Chapter 2 लेखन कला और शहरी जीवन

In Text Questions and Answers

प्रश्न 1. 
जलप्लावन के बारे में अनेक समाजों में अपनी-अपनी पुराण कथाएँ प्रचलित हैं। ये कुछ ऐसे तरीके हैं जो इतिहास में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों की यादों को अमिट रखते हुए अभिव्यक्त करते हैं। इनके बारे में कछ और जानकारी का पता लगाएँ और यह बताएँ कि जलप्लावन से पहले और उसके बाद का जनजीवन कैसा रहा होगा ?
उत्तर:
जल प्लावन के बारे में सभी समाजों में अपनी-अपनी पुराण कथाएँ प्रचलित हैं। ये कथाएँ इतिहास में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों की यादों को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। ऐसी कहानियों से जलप्लावन से पहले के एवं बाद के जन-जीवन की भी जानकारी मिलती है। जलप्लावन से पहले मानव अनेक गतिविधियों में संलग्न था जिनमें खेती, पशुपालन, उद्योग-धन्धे एवं व्यापार आदि प्रमुख थे। उस काल में अनेक प्रकार के छोटे-बड़े भवन एवं महल बने हुए थे। मानव का जीवन सामान्य रूप से गतिशील था परन्तु जलप्लावन के पश्चात् मानव जीवन को भीषण संकट का सामना करना पड़ा होगा। चारों तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा होगा। अनेक लोगों को अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ा होगा। इसके अतिरिक्त इस विनाश-लीला ने पशु-पक्षियों के साथ-साथ सभी प्रकार के भवनों, महलों एवं विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों को भी नष्ट कर दिया होगा। 

प्रश्न 2. 
क्या शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना सम्भव होता ? इस विषय पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
नहीं, शहरी अर्थव्यवस्था में खाद्य उत्पादन के अलावा व्यापार, विभिन्न वस्तुओं का विनिर्माण तथा तरह-तरह की सेवाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बढ़ई का सही काम करने, मनकों में छेद करने, पत्थरों पर मुद्राएँ उकेरने, फर्नीचर बनाने, सीपियाँ काटने आदि कार्यों के लिए धातु के औजारों की जरूरत पड़ती थी। मेसोपोटामियाई हथियार भी काँसे के बने होते थे। अतः कहा जा सकता है कि शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना सम्भव नहीं होता। 

प्रश्न 3. 
आप क्या सोचते हैं कि भंडारगृह में क्या रखा जाता होगा ? रसोईघर की पहचान कैसे की जा सकती
उत्तर:
राजमहल के भण्डार गृह में सम्भवतः राजा, राजपरिवार एवं महल के कर्मचारियों के लिए भोज्य सामग्री के अतिरिक्त कीमती धातुओं के आभूषण रखे जाते होंगे। रसोईघर की पहचान आग के लिए चूल्हे और ऊपर बर्तन. रखकर पकाने के लिए बने छिद्र को देखकर की जा सकती है। रसोईघर के फर्श पर वर्गाकार सुन्दर पत्थर लगे हुए हैं जहाँ खड़े होकर रसोईघर में भोजन बनाने का कार्य किया जाता था।

प्रश्न 4. 
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि असुरबनिपाल और नैबोनिड्स ने मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्पराओं की कद्र की?
उत्तर:
असीरिया का अन्तिम शासक असुरबनिपाल मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्पराओं की कद्र करता था। उसने यहाँ की प्राचीन परम्पराओं को संरक्षण प्रदान किया। उसने अपने राज्य की राजधानी निनवै में एक पुस्तकालय की स्थापना की। उसने इतिहास, महाकाव्य, शकुन साहित्य, ज्योतिष विद्या, स्तुतियों और कविताओं की पट्टिकाओं को एकत्रित करने का भरपूर प्रयत्न किया और उसमें सफल भी रहा। उसने अपने लिपिकों को दक्षिण में पुरानी पट्टिकाओं का पता लगाने के लिए भेजा क्योंकि वहाँ के विद्यालयों में पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था। उसके शासन काल में गिल्गेमिश के महाकाव्य जैसी महत्वपूर्ण पट्टिकाओं की प्रतियाँ तैयार की गईं।

असुरबनिपाल के पुस्तकालय में कुल मिलाकर 1000 मूल ग्रन्थ थे और लगभग 30,000 पट्टिकाएँ थीं जिन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया गया था। नैबोनिड्स स्वतन्त्र बेबीलोन का अन्तिम शासक था, उसने भी मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्पराओं की कद्र की तथा सम्मान प्रदान किया। वह महिलाओं का सम्मान करता था। उसने सुदूर दक्षिण में एक पुरातन नगर का कार्य भार सँभालने के लिए अपनी पुत्री को पुरातन समय की महिला पुरोहित के समान वस्त्र धारण करने की सलाह दी तथा उसे महिला पुरोहित के रूप में वहाँ प्रतिष्ठित किया। इसके अतिरिक्त नैबोनिड्स ने प्राचीन काल के अक्कद के राजा सारगोन की खण्डित मूर्ति की मरम्मत कराई। इस प्रकार उक्त सब बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि असुरबनिपाल और नैबोनिड्स ने मेसोपोटामिया की प्राचीन परम्पराओं का पालन किया।

Textbook Questions and Answers 

संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1. 
आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरम्भ में शहरीकरण के कारण थे ?
उत्तर:
प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही प्रारम्भ में शहरीकरण के कारण थे। इस बात के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

  1. प्राकृतिक उर्वरता के कारण जब खाद्य पदार्थों का उत्पादन आवश्यकता से अधिक होने लगा तो कृषक अपने अधिशेष उत्पादन को शहरों में बेचकर अच्छा लाभ कमाने लगे। इससे शहरीकरण को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।
  2. प्राकृतिक उर्वरता एवं खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर के कारण जनसंख्या बढ़ने लगी फलस्वरूप नये शहरों का विकास हुआ।
  3. गाँवों से शहरों में आने वाले अनाज व अन्य खाद्य पदार्थों के संग्रहण, भण्डारण एवं वितरण के लिए व्यवस्था करनी होती है। इससे व्यवसायों में वृद्धि होने लगी, जिसने शहरीकरण को प्रोत्साहन प्रदान किया।

प्रश्न 2. 
आपके विचार से निम्नलिखित में से कौन-सी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारम्भ में शहरीकरण हुआ था और निम्नलिखित में से कौन-कौन सी बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हुईं ?
(क) अत्यन्त उत्पादक खेती
(ख) जल-परिवहन
(ग) धातु और पत्थर की कमी
(घ) श्रम-विभाजन 
(ङ) मुद्राओं का प्रयोग
(च) राजाओं की सैन्य-शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया।
उत्तर:
प्रारम्भ में शहरीकरण के लिए आवश्यक दशाएँ-प्रारम्भ में शहरीकरण के लिए आवश्यक दशाएँ निम्नलिखित थीं
(क) अत्यन्त उत्पादक खेती-नि:संदेह अत्यन्त उत्पादक खेती प्रारम्भिक शहरीकरण की एक अत्यन्त आवश्यक दशा थी। यह निर्विवाद है कि शहरीकरण तभी संभव हो सकता है जब खेती में इतनी उपज होती हो कि वह शहरों में रहने वाले लोगों का पेट भरने में समर्थ हो सके। शहरों में लोग घनी बस्तियों में रहते हैं। अतः कहा जा सकता है कि जिस स्थान पर शहर का विकास होता है, उस स्थान पर भूमि का प्राकृतिक स्वरूप उपजाऊ होना अत्यन्त आवश्यक है। उदाहरण के लिए मेसोपोटामिया का शहर के रूप में विकास होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

(ख) जल परिवहन-जल परिवहन भी शहरीकरण के लिए अत्यन्त उत्पादक खेती से कम आवश्यक दशा नहीं थी। प्रारम्भिक काल में बोझा ढोने वाले पशुओं की पीठ पर लादकर व बैलगाड़ियों में भरकर शहरों में कृषि उत्पाद को ले जाना आसान नहीं था। इन माध्यमों से परिवहन में अत्यधिक समय लगता था तथा काफी खर्चीला होता था। इसके विपरीत जल परिवहन खाद्यान्न एवं अन्य सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का एक सस्ता एवं सुरक्षित साधन था। खाद्यान्न व अन्य सामान से भरी नौकाएँ नदी की धारा के साथ चलती थीं। परिणामतः उन पर कोई अतिरिक्त व्यय नहीं करना पड़ता था। प्राचीन मेसोपोटामिया की नहरें तथा प्राकृतिक जलधाराएँ छोटी-बड़ी बस्तियों के बीच परिवहन के अच्छे साधनों के रूप में कार्य करती थीं। यही कारण था कि जल परिवहन मेसोपोटामिया में प्रारम्भिक शहरीकरण के विकास का एक महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हुआ।

(ग) धातु और पत्थर की कमी-धातु और पत्थर की कमी ने भी मेसोपोटामिया में प्रारम्भिक शहरीकरण को बल दिया। निःसंदेह उन्नत व्यापार की अवस्था शहरीकरण का एक महत्वपूर्ण कारण है। इसके अतिरिक्त व्यापार के द्वारा ही शहरों में बनने वाला माल ग्रामों में पहुँचता है और ग्रामों से कच्चा माल व खाद्यान्न शहरों में आता है। मेसोपोटामिया खाद्य संसाधनों की दृष्टि से सम्पन्न था किन्तु वहाँ खनिज पदार्थों की कमी थी। दक्षिणी मेंसोपोटामिया के अधिकांश भागों में औजार, मोहरें और आभूषण आदि बनाने के लिए अच्छे पत्थरों और गाड़ियों के पहिए अथवा नावें बनाने के लिए अच्छी लकड़ी का अभाव था। इसी प्रकार औज़ार, बर्तन तथा आभूषण बनाने के लिए अच्छी धातु भी उपलब्ध नहीं थी। अतः ये वस्तुएँ व्यापार के द्वारा ही प्राप्त की जाती थीं। इसके साथ ही मेसोपोटामिया से कपड़ा और कृषि सम्बन्धी उत्पादों को अन्य देशों के लिए निर्यात किया जाता था। मेसोपोटामिया में अच्छी लकड़ी, ताँबा, राँगा, सोना, चाँदी, सीपी, विभिन्न प्रकार के पत्थर आदि तुर्की, ईरान और खाड़ी के अन्य देशों से आयात किये जाते थे। शहरों के विकास के फलस्वरूप विकसित दशाएँ-शहरों के विकास के फलस्वरूप निम्नलिखित बातें उत्पन्न हुईं

(घ) श्रम-विभाजन-नगरीय जीवन और लोगों का एक स्थान पर बसना तभी संभव होता है, जब अनेक लोग विभिन्न गैर-खाद्यान्न उत्पादक रोजगारों जैसे धातुकर्म, मुहर, नक्काशी, प्रशासन और मंदिर सेवा आदि में लगे हों। शहर के विनिर्माताओं को अपने-अपने उद्योगों के लिए ईंधन, धातु तथा अनेक प्रकार के पत्थरों की आवश्यकता होती है। इन वस्तुओं को केवल एक ही स्थान से प्राप्त करना असम्भव है। इसी प्रकार कोई एक व्यक्ति समस्त प्रकार की वस्तुओं के निर्माण में कुशल नहीं हो सकता है। फलस्वरूप औद्योगिक और व्यापारिक विकास में श्रम विभाजन का महत्वपूर्ण योगदान होता है। वस्तुतः शहरीकरण की प्रक्रिया को श्रम-विभाजन से भी बल मिलता है।

(ङ) मुद्राओं का प्रयोग-शहरीकरण के विकास के कारण मुद्राओं के प्रचलन को बढ़ावा मिला। निःसंदेह मुद्राओं के प्रचलन ने साहूकारों, विभिन्न व्यवसायियों तथा शासन के काम को आसान बना दिया। शहरों में जिन लोगों से लेन-देन होता था, वे सामान्यतया एक-दूसरे से अपरिचित होते थे। अतः संदेशों, दस्तावेजों और सामान के गट्ठरों को भेजते समय मुहर लगाना जरूरी समझा जाता था।

(च) राजाओं की सैन्य-शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया-शहरीकरण की प्रक्रिया ने राजाओं की सैन्य-शक्ति की आधारशिला रखी। हम जानते हैं कि शहरीकरण, औद्योगीकरण और व्यापारिक विकास में घनिष्ठ सम्बन्ध है। व्यापार के विकास के लिए शांति और सुरक्षा अति आवश्यक है जो कि किसी शक्तिशाली केन्द्र द्वारा प्रदान की जा सकती है। परिणामस्वरूप शहरीकरण के साथ-साथ कानून-व्यवस्था की देखभाल और श्रम-विभाजन पर नियंत्रण अति आवश्यक हो गया। परिणामतः राजा की सैन्य शक्ति में भी वृद्धि होने लगी। उदाहरण के लिए, यदि मेसोपोटामिया में शहरीकरण हुआ तो वहाँ एक कुशल और शक्तिशाली केन्द्रीय शासक का भी उद्भव हुआ।

प्रश्न 3. 
यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए खतरा थे? 
उत्तर:
खानाबदोश पशुचारक निम्नलिखित कारणों से शहरी जीवन के लिए खतरा थे

  1. अक्सर पशुचारक अपनी भेड़-बकरियों को पानी पिलाने के लिए किसानों के बोये हुऐ खेतों से निकालकर ले जाते थे, जिससे फसल को नुकसान होता था। इस कारण किसानों व खानाबदोश पशुचारकों के मध्य झगड़े हो जाते थे।। 
  2. कभी-कभी ये पशुचारक किसानों के गाँवों पर हमला कर देते थे और उनका माल लूट लेते थे। यह अव्यवस्था शहरी जीवन में बाधक थी।
  3. कई बार बस्तियों के लोग भी इन पशुचारकों का रास्ता रोक देते थे और उन्हें अपने पशुओं को नदी या नहर तक नहीं ले जाने देते थे फलस्वरूप दोनों के मध्य झगड़ा हो जाता था जो शहरी जीवन के लिए खतरा था।

प्रश्न 4. 
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मन्दिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?
उत्तर:
मेसोपोटामिया में मन्दिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के निवास स्थान थे। इन मन्दिरों का निर्माण ईंटों से किया जाता था। समय बीतने के साथ-साथ इनका आकार बढ़ता चला गया। मन्दिरों के खुले आँगन के चारों ओर अनेक कमरे बनाये जाते थे। प्रारम्भिक मन्दिर साधारण घरों की तरह होते थे। वस्तुतः मन्दिर भी देवी या देवता का घर ही होता था लेकिन मन्दिरों तथा साधारण घरों में कुछ अन्तर भी थे। मन्दिरों की बाहरी दीवारें कुछ विशेष अन्तरालों के पश्चात् अन्दर एवं बाहर की ओर मुड़ी हुई होती थीं जबकि साधारण घरों की दीवारें इस प्रकार की नहीं होती थीं। संक्षेप में निबन्ध लिखिए

प्रश्न 5. 
शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन-कौन सी नयी संस्थाएँ अस्तित्व में आईं ? आपके विचार से उनमें से कौन-सी संस्थाएँ राजा की पहल पर निर्भर थीं?
उत्तर:
मेसोपोटामिया में शहरी जीवन लगभग 5000 ई. पू. से शुरू होने के बाद दक्षिणी मेसोपोटामिया में बस्तियों का विकास होना प्रारम्भ हो चुका था। इन प्रारम्भिक बस्तियों से प्रारम्भिक शहर अस्तित्व में आने प्रारम्भ हो गए। ये शहर तीन प्रकार के थे

  1. वे शहर जो मन्दिर के चारों ओर विकसित हुए। 
  2. वे शहर जो व्यापार के केन्द्र के रूप में विकसित हुए। 
  3. शाही शहर।

मेसोपोटामिया में अस्तित्व में आने वाली नई संस्थाएँ- शहरी जीवन शुरू होने के बाद मेसोपोटामिया में निम्नलिखित . नई संस्थाएँ अस्तित्व में आईं-

  1. मन्दिर
  2. सामुदायिक मुखियाओं का उदय 
  3. सेना
  4. सामाजिक संस्थाएँ 
  5. व्यापार केन्द्र 
  6. लेखन कला 
  7. विद्यालय।

(i) मन्दिर-
शहरी जीवन शुरू होने के पश्चात् मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम अस्तित्व में आयी संस्था मन्दिर थी। बाहर से आकर बसने वाले लोगों ने मन्दिरों का निर्माण या पुनर्निर्माण करना प्रारम्भ कर दिया। सर्वप्रथम ज्ञात मन्दिर एक छोटा-सा देवालय था, जो कच्ची ईंटों से निर्मित था। यहाँ स्थित मन्दिर विभिन्न प्रकार के देवी-देवताओं के निवास स्थान थे, जैसे-चन्द्रदेवता ‘उर’ तथा प्रेम व युद्ध की देवी ‘इन्नाना’। इन मन्दिरों का निर्माण ईंटों से किया जाता था तथा समय के साथ-साथ इनका आकार भी बढ़ता चला गया। मन्दिर में स्थित देवता पूजा का केन्द्रबिन्दु होता था। यहाँ के लोगों के व्यक्तिगत रूप से पूजे जाने वाले देवता उनके खेतों, मत्स्य क्षेत्रों व पशुधन के स्वामी माने जाते थे। फलस्वरूप लोग इन्हें प्रसन्न करने के लिए अन्न, दही व मछली आदि लाते थे। धीरे-धीरे मन्दिरों ने अपने क्रियाकलाप बढ़ा दिए और मुख्य शहरी संस्था का रूप ले लिया।

(ii) सामुदायिक मुखियाओं का उदय:
जब मेसोपोटामिया के किसी क्षेत्र में विभिन्न समुदायों के मध्य लम्बे समय तक युद्ध चलता था तो जो मुखिया युद्ध में विजय प्राप्त करते थे, वे अपने साथियों व अनुयायियों को लूट का माल बाँटकर उन्हें प्रसन्न कर देते थे तथा पराजित लोगों को गिरफ्तार कर अपने साथ ले जाते थे। ऐसे लोगों को वे नौकर या चौकीदार बनाकर रखते थे। परन्तु युद्ध में विजयी होने वाले ये मुखिया लोग स्थायी रूप से समुदाय के मुखिया नहीं रह पाते थे। एक लम्बे समय पश्चात् इन लोगों ने अपने-अपने समुदायों के कल्याण पर भी ध्यान देना प्रारम्भ कर दिया, फलस्वरूप नयी-नयी संस्थाएँ व परम्पराएँ स्थापित हो गईं। इन विजेता मुखियाओं ने मन्दिरों में देवी-देवताओं के समक्ष बहुमूल्य भेटें अर्पित करना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने मन्दिरों की व्यवस्था के लिए मन्दिर में आने वाले चढ़ावे का हिसाब-किताब रखने की प्रभावी व्यवस्था की। इस व्यवस्था ने राज्य को उच्च स्थान प्रदान करवाया और समुदाय पर उसका पूर्ण नियन्त्रण स्थापित हो गया।

(iii) सेना:
सोपोटामिया के विभिन्न क्षेत्रों में मुखियाओं ने ग्रामीणों को अपने पास बसने के लिए प्रोत्साहन प्रदान किया जिससे कि वे आवश्यकता पड़ने पर तुरन्त अपनी सेना एकत्रित कर सकें। मेसोपोटामिया के उरुक नगर के उत्खनन से सशस्त्र वीरों एवं उनके द्वारा मारे गये शत्रुओं के चित्र प्राप्त हुए हैं, जिनसे सेना रखने सम्बन्धी जानकारी मिलती है। ,

(iv) सामाजिक संस्थाएँ:
मेसोपोटामिया के नगरों की सामाजिक व्यवस्था में एक उच्च वर्ग का उदय हो चुका था। समाज की अधिकांश धन-सम्पदा पर इसी वर्ग का अधिकार था। समाज में एकल परिवार को ही आदर्श माना जाता था। पिता ही परिवार का मुखिया होता था। कन्या के माता-पिता की सहमति से ही कन्या का विवाह किया जाता था। विवाह की रस्मों के पूर्ण होने के पश्चात् वर-वधू पक्ष में उपहारों का आदान-प्रदान होता था। पिता का घर, पशुधन, खेत आदि उसके पुत्रों को प्राप्त होते थे। पुत्री को दान-दहेज के रूप में गृहस्थी की सामग्री प्राप्त होती थी।

(v) व्यापार केन्द्र:
मेसोपोटामिया की सभ्यता में कई व्यापार केन्द्र भी थे जिनमें मारी नगर प्रमुख था। यहाँ से होकर लकड़ी, ताँबा, राँगा, तेल, मदिरा आदि वस्तुएँ तुर्की, सीरिया व लेबनान आदि देशों को निर्यात की जाती थीं।

(vi) लेखन कला:
मेसोपोटामिया की सभ्यता की विश्व को एक महत्वपूर्ण देन लिपि का आविष्कार है जिसे कीलाकार लिपि के नाम से जाना जाता है। यहाँ के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर कीलाकार चिह्न बनाकर लिखते थे। इन्हीं पट्टिकाओं पर विभिन्न प्रकार का हिसाब-किताब रखा जाता था।

(vii) विद्यालय:
सापोटामिया में विद्यालयों के प्रमाण मिले हैं जहाँ विद्यार्थी पुरानी लिखित पट्टिकाओं को पढ़ते एवं उनकी नकल करते थे। यहाँ कुछ विद्यार्थियों को साधारण प्रशासन का हिसाब-किताब रखने वाला लेखाकार न बनाकर, ऐसा प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति बनाया जाता था, जो अपने पूर्वजों द्वारा प्राप्त बौद्धिक उपलब्धियों को आगे बढ़ा सकें।
मेरे विचार से इन संस्थानों में से मन्दिर, व्यापार एवं लेखन कला राजा की पहल पर निर्भर थे। 

प्रश्न 6. 
किन पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है ? 
उत्तर:
निम्नलिखित पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है
(i) ईसाइयों के पवित्र ग्रन्थ बाइबिल के प्रथम भाग ओल्ड टेस्टामेंट की ‘बुक ऑफ जेनेसिस’ में शिमार अर्थात् सुमेर के विषय में बताया गया है कि वहाँ ईंटों से बने शहर हैं। यूरोप के पादरी एवं विद्वान मेसोपोटामिया को अपने पूर्वजों की भूमि मानते थे। जब इस क्षेत्र में पुरातत्वीय खोज की शुरुआत हुई तो ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ के शाब्दिक सत्य को सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया।

(ii) बाइबिल में जल प्लावन की कहानी का उल्लेख मिलता है। बाइबिल के अनुसार यह जलप्लावन पृथ्वी पर सम्पूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला था किन्तु ईश्वर ने जलप्लावन के पश्चात् भी जीवन को पृथ्वी पर सुरक्षित बनाये रखने के लिए ‘नोआ’ नामक एक मनुष्य का चयन किया। नोआ ने एक बहुत बड़ी नाव बनाई और उसमें समस्त जीव-जंतुओं का एक-एक जोड़ा रख लिया। जब पृथ्वी पर जलप्लावन की घटना घटित हुई तो नावों में रखे गए सभी जोड़ों को छोड़कर सब कुछ नष्ट हो गया। इसी प्रकार की एक कहानी मेसोपोटामिया के परम्परागत साहित्य में भी पायी जाती है। इस कहानी के मुख्य पात्र को जिउसूद्र अथवा उतनापिष्टिम कहा जाता था।

(iii) मेसोपोटामिया की परम्परागत कथाओं के अनुसार उरुक के शासक एनमर्कर ने ही मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लेखन व व्यापार की शुरुआत की थी। एक परम्परागत कथा के अनुसार उरुक के राजा एनमर्कर ने अपने राज्य के एक सुन्दर मन्दिर को सुसज्जित करने के लिए बहुमूल्य लाजवद्र तथा अन्य बहुमूल्य रत्न धातुएँ लाने के लिए अपने एक दूत को ‘अरट्टा’ नामक राज्य के शासक के पास भेजा परन्तु जब दूत अपनी बात को अरट्टा के राजा को नहीं समझा पाया और अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया तो राजा एनमर्कर ने अपने हाथ से चिकनी मिट्टी की पट्टिका बनाई और उस पर शब्द लिख दिए। उसने यह पट्टिका अरट्टा के राजा को प्रदान की। ये शब्द कीलाकार शब्द थे। इस कहानी से यह पता चलता है कि एनमर्कर ने मेसोपोटामिया में सर्वप्रथम लेखन व व्यापार की शुरुआत की थी। यहाँ के लोग मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखा करते थे। उनकी लिपि कीलाकार लिपि कहलाती थी। 

(iv) ‘गिल्गेमिश’ नामक महाकाव्य से यह जानकारी मिलती है कि मेसोपोटामिया के लोगों को अपने नगरों पर गर्व था। ऐसा कहा जाता है कि गिल्गेमिश ने राजा एनमर्कर के पश्चात् अनेक नगरों पर शासन किया था। गिल्गेमिश एक महान वीर था जिसने दूर-दूर के प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर अपने शासन का विस्तार कर लिया था।
लेकिन वह अपने एक वीर मित्र की अचानक मृत्यु से बहुत दुखी हो गया और अमरत्व की खोज में निकल गया। उसने दुनियाभर में अमरत्व की खोज की लेकिन वह सफल न हो सका अंत में वह अपने नगर उरुक लौट आया। एक दिन वह जब अपने आपको सांत्वना देने के लिए नगर की चारदीवारी के पास भ्रमण कर रहा था तभी उसकी दृष्टि उन पकी हुई ईंटों पर पड़ी जिनसे उसकी नींव डाली गई थी। वह बहुत भाव-विभोर हो गया। यह कहानी यह बताती है कि गिल्गेमिश को अपने नगर में ही सांत्वना मिलती है, जिसे उसकी प्रजा ने बनाया था।

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