chapter 1 Introduction (परिचय)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित कथन सही हैं अथवा गलत? इन्हें तदनुसार चिह्नित करें

(क) सांख्यिकी केवल मात्रात्मक आँकड़ों का अध्ययन करती है।
(ख) सांख्यिकी आर्थिक समस्याओं का समाधान करती है।
(ग) आँकड़ों के बिना अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का कोई उपयोग नहीं है।

उत्तर :

(क) गलत,
(ख) सही,
(ग) सही।

प्रश्न 2.
उन क्रियाकलापों की सूची बनाएँ जो जीवन के सामान्य कारोबार के अंग होते हैं। क्या ये आर्थिक क्रियाकलाप हैं?
उत्तर :
उन क्रियाकलापों की सूची जो जीवन के सामान्य कारोबार के अंग होते हैं, निम्नलिखित हैं|

  1. आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए वस्तुओं को क्रय करना।
  2. लाभ कमाने के लिए वस्तुओं का उत्पादन करना।
  3. किसी अन्य व्यक्ति के लिए कार्य करना और बदले में पारिश्रमिक लेना।
  4. पारिश्रमिक (वेतन/मजदूरी) पाने के लिए दूसरे व्यक्ति को सेवा प्रदान करना।
  5. लाभ कमाने के लिए वस्तुएँ बेचना (विक्रेता का कार्य)।

उपर्युक्त सभी क्रियाएँ आर्थिक हैं क्योंकि ये सभी धन सम्बन्धी क्रियाएँ हैं और मौद्रिक लाभ कमाने के उद्देश्य से की जाती हैं।

प्रश्न 3.
सरकार और नीति निर्माता आर्थिक विकास के लिए उपयुक्त नीतियों के निर्माण के लिए
सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रयोग करते हैं। दो उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए।
अथवा सरकार एवं नीति-निर्माताओं के लिए सांख्यिकीय आँकड़ों के प्रयोग का महत्व बताइए।
उत्तर :
1. सरकार द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रयोग देश में पूर्ण रोजगार के स्तर को बनाए रखने के लिए सरकार को अपनी व्यय नीति, कर नीति, मौद्रिक नीति आदि में समायोजन करना पड़ता है, परन्तु यह समायोजन सांख्यिकीय तथ्यों के आधार पर ही हो सकता है। सरकारी बजट का निर्माण भी सांख्यिकीय आँकड़ों के आधार पर किया जाता है। सरकार द्वारा नियुक्त आयोगों, समितियों आदि के प्रतिवेदनों का आधार भी समंक ही होते हैं। वास्तव में, सांख्यिकीय आँकड़े एक ऐसा आधार है जिसके चारों ओर सरकारी क्रियाएँ घूमती हैं।

2. नीति-निर्माताओं द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का प्रयोग-सांख्यिकीय आँकड़े नीति निर्माण की आधारशिला हैं। योजनाएँ बनाने, उन्हें क्रियान्वित करने तथा उनकी उपलब्धियों/असफलताओं का मूल्यांकन करने में पग-पग पर सांख्यिकीय आँकड़ों का सहारा लेना पड़ता है। नीति-निर्माता समंकों का प्रयोग निम्नलिखित बातों के लिए करते हैं

  • अन्य देशों की तुलना में अपने देश के आर्थिक विकास की स्थिति को जानने के लिए; .
  • आर्थिक विकास के निर्धारक तत्त्वों के प्रभाव, तकनीकी प्रगति व उत्पादकता की स्थिति जानने के लिए;
  • अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में प्राथमिकताएँ निर्धारित करने के लिए;
  • विभिन्न क्षेत्रों के निर्धारित लक्ष्यों व वित्तीय साधनों का अनुमान लगाने के लिए;
  • विभिन्न परियोजनाओं के कार्यकरण का मूल्यांकन करने के लिए

प्रश्न 4.
आपकी आवश्यकताएँ असीमित हैं तथा उनकी पूर्ति करने के लिए आपके पास संसाधन सीमित हैं। दो उदाहरणों द्वारा इसकी व्याख्या करें।
उत्तर :
उदाहरण 1 – माना हमारे पास केवल १ 10 हैं। हम इससे फल, सब्जियाँ, पुस्तक, खेल का सामान आदि खरीदना चाहते हैं, सिनेमा भी देखना चाहते हैं। क्या हम ऐसा कर सकते हैं? नहीं। क्योंकि हमारे पास साधन सीमित अर्थात् मात्र 10 हैं। अतः हम इन आवश्यकताओं को वरीयता के क्रम में रखकर सर्वाधिक आवश्यक उन वस्तुओं को खरीद पाएँगे जिनका मूल्य र 10 तक होगा।

उदाहरण 2 – माना एक व्यक्ति के पास मात्र १ 10,000 की पूँजी है। वह इसे अनाज को संग्रह करने, अंश पत्रों व ऋण पत्रों में लगाने, कम्प्यूटर लगाकर जॉब वर्क करने आदि कार्यों में लगाना चाहता है। वह ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि उसके पास पूँजी सीमित (मात्र १ 10,000) है। अत: वह वही कार्य कर पाएगा जिसमें अधिकतम पूँजी की आवश्यकता मात्र १ 10,000 हो।

प्रश्न 5.
उन आवश्यकताओं का चुनाव आप कैसे करेंगे जिनकी आप पूर्ति करना चाहेंगे?
उत्तर :
जिन आवश्यकताओं की हम पूर्ति करना चाहेंगे उनका चुनाव निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर किया जाएगा

  1. विभिन्न आवश्यकताओं की तीव्रता देखकर, अधिक तीव्रता वाली आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए चुनाव किया जाएगा।
  2. यह देखा जाएंगा कि हमारे पास उन आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए कितने साधन उपलब्ध हैं।
  3. यह भी देखा जाएगा कि उपलब्ध संसाधनों के कितने वैकल्पिक प्रयोग हो सकते हैं। संक्षेप में, साधनों की उपलब्धता उनके वैकल्पिक प्रयोगों के आधार पर, अधिक तीव्रता वाली आवश्यकताओं की क्रमानुसार सन्तुष्टि की जाएगी।

प्रश्न 6.
आप अर्थशास्त्र का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं? कारण बताइए।
उत्तर :
हम अर्थशास्त्र का अध्ययन निम्नलिखित कारणों से करना चाहते हैं

  1. अर्थशास्त्र के अध्ययन से ज्ञान में वृद्धि होती है, तर्क शक्ति बढ़ती है और दृष्टिकोण विस्तृत एवं वैज्ञानिक हो जाता है।
  2. अर्थशास्त्र के अध्ययन से चुनाव योग्यता में वृद्धि होती है और हम आवश्यक तथा अनावश्यक आवश्यकताओं में भेद करने में समर्थ हो जाते हैं।
  3. पारिवारिक बजट बनाकर हम विवेकपूर्ण ढंग से व्यय करना सीख जाते हैं। इससे हमें अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त होती है।
  4. न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन कैसे किया जाए, इसको ज्ञान हमें, अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होता है।
  5. अर्थशास्त्र के अध्ययन से हमें देश में जन-कल्याण हेतु चलाई जा रही विभिन्न परियोजनाओं का ज्ञान होता है।
  6. अर्थशास्त्र के अध्ययन से हमारी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
  7. हमें देश में प्रचलित विभिन्न कुरीतियों एवं समस्याओं का ज्ञान होता है; जैसे–निर्धनता, बेरोजगारी, जनसंख्या में वृद्धि, अल्प-पोषण, जाति प्रथा, दहेज प्रथा, बाल-विवाह आदि। अर्थशास्त्र के अध्ययन से हमें इन समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है।

प्रश्न 7.
सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होतीं।’ टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकीय विधियाँ सामान्य बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होतीं यह बात सर्वथा सत्य है। अत: इसका प्रयोग विशेष सावधानी के साथ उसकी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए एक उपयुक्त व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए अन्यथा उससे निकाले गए निष्कर्ष भ्रामक होंगे। इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है
उदाहरण – एक बार चार व्यक्तियों का एक परिवार (पति-पत्नी तथा दो बच्चे) नदी पार करने निकला। पिता को नदी की औसत गहराई की जानकारी थी। अतः उसने परिवार के सदस्यों के औसत । कद का हिसाब लगाया। चूँकि परिवार के सदस्यों का औसत कद नदी की औसत गहराई से अधिक था, इसलिए उसने सोचा कि वे सभी सुरक्षित रूप से नदी पार कर सकते हैं। परिणामस्वरूप नदी पार करते समय बच्चे पानी में डूब गए। स्पष्ट है कि उस व्यक्ति ने ‘औसत’ का दुरुपयोग किया था। स्पष्ट है कि सांख्यिकी का प्रयोग पूर्ण योग्यता तथा ज्ञान के साथ, अत्यधिक सावधानी बरतते हुए तथा उसके विज्ञान की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए, एक उपयुक्त व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए ताकि निकाले गए निष्कर्ष सही तथा स्पष्ट हों।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जो मानव व्यवहार का अध्ययन साध्यों एवं सीमित तथा वैकल्पिक प्रयोगों वाले साधनों के बीच संबंध के रूप में करता है।” यह कथन किसका है?
(क) जे०के० मेहता
(ख) मार्शल
(ग) रॉबिन्स
(घ) पीगू
उत्तर :
(ग) रोबिन्स

प्रश्न 2.
आवश्यकताविहीनता की संकल्पना का प्रतिपादन किया था
(क) मार्शल ने
(ख) जे०के० मेहता ने
(ग) रोबिन्स ने
(घ) ए०के० सेन ने।
उत्तर :
(ख) जे०के० मेहता ने

प्रश्न 3.
अर्थशास्त्र के जनक कहे जाते हैं
(क) एडम स्मिथ
(ख) रिकाडों
(ग) प्रो० रोबिन्स
(घ) प्रो० मार्शल
उत्तर :
(क) एडम स्मिथ

प्रश्न 4.
प्रो० रोबिन्स के अनुसार अर्थशास्त्र है
(क) केवल आदर्श विज्ञान
(ख) केवल वास्तविक विज्ञान ,
(ग) वास्तविक व आदर्श विज्ञान
(घ) विज्ञान व कला दोनों
उत्तर :
(ख) केवल वास्तविक विज्ञान

प्रश्न 5.
सुख की प्राप्ति ही मानव-जीवन का लक्ष्य है, किस भारतीय विचारक से संबंधित है।
(क) जे०के० मेहता
(ख) एम०के० गाँधी
(ग) ए०के० सेन
(घ) रवीन्द्रनाथ टैगोर
उत्तर :
(क) जे०के० मेहता

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थशास्त्र क्या है?
उत्तर :
अर्थशास्त्र वह सामाजिक विज्ञान है जिसके अंतर्गत सामाजिक, वास्तविक व सामान्य मनुष्यों की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
अर्थशास्त्र की धन केन्द्रित परिभाषा दीजिए तथा उसकी दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
“अर्थशास्त्र राष्ट्रों के धन के स्वरूप तथा कारणों की खोज से संबंधित है।”
विशेषताएँ–

  • ‘धन’ ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री का केन्द्र-बिन्दु है।
  • व्यक्तिगत समृद्धि के द्वारा ही राष्ट्रीय धन एवं सम्पत्ति में वृद्धि संभव है।

प्रश्न 3.
अर्थशास्त्र की कल्याण केन्द्रित परिभाषा दीजिए एवं उसकी दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
“अर्थशास्त्र मानव जीवन के सामान्य व्यवसाय का अध्ययन है; इसमें व्यक्तिगत तथा सामाजिक क्रियाओं के उस भाग की जाँच की जाती है जिसका भौतिक सुख के साधनों की प्राप्ति और उपयोग से बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है।”
विशेषताएँ-

  1. अर्थशास्त्र में सामान्य, सामाजिक तथा वास्तविक मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
  2. अर्थशास्त्र मानव के जीवन के साधारण व्यवसाय’ का अध्ययन करता है। इसका आशय मनुष्य की उन क्रियाओं से लगाया जाता है, जिनका संबंध दैनिक जीवन से है।

प्रश्न 4.
प्रो० रोबिन्स द्वारा दी गई अर्थशास्त्र की परिभाषा लिखिए।
उत्तर :
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें साध्य तथा सीमितता और अनेक उपयोग वाले साधनों से संबंधित मानव व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।”

प्रश्न 5.
रोबिन्स की परिभाषा अन्य परिभाषाओं से श्रेष्ठ है।’ इस कथन के पक्ष में उपयुक्त तर्क दीजिए।
उत्तर :

  • रोबिन्स की परिभाषा अधिक वैज्ञानिक है क्योंकि यह ‘आर्थिक समस्या’ अर्थात् चुनाव करने के पहलू की बात करते अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री को मजबूत आधार प्रदान करती है।
  • रोबिन्स की परिभाषा तर्कपूर्ण है।
  • यह परिभाषा अर्थशास्त्र के क्षेत्र को अधिक व्यापक करती है।

प्रश्न 6.
उपभोक्ता किसे कहते हैं?
उत्तर :
जब एक व्यक्ति अपनी आवश्यकता की प्रत्यक्ष संतुष्टि के लिए किसी वस्तु को खरीदता है तो वह ‘उपभोक्ता’ कहलाता है।

प्रश्न 7.
विक्रेता किसे कहते हैं?
उत्तर :
जो व्यक्ति वस्तुओं को स्वयं के लाभ के लिए दूसरों को बेचता है तो वह विक्रेता’ कहलाता है।

प्रश्न 8.
उत्पादक किसे कहते हैं?
उत्तर :
उत्पादक वह व्यक्ति है जो अपने लाभ के लिए वस्तुओं का उत्पादन करता है।

प्रश्न 9.
सेवाधारी किसे कहते हैं?
उत्तर :
वह व्यक्ति जो नौकरी करता है अर्थात् दूसरों के लिए कार्य करता है जिसके लिए उसे पारिश्रमिक दिया जाता है, ‘सेवाधारी’ कहलाता है।

प्रश्न 10.
सेवा प्रदाता किसे कहते हैं?
उत्तर :
वे व्यक्ति जो, भुगतान लेकर अन्य व्यक्तियों को सेवा प्रदान करते हैं (जैसे–डॉक्टर, वकील, बैंकर, अध्यापक आदि) सेवा प्रदाता’ कहलाते हैं।

प्रश्न 11
 आर्थिक क्रियाओं का अर्थ लिखिए।
उत्तर :
वे सभी क्रियाएँ जो धन प्राप्त करने के लिए की जाती हैं, “आर्थिक क्रियाएँ’ कहलाती हैं।

प्रश्न 12.
आर्थिक समस्या क्या है?
उत्तर :
असीमित आवश्यकताओं, सीमित साधनों एवं उनके वैकल्पिक प्रयोग के कारण उत्पन्न चुनाव की समस्या ही ‘आर्थिक समस्या है।

प्रश्न 13.
सांख्यिकी शब्द का एकवचन में क्या अर्थ है?
उत्तर :
एकवचन में सांख्यिकी शब्द से आशय ‘सांख्यिकी विज्ञान’ से है। ए०एल० बाउले ने इसे ‘गणना का विज्ञान’ कहा है।

प्रश्न 14.
बहुवचन में सांख्यिकी का क्या अर्थ है?
उत्तर :
बहुवचन में सांख्यिकी का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित संख्यात्मक तथ्ये हो सकते हैं; जैसे—राष्ट्रीय आय समंक, कृषि समंक आदि।

प्रश्न 15.
समंकों की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :

  • समंक तथ्यों के समूह होते हैं।
  • समंक संख्या में व्यक्त किए जाते हैं।

प्रश्न 16.
सांख्यिकी की एक उपयुक्त परिभाषा दीजिए।
उत्तर :
सांख्यिकी एक विज्ञान और कला है जो सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक व अन्य समस्याओं से संबंधित समंकों के संग्रहण, सारणीयन, प्रस्तुतीकरण, संबंध स्थापन, निर्वचन और पूर्वानुमान से संबंध रखती है ताकि निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।

प्रश्न 17.
सांख्यिकीय रीतियों से क्या आशय है।
उत्तर :
सांख्यिकीय रीतियों के अंतर्गत उन सिद्धांतों एवं तकनीकों का समावेश होता है जिनका व्यवहार समूहों को संकलन, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और निर्वचन में किया जाता है और महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

प्रश्न 18.
विवरणात्मक सांख्यिकी से क्या आशय है?
उत्तर :
विवरणात्मक सांख्यिकी से आशय समंकों के विधियन, वर्गीकरण, सारणीयन एवं केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापन आदि से हैं। इनके द्वारा संख्यात्मक तथ्यों की मौलिक विशेषताओं को प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 19.
सांख्यिकी की प्रकृति क्या है?
उत्तर :
सांख्यिकी विज्ञान व कला दोनों हैं क्योंकि इसका प्रयोग केवल ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से ही नहीं किया जाता अपितु तथ्यों को समझने तथा उनसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकालने के उद्देश्य से भी किया जाता है।

प्रश्न 20.
सांख्यिकी के दो कार्य बताइए।
उत्तर :

  • तथ्यों को सूक्ष्म तथा सरल रूप में प्रस्तुत करना,
  • तथ्यों को तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत करना।

प्रश्न 21.
सांख्यिकी की दो सीमाएँ बताइए।
उत्तर :

  • सांख्यिकी समूहों का अध्ययन करती है, व्यक्तिगत इकाइयों का नहीं।
  • सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों को ही अध्ययन करती है, गुणात्मक तथ्यों का नहीं। |

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अर्थशास्त्र क्या है?
उत्तर :
मनुष्य की आवश्यकताएँ असीमित हैं किंतु इनकी तीव्रता में अंतर पाया जाता है। इनमें से कुछ आवश्यकताएँ अधिक तीव्र होती हैं जिनको संतुष्ट करना अत्यधिक आवश्यक होता है। समाज के सभी सदस्य इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं; उदाहरण के लिए वकील न्यायालय में बहस करता है, डॉक्टर व नर्स अस्पताल में मरीजों की देखभाल करते हैं, अध्यापक विद्यालय में पढ़ाता है, किसान खेत जोतता है और मजदूर पत्थर तोड़ता है इत्यादि। ये सभी क्रियाएँ आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही की जाती हैं। मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए किए गए ऐसे सभी प्रयत्नों का अध्ययन अर्थशास्त्र के अंतर्गत किया जाता है।

अर्थशास्त्र की सामान्य परिभाषा–
“अर्थशास्त्र वह सामाजिक विज्ञान है जिसके अंतर्गत सामाजिक वास्तविक व सामान्य मनुष्यों की आवश्यकताओं की संतुष्टि के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों का अध्ययन किया जाता है।”

प्रश्न 2.
अर्थशास्त्र की धन संबंधी परिभाषाओं के प्रमुख दोष बताइए।
उत्तर :
प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को धन का विज्ञान माना और उन्होंने धन के अंतर्गत केवल भौतिक वस्तुओं को ही सम्मिलित किया। उन्होंने एक ऐसे आर्थिक मनुष्य का अध्ययन किया जिसका उद्देश्य केवल धन कमाना होता है। इन परिभाषाओं के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

  1. धन संबंधी परिभाषाओं में धन पर, जो कि साधन है, आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है। और मानव, जो कि साध्य है, की उपेक्षा की गई है। वास्तव में, धन तो केवल ‘साधन’ है जिसकी सहायता से मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, ‘साध्य’ (end) नहीं।
  2. प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने एक ऐसे आर्थिक मनुष्य की कल्पना की थी, जो केवल धन कमाने के लिए आर्थिक क्रियाएँ करता है। आर्थिक मनुष्य की उनकी धारणा पूर्णतः काल्पनिक थी।
  3. धन संबंधी परिभाषाओं में केवल धनोत्पादन एवं धन संग्रह पर ही बल दिया गया था, उनके न्यायपूर्ण वितरण एवं मानव कल्याण में वृद्धि पर कोई ध्यान नहीं दिया गया था।

प्रश्न 3.
रोबिन्स की अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए और इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
रोबिन्स की परिभाषा-“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें साध्यों तथा सीमितता और उनके उपयोग वाले साधनों से संबंधित मानव व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।” परिभाषा की विशेषताएँ-प्रो० रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं|

  1. प्रो० रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र प्रत्येक क्रिया के आर्थिक पक्ष का अध्ययन करता है। इस प्रकार यह परिभाषा अर्थशास्त्र को आर्थिक-अनार्थिक क्रियाओं, भौतिक-अभौतिक कल्याण एवं साधारण-असाधारण व्यवसाय आदि के बंधन से मुक्त कर देती है।
  2. प्रो० रोबिन्स ने सामाजिक व्यवहार के स्थान पर मानव व्यवहार को अर्थशास्त्र का विषय-क्षेत्र माना है। इसलिए इस विज्ञान का कार्य-क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक व्यापक है।
  3. प्रो० रोबिन्स ने अर्थशास्त्र को केवल वास्तविक विज्ञान (Positive Science) माना है। उनकी दृष्टि में अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है। दूसरे शब्दों में, अर्थशास्त्री का क्या होना चाहिए से कोई संबंध नहीं है।
  4. यह परिभाषा सार्वभौमिक है। यह सभी देशों एवं सभी आर्थिक प्रणालियों (चाहे वह पूँजीवादी व्यवस्था हो, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा साम्यवादी) के सम्बन्ध में लागू होती है।
  5. आर्थिक समस्या का जन्म आवश्यकताओं की असीमितता एवं साधनों की दुर्लभता के कारण होता है। यह आर्थिक समस्या ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री है।।
  6. यह परिभाषा तार्किक दृष्टि से खरी एवं वैज्ञानिक है।

प्रश्न 4.
मार्शल तथा रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषाओं की तुलना कीजिए।
उत्तर :
मार्शल व रोबिन्स की परिभाषाओं की तुलना

  1. मार्शल की परिभाषा श्रेणी-विभाजक है। उन्होंने मानवीय क्रियाओं को भौतिक-अभौतिक, आर्थिक-अनार्थिक तथा साधारण-असाधारण व्यवसाय के रूप में वर्गीकृत किया है। इसके विपरीत, रोबिन्स की परिभाषा विश्लेषणात्मक है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र ‘चुनाव का विज्ञान’ है।
  2. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र में केवल ‘धन’ से सम्बन्धित क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। जबकि रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र प्रत्येक क्रिया का चुनाव करने की दृष्टि से अध्ययन करता
  3. मार्शल अर्थशास्त्र को सामाजिक विज्ञान’ मानते हैं, जबकि रोबिन्से उसे ‘मानव विज्ञान मानते हैं।
  4. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र मनुष्य की केवल आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करता है। इसके विपरीत, रोबिन्स के विचार में अर्थशास्त्र के अन्तर्गत मनुष्य की सभी प्रकार की क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
  5. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र ‘मानव कल्याण’ का शास्त्र है, जबकि रोबिन्स के अनुसार अर्थशास्त्र का कल्याण से कोई सम्बन्ध नहीं है। अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है।
  6. मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र विज्ञान तथा कला दोनों है, जबकि रोबिन्स के अनुसार अर्थशास्त्र केवल वास्तविक विज्ञान है।
  7. मार्शल आर्थिक विश्लेषण के लिए निगमन तथा आगमन दोनों ही प्रणालियों का प्रयोग करते हैं, जबकि रोबिन्स आर्थिक विश्लेषण के लिए केवल निगमन रीति का ही प्रयोग करते हैं।
  8. मार्शल की परिभाषा सरल तथा व्यावहारिक है, जबकि रोबिन्स की परिभाषा वैज्ञानिक तथा सैद्धान्तिक है।

प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र की एक विकास केन्द्रित परिभाषा दीजिए और इसकी विशेषताएँ बताइए। अथवा प्रो० सेमुअल्सन द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए और इसकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर :
आर्थिक विकास की समस्या आज की ज्वलन्त समस्या है। अतः आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र की परिभाषा में ‘आर्थिक विकास की समस्या को विशेष महत्त्व दिया है।

प्रो० सेमुअल्सन द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा –
“अर्थशास्त्र इस बात का अध्ययन करता है कि व्यक्ति और समाज अनेक प्रयोग में आ सकने वाले उत्पादन के सीमित साधनों का चुनाव एक समयावधि में विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में लगाने और उनको समाज में विभिन्न व्यक्तियों और समूहों के उपभोग हेतु वर्तमान व भविष्य में, बाँटने के लिए किस प्रकार करते हैं, ऐसा वे चाहे मुद्रा का प्रयोग करके करें अथवा इसके बिना करें। यह साधनों के आवंटन के स्वरूप में सुधार करने की लागतों व उपयोगिताओं का विश्लेषण करता है।”

परिभाषा की विशेषताएँ – उपर्युक्त परिभाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. साधन सीमित तथा वैकल्पिक प्रयोग वाले हैं जिनको विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाता है।
  2. ‘आर्थिक विकास की प्रकृति प्रावैगिक है। अत: इस समस्या को शामिल करने से यह परिभाषा ‘प्रावैगिक हो गई है।
  3. प्रो० सेमुअल्सन ने चुनाव की समस्या’ या ‘साधनों के वितरण की समस्या’ को ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ और ‘मुद्रा विनिमय प्रणाली’ दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं में लागू किया है। फलस्वरूप अर्थशास्त्र का क्षेत्र व्यापक हो गया है।
  4. यह परिभाषा सार्वभौमिक है और सभी प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं (पूँजीवादी, समाजवादी, साम्यवादी) में लागू होती है।
  5. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में आय, उत्पादन, रोजगार व आर्थिक विकास आदि की समस्याओं का समावेश करके यह परिभाषा अर्थशास्त्र के क्षेत्र को विस्तृत कर देती है।

प्रश्न 6.
अर्थशास्त्र के विज्ञान होने के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र के विज्ञान होने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं।—

  1. इसमें तथ्यों का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन वैज्ञानिक रीति पर आधारित होता है।
  2. इसमें ‘कारण’ एवं परिणाम के सम्बन्ध पर आधारित नियमों का प्रतिपादन किया जाता है।
  3. भावी घटनाओं के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाए जाते हैं।
  4. अनेक नियम सर्वव्यापकता को गुण रखते हैं; जैसे—उपयोगिता ह्रास नियम, माँग का नियम आदि।

प्रश्न 7.
“अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी है। इस सम्बन्ध में विभिन्न अर्थशास्त्रियों के विचार बताइए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र एक विज्ञान है, यह सर्वसम्मति सेस्वीकार किया जाता है किन्तु अर्थशास्त्रियों में इस बारे में मतभेद है कि यह वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान है अथवा नहीं। सीनियर, केयरनीज, रोबिन्स, सेमुअल्सन व बोल्डिग अर्थशास्त्र को केवल वास्तविक विज्ञान मानते हैं। रोबिन्स के अनुसार-“अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है।” प्रो० बोल्डिग के अनुसार—अर्थशास्त्री चुनाव का अध्ययन करता है, उनका मूल्यांकन नहीं।” इसके विपरीत, वर्तमान समय में अधिकांश अर्थशास्त्री अर्थशास्त्र को वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी मानते हैं वे यह स्वीकार करते हैं-“अर्थशास्त्री का कार्य केवल व्याख्या या खोज करना ही नहीं अपितु समर्थन तथा निंदा करना भी है।”

प्रो० पीगू के अनुसार – 
“इसका (अर्थशास्त्र का) प्रमुख महत्त्व तो इस बात में है कि वह नीतिशास्त्र से अलग नहीं किया जी सकता।” इस प्रकार अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी है।

प्रश्न 8.
अर्थशास्त्र कला है।’ इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र कला है क्योंकि अर्थशास्त्र की अनेक शाखाएँ व्यावहारिक समस्याओं का हल बताती हैं; उदाहरण के लिए अर्थशास्त्री बताता है कि ब्याज की उचित दर क्या होनी चाहिए, आदर्श मजदूरी व पूर्ण रोजगार के स्तर पर कैसे पहुँचा जाए, किन करों के द्वारा बजट के घाटे को पूरा किया जाए। कीन्स, मिल, मार्शल व पीगू आदि अर्थशास्त्री अर्थशास्त्र को कला मानते हैं। उनके अनुसार, कला व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने का एक साधन है। प्रो० पीगू के अनुसार-“हमारा मनोवेग एक दार्शनिक जैसा नहीं होता जो ज्ञान के लिए ही ज्ञान प्राप्त करता है बल्कि वह एक शरीर विज्ञाता (डॉक्टर) के दृष्टिकोण की भाँति होना चाहिए, जो ज्ञान इसलिए प्राप्त करता है क्योंकि वह रोग तथा पीड़ा को दूर करने में सहायता करता है।”

प्रश्न 9.
अर्थशास्त्र की सीमाएँ बताइए।
उत्तर :
विभिन्न अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अर्थशास्त्र की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. अर्थशास्त्र केवल मानवीय क्रियाओं का अध्ययन करता है, पशु-पक्षी अथवा जीव-जन्तुओं की क्रियाओं का नहीं।
  2. अर्थशास्त्र में वास्तविक मनुष्यों की क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है काल्पनिक मनुष्यों की क्रियाओं का नहीं।
  3. अर्थशास्त्र में केवल सामान्य मनुष्य के कार्यों का अध्ययन किया जाता है; पागल, कंजूस, शराबी आदि के कार्यों का अध्ययन नहीं।
  4. अर्थशास्त्र केवल सामाजिक मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करता है और धन आर्थिक क्रिया का मापदण्ड है।
  5. अर्थशास्त्र के नियम प्राकृतिक विज्ञानों की तुलना में कम निश्चित होते हैं।

प्रश्न 10.
अर्थशास्त्र में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का महत्त्व – आर्थिक विश्लेषण में समंक अत्यधिक उपयोगी होते हैं। मार्शल के अनुसार-“समंक वे तृण हैं, जिनसे मुझे अन्य अर्थशास्त्रियों की भाँति ईंटें बनानी हैं।” अर्थशास्त्र की प्रत्येक शाखा में सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग किया जाता है|

  1. उपभोग के क्षेत्र में – उपभोग समंक यह बताते हैं कि विभिन्न आय-वर्ग किस प्रकार अपनी आय को व्यय करते हैं, उनका रहन-सहन का स्तर तथा उनकी करदान क्षमता क्या है।
  2. उत्पादन के क्षेत्र में – उत्पादन समंक माँग एवं पूर्ति में समायोजन करने में सहायक होते हैं। ये समंक देश की उत्पादकता के मापक होते हैं।
  3. विनिमय के क्षेत्र में – समंकों के माध्यम से बाजार माँग व पूर्ति की विभिन्न दशाओं पर आधारित मूल्य निर्धारण के नियम व लागत मूल्य का अध्ययन किया जाता है।
  4. वितरण के क्षेत्र में – समंकों की सहायता से ही राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है, इसीलिए कहा जाता है-“कोई भी अर्थशास्त्री सांख्यिकीय तथ्यों के विस्तृत अध्ययन के बिना उत्पादन या वितरण संबंधी निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न नहीं करेगा।”

प्रश्न 11.
सांख्यिकी की सीमाएँ बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकी की प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं

  1. सांख्यिकी समूहों का अध्ययन करती है, व्यक्तिगत इकाइयों का नहीं।
  2. सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का ही अध्ययन करती है, गुणात्मक तथ्यों को नहीं।
  3. सांख्यिकी के परिणाम असत्य सिद्ध हो सकते हैं, यदि उनका अध्ययन बिना संदर्भ के किया जाए।
  4. सांख्यिकीय समंकों में एकरूपता व सजातीयता होनी आवश्यक है, विजातीय समंकों से सार्थक निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।
  5. सांख्यिकी के नियम दीर्घकाल में तथा औसत रूप से ही सत्य होते हैं।
  6. सांख्यिकी की रीति किसी समस्या के अध्ययन की विभिन्न रीतियों में से एक रीति है, एकमात्र रीति नहीं।
  7. सांख्यिकी विश्लेषण को साधन मात्र है, समस्या का समाधान नहीं।

प्रश्न 12.
सांख्यिकी के प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर :
सांख्यिकी के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं

  1. सांख्यिकी का कार्य तथ्यों को सूक्ष्म तथा सरल रूप में प्रस्तुत करना है।
  2. सांख्यिकी समंकों के बीच तुलनात्मक अध्ययन के लिए आधार प्रस्तुत करती है।
  3. सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण कार्य सामान्य वितरणों को संक्षिप्त एवं निश्चित रूप में प्रस्तुत करना है।
  4. सांख्यिकी का एक कार्य व्यक्तिगत ज्ञान व अनुभव की वृद्धि करना है।
  5. सांख्यिकी सरकार का नीति-निर्माण में पथ-प्रदर्शन करती है।
  6. सांख्यिकी समंकों की सहायता से अन्य विज्ञानों के नियमों की सत्यता की जाँच की जाती है।
  7. सांख्यिकी नीति प्रभावों के मापने में सहायता करती है।
  8. सांख्यिकी दो या अधिक तथ्यों के मध्य संबंधों का अध्ययन करती है।
  9. सांख्यिकी द्वारा वर्तमान तथ्यों व परिस्थितियों के आधार पर भविष्य के बारे में भी अनुमान किया जा सकता है।

दीर्घ उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो धन की विवेचना करता है।” इस कथन की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
अथवा प्रो० एडम स्मिथ व उसके अनुयायियों द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषाओं की म आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
अथवा अर्थशास्त्र की ‘धन-केन्द्रित परिभाषाओं को लिखिए तथा इनकी आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
उत्तर :
अर्थशास्त्र की धन सम्बन्धी परिभाषाएँ
प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को ‘धन का विज्ञान माना है। प्रो० एडम स्मिथ, जिन्हें ‘अर्थशास्त्र को जनक’ कहा जाता है, ने अपनी पुस्तके An Enquiry into the Nature and Causes of wealth of Nations’ में अर्थशास्त्र को इन शब्दों में परिभाषित किया है-

“अर्थशास्त्र राष्ट्रों के धन के स्वरूप तथा कारणों की खोज से सम्बन्धित है।” उपर्युक्त परिभाषा के समर्थन में स्मिथ के समर्थकों द्वारा दी गई कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नांकित हैं
(i) जे०बी० से के अनुसार –“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो धन की विवेचना करता है।”
(i) एफ०एल० वाकर के अनुसार –“अर्थशास्त्र ज्ञान की वह शाखा है जो धन से सम्बन्धित है।” धन सम्बन्धी परिभाषाओं की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. ‘धन’ ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री का केन्द्र-बिन्दु है।
  2. मनुष्य की अपेक्षा धन अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मानवीय सुख का एकमात्र आधार धन ही है। धन के अभाव में मानवीय सुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
  3. ‘धन’ के अन्तर्गत केवल भौतिक वस्तुओं को शामिल किया जाता है, सेवाओं को नहीं।
  4. व्यक्तिगत समृद्धि द्वारा ही राष्ट्रीय धन एवं सम्पत्ति में वृद्धि सम्भव है।
  5. मनुष्य केवल स्व:हित (Self-interest) की भावना से प्रेरित होकर आर्थिक क्रियाएँ करता है।

अतः वह ‘आर्थिक मनुष्य’ (Economic Man) की भाँति है। उसका उद्देश्य मात्र धन कमाना होता

धन सम्बन्धी परिभाषाओं की आलोचना
धन सम्बन्धी परिभाषाएँ दोषपूर्ण थीं। अतः इनकी निम्नलिखित आधारों पर तीव्र आलोचनाएँ की गईं–

  1. मनुष्य की अपेक्षा धन पर अधिक बल-धन सम्बन्धी परिभाषाओं में धन पर जो कि साधन है, आवश्यकता से अधिक बल दिया गया है और मानव, जो कि साध्य है, की उपेक्षा की गई है। वास्तव में, धन तो केवल ‘साधन है जिसकी सहायता से मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, ‘साध्य’ (end) नहीं।।
  2. अर्थशास्त्र का संकुचित क्षेत्र-धन सम्बन्धी परिभाषाओं ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र को संकुचित कर दिया है क्योंकि प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने धन के अन्तर्गत केवल भौतिक पदार्थों को ही शामिल किया था, सेवाओं (डॉक्टर, वकील, अध्यापक आदि की सेवाएँ) को नहीं। यह अनुचित था।
  3. आर्थिक मनुष्य की कल्पना प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने एक ऐसे आर्थिक मनुष्य (Economic Man) की कल्पना की थी, जो केवल धन की प्रेरणा और अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर कार्य करता है तथा जिस पर देशप्रेम, धर्म, परोपकार आदि भावनाओं को कोई प्रभाव नहीं पड़ता। आर्थिक मनुष्य की यह धारणा पूर्णतः कल्पित थीं।
  4. धन के न्यायपूर्ण वितरण की उपेक्षा-इन परिभाषाओं में केवल धनोत्पादन एवं धन संग्रह पर ही बल दिया गया है तथा धन के उचित वितरण तथा प्रयोग द्वारा मानव-कल्याण में होने वाली वृद्धि पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

उपर्युक्त दोषों के कारण कार्लाइल (Carlyle), रस्किन (Ruskin), विलियम मॉरिस (William Morris) आदि विद्वानों ने अर्थशास्त्र को ‘कुबेर की विद्या’, ‘घृणित विज्ञान’, ‘रोटी और मक्खन का विज्ञान’ कहकर इसकी कड़ी आलोचना की।

प्रश्न 2.
“राजनीतिक अर्थव्यवस्था अथवा अर्थशास्त्र मानव के सामान्य व्यवसायं का अध्ययन है। यह व्यक्तिगत तथा सामाजिक क्रिया के उस भार्ग का अध्ययन करता है जो सुख के भौतिक साधनों की प्राप्ति तथा प्रयोग से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है।” अर्थशास्त्र के इस दृष्टिकोण का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
अथवा अर्थशास्त्र मानव के भौतिक कल्याण का अध्ययन है।” इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। अथवा मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा को समझाइए।
उत्तर :
मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा
मार्शल की परिभाषा ‘मानव कल्याण पर केन्द्रित है। धन तो मानव कल्याण में वृद्धि का साधन मात्र है। मार्शल ने अपनी परिभाषा को अन्तिम रूप इस प्रकार दिया है अर्थशास्त्र मानव जीवन के सामान्य व्यवसाय का अध्ययन है; इसमें व्यक्तिगत तथा सामाजिक क्रियाओं के उस भाग की जाँच की जाती है जिसका भौतिक सुख के साधनों की प्राप्ति और उपयोग से बड़ा ही घनिष्ठ सम्बन्ध है।”

मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की विशेषताएँ

  1. मार्शल ने अर्थशास्त्र को ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ से अलग करके एक स्वतन्त्र विषय ‘अर्थशास्त्र का नाम दिया।
  2. मार्शल ने धन के स्थान पर मनुष्य को प्रमुख स्थान दिया, क्योंकि धन ‘साधन’ है और मनुष्य ‘साध्य’। इस प्रकार उन्होंने मानव को अर्थशास्त्र का प्रमुख अंग माना।
  3. अर्थशास्त्र में सामान्य, सामाजिक तथा वास्तविक मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
  4. अर्थशास्त्र मानव के जीवन के साधारण व्यवसाय’ का अध्ययन करता है। इसका आशय मनुष्य की उन क्रियाओं से लगाया जाता है, जिनका सम्बन्ध दैनिक जीवन से है।
  5. अर्थशास्त्र में मनुष्य की क्रियाओं के केवल उस भाग का अध्ययन होता है, जिसका सम्बन्ध धन कमाने व खर्च करने से होता है।
  6. अर्थशास्त्र के अन्तर्गत केवल उन्हीं आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है, जो आर्थिक कल्याण में वृद्धि करती हैं।
  7. अर्थशास्त्र केवल ऐसे मनुष्य की क्रियाओं का अध्ययन करता है, जो समाज में रहता है, समाज से प्रभावित होता है और समाज को प्रभावित करता है।
  8. अर्थशास्त्र एक विज्ञान है और उसका अध्ययन वैज्ञानिक आधार पर किया जाना चाहिए।

मार्शल द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की आलोचना
रोब्रिन्स ने कल्याण केन्द्रित परिभाषाओं की कटु आलोचना की है। मुख्य आलोचनाएँ निम्नलिखित हैं

  1.  ये परिभाषाएँ श्रेणी विभाजक हैं, विश्लेषणात्मक नहीं-
    • मार्शल ने अर्थशास्त्र के अध्ययन को केवल भौतिक साधनों की प्राप्ति तथा उपयोग तक ही सीमित रखा है, परन्तु साधन अभौतिक भी होते हैं; जैसे-डॉक्टर, वकील, अध्यापक, मजदूर आदि की सेवाएँ। ये सेवाएँ धन-प्राप्ति में सहायक होती हैं।
    • मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र में मनुष्य की केवल आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। रोबिन्स के अनुसार, क्रियाओं को आर्थिक एवं अनार्थिक–इने दो भागों में बाँटना अनुचित है; क्योंकि एक ही प्रकार की क्रिया एक समय आर्थिक हो सकती है और दूसरे समय अनार्थिक।
    • मार्शल के अनुसार, अर्थशास्त्र में मनुष्य के ‘साधारण व्यवसाय का अध्ययन’ है, परन्तु क्रियाओं को ‘साधारण व्यवसाय’ और ‘असाधारण व्यवसाय में बाँटना सम्भव नहीं है।
  2. अर्थशास्त्र को कल्याण से सम्बद्ध करना अनुचित – प्रो० रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र र्को कल्याण से सम्बद्ध करना अनुचित है, क्योंकि मानव कल्याण एक मनोवैज्ञानिक धारणा है जिसकी सही-सही माप सम्भव नहीं है।
  3. अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है – रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है। उद्देश्य अच्छे हों अथवा बुरे, अर्थशास्त्र का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है।
  4. अर्थशास्त्र एक मानव विज्ञान है – प्रो० मार्शल ने अर्थशास्त्र को ‘सामाजिक विज्ञान’ बताया है, परन्तु प्रो० रोबिन्स इसे मानव विज्ञान’ मानते हैं।
  5. अर्थशास्त्र का संकुचित क्षेत्र – कल्याण प्रधान परिभाषाओं ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र को संकुचित कर दिया है क्योकि इनके अनुसार अनार्थिक, अभौतिक तथा असामान्य क्रियाओं का अध्ययन अर्थशास्त्र के अन्तर्गत नहीं किया जाता है।
  6. अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है – मार्शल की परिभाषा के आधार पर अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान बन गया है, जबकि रोबिन्स के अनुसार, अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है, आदर्श विज्ञान नहीं। निष्कर्ष–उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि मार्शल ने अर्थशाग्र की धन सम्बन्धी परिभाषाओं में व्यापक सुधार करके अर्थशास्त्र को एक सम्मानजनक स्थान टि… आज भी मार्शल की परिभाषा सरल एवं व्यावहारिक मानी जाती है।

प्रश्न 3.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जो मानव व्यहार का अध्ययन साध्यों एवं सीमित तथा वैकल्पिक प्रयोगों वाले साधनों के बीच सम्बन्ध के रूप में करता है”-रोबिन्स। अर्थशास्त्र की इस परिभाषा की आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
अथवा प्रो० एल रोबिन्स द्वारा दी गई अर्थशास्त्र की परिभाषा लिखिए और उसका आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर :
रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा प्रो० रोबिन्स ने अपनी पुस्तक ‘An Essay on the Nature and Significance of Economic Science में अर्थशास्त्र की परिभाषा एक नए दृष्टिकोण से दी जो इस प्रकार है अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जिसमें साध्यों तथा सीमितता और अनेक उपयोग वाले साधनों से सम्बन्धित मानव व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।”

रोबिन्स की परिभाषा के मूल तत्त्व
प्रो० रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा के मूल तत्त्व निम्नलिखित हैं

  • मनुष्य की आवश्यकताएँ असीमित होती हैं और जैसे ही एक आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है, वैसे ही दूसरी आवश्यकता सामने आ जाती है।
  • मनुष्य के पास साधन सीमित होते हैं।
  • साध्यों (आवश्यकताओं) की तीव्रता में अन्तर होता है।
  • साधनों के वैकल्पिक प्रयोग सम्भव हैं अर्थात् आवश्यकता पूर्ति के एक ही साधन का अनेक प्रकार से प्रयोग हो सकता है।

असीमित आवश्यकताओं तथा वैकल्पिक प्रयोग वाले सीमित साधनों के कारण मनुष्य के सामने चुनाव की समस्या आती है और आर्थिक समस्या का जन्म होता है। यही आर्थिक समस्या आर्थिक जीवन (अर्थशास्त्र) का आधार है।

परिभाषा की आलोचना
अनेक अर्थशास्त्रियों; जैसे—डरबिन, वूटन, फ्रेजर आदि ने रोबिन्स की परिभाषा की कड़ी आलोचना की है। कुछ प्रमुख आलोचनाएँ अग्रलिखित हैं

  1. अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति पूर्णतः तटस्थ नहीं है-प्रो० रोबिन्स की यह धारणा कि अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति पूर्णतः तटस्थ है, गलत है। व्यवहार में अर्थशास्त्र को कल्याण की भावना से पूर्णत: मुक्त नहीं किया जा सकता। स्वयं रोबिन्स की परिभाषा में ‘कल्याण’ भावना का समावेश
  2. इस परिभाषा से अर्थशास्त्र का क्षेत्र एक-साथ अत्यन्त विस्तृत’ एवं ‘अत्यन्त संकुचित’ हो गया है-प्रो० रोबिन्स ने अर्थशास्त्र के अन्तर्गत सभी प्रकार के मनुष्यों की सभी प्रकार की क्रियाओं के अध्ययन का समावेश करके उसके क्षेत्र को अत्यधिक व्यापक बना दिया है। दूसरी
    ओर, प्रो० रोबिन्स की परिभाषा ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र को अत्यधिक संकुचित भी कर दिया है। इसका कारण यह है कि रोबिन्स का अर्थशास्त्र ‘साधनों की दुर्लभता से उत्पन्न समस्याओं का तो अध्ययन करता है किन्तु ‘प्रचुरता से उत्पन्न होने वाली समस्याओं का अध्ययन नहीं करता।।
  3. अर्थशास्त्र केवल वास्तविक विज्ञान नहीं है-रोबिन्स ने अर्थशास्त्र को ‘विशुद्ध वास्तविक विज्ञान माना है। इसके विपरीत, वास्तविकता यह है कि अर्थशास्त्र में केवल वास्तविक विज्ञान है। वरन् यह आदर्श विज्ञान और कला भी है।
  4. ‘साध्यों’ एवं ‘साधनों के बीच अन्तर स्पष्ट नहीं है—प्रो० रोबिन्स ने अपनी परिभाषा में ‘साध्यों एवं ‘साधनों के मध्य अन्तर को स्पष्ट नहीं किया है।
  5. ‘सीमित’ एवं वैकल्पिक प्रयोग’ शब्दों का प्रयोग अनावश्यक–साधन सदैव सीमित होते हैं। एवं उनका वैकल्पिक प्रयोग किया जा सकता है। अत: परिभाषा में इन शब्दों का प्रयोग अनावश्यक है।
  6. अन्य शास्त्रों से अन्तर स्पष्ट करना सरल नहीं-यदि रोबिन्स की परिभाषा का व्यवहार में पालन किया आए तो अर्थशास्त्र एवं अन्य शास्त्रों में अन्तर करना सरल नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने . अर्थशास्त्र के अन्तर्गत सभी प्रकार के मनुष्यों की सभी प्रकार की क्रियाओं को शामिल किया है।
  7. केवल निगमन प्रणाली का प्रयोग-प्रो० रोबिन्स ने अपने आर्थिक विश्लेषण में केवल निगमन प्रणाली का ही प्रयोग किया है, जबकि सन्तुलित निष्कर्षों की प्राप्ति के लिए आगमन तथा निगमन दोनों ही प्रणालियों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
  8. स्थैतिक परिभाषा-प्रो० रोबिन्स द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की प्रकृति स्थैतिक है, क्योंकि यह ‘आर्थिक विकास एवं उससे उत्पन्न समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं देती।
  9. मानव व्यवहार सदैव विवेकपूर्ण नहीं—प्रो० रोबिन्स की मान्यता है कि मानव व्यवहार सदैव विवेकपूर्ण होता है, जबकि वास्तविक जीवन में हम ऐसा नहीं पाते।
  10. सामाजिक पक्ष की उपेक्षा-प्रो० रोबिन्स ने समाज के अन्दर तथा बाहर रहने वाले सभी प्रकार के मनुष्यों को अर्थशास्त्र का विषय माना है। यह गलत है, क्योंकि जब तक आर्थिक समस्याएँ सामाजिक रूप नहीं ले लेतीं, उन्हें अर्थशास्त्र के अन्तर्गत शामिल नहीं किया जा सकता।
  11. सैद्धान्तिक पक्ष की प्रधानता–रोबिन्स की परिभाषा सैद्धान्तिक अधिक और व्यावहारिक कम है। इस कारण यह सामान्य लोगों के लाभ एवं उपयोग का शास्त्र नहीं रह गया है। इसके सैद्धान्तिक स्वरूप ने विषय को जटिल बना दिया है।

प्रश्न 4.
“अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो आवश्यकताविहीन अवस्था प्राप्त करने में मानव व्यवहार का एक साधन के रूप में अध्ययन करता है।” प्रो० जे०के० मेहता द्वारा प्रस्तुत अर्थशास्त्र की इस परिभाषा का आलोचनात्मक अध्ययन कीजिए।
अथवा ‘अर्थशास्त्र आवश्यकताविहीनता का शास्त्र है।’ आलोचनात्मक टिप्पणी कीजिए।
उत्तर :
प्रो० जे० के० मेहता द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा
अर्थशास्त्र एक विज्ञान है जो आवश्यकताविहीन अवस्था प्राप्त करने में मानव, व्यवहार का एक साधन के रूप में अध्ययन करता है।”
परिभाषा की व्याख्या – उपर्युक्त परिभाषा मूलतः भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के अनुरूप है.तया भारतीय धर्म, दर्शन एवं परम्परा से प्रेरित है। प्रो० मेहता के अनुसार, अर्थशास्त्र का प्रमुख उद्देश्य ‘वास्तविक सुख’ को अधिकतम करना है, जो आवश्यकताओं को न्यूनतम करके ही प्राप्त किया जा सकता है। वे सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श में विश्वास रखते हुए आवश्यकताओं को न्यूनतम करके अन्ततः उन्हें समाप्त कर देने पर बल देते हैं। जे०के० मेहता के शब्दों में-“आवश्यकता से मुक्ति पाने की समस्या ही आर्थिक समस्या है।”

प्रो० मेहता के अनुसार, सुख वह अनुभव है, जो मनुष्य को उस स्थिति में प्राप्त होता है जब उसे आवश्यकता का अनुभव ही न हो। प्रो० मेहता के अनुसार, इच्छारहित अवस्था में जबकि मानव का मस्तिष्क पूर्ण सन्तुलन में होता है, जो अनुभव प्राप्त होता है, उसे ‘सुख’ कहते हैं। अर्थशास्त्र का उद्देश्य इसी सुख को अधिकतम करना है।

सुख की स्थिति प्राप्त करने के निम्नलिखित दो उपाय हैं

  • बाह्य शक्तियों का, जो असन्तुलन की अवस्था उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी हैं, इस प्रकार से समन्वये किया जाए कि वे मस्तिष्क के साथ मेल खाएँ।
  • मस्तिष्क को ऐसी अवस्था में रखा जाए जिससे वह बाह्य शक्तियों से प्रभावित न हो। इस हेतु मस्तिष्क को दबाने की नहीं बल्कि उसे ‘शिक्षित करने की आवश्यकता है।

ऐसी स्थिति को एकदम प्राप्त करना मनुष्य के लिए असम्भव है। अतः उसे धीरे-धीरे अपनी आवश्यकताओं को कम करना चाहिए।

परिभाषा की विशेषताएँ
प्रो० मेहता द्वारा प्रतिपादित अर्थशास्त्र की परिभाषा की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं–

  • यह परिभाष ‘मनोविज्ञान तथा नैतिकता’ पर आधारित है।
  • प्रो० मेहता ‘सन्तुष्टि के स्थान पर ‘सुख की प्राप्ति को मानव जीवन का लक्ष्य मानते हैं।
  • अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान है।
  • यह परिभाषा ‘साम्यवादी अवस्था’ का समर्थन करती है।
  • प्रो० मेहता के अर्थशास्त्र की प्रकृति स्थैतिक है।

परिभाषा की आलोचना
प्रो० मेहता की परिभाषा की निम्नवत् आलोचना की गई है

  1. प्रो० मेहता की परिभाषा अर्थशास्त्र को अनावश्यक रूप से धर्म, दर्शन तथा नीतिशास्त्र से सम्बन्धित कर देती है और इस प्रकार अर्थशास्त्र को अव्यावहारिक बना देती है।
  2. प्रो० मेहता अर्थशास्त्र को केवल आदर्श विज्ञान मानते हैं, जबकि यह आदर्श विज्ञान होने के साथ-साथ वास्तविक विज्ञान भी है।
  3. प्रो० मेहता को दृष्टिकोण काल्पनिक तथा अव्यावहारिक है।
  4. प्रो० मेहता की परिभाषा भौतिक विकास की विरोधी है, क्योंकि सभ्यता के विकास से मनुष्य की आवश्यकताएँ बढ़ती हैं न कि घटती हैं।
  5. प्रो० मेहता की परिभाषा को स्वीकार कर लेने पर अर्थशास्त्र का महत्त्व ही समाप्त हो जाता है।

वास्तव में, जब मनुष्य आवश्यकताविहीनता की स्थिति में पहुँच जाता है तो उसके लिए अर्थशास्त्र का अध्ययन ही व्यर्थ हो जाता है। अत: इस परिभाषा का कोई व्यावहारिक महत्त्व नहीं है।

प्रश्न 5.
अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री क्या है? विवेचना कीजिए।
उत्तर :

अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री

अर्थशास्त्र मानव के व्यवहारों का अध्ययन है। मानव के आर्थिक व्यवहारों को अग्रलिखित पाँच भागों में बाँटा जा सकता है। ये विभाग ही अर्थशास्त्र की विषय-सामग्री माने जाते हैं

1. उपभोग – उपभोग समस्त आर्थिक क्रियाओं का आदि तथा अंत है। इसके अंतर्गत मानवीय आवश्यकताओं, उनकी विशेषताओं, उनका वर्गीकरण, तुष्टिगुण व उससे संबंधित नियमों एवं सिद्धांतों, माँग का नियम व माँग की लोच आदि का अध्ययन किया जाता है।

2. उत्पादन –
वस्तुओं में आर्थिक उपयोगिता का सृजन ही उत्पादन है। अर्थशास्त्र के इस विभाग के अन्तर्गत उत्पादन का अर्थ, उत्पादन के विभिन्न नियम, उत्पादन प्रणालियाँ तथा उत्पादन के उपादानों एवं उनसे संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

3. विनिमय –
उत्पादित वस्तुओं का विनिमय किया जाता है, जिसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त करता है। अर्थशास्त्र के इस विभाग के अन्तर्गत विभिन्न बाजार दशाओं में मूल्य निर्धारण, उत्पादन लागत तथा मुद्रा एवं बैंकिंग की विभिन्न प्रणालियों एवं समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

4. वितरण – 
आधुनिक युग में उत्पादन-कार्य उत्पत्ति के सभी साधनों के परस्पर सहयोग द्वारा किया जाता है और उत्पादित धन उत्पत्ति के विभिन्न साधनों में वितरित किया जाता है, यही वितरण है। अर्थशास्त्र के इस विभाग के अन्तर्गत राष्ट्रीय आय, उत्पत्ति के साधनों के पारिश्रमिक—लगान, मजदूरी, ब्याज, लाभ आदि के निर्धारण सम्बन्धी सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है।

5. लोक वित्त या राजस्व – 
राजस्व अर्थशास्त्र का एक नया किंतु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण विभाग है। इसके अन्तर्गत कर निर्धारण के सिद्धांतों, सार्वजनिक आय, सार्वजनिक व्यय, सार्वजनिक ऋण तथा इनसे संबंधित सिद्धांतों, कल्याणकारी राज्य की स्थापना आदि महत्त्वपूर्ण विषयों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 6.
अर्थशास्त्र की प्रकृति की विवेचना कीजिए। अथवा अर्थशास्त्रविज्ञान है अथवा कला अथवा दोनों? स्पष्ट कीजिए।
अथवा ‘अर्थशास्त्र उद्देश्यों के प्रति तटस्थ है। क्या आप रोबिन्स के इस तर्क से सहमत हैं? यदि नहीं, तो क्यो
उत्तर :
अर्थशास्त्र की प्रकृति से आशय यह जानने से है कि अर्थशास्त्र विज्ञान है अथवा कला। अर्थशास्त्र विज्ञान है तो उसका स्वरूप क्या है अर्थात् अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान है अथवा आदर्श विज्ञान।

विज्ञान का अर्थ – विज्ञान ज्ञान का एक क्रमबद्ध अध्ययन है, जो कारण तथा परिणाम के मध्य पारस्परिक संबंध स्थापित करता है। विज्ञान में विषय विशेष का नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। किसी भी शास्त्र को ‘विज्ञान’ होने के लिए उसमें निम्नांकित बातें होनी चाहिए

  • ज्ञान का अध्ययन क्रमबद्ध होना चाहिए।
  • तथ्यों के विश्लेषण के फलस्वरूप कुछ नियमों एवं सिद्धांतों का प्रतिपादन होना चाहिए।
  • इन सिद्धांतों का निर्माण कारण और परिणाम के संबंधों के आधार पर होना चाहिए।
  • इन नियमों में सर्वव्यापकता का गुण होना चाहिए।
  • विज्ञान द्वारा एक निश्चित भविष्यवाणी की जानी चाहिए।

‘अर्थशास्त्र विज्ञान है, के पक्ष में तर्क – ‘अर्थशास्त्र विज्ञान है, इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

  • इसमें तथ्यों का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। यह अध्ययन वैज्ञानिक नीति पर आधारित होता है।
  • कारण एवं परिणाम के संबंध पर आधारित नियमों का प्रतिपादन किया जाता है।
  • भावी घटनाओं के संबंध में पूर्वानुमान लगाए जाते हैं।
  • अनेक नियम सर्वव्यापकता का गुण रखते हैं; जैसे—उपयोगिता ह्रास नियम, माँग का नियम आदि।

विज्ञान के स्वरूप – विज्ञान दो प्रकार के होते हैं–
(अ) वास्तविक विज्ञान,
(ब) आदर्श विज्ञान।

(अ) वास्तविक विज्ञान – वास्तविक विज्ञान किसी विषय की वास्तविक रूप में अध्ययन करता है। इसमें क्या है? (What is?) का अध्ययन किया जाता है। यह ‘वस्तुस्थिति कैसी है?’, का उत्तर देता है। यह वस्तुस्थिति का अध्ययन करके कारण एवं परिणाम में संबंध स्थापित करता है।

अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान है – अर्थशास्त्र एक वास्तविक विज्ञान है, क्योंकि इसमें वास्तविक आर्थिक घटनाओं के कारण तथा परिणामों का विवेचन किया जाता है और इन संबंधों को नियमों के द्वारा व्यक्त किया जाता है; उदाहरण के लिए माँग को नियम यह बताता है कि कीमत में वृद्धि होने पर माँग में कमी और कीमत में कमी होने पर माँग में वृद्धि होती है। यहाँ कीमत में परिवर्तन ‘कारण’ और माँग में परिवर्तन परिणाम है।

(ब) आदर्श विज्ञान – आदर्श विज्ञान का मुख्य कार्य मानवीय आचरण के लिए आदर्श प्रस्तुत करना है। यह ‘क्या होना चाहिए? (What ought to be?) का उत्तर देता है और बताता है कि हमें किन आदर्शों का पालन करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह हमें वांछनीय और अवांछनीय का ज्ञान कराता है।

अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान है – अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान है, क्योंकि यह हमें मानवीय कल्याण को अधिकतम करने के लिए आर्थिक आदर्शों का ज्ञान कराता है; उदाहरण के लिए एक अर्थशास्त्री केवल मजदूरी निर्धारण के विभिन्न सिद्धांतों का ही अध्ययन नहीं करता अपितु वह यह भी बताता है कि उचित मजदूरी क्या होनी चाहिए। इसी प्रकार अर्थशास्त्र में हम केवल इस बात का ही अध्ययन नहीं करते कि लगान कैसे निर्धारित होता है। अपितु इस बात का भी अध्ययन करते हैं कि लगान की आदर्श मात्रा क्या होनी चाहिए।

इस प्रकार अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान के साथ-साथ आदर्श विज्ञान भी है।

कला – कला का आशय ‘किसी उद्देश्य को प्राप्त करने की विधियों से है। वास्तव में, कला ‘आदर्श को प्राप्त करने के सर्वोत्तम तरीका बतलाती है। यह वास्तविक विज्ञान और आदर्श विज्ञान के बीच पुल का कार्य करती है। कोसा के अनुसार–एक विज्ञान हमें जानने के संबंध में बतलाता है और कला करने के संबंध में बतलाती है। दूसरे शब्दों में–‘विज्ञान व्याख्या तथा खोज करता है, कला निर्देशन करती है।”

अर्थशास्त्र कला है – अर्थशास्त्र कला है, क्योंकि अर्थशास्त्र की अनेक शाखाएँ व्यावहारिक समस्याओं का हल बनाती हैं; उदाहरण के लिए, अर्थशास्त्री बताता है कि ब्याज की उचित दर क्या होनी चाहिए, आदर्श मजदूरी व पूर्ण रोजगार के स्तर पर कैसे पहुंच जाए, किन करों के द्वारा बजट के घाटे को पूरा किया जाए? कींस, मिल, मार्शल व पीगू आदि अर्थशास्त्री अर्थशास्त्र को कला मानते हैं। उनके अनुसार, कला व्यावहारिक समस्याओं को सुलझाने का एक साधन है।

निष्कर्ष – प्रो० पीगू के अनुसार-“अर्थशास्त्र न केवल विज्ञान है अपितु कला भी है।” वे अर्थशास्त्र के व्यावहारिक पक्ष को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। वास्तव में, अर्थशास्त्र केवल प्रकाशदायक ही नहीं अपितु फलदायक भी है। प्रो० चैपमैन के शब्दों में–“अर्थशास्त्र आर्थिक तथ्यों के वांछित रूपों के बारे में जिज्ञासा करता हुआ एक आदर्श विज्ञान है तथा वांछित उद्देश्यों को प्राप्त करने के तरीकों को ज्ञात करते हुए एक कला है।’ संक्षेप में, अर्थशास्त्र विज्ञान एवं कला दोनों है।

प्रश्न 7.
आधुनिक युग में अर्थशास्त्र के अध्ययन का क्या महत्त्व है? अथवा अर्थशास्त्र के अध्ययन का सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक लाभ बताइए।
उत्तर :

अर्थशास्त्र के अध्ययन का महत्त्व

मार्शल के शब्दों में-“अर्थशास्त्र के अध्ययन का उद्देश्य प्रथम तो ज्ञान के लिए ज्ञान प्राप्त करना है। तथा दूसरे व्यावहारिक जीवन में मार्गदर्शन करना है।” नि:संदेह अर्थशास्त्र केवल ज्ञानवर्द्धक ही नहीं बल्कि फलदायक भी है। अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होने वाले लाभों को दो भागों में बाँटा जाता है
(I) सैद्धांतिक लाभ तथा
(II) व्यावहारिक लाभ।

(I) अर्थशास्त्र के अध्ययन के सैद्धांतिक लाभ
सैद्धांतिक दृष्टि से अर्थशास्त्र के अध्ययन से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं|

  1. ज्ञान में वृद्धि–अर्थशास्त्र के अध्ययन से मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती है। मनुष्य को बेरोजगारी, अति-जनसंख्या, निर्धनता, तेजी व मन्दी आदि विभिन्न आर्थिक समस्याओं का ज्ञान हो जाता है।
  2. तर्कशक्ति में वृद्धि–ज्ञान में वृद्धि होने से मनुष्य की तर्कशक्ति बढ़ती है। मनुष्य पहले की | अपेक्षा कहीं अधिक संतुलित मत व्यक्त कर सकता है।
  3. चुनाव योग्यता में वृद्धि–अर्थशास्त्र के अध्ययन से मनुष्य की चुनाव-योग्यता में वृद्धि हो जाती है। वह आवश्यक तथा अनावश्यक आवश्यकताओं में भेद करने में समर्थ हो जाता है।
  4. विस्तृत दृष्टिकोण-अर्थशास्त्र के अध्ययन से मनुष्य को दृष्टिकोण विस्तृत तथा वैज्ञानिक हो जाता है क्योंकि अर्थशास्त्र ज्ञान का क्रमबद्ध अध्ययन है।

(II) अर्थशास्त्र के अध्ययन के व्यावहारिक लाभ
अर्थशास्त्र के अध्ययन से प्राप्त होने वाले प्रमुख व्यावहारिक लाभ निम्नलिखित हैं

1. गृहस्वामियों तथा उपभोक्ताओं को लाभ-

  • सम-सीमांत उपयोगिता नियम का पालन करके उपभोक्ता अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर सकता है।
  • गृहस्वामी पारिवारिक बजट बनाना और उसके अनुसार व्यय करना जाने जाते हैं। इससे अति व्यय नहीं होता।।
  • मनुष्य परिवार नियोजन के महत्त्व को जान जाता है।

2. उत्पादकों तथा व्यापारियों को लाभ-

  • उत्पादकों को उत्पादन (प्रतिफल) के नियमों, श्रम विभाजन के लाभों, आन्तरिक व बाह्य बचतों, व्यापार-चक्रों आदि की जानकारी हो जाती है।
  • उत्पादकों तथा व्यापारियों को बाजार की गतिविधियों, बाजार में पाई जाने वाली प्रतियोगिता, वस्तु की माँग व पूर्ति में होने वाले परिवर्तन, विज्ञापन, बैंक व बीमा कम्पनियों की कार्यप्रणाली आदि बातों की जानकारी होती है।
  • उत्पादकों को भूमि, श्रम, पूँजी तथा संगठन के पारिश्रमिक का निर्धारण करने में सहायता मिलती है।

3. कृषकों को लाभ-

  • किसानों को इस बात की जानकारी हो जाती है कि कृषि-उत्पादन में वृद्धि करने के लिए कौन-से उपादानों का अधिक प्रयोग किया जाए, खेती की कौन-सी विधि अपनाई जाए इत्यादि।
  • अर्थशास्त्र के अध्ययन से किसानों को यह निश्चित करने में सहायता मिलती है कि उन्हें उपज कब और कहाँ बेचनी चाहिए ताकि उन्हें उचित कीमत प्राप्त हो सके।
  • किसानों को विभिन्न प्रकार की सहकारी समितियों के महत्त्व का ज्ञान हो जाता है।
  • किसानों को विभिन्न कृषि समस्याओं तथा उनके समाधान के उपायों की जानकारी मिलती

4. राजनीतिज्ञों को लाभ-

  • अधिकांश समस्याएँ आर्थिक कारणों से उत्पन्न होती हैं। अत: विभिन्न समस्याओं को समझने हेतु अर्थशास्त्र आर्थिक मामलों में राजनीतिज्ञों को विशेष जानकारी प्रदान करता है।
  • अच्छा सरकारी बजट बनाने हेतु वित्तमंत्री के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान परमावश्यक है।
  • आर्थिक योजनाएँ बनाने के लिए राजनीतिज्ञों को वर्तमान आर्थिक समस्याओं के बारे में जानकारी प्राप्त हो जाती है।
  • चुनाव संबंधी प्रभावशाली घोषणा तैयार करने के लिए राजनीतिज्ञों को आर्थिक समस्याओं की जानकारी हो जाती है।

5. श्रमिकों को लाभ-

  • अर्थशास्त्र के अध्ययन से श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
  • श्रमिकों को श्रमसंघों के महत्त्व की जानकारी हो जाती है; श्रमसंघ श्रमिकों की मजदैरी में वृद्धि, काम की दशाओं में सुधार आदि के लिए प्रयत्न करते हैं; अत: यह संगठित होने लगता है।

6. समाज सुधारकों को लाभ – अर्थशास्त्र का अध्ययन करके समाज सुधारक विभिन्न आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं को सुलझा सकते हैं। जनसंख्या-वृद्धि, निर्धनता, बेकारी आदि समस्याओं के समाधान के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान अनिवार्य है। इसी प्रकार, जाति प्रथा, दहेज प्रथा तथा संयुक्त परिवार प्रथा के आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है।

निष्कर्ष – माल्थस के विचार में–“अर्थशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जिसके बारे में यह कहा जा सकता है कि इसकी अज्ञानता केवल भलाई से ही वंचित नहीं करती बल्कि भारी बुराइयाँ भी उत्पन्न कर देती है।”

प्रश्न 8.
सांख्यिकी को परिभाषित कीजिए। अथवा एकवचन तथा बहुवचन के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ दीजिए।
उत्तर :
अंग्रेजी भाषा के STATISTICS’. (सांख्यिकी) शब्द को दो रूपों में प्रयोग होता है
(I) एकवचन में और
(II) बहुवचन में।

बहुवचन में स्टैटिस्टिक्स शब्द का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित संख्यात्मक तथ्य होते हैं, जैसे—कृषि के समंक, जनसंख्या समंक, राष्ट्रीय आय समंक आदि। एकवचन में ‘स्टैटिस्टिक्स’ शब्द का अर्थ सांख्यिकी विज्ञान से है।

(I) एकवचन के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ

स्टैटिस्टिक्स शब्द का एकवचन में अर्थ सांख्यिकी विज्ञान से है। सामान्य रूप में सांख्यिकी विज्ञान की परिभाषाओं को दो भागों में बाँटा जा सकता है
(अ) संकीर्ण परिभाषाएँ
1. ए०एल० घाउले
ने सांख्यिकी की तीन परिभाषाएँ दी हैं

  • “सांख्यिकी, गणना का विज्ञान है।”
  • “सांख्यिकी को उचित रूप से औसतों का विज्ञान कहा जा सकता है।”
  • “सांख्यिकी वह विज्ञान है, जो सामाजिक व्यवस्था को सम्पूर्ण मानकर सभी रूपों में उसका मापन करता है।”

2. बोडिंगटन के अनुसार-“सांख्यिकी अनुमानों और सम्भाविताओं का विज्ञान है।”

(II) बहुवचन के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ

  1. ए० एल० बाउले के अनुसार-“समंक अनुसंधान के किसी विभाग में तथ्यों के संख्यात्मक विवरण हैं, जिनका एक-दूसरे से संबंधित रूप में अध्ययन किया जाता है।”
  2. यूल तथा केण्डाल के अनुसार-“समंक से तात्पर्य उन आँकड़ों से है, जो पर्याप्त सीमा तक | अनेक प्रकार के कारणों से प्रभावित होते हैं।”
  3. होरेस सेक्राइस्ट के अनुसार-“समंक से हमारा अभिप्राय तथ्यों के उन समूहों से है, जो अगणित कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्याओं में व्यक्त किए जाते हैं, एक उचित मात्रा की शुद्धता के अनुसार गिने या अनुमानित किए जाते हैं, किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य के लिए एक व्यवस्थित ढंग से एकत्र किए जाते हैं और जिन्हें एक-दूसरे से संबंधित रूप में प्रस्तुत किया जाता है।”

(ब) व्यापक परिभाषाएँ
1. प्रो० किंग के अनुसार – “गणना तथा अनुमानों के संग्रह को विश्लेषण के आधार पर प्राप्त परिणामों से सामूहिक, प्राकृतिक अथवा सामाजिक घटनाओं पर निर्णय करने की रीति को सांख्यिकी विज्ञान कहते हैं।”

2. सैलिगमैन के अनुसार – 
“सांख्यिकी वह विज्ञान है, जो किसी विषय पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से संग्रह किए गए आँकड़ों के संग्रहण, वर्गीकरण, प्रदर्शन, तुलना और व्याख्या करने की रीतियों का विवेचन करता है।”

3. क्रॉक्सटन व काउड्डेन के अनुसार – 
“सांख्यिकी को संख्या संबंधी समंकों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर सांख्यिकी की एक उपयुक्त परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है-“सांख्यिकी एक विज्ञान और कला है, जो सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक व अन्य समस्याओं से संबंधित समंकों के संग्रहण, सारणीयन, प्रस्तुतीकरण, संबंध स्थापन, निर्वचन और पूर्वानुमान से संबंध रखती है ताकि निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।”

प्रश्न 9.
आधुनिक युग में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए। अथवा “सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है तथा जीवन के अनेक बिन्दुओं को स्पर्श करती है।” समीक्षा कीजिए।
उत्तर :

सांख्यिकी का महत्त्व

सांख्यिकी के बारे में सत्य ही कहा गया है-“संख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती है तथा जीवन के अनेक बिन्दुओं को स्पर्श करती है।” सांख्यिकी के कारण ही अनेक क्षेत्रों में तीव्र गति से प्रगति हुई है। एफ०जे० मोरोने के अनुसार-आधुनिक जीवन का शायद ही कोई छेद या कोना हो, जिसमें; सांख्यिकीय सिद्धांतों का व्यवहार, चाहे वह सरल हो या न हो; परिणाम लाभपूर्ण न हो।” सेक्राइस्ट के अनुसार-“व्यापार, सामाजिक नीति तथा राज्य से संबंधित शायद ही कोई समस्या हो, जिसको समझने के लिए समंकों की आवश्यकता न पड़ती हो।”

एडवर्ड जे० कैने के अनुसार-“आज सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग ज्ञान एवं अन्वेषण की लगभग प्रत्येक शाखा–बिन्दुरेखीय कला से लेकर नक्षत्र भौतिकी तक और प्रायः प्रत्येक प्रकार के व्यवहार–संगीत रचना से लेकर प्रक्षेपास्त्र निर्देशन तक में किया जाता है।”

1. अर्थशास्त्र में सांख्यिकी का महत्त्व-आर्थिक विश्लेषण में समंक अत्यधिक उपयोगी होते हैं। मार्शल के अनुसार-“समंक वे तृण हैं, जिनसे मुझे अन्य अर्थशास्त्रियों की भाँति ईंटें बनानी हैं।” अर्थशास्त्र की प्रत्येक शाखा में साख्यिकीय रीतियों का प्रयोग किया जाता है

  • उपभोग के क्षेत्र में – उपभोग समंक यह बताते हैं कि विभिन्न आय-वर्ग किस प्रकार अपनी आय को व्यय करते हैं, उनका रहन-सहन का स्तर तथा उनकी करदान क्षमता क्या
  • उत्पादन के क्षेत्र में – उत्पादन समंक माँग एवं पूर्ति में समायोजन करने में सहायक होते हैं। ये समंक देश की उत्पादकता के मापक होते हैं।
  • विनिमय के क्षेत्र में – समंकों के माध्यम से बाजार माँग व पूर्ति की विभिन्न दशाओं पर आधारित मूल्य निर्धारण के नियम व लागत मूल्य का अध्ययन किया जाता है।
  • वितरण के क्षेत्र में – समंकों की सहायता से ही राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है, इसीलिए कहा जाता है-“कोई भी अर्थशास्त्री सांख्यिकीय तथ्यों के विस्तृत अध्ययन के बिना उत्पादन या वितरण संबंधी निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न नहीं करेगा।”

2. आर्थिक नियोजन में सांख्यिकी का महत्व – समंकों की आधारशिला पर ही योजना का भवन बनाया जाता है। योजनाएँ बनाने, उन्हें क्रियान्वित करने तथा उनकी सफलताओं का मूल्यांकन करने में पग-पग पर समंकों का सहारा लेना पड़ता है। आर्थिक नियोजन में समंकों का प्रयोग निम्नलिखित बातों के लिए किया जाता है

  • अन्य देशों की तुलना में अपने देश के आर्थिक विकास की स्थिति जानने के लिए।
  • आर्थिक विकास के निर्धारक तत्त्वों के प्रभावे, तकनीकी प्रगति व उत्पादकता की स्थिति जानने के लिए।
  • अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में प्राथमिकताएँ निर्धारित करने के लिए।
  • विभिन्न क्षेत्रों के निर्धारित लक्ष्यों व वित्तीय साधनों का अनुमान लगाने के लिए।
  • योजना की सफलता का मूल्यांकन करने के लिए।

3. राज्य के लिए सांख्यिकी को महत्व – ठीक ही कहा गया है कि समंक शासन के नेत्र हैं। कल्याणकारी राज्य की धारणा के साथ समंकों का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। देश में पूर्ण रोजगार के स्तर को बनाए रखने के लिए सरकार को अपनी व्यय नीति, कर नीति, मौद्रिक नीति आदि में समायोजन करना पड़ता है, परन्तु समायोजन संख्यात्मक तथ्यों के आधार पर ही हो सकता है। सरकारी बजट का निर्माण भी समंकों के आधार पर ही किया जाता है। सरकार द्वारा नियुक्त आयोगों, समितियों आदि के प्रतिवेदनों के आधार भी समंक ही होते हैं। वास्तव में, समंक एक ऐसा आधार है, जिसके चारों ओर सरकारी क्रियाएँ घूमती हैं।

4. वाणिज्य तथा उद्योगों में सांख्यिकी का महत्त्व – व्यापार तथा उद्योगों में सांख्यिकीय रीतियों का महत्त्व लगातार बढ़ रहा है। प्रो० बोर्डिंगटन के अनुसार-“एक अच्छा व्यापारी वह है, जिसका अनुमान यथार्थता के बहुत निकट हो।” यह उसी दशा में सम्भव है, जबकि सांख्यिकीय रीतियों तथा समंकों को अनुमान का आधार बनाया जाए। विपणि तथा उत्पादन शोध, विनियोग नीति, गुण नियन्त्रण, कर्मचारियों के चुनाव, आर्थिक पूर्वानुमान, अंकेक्षण आदि अनेक व्यापारिक क्रियाओं में सांख्यिकीय रीतियों का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक व्यापारी को मूल्यों की प्रवृत्ति व क्रियाओं की गति आदि का अनुमान करने के लिए सांख्यिकीय रीतियों का सहारा लेना पड़ता है। बीमा, व्यवसायी, बैंकर, स्टॉक व शेयर दलाल, सट्टेबाज, निवेशकर्ता आदि सभी के लिए सांख्यिकीय रीतियाँ समान रूप से उपयोगी हैं।

सांख्यिकी क सार्वभौमिक उपयोगिता है।
आधुनिक युग में सांख्यिकी को प्रयोग सर्वत्र होता है। सामान्य मनुष्य के दैनिक जीवन से लेकर उच्च ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में सांख्यिकी का प्रयोग होता है। लगभग सभी विज्ञानों के सिद्धान्तों के प्रतिपादन तथा पुष्टीकरण के लिए सांख्यिकीय रीतियों को प्रयोग में लाया जाता है। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, मनोविज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायनशास्त्र, चिकित्साशास्त्र सभी में सांख्यिकीय विवेचन नितान्त आवश्यक है।