Chapter 1 संसाधन एवं विकास

अभ्यास प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. निम्नलिखित में कौन-सा ऊर्जा का परम्परागत स्रोत है-

a. कोयला

b. पवन

c. बायो गैस

d. इनमें से कोई नहीं। (a)

2. लौह अयस्क किस प्रकार का संसाधन है?

a. नवीकरण योग्य

b. प्रवाह

c. जैव

d. अनवीकरण योग्य । (d)

3. ज्वारीय ऊर्जा निम्नलिखित में से किस प्रकार का संसाधन है?

a. पुनः पूर्ति योग्य

b. अजैव

c. मानवकृत

d. अचक्रीय । (a)

4. निम्नलिखित में से कौन-सी मृदा या मिट्टी भारत के सबसे विस्तृत क्षेत्र में पायी जाती है और भारत के लिए अति महत्त्वपूर्ण मिट्टी है?

a. लैटेराइट मृदा

b. काली मृदा

c. जलोढ़ मृदा

d. लाल और पीली मृदा । (c)

5. नवीकरण योग्य संसाधन है-

a. पवन ऊर्जा

c. जल

b. वन

d. ये सभी। (d)

6. भारत के मैदानी क्षेत्र का क्षेत्रफल है-

a. 43 प्रतिशत

b. 30 प्रतिशत

c. 27 प्रतिशत

d. 46 प्रतिशत। (a)

7. जलोढ़ मिट्टी को किन दो भागों में विभाजित किया जाता है?

a. बाँगर और खादर

b. उपजाऊ और अनुपजाऊ

c. काली और पीली

d. इनमें से कोई नहीं। (a)

8. लैटेराइट मिट्टी का रंग कैसा होता है?

a. लाल

b. काला

c. पीला

d. भूरा। (a)

9. उत्तर प्रदेश में कौन-सी मिट्टी पायी जाती है?

a. जलोढ़

b पर्वतीय

c. लैटेराइट

d. काली या रेगड़ (a)

10. कपास की खेती के लिए सबसे उचित मिट्टी कौन-सी है?

a. काली मिट्टी

b. लाल मिट्टी

c. जलोढ़ मिट्टी

d. लैटेराइट मिट्टी। (a)

11. निम्नलिखित में से किस प्रांत में सीढ़ीदार (सोपानी) खेती की जाती है?

a. पंजाब

c. हरियाणा

b. उत्तर प्रदेश के मैदान

d. उत्तराखंड। (d)

12. जैविक संसाधन में निम्न में से कौन शामिल हैं?

a. पशु

b. वन

c. मनुष्य

d. ये सभी। (d)

13. पंजाब में भूमि निम्नीकरण का प्रमुख कारण है-

a. खनन किया

b. वनोन्मूलन

c. अत्यधिक सिंचाई

d. अति पशुचारण। (c)

14. लाल-पीली मिट्टी पायी जाती है-

a. दक्कन के पठार में

b. मालवा प्रदेश में

c. ब्रह्मपुत्र घाटी में

d. थार रेगिस्तान में। (a)

15. भूमि एक ——– साधन है।

a. प्राकृतिक

b. मानव-निर्मित

c. सौर ऊर्जा से निर्मित

d. इनमें से कोई नहीं। (a)

16. निम्नलिखित में से एक मिट्टी का प्रकार नहीं है-

a. काली

b. पीली

c. लैटेराइट

d. सीमेंट । (d)

17. सतत् पोषणीय विकास है-

a. सतत् विकास होते रहना

b. विकास तो हो लेकिन पर्यावरण का किसी भी प्रकार का नुकसान न हो

c. विकास में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न होना

d. कई वर्षों से होने वाला विकास। (b)

18. पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं पर पाई जाने वाली मृदा है-

a. रेतीली मृदा

b. पर्वतीय मृदा

c. जलोढ़ मृदा

d. काली मृदा । (c)

19. नियोजन एक सर्वमान्य रणनीति है.

a. वस्तुओं की गुणवत्ता सुधारने के लिए

b. संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए

c. प्रदूषण के स्तर को सुधारने के लिए

d. उपर्युक्त में से कोई नहीं (b)

20. महत्त्वपूर्ण संसाधनों की अत्यधिक कमी है-

a. मध्य प्रदेश में

b. झारखंड में

c. छत्तीसगढ़ में

d. इन सभी राज्यों में (d)

21. भारत के किस राज्य में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की बहुतायत है?

a. हिमाचल प्रदेश

b. बिहार

c. राजस्थान

d. केरल (c)

22. भारत का शीत मरुस्थल अवस्थित है-

a. कर्नाटक

b. तमिलनाडु

c. हिमाचल प्रदेश

d. लद्दाख (d)

23. निम्नलिखित में से कौन-सी मृदा अधिकांशतः गहरी तथा अम्लीय होती है?

a. काली मृदा

b. जलोढ़ मृदा

c. मरुस्थली मृदा

d. लैटेराइट मृदा (d)

24. लैटेराइट शब्द ग्रीक भाषा के शब्द ‘लैटर से लिया गया है, जिसका अर्थ है-

a. ईंट

b. सीमेंट

c. लोहा

d. पीतल (a)

25. चाय और कॉफी उगाई जाती है-

a. केरल

c. कर्नाटक

b. तमिलनाडु

d. इन सभी राज्यों में। (d)

26. तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल लैटेराइट मृदाएँ किस फसल के लिए अधिक उपयुक्त हैं?

a. गेहूँ

b. चावल

c. काजू

d. बाजरा (c)

27. मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को कहा जाता है-

a. मृदा संकेंद्रण

b. मृदा अपरदन

c. मृदा निर्माण

d. उपर्युक्त में से कोई नहीं । (b)

28. किन मानवीय क्रियाओं से मृदा असंतुलन होता है?

a. खनन

b. पशुचारण

c. वनोन्मूलन

d. इन सभी से। (d)

29. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राकृतिक तत्व मृदा अपरदन हेतु उत्तरदायी है?

a. पवन

b. हिमनदी

c. जल

d. ये सभी। (d)

30. चंबल बेसिन की उत्खात भूमि को कहा जाता है-

a. खड्ड

b. उपजाऊ

c. मरुस्थलीय

d. वनीय । (a)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भूमि एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन क्यों है?

उत्तर- हम भूमि पर रहते हैं, इस पर अनेक आर्थिक क्रियाकलाप करते हैं तथा विभिन्न रूपों में इसका उपयोग करते हैं। अतः भूमि एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।

प्रश्न 2. भूमि का उपयोग सावधानी एवं योजनाबद्ध तरीके से क्यों होना चाहिए?

उत्तर- भूमि एक सीमित संसाधन है अतः इसका उपयोग सावधानी एवं योजनाबद्ध तरीके से होना चाहिए।

प्रश्न 3. भारतीय भूमि पर कौन-कौन सी भू-आकृतियाँ पाई जाती हैं?

उत्तर- भारतीय भूमि पर जैसे-पर्वत, पठार, मैदान और विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ द्वीप आदि पाई जाती हैं।

प्रश्न 4. भारत का लगभग कितना प्रतिशत हिस्सा पठारी है? इसमें क्या पाया जाता है?

उत्तर- भारत का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा पठारी है। इस क्षेत्र में खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष है।

प्रश्न 5. काली मृदाओं को अन्य किन नामों से जाना जाता है?

उत्तर- काली मृदाओं को रेगड़’ तथा ‘काली कपास मृदा’ के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 6. काली मृदाओं के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान किसका है?

उत्तर – काली मृदाओं के निर्माण में जलवायु और जनक शैलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न 7. भारत में काली मृदाएँ कहाँ पायी जाती हैं?

उत्तर- भारत में काली मृदाएँ महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठार पर पायी जाती हैं।

प्रश्न 8. काली मृदाओं की जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली बौछार से ही क्यों शुरू कर दी जाती है?

उत्तर- गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी हो जाती हैं तथा इनको जोतना मुश्किल होता है इसलिए इनकी जुताई मानसून प्रारंभ होने की पहली बौछार से ही शुरू हो जाती है।

प्रश्न 9. जलोढ़ मृदा का निर्माण किससे हुआ है?

उत्तर- जलोढ़ मृदा का निर्माण हिमालय की तीन महत्त्वपूर्ण नदी तंत्रों-सिंधु, गंगा, और बह्मपुत्र नदियों द्वारा लाये गए निक्षेपों से हुआ है।

प्रश्न 10. आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ कितने प्रकार की होती हैं?

उत्तर – आयु के आधार पर जलोढ़ मृदाएँ दो प्रकार की होती हैं- पुराना जलोढ़ (बांगर ) तथा नया जलोढ़ (खादर)। बांगर मृदा में ‘कंकर’ ग्रंथियों की ज्यादा मात्रा होती है जबकि खादर मृदा में बांगर मृदा की तुलना में ज्यादा महीन कण पाए जाते हैं।

प्रश्न 11. जलोढ़ मृदा किस प्रकार की फसलों हेतु उपयुक्त है?

उत्तर – जलोढ़ मृदा गन्ना, चावल, गेहूँ और दलहन जैसी फसलों की खेती हेतु उपयुक्त है।

प्रश्न 12. अवनलिका अपरदन किसे कहते हैं?

उत्तर- जब बहता हुआ जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ बनाता है तो इस स्थिति को अवनलिका अपरदन कहते हैं।

प्रश्न 13. संसाधन से क्या अभिप्राय है?

उत्तर- मानव के विभिन्न उद्देश्यों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा किसी कठिनाई का निवारण करने वाले अथवा निवारण में योगदान देने वाले स्रोतों को संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 14. संसाधन वर्गीकरण के क्या आधार हो सकते हैं?

उत्तर- संसाधन वर्गीकरण के विभिन्न आधार हो सकते हैं: जैसे— प्राकृतिक तत्व, मानवीय ज्ञान, संसाधन स्रोत, संसाधन उपलब्धता, विकास अवस्था आदि।

प्रश्न 15. प्राकृतिक संसाधनों के वर्गीकरण का क्या आधार है?

उत्तर- प्राकृतिक संसाधनों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जाता है-

(i) उत्पत्ति (उद्गम) के आधार पर,

(ii) उपलब्धता के आधार पर तथा

(iii) विकास की अवस्था के आधार पर।

प्रश्न 16. स्रोतों के आधार पर संसाधनों का कितने भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है?

उत्तर- (i) खनिज संसाधन, (i) मृदा संसाधन, (ii) वनस्पति संसाधन, (iv) जल संसाधन, (v) जैव संसाधन ।

प्रश्न 17. उत्पत्ति और समाप्यता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए।

उत्तर- उत्पत्ति के आधार पर जैव और अजैव संसाधन । समाप्यता के आधार पर नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य संसाधन ।

प्रश्न 18. आपूर्ति संसाधन से क्या तात्पर्य है?

उत्तर- वे संसाधन, जो कभी समाप्त नहीं होते तथा जिनका उपयोग निरंतरता के साथ किया जा सकता है, आपूर्ति संसाधन कहलाते हैं; जैसे- जल, पवन, प्राकृतिक वनस्पति व सूर्यातप आदि ।

प्रश्न 19. किसी राष्ट्र का भविष्य किन तथ्यों पर निर्भर करता है?

उत्तर- किसी राष्ट्र का भविष्य उसमें उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों पर निर्भर करता है।

प्रश्न 20. किसी देश या प्रदेश का आर्थिक विकास किन कारकों पर निर्भर करता है?

उत्तर- किसी देश या प्रदेश का आर्थिक विकास निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करता है-

(1) उस देश या प्रदेश में उपलब्ध विभिन्न प्रकार के संसाधन,

(2) जनसंख्या की आवश्यकता एवं आकांक्षाएँ तथा

(3) जनसंख्या का कौशल और तकनीकी ज्ञान।

प्रश्न 21. संभाव्य संसाधन किन्हें कहते हैं?

उत्तर- ऐसे संसाधन, जिनकी किसी प्रदेश या क्षेत्र में होने की संभावना बनी रहती है, संभाव्य संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण के लिए अफ्रीका महाद्वीप में जल शक्ति संसाधन की विपुल संभावना है परंतु वैज्ञानिक तकनीकी ज्ञान के अभाव के कारण इस संसाधन का समुचित उपयोग नहीं हो पाया है अतः इन्हें हम भविष्य के संसाधन या संभाव्य संसाधन कह सकते हैं।

प्रश्न 22. मृदा निर्माण में किन कारकों का योगदान होता है?

उत्तर- मृदा निर्माण में शैल, जलवायु, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, स्थानीय स्थलाकृति और समय की लंबी अवधि आदि कारकों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

प्रश्न 23. भूमि की बनावट में कौन-सी शक्तियों का योगदान होता है?

उत्तर – तापमान, बहता हुआ जल व वायु आदि।

प्रश्न 24. भारतीय मिट्टी को कितने भागों में बाँटा जाता है?

उत्तर- (i) जलोढ़ (ii) काली, (iii) लाल, (iv) लैटेराइट, (v) पर्वतीय एवं (vi) मरुस्थलीय ।

प्रश्न 25. काली मिट्टी की दो प्रमुख विशेषताएँ कौन-सी हैं?

उत्तर- (i) इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है।

(ii) काली मिट्टी कपास उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है।

प्रश्न 26. काली मिट्टी की बनावट किन तथ्यों पर निर्भर करती है?

उत्तर- काली मिट्टी की बनावट मूल शैल संरचना एवं जलवायु दशाओं पर निर्भर करती है।

प्रश्न 27. काली मिट्टी के प्रमुख क्षेत्र मुख्य रूप से किन राज्यों में सीमित हैं?

उत्तर – काली मिट्टी दक्कन ट्रैप की देन है जो महाराष्ट्र, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश में पायी जाती है।

प्रश्न 28. श्रीमान P असम के निवासी हैं। वे चाय या गेहूँ की खेती करना चाहते हैं। इनमें से कौन-सी फसल की उनके राज्य में उपज ली जा सकती है? अपने उत्तर के लिए दो तर्क प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर- श्रीमान P को असम में चाय की खेती करनी चाहिए क्योंकि असम की मिट्टी और जलवायु चाय उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं।

(i) उचित प्रकार से सिंचित लैटेराइट मिट्टी में उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में चाय के पौधे अच्छी प्रकार से विकसित होते हैं। यह मिट्टी जैविक पदार्थों से भरपूर होती है। चाय की झाड़ियों को पूरे वर्ष गर्म नमी वाला और पाले से रहित जलवायु की आवश्यकता होती है।

(ii) पूर्व वर्ष लगातार होने वाली हल्की बारिश नाजुक पत्तियों की बढ़ोतरी में सहायक बनती है।

प्रश्न 29. भारत में पाई जाने वाली जलोढ़ मिट्टी की तीन विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर- (i) जलोढ़ मिट्टी का निर्माण नदियों द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों से बहाकर लाए गए अवसाद से होता है।

(ii) यह मिट्टी बहुत ही उर्वर होती है और देश के सर्वाधिक क्षेत्रफल पर पायी जाती है।

(iii) गहन कृषि होने के कारण इस मृदा के क्षेत्र में जनसंख्या घनत्व अधिक पाया जाता है।

प्रश्न 30. मृदा अपरदन से क्या अभिप्राय है?

उत्तर- प्राकृतिक कारकों द्वारा मृदा का एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटना मृदा अपरदन कहलाता है।

प्रश्न 31. मृदा अपरदन कितने प्रकार का होता है?

उत्तर- (i) अवनालिका अपरदन (ii) परत अपरदन तथा (iii) वायु अपरदन।

प्रश्न 32. मृदा अपरदन किस प्रकार रोका जा सकता है?

उत्तर- (i) जल प्रवाह की तीव्रता को कम करके तथा (ii) वृक्षारोपण द्वारा।

प्रश्न 33. संसाधनों के दो प्रकार बताइए। प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर- (i) प्राकृतिक संसाधन – प्राकृतिक वनस्पति ।

(ii) मानवीय संसाधन – रेलमार्ग ।

प्रश्न 34. प्राकृतिक संसाधनों के दो प्रकार कौन से हैं? प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर- (i) जैविक संसाधन – प्राकृतिक वनस्पति (पेड़-पौधे)।

(ii) अजैविक संसाधन – मृदा

प्रश्न 35. नवीकरण योग्य संसाधनों के दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर- (i) सौर ऊर्जा, (ii) पवन ऊर्जा ।

प्रश्न 36. कोई दो मानवीय क्रियाएँ लिखिए जो भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी हैं।

उत्तर- (i) मृदा प्रदूषण तथा (ii) वनों का कटाव ।

प्रश्न 37. मृदा के निर्माण में जलवायु सबसे महत्त्वपूर्ण कारक किस प्रकार है? दो कारणों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- (i) जलवायु अपक्षय की दर निर्धारित करती है।

(ii) जलवायु वनस्पति के प्रकार का निर्णय करती है।

प्रश्न 39. बांगर और खादर में दो अंतर बताइए |

उत्तर- (i) बांगर की तुलना में खादर अधिक उपजाऊ होती है

(ii) प्राचीन जलोढ़ मृदा को बांगर तथा नवीन जलोढ़ मृदा को खादर कहा जाता है।

प्रश्न 40. धरातलीय या परतदार कटाव क्या है?

उत्तर – तेज मूलसाधार वर्षा के कारण जब धरातल का ऊपरी उत्पादक भाग तेज पानी से बह जाता है, तब उसे धरातलीय या परतदार कटाव कहते हैं।

प्रश्न 41. कछार वाले कटाव से क्या आशय है?

उत्तर- नदियाँ अथवा तेज बहने वाली जल धाराओं के द्वारा जो कटाव होता है, उसे कछार वाला कटाव कहते हैं। इसमें मिट्टी कुछ गहराई तक कट जाती है तथा भूमि सतह पर नालियाँ व गड्ढे बन जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भू-संसाधन क्या है? इसका समुचित उपयोग क्यों आवश्यक है?

उत्तर – प्रकृति द्वारा प्रदत्त वह संसाधन जिस पर हम निवास करते हैं, अनेक प्रकार के आर्थिक क्रियाकलाप करते हैं तथा जिसका विभिन्न रूपों में उपयोग करते हैं, भू-संसाधन कहलाता है।

भूमि एक सीमित संसाधन है, इसका निर्माण या विस्तार संभव नहीं है, इसलिए उपलब्ध भूमि का विभिन्न उद्देश्यों के लिए उपयोग सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से करना अत्यंत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त भू-संसाधन पर्वतीय पठारी मैदानी और द्वीपीय रूपों में होता है। भूमि के इन विविध रूपों का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों से किया जाता है इसलिए भी भूमि का समुचित उपयोग आवश्यक है।

प्रश्न 2. पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

उत्तर – पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन की रोकथाम के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए-

(i) वनोन्मूलन और अति पशुचारण से संबंधित क्रियाओं को नियंत्रित किया जाना चाहिए।

(i) निर्माण एवं खनन कार्य जैसे कार्य संतुलित रूप में और वैज्ञानिक ढंग से पूर्ण किए जाने चाहिए।

(ii) अतिरिक्त ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखा जुताई की जानी चाहिए।

(iv) सीढ़ीदार कृषि के साथ वृक्ष मेखला (Belt) का विकास किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3. लाल मिट्टी और लैटेराइट मिट्टी में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- लाल मिट्टी और लैटेराइट मिट्टी में अंतर निम्नलिखित हैं-

प्रश्न 4. मृदा अपरदन को नियंत्रित करने वाली विधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- मृदा अपरदन को नियंत्रित करने हेतु अनेक प्रकार की विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं जिनमें वृक्षारोपण, नदियों पर बाँध निर्माण, पशुओं की नियंत्रित चराई पर रोक, ढाल के विपरीत जुताई, जल निकासी की उचित व्यवस्था, खेतों में हरी खाद फसलें उगाना, नाली व गड्ढों को समतल बनाना, वन संरक्षण व जल के बहाव मार्गों का निर्माण प्रमुख हैं। ये विधियाँ मैदानी भागों में प्रयोग में लायी जा सकती हैं।

पहाड़ी क्षेत्रों में वनोन्मूलन, अति पशुचारण, निर्माण और खनन जैसे मानवीय तत्त्व तथा पवन, हिमनदी व जल आदि प्राकृतिक तत्त्व मृदा अपरदन के लिए उत्तरदायी हैं। पहाड़ी क्षेत्रों पर मानवीय क्रियाओं को नियंत्रित करने के अतिरिक्त ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के समानांतर जुताई, सीढ़ीदार कृषि मेखला (Belt) का विकास करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

प्रश्न 5. संसाधनों से आप क्या समझते हैं?

उत्तर – प्रकृति प्रदत्त निःशुल्क उपहार जैसे मृदा, जल, वायु, सूर्य का प्रकाश, पेड़-पौधे, खनिज पदार्थ, जंगली पशु आदि जिनसे मानव की अनेक आवश्यकताएँ पूर्ण होती हैं या उसके लिए उपयोगी होते हैं अथवा उपयोगिता में सहायक होते हैं, ‘संसाधन’ कहलाते हैं। प्रकृति ने मानव को अमूल्य प्राकृतिक उपहार प्रदान किए हैं, परंतु इन्हें मानव के लिए उपयोगी बनाने में कुछ महत्त्वपूर्ण तत्वों का हाथ रहता है। स्वास्थ्य इच्छाशक्ति, तकनीकी ज्ञान एवं राष्ट्रीय संगठन आदि ऐसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। संसाधन का अर्थ केवल प्राकृतिक तत्त्व ही नहीं है, अपितु मानवीय या सांस्कृतिक तथ्य भी महत्त्वपूर्ण संसाधन होते हैं। इस प्रकार कोई भी वह वस्तु, जो मानव के लिए उपयोगी हो अथवा उपयोगिता में सहायक हो, संसाधन कहलाती है।

प्रश्न 6. प्राकृतिक संसाधनों की चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर- प्राकृतिक संसाधनों की चार विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- (i) प्राकृतिक संसाधन नैसर्गिक रूप से प्रकृति द्वारा निर्मित होते हैं। इनके मूलस्वरूप का निर्माण मानव द्वारा नहीं किया जा सकता।

(ii) प्राकृतिक संसाधनों की सहायता से मानव के हितों की पूर्ति करने वाली विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का निर्माण किया जाता है।

(iii) किसी देश के प्राकृतिक संसाधन प्रायः वैश्विक परिप्रेक्ष्य में उसकी स्थिति का निर्धारण करते हैं। इसी आधार पर संबंधित देश विकसित अथवा विकासशील कहलाते हैं।

(iv) प्राकृतिक संसाधनों का वितरण एक समान नहीं होता, कहीं पर ये अधिक तो कहीं पर कम पाए जाते हैं।

प्रश्न 7. मृदा अपरदन के लिए उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- मृदा अपरदन के लिए उत्तरदायी कारण निम्नलिखित हैं-

(i) वृक्षों का अविवेकपूर्ण कटान ।

(ii) वानस्पतिक क्षेत्र का विस्तार / फैलाव घटना ।

(iii) वनों में आग लगना।

(iv) मृदा अपरदन की क्रिया तीव्र करने वाली फसलों को उगाना।

(v) त्रुटिपूर्ण फसल चक्र अपनाना।

(vi) क्षेत्र ढलान की दिशा में कृषि कार्य करना ।

उपर्युक्त में से कोई एक या अनेक वस्तुस्थितियाँ सम्मिलित रूप से मृदा अपरदन के लिए उत्तरदायी हो सकती हैं।

प्रश्न 8. काली मृदा का निर्माण और उसकी विशेषताएँ बताइए।

उत्तर- ज्वालामुखी उद्गार के समय धरातल पर फैले लावा के शीतल होने तथा उसके अपक्षय से काली मृदा का निर्माण होता है। काली मृदा की विशेषताएँ-

(i) इसमें नमी काफी समय तक बनाये रखने की क्षमता होने के कारण सिंचाई की कम आवश्यकता होती है।

(ii) यह मृदा कपास के लिए उत्तम है अतः इसे कपास मृदा भी कहते हैं।

(ii) इसका स्थानीय नाम रेंगड़ मृदा है।

(iv) काली मृदा बहुत ही महीन कणों वाली चीका मृदा है।

(v) इसमें पानी पड़ने पर यह चिपचिपी हो जाती है तथा सूखने पर इसमें दरार पड़ जाती है।

(vi) इसमें लोहांश अधिक होता है। मैग्नीशियम की मात्रा भी खूब पायी जाती है।

प्रश्न 9. कल्पना करें कि तेल संसाधन खत्म होने पर इनका हमारी जीवन शैली पर क्या प्रभाव होगा?

उत्तर- यदि तेल संसाधन खत्म हो जाएँ तो इनका हमारी जीवन शैली पर निम्नलिखित रूप से प्रभाव पड़ेगा-

(i) परिवहन तंत्र सर्वाधिक प्रभावित होगा।

(ii) हमें पैदल अथवा साइकिल से विद्यालय जाना पड़ेगा।

(ii) लोग अपने ऑफिस व अन्य स्थानों पर समय पर नहीं पहुँच पाएँगे।

(iv) वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं पहुँचाई जा सकेंगी।

(v) सब्जियाँ व दैनिक उपयोग की वस्तुएँ महँगी हो जाएँगी।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. संसाधनों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर-

संसाधनों का वर्गीकरण

संसाधनों का वर्गीकरण कई प्रकार से किया जाता है; जैसे- प्राकृतिक और मानव निर्मित संसाधन यह संसाधनों का सामान्य वर्गीकरण है। विभिन्न आधारों पर संसाधनों का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है-

(i) उत्पत्ति के आधार पर – जैव और अजैव संसाधन ।

(ii) समाप्यता के आधार पर – नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य संसाधन ।

(iii) स्वामित्व के आधार पर- व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संसाधन ।

(iv) विकास स्तर के आधार पर- संभावी विकसित, भंडार और संचित कोष संसाधन ।

संसाधनों का सामान्य वर्गीकरण

(i) प्राकृतिक संसाधन- ये संसाधन प्रकृति प्रदत्त निःशुल्क, उपहारस्वरूप हैं। सूर्यातप, भूमि, जल, वायु, वन, वन्यजीव, खनिज, ऊर्जा स्त्रोत आदि की गणना प्राकृतिक संसाधनों के अंतर्गत की जाती है। ये संसाधन जैविक (वनस्पति एवं जीव-जंतु) तथा अजैविक (खनिज, जल, मृदा) संसाधन हैं।

(ii) मानव निर्मित संसाधन – मानव द्वारा निर्मित संसाधनों को ‘मानवकृत संसाधन’ कहा जाता है मशीनें, भवन, सड़कें, रेलमार्ग, कृषि फार्म, कारखाने औद्योगिक उत्पादन प्रौद्योगिकी आदि इसी प्रकार के संसाधन हैं।

(iii) नवीकरणीय संसाधन – कुछ संसाधन ऐसे होते हैं जो एक बार उपयोग कर लिए जाने के उपरांत स्वयं पुनः बन जाते हैं। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि इसी श्रेणी में सम्मिलित हैं।

(iv) अनवीकरणीय संसाधन – ये ऐसे संसाधन होते हैं जो एक बार उपयोग में लाए जाने के बाद सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं तथा उनका पुनरुत्पादन नहीं किया जा सकता। कोयला, खनिज तेल आदि इसके मुख्य उदाहरण हैं।

प्रश्न 2. क्या राष्ट्रों का भावी विकास संसाधनों पर निर्भर करता है, विवेचना कीजिए।

उत्तर- राष्ट्रों का भावी विकास संसाधनों पर निर्भर है

राष्ट्रों का वर्तमान एवं भावी विकास संसाधनों पर ही निर्भर है। संसाधन किसी राष्ट्र की संपदा कहलाते हैं। ये देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास की आधारशिला है। वस्तुतः कोई भी वस्तु या तत्त्व तब तक संसाधन की श्रेणी में नहीं आ सकता, जब तक कि वह मानव के उद्देश्य की पूर्ति न करता हो अथवा पूर्ति में किसी प्रकार का सहयोग न देता हो। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय विकास में भूगर्भ में छिपे कोयले के विशाल भंडार उस समय तक संसाधन नहीं थे जब तक कि मानव को कोयले की उपयोगिता का ज्ञान न था, परंतु जैसे ही मनुष्य को कोयले की उपयोगिता का ज्ञान हुआ, यह काला पदार्थ उसके लिए महत्त्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन बन गया जो आज राष्ट्रों के विकास का मानक है। मानव की आवश्यकताएँ सर्वत्र समान नहीं होती हैं। उनके सांस्कृतिक तथा तकनीकी विकास के स्तर के अनुरूप संसाधनों में अंतर पाया जाता है। शैल, खनिज पदार्थ, मृदा, जल, वायु, सूर्य का प्रकाश, वन व जीव-जंतु आदि पर्यावरण के प्रमुख तत्त्व हैं, जिनसे मानव की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, परंतु इन सभी प्राकृतिक संसाधनों का विकास उस देश या प्रदेश के निवासियों के कौशल और तकनीकी ज्ञान पर ही निर्भर करता है।

परिवहन के साधन आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, ट्रांस-साइबेरियन रेलमार्ग के विकास तथा कृषि के लिए आधुनिक यंत्रों एवं उपकरणों के आविष्कार के पश्चात् साइबेरिया के विशाल मैदानों में उन्नत कृषि की जाने लगी है। तकनीकी विकास के फलस्वरूप नदियों पर बड़े-बड़े बाँध बनाकर कृत्रिम जल प्रपातों द्वारा जल विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जाने लगा है।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि संसाधन राष्ट्रों के भावी विकास के आधार हैं। परंतु इसके लिए अत्यंत आवश्यक है कि कोई भी पदार्थ, वस्तु घटना या विचार तभी राष्ट्रीय विकास में सहयोग दे सकता है जब मानव प्राकृतिक संसाधनों को विकास की दिशा देने की सूझ-बूझ रखता हो।

प्रश्न 3. भूमि किस प्रकार बहुत महत्त्वपूर्ण संसाधन है? विस्तारपूर्वक समझाइए |

उत्तर- प्रकृति द्वारा दिए गए उपहारों में निस्संदेह भूमि सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन है। इस बात की सत्यता निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है-

(i) यह भूमि ही है जिस पर हम सभी रहते हैं और इससे ही अपनी बहुत-सी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

(ii) यह भूमि ही है जहाँ व्यक्ति अपनी कृषि संबंधी विभिन्न प्रकार की गतिविधियों द्वारा अपने खाने के लिए अनाज पैदा करते हैं और तरह-तरह की फल-सब्जियों द्वारा अपने आहार को पोषण युक्त बनाते हैं। भारत में हर प्रकार की जलवायु पायी जाती है इसलिए मानव अपनी सभी खाद्य समस्याएँ आसानी से हल कर लेता है।

(iii) अपनी सभी औद्योगिक गतिविधियों के लिए भी मानव भूमि पर निर्भर होते हैं। अपने कारखानों को चलाने के लिए सभी प्रकार की सामग्री उसे भूमि से ही प्राप्त होती है रुई और पटसन जैसे कच्चे माल की प्राप्ति भी उसे भूमि पर कार्य करने से होती है। जिस पर उसका कपड़ा उद्योग खड़ा है। लोहा-इस्पात के कारखानों के लिए उसे धातुओं के रूप में कच्चा माल भूमि से ही प्राप्त होता है।

(iv) अपनी निवास संबंधी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी मानव भूमि पर ही निर्भर करता है। उसके सभी मकान, कार्यालय, कारखाने भूमि पर ही बने होते हैं और भूमि से प्राप्त पदार्थों से ही इनका निर्माण होता है।

(v) भूमि पर वन हैं जिनकी लकड़ी ईंधन से लेकर भवन बनाने तक के कार्यों में मनुष्य द्वारा उपयोग की जाती है।

(vi) भूमि पर ही परिवहन और संचार के सभी साधन स्थित होते हैं। सड़कें, रेलें, पुल आदि सभी भूमि पर बने होते हैं।

प्रश्न 4. संसाधन से आप क्या समझते हैं? संसाधनों के संरक्षण के विभिन्न उपायों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर- संसाधन से आशय

हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वे सभी वस्तुएँ, जो मनुष्य की आवश्यकता की पूर्ति में प्रयुक्त की जा सकती हैं तथा जिनको उपयोग में लाने की प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, संसाधन कहलाती हैं।

संसाधन संरक्षण

मानव द्वारा संसाधनों के प्रबंधन को संरक्षण कहते हैं। विश्व में अधिकांश संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं अतः उनका कम मात्रा में अधिक एवं सुरक्षित उपयोग करना संरक्षण कहलाता है। दूसरे शब्दों में, “प्राकृतिक संसाधनों का कम से कम मात्रा में अधिकतम उपयोग ही संसाधन संरक्षण है।” वास्तव में, संसाधन संरक्षण में भावी पीढ़ी की आवश्यकता और आकांक्षाओं का भाव भी निहित है। अतः हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का न्यायसंगत और योजनाबद्ध उपयोग ही संरक्षण है। मानव ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अधिक और उनके संरक्षण की चिंता किए बिना उनका अंधाधुंध उपयोग किया है। इसके कुछ अपवाद भी हैं। कई समुदाय अपने निजी प्रयासों से पेड़-पौधों और पशुओं का अपने तरह से संरक्षण करने में जुटे हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान में विश्नोई जाति के लोग पेड़-पौधों और पशुओं के संरक्षण के लिए कुछ सिद्धांतों का अनुसरण करते हैं।

संसाधन हमारे पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। इनके सही उपयोग से ही पर्यावरण को संतुलित बनाए रखा जा सकता है। संसाधनों के दुरुपयोग और आवश्यकता से अधिक उपयोग से पर्यावरण असंतुलित हो जाता है। नवीकरण योग्य संसाधनों के सही उपयोग से समस्याएँ कम उत्पन्न होती हैं। आवश्यकता से अधिक संसाधनों का उपयोग वर्तमान पर्यावरण की बरबादी का कारण बनता है। अनवीकरणीय संसाधनों के प्रति तो और अधिक सावधानी बरतन की आवश्यकता है क्योंकि इन्हें पुनः नहीं बनाया जा सकता है। हमें इनके संरक्षण के लिए अधिकाधिक उपाय करने चाहिए।

प्रश्न 5. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए—

(i) भारत में भूमि उपयोग प्रारूप का वर्णन करें। सन् 1960-61 में वन के अंतर्गत क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई, इसका क्या कारण है?

(ii) प्रौद्योगिक और आर्थिक विकास के कारण संसाधनों का अधिक उपयोग कैसे हुआ है?

उत्तर- (i) भारत में भूमि उपयोग प्रारूप – भारत का कुल भूमि क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी है। परंतु इसके 93% भू-भाग के ही भूमि उपयोग आँकड़े उपलब्ध हैं। उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत में भूमि उपयोग संतुलित नहीं है। सन् 2014-15 के आँकड़ों से स्पष्ट है कि भूमि का सर्वाधिक 45.5% उपयोग शुद्ध बोए गए क्षेत्र के अंतर्गत तथा सबसे कम उपयोग 19% विविध वृक्ष एवं उपवनों के अंतर्गत हैं। इसके अतिरिक्त वनों के अंतर्गत 23.3% क्षेत्र है। स्थायी चरागाहों के अंतर्गत भी भूमि कम है। अतः भूमि उपयोग का यह प्रारूप देश में असंतुलित प्रारूप को प्रकट करता है। देश में भूमि उपयोग का यह प्रारूप राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर भी संतुलित रूप में नहीं है। इसलिए भारत जैसे अधिक जनसंख्या और सीमित भूमि संसाधन वाले देशों में नियोजित व संतुलित भूमि उपयोग प्रारूप स्थापित करने की अधिक आवश्यकता है।

वन क्षेत्र में सीमित वृद्धि – भारत में वन क्षेत्र पर्याप्त एवं संतुलित नहीं है। वर्ष 2014-15 में देश में 23% भाग पर वन क्षेत्र हैं किंतु इसे कदापि संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि के कारण कृषि और गैर कृषि कार्यों में भूमि की आवश्यकता को पूरा करने के लिए भी वनों को बड़ी बेरहमी से काटा गया है। वास्तव में यदि देश में वननीति और वन संरक्षण अधिनियम न बने होते तो वनों का विनाश और भी तेजी से होता। देश में वनों को काटने की चाहत का प्रभावी होना एवं वन संरक्षण के प्रति उदासीनता ही आज वास्तव में सीमित वन क्षेत्रों के लिए उत्तरदायी कारण है।

(ii) किसी क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थाओं के तदनुरूप परिवर्तन के अभाव में मात्र संसाधनों की उपलब्धता से विकास संभव नहीं है। देश में बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जो संसाधनों में समृद्ध होते हुए भी प्रौद्योगिकी के अभाव में संसाधनों का पर्याप्त उपयोग नहीं कर पाए हैं और विकास में पिछड़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश जल एवं वन संसाधन की दृष्टि से संपन्न राज्य है किंतु उचित प्रौद्योगिकी के अभाव में इन संसाधनों का यहाँ पर्याप्त उपयोग नहीं किया जा रहा है जबकि यही संसाधन एवं भौगोलिक परिस्थिति स्विट्ज़रलैंड के पास हैं और वहाँ इनको पर्यटन के रूप में ही नहीं, आर्थिक विकास की दृष्टि से भी प्रौदयोगिकी उपयोग से विकसित किया गया है। अतः यह कहना उचित है कि प्रौद्योगिकी आर्थिक विकास को गति प्रदान करती है तथा इन दोनों के द्वारा संसाधनों का अधिक मात्रा में उपयोग होने लगता है। वास्तव में प्रौद्योगिकी और आर्थिक विकास दोनों ही संसाधनों के उचित उपयोग के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। विकसित देशों के पास यह दोनों ही उपलब्ध हैं इसलिए ये देश अपने ही संसाधनों का नहीं बल्कि विश्व के अन्य देशों के संसाधनों को भी आयात करके उनका उपयोग कर रहे हैं।

प्रश्न 6. संसाधन का क्या अर्थ है? संसाधनों के नियोजन की क्या आवश्यकता है?

उत्तर- संसाधन का अर्थ

हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वे सभी वस्तुएँ, जो मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति में प्रयुक्त की जा सकती हैं तथा जिनको उपयोग में लाने की प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, संसाधन कहलाती हैं। ये वस्तुएँ आर्थिक रूप से संभाव्य एवं सांस्कृतिक रूप से मान्य होती हैं। मानव प्राकृतिक पदार्थों के साथ प्रौद्योगिकी द्वारा अंतर्क्रिया करके आर्थिक विकास की गति तेज करने के लिए संसाधनों का प्रयोग करता है। अतः संसाधन मात्र प्राकृतिक उपहार नहीं बल्कि मानवीय क्रियाओं का परिणाम हैं। इसलिए मानव को सबसे बड़ा संसाधन माना जाता है क्योंकि मानव के ज्ञान के द्वारा ही प्रत्येक प्राकृतिक पदार्थ रूपांतर प्रक्रिया द्वारा संसाधनों की श्रेणी में सम्मिलित होता है।

संसाधन नियोजन का अर्थ- संसाधन नियोजन वह कला अथवा तकनीक है, जिसके द्वारा हम अपने संसाधनों का प्रयोग विवेकपूर्ण ढंग से करते हैं।

संसाधन नियोजन की आवश्यकता अथवा संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का महत्त्व- संसाधन नियोजन निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है-

(i) संसाधन सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं इसलिए उनका नियोजन आवश्यक है जिससे उन्हें हम स्वयं भी उचित ढंग से प्रयोग करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रखें।

(ii) संसाधन न केवल सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं वरन् उनकी उपलब्धता में काफी विभिन्नता और विविधता पायी जाती हैं, भारत जैसे देश में बहुत से ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ एक तरह के संसाधनों की प्रचुरता है परंतु दूसरी तरह के संसाधनों की कमी। संसाधन नियोजन की प्रक्रिया से देश के प्रत्येक राज्य का समान और संतुलित विकास संभव हो सकता है।

(iii) संसाधन नियोजन से उनका विनाश रोका जा सकता है और देश की मूल्यवान संपदा का संरक्षण किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से वृक्षों को अंधाधुंध काटना और वन्य प्राणियों का विनाश रोका जा सकता है। अन्यथा लोग अपने लालच के लिए संसाधनों का दुष्प्रयोग कर सकते हैं और राष्ट्रीय संपदा का विनाश कर सकते हैं।

(iv) संसाधनों के नियोजन से देश के विकास से संबंधित योजनाओं को सफल बनाया जा सकता है।

इस प्रकार संसाधन नियोजन देश के निरंतर और निश्चित विकास के लिए आवश्यक है।

मानचित्र संबंधी प्रश्न

भारत के रेखा मानचित्र में मृदा के प्रमुख प्रकारों को इंगित कीजिए ।

उत्तर-

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