Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुह्रद्

पाठ परिचय : 

प्रस्तुत नाट्यांश महाकवि विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नामक नाटक के प्रथम अङ्क से उद्धृत किया गया है। नन्दवंश का विनाश करने के बाद उसके हितैषियों को खोज-खोजकर पकड़वाने के क्रम में चाणक्य अमात्य राक्षस एवं उसके कुटुम्बियों की जानकारी प्राप्त करने के लिए चन्दनदास से वार्तालाप करता है किन्तु चाणक्य को अमात्य राक्षस के विषय में कोई सुराग न देता हुआ चन्दनदास अपनी मित्रता पर दृढ़ रहता है। उसके मैत्री भाव से प्रसन्न होता हुआ भी चाणक्य जब उसे राजदण्ड का भय दिखाता है, तब चन्दनदास राजदण्ड भोगने के लिये भी सहर्ष प्रस्तुत हो जाता है। इस प्रकार अपने सुहृद् (मित्र) के लिए प्राणों का भी उत्सर्ग करने के लिए तत्पर चन्दनदास अपनी सुहृद्-निष्ठा का एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत करता है। 

पाठ के नाट्यांशों का सप्रसंग हिन्दी-अनुवाद- 

1. चाणक्यः – वत्स मणिकारश्रेष्ठिनं चन्दनदासमिदानीं द्रष्टुमिच्छामि। 
शिष्यः – तथेति (निष्क्रम्य चन्दनदासेन सह प्रविश्य) इतः इतः श्रेष्ठिन्। (उभौ परिक्रामतः) 
शिष्यः – (उपसृत्य) उपाध्याय! अयं श्रेष्ठी चन्दनदासः।  
चन्दनदासः – जयत्वार्यः। 
चाणक्यः – श्रेष्ठिन्! स्वागतं ते। अपि प्रचीयन्ते संव्यवहाराणां वृद्धिलाभा? 
चन्दनदासः – (आत्मगतम्) अत्यादरः शङ्कनीयः। (प्रकाशम्) अथ किम्। आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या। 
चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन्! प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः। 
चन्दनदासः – आज्ञापयतु आर्यः, किं कियत् च अस्मज्जनादिष्यते इति। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। मूलतः यह पाठ महाकवि विशाखदत्त विरचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नामक नाटक के प्रथम अंक से संकलित है। इस अंश में चाणक्य एवं चन्दनदास का वार्तालाप है, जिसमें अमात्य राक्षस के मित्र चन्दनदास को विरोधी प्रधानमंत्री चाणक्य के द्वारा आदर-सत्कार करने से सन्देह उत्पन्न होता है।
 
हिन्दी अनुवाद – 

 2. चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन्! चन्द्रगुप्तराज्यमिदं न नन्दराज्यम्। नन्दस्यैव अर्थसम्बन्धः प्रीतिमुत्पादयति। 
चन्द्रगुप्तस्य तु भवताम-परिक्लेश एव। 
चन्दनदासः – (सहर्षम्) आर्य! अनुगृहीतोऽस्मि। 
चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन्! स चापरिक्लेशः कथमाविर्भवति इति ननु भवता प्रष्टव्याः स्मः। 
चन्दनदासः – आज्ञापयतु आर्यः। 
चाणक्यः – राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव। 
चन्दनदासः – आर्य! कः पुनरधन्यो राज्ञो विरुद्ध इति आर्येणावगम्यते ? 
चाणक्यः – भवानेव तावत् प्रथमम्।
चन्दनदासः – (कर्णी पिधाय) शान्तं पापम्, शान्तं पापम्। कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोधः? 
चाणक्यः – अयमीदृशो विरोधः यत् त्वमद्यापि राजापथ्यकारिणोऽमात्य-राक्षसस्य गृहजनं स्वगृहे 
रक्षसि। चन्दनदासः – आर्य! अलीकमेतत्। केनाप्यनार्येण आर्याय निवेदितम्। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ शीर्षक पाठ से उद्धत है। मूलतः यह पाठ महाकवि विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नामक नाटक के प्रथम अंक से संकलित किया गया है। इसमें चन्दनदास के रूप में सुहृद्-निष्ठा (मित्रता) का एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत हुआ है। वह मित्र के लिए अपने प्राणों का भी उत्सर्ग करने हेतु तत्पर हो जाता है। इस अंश में चाणक्य अपने शत्रु राजा के अमात्य राक्षस एवं उसके परिवार के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के लिए चन्दनदास से वार्तालाप करता है। 

हिन्दी अनुवाद – 

3. चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन्! अलमाशङ्कया। भीताः पूर्वराजपुरुषाः पौराणामिच्छतामपि गृहेषु गृहजनं 
निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति। ततस्तत्प्रच्छादनं दोषमुत्पादयति। 
चन्दनदासः – एवं नु इदम्। तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति। 
चाणक्यः – पूर्वम् ‘अनृतम्’, इदानीम् ‘आसीत्’ इति परस्परविरुद्धे वचने। 
चन्दनदासः – आर्य! तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षस्य गृहजन इति। 
चाणक्यः – अथेदानी क्व गतः? 
चन्दनदासः – न जानामि। 
चाणक्यः – कथं न ज्ञायते नाम? भो श्रेष्ठिन्! शिरसि भयम्, अतिदूरं तत्प्रतिकारः।
 
कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ महाकवि विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नामक नाटक के प्रथम अंक से संकलित किया गया है। इसमें चन्दनदास के रूप में सुहृद्-निष्ठा (मित्रता) का एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत हुआ है। वह मित्र के लिए अपने प्राणों का भी उत्सर्ग करने हेतु तत्पर, हो जाता है। इस अंश में चाणक्य द्वारा चन्दनदास को भय दिखलाकर अमात्य राक्षस के परिवार के विषय में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया गया है। 

हिन्दी अनुवाद –

4. चन्दनदासः – आर्य! किं मे भयं दर्शयसि? सन्तमपि गेहे अमात्यराक्षस्य गृहजनं न समर्पयामि, किं – पुनरसन्तम् ? 
चाणक्यः – चन्दनदास! एष एव ते निश्चयः? 
चन्दनदासः – बाढम्, एष एव मे निश्चयः। 
चाणक्यः – (स्वगतम्) साधु! चन्दनदास साधु। 
सुलभेष्वर्थलाभेषु, परसंवेदने जने। 
क इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना॥

श्लोक का अन्वय – परस्य संवेदने अर्थलाभेषु सुलभेषु इदं दुष्करं कर्म जने (लोके) शिविना विना क: कुर्यात्। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत नाट्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। मूलतः यह पाठ महाकवि विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नामक नाटक के प्रथम अंक से संकलित किया गया है। इसमें चन्दनदास के रूप में सुहृद्-निष्ठा (मित्रता) का एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत हुआ है। वह मित्र के लिए अपने प्राणों का भी उत्सर्ग करने हेतु तत्पर हो जाता है। इस अंश में अपने मित्र धर्म के लिए प्राणों का भी उत्सर्ग करने हेतु तत्पर चन्दनदास की चाणक्य मन ही मन प्रशंसा करता है। 

हिन्दी अनुवाद – 

चन्दनदास – हे आर्य! आप मुझे क्या भय दिखा रहे हो? मेरे घर में अमात्य राक्षस के परिवार के होने पर भी मैं उसे समर्पित नहीं करूँगा, फिर नहीं होने पर तो क्या कर सकता हूँ? 
चाणक्य – चन्दनदास! क्या यही तुम्हारा निश्चय है ? 
चन्दनदास – हाँ, यही मेरा निश्चय है।  
चाणक्य – (अपने ही मन में) शाबास चन्दनदास! शाबास। दूसरों की वस्तु को समर्पित करने पर बहुत धन प्राप्त होने की स्थिति में भी दूसरों की वस्तु की सुरक्षा रूपी कठिन कार्य को एक (दानवीर राजा) शिवि को छोड़कर दूसरा कौन कर सकता है? 
श्लोक का आशय – इस श्लोक के द्वारा महाकवि विशाखदत्त ने बड़े ही संक्षिप्त शब्दों में चन्दनदास के गुणों का वर्णन किया है। इसमें कवि ने कहा है कि दूसरों की वस्तु की रक्षा करनी कठिन होती है। यहाँ चन्दनदास के द्वारा अमात्य राक्षस के परिवार की रक्षा का कठिन काम किया गया है। न्यासरक्षण को महाकवि भास ने भी दुष्कर कार्य मानते हुए स्वप्नवासवदत्तम् में कहा है-दुष्करं न्यासरक्षणम्। 

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