Chapter 3 टार्च बेचने वाले

Textbook Questions and Answers

Chapter 3 टार्च बेचने वाले

प्रश्न 1. 
लेखक ने टार्च बेचने वाली कम्पनी का नाम 'सूरज छाप' ही क्यों रखा ? 
उत्तर : 
सूर्य प्रकाश फैलाता है और अन्धकार दूर करता है, टार्च भी अन्धकार दूर करके प्रकाश फैलाती है। टार्च बेचने वाला जीवन निर्वाह के लिए टार्च बेचता था। वह टार्च की विशेषता बताता है। यह अन्धकार दूर करती है, मार्ग दिखाती है। घर में व्याप्त अन्धकार को दूर करती है। प्रकाश फैलाने का कार्य करने के कारण ही उसने अपनी कम्पनी का नाम सूरज छाप रखा। 

प्रश्न 2.
पाँच साल बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात किन परिस्थितियों में और कहाँ होती है ? 
उत्तर : 
एक शाम को एक शहर के मैदान में दोनों की मुलाकात हुई। मैदान में खूब रोशनी थी और लाउडस्पीकर लगे थे। एक मंच था जो बहुत सजा हुआ था। मंच पर सुन्दर रेशमी वस्त्र धारण किए हुए एक भव्य पुरुष बैठे हुए थे और प्रवचन कर रहे थे। प्रवचन करने वाला भव्य पुरुष टार्च बेचने वाले का मित्र था। जब वह मंच से उतर कर कार में बैठने लगा तो टार्च बेचने वाला उसके पास पहुँचा। भव्य पुरुष ने उसे पहचान कर अपने साथ कार में बैठा लिया। इस प्रकार दोनों की मुलाकात हुई।

प्रश्न 3.
पहला दोस्त मंच पर किस रूप में था और वह किस अँधेरे को दूर करने के लिए टार्च बेच रहा था ? 
उत्तर : 
टार्च बेचने वाले का दोस्त मैदान में बने मंच पर विराजमान था। वह संत के रूप में था और प्रवचन कर रहा था। उस का भव्य रूप था, शरीर पुष्ट था। उसने रेशमी वस्त्र धारण कर रखे थे। उसकी लम्बी दाढ़ी थी और पीठ पर लम्बे केश लहरा रहे थे। वह फिल्मों के संत की तरह लग रहा था। वह गुरु-गंभीर वाणी में प्रवचन कर रहा था। इस रूप में उसने अपने मित्र को देखा। टार्च जिस प्रकार प्रकाश करके बाहर के अन्धकार को दूर करती है। उसी प्रकार वह अन्दर के अँधेरे को दूर करने के लिए अध्यात्म की टार्च बेच रहा था। वह अपने प्रवचन से लोगों के हृदय में ज्योति जगाने का अश्वासन दे रहा था।

प्रश्न 4. 
भव्य पुरुष ने कहा - "जहाँ अन्धकार है वहीं प्रकाश है।" इसका क्या तात्पर्य है ? 
उत्तर : 
मंच पर विराजमान उस भव्य पुरुष ने जो संत सरीखा दिख रहा था पहले तो लोगों को अंधकार की बात कहकर भयभीत किया फिर उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि जहाँ अंधकार होता है, वहीं प्रकाश भी होता है। इस कथन का आशय यह है कि ज्ञान और अज्ञान अर्थात अंधकार और प्रकाश दोनों मनुष्य के मन में रहते हैं। मन में छाए अंधकार को दूर करके ज्ञान के इस प्रकाश को प्राप्त कर सकते हैं। अंधकार यहाँ दुख, कष्ट, विपत्ति, अज्ञान का प्रतीक है और प्रकाश सुख, आनंद, सम्पत्ति, ज्ञान का प्रतीक है। 

प्रश्न 5. 
भीतर के अंधेरे की टार्च बेचने और 'सरज छाप' टार्च बेचने के धंधे में क्या फर्क है ? पाठ के आधार पर बताइए। 
उत्तर :
लेखक की दृष्टि में दोनों ही दोस्त टॉर्च बेचने का धंधा करते हैं। पहला दोस्त सूरज छाप टार्च बेचता है। अपनी टार्च बेचने से पहले लोगों का मजमा इकट्ठा कर वह उन्हें अंधकार के बारे में और इससे होने वाली हानियों के बारे में बताता है जिससे वह टार्च खरीदने को तैयार हो जायें। दूसरा दोस्त साधु-संतों के वेश में रेशमी वस्त्र धारण किये, लम्बी दाढ़ी बढ़ाकर, मंच पर बैठकर आध्यात्मिक प्रवचन देता है। वह भी लोगों को अज्ञानरूपी अंधकार से डराकर उन्हें ज्ञानरूपी टार्च खरीदने को प्रेरित करता है। यह प्रकाश उसके साधना मंदिर में प्राप्त होता है। इस प्रकार टार्च दोनों ही बेचते हैं। एक सूरज छाप टार्च बेचता है तो दूसरा सनातन कंपनी की अध्यात्म टार्च बेचता है। पहले वाले की गिनी-चुनी आमदनी होती है जबकि दूसरे वाले की इतनी आमदनी होती है कि उसके ठाठ-बाट देखते ही बनते हैं। 

प्रश्न 6. 
'सवाल के पाँव जमीन में गहरे गढ़े हैं। यह उखड़ेगा नहीं।' इस कथन में मनुष्य की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत है और क्यों ? 
उत्तर : 
उपर्युक्त कथन में यह संकेत है कि प्रत्येक मनुष्य पैसा पैदा करने की चिन्ता से ग्रसित है। टार्च बेचने वाले तथा उसके मित्र के सामने मूल समस्या पैसा पैदा करने की है। मनुष्य पैसा पैदा करने के अनेक उपायों पर विचार करता है किन्तु समाधान नहीं होता। कारण यह है कि पैसा कमाने का कोई निश्चित और एक तरीका नहीं है। यह समस्या सभी के सामने है। यह समस्या अर्थात् सवाल बहुत कठिन है और मनुष्य सदैव इसके समाधान का प्रयत्न करता रहता है। पर सभी को समान सफलता नहीं मिलती।

प्रश्न 7. 
'व्यंग्य विधा में भाषा सबसे धारदार है।' परसाई जी की इस रचना को आधार बनाकर इस कथन के पक्ष में अपने विचार प्रकट कीजिए। 
उत्तर : 
हरिशंकर परसाई जी ने व्यंग्य विधा की विवेचना करते हुए कहा है कि 'व्यंग्य विधा में भाषा सबसे धारदार है' अर्थात् एक अच्छा व्यंग्य तभी लिखा जा सकता है जब व्यंग्यकार की भाषा धारदार हो। धारदार का अर्थ है-अर्थवत्ता से युक्त, पैनी, प्रहार करने की शक्ति रखने वाली। व्यंग्यकार भाषा के द्वारा ही सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करता है। इस पाठ में अध्यात्म पर एवं धार्मिक प्रवचनकर्ताओं पर भाषा के माध्यम से व्यंग्य किया गया है। लोगों को अँधेरे से भयभीत करके ये प्रवचनकर्ता अध्यात्म की शरण में जाने को विवश करते हैं। लेखक इसीलिये उन्हें टार्च बेचने वाला कहता है। ये 
है। प्रवचनकर्ता लोगों के मन में व्याप्त, अज्ञान के अंधकार को दूर करने और ज्ञान का प्रकाश फैलाने का दावा करके अपने अध्यात्म की टार्च बेचते हैं। यह सनातन कंपनी की टार्च ही तो है। इस प्रकार धारदार भाषा के माध्यम से व्यंग्यकार परसाई ने अपना कथन स्पष्ट किया है। इससे स्पष्ट है व्यंग्य की भाषा धारदार हो 

प्रश्न 8. 
आशय स्पष्ट कीजिए -
(क) क्या पैसा कमाने के लिए मनुष्य कुछ भी कर सकता है? 
आशय - प्रत्येक मनुष्य का स्वविवेक होता है। हर मनुष्य उसका इस्तेमाल अपने अच्छे-बुरे कार्यों में करता है। पैसा मत नहीं है, लेकिन गलत तरीकों से पैसा कमाना गलत है। कछ व्यक्ति स्वार्थवश, कछ परिस्थितिवश गलत संगत में पड़कर गलत तरीके से पैसा कमाते हैं, लेकिन अंत में उनको दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। सभी मनुष्यों के विचार-व्यवहार अलग-अलग होते हैं। कुछ व्यक्ति चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, गलत तरीके से पैसा नहीं कमाते। वे अपने सिद्धांतों पर चलते हैं। अधिकतर व्यक्ति पैसा कमाने के लिए अपने आदर्शों को ध्यान में रखते हुए सभी उपायों को काम में लेते हैं। 

(ख) 'प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अन्तर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ।' 
आशय - यह कथन दूसरे मित्र का है जो ढोंगी है और संत बन गया है। प्रवचन देकर लोगों को ठगता है। वह आत्मा के प्रकाश की बात करता है। आत्मा में अज्ञान का अन्धकार है। आत्मा की आँखें ज्योतिहीन हो गई हैं। आत्मा की ज्योति (ज्ञान) को जगाने की आवश्यकता है। लोग उसके 'साधना-मन्दिर' में आकर ज्ञान की ज्योति जगाएँ। 

(ग) धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूंगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ।'
आशय - 'सूरज छाप' कम्पनी की छाप बेचने वाले को जब यह पता लगा कि उसके मित्र ने साधु भेष में प्रवचन दे खूब पैसा कमाया है तब उसका मन बदल गया। उसने कहा मैं भी धंधा बदलूँगा और 'सूरज छाप' टार्च न बेचकर अध्यात्म की टार्च बेचूंगा। मैं धार्मिक प्रवचन करूँगा और पैसा कमाऊँगा।

प्रश्न 9. 
उस व्यक्ति ने 'सूरज छाप' टार्च की पेटी को नदी में क्यों फेंक दिया ? क्या आप भी वही करते? 
उत्तर :
टार्च बेचने वाले का एक मित्र था, जब वे दोनों बेरोजगार थे तब एक दिन उसके मन में एक सवाल पैदा हुआ कि पैसा कैसे पैदा किया जाए। इस कठिन समस्या को हल करने के लिए दोनों मित्रों ने तय किया वे अलग-अलग स्थानों पर अपनी किस्मत आजमाने के लिए निकलें। यह भी निश्चित हुआ कि पाँच साल बाद दोनों मित्र उसी स्थान पर मिलें। . एक मित्र ने टार्च बेचने का धंधा आरम्भ किया। 

वह लोगों को अँधरे के भय और हानियाँ सुनाकर डराता और अपनी टार्च बेचता था। पाँच साल पूरे होने पर वह उसी स्थान पर आ पहुंचा जहाँ दोनों मित्रों को मिलना था, पूरे दिन प्रतीक्षा करने पर भी जब मित्र नहीं आया तो उसे चिंता हुई और वह उसे खोजने को चल पड़ा। जब वह एक शहर की सड़क पर जा रहा था, तो उसे पास ही रोशनी से जगमगाता मैदान दिखाई दिया जहाँ हजारों लोगों को बड़ी श्रद्धा से एक भव्य स्वरूप वाले व्यक्ति का प्रवचन सुनते दिखाई दिए। प्रवचनकर्ता ने रेशमी वस्त्र धारण कर रखे थे। लम्बे केशों और दाढ़ी वाले वह प्रवचनकर्ता परमज्ञानी संत प्रतीत हो रहे थे। 

टार्च विक्रेता ने पास जाकर सुना तो वह संसार में छाए हुए अज्ञानरूपी अंधकार से मुक्ति पाने का उपाय बता रहे थे। टार्च बेचने के लिए लोगों जो कुछ वह कहता, वे ही बातें वह भी ज्ञान और अध्यात्म में लपेट कर श्रोताओं को सुना रहे थे। प्रवचन की समाप्ति पर वह संत के समीप पहुंचा तो उन्होंने उसे पहचान लिया। वह उसे गाड़ी में बिठाकर अपने 'साधना मंदिर' में ले गए। वहाँ संत के ठाट-बाट देखकर वह चकित रह गया। दोनों में मित्रों की तरह खुलकर बातें हुई। टार्च विक्रेता ने इस ठाट-बाट का रहस्य पूछा तो संत ने कुछ दिन अपने पास रखा। 

टार्च विक्रेता समझ गया कि बिजली की टार्च बेचने के बजाय अध्यात्म की टार्च बेचने का धंधा ही सबसे लाभदायक धंधा है। अतः उसने अपनी 'सूरज छाप- टार्चा की पेटी को नदी में फेंक दिया और दाढी-केश बढ़ाना आरम्भ कर दिया। आज के सामाजिक परिवेश में धन कमाना ही जीवन का प्रमुख लक्ष्य बन गया है। चाहे उसके लिए कुछ भी उपाय क्यों न अपनाना पड़े। मेरा मानना है कि धनार्जन ही जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। 

जीवन मूल्यों की रक्षा करते हुए धन कमाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन छल, कपट, पाखंड और ठगी से कमाया गया धन समाज में ईर्ष्या, द्वेष और असंतोष पैदा करता है। आज कोरोना महामारी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जहाँ अरबों-खरबों की संपत्ति कमाने वाले इससे नहीं बच पा रहे हैं। अतः मैं टार्च विक्रेता बना रहना उचित मानता हूँ। परिश्रम की कमाई पर निर्भर होना ही श्रेष्ठ समझता हूँ। पाखंडी संत बनकर करोड़पति नहीं बनता।

प्रश्न 10. 
टार्च बेचने वाले किस प्रकार की स्किल का प्रयोग करते हैं ? क्या इसका 'स्किल इंडिया' प्रोग्राम से कोई संबंध है ? 
उत्तर :
टार्च बेचने वाले टार्च बेचने के लिए सड़क किनारे या चौराहों पर मजार लगाकर लोगों को अपनी नाटकीय भाषा-शैली के द्वारा प्रभावित करते हैं। वे अपने टार्गों की खूबियाँ का बखान करते हैं। लोगों को अँधेरे से होने वाली हानियों और परेशानियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। टार्च बेचने वाले पाठ में टार्च बेचने वाला इसी स्किल का प्रयोग करके लोगों को टार्च खरीदने को प्रेरित करता है। 

टार्च बेचने वालों की इस प्रकार की स्किल का स्किल इंडिया प्रोग्राम से कोई सीधा संबंध तो दिखाई नहीं देता किन्तु इस प्रोग्राम का उद्देश्य भी कारीगरों को स्किल्ड बनाना ही है। विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनाने वाले या बेचने वाले लोगों और शिल्पियों को कार्य-कुशल बनाना, नई तकनीकों के प्रयोग के लिए प्रेरित करना, समयानुकूल सुधार और डिजायनें बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त करना आदि इस प्रोग्राम के उद्देश्य हैं। टार्च बेचने वाला कुछ बनाता नहीं बेचता है। अत: मार्केटिंग का कौशल सिखाना प्रोग्राम का हिस्सा माना जा सकता है। 

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