Chapter 1 साखी

प्रश्न-अभ्यास

(पाठ्यपुस्तक से)

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?
उत्तर
मीठी वाणी जीवन में आत्मिक सुख व शांति प्रदान करती है। इसके प्रयोग से संपूर्ण वातावरण सरस व सहज बन जाता है। यह सुननेवाले के मन को प्रभावित व आनंदित करती है। इसके प्रभाव से मन में स्थित शत्रुता, कटुता वे आपसी ईष्र्या-द्वेष के भाव समाप्त हो जाते हैं। मीठी वाणी बोलने से सुननेवालों को शांति प्राप्त होती है। इसलिए हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि जिसे सुनकर लोग आनंद की अनुभूति करें। हम मीठी वाणी बोलकर अपने शरीर को भी शीतलता पहुँचाते हैं। कठोर वाणी हमें क्रोधित व उत्तेजित करती है। मीठी वाणी अहंकारशून्य होने के कारण तन को शीतलता प्रदान करती है तथा आनंद की सुखद अनुभूति कराती है। इस प्रकार मीठी वाणी बोलने से न केवल दूसरों को हम सुख प्रदान करते हैं अपितु स्वयं भी शीतलता का अनुभव करते हैं।

प्रश्न 2.
दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
साखी के संदर्भ में ‘दीपक ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतीक है। जिस प्रकार दीपक का प्रकाश अंधकार को मिटा देता है, उसी प्रकार से जब ईश्वरीय ज्ञान की लौ दिखाई देती है, तब अज्ञान रूपी अंधकार मिट जाता है और मनुष्य के भीतर-बाहर ज्ञान का प्रकाश फैल जाता है। ज्ञान का प्रकाश तभी प्रज्वलित होता है, जब मनुष्य का ‘अहम्’ नष्ट हो जाता है और परमात्मा से उसका साक्षात्कार हो जाता है।

प्रश्न 3.
ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?
उत्तर
ईश्वर संसार के कण-कण में व्याप्त है परंतु हम उसे देख नहीं पाते, क्योंकि हमारा अस्थिर मन सांसारिक विषय-वासनाओं, अज्ञानता, अहंकार और अविश्वास से घिरा रहता है। अज्ञान के कारण हम ईश्वर से साक्षात्कार नहीं कर पाते। जिस प्रकार कस्तूरी नामक सुगंधित पदार्थ हिरण की नाभि में विद्यमान होता है लेकिन वह उसे जंगल में इधर-उधर ढूँढ़ता रहता है उसी प्रकार ईश्वर हमारे हृदय में निवास करते हैं परंतु हम उन्हें अज्ञानता के कारण मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों व गुरुद्वारों में व्यर्थ में ही खोजते फिरते हैं। कबीर के मतानुसार कण-कण में छिपे परमात्मा को पाने के लिए ज्ञान का होना अत्यंत आवश्यक है।

प्रश्न 4.
संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
संसार में सुखी वही व्यक्ति है, जिसने घट-घट और कण-कण में बसने वाले ईश्वर से प्रीति कर ली है, उसके तत्व ज्ञान को जान और मान लिया है। दुखी मनुष्य वह है, जो दिन में खाकर और रात में सोकर हीरे जैसे अनमोल जीवन साखी 5 को व्यर्थ गॅवाकर भौतिक सुखों की चकाचौंध में खोया हुआ है। यहाँ जो व्यक्ति संसार के विषयों से अनासक्त होकर ईश्वर में मन को लगाए हुए है, वह ‘जागना’ का प्रतीक है और जो व्यक्ति विषय-विकारों में मस्त है, भौतिक दृष्टि से उसकी आँखें बेशक खुली हुई हैं, पर वास्तव में वह सोया हुआ है, अर्थात् ‘सोना’ का प्रतीक है।

प्रश्न 5.
अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?
उत्तर
स्वभाव की निर्मलता के लिए आवश्यक है कि मनुष्य का मन निर्मल हो । मन तभी निर्मल रह सकता है जब हम उसे विकारों से मुक्त रखेंगे। इसके लिए आवश्यक है कि हम बुरे काम न करें। इसके लिए कबीर ने यह उपाय सुझाया है कि हमें सदा निंदक अर्थात आलोचना करनेवाले को सम्मान सहित आँगन में कुटी बनाकर रखना चाहिए। क्योंकि उन्हें यह विश्वास है कि निंदक ही वह प्राणी है जो मनुष्य की गलतियों को सुधारने का अवसर देता है। जिससे मनुष्य के स्वभाव में निर्मलता का भाव उत्पन्न होता है।

प्रश्न 6.
एकै अषिर पीव का, पढ़े सु पंडित होइ’-इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर
इस पंक्ति के द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि ईश्वर को पाने के लिए तो उसके नाम, भक्ति और प्रेम का एक अक्षर पढ़ लेना ही बड़े-बड़े वेदों तथा ग्रंथों को पढ़ने के समान है। पंडित बनने के लिए ईश्वर के नाम के एक अक्षर को गहराई से समझकर हृदय में आत्मसात् कर लेना पर्याप्त है। पुस्तकीय ज्ञान द्वारा व्यक्ति द्वंद्व, विवाद एवं वैचारिक मतभेदों में फँस जाता है।

प्रश्न 7.
कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
कबीर जी द्वारा रचित इन साखियों की भाषा सधुक्कड़ी है। इसमें अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, पूर्वी हिंदी तथा पंजाबी के शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है। कबीर की भाषा में देशज शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। कवि ने अपनी बात कहने के लिए साखी को अपनाया है। यह वस्तुतः दोहा छंद है। इनमें अत्यंत सामान्य भाषा में लोक व्यवहार की शिक्षा दी गई है। इनमें मुक्तक शैली का प्रयोग हुआ है तथा गीति तत्व के सभी गुण विद्यमान है। भाषा सहज तथा मधुर है। भाषा में अनुप्रास, रूपक पुनरुक्ति प्रकाश, उदाहरण व दृष्टांत अलंकार प्रयुक्त है। अपनी चमत्कारी भाषा के कारण कबीर जगत् प्रसिद्ध हैं।

(ख) निम्नलिखित का भाव स्पष्ट कीजिए

प्रश्न 1.
विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
उत्तर
विरह-व्यथा विष से भी अधिक मारक है, दारुण है। इस व्यथा का वर्णन शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह केवल अनुभूति का विषय है। सर्प और विष का उदाहरण देते हुए कवि ने राम वियोगी की व्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। कबीर के अनुसार विरह सर्प की भाँति है। विरह-विष तन में व्याप्त है। कोई मंत्र (झाड़-फॅक) इस विष को मार नहीं सकता है। राम का वियोगी-विरह व्यथा में मरता है अगर जीता है तो बावला हो जाता है।

प्रश्न 2.
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूंढे बन मॉहि।
उत्तर
मनुष्य के घट (शरीर) में ही परमात्मा का वास है अर्थात् शक्ति का स्त्रोत हमारे भीतर है पर इसके प्रति हमारा विश्वास नहीं। हम उसे बाहर कर्मकांड आदि में ढूंढते हैं अपने भीतर ढूंढने का यत्न नहीं करते। यही भ्रम है-यही भूल है, मृग जैसी हमारी दशा है। उसकी नाभि में ही कस्तूरी है पर उसे उसका बोध नहीं और उस सुगंध की खोज में वह स्थान-स्थान पर भटकता फिर रहा है।

प्रश्न 3.
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नॉहि।
उत्तर
कबीर के अनुसार जब तक मैं अर्थात् अहंकार को भाव मन में था तब तक वहाँ ईश्वर का वास नहीं था। केवल मन में अज्ञान रूपी अंधकार ही समाया हुआ था। जब ज्ञान दीपक में स्वयं के स्वरूप को पहचाना तब मन में छाया अज्ञान दूर हो गया। मन निर्मल हो गया। मन निर्मल हो ईश्वर से अभिन्नता का अनुभव करने लगा।

प्रश्न 4.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भयो ने कोइ।
उत्तर
कबीर प्रेम मार्ग की श्रेष्ठता पर बल देते हुए कहते हैं कि शास्त्र पढ़-पढ़कर सारा संसार नष्ट होता जा रहा है। युग बीतते जा रहे हैं लेकिन कौन सच्चे अर्थों में पंडित या विद्वान बन पाया? किसने वह अलौकिक आनंद प्राप्त किया जो प्रेम से मिलता है। कबीर की दृष्टि से जिसने प्रेम के दो अक्षरों को जान लिया है। वही विद्वान है, पंडित है। प्रेम हृदय का भाव है और पढ़ना मस्तिष्क का । प्रेम के मार्ग में पढ़ाई साधक भी हो सकती है और बाधक भी।

भाषा अध्ययन

प्रश्न 1.
पाठ में आए निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप उदाहरण के अनुसार लिखिए-
उदाहरण-जिवै – जीना
औरन, माँहि, देख्या, भुवंगम, नेड़ा, आँगणी, साबण, मुवा, पीव, जालौं, तास

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