Chapter 1 सुभाषितानि

पाठ-परिचय – ‘सुभाषित’ शब्द ‘सु + भाषित’ इन दो शब्दों के मेल से सम्पन्न होता है। सु का अर्थ सुन्दर, मधुर तथा भाषित का अर्थ वचन है। इस तरह सुभाषित का अर्थ सुन्दर/मधुर वचन है। प्रस्तुत पा नीतिशतकम्, मनुस्मृतिः, शिशुपालवधम्, पञ्चतन्त्रम् से रोचक और विचारपरक श्लोकों को संगृहीत किया गया है।

पाठ के श्लोकों का अन्वय, कठिन-शब्दार्थ एवं हिन्दी-भावार्थ –

  1. गुणा गुणज्ञेषु ……………………….. समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः॥
    अन्वयः – गुणाः गुणज्ञेषु गुणाः भवन्ति, ते (गुणाः) निर्गुणं प्राप्य दोषाः भवन्ति। (यथा) नद्यः सुस्वादुतोयाः प्रभवन्ति, समुद्रम् आसाद्य (ताः) अपेयाः भवन्ति।

कठिन-शब्दार्थ :

गुणज्ञेषु = गुणवानों में।
प्राप्य = प्राप्त करके।
सुस्वादुतोयाः = स्वादिष्ट जल वाली।
प्रभवन्ति = उत्पन्न होती हैं।
समुद्रम् आसाद्य = समुद्र में मिलकर।
हिन्दी-भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में गुणवान् के महत्त्व को बताते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार उत्पन्न होते समय नदी का जल मीठा एवं पीने योग्य होता है किन्तु समुद्र में मिलने पर वही जल खारा एवं पीने योग्य नहीं होता है, उसी प्रकार गुण भी गुणवान् में ही सद्गुण के रूप में रहते हैं किन्तु वे ही गुण गुणहीन व्यक्ति को प्राप्त करके दोष बन जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि संगति के अनुसार ही गुण-दोष बनते हैं।

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  1. साहित्यसङ्गीतकला ………………………………………….. तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥
    अन्वयः – साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः (जनः) पुच्छविषाणहीनः साक्षात् पशुः (भवति)। तृणं न खादन् अपि जीवमानः, तद् पशूनां परमं भागधेयम्।

कठिन-शब्दार्थ :

पुच्छविषाणहीनः = पूँछ और सींग के बिना।
तृणं = घास।
खादन् अपि = खाते हुए भी।
जीवमानः = जिन्दा रहता हआ।
भागधेयम = सौभाग्य है।
हिन्दी-भावार्थ – साहित्य, संगीत और कला से रहित मनुष्य पूँछ और सींग से रहित साक्षात् पशु है। घास न खाते हुए भी वह (मनुष्य) जीवित है, यह पशुओं का परम सौभाग्य है। अर्थात् यदि मनुष्य घास भी खाने लगे तो पशुओं को घास भी खाने को प्राप्त नहीं होगी।

  1. लुब्धस्य नश्यति यश: …………………………………. प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य॥
    अन्वयः – लुब्धस्य यशः नश्यति, पिशुनस्य मैत्री, नष्टक्रियस्य कुलम्, अर्थपरस्य धर्मः, व्यसनिनः विद्याफलम्, कृपणस्य सौख्यम, (तथा च) प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य राज्यम् (नश्यति)

कठिन-शब्दार्थ :

लुब्धस्य = लोभी का।
पिशुनस्य = चुगलखोर की।
नष्टक्रियस्य = नष्ट क्रिया वाले का।
अर्थपरस्य = धन-परायण का।
व्यसनिनः = बुरी लत वालों की।
कृपणस्य = कंजूस का।
सौख्यम् = सुख।
नश्यति = नष्ट हो जाता है।
हिन्दी-भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में अनेक प्रकार के दुर्गुणों को त्यागने की प्रेरणा देते हुए तथा उन दुर्गुणों के दुष्परिणाम का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि लोभी व्यक्ति का यश, चुगलखोर की मित्रता, कर्महीन (निकम्मे) का कुल, केवल धन के लालची (स्वार्थी) का धर्म, व्यसनी का विद्या-फल, कंजूस का सुख तथा अभिमानी मन्त्रियों वाले राजा का राज्य नष्ट हो जाता है। अतः इन दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।

  1. पीत्वा रसं तु कटुकं ……………………………… मधुरसूक्तरसं सृजन्ति॥
    अन्वयः – असौ मधुमक्षिका कटुकं मधुरं तु रसं समानं पीत्वा माधुर्यमेव जनयेत्। तथैव सन्तः सज्जनदुर्जनानां वचः समं श्रुत्वा मधुरसूक्तरसं सृजन्ति।

कठिन-शब्दार्थ :

मधुमक्षिका = मधुमक्खी।
कटुकं = कड़वा।
पीत्वा = पीकर।
जनयेत् = पैदा करती/निर्माण करती है।
तथैव = वैसे ही।
सन्तः = सज्जन।
सृजन्ति = निर्माण करते हैं।
हिन्दी-भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार मधुमक्खी कड़वे एवं मीठे दोनों प्रकार के रस का पान करके भी केवल मधुरता (शहद) को ही प्रदान करती है, उसी प्रकार सज्जन लोग सज्जनों एवं दुर्जनों के वचनों को समान रूप से ग्रहण करके भी केवल मधुर सूक्त-वचन की ही रचना करते हैं अर्थात् मधुर वचन ही बोलते हैं।

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  1. विहाय पौरुषं यो हि ………………………………….. मूर्ध्नि तिष्ठन्ति वायसाः॥
    अन्वयः – यः पौरुषं विहाय दैवम् एव अवलम्बते, प्रासादसिंहवत् तस्य मूर्ध्नि हि वायसाः तिष्ठन्ति।

कठिन-शब्दार्थ :

विहाय = छोड़कर।
दैवम् = भाग्य को।
अवलम्बते = आश्रित रहता है।
प्रासादसिंहवत् = महल (भवन) में स्थित सिंह के समान।
मूर्ध्नि = मस्तक पर।
वायसाः = कौए।
हिन्दी-भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में कहा गया है कि जिस प्रकार पराक्रम से रहित महल में स्थित मूर्तिवाला सिंह के मस्तक पर कौए बैठे रहते हैं, उसी प्रकार जो व्यक्ति परिश्रम से रहित केवल भाग्य पर आश्रित रहता है, वह कायर के समान दुर्जनों से घिरा हुआ होता है। अतः हमें भाग्य पर ही आश्रित न होकर परिश्रम करना चाहिए।

  1. पुष्पपत्रफलच्छाया …………………………………… येषां विमुखं यान्ति नार्थिनः॥
    अन्वयः – पुष्प-पत्र-फल-च्छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः महीरुहाः धन्याः, येषाम् आर्थिनः विमुखं न यान्ति।

कठिन-शब्दार्थ :

मूल = जड़।
वल्कल = पेड़ की छाल।
दारुभिः = लकड़ियों द्वारा।
महीरुहाः = वृक्ष।
अर्थिनः = याचक लोग।
यान्ति = जाते हैं।
हिन्दी-भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में वृक्षों की महानता का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वृक्ष धन्य हैं, क्योंकि उनके पुष्प, पत्ते, फल, छाया, छाल व लकड़ियाँ प्राप्त करके कोई भी याचक निराश होकर वापस नहीं जाता है। वृक्ष सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं। उनकी दानशीलता को देखकर उन्हें धन्य कहा गया है।

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  1. चिन्तनीया हि विपदाम् ………………………………………… युक्तं प्रदीप्ते वह्निना गृहे॥
    अन्वयः – विपदाम् आदौ एव प्रतिक्रियाः चिन्तनीयाः। हि वह्निना गृहे प्रदीप्ते कूपखननं न युक्तम्।

कठिन-शब्दार्थ :

विपदाम् = विपत्तियों के।
आदौ = प्रारम्भ में।
प्रतिक्रियाः = उपाय।
वह्निना = अग्नि द्वारा।
गृहे = घर के।
प्रदीप्ते = जल जाने पर।
कूपखननम् = कुआँ खोदना।
हिन्दी-भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में प्रेरणा देते हुए कहा गया है कि विपत्तियाँ आने से पहले ही उनके निवारण के उपाय सोच लेने चाहिए। विपत्तियाँ आने के बाद किया गया उपाय उसी प्रकार व्यर्थ है जिस प्रकार आग से घर जल जाने पर कुआँ खोदना व्यर्थ है।

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