(क) कवित्त (ख) सवैया
(क) कवित्त (ख) सवैया घनानंद सप्रसंग व्याख्या (क) कवित्त संदर्भ प्रस्तुत काव्यांश पाठ्य पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) में संकलित ‘कवित्त’ शीर्षक कविता का अंश है। यह घनानंद की रचना है, जो रीतिकाल के प्रमुख स्वच्छंदतावादी कवि हैं। प्रसंग कवि ने अपनी प्रेमिका सुजान के अंतिम दर्शन की अभिलाषा को इस काव्यांश में व्यक्त किया है। व्याख्या […]
पद
पद विद्यापति सप्रसंग व्याख्या हिए नहि सहए असह दुख रे भेल साओन मास।। एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए। सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पति आए।। मोर मन हरि हर लए गेल रे अपनो मन गेल। गोकुल तेजि मधुपुर बस रे कन अपजस लेल।। विद्यापति कवि गाओल रे धनि धरु […]
बारहमासा
बारहमासा सप्रसंग व्याख्या काँपा हिया जनावा सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ।। घर घर चीर रचा सब काहूँ। मोर रूप रँग लै गा नाहू।। पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई।। सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधौ भै छारा।। यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जनम करै […]
(क) भरत-राम का प्रेम (ख) पद
(क) भरत-राम का प्रेम (ख) पद तुलसीदास सप्रसंग व्याख्या (क) भरत-राम का प्रेम संदर्भ प्रस्तुत काव्यांश पाठ्य-पुस्तक ‘अंतरा’ (भाग-2) के ‘भरत-राम का प्रेम’ शीर्षक पद से लिया गया है। यह पद ‘रामचरितमानस’ के ‘अयोध्या-कांड’ में संकलित है। प्रसंग अयोध्या के राजा दशरथ राम को राजा बनाना चाहते थे, किंतु कैकयी को दिए अपने ‘वर’ के […]
(क) तोड़ो (ख) वसंत आया
(क) तोड़ो (ख) वसंत आया रघुवीर सहाय सप्रसंग व्याख्या (क) वसंत आया ऐसे किसी बँगले के किसी तरु (अशोक) पर कोई चिडिया कुऊकी चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पाँव तले ऊँचे तरुवर से गिरे बड़े-बड़े पियराए पत्ते कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी […]
(क) एक कम (ख) सत्य
(क) एक कम (ख) सत्य विष्णु खरे सप्रसंग व्याख्या (क) एक कम इतने लोगों को इतने तरीकों से आत्मनिर्भर मालामाल और गतिशील होते देखा है कि अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए तो जान लेता हूँ मेरे सामने एक ईमानदार आदमी, औरत या बच्चा खड़ा […]
Poem 4 (क) बनारस (ख) दिशा व्याख्या
Poem 4 (क) बनारस (ख) दिशा
Poem 4 (क) बनारस (ख) दिशा
Poem 4 (क) बनारस (ख) दिशा
(क) यह दीप अकेला (ख) मैंने देखा, एक बूँद vyakya
3 (क) यह दीप अकेला (ख) मैंने देखा, एक बूँद सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ सप्रसंग व्याख्या (क) यह दीप अकेला है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह जन है-गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा? पनडुब्बा-ये मोती सच्चे फिर कौन कृती लाएगा? यह समिधा-ऐसी आग हठीला बिरला सुलगाएगा। यह अद्वितीय-यह […]
(क) यह दीप अकेला (ख) मैंने देखा, एक बूँद audio
3 (क) यह दीप अकेला (ख) मैंने देखा, एक बूँद सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ प्रश्न-अभ्यास यह दीप अकेला उत्तर कवि अज्ञेय अस्तित्ववादी हैं। मनुष्य की अस्मिता तथा क्षमता पर उनका भरोसा है। ‘यह दीप अकेला’ कविता में ‘दीप’ को प्रतीक के रूप में रखकर अक्षेय ने मनुष्य की क्षमता तथा विशिष्टताओं को दर्शाया है। वह […]