Chapter 1 Neuron, Synapse and Nerve Impulse (स्नायु, स्नायु-सन्धि-स्थल तथा तन्त्रिका आवेग)

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्नायु अथवा न्यूरॉन (Neuron) का अर्थ स्पष्ट कीजिए। चित्र के माध्यम से स्नायु की संरचना को स्पष्ट कीजिए तथा स्नायु के प्रकारों का भी सामान्य परिचय दीजिए।(2018)
या
न्यूरॉन किसे कहते हैं? न्यूरॉन के प्रकारों को स्पष्ट कीजिए। (2008)
या
न्यूरॉन का चित्र बनाइए तथा उसकी कार्यप्रणाली का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (2010)
या
न्यूरॉन का चित्र बनाकर उसके भागों को नामांकित कीजिए। (2013)
उत्तर
प्राणियों के अधिकांश व्यवहार का सम्बन्ध किसी-न-किसी रूप में उनके शरीर से अवश्य होता है। शरीर की संरचना व्यवहार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। व्यवहार को निर्धारित करने में सर्वाधिक योगदान स्नायु-संस्थान का होता है। स्नायु-संस्थान ही उत्तेजनाओं को ग्रहण करता है तथा व्यवहार को निर्देशित करता है। स्नायु-संस्थान की सबसे छोटी इकाई को स्नायु अगवा न्यूरॉन (Neuron) कहते हैं।

स्नायु अथवा न्यूरॉन का अर्थ

जीवित प्राणियों के शरीर की एक विशेष प्रकार की कोशिकाओं को स्नायु अथवा न्यूरॉन कहा जाता है। स्नायु अथवा स्नायु कोशिका का सम्बन्ध शरीर के स्नायु-तन्त्र से होता है। स्नायु अथवा न्यूरॉन का मुख्य कार्य स्नायु-प्रवाहों या आवेगों (Nerve Impulses) को शरीर में परिचालित करना अथवा ढोना होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि स्नायु अथवा न्यूरॉन शरीर की वे कोशिकाएँ हैं जो शरीर में स्नायु-प्रवाह को ढोने या चलाने का कार्य करती हैं।

स्नायु की संरचना य

दि स्नायु की संरचना का अध्ययन किया जाए तो स्नायु में तीन प्रमुख भाग दिखाई पड़ते हैं
(1) वृक्षतन्तु
(2) जीवकोश तथा
(3) अक्षतन्तु। इन तीनों भागों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है

(1) वृक्षतन्तु (Dendrite)- स्नायु अथवा न्यूरॉन वृक्षतन्तु या वृक्षिका को एक भाग वृक्षतन्तु या वृक्षका कहलाता है। स्नायु के । इस भाग की सम्बन्ध जीवकोश से होता है। जहाँ तक इस अक्षतन्तु भाग के आकार का प्रश्न है, यह बिल्कुल किसी वृक्ष की शाखाओं के समान अनियमित-सा होता है। अनेक है -शाखाओं-प्रशाखाओं के कारण स्नायु का यह भाग घना-सा दिखाई देता है। वृक्षतन्तु द्वारा सामान्य रूप से दो
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प्रकार के कार्य किये जाते हैं। इसका प्रथम कार्य जीवकोश है-स्नायु-प्रवाह को ग्रहण करना तथा द्वितीय कार्य चित्र-स्नायु अथवा न्यूरॉन की रचना है—ग्रहण किये गये स्नायु-प्रवाह को स्नायु के मूल भाग जीवकोश को प्रदान करना। वृक्षतन्तु द्वारा स्नायु-आवेग को ग्रहण करने का मुख्य कार्य सम्पन्न करने के कारण इसे ग्राहीतन्तु भी कहते हैं।

(2) जीवकोश (Cell body)- जीवकोश जीवधारियों की एक इकाई है तथा इसे जीवन का मौलिक आधार कहा जाता है।
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इन्हें स्नायुकोश या कोशाण भी कह सकते हैं। इनकी आकृति वृत्ताकार या अण्डाकार हो सकती है। एक जीवकोश की रचना कई अवयवों से मिलकर होती है। सभी जीवकोश जीवद्रव्य (Protoplasm) नामक तरल पदार्थ से बनते हैं जो रंगहीन जैली की तरह होता है। जीवकोश की रचना कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) और केन्द्रक (Nucleus) से होती है। जीवकोश के चारों ओर एक झिल्ली, कोशिका झिल्ली (Cell-membrane) होती है जो अत्यन्त पतली व लचीली होती है और दबाव पड़ने से फट सकती है। जीवकोश के मध्य में केन्द्रक होता है जिसके भीतर एक पतली झिल्ली होती है जिसे केन्द्रक जीवद्रव्य (Nucleoplasm) कहते हैं। स्नायु का जीवकोश एक महत्त्वपूर्ण अंग है जिससे प्रत्येक स्नायु-आवेग गुजरता है। वृक्षतन्तुओं द्वारा ग्रहण किये जाने वाले स्नायु-आवेग जीवकोश के केन्द्र में आते हैं और यहाँ से अक्षतन्तु की ओर भेज दिये जाते हैं। अक्षतन्तु से ये स्नायु-आवेग स्नायु-ग्रन्थि या मांसपेशी आदि तक पहुँचते हैं।

(3) अक्षतन्तु (Axons)- स्नायु की संरचना में ‘अक्षतन्तु’ स्नायु का सबसे लम्बा भाग होता है। ये दुम की तरह निकले होते हैं। अक्षतन्तु के एक सिरे पर अन्तिम छोर वाले भाग को एण्ड-ब्रश (End-brush) कहते हैं। अक्षतन्तु की संरचना में तीन झिल्लियाँ होती हैं। जो स्नायु-आवेग जीवकोश में आता है, वह अक्षतन्तु के माध्यम से एण्ड-ब्रश से गुजरता हुआ दूसरे स्नायु वृक्ष के तन्तु को, मांसपेशियों को या किसी ग्रन्थि को भेज दिया जाता है।

वस्तुत: बाह्य एवं आन्तरिक उद्दीपकों से उत्पन्न उत्तेजनाओं को वृक्षतन्तु (Dendrites) तथा अक्षतन्तु (Axons) के माध्यम से केन्द्रों तक प्रेषित किया जाता है। स्नायु तन्तु तथा मांसपेशियाँ अक्सर ‘हाँ/ना’ के इस नियम का पालन करती हैं कि उद्दीपक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकते हैं या नहीं।

स्नायुओं के प्रकार

प्रकार्यात्मक (Functional) दृष्टि से स्नायुओं के तीन प्रमुख प्रकार हैं-
(1) ज्ञानवाही स्नायु,
(2) कर्मवाही स्नायु तथा
(3) संयोजक स्नायु। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है
(1) ज्ञानवही स्नायु (Sensory Neurons)- भ. ज्ञानवाही स्नायुओं में वृक्षतन्तु अपेक्षाकृत अधिक लम्बे तथा । ज्ञानेन्द्रियों की तरफ होते हैं। ये स्नायु-आवेगों को ज्ञानेन्द्रियों से वृक्षतन्तुओं के माध्यम से ग्रहण कर सुषुम्ना नाड़ी या मस्तिष्क तक प्रेषित करते हैं। संवेदनाओं को उत्पन्न करने । का कार्य भी इन्हीं का होता है; जैसे—स्पर्श, गर्मी, सर्दी या चित्र-ज्ञानवाही स्नायु पीड़ा की संवेदना।
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(2) कर्मवाही स्नायु (Motor Neurons)- कर्मवाही स्नायुओं में प्रायः जीवकोश ऊपर की ओर स्थित होता है जिसमें वृक्षतन्तुओं की संख्या कम होती है और वृक्षतन्तु जीवकोश के चारों ओर मिलते हैं। इस तरह के कर्मवाही स्नायु शरीर के विभिन्न भागों के अलावा सुषुम्ना नाड़ी और मस्तिष्क में भी पाये जाते हैं। कर्मवाही स्नायु का मुख्य कार्य स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क से बाहर ले जाकर ऊतकों तक पहुँचाना है। इन स्नायुओं द्वारा मांसपेशियों में गति उत्पन्न होती है तथा ग्रन्थियों को क्रियाशील बनाने हेतु स्राव उत्पन्न होता है।

(3) संयोजक स्नायु (Co-ordinating Neurons)- संयोजक स्नायु शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार की संरचना वाले होते हैं। ये संयोजक स्नायु सुषुम्ना 7 नाड़ी और मस्तिष्क में सबसे ज्यादा संख्या में उपस्थित रहते हैं और सुषुम्ना व मस्तिष्क के बीच सम्पर्क स्थापित करते हैं। इन्हें ज्ञानवाही तथा कर्मवाही स्नायुओं के बीच में फैला हुआ। चित्र-कर्मवाही स्नायु देखा जा सकता है। इनका प्रधान कार्य विभिन्न
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स्नायुओं को आपस में जोड़ने का है। व्रस्तुतः ये एक विशाल भवन में टेलीफोन व्यवस्था की तरह हैं। जिसमें कुछ तार अन्दर जाते हैं तो कुछ तार बाहर आते हैं और भवन के प्रत्येक हिस्से से सम्पर्क स्थापित कर देते हैं। इसी तरह से ये स्नायु-तन्तु आन्तरिक तारों के समान शरीर के विभिन्न विभागों व क्षेत्रों को परस्पर जोड़ने का कार्य करते हैं। इसके परिणामतः शरीर के विभिन्न अंग अच्छी तरह कार्य करने लगते हैं।

स्नायु-तन्त्र के कार्य (Functions of Neurons)- स्नायु-तन्त्र की कार्यात्मक इकाई स्नायु या न्यूरॉन है, अतः स्नायु-तन्त्र के कार्य स्नायु या न्यूरॉन द्वारा ही किये जाते हैं। स्नायु द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है—विभिन्न उत्तेजनाओं को ग्रहण करना तथा उन्हें शरीर से सम्बन्धित केन्द्रों में। भेजना। यह कार्य स्नायु-प्रवाह अथवा आवेग के माध्यम से सम्पन्न होता है। स्नायु के वृक्षतन्तु नामक भाग द्वारा स्नाय-आवेग को ग्रहण किया जाता है। वह उसके जीवकोश नामक भाग को संचारित कर देता है। जीवकोश द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-आवेग पुनः अक्षतन्तु नामक भाग को संचारित कर दिया जाता है जहाँ से यह आवेग स्नायु-तन्त्र के अभीष्ट केन्द्र को भेज दिया जाता है तथा अभीष्ट ज्ञान। प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न2
तन्त्रिका आवेग से क्या आशय है? इसके मापन का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

तन्त्रिका आवेग 

तन्त्रिका-तन्त्र की विभिन्न नाड़ियाँ अनेक स्नायुओं से मिलकर बनी होती हैं। इन्हीं स्नायुओं में तन्त्रिको आवेग या नाड़ी आवेग या नाड़ी प्रवाह (Nerve Impulse) 300 से 500 फीट प्रति सेकण्ड की गति से कार्य करता है। प्रत्येक तन्त्रिका आवेग का एक निश्चित सीमान्त होता है। इस भाँति, तन्त्रिका आवेग एक तरह का स्वतः उद्दीप्त (Self-initiated) आवेग या प्रवाह होता है जो एक स्नायु में एकसमान गति से प्रवाहित होता है।

अध्ययनों का निष्कर्ष है कि प्रत्येक तन्त्रिका आवेग विद्युत-रासायनिक प्रकृति (Electro Chemical Nature) का होता है। जब कोई स्नायु, तन्त्रिका आवेगरहित स्थिति अर्थात् विश्राम की अवस्था (Resting State) में होता है तो स्नायु की झिल्ली के दोनों ओर अर्थात् अन्दर व बाहर की तरफ विद्युत-रासायनिक विभवान्तर पैदा होता है। इसका अभिप्राय यह है कि स्नायु के बाहर की तरफ धनात्मक आवेश (Positive Ions) तथा अन्दर की तरफ ऋणात्मक आवेश (Negative Ions) होते हैं। दोनों ही आवेशों को वोल्टमीटर की मदद से मापा जा सकता है।
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धनात्मक तथा ऋणात्मक आवेशों के निःधुवण (Depolarization) के समय सम्पूर्ण स्नायु में या तो कुल नि:ध्रुवण होता है या यह बिल्कुल भी नहीं होता है। दूसरे शब्दों में, स्नायु का नि:ध्रुवण ‘सम्पूर्ण या कुछ भी नहीं सिद्धान्त (All or None Law) पर आधारित होता है। स्नायुओं में तन्त्रिका आवेग (नाड़ी प्रवाह) विद्युतीय निःधुवण (Electric Depolarization) के आधार पर आगे बढ़ता है।

स्नायु सन्धि पर तन्त्रिका आवेग के प्रवाहित होने का आधार,खासतौर पर रासायनिक होता है और रासायनिक पदार्थों के आधार पर ही ज्यादातर स्नायु सन्धियों पर तन्त्रिका आवेग एक स्नायु से दूसरे स्नायु की ओर प्रवाहित होता है। प्रयोगों से यह भी पता चला है कि एक स्नायु को एक बार नि:ध्रुवण होने के बाद दूसरी बार नि:ध्रुवण तत्काल न होकर कुछ समय के उपरान्त होता है। इस समय-अन्तराल या अवधि को तिर्यक अवधि (Refractory Period) कहा जाता है और इसका औसत काल एक सेकण्ड का एक हजारवाँ भाग ( \cfrac { 1 }{ 1000 }  वाँ भाग) मापा गया है। इस भाँति, तन्त्रिका आवेग स्नायुओं में प्रवाहित होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्नायु-सन्धि (Synapse) से आप क्या समझते हैं?
या
सन्धि-स्थल को चित्र की सहायता से स्पष्ट कीजिए। (2016)
उत्तर
स्नायु-सन्धि शरीर के भीतर वे स्थान हैं जहाँ दो-या-दो से अधिक स्नायु एक-दूसरे से नाड़ी आवेग को लेते या देते हैं। शरीर के भिन्न-भिन्न भागों पर स्नायु-तन्तुओं के जोड़ या संयोजक या सन्धियाँ दिखाई पड़ती हैं, जिन्हें स्नायु-सन्धि (Synapse) कहा जाता है। हालाँकि दो स्नायुओं के सिरे एक-दूसरे के बहुत समीप होते हैं, किन्तु शरीर-रचना-शास्त्र के अनुसार दो स्नायु कभी आपस में पूरी तरह जुड़ते नहीं हैं। दो स्नायुओं का यह संगम (Junction) ही स्नायु-सन्धि है। इस सन्धि पर अधिक या एक अक्षतन्तु का सिरा दूसरे स्नायुओं के वृक्षतन्तु को सन्देश या आवेग सम्प्रेषित करता है। अर्थात् अपने में से होकर गुजरने देता है।
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प्रश्न 2
स्नायु-सन्धि की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
स्नायु-सन्धि की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. स्नायु-सन्धियाँ एकपक्षीय मार्ग (One-way Traffic) पर कार्य करती हैं। इनसे नाड़ी आवेग या सन्देश एक ही दिशा में प्रवाहित हो सकता है, उसके विपरीत दिशा में नहीं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि एक स्नायु के अक्षतन्तु से नाड़ी आवेग दूसरे स्नायु के वृक्षतन्तु या जीवकोश की ओर गुजर सकता है, इसकी विपरीत दिशा में नहीं गुजर सकता।
  2. किसी भी स्नायु–सन्धि पर दो-या-दो से अधिक स्नायु सम्बन्धित होते हैं।
  3. किन्हीं भी दो स्नायुओं के बीच कुछ-न-कुछ खाली स्थान होना अपरिहार्य समझा जाता है।
  4. स्नायु की अपेक्षा स्नायु-सन्धि को पार करने में नाड़ी आवेग को अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है।
  5. स्नायु-सन्धि से नाड़ी आवेग गुजरते समय, स्नायु-सन्धि परे नाड़ी आवेग या स्नायु आवेग की गति अपेक्षाकृत धीमी हो जाती है।

तिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1
स्नायु द्वारा सम्पन्न होने वाले कार्यों को स्पष्ट कीजिए। (2018)
उत्तर
स्नायु-तन्त्र की कार्यात्मक इकाई स्नायु या न्यूरॉन है; अतः स्नायु-तन्त्र के कार्य स्नायु या न्यूरॉन द्वारा ही किये जाते हैं। स्नायु द्वारा किया जाने वाला मुख्य कार्य है—विभिन्न उत्तेजनाओं को ग्रहण करना तथा उन्हें शरीर के सम्बन्धित केन्द्रों में भेजना। यह कार्य स्नायु-प्रवाह अथवा आवेग के माध्यम से सम्पन्न होता है। स्नायु के वृक्षतन्तु नामक भाग द्वारा स्नायु-आवेग को ग्रहण किया जाता है। जो उसे जीवकोश नामक भाग को संचारित कर देता है। जीवकोश द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-आवेग पुनः अक्षतन्तु नामक भाग को संचारित कर दिया जाता है जहाँ यह आवेग स्नायु-तन्त्र के अभीष्ट केन्द्र को भेज दिया जाता है तथा अभीष्ट ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 2
संयोजक स्नायुकोश का क्या कार्य है? (2017)
उत्तर
संयोजक स्नायुकोशों का मुख्य कार्य विभिन्न स्नायुओं को आपस में जोड़ने का है। ये सुषुम्ना तथा मस्तिष्क के बीच सम्पर्क स्थापित करते हैं। संयोजक स्नायु शरीर के विभिन्न विभागों तथा क्षेत्रों को परस्पर जोड़ने का कार्य करते हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर के विभिन्न अंग अच्छी तरह से कार्य करने लगते हैं।

निश्चित उतरीय प्रश्न

प्रश्न 1 निम्नलिखित वाक्यों में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए
1. स्नायु-तन्त्र का निर्माण करने वाली कोशिकाओं को …………. कहते हैं।
2. तन्त्रिका-तन्त्र की मौलिक इकाई को …………. कहते हैं।
3. तन्त्रि-तन्त्र में पाये जाने वाले कोशों को ………… कहते हैं।
4. जीवकोश ………… का एक अंग है। (2012)
5. स्नायु अथवा न्यूरॉन का मुख्य कार्य ……..को शरीर में परिचालित करना अथवा ढोना होता है।
6. सूचनाओं को मस्तिष्क तथा सुषुम्ना तक पहुँचाने का कार्य ……………का होता है। (2009)
7. वृक्षतन्तु द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-आवेग ……………. को प्रदान कर दिया जाता है।
8. ज्ञानेन्द्रियों से स्नायु-प्रवाह को ग्रहण करने वाले स्नायुओं को ……………… कहते हैं।
9. स्नायु-प्रवाह को मांसपेशियों तथा पिण्डों तक पहुँचाने का कार्य करने वाले स्नायुओं को ……….. कहते हैं।
10. ज्ञानवाही तथा कर्मवाही स्नायुओं को परस्पर सम्बद्ध करने वाले स्नायुओं को……….. कहते हैं।
11. स्नायु-तन्त्र में दो या दो से अधिक स्नायुओं के परस्पर सम्बद्ध होने के स्थल को ………………. कहते हैं।
12. ……………… पर स्नायु-प्रवाह ‘सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं’ के नियम से संचालित होता है। (2011)
13. सन्धि-स्थल पर स्नायु-प्रवाह………………. के नियम से संचालित होता है। (2010)
14. स्नायु-तन्त्र में स्नायु-आवेग………………. के माध्यम से ही अग्रसर होता है।
15. स्नायु कोशिका में उत्पन्न होने वाले विद्युत-रासायनिक विक्षोभ को . …………….. कहते हैं।
16. स्नायु-आवेग का मापन ……………… द्वारा किया जाता है।
उत्तर
1.स्नायु अथवा न्यूरॉन, 2. न्यूरॉन, 3. न्यूरॉन, 4. स्नायु कोशिका या न्यूरॉन, 5. स्नायु-आवेग, 6. न्यूरॉन, 7. जीवकोश, 8. ज्ञानवाही स्नायु, 9. कर्मवाही स्नायु, 10. संयोजक स्नायु, 11. स्नायु-सन्धि, 12. सन्धि-स्थल, 13. ‘सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं’, 14. स्नायु-सन्धि, 15, स्नायु-आवेग, 18. गैल्वेनोमीटर।

प्रश्न II.निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दीजिए- :
प्रश्न 1.
न्यूरॉन का अर्थ लिखिए।
उत्तर
स्नायु-तन्त्र की कोशिकाओं को न्यूरॉन कहते हैं।

प्रश्न 2.
‘स्नायु अथवा ‘न्यूरॉन की परिभाषा लिखिए। |
उत्तर
‘स्नायु’ अथवा ‘न्यूरॉन’ शरीर की वे कोशिकाएँ हैं जो शरीर में स्नायु-प्रवाह को ढोने या चलाने का कार्य करती हैं।

प्रश्न 3.
स्नायु अथवा न्यूरॉन के मुख्य भागों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
(1) वृक्षतन्तु या वृक्षिका,
(2) जीवकोश तथा
(3) अक्षतन्तु।

प्रश्न 4.
स्नायु-तन्त्र में पाये जाने वाले न्यूरॉन के प्रकार बताइए।
उत्तर
(1) ज्ञानवाही न्यूरॉन
(2) कर्मवाही न्यूरॉन तथा
(3) संयोजक स्नायु।

प्रश्न 5.
कर्मवाही स्नायु के मुख्य कार्य का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
कर्मवाही स्नायु का मुख्य कार्य स्नायु-प्रवाहों को मस्तिष्क से बाहर ले जाकर ऊतकों तक पहुँचाना है।

प्रश्न 6.
स्नायु-सन्धि से क्या आशय है? ।
उत्तर
स्नायु-सन्धि शरीर के भीतर वे स्थान हैं जहाँ दो या दो से अधिक स्नायु एक-दूसरे से स्नायु-आवेग को लेते या देते हैं।

प्रश्न 7.
तन्त्रिका आवेग की प्रकृति क्या होती है?
उत्तर
तन्त्रिका आवेग की प्रकृति विद्युत-रासायनिक होती है।

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों में दिये गये विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव कीजिए
प्रश्न 1.
शरीर में स्नायु आवेग को संचारित करने वाली कोशिका को कहते हैं
(क) रक्त कोशिका
(ख) साधारण कोशिका
(ग) न्यूरॉन या स्नायु
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(ग) न्यूरॉन या स्नायु

प्रश्न 2.
स्नायु-तन्त्र की संरचनात्मक इकाई को कहते हैं
(क) कोशिका
(ख) वृक्षतन्तु
(ग) स्नायु
(घ) सुषुम्ना
उत्तर:
(ग) स्नायु

प्रश्न 3.
इनमें से कौन स्नायुकोश (न्यूरॉन) का अंग है?
(क) वृक्षतन्तु
(ख) थायरॉइड
(ग) संग्राहक
(घ) ज्ञानवाही स्नायु
उत्तर:
(क) वृक्षतन्तु

प्रश्न 4.
कौन न्यूरॉन का भाग है? (2011, 15)
(क) सेतु
(ख) जीवकोश
(ग) उद्दीपक
(घ) ज्ञानेन्द्रिय
उत्तर:
(ख) जीवकोश

प्रश्न 5.
कौन न्यूरॉन का अंग नहीं है।
(क) वृक्षतन्तु
(ख) जीवकोश
(ग) सेतु
(घ) अक्षतन्तु
उत्तर:
(ग) सेतु

प्रश्न 6.
न्यूरॉन के उस भाग को क्या कहते हैं जिसके द्वारा स्नायु-प्रवाह को ग्रहण किया जाता है?
(क) वृक्षतन्तु
(ख) अक्षतन्तु
(ग) जीवकोश
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) वृक्षतन्तु

प्रश्न 7.
जीवकोश द्वारा ग्रहण किया गया स्नायु-प्रवाह
(क) वृक्षतन्तु को प्रेषित किया जाता है
(ख) अन्य जीवकोशे को प्रेषित किया जाता है।
(ग) अक्षतन्तु को प्रेषित किया जाता है
(घ) अपने आप में समेट लिया जाता है।
उत्तर:
(ग) अक्षतन्तु को प्रेषित किया जाता है

प्रश्न 8.
ज्ञानेन्द्रियों से स्नायु-प्रवाह को ग्रहण करने वाले स्नायु को कहते हैं
(क) ज्ञानवाही स्नायु
(ख)कर्मवाही स्नायु
(ग) संयोजक स्नायु
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(क) ज्ञानवाही स्नायु

प्रश्न 9.
स्नायु-तन्त्र में एक स्नायु के वृक्षतन्तु तथा दूसरे स्नायु के अक्षतन्तु में सम्बन्ध स्थापित होने के स्थल को कहते हैं
(क) ज्ञानकेन्द्र
(ख) मिलन बिन्दु
(ग) स्नायु-सन्धि
(घ) ये सभी
उत्तर:
(ग) स्नायु-सन्धि

प्रश्न 10.
स्नायु कोशिका के उद्दीप्त होने के कारण उसमें उत्पन्न होने वाले विद्युत-रासायनिक विक्षोभ को कहते हैं (2012)
(क) ज्ञान का संचार
(ख) स्नायु आवेग
(ग) स्नायविक कण्ट
(घ) उत्तेजना
उत्तर:
(ख) स्नायु आवेग

प्रश्न 11.
स्नायु सन्धि-स्थल के सम्बन्ध में गलत कथन है (2017)
(क) स्नायु सन्धि-स्थल पर दो स्नायुकोशों के बीच कुछ दूरी होती है।
(ख) स्मायु सन्धि-स्थल पर स्नायु प्रवाह ‘सम्पूर्ण अथवा कुछ भी नहीं’ के नियम से संचालित होता है।
(ग) स्नायु सन्धि-स्थल पर स्नायु प्रवाह कुछ धीमा पड़ जाता है।
(घ) स्नायु सन्धि-स्थल पर स्नायु-प्रवाह रुक जाता है।
उत्तर:
(घ) स्नायु सन्धि-स्थल पर स्नायु-प्रवाह रुक जाता है।