Chapter 10 आओ, मिलकर बचाएँ

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

कविता के साथ

प्रश्न. 1.
माटी का रंग प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर:
कवयित्री ने ‘माटी का रंग’ प्रयोग करके स्थानीय विशेषताओं को उजागर करना चाहा है। संथाल परगने के लोगों में जुझारूपन, अक्खड़ता, नाच-गान, सरलता आदि विशेषताएँ जमीन से जुड़ी हैं। कवयित्री चाहती है कि आधुनिकता के चक्कर में हम अपनी संस्कृति को हीन न समझे। हमें अपनी पहचान बनाए रखनी चाहिए।

प्रश्न, 2.
भाषा में झारखंडीपन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
झारखंडी’ का अभिप्राय है- झारखंड के लोगों की स्वाभाविक बोली। कवयित्री का मानना है कि यहाँ के लोगों को अपनी क्षेत्रीय भाषा को बाहरी भाषा के प्रभाव से मुक्त रखना चाहिए। उसके विशिष्ट उच्चारण व स्वभाव को बनाए रखना चाहिए।

प्रश्न. 3.
दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?
उत्तर:
दिल का भोलापन सच्चाई और ईमानदारी के लिए जरूरी है, परंतु हर समय भोलापन ठीक नहीं होता। भोलेपन का फायदा उठाने वालों के साथ अक्खड़पन दिखाना भी जरूरी है। अपनी बात को मनवाने के लिए अकड़ भी होनी चाहिए। साथ ही कर्म करने की प्रवृत्ति भी आवश्यक है। अत: कवयित्री भोलेपन, अक्खड़पन व जुझारूपन-तीनों गुणों को बचाने की आवश्यकता पर बल देती है।

प्रश्न. 4.
प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?
उत्तर:
कविता में प्रकृति के विनाश एवं विस्थापन के कठिन दौर के साथ-साथ संथाली समाज की अशिक्षा, कुरीतियों और शराब की ओर बढ़ते झुकाव को भी व्यक्त किया गया है जिसमें पूरी-पूरी बस्तियाँ डूबने जा रही हैं।

प्रश्न. 5.
इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है-से क्या आशय है?
उत्तर:
कवयित्री का कहना है कि आज के विकास के कारण भले ही मानवीय मूल्य उपेक्षित हो गए हों, प्राकृतिक संपदा नष्ट हो रही है, परंतु फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे अपने प्रयत्नों से बचा सकते हैं। लोगों का विश्वास, उनकी टूटती उम्मीदों को जीवित करना, सपनों को पूरा करना आदि ऐसे तत्व हैं, जिन्हें सामूहिक प्रयासों से बचाया जा सकता है।

प्रश्न. 6.
निम्नलिखित पंक्तियों के काव्य-सौंदर्य को उद्घाटित कीजिए:
(क) ठंडी होती दिनचर्या में,
जीवन की गर्माहट
(ख) थोड़ा-सा विश्वास
थोड़ा-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ।
उत्तर:
(क) इस पंक्ति में कवयित्री ने आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापन की पीड़ा को व्यक्त किया है। विस्थापन से वहाँ के लोगों की दिनचर्या ठंडी पड़ गई है। हम अपने प्रयासों से उनके जीवन में उत्साह जगा सकते हैं। यह काव्य पंक्ति लाक्षणिक है। इसका अर्थ है-उत्साहहीन जीवन। ‘गर्माहट’ उमंग, उत्साह और क्रियाशीलता का प्रतीक है। इन प्रतीकों से अर्थ गंभीर्य आया है। शांत रस विद्यमान है। अतुकांत अभिव्यक्ति है।
(ख) इस अंश में कवयित्री अपने प्रयासों से लोगों की उम्मीदें, विश्वास व सपनों को जीवित रखना चाहती है। समाज में बढ़ते अविश्वास के कारण व्यक्ति का विकास रुक-सा गया है। वह सभी लोगों से मिलकर प्रयास करने का आहवान करती है। उसका स्वर आशावादी है। ‘थोड़ा-सा’; ‘थोड़ी-सी’ वे ‘थोड़े-से’ तीनों प्रयोग एक ही अर्थ के वाहक है। अतः अनुप्रास अलंकार है। दूर्द (उम्मीद), संस्कृत (विश्वास) तथा तद्भव (सपने) शब्दों को मिला-जुला प्रयोग किया है। तुक, छंद और संगीत विहीन होते हुए कथ्य में आकर्षण है। खड़ी बोली है।

प्रश्न. 7.
बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है?
उत्तर:
बस्तियों को शहर की नग्नता व जड़ता से बचाने की जरूरत है। स्वभावगत, वेशभूषा व वनस्पति विहीन नग्नता से बचाने का प्रयास सामूहिक तौर पर हो सकता है। शहरी जिंदगी में उमंग, उत्साह व अपनेपन का अभाव होता है। शहर के लोग अलगाव भरी जिंदगी व्यतीत करते हैं।

कविता के आस-पास

प्रश्न. 1.
आप अपने शहर या बस्ती की किन चीज़ों को बचाना चाहेंगे?
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

प्रश्न. 2.
आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करें।
उत्तर:
आदिवासी समाज आज स्वयं को आधुनिक बनाने के चक्कर में अपनी मौलिकता खो रहा है। स्वयं को पिछड़ा मानकर हीनभाव से ग्रस्त हो वे अपनी धरती की गंध भूलते जा रहे हैं, पर आज भी वहाँ शिक्षा और कुरीतियों के कारण पीढ़ियाँ बिगड़ रही हैं।

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न. 1.
शहरी जीवन भाग-दौड़ भरा होने पर भी कवयित्री उसे ठंडी दिनचर्या क्यों मानती हैं?
उत्तर:
शहर में काम की भाग-दौड़ तो बहुत है, पर सामाजिक संबंधों, भावों, प्रेम एवं सौहार्द का अभाव है। आडंबर से भरे शहरी जीवन में गायन-नृत्य, प्रकृति के सान्निध्य का अभाव है। इसी से जीवन दिखावा मात्र है। परस्पर स्नेह के अभाव में गर्माहट नहीं आ सकती। इसीलिए कवयित्री ठंडी होती दिनचर्या को अपनी बस्ती से दूर रखना चाहती है।

प्रश्न, 2.
कविता में वर्णित संथालों के हथियारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कविता में धनुष, तीर, कुल्हाड़ी आदि हथियारों का उल्लेख किया गया है। जब कवयित्री कहती हैं कि हमें धनुष की डोरी, तीर का नुकीलापन और कुल्हाड़ी की धार को बचाना है तो हमें यह अनुभव होता है कि ये पारंपरिक हथियार भी संथालों की पहचान हैं।

प्रश्न. 3.
शहरी प्रभाव के कारण प्राकृतिक वातावरण में क्या परिवर्तन हो रहे हैं?
उत्तर:
शहरी प्रभाव के कारण संथाल बस्तियों में विस्थापन की समस्या आ रही है। जंगल की ताज़ी हवा, नदियों का स्वच्छ जल, पहाड़ों की मौन शांति, मिट्टी की सुगंध, फ़सलों की लहलहाहट, खुले आँगन, मैदान और चरागाह समाप्त होते जा रहे हैं। इससे बच्चे, बूढे और पशु सभी के लिए अभावग्रस्त स्थिति पैदा हो गई है।

प्रश्न. 4.
वर्तमान परिवेश के लिए क्या कहा गया है?
उत्तर:
वर्तमान परिवेश को अविश्वास भरा दौर कहा गया है।

प्रश्न. 5.
आज के दौर में कवयित्री क्या बचाकर या जीवित रखना चाहती है?
उत्तर:
कवयित्री थोड़ी-सी उम्मीद, विश्वास और थोड़े सपने जीवित रखना चाहती है।

प्रश्न. 6.
कविता में किसे बचाने की बात की जा रही है?
उत्तर:
कविता में कहा गया है कि अब भी हमारे पास बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है, उसी को बचाने की बात कही जा रही है।

प्रश्न. 7.
बस्ती को ‘बचाएँ डूबने से आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
बस्ती के डूबने का अर्थ है-पारंपरिक रीति-रिवाजों का लोप हो जाना और मौलिकता को खोकर विस्थापन का निरंतर बढ़ना-यह बड़ी चिंता का विषय है। इस प्रकार आदिवासियों की धरोहरे का लुप्त होना डूबने के समान है।

प्रश्न. 8.
संथाल बस्तियों की किन विशेषताओं का ज्ञान आपको कविता के माध्यम से हुआ?
उत्तर:
संथाल बस्तियाँ आदिवासियों की बस्तियाँ हैं। ये लोग अपनी मिट्टी और प्रकृति से जुड़े हुए हैं। इनकी जिंदगी में आडंबर और दिखावे के लिए कहीं भी स्थान नहीं है। ये मन से भोले, अक्खड़ और जुझारू होते हैं। गाना और नाचना इनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग है। परस्पर प्रेम और विश्वास इनकी जीवन-शैली है।

प्रश्न, 9.
शहरी प्रभाव में आकर संथाल आदिवासियों में क्या परिवर्तन हो रहे हैं?
उत्तर:
संथाल लोग शहरी संपर्क में आकर अपनी प्रकृति से जुड़ी परंपरा को छोड़ रहे हैं। अपनी भाषा के प्रति उनका लगाव कम हो रहा है और वे भी दिखावे की ओर बढ़ रहे हैं। नाचना-गाना, मन का भोलापन, प्रकृति से लगाव, पहाड़ों का आनंददायक जीवन आदि सभी से वे दूर होते जा रहे हैं।

प्रश्न. 10.
‘आओ मिलकर बचाएँ’ कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता की रचना संथाल आदिवासी परिवार में जन्मी कवयित्री निर्मला पुतुल दुवारा की गई है। इस कविता में प्रकृति और सामाजिक व्यवस्था को बचाने के लिए प्रयास करने का आह्वान किया गया है। कवयित्री को लगता है कि हम अपनी पारंपरिक भाषा, भावुकता, भोलापन, ग्रामीण संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। प्राकृतिक नदियाँ, पहाड़, मैदान, मिट्टी, फ़सल, हवाएँ आधुनिकता का शिकार हो रही हैं। हमें इन सबको बचाना है। कवयित्री के अनुसार आजकल के परिवेश में बढ़ रहे विकारों को हमें मिटाना है और उसके स्थान पर प्राचीन संस्कारों और प्राकृतिक उपादानों को बचाना है। निराश होने की बात नहीं, अभी हमारे पास बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है।

प्रश्न. 11.
आओ, मिलकर बचाएँ’ कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।
उत्तर:
इस कविता में दोनों पक्षों का यथार्थ चित्रण हुआ है। वृहत्तर संदर्भ में यह कविता समाज में उन चीजों को बचाने की बात करती है जिनका होना स्वस्थ सामाजिक परिवेश के लिए जरूरी है। प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज संकट में है, जो कविता का मूल स्वरूप है। कवयित्री को लगता है कि हम अपनी पारंपरिक भाषा, भावुकता, भोलेपन, ग्रामीण संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। प्राकृतिक नदियाँ, पहाड़, मैदान, मिट्टी, फ़सल, हवाएँ-ये सब आधुनिकता का शिकार हो रही हैं। आज के परिवेश में विकार बढ़ रहे हैं जिन्हें हमें मिटाना है। हमें प्राचीन संस्कारों और प्राकृतिक उपादानों को बचाना है। वह कहती है कि विनाश होने की बात नहीं है क्योंकि अभी भी बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है।

प्रश्न. 12.
लेखिका के प्राकृतिक परिवेश में कौन-से सुखद अनुभव हैं?
उत्तर:
लेखिका ने संथाल परगने के प्राकृतिक परिवेश में निम्नलिखित सुखद अनुभव बताए हैं –

  1. जंगल की ताज़ी हवा
  2. नदियों का निर्मल जल
  3. पहाड़ों की शांति
  4. गीतों की मधुर धुनें
  5. मिट्टी की स्वाभाविक सुगंध
  6. लहलहाती फ़सलें।