुई है?
उत्तर :
उक्त गीत में पथिक द्वारा अपने प्रियजनों के पास जल्दी पहुँचने की चिन्ता करने से तथा पक्षियों के द्वारा अपने बच्चे के पास दाना-चुग्गा लेकर जल्दी जाने के विचार से कवि ने मधुर प्रेमाभिव्यक्ति की है। जो प्रिय मिलन की याद से पैरों में चंचल गति भर देता है।

प्रश्न 17.
“यह अपूर्ण संसार न मझको भाता”-कवि को यह संसार अधूरा क्यों लगता है?
उत्तर :
यह संसार अभाव, राग-द्वेष और स्वार्थपरता से व्याप्त होने से पूर्ण नहीं है। कवि संवेदनशील एवं मानवीय भावनाओं के संसार में रहता है। अत: उसकी कल्पनाओं के समक्ष यह संसार उसे अपूर्ण और अधूरा लगता है।

निबन्धात्मक प्रश्न –

प्रश्न 1.
‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि ने अपने व्यक्तित्व की कौन-कौनसी विशेषताओं से अवगत कराया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि हरिवंश राय बच्चन ने ‘आत्मपरिचय’ कविता में जग की सारी समस्याओं का उत्तरदायित्व अपने पर लिये तथा साथ ही सबके लिए जीवन में प्यार साथ लिये रहना बताया है। कवि कहते हैं कि जग उनको पूछता है जो उनकी सुनते हैं लेकिन मैं अपने सिर्फ अपने मन की सुनता हूँ। कवि को प्रेमहीन अपूर्ण संसार अच्छा नहीं लगता है इसलिए वे अपने स्वप्नों के, अपनी कल्पनाओं के संसार में ही विचरण करते हैं।

कवि सुख-दुःख दोनों में ही मगन रहते हैं इसलिए भवसागर की समस्याओं पर ध्यान न देकर वे संसार रूपी सागर की समस्याओं रूपी लहरों पर मस्त रहते हैं। कवि अपनी शीतल वाणी में जोश की आग लेकर घूमते हैं। इस तरह कवि अपने जीवन में मिली आशा-निराशा सभी से संतुष्ट रहकर अपनी ही धुन में मस्त रहते हैं। संसार को मिथ्या जानकर हानि-लाभ, मान-अपमान, सुख-दु:ख सभी अवस्थाओं को समान मानते हैं। विपरीत परिस्थितियाँ उनके जीवन में उत्साह और उमंग भर देती हैं।

प्रश्न 2.
‘आत्मपरिचय’ कविता के उद्देश्य या प्रतिपाद्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर :
कवि हरिवंश राय बच्चन ने ‘आत्मपरिचय’ कविता के माध्यम से यही समझाया है कि स्वयं को जानना, दुनिया को जानने से कठिन है। समाज से बड़ा खट्टा-मीठा रिश्ता होता है व्यक्ति का, फिर भी सांसारिक क्रियाकलापों से कट कर कोई नहीं रह सकता है। उसे समाज के भीतर रह कर ही, अपनी पहचान बनानी पड़ती है।

विरोधी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। मनुष्य को द्वन्द्वात्मक अवस्था में स्वयं से और संसार से वैचारिकता के स्तर पर नित लड़ना पड़ता है। इसलिए कवि कहते हैं कि ऐसी अवस्थाएँ सबके जीवन में होती हैं, जरूरत है इन अवस्थाओं को हँस कर, खुशी-खुशी पार करें। अपने जीवन को तथा दूसरों के जीवन को भी नि:स्वार्थ स्नेह से संचित करें।

प्रश्न 3.
‘आत्मपरिचय’ कविता को ध्यान में रखते हुए कविता के सार को कवि के शब्दों में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
‘आत्मपरिचय’ कविता में कवि अपने जीवन परिचय एवं संसार की स्वार्थहीनता को व्यक्त करते हैं। यद्यपि कवि सांसारिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, फिर भी वह अपने इस जीवन से स्नेह करते हैं। वे अपनी आशाओं और निराशाओं दोनों से संतुष्ट हैं। वे संसार से मिले प्रेम और उपेक्षा दोनों की ही परवाह नहीं करते हैं।

क्योंकि वे जानते हैं कि संसार उन्हीं की जय-जयकार करता है जो उसकी इच्छानुसार जीते हैं। यहाँ कवि मस्तमौजी है। अपनी भावनाओं के अनुरूप जीवन जीते हैं। वे अपनी शीतल वाणी द्वारा अपना आक्रोश व्यक्त करते हैं। उनकी व्यथा शब्दों के माध्यम से व्यक्त होती है। कवि सभी परिस्थितियों में मनुष्य को सामंजस्य बनाये रखने का संदेश देते हैं। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से संसार को सभी कठिनाइयों में झूमने व खुशियाँ मनाने की सलाह देते हैं।

प्रश्न 4.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में व्यक्त उद्देश्य पर विचार प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
यह गीत कवि हरिवंश राय बच्चन के काव्य-संग्रह ‘निशा-निमंत्रण’ से प्रस्तुत है। इस गीत में कवि ने प्रकृति की दैनिक परिवर्तनशीलता के संदर्भ में प्राणी-वर्ग के धड़कते हृदय को सुनने की काव्यात्मक कोशिश को व्यक्त किया है। प्रिय से मिलन या अपनों के मध्य रहने का सुकून पगों की गति में चंचलता यानि तेजी भर देता है। इस अनुभूति के सहारे हम शिथिलता या जड़ता को प्राप्त होने की स्थिति से बच जाते हैं।

यह गीत गुजरते समय की तीव्रता का अहसास एवं लक्ष्य को प्राप्त करने का जोश लिये हुए है। समय के जल्दी-जल्दी बीतने की प्रक्रिया हमें सांसारिक क्षणभंगुरता से परिचित करवाती है कि समय जल्दी खत्म हो रहा है, हमें जल्दी से अपने लक्ष्य को प्राप्त करना होगा। इसी संदेश पर ध्यान केन्द्रित करती यह कविता अपने कथ्य और उद्देश्य को भली-भाँति प्रकट करती है।

प्रश्न 5.
कौनसा विचार दिन ढलने के बाद लौट रहे पंथी के कदमों को तेज और धीमा कर देता है? बच्चन के गीत के आधार पर व्यक्त कीजिए।
उत्तर :
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में बच्चनजी ने दोनों ही प्रकार की स्थितियों को व्यक्त किया है। एक तरफ प्रिय आलम्बन तथा अपनों के मध्य रहने का सुकून, शिथिल कदमों को और तेज कर देता है। वह ढलते दिन को देखकर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता है कि उसकी मंजिल दूर नहीं है।

वहीं दूसरी स्थिति एकाकी जीवन व्यतीत करने वालों के साथ की है। शाम के समय उनके मन में विचार उठता है कि उनके इंतजार में व्याकुल होने वाला कोई नहीं है अतः वह किसके लिए तेजी से घर जाने की कोशिश करे। यह विचार लौटते कदमों को और शिथिल बना देता है तथा उनके हृदय को और भी व्यथित व पीड़ा से भर देता है।

प्रश्न 6.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में व्यक्त गूढ़ अर्थ को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में कवि ने सत्य के साथ समय के गुजरते जाने के एहसास में। – लक्ष्य प्राप्ति के लिए कुछ करने का जज्बा लिए अर्थ को कविता में व्यक्त किया है। मंजिल दूर होने की स्थिति में। लोगों में उदासीनता का भाव आ जाता है। कभी-कभी उनके मन में निराशा का भी भाव आ जाता है। मंजिल की दूरी से घबराकर कुछ लोग प्रयास करना छोड़ देते हैं। कुछ व्यर्थ के तर्क-वितर्क में उलझ जाते हैं। मनुष्य आशा-निराशा के बीच झूलने लगता है।

यह बीच की स्थिति को व्यक्त करता है। दूसरी स्थिति में बच्चे आशा लगाए बैठे होंगे कि कब उनके अपने शाम होते ही घर आयेंगे और उन्हें स्नेह-दुलार से, भोजन से तृप्त करेंगे। यह आशा मनुष्य (प्राणीजगत) के जीवन में नव-संचार के भाव भरती है कि हमारे जीवन का एक ध्येय है कि हमारे अपने हमसे स्नेह-प्रेम की आस टिकाये बैठे हैं।

तीसरी स्थिति, कवि स्वयं की या एकाकी जीवन व्यतीत करने वालों की स्थिति के बारे में कहते हैं कि जो अकेले हैं, निराशा हैं व्याकुल हैं उन्हें यह ढलता दिन और भी अकेला, व्यथित व व्याकुल बना देता है। संसार की निस्सारता व क्षणभंगुरता उन्हें स्पष्ट दिखाई देने लगती है। अनेकानेक अर्थों को संजोये यह गीत मन:स्थितिनुसार अर्थ व्यक्त करता है।

रचनाकार का परिचय सम्बन्धी प्रश्न –

प्रश्न 1.
कवि हरिवंश राय बच्चन के साहित्यिक कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर :
कवि का जन्म सन् 1907 में इलाहाबाद में हुआ। उच्च शिक्षा प्राप्त कर ये प्राध्यापक एवं शिक्षा मंत्रालय में हिन्दी-विशेषज्ञ रहे। ये हालावाद के प्रवर्तक कवि रहे हैं। इन्होंने छायावाद की लाक्षणिक वक्रता के बजाय सीधी-सादी – जीवंत भाषा में तथा संवेदना से युक्त गेय शैली में अपनी बात कही।

व्यक्तिगत जीवन में घटी घटनाओं की सहज अनुभूति की ईमानदार अभिव्यक्ति बच्चनजी की कविताओं में प्रकट हुई। ‘मधुशाला’, ‘मधुबाला’, ‘मधुकलश’, ‘निशा-निमंत्रण’, ‘एकांत संगीत’, ‘आकुल-अंतर’, ‘मिलन-यामिनी’ (काव्य संग्रह); क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिरफिर’, ‘बसेरे से दूर’, ‘दशद्वार से सोपान’ (आत्मकथा); प्रवासी की डायरी (डायरी) इत्यादि का रचित संसार है। इनका निधन सन् 2003 में मुम्बई में हुआ।

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