Chapter 12 व्यक्ति के व्यक्तित्व पर बाल्यावस्था का प्रभाव

बहुविकल्पीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
व्यक्तित्व की अवधारणा में निहित है।
या
व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान कैसे करेंगे?
(a) यति याविक गुण
(b) व्यक्ति के बाम गुण
(c) की के आन्तरिक र बाह्न गुण
(d) उपरीका में से कोई नहीं
उतर:
(c) गत अक और बाहा गुम।

प्रश्न 2.
वंशानुक्म किस रूप में व्यक्तित्व को प्रभावित करता है?
(a) लिंग निर्धारण
(b) शारीरिक विशेषताएँ
(c) शैक्षिक प्रतिभा
(d) ये सभी
उतर:
(d) ये सभी

प्रश्न 3.
बाल्यावस्था मानी जाती हैं
(a) 1 से 6 वर्ष
(b) 6 से 12 वर्ष
(c) 13 से 18 वर्ष
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) 6 से 12 वर्ष

प्रश्न 4.
व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक है।
(a) परिवार का प्रभाव
(b) स्कूल का प्रभाव
(c) माता-पिता का प्रभाव
(d) ये सभी
उत्तर
(d) ये सभी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1.
व्यक्तित्व का अर्थ बताते हुए परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
व्यसा की आतरिक एवं बाह्य विशेषताओं का समन्वित एवं संगठित रूप ही व्यक्तित्व है। आँपोर्ट के अनुसार, “कात के अन्दा न मनोदैहिक गुणों का
त्यात्मक संगठन है, जो परिवेश के प्रति होने वाली अपुर्व अभियोजना का निर्णय

प्रश्न 2.
श्रेष्ठ व्यक्तित्व की चार मुख्य विशेषताओं को बताएँ। (2013)
अथव 
सन्तुलित व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए। (2007)
उत्तर:
सन्तुलित एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं।

प्रश्न 3.
बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले दो मुख्य कारक कौन-कौन से हैं? (2012)
उत्तर:
बालक के व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले दो मुख्य कारक निम्न हैं।

प्रश्न 4.
व्यक्तित्व के विकास की विभिन्न अवस्था लिखिए। (2014)
उत्तर:
व्यक्तित्व के विकास को मात्र चार अवस्थाएँ हैं ।

प्रश्न 5.
परिवार में बालक के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव किसका पड़ता है। (2004)
उत्तर:
परिवार में बालक के व्यक्तित्व पर सर्वाधिक प्रभाव माता-पिता का पड़ता है। इसके अतिरिका यासक के अक्तित्व के विकास पर तावरण का भी प्रभव पड़ता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1. अच्छे व्यक्तित्व की क्या-क्या विशेषताएँ हैं? (2013)
उतर:
श्रेष्ठ व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ प्रेत तितत्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

  1. सुदुङ मानसिक स्वास्थ्य समस्छ मन, एक अच्छे व्यक्तित्व की अभिन्न विशेषता है। स्वस्थ मन से आशय व्यक्ति की बुद्धि सामान्य होने, सदैव प्रसन्नचित रहने एवं समुचित मानसिक शक्तियों से सम्पन्न रहने से है।
  2. उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य एक अच्छे व्यक्तित्व के लिए अवश्यक है कि शारीरिक गठन आयु एवं लिंग आदि के समानुपाती हो तथा शरीर स्वस्थ एवं रोगमुक्त हो।
  3. सामाजिकता व्यक्ति समाज के साथ जितना अच्छा समायोजन करने की | रियत में होता है, उन्ह ही उसका अक्व श्रेष्ठ माना जाता है।
  4. संवेगात्मक सन्तुलन संवेगात्मक रूप से सन्तुलित होने का अभिप्राय है। कि व्यक्ति न तो अति संवेगी हो और न ही सग शून्य हो। श्रेष्ठ किवि के लिए संवेगों का विकास सन्तुलित रूप से होना आवश्यक हैं।
  5. अच्छे लक्ष्य श्रेष्ठ व्यमित्व के लिए साक्ष्य सदैव अच्छ, स्वस्थ एवं व्यावहारिक होने चाहिए।
  6. चरित्रवान व्यक्तित्व चारित्रिक गुणों; जैसे-झूठ न बोलना, धोखा । देना, कोरी न करना, बेईमानी न करना आदि से सम्पन्न व्यक्ति का व्यक्तित्व उत्तम माना जाता है।
  7. सन्तोषी एवं महत्वाकांक्षी श्रेष्ठ व्यक्तित्व के लिए सन्तोष एवं महत्वाकांक्षा के बीच सन्तुलन स्थपित होना आवश्यक है। व्यक्ति को निरन्तर प्रगति को और प्रयत्नशील रहना चाहिए, किन्तु अपने प्रयत्नों में असफल होने पर भी उसे दुःख, चिन्ता या भग्नाशी का शिकार नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 2. आनुवंशिकता से आप क्या समझते हैं? (2008, 10)
उतर:
आनुवंशिकता से आशय आनुवंशिक बालकों के किच के निर्माण एवं विकास को प्रभावित करती है। आनुवंशिकता का अग्रेजी शब्द हेरेरैडिटी (Heredity) होता है। तैटिन भाषण से निर्मित इस शब्द का आशय उस पूँजी से है, जो बच्चों को माता-पिता से उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होती है अर्थात् आनुवंशिकता का अर्थ व्यक्तियों में पढ़ी-दर-पीढ़ी संधारित होने वाले शारीरिक, बौद्धिक तथा अन्य व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों से है। इस मान्यता के अनुसार बरु मा सन्तान के विभिन्न गुण एवं लक्षण अपने माता-पिता के समान होते हैं।

उदाहरणस्वरूप गोरे माता-पिता की सतान अधिकांशतः गोरी ही होती है। इस प्रकार हम कह सो हैं कि प्रजनन की प्रक्रिया के माध्यम से संचारित होने ने जैविकोय एवं अन्य गुणों से आनुशक माना जाता है। आनुवंशिकता के यह जीन्स होते है। आनुबंशिक के ही परिणामस्वरूप विभिन्न पीढ़ियों में समानता होती हैं।

प्रश्न 3.
टिप्पणी लिखिए बयों के विकास में खेल का महत्व। (2006, 13)
उत्तर:
खेल का बच्चों के सर्वांगीण विकास में बहुत योगदान है, क्योंकि खेलने से बच्चों के शरीर के सभी अगों का सही प्रकार से विकास होता है। इसके अतिरिक्त खेलते समय बच्चे में स्वस्थ प्रतिस्पर्ला कसा, टीम भावना, सहयोग, त्याग, हार के समय भी मुस्कुराना, अनुशासन आदि गुणों का विकास होता है। परिणामत: बच्चे का उत्तम प्रकार का समाजौकाण होता है। जहाँ तक संवेगात्मक गुणों के विकास का प्रश्न हैं, खेलने से अच्चे का तनाव दूर होता है। एवं उसमें संवेगात्मक स्थिरता आती हैं। इस प्रकार कह सकते हैं कि बच्चों के विकास में खेल का अत्यन्त महत्व है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)

प्रश्न 1.
व्यक्तित्व को परिवार तथा वातावरण वैसे प्रभावित करता है? विवेचना कीजिए। (2015)
अथवा
मनुष्य के व्यक्तित्व पर वातावरण किस प्रकार प्रभाव डालता है? (2008)
अथवा
ऊध बालक के व्यक्तित्व के विकास में आनुवंशिकता तथा पर्यावरण का क्या महत्त्व है? (2018)
अथवा
बालक के यक्तित्व को प्रभावित करने वाले तत्व वौन-कौन (2003, 06)
अथवा 
व्यक्तित्व निर्माण में किन कारकों का योगदान होता है? (2006, 08, 09, 14)
उत्तर:
बालक के व्यक्तित्व निर्माण में आनुवंशिकता एवं पर्यावरण को प्रमुख योगदान होता है। आनुवंशिकता के अन्तर्गत वे समस्त कारक निहित होते हैं, जो बालक को अपने माता-पिता तथा पूर्वजों से प्राप्त होते हैं। बालक के शारीरिक गुण तथा अन्य विभिन्न जन्मजात गुण आनुशिकता से ही निघांरित होते हैं।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम कह सकते हैं कि बालक के व्यक्तित्व के विकास में आनुवंशिकता का विशेष महत्व होता है। पर्यावरण में आशय उन् समस्त बाहरी कारकों से है, जो जम के उपरान्त बालक के जीवन को प्रभावित करते हैं। ये कारण भी अनेक है तथा इनका बालक के ग्यक्तित्व के त्रिकास में अत्यधिक योगदान होता है। उत्तम पर्यावरण बालक के विकास में सहायक तथा प्रतिकूल पर्यावरण आधिक होता है।

व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाले कारक

ऐसे अनेक कारक है, जो जातक के व्यक्तित्व निर्माण में प्रभाव डालते हैं। बालक के व्यक्तित्व पर प्रभाव टालने वाले तत्व निम्नलिखित हैं।
1. शारीरिक बनावट का प्रभाव व्यक्ति के व्यक्तित्व पर उसके। आकार का प्रभाव जाने कारक पड़ता है। यह देखा जाता है कि गोल मटोल आदमो हास्यप्रिय, आरामपसन्द एवं सामाजिक होते हैं, जबकि दुबले-पतले। माता-पिता का प्रमा आदमी संयमी होते हैं। व्यक्ति। अपर आ सकतात ज भाव के शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान। आर्थिक स्तेि का प्रमा में रखते हुए। अन्य व्यक्ति। भी उसके प्रति अपने व्यवहार प्रतिमान का निर्धारण करते हैं। भव्य एवं आकर्षक शारीरिक गठन वाले व्यक्ति के प्रति सम्मान क व्यवहार किया जाता है।

2. अन्त:स्रावी ग्रन्थियाँ ये प्रन्थियों अपना रस रक्त में छोड़ देती हैं एवं रक्त इसे सम्पूर्ण शरीर में ले जाता है। यदि ये प्रन्थियाँ पर्याप्त मात्रा में रक्त को अपना रस देना बन्द कर दें, तो शरीर, बुद्धि एवं भाव में परिवर्तन हो आता है। यदि पीयूष ग्रन्थि आदि अपना काम मन्द गति से करती है, तो व्यक्ति की। लम्बाई नहीं बढ़ती तथा वह बौना हो जाता है, यदि ये अन्य तीव्र गति से कार्य करती हैं, तो व्यक्ति या लम्या हो जाता है।

3. स्नायविक संगठन निरीक्षण द्वारा यह देखा गया है कि यदि जल्यावस्था में क्ति के मस्तिष्क को किसी प्रकार का आघात लगता है, तो उसके व्यक्तित्व में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन आ जाते है। इसके साथ-साथ विशिष्ट प्रकार के स्नायविक संगठन का भी व्यक्तित्व पर उल्लेखनीय प्रभाव

4. माता-पिता का प्रभाव माता-पिता का भय बच्चों पर बहुत अधिक पड़ता है, जो माता-पिता कठोर स्वभाव के होते हैं एवं अपने बच्चों को अधिक प्यार नहीं करते, ऐसे बच्चों में अन्तर्मुखी प्रवृत्ति बढ़ जाती हैं। वे एकान्त में रहने लगते हैं तथा हमेशा कल्पनाशील रहते हैं, जो माता-पिता अपने बच्चों को अधिक प्यार करते हैं, उन बच्चों में आत्मनिर्भरता के गुणों का अभाव पाया जाता है, वे बच्चे परावलम्बी हो जाते हैं। इस प्रकार उपरोक्त दोनों प्रकार के बच्चों का व्यक्तित्व स्वाभाविक तथा सामान्य नहीं होता है। अत: माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों के प्रति किए गए आचरण में प्यार एवं नियन्त्रण का सन्तुलन बना रहे।

5. बालक के जन्म-क्रम का प्रभाव परिवार में बच्चा जब तक इकलौता रहता है, तो उसके अधिकार को छीनने वाला कोई नहीं होता और न कोई उसकी सुख-सुविधाओं में हिस्सा में आता है, इसलिए यह निर्दी हो जाता है। इससे भिन्न परिवार में सबसे छोटा बच्चा, बों परिवार में सभी का स्नेह प्राप्त करता है एवं उत्तरदायित्वों से मुक्त होता है, हमेशा सहायता के लिए दूसरे की और ही देखता है।

6. क्रीड़ा-समूह का व्यक्तित्व पर प्रभाव जब बच्चा चलने-फिरने योग्य हो आता है, तो वह अन्य बच्चों के साथ मिलता-जुलता है। खेलकूद के लिए बच्चों का एक क्लौड़ा समूह बन जाता है। में अपना अपना कार्य बाँट लेते हैं। कार्यों के आधार पर ही व्यक्तित्व का विकास होता हैं।

7. आर्थिक स्थिति का प्रमाण परिवार की आर्थिक स्क्यिति व्यक्तित्व विकास को प्रभवित करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। सामान्य रूप से यह देखा गया है। कि जे बालक आर्थिक अभाओं में पलते हैं, वे प्रायः अपराधी प्रवृत्ति के बन् आते हैं, जयके सम्पन्न परिवारों के बालकों का विकास सुचारु रूप से होता है।

प्रश्न 2.
“बाल्यावस्था अछी आदतों के निर्माण की उत्तम अवस्था है।” इस कधन की पुष्टि कीजिए। (2015, 18)
उत्तर:
बाल्यावस्था सामान्यतः 2 से 12 वर्ष तक मानी जाती है। इस अवस्था को अच्छी आदतों के निर्माण की उत्तम अवस्था माना जाता है, क्योकि इस अवस्था में बालक के व्यक्तित्व के सभी घरों का विकास स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगता हैं। इस कथन की विवेचना निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत की जा सकती है
1. शारीरिक विकास बाल्यावस्था के दौरान बालकों को शारीरिक क्षमता बढ़ जाती है। वे कार्यों को स्वतन्त्र रूप से कर सकते हैं, लक्ष्यों का निर्धारण कर सकते है तथा यह को अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं। इस अवस्था में बालक शौच एवं नींद जैसी प्राथमिक क्रियाओं पर नियंत्रण करना सीखता है। नियमित रूप से मल त्याग को आदत एवं समय पर सोना व जागना ऐसौ आदतें हैं, जो बाल्यावस्था में निरन्तर अभ्यास करने से जीवनभर के लिए स्थायी हो जाती हैं। इस अवस्था में बालक पेशीय कौशलों में भी प्रमुख उपलब्धियाँ प्राप्त करता है। इस अवस्था में हाथ, भुजा एवं शरीर में सभी, आँख को गति के साथ समन्वित होते हैं। यालक तेज दौड़ने, उतने, कूदने आदि में सक्षम रहता है। अत: इस अवस्था में बालक में अपने शरीर को चुस्त दुरत रखने एवं नियमित मायाम करने की आदत हाली जा सकती है।

2. मानसिक विकास सामान्यतः 7 से 11 वर्ष की आयु में बच्चे में किसी वस्तु की विभिन्न विशेषताओं का ध्यान देने की क्षमता किसित होती है। यह क्षमता बच्चे की इस बात को समझने में सहायक होती है कि चीजों को देखने या समझने के भिन्न-भिन्न तरीके होते हैं, इसके परिणामस्वरूप बच्चे दूसरों के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करते हैं। चिन्तन अधिक सचीला हो गता है और समस्या समाधान करते समय बच्चे विकल्पों के बारे में सोच सकते हैं। स्पतः इस अवस्था में माता-पिता एवं शिक्षक बच्चों में अच्छी आदतों का विकास करने में अपिक सफल होते हैं, क्योंकि वे बच्चों के समक्ष तार्किक उदाहरण प्रस्तुत कर उन्हें अच्छी आदतों के लाभ का ज्ञान करा सकते हैं, जिससे बच्चा स्वयं उन आदतों का अनुकरण करने की ओर उन्मुख होता है।

3. सामाजिक-सांवेगिक विकास बच्चे में विकसित हो रहे स्वतन्त्रता के बोध के कारण वह कार्यों को अपने तरीके से करता है। बच्चे की इन स्वरित क्रियाओं के प्रति माता-पिता जिस प्रकार में प्रक्रिया करते हैं वह पहलाक्ति बोध या अपराध बोध को विकसित करता है। उदाहरणत: यदि उन्हें यह अनुभव कराया जाता है कि उनके प्रश्न अनुपयोगी हैं तथा उनके द्वारा खेले गए खेल मूर्खतापूर्ण हैं, तो सम्भव है कि बच्चों में स्वय के प्रति दोष भावना विकसित हो। अतः बच्चों में कुछ नया रचनात्मक करने की एवं पहल करने की आदत का विकास, उनके कार्यों के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया से हो मारा है।

बाल्यावस्था में सांवेगिक विकास का दूसरा पक्ष बच्चो के आत्मबोध से जुड़ा है। इस अवस्था में बच्चे स्वयं को सामाजिक समूहों के सन्दर्भ में देखना शुरू करते हैं; जैसे विद्यालय के संगत क्लब, पर्यावरण काय आदि का सदस्य होना। इसके अतिरिक्त बाल्यावस्था में बच्चे अपनी लिंग भूमिका के प्रति जागरुक होते है। अतः इस अवस्था में बालक में दूसरे समूह अथवा दूसरे लिंग के व्यक्ति के अस्तित्व को स्वीकार की मनोवृत्ति पैदा की जा सकती है। बम्नतः बाल्यावस्था में सामाजिक रूप से सने का संसार विस्तृत हो जाता है एवं इसमें माता-पिता के अतिरिक्त परिवार तथा पास-पड़ोस एवं विशालय के प्रौढ़ व्यक्ति भी सम्मिलित हो जाते हैं। सामाजिक-सांवेगिक विकास का यह चरण बालक में अनुकरण, सहानुभूति, धेिश महशीलता आदि के विकास को प्रसाहित करता है।

4. नैतिक विकास इस अवस्था में बालक माता-पिता अथवा समाज के नियमों के आधार पर अपने नैतिक र्को को विकसित करता है। बच्चे इन नियमों को स्वयं के नियमों के रूप में स्वीकृत करते हैं। दूसरों की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए इन नियमों को आत्मसात् कर लिया जाता है। बच्चे इन नियमों को ऐसे सुनिश्चित दिशा-निर्देश के रूप में देखते हैं, जिनका अनुसरण किया जाना चाहिए।

उपरोका विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि बाल्यावस्था अच्छी आदतों के विकास की उत्तम अवस्था है।

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