Chapter 6 पुष्पी पादपों का शारीर

Textbook Questions and Answers 

प्रश्न 1. 
विभिन्न प्रकार के मेरिस्टेम की स्थिति तथा कार्य बताओ।
उत्तर:
स्थिति के अनुसार मेरिस्टेम तीन प्रकार की होती है:
1. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem): यह विभज्योतक (merictem) पौधों के शीर्ष भागों पर होती है जैसे गलशीर्ष वरने के शीर्ष पा। शीर्ष पर रिनल विभज्योतक निरन्तर विभाजन कर नई कोशिकाओं का निर्माण करती हैं जिससे पौधे लम्बाई में बढ़ते हैं।

2. पाव विभन्योतक (Lateral Meristem): संवहन एधा और कॉक एषा, पाय विभज्योतक के उदाहरण हैं। यह स्थायी कृतकों के पुनःविभेदन के कारण बनते हैं। संबहन एषा का निर्मग प्राकाषा (Procrambium) से तथा कॉर्क एथा का निम्नण वल्कट अथवा परिरंभ से होता है। संवहन एथा अन्दर की ओर जाइलम और बाहर की ओर द्वितीयक प्लोयम का निर्माण करता है। कॉर्क एषा अपने अन्दर की ओर कॉकस्तर (द्वितीयक बल्कुट) और बाहर की ओर कॉर्क इत्पन्न करता हैं।


3. अन्तर्वशी या अन्तर्विष्ट विभन्योतक (Intercalary Meristem): यह शोर्याय विभज्योतक से पृथक् हुआ भाग है। जने की वृद्धि के समय स्थाबी उत्तक के बीच कुछ विभज्योतकी ऊतक बचा रहता है। वह उन्तक पत्ती के आधार के पास अपवा पणं के आधार के पास बना रहता है। इस प्रकार को विभज्योतक ऊतक प्राय: घासों में परें के आधार के पास, पुदीने की पर्वसन्धि (Node) के नीचे, चीड़ (Pinus) की पत्ती के आधार के निकट आदि स्थान पर पाये जाते हैं। पासों में पौधों की लम्बाई अन्तर्वेशी विभन्योतक के कारण ही बढ़ती हैं।

प्रश्न 2. 
कॉर्क कैविवम ऊतकों से बनता है जो कॉर्क बनाते हैं। क्या आप इस कथन से सहमत है? वर्णन करो।
उत्तर:
उपरोक्त कथन सही है क्योंकि कॉर्क कैंबियम ऊतकों से बनता है, इससे हो कॉक का निर्माण होता है। जैसे – जैसे तने की परिधि में वृद्धि होती जाती है त्यों – त्यों बाहरी कल्कुट तथा बासत्वचा की साडे टूटती जाती हैं और उन्हें नई संरक्षी कोशिका सतह की आवश्यकता होती है। इसलिये एक दुसरा विभन्योतक उत्तक तैयार हो जाता है जिसे कॉक कैम्बियम या कागजन कहते हैं। यह प्राय: वकट क्षेत्र में विकसित होता हैं।

यह कुछ सतही मोटी और संकरी पतली भित्ति वाली आयाताकार कोशिकाओं से बनी होती है। कागजन दोनों ओर कोशिकाओं को बनाता है। बाहर की और की कोशिकाएं कॉर्क अममा काग में बँट जाती हैं और अन्दर की ओर की कोशिकाएं द्वितीयक बल्कुट अथवा कागअस्तर में विभेदित हो जाती हैं। कांक में जल प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि इसकी कोशिका भित्ति पर सूरिन जमा रहता है। द्वितीयक वल्कुट की कोशिकाएँ पाकी होती हैं। कागजन, काग तथा काग मिलकर परिचर्म बनाते हैं।

प्रश्न 3. 
चित्रों की सहायता से काष्ठीय एंजियोस्पर्म के तने में द्वितीयक वृद्धि के प्रक्रम का वर्णन करो।
उत्तर:
तीयक वृद्धि शीर्षस्थ विभज्योतक की कोशिकाओं के विभाजन, विभेदन और परिवर्द्धन के फलस्वरूप प्राथमिक ऊतकों का निर्माण होता है। अत: शीर्षस्थ विभज्योतक के कारण पौधे की लम्बाई में वृद्धि होती है। इसे प्राथमिक वृद्धि कहते हैं। द्विबीजपत्री तथा जिम्नोस्पर्स आदि काष्ठीय पौधों में पार्श्व विभज्योतक के कारण तने तथा जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है। इस प्रकार मोटाई में होने वाली वृद्धि को द्वितीयक वृद्धि (secondary growth) कहते हैं। जाइलम और फ्लोएम के मध्य विभज्योतक को संवहन एधा (vascular cambium) तथा वल्कुट या परिरम्भ में विभज्योतक को कॉर्क एधा (cork cambium) कहते हैं। द्वितीयक वृद्धि-द्विबीजपत्री तना द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा (vascular cambium) तथा कॉर्क एधा (cork cambium) की क्रियाशीलता के कारण होती है।

संवहन एधा की क्रियाशीलता द्विबीजपत्री तने में संवहन बण्डल वर्षी (open) होते हैं। संवहन बण्डलों के जाईलम तथा फ्लोएम के मध्य अन्तःपूलीय एधा (intrafascicular cambium) होती है। मज्जा रश्मियों की मृदूतकीय कोशिकाएँ जो अन्त:पूलीय एधा के मध्य स्थित होती हैं, विभज्योतकी होकर आन्तरपूलीय एधा (interfascicular cambium) बनाती हैं। पूलीय तथा आन्तरपूलीय एधा मिलकर संवहन एधा का घेरा बनाती हैं। संवहन एधा वलय (vascular cambium ring) की कोशिकाएँ तने की परिधि के समानान्तर तल अर्थात् स्पर्शरेखीय तल (tangential plane) में ही विभाजित होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक कोशिका के विभाजन से जो नई कोशिकाएँ बनती हैं उनमें से केवल एक जाइलम या फ्लोएम की कोशिका में रूपान्तरित हो जाती है, जबकि दूसरी कोशिका विभाजनशील (meristematic) बनी रहती है। परिधि की ओर बनने वाली कोशिकाएँ फ्लोएम के तत्त्वों में तथा केन्द्र की ओर बनने वाली कोशिकाएँ जाइलम के तत्त्वों में परिवद्धित हो जाती हैं। बाद में बनने वाला संवहन ऊतक क्रमशः द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) तथा द्वितीयक फ्लोएम (secondary phloem) कहलाता है। ये संरचना तथा कार्य में प्राथमिक जाइलम तथा फ्लोएम के समान होते हैं। कॉर्क एधा की क्रियाशीलता संवहन एधा की क्रियाशीलता से बने द्वितीयक ऊतक पुराने ऊतकों पर दबाव डालते हैं जिसके कारण भीतरी (केन्द्र की ओर उपस्थित) प्राथमिक जाइलम अन्दर की ओर दब जाता है।

इसके साथ ही परिधि की ओर स्थित प्राथमिक फ्लोएम नष्ट हो जाता है। इससे पहले कि बाह्य त्वचा (epidermis) की कोशिकाएँ एक निश्चित सीमा तक खिंचने के बाद टूट-फूट जाएँ, अधस्त्वचा (hypodermis) के अन्दर की कुछ मृदूतकीय कोशिकाएँ विभज्योतक (meristem) होकर कॉर्क एधा (cork cambium) बनाती हैं। कॉर्क एधा कभी-कभी वल्कुट, अन्तस्त्वचा, परिरम्भ (pericycle) आदि से बनती है। कॉर्क एधा तने की परिधि के समानान्तर विभाजित होकर बाहर की ओर सुबेरिनयुक्त (suberized) कॉर्क या फेलम (cork or phellem) का निर्माण करती है। यह तने के अन्दर के भीतरी ऊतकों की सुरक्षा करती है। कॉर्क एधा से केन्द्र की ओर बनने वाली मृदूतकीय (parenchymatous), स्थूलकोणीय अथवा दृढ़ोतकी कोशिकाएँ द्वितीयक वल्कुट (phelloderm) का निर्माण करती हैं। कॉर्क एधा से बने फेलम तथा फेलोडर्म को पेरीडर्म (periderm) कहते हैं। पेरीडर्म में स्थान-स्थान पर गैस विनिमय के लिए वातरन्ध्र (lenticels) बन जाते हैं। द्वितीयक जाइलम वसन्त काष्ठ तथा शरद् काष्ठ में भिन्नत होता है। इसके फलस्वरूप कुछ पौधों में स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं। 

प्रश्न 4. 
निम्नलिखित में विभेद करो
(अ) ट्रेकीड तथा वाहिका 
(ब) पैरेंकाइमा तथा कॉलेनकाइमा 
(स) रसदारु तथा अंत:काष्ठ 
(द) खुला तथा बंद संवहन बंडल।
उत्तर:
(अ) देकीड तथा वाहिका

वाहिनिका (Trachieds)

वाहिकाएँ (vessels)

1. यह दीर्थीकृत कोशिका है जिसके दोनों सिरे बन्द व शृंडाकार होते हैं।

यह छोटी या लम्बी नलिकाकार रनो। इसकी लम्बाई अपेक्षाकृत कम व चौड़ाई अधिक होती है।

2. यह एक कोशिका है। इसकी अन्त:भित्ति (End wall) पूर्ण होती है।

यह एक के ऊपर एक कोशिकाओं की कतार से बनती है। इसमें अन्त:भिति पूर्ण या अपूर्ण रूप से पुल जाती है।

3. ये कोशिका भित्ति पर स्थित गों द्वारा सम्पर्क बनाती है।

इसमें सम्पर्क शिदित अन्त:भित्ति द्वारा वन होता है।

4. ये जल संवतन व वान्विक सहायता का कार्य करती हैं।

इनका मुख्य कार्य जल संवहन है।

5. इनकी भित्ति साखा तथा अपेक्षाकृत कोशिका गुहा संकी होती है।

इतकी भी कोशिका भित्ति समत तथा कोशिका गुहा बहुत चौड़ी होती है।


(ब) पैरेंकाइमा तथा कॉलेनकाइमा 

मृदूतक (Parenchyma)

स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma)

1. ये सजीव होती हैं। कोशिका भित्ति पाली व प्राय: रोल्यूलोस की बनी होती हैं।

ये भी सजीव होती है। कोशिकाओं में अन्ताकोशिक अवकाश के सामने वाले कोणों पर कोशिकाभित्ति अधिक मोटी व मध्य भाग में अपेक्षाकृत पालो होती है। यह मोटाई भित्ति पर सेल्युलोस, हेमोसेल्युलोस व पेक्टिन के निक्षेपण से होती है।

2. कोशिकाएँ गोल, अण्डाकार, बहुभुजी व सम – व्यासी होती हैं।

कोशिकाएं समव्यासो, अण्वकार, बेलनाकार व बहुभुजी होती हैं। नहीं होते हैं।

3. अन्तराकोशिक अवकाश होते हैं।

पौधों के अंगों को लचीलापन व दृढ़ता देती हैं। कभी – कभी क्लोरोप्लास्ट होने पर भोजन बनाती है।

4. कोशिकाओं में स्वर्च, वसा, प्रोटीन आदि संचित राते हैं तथा क्लोरोप्लास्ट होने पर भोजन बनाने का कार्य भी करती हैं।

अति विशेष परिस्थिति में विभाजन की क्षमता आती है।

5. आवश्यकता पड़ने पर कोशिकाओं में विभाजन की धमता आ जाता है। घाय भरलेय कॉफ एप बनाती हैं।

स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma)

(स) रसदारु तथा अंत:काष्ठ 

रसदारु (Sapwood or Alburnum)

अन्तःकाष्ठ (Heart wood or Duramen)

1. हा वृद्धि तने के बाहरी भाग में होती है।

यह वृद्धि तने के केन्द्र में होती हैं।

2. इस कार में मृतक की कोशिकार भी मिलती हैं।

किसी प्रकार की सजीव कोशिकाएं नहीं मिलती है।

3. इसमें आमतौर पर रेजिन, टैनिन आदि नहीं होते हैं।

इसमें रेजिन, दैनिन आदि मिलते हैं।

4. टाइलोसित नहीं मिलते हैं।

टाइलेसिस मिलते हैं।

5. यह काप्त क्रियाशील होती है।

यह काष्ठ अक्रियाशील होती है।

6. बहका कमभरकी तथा हल्के रंग की होती है।

यह काष्ठ गहरे रंग की तथा भारी होती है।

7. यह का कीड़ों आदि से सुरक्षित नहीं होती है।

यह काष्ठ सभी प्रकार के कीड़ों, कवक आदि से सुरक्षित होती है।


(द) खुला तथा बन्द संवहन पूल संवहन पूल: जिसमें जाइलम व फ्लोयम के मला एथा उपस्थित हो, उस संवहन पूल को खुला (open) कहते हैं तथा एषा के अनुपस्थित होने पर संबहन पूल को बन्द (Closed) कहते है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में शारीर के आधार पर अंतर करो
(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विवीजपत्री मूल 
(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री जना।
उत्तर:
(अ) एकबीजपत्री मूल तथा द्विबीजपत्री पूल में अन्तर:

एकबीजपत्री मूल (Monocot Root)

द्विबीजपत्री मूल (Dicot Root)

1. जाइलम पूल संख्या में 6 को अधिक (यहु-आदिदारुक) होते हैं।

संख्या में 2 से 6 तक (द्वि-आदिदारुक से पट आणिधारक) होते है।

2. मजा मुक्किसित होती है।

मज्जा अल्पविकसित या अनुपस्थित होती है।

3. परिम्भ से पार्श्व मूलों की उत्पत्ति होती है।

पाश्यमूलों, पधा तथा कोंक एधा को उत्पत्ति होती है।

4. राधा अनुपस्थित।

राधा उपस्थित।

(ब) एकबीजपत्री तना तथा द्विबीजपत्री तना में अन्तर:

एकबीजपत्री तना (Monocot Secm)

द्विबीजपत्री तना (Dicot Stem)

1. इसमें अधश्चर्म (Hypodermis) दृढ़ोतकी होती है।

स्थूलकोपोतकी होती है।

2. सामान्य वल्कुट अविभेदिन नया अधश्चम से केन्द्र तक मृतक उपस्थित।

मृदूरक की कुछ परतें होती हैं।

3. अंतश्नर्म अनुपस्थित होती है।

मृदूतक कोशिकाओं को एक लहरदार (Wavy) परत होती है।

4. परिराम्भ अनुपस्थित होता है।

परिम्भ मृदूतक तथा दूटोतक में एकानर क्रम में होता है।

5. संकन पूल – बिस्रो हुने

-‘संयुका, कोटसल (Collateral) व बन्द (Closed)

– परिधि क्षेत्र में छोटे तथा केन्द्रीय भाग में बड़े आमाप के

-प्राय: अंडाकार (Oval shaped)

– फ्लोयम मृदूतक अनुपस्थित

– पूलाच्छद उपस्थित

– वलय में उपस्थित

-संयुन्ज, कोलेटरल (Collateral) व खाले (open)

-एक समान आमाप (Size) के

-प्राय: वेजलपी (Wedge-shaped)

-उपस्थिर

-अनुपस्थित

6. मया किरण अनुपस्थित

संबडन पूलों के बीच मृतक उपरिश्वत

7. मशा अनुपस्थित

केन्द्र में मज्जा उपस्थित


प्रश्न 6. 
आप एक शैशव तने की अनुप्रस्थ काट का सूक्ष्मदर्शी से अवलोकन करें। आप कैसे पता करेंगे कि यह एकबीजपत्री तना अथवा द्विबीजपत्री तना है? इसके कारण बताओ।
उत्तर:
एकबीजपत्री तने में वल्कुट, अन्तश्चर्म, परिरम्भ व मजा क्षेत्र का विभेदन नहीं होता है जिसके सभी संबहन पूल भरण ऊतक में बिखरे होते हैं। प्रत्येक संवहन पूल में जल गुहिका भी होनी है नया संवहन पूल अवर्षा (Closed) होते हैं। जबकि द्विवीजपत्री स्तम्भ में स्पष्ट रूप से बल्कुट, अचारचम, परिरम्भ व मजा क्षेत्र का विभेदन होता है। सभी संवहन पूल एक वलय में व्यवस्थित रहते हैं तथा ये बी (open) किस्म के होते हैं।

प्रश्न 7. 
सूक्ष्मदशी किसी पौधे के भाग को अनुप्रस्थ काट निम्नलिखित शारीर रचनाएं दिखाते हैं:
(अ) संवहन बंडला, संयुक्त, फैले हुए तथा उसके चारों ओर स्केलेरेनकाइमी आच्छद है।
(ब) फ्लोयम पैरेंकाइमा नहीं है। आप कैसे पहचानोगे कि वह किसका है?
उत्तर:
(अ) यह स्थिति एकबोजपत्री स्तम्भ में देखने को मिलता है। एकबीजपत्री स्तम्भ में भरण ऊतक में सभी संबहन पूल बिखरे होते हैं क्योंकि इसमें अन्तश्चम व परिरम्भ का अभाव होता है। इस अभाव के कारण ही बल्कुट व मजा क्षेत्र का लिमेदन नहीं होता। इनमें संवहन बंडल संयुक्त हाते हैं व अवर्षों (Closed)। सभी संवहन बंडलों के दोनों सिरों पर स्केलेरेनकाइमी आजाद होता है।
(ब) एकबोजपनी स्तम्भ के संचान पूलों को देखें ते इसमें जायलम व फ्लोयम तो होत है परन्तु पलोम में पेरेंकाइमा का अभाव होता है। अतः दोन लजण एकबीजपत्री स्तम्भ के होते हैं। 

प्रश्न 8. 
जाइलम तथा फलोयम को जटिल ऊतक क्यों कहते हैं?
उत्तर:
ऊतक दो प्रकार की होती हैं – गाय किसी रूतक में एक ही प्रकार की कोशिकाओं का समूह होते उसे साल तक कहते हैं। उच्चारण मृदूतक, स्थूलकोपोतक, दृकोतक आदि। परन्तु जब एक से अधिक प्रकार की समान उत्पत्ति वाली कोशिकायें मिलकर ऊतकवनती तो उसे जाटण उनक कहते हैं। उदाहरण- जश्लम, पप्लोयम आदि।

इलम क निर्माण चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर होता है बाहिनिकायें, वाहिकायें, जाइलम तंतु तथा जाइलम मृदूतक। इसी प्रकार क्लोयन में भी चार प्रकार की कोशिकायें होती हैं – चालनी नलिकायें, सह कोशिकाएं, पणोयम तंतु तथा जलायम मुदतक। अत: जाइलम व फ्लोयम जटिल ऊतकें हैं।

प्रश्न 9. 
रंधीतंत्र क्या है? रन की रचना का वर्णन करो और इसका चिह्नित चित्र बनाओ।
उत्तर:
प्रायः पौधों की वाषव संरचनाओं की बाह्यत्वचा पर रन होते हैं। रंध को उपस्थिति को धतंत्र कहते हैं। वैसे ये पत्तियों की वाहायच पर अधिक संख्या में होते हैं। छ वाष्पोत्साहन तथा गैसों के विनिमय को नियोजित करते हैं।

प्रत्येक धि में सेम के आकर की दो कोशिकाएं होती हैं कि हार कोशिकाएँ कहते हैं। पास में हार कोशिकायें डंबलाकार होती हैं। द्वारकोशिका की बाहरी भित्ति पतली तथा आंतरिक भित्ति मोटी होती है। हार कोशिकाओं में बलोरोप्लास्ट होता है और यह रंध के खुलने थ बंद होने के क्रम को नियमित करता है। कभी – कभी कुछ बाह्यवघीय कोशिकाएं जो रंध के आस – पास होती है उनकी आकृति, माप तथा पदायें में विशिष्टता आ जाती है। इन कोशिकाओं को सहायक कोशिकाएं कहते हैं। रंधीय छिद्र, द्वार कोशिका तथा सहायक कोशिकाएं मिलकर रंधी तंभ का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 10. 
पुष्पी पादपों के तीन मूलभूत ऊतक तन्त्र बताओ. प्रत्येक तज के ऊतक बताओ।
उत्तर:
पुष्पी पादपों में तीन मूलभूत ऊतक तंत्र निम्नवत् हैं:

  1. बाह्यत्वचीय ऊतक तंत्र – मृदूतक।
  2. भरण ऊतक तंत्र – पेरेनकाइमा, कोलेनकाइमा तथा स्क्लेरेनकाइमा।
  3. संवहन ऊतक तंत्र-जाइलम तथा फ्लोएम।

प्रश्न 11. 
पादप शारीर का अध्ययन हमारे लिये कैसे उपयोगी?
उत्तर:
पादप शारीर के अध्ययन से पौधों की आंतरिक बनाक का जान होता है। उपस्थित विभिन्न प्रकार की स्तकों तथा काक तंत्र की जानकारी मिलती है। उत्तकों की बनावट से तथा उनकी उपस्थिति स्थाण से उनके कार्य का ज्ञान होता है। पत्ती, स्तम्भ व मल की संरचना में अनार होता है तथा इनमें ऊरक उपयुक्त दंग से व्यस्थित होतो हैं अतः हम उसे काटकर सूक्ष्मदी में अध्ययन कर बना सकते हैं कि या द्विशीजपत्री या एकबीजपत्री स्तम्भ, मूल हा पर्ण है। आन्तरिक संरचना के आधार पर मौसम का प्रभाव पक्ष की अनुभागत: रसायनों व निशेषणं का आर्थिक दृष्टि से उपयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 12. 
परिचर्म क्या है? दिबीजपत्री तने में परिचर्म कैसे बनता है?
उत्तर:
वागजा, काग तथा कागअस्तर मिलकर परिचर्म यः परिषक (periderm) कहलाते हैं। परिषक निर्माण के समय जैसे – जैसे तने की परिधि में वृद्धि होती जाती है त्यों त्यों बाहरी वल्कुट तथा बाहात्वचा की सतहें टूटती जाती हैं और जन्हें संरक्षी कोशिका सतह की आवश्यकता होती है। इसलिये यस्कर क्षेत्र में एक विभन्योतक ऊतक कॉक एधा या कागजन (Phellogen) सैयार हो जाता है। कागजन के विभाजन के कारण अक्ष की गोलाई बढ़ती है। इसलिये कागजन को पाश्चाय निमोनक भी कहा जाता है।
कॉर्क एथा को कोशिकायें संकरी पतली भित्तियों वाली आयताकार कोशिकाओं की परत होती है। कॉर्क एधा विभाजित होकर दोनों ओर कोशिकाओं को बनाता है। याहा की ओर की कोशिकाएँ कार्क (Cork) अबज काम (Phellen) में बंट जाती हैं और अंदर की ओर की कोशिकाएं द्वितीयक वाकुट अथवा कागअन्तर (Phellodem) में विदित हो जाती हैं।

कॉक में जल प्रवेश नहीं कर सकता। कोंक की कोशिकाय वरभूजीय आकार की व मृत होती हैं। इनकी कोशिका भिति पर सुरिन जम होता है, यह जाल के लिये रोधक होता है। द्वितीयक कल्कुट की कोशिकाएं मृतकी होती हैं। कॉर्क एषा की क्रियाशीलता के कारण वल्कुट की चाहरी परत जचा पालाचा पर दबाव पडता है और अंतत: ये परतें मत हो जाती व उतर जाती हैं। क्रियाशील कॉक प्रथा के याहर जितनी भी मृत कोशिकाएँ हैं, वे छालवल्क (Bark) बनाती हैं संबन एषा के बाहर के सभी कतकों को सामूहिक रूप से छालवल्य. कहते हैं।

इसके अन्तर्गत पलोगम, परिरम्भ, वल्कुट और परित्वक आते हैं। कुछ क्षेत्रों में कागजम कॉर्क कोशिकाओं की बजाय बाहर की ओर मृदूतकोय कोशिकाएं बनाती हैं। ये मृदूतकी कोशिकायें वात्वचा पर फट जाती हैं और लैंस की आकृति के छि बनाती हैं, जिसे वातरन्ध्र (Lenticles) कहते हैं। वातरंध बाहरी वायुमण्डल तथा तने के भीतरी उनकों के बीच गैसों का आदान-प्रदान करते हैं। ये प्राय: काप्नीय वृक्षों में पाये जाते हैं।

प्रश्न 13. 
पृष्ठाचार पत्ती की भीतरी रचना का वर्णन चिह्नित चित्रों की सहायता से करो।
उत्तर:
पृष्ताधारी पर्ण विवीजपत्री पादपों की पत्तियाँ होती हैं, जिनमें केवल एक ही सवड (ऊपरी) पर सूर्य का सीधा प्रकाश पड़ता है। अत: दोनों सतहों में उपस्थित काकों को संरचना में परिवर्तन आ जाता हैं।

  1. बाह्यत्वचा (Epidermais): पत्ती की ऊपरी एवं निचली सतहों को बकत्वना ढके रहती है। 
    • ऊपरी बाहात्वचा (Upper or adaxial cpirlermis) यह कोशिकाओं की एक परत की बनी होती है जिसकी बाहरी भित्तियाँ क्यूटिनयुका होता हैं। इसमें रन्ध बहुत ही कम होते हैं। 
    • निचली बात्वचा (Lower or atausl epidermis) यह एक परत की, उपत्वचा (euticle) की पतली परत होती है परन्तु रन्द्र अधिक संख्या में होते हैं। प्रत्येक रन्ध द्वार कोशिकाओं से घिरे होते हैं जिनमें हरितलवक पाये जाते है।
  2. पर्णमध्योतक (Mesophyll) ऊपरी तथा निघाली वाह्यत्वचा के बीच का ऊतक पर्णमध्योतक कहलाता है। यह दो क्षेत्रों में बंटा होता है:
    • खम्भ ऊतक (Palisade tissue): इसकी कोशिकाएँ लम्बी व पतली भित्ति वाली होती हैं। इनमें अन्तराकोशिक अवकाश बहुत छोटे होते हैं। इनमें इस्सिलक्क प्रचुरता से पाये जाते हैं। 
    • स्पंजी ऊतक (Spongy tissue): खाभ ऊतक से लेकर निचली वाहायचा तक स्पंजी मृतक होता है। ये कोशिकाएँ गोल व डीली व्यास्था वाली होती हैं। इनमें अन्तराकोशिक अवकाश मिलते हैं तथा इखिलक्क को मात्रा कम होती
  3. संवहन पूल (Niuscular hundle): इनमें मध्यशिरा वाला संवहन पूल अन्य पूलों की अपेक्षा बड़ा होता है। संवहन पूल संयुक्त, बहि:पालोयमी तथा अवर्षी होते हैं। इनमें प्रोटोजाइलम सदैव उपरी शहत्वचा को ओर तथा मेटाजाइलम निचली याहायचा की ओर होत है। फ्लोयम निचली बाहायचा की ओर होता है। प्रत्येक पूल के चारों और मृदूतको पूल आच्छर पाई जाती है। मध्यशिरा वाले संवहन पूल के दोनों तरफ पूल आसन की अतिवृद्धियाँ पाई जाती है जो मृत्तकी या स्थलकोणोतकी होती हैं।

प्रश्न 14.
त्वक कोशिकाओं की रचना तथा स्थिति उन्हें किस प्रकार विशिष्ट कार्य करने में सहायता करती है?
उत्तर:
आवधं या त्वक कोशिकायें (Balliform cells) एकीजपत्रियों की पत्तियों को ऊपरी बाहात्वचा में पायी जाती है। आवर्थ या वक कोशिकायें गुब्बारे के आकार की होती है तथा इसकी भित्ति पतली और जीवद्रव्य में अनेक रिकिाकाएँ पायी जाती हैं। इनमें जल अधिक मात्र में होता है। यह आर्द्रतानाही होती है तथा पत्तियों को खलने व मुड़कर बन्द होने का नियंत्रण करती है। ये कोशिकाएं जब स्कीत (flaccid) होती है, तब ये कोशिकाएँ मुड़ी हुई पत्तियों को खुलने में सहायता करती हैं। वाष्पोत्सजन को अधिक दर होने पर ये पनियाँ वाग्मोत्सर्जन की दर कम करने के लिये मुड़ जाती हैं।

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