Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

अभ्यासः

प्रश्न 1.
प्रश्नानामुत्तराणि एकपदेन लिखत-
(क) केन पीडितः वैभवः बहिरागतः?
उत्तरम्:
विद्युद्भावेन!

(ख) भवनेत्यादीनां निर्माणाय के कर्त्यन्ते?
उत्तरम्:
भवनेत्यादीनां निर्माणाय वृक्षाः कर्त्यन्ते।

(ग) मार्गे किं दृष्ट्वा बालाः परस्परं वार्तालाप कुर्वन्ति?
उत्तरम्:
यत्र-तत्र अवकार भाण्डारं।

(घ) वयं शिक्षिताः अपि कथमाचरामः?
उत्तरम्:
अशिक्षिता इवाचरामः।

(ङ) प्लास्टिकस्य मृत्तिकायां लयाभावात् कस्य कृते महती क्षतिः भवति?
उत्तरम्:
पर्यावरणस्य।

(च) अद्य निदाघतापतप्तस्य किं शुष्कतां याति?
उत्तरम्:
तालुहि।

प्रश्न 2.
पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत-
(क) परमिन्दर् गृहात् बहिरागत्य किं पश्यति?
उत्तरम्:
परमिन्दर् गृहात् बहिरागत्य यत् वायुवेगः तु सर्वथाऽवरुद्ध पश्यति।

(ख) अस्माभिः केषां निर्माणाय वृक्षाः कर्त्यन्ते?
उत्तरम्:
भवनानां, मैट्रोभार्गाणां, उपरिगामि सेतूनाम् मार्गेत्यादीनां निर्माणाय वृक्षाः कर्त्यन्ते।

(ग) विनयः संगीतामाहूय किं वदति?
उत्तरम्:
विनयः संगीतामाहूय पश्य-पश्य उपरितः इदानीमपि अवकरः मार्गे क्षिप्यते।

(घ) रोजलिन् आगत्य किं करोति?
उत्तरम्:
रोजलिन् आगत्य स्वक्षिप्तमवकरम् मार्गे विकीर्णमन्यदवकरं चापि संग्रह अवकरकण्डो ले पातयति।

(ङ) अन्ते जोसेफः पर्यावरणक्षायै कः उपायः बोधयति?
उत्तरम्:
अन्ते जोसेफ: पर्यावरणक्षायै प्लास्टिकस्य अवरोधः, नदी जले निमज्जिताः पशवः अपित रक्षणीयाः उपाय: बोधयति।

प्रश्न 3.
रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(क) जागरूकतया एव स्वच्छताऽभियानमपि गतिं प्राप्यति?
उत्तरम्:
कस्या एव स्वच्छताऽभियानमपि गतिं प्राप्स्यति।?

(ख) धेनुः शाकफलानामावरणैः सह प्लास्टिकस्यूतमपि खादति स्म?
उत्तरम्:
धेनुः कस्मै सह प्लास्टिकस्यूतमपि खादति स्म?

(ग) वायुवेगः सर्वथाऽवरुद्धः आसीत्?
उत्तरम्:
कः सर्वथाऽवरुद्धः आसीत्?

(घ) सर्वे अवकरं संगृह्य अवकरकण्डोले पातयन्ति?
उत्तरम्:
सर्वे अवकरं संगृह्य केन पातयन्ति?

(ङ) अधुना प्लास्टिकनिर्मितानि वस्तूनि प्रायः प्राप्यन्ते?
उत्तरम्:
अधुना प्लास्टिकनिर्मितानि कानि प्रायः प्राप्यन्ते?

(च) सर्वे नदीतीरं प्राप्ताः प्रसन्नाः भवति?
उत्तरम्:
सर्वे कुत्र प्राप्ताः प्रसन्नाः भवति?

प्रश्न 4.
सन्धिविच्छेदं पूरयत-
(क) ग्रीष्मतौं – ________ + ऋतौ
(ख) बहिरागत्य – बहिः + ________
(ग) काञ्चित् – ________ + चित्
(घ) तद्वनम् – ________ + वनम्
(ङ) कलमेत्यादीनि – कलम + ________
(च) अतीवानन्दप्रदोऽयम् – ________ + आनन्दप्रदः + ________
उत्तरम्:
(क) ग्रीष्मतौं – ग्रीष्म + ऋतौ
(ख) बहिरागत्य – बहिः + आगत्य
(ग) काञ्चित् – कश्यित् + चित्
(घ) तद्वनम् – तत् + वनम्
(ङ) कलमेत्यादीनि – कलम. + इत्या
(च) अतीवानन्दप्रदोऽयम् – अति + आनन्दप्रदः + अयम्

प्रश्न 5.
विशेषणपदैः सह विशेष्यपदानि योजयत-

उत्तरम्:

प्रश्न 6.
शुद्धकथनानां समक्षम् आम् अशुद्धकथनानां समक्षं च न इति लिखत-
(क) प्रचण्डोष्मणा पीडिताः बालाः सायंकाले एकैकं कृत्वा गृहाभ्यन्तरं गताः।
उत्तरम्:
आम्

(ख) मार्गे मित्राणि अवकरभाण्डारं यत्र-तत्र विकीर्ण दृष्ट्वा वार्तालापं कुर्वन्ति।
उत्तरम्:
आम्

(ग) अस्माभिः पर्यावरणस्वच्छतां प्रति प्रायः ध्यानं न दीयते।
उत्तरम्:
आम्

(घ) वायुं विना क्षणमपि जीवितुं न शक्यते।
उत्तरम्:
आम्

(ङ) रोजलिन् अवकरम् इतस्ततः प्रक्षेपणात् अवरोधयति बालकान्।
उत्तरम्:
आम्

(च) एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वनं सुपुत्रेण कुलमिव दह्यते।
उत्तरम्:

(छ) बालकाः धेनुं कदलीफलानि भोजयन्ति।
उत्तरम्:
आम्

(ज) नदीजले निमज्जिताः बालाः प्रसन्नाः भवन्ति।
उत्तरम्:
आम्

प्रश्न 7.
घटनाक्रमामनुसारं लिखत-
(क) उपरितः अवकरं क्षेप्तुम् उद्यतां रोजलिन् बालाः प्रबोधयन्ति।
(ख) प्लास्टिकस्य विविधापक्षान् विचारयितुं पर्यावरणसंरक्षणन पशूनेत्यादीन् रक्षितुं बालाः कृतनिश्चयाः भवन्ति।
(ग) गृहे प्रचण्डोष्मणा पीडितानि मित्राणि एकैकं कृत्वा गृहात् बहिरागच्छन्ति।
(घ) अन्ते बालाः जलविहारं कृत्वा प्रसीदन्ति।
(ङ) शाकफलानामावरणैः सह प्लास्टिकस्यूतमपि खादन्तीं धेनुं बालकाः कदलीफलानि भोजयन्ति।
(च) वृक्षाणां निरन्तरं कर्तनेन, ऊष्मावर्धनेन च दुःखिताः बालाः नदीतीरं गन्तुं प्रवृत्ताः भवन्ति।
(छ) बालैः सह रोजलिन् अपि मार्गे विकीर्णमवकरं यथास्थानं प्रक्षिपति।
(ज) मार्गे यत्र-तत्र विकीर्णमवकरं दृष्ट्वा पर्यावरणविषये चिन्तिताः बालाः परस्परं विचारयन्ति।
उत्तरम्:
(ग) गृहे प्रचण्डोष्मणा पीडितानि मित्राणि एकैकं कृत्वा गृहात् बहिरागच्छन्ति।
(ज) मार्गे यत्र-तत्र विकीर्णमवकरं दृष्ट्वा पर्यावरणविषये चिन्तिताः बालाः परस्परं विचारयन्ति।
(क) उपरितः अवकरं क्षेप्तुम् उद्यतां रोजलिन् बालाः प्रबोधयन्ति।
(घ) अन्ते बालाः जलविहारं कृत्वा प्रसीदन्ति।
(ङ) शाकफलानामावरणैः सह प्लास्टिकस्यूतमपि खादन्तीं धेनुं बालकाः कदलीफलानि भोजयन्ति।
(ख) प्लास्टिकस्य विविधापक्षान् विचारयितुं पर्यावरणसंरक्षणन पशूनेत्यादीन् रक्षितुं बालाः कृतनिश्चयाः भवन्ति।
(च) वृक्षाणां निरन्तरं कर्तनेन, ऊष्मावर्धनेन च दुःखिताः बालाः नदीतीरं गन्तुं प्रवृत्ताः भवन्ति।
(छ) बालैः सह रोजलिन् अपि मार्गे विकीर्णमवकरं यथास्थानं प्रक्षिपति।

Summary

पाठ परिचय
प्रस्तुत पाठ स्वच्छता तथा पर्यावरण सुधार को ध्यान में रखकर सरल संस्कृत में लिखा गया एक संवादात्मक पाठ है। हम अपने आस-पास के वातावरण को किस प्रकार स्वच्छ रखें तथा यह भी ध्यान रखें कि नदियों को प्रदूषित न करें, वृक्षों को न काटें, अपितु अधिकाधिक वृक्षारोपण करें और धरा को शस्यश्यामला बनाएँ। प्लास्टिक का प्रयोग कम करके पर्यावरण संरक्षण में योगदान करें। इन सभी बिन्दुओं पर इस पाठ में चर्चा की गई है। पाठ का प्रारंभ कुछ मित्रों की बातचीत से होता है, जो सायंकाल में दिन भर की गर्मी से व्याकुल होकर घर से बाहर निकले हैं-

शब्दार्थ:
विद्युदभावे – बिजली चले जाने पर, प्रचण्डोष्मणा – बहुत गर्मी से, (प्रचण्ड + ऊष्मणा), निष्क्रामति – निकलता है, अवरुद्धः – रुका हुआ है, स्वेदबिन्दवः – पसीने की बूंदें, स्वेदधाराः इव – पसीने की नदियाँ सी, प्रस्रवन्ति – बह रही हैं, निदाघतापतप्तस्य – ग्रीष्म के ताप से दुःखी मनुष्य का, पुंसो भयार्दितस्येव – भयभीत मनुष्य के समान, उपरिगामिसेतूनाम् – ऊर्ध्वगामी पुलों के, कर्त्यन्ते – काटे जा रहे हैं, वह्निना – आग से, दह्यते – जलाया जाता है, चेत् – शायद, अवकरभाण्डारम् – कूड़े के ढेर, प्लास्टिकस्यूतानि – प्लास्टिक के लिफाफे, इवाचरामः (इव+आचराम:) – के समान व्यवहार करते हैं, क्षिप्यते – फेंका जा रहा है, आहूय – बुलाकर (आवाज़ लगा कर), मार्गे भ्रमत्सु – रास्ते में चलने वालों पर, देयाः – देने योग्य, विकीर्णम् – बिखरा हुआ, संगृह्य – इकट्ठा कर के, शाकफलानामावरणैः सह – सब्जियों और फलों के छिलकों के साथ, पिहिते अवकरकण्डोले – ढके हुए कूड़ेदान में, कार्पासेन – कपास से, चर्मणा – चमड़े से, आलपन्तः – बात करते हुए।

मूलपाठः
गद्यांश – वैभवः – अरे परमिन्दर! अपि त्वमपि विद्युदभावेन पीडितः बहिरागतः?

सरलार्थः
वैभवः – अरे परमिन्दर क्या बिजली नहीं रहने के कारण बाहर आए हो?

गद्यांश – परमिन्दर् : आम् मित्र! ……… पवनः।

सरलार्थ:
हाँ मित्र! एक तो बहुत गर्मी दूसरी और बिजली का अभाव बाहर पर भी हवा रूका हुआ सा है। सही कहा गया है कि – ‘हवा के बिना संसार नहीं, यदि हवा एक क्षण के लिए भी पृथ्वी पर नहीं हो तो पृथ्वी के सभी जीव नष्ट हो जायेगे।

गद्यांश – विनयः – अरे मित्र…………… नैव दृश्यन्ते॥

सरलार्थः
अरे मित्र पसीने की बँदे से शरीर पसीने की नदियाँ के समान बह रही है। शुक्ल महादेय ने श्लोक में लिखा है – तेज गर्मी के कारण जल की बुन्दे आकाश से विलुप्त ठीक वैसे ही जैसे सामान्य लोग आरक्षित की जगह नहीं होते।

गद्यांश – परमिन्दर – आम् …………….. जायते वपुः।

सरलार्थः
हाँ, यह तो बिल्कुल है – ‘तेज गर्मी के कारण दुःखी मनुष्य का ओंठ सुख जाता हैं जैसे डर के कारण मनुष्य के शरीर में पसीना सुख जाता है।

गद्यांश – जोसेफः मित्राणि ……………………… कुलं यथा।

सरलार्थः
दोस्तों, यहाँ-वहाँ बहुत धरती पर भवन भूमि के अन्दर के रास्ता, विशेषरूप से मैट्रो मार्ग, उर्ध्वगामी पुलों के, मार्गों के निर्माण में बहुत से वृक्ष काटे गए है जिससे पर्यावरण की उपेक्षा हुई है। हम लोग तो बहुत भुल गए हैं – जैसे एक सुखे पेड़ के टकराने से उत्पन्न अग्नि से पुरा जंगल जल जाता हैं ठीक इसी प्रकार एक कुपुत्र से पूरा वंश नष्ट हो जाता है।

गद्यांश – परमिन्दर – आम् ………….. शक्ष्येम।

सरलार्थः
हाँ ये सभी सत्य हैं आओ नदी के किनारे जाते हैं। वहाँ कहीं शान्ति प्राप्त होगी।

गद्यांश – जोसेफ: – पश्यन्तु मित्राणि ……… अनने प्रकारेण ……..

सरलार्थः
देखों मित्रों यहाँ-वहाँ प्लास्टिक के वस्तुएँ फेंकी हुई है। कहते हैं स्वास्थ्य के लिए स्वच्छता आवश्यक लेकिन हम लोग शिक्षित होकर भी अशिक्षित का आचरण कर रहे हैं।

गद्यांश – वैभवः – गृहाणि तु ……… न दीयते।

सरलार्थः
घर की सफाई पर हम लोग प्रतिदिन ध्यान देते हैं लेकिन पर्यावरण एवं स्वच्छता पर ध्यान न देते

गद्यांश – विनयः – पश्य-पश्य ………………. एवं संस्कारा देयाः।

सरलार्थः – देखो-देखों ऊपर सड़क पर बेकार चीजें फेंकी जा रही है कृपाकर ऐसा न करें। यह तो अशोभनीय है हम लोगों की भाँति बच्चों में भी ऐसा संस्कार होगा।

गद्यांश – रोजलिन् – आम् पुत्र! ……………… गति प्राप्यति।

सरलार्थः
हाँ पुत्र! सदा सत्य बोलते हो। क्षमा करो मैं बगीचा जाता हूँ। हम लोगों में जागरूकता होनी चाहिए और प्रधानमंत्री महोदय् के स्वच्छता अभिमान को गति प्रदान करनी चाहिए।

गद्यांश – विनयः – पश्य तत्र धेनुः …………. अवकरकण्डोले क्षिपन्ति।

सरलार्थः
देखो-देखों गाये फल और सब्जी के बाह्य छिलके के साथ प्लास्टिक की थैली भी खा जा रही है। ऐसा करने से रोकना है, रास्ते में केला बेचने वाला से लड़का केला खरीदकर गाय को खाने के लिए देता है और प्लास्टिक की थैली ढके हुए कुडेदान में डालने की सलाह दो।

गद्यांश – परमिन्दर – प्लास्टिकस्य मृत्तिकायां ………. प्राप्यन्ते।

सरलार्थः
परमिन्दर प्लास्टिक से बनी मुत्तियों से हमारे पर्यावरण की अपार क्षति होती है। पहले तो कपास से, चमड़ा से, लोहा से, लाख से, मिट्टी से, लकड़ी से वस्तुएँ बनायी जाती थीं अब इसके स्थान पर प्लास्टिक से बनी वस्तुएँ प्रयोग होती है।

गद्यांश – वैभवः – आम् घटिपट्टिका ……………. भवन्ति।
सरलार्थः
हाँ, घड़ी की पट्टी और अनेकों प्रकार की वस्तुएँ, कलम आदि वस्तुएँ तो प्लास्टिक से बनी हुई है।

गद्यांश – जोसेफः – आम् अस्माभिः ………….. सम्भवो भुवि।

सरलार्थः
हाँ। हम लोगों को अभिभावकों एवं शिक्षकों के सहयोग से प्लास्टिक के ऊपर अलग-अलग प्रकार से विचार करनी चाहिए। पर्यावरण से ही पशुओं की भी रक्षा होती है। इसके बाद सभी नदी के किनारे गए, नदी के जल में स्नान करते हुए गाने लगे – ‘यदि मित्रो पर्यावरण सही नहीं हैं तो कुछ भी नही है। सारा संसार पर्यावरण से ही संभव है।

गद्यांश – सर्वे – अतीवानन्दप्रदोऽयं जलविहारः।

सरलार्थः
सभी काफी खुशी के साथ जल विहार करने लगे।

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