Chapter 2 संविधान निर्माण

In Text Questions and Answers

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प्रश्न 1.
अगर दक्षिण के बहुसंख्यक काले लोगों ने गोरों से अपने दमन और शोषण का बदला लेने का निश्चय किया होता तो क्या होता? 
उत्तर:
ऐसा होने पर दक्षिण अफ्रीका में हिंसा भड़क जाती। हर तरफ मार-काट मच जाती। अराजकता का माहौल व्याप्त हो जाता। बदले की भावना से भाईचारे को आघा तथा लोकतन्त्र की हत्या हो जाती। लेकिन दक्षिण अफ्रीका के बहुसंख्यक लोगों ने ऐसा न करके समानता पर आधारित समाज की स्थापना की। 

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प्रश्न 1.
आज का दक्षिण अफ्रीका: यह तस्वीर आज के दक्षिण अफ्रीका की सोच को उजागर करती है। आज का दक्षिण अफ्रीका खुद को ‘इन्द्रधनुषी देश’ कहता है। क्या आप बता सकते हैं क्यों? 
उत्तर:
दक्षिण अफ्रीका के लोग स्वयं को इन्द्रधनुषी देश इसलिए कहकर पुकारते हैं क्योंकि गोरी रंगभेदी सरकार के कटु अनुभवों को भुलाकर गोरे, अश्वेत, रंगीन चमड़ी वाले तथा भारतीय मूल के सभी लोगों ने मिलकर काम करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक नवीन राष्ट्र का निर्माण किया है। 

प्रश्न 2.
क्या दक्षिण अफ्रीका के स्वतंत्रता संग्राम से आपको भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की याद आई? इन बिन्दुओं के आधार पर दोनों संघर्षों में समानताएँ और असमानताएँ बताएँ। 
(i) विभिन्न समुदायों के बीच सम्बन्ध 
(ii) नेतृत्व : गाँधी/मंडेला 
(iii) संघर्ष का नेतृत्व करने वाली पार्टी : अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस/भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 
(iv) संघर्ष का तरीका 
(v) उपनिवेशवाद का चरित्र। 
उत्तर:
हाँ, दक्षिण अफ्रीकी स्वतंत्रता संग्राम की कहानी हमें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की याद दिलाती है। 

बिन्दु

समानता

असमानता

(1) विभिन्न समुदायों के बीच सम्बन्ध

दोनों ही देशों में गोरे शासकों द्वारा वहाँ की जनता को हीन दृष्टि से देखा गया।

कुछ भारतीयों ने भी दक्षिण अफ्रीकी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, लेकिन किसी भी दक्षिण अफ्रीकी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया।

(2) नेतृत्व : गांधी/ मंडेला 

गाँधी और मंडेला दोनों ने अपने देश के राष्ट्रीय आंदोलनों में अहिंसा के माध्यम से संघर्ष किया तथा दोनों ही जनता के बीच बहुत ही लोकप्रिय थे।

मंडेला ने आजीवन कारावास में रहते हुए जेल से ही आंदोलन का नेतृत्व किया; जबकि गांधी जनता के बीच जाकर आंदोलन को संचालित करते रहे।

(3) संघर्ष का नेतृत्व करने वाली पाटी : अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस/भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

अफ्रीका में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ही राष्ट्रीय आंदोलन की एकमात्र पाटी थी; जबकि भारत में अन्य राजनैतिक पार्टियों ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में अपना योगदान दिया।

दोनों ही पार्टियों ने अपने-अपने देश में जन-आंदोलनों का नेतृत्व किया तथा उचित समय पर उचित कार्यक्रम द्वारा आंदोलन को निर्देशित किया। दोनों ही संगठन जनता के बीच बहुत ही लोकप्रिय थे।

(4) संघर्ष का तरीका

दोनों ही देशों में स्वतंत्रता की लड़ाई अधिकतर जनतांत्रिक तथा अहिंसक तरीकों से लड़ी गयी। इसके लिए धरना, प्रदर्शन, हड़ताल आदि तरीके अपनाए गए।

भारत में कुछ क्रांतिकारी संगठन भी थे, जिन्होंने हिंसा को अपनाते हुए अंग्रेजी बर्बरता का विरोध किया। यहाँ कुछ आदिवासी संगठनों ने भी अपने तरीके से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। 

(5) उपनिवेशवाद का चरित्र

17वीं-18वीं सदी के दौरान विभिन्न यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों ने जिस तरह से भारत में सत्ता प्राप्त की, उसी तरह की प्रक्रिया उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भी अपनायी।

भारत में यूरोपीय लोग बसे नहीं, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में बहुत अधिक संख्या में यूरोपीय लोग बस गये और वहां के स्थानीय शासक बन गये।

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प्रश्न 1.
भारतीय संविधान निर्माताओं के बारे में यहाँ (पाठ्यपुस्तक में) दी गई सभी जानकारियों को पढ़ें। आपको यह जानकारी कंठस्थ करने की जरूरत नहीं है। इस आधार पर निम्नलिखित कथनों के पक्ष में उदाहरण प्रस्तुत करें: 
(i) संविधान सभा में ऐसे अनेक सदस्य थे जो कांग्रेसी नहीं थे। 
(ii) सभा में समाज के अलग-अलग समहों का प्रतिनिधित्व था। 
(iii) सभा के सदस्यों की विचारधारा भी अलग-अलग थी। 
उत्तर:
(i) प्रमुख गैर-कांग्रेसी सदस्य ये थे-(i) जयपाल सिंह (आदिवासी महासभा के संस्थापक, खिलाड़ी और शिक्षाविद्) (ii) श्यामा प्रसाद मुखर्जी (शिक्षाविद् वकील तथा हिन्दू महासभा में सक्रिय, बाद में भारतीय जनसंघ के संस्थापक) (iii) भीमराव रामजी अंबेडकर (सामाजिक क्रांतिकारी चिंतक, जातिगत भेदभाव के खिलाफ अग्रणी आंदोलनकारी रिपब्लिक पार्टी ऑफ इण्डिया के संस्थापक) (iv) सोमनाथ लाहिड़ी (लेखक, सम्पादक तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता)। 

(ii) सभा में समाज के अलग-अलग समूहों का प्रतिनिधित्व था, जैसे-वल्लभभाई झावरभाई पटेल (किसान सत्याग्रह के नेता); अबुल कलाम आजाद-धर्मशास्त्री, अरबी के विद्वान, जयपाल सिंह-आदिवासी महासभा के अध्यक्ष; भीमराव रामजी अंबेडकर सामाजिक क्रांतिकारी चिंतक, जाति आधारित असमानता के प्रखर विरोधी; श्यामा प्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा के सदस्य; टी.टी. कृष्णमाचारी (उद्यमी); एच. सी. मुखर्जी प्रसिद्ध लेखक और शिक्षाविद्। 

(iii) सभा के सदस्यों की विचारधारा भी अलग-अलग थी। यथा-

पृष्ठ 29 

प्रश्न 1.
पाठ्यपुस्तक में दिए गए तीनों उद्धरणों को गौर से पढ़ें: 
(i) पहचानिए कि कौनसा एक विचार तीनों उद्धरणों में उपस्थित है। 
(ii) इन तीनों उद्धरणों में इस साझे विचार को व्यक्त करने का तरीका किस तरह एक-दूसरे से भिन्न है? 
उत्तर:
(i) इन तीनों उद्धरणों में जो साझा विचार उपस्थित है, वह है-स्वतंत्रता का अधिकार। 
(ii) नायडू ने इसे नई जवाबदेही के रूप में व्यक्त किया है, नेहरू ने इसे कर्त्तव्य बोध से जोड़ा है और लाहिड़ी ने इसे देश की सेवा का मौका कहा है। 

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प्रश्न 1.
संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत और दक्षिण अफ्रीका के संविधानों की प्रस्तावना की तुलना कीजिए। (ये प्रस्तावनाएँ पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 30 और 31 पर दी गई हैं।) 
(i) इन सभी में जो विचार साझा हैं, उनकी सूची बनाएँ। 
(ii) इन सभी में कम-से-कम एक बड़े अंतर को रेखांकित करें। 
(iii) तीनों में कौनसी प्रस्तावना अतीत की ओर संकेत करती है? 
(iv) इन प्रस्तावनाओं में से कौन-सी ईश्वर का आहवान नहीं करती? 
उत्तर:
(i) इन तीनों में जो विचार साझा है-वह प्रस्तावना के प्रारंभ में अपने देश के लोग संविधान को अंगीकृत तथा स्थापित करते हैं। 
(ii) इन तीनों के बीच एक प्रमुख अन्तर यह है कि ‘समाजवादी’ शब्द का प्रयोग केवल भारतीय संविधाल की प्रस्तावना में हुआ है। 
(iii) दक्षिण अफ्रीकी संविधान की प्रस्तावना अतीत का संदर्भ देती है। 
(iv) भारतीय संविधान और अमेरिका की प्रस्तावनाओं में ईश्वर का आह्वान नहीं किया गया है। 

Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1. 
नीचे कुछ गलत वाक्य दिए गए हैं। हर एक में की गई गलती पहचानें और इस अध्याय के आधार पर उसको ठीक करके लिखें। 
(क) स्वतंत्रता के बाद देश लोकतांत्रिक हो या नहीं, इस विषय पर स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने अपना दिमाग खुला रखा था। 
(ख) भारतीय संविधान सभा के सभी सदस्य संविधान में कही गई हरेक बात पर सहमत थे। 
(ग) जिन देशों में संविधान है वहाँ लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था ही होगी। 
(घ) संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है इसलिए इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता। 
उत्तर:
(क) स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं की इस बारे में स्पष्ट धारणा थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् देश में लोकतंत्र होना चाहिए। 
(ख) भारतीय संविधान सभा के अलग-अलग सदस्यों के विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग विचार थे, किन्तु उन्होंने अपने मतभेद सुलझा लिए और संविधान के मूलभूत सिद्धान्तों पर उन्होंने एक समान राय रखी। 
(ग) एक लोकतांत्रिक देश में संविधान निश्चित रूप से होना चाहिये। 
(घ) यद्यपि संविधान देश का सर्वोच्च कानून होता है, तथापि संसद द्वारा एक विशिष्ट बहुमत से उसमें संशोधन किया जा सकता है। 

प्रश्न 2. 
दक्षिण अफ्रीका का लोकतांत्रिक संविधान बनाने में, इनमें से कौन-सा टकराव सबसे महत्त्वपूर्ण था : 
(क) दक्षिण अफ्रीका और उसके पड़ोसी देशों का 
(ख) स्त्रियों और पुरुषों का। 
(ग) गोरे अल्पसंख्यक और अश्वेत बहुसंख्यकों का 
(घ) रंगीन चमड़ी वाले बहुसंख्यकों और अश्वेत अल्पसंख्यकों का। 
उत्तर:
(ग) गोरे अल्पसंख्यक और अश्वेत बहुसंख्यकों का। 

प्रश्न 3.
लोकतांत्रिक संविधान में इनमें से कौन-सा प्रावधान नहीं रहता? 
(क) शासन प्रमुख के अधिकार 
(ख) शासन प्रमुख का नाम 
(ग) विधायिका के अधिकार 
(घ) देश का नाम। 
उत्तर:
(ख) शासन प्रमुख का नाम। 

प्रश्न 4. 
संविधान निर्माण में इन नेताओं और उनकी भूमिका में मेल बैठाएँ : 

(क) मोतीलाल नेहरू

1. संविधान सभा के अध्यक्ष 

(ख) बी. आर. अंबेडकर

2. संविधान सभा की सदस्य 

(ग) राजेंद्र प्रसाद

3. प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष 

(घ) सरोजिनी नायडू

4. 1928 में भारत का संविधान बनाया 

उत्तर:

(क) मोतीलाल नेहरू

4. 1928 में भारत का संविधान बनाया 

(ख) बी. आर. अंबेडकर

3. प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष 

(ग) राजेंद्र प्रसाद

1. संविधान सभा के अध्यक्ष 

(घ) सरोजिनी नायडू

2. संविधान सभा की सदस्य 

 प्रश्न 5. 
जवाहर लाल नेहरू के नियति के साथ साक्षात्कार वाले भाषण के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों का जवाब दें: 
(क) नेहरू ने क्यों कहा कि भारत का भविष्य सुस्ताने और आराम करने का नहीं है? 
(ख) नये भारत के सपने किस तरह विश्व से जुड़े हैं? 
(ग) वे संविधान निर्माताओं से क्या शपथ चाहते थे? 
(घ) “हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की कामना हर आँख से आँसू पोंछने की है।” वे इस कथन में किसका जिक्र कर रहे थे? 
उत्तर:
(क) नेहरू ने ऐसा इसलिए कहा था जिससे भारत के लोग उन वायदों को पूरा करने के निरन्तर प्रयास करें, जो उन्होंने किए थे। 
(ख) नये भारत के सपने हैं-दरिद्रता, अज्ञान, बीमारियों और अवसर की असमानता का अन्त करना है। यह विश्व शांति और समृद्धि के लिये आवश्यक है। 
(ग) वे भारतीय संविधान के निर्माताओं से यह वचन लेना चाहते थे कि वे भारत के संसाधनों तथा जनता के प्रति मानवता के हित में अपने आपको समर्पित कर दें। 
(घ) वे इस कथन में महात्मा गांधी का जिक्र कर रहे थे। 

प्रश्न 6. 
हमारे संविधान को दिशा देने वाले ये कुछ मूल्य और उनके अर्थ हैं। इन्हें आपस में मिलाकर दोबारा लिखिए। 

(क) संप्रभु

1. सरकार किसी धर्म के निर्देशों के अनुसार काम नहीं करेगी।

(ख) गणतंत्र

2. फैसले लेने का सर्वोच्च अधिकार लोगों के पास है। 

(ग) बंधुत्व

3. शासन प्रमुख एक चुना हुआ व्यक्ति है।

(घ) धर्मनिरपेक्ष

4. लोगों को आपस में परिवार की तरह रहना चाहिए। 

उत्तर:

(क) संप्रभु

2. फैसले लेने का सर्वोच्च अधिकार लोगों के पास है।

(ख) गणतंत्र

3. शासन प्रमुख एक चुना हुआ व्यक्ति है।

(ग) बंधुत्व

4. लोगों को आपस में परिवार की तरह रहना चाहिए। 

(घ) धर्मनिरपेक्ष

1. सरकार किसी धर्म के निर्देशों के अनुसार काम नहीं करेगी। 

प्रश्न 7. 
कुछ दिन पहले नेपाल से आपके एक मित्र ने वहाँ की राजनैतिक स्थिति के बारे में आपको पत्र लिखा था। वहाँ अनेक राजनैतिक पार्टियाँ राजा के शासन का विरोध कर रही थीं। उनमें से कुछ का कहना था कि राजा द्वारा दिए गए मौजूदा संविधान में ही संशोधन करके चुने हुए प्रतिनिधियों को ज्यादा अधिकार दिए जा सकते हैं। अन्य पार्टियाँ नया गणतांत्रिक संविधान बनाने के लिए नई संविधान सभा गठित करने की मांग कर रही थीं। इस विषय में अपनी राय बताते हुए अपने मित्र को पत्र लिखें। 
उत्तर:
इस संबंध में हमारे सामने दो विचार रखे गये हैं। पहले विचार के अनुसार चुने हुये जन-प्रतिनिधियों को अधिक शक्ति दी जानी चाहिये ताकि संपूर्ण व्यवस्था को अधिक से अधिक जनतांत्रिक बनाया जा सके। दूसरा समूह राजशाही को खत्म कर इसकी जगह नए गणतांत्रिक संविधान के निर्माण की बात कर रहा है। इससे तीन बातें उभरकर सामने आती हैं-(1) निर्वाचित प्रतिनिधियों को और अधिक शक्तियाँ देने के लिए संविधान में संशोधन को मांग, (2) गणतंत्रात्मक संविधान लिखने के लिए नई संविधान सभा और (3) राजा के शासन का विरोध। ये तीनों ही तथ्य यह बताते हैं कि लोग लोकतंत्रात्मक शासन चाहते हैं और राजतंत्रात्मक शासन को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। ऐसी स्थिति नई संविधान सभा गठित कर नया गणतांत्रिक संविधान का निर्माण करना ही नेपाल के हित में होगा। 

प्रश्न 8. 
भारत के लोकतंत्र के स्वरूप में विकास के प्रमुख कारणों के बारे में कुछ अलग-अलग विचार इस प्रकार हैं। आप इनमें से हर कथन को भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कितना महत्त्वपूर्ण कारण मानते हैं? 
(क) अंग्रेज शासकों ने भारत को उपहार के रूप में लोकतांत्रिक व्यवस्था दी। हमने ब्रिटिश हुकूमत के समय बनी प्रांतीय असेंबलियों के जरिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम करने का प्रशिक्षण पाया। 
(ख) हमारे स्वतंत्रता संग्राम ने औपनिवेशिक शोषण और भारतीय लोगों को तरह-तरह की आजादी न दिए जाने का विरोध किया। ऐसे में स्वतंत्र भारत को लोकतांत्रिक होना ही था। 
(ग) हमारे राष्ट्रवादी नेताओं की आस्था लोकतंत्र में थी। अनेक नव स्वतंत्र राष्ट्रों में लोकतंत्र का न आना हमारे नेताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। 
उत्तर:
(क) इस कारक के योगदान को बहुत हद तक स्वीकार किया जा सकता है। हालांकि इसे अंग्रेजों की देन नहीं माना जा सकता है। यह सच है कि यदि हमें पूर्व प्रशिक्षण प्राप्त नहीं होता तो भारत जैसे विशाल देश में आरंभिक दौर में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना बहुत ही कठिन होती। 

(ख) इस कारक का भी भारत में लोकतंत्र की स्थापना में योगदान रहा है। चूँकि हमारे संघर्ष का तरीका, हमारे राजनीतिक दलों की संरचना सभी लोकतांत्रिक थी, अतः लोकतंत्र की अच्छाइयों को हम महसूस कर रहे थे। दूसरी तरफ, चूंकि लोगों को विभिन्न स्वतंत्रताएँ नहीं मिली थीं, अतः लोकतंत्र ही एकमात्र ऐसी व्यवस्था थी जो उनकी इन आकांक्षाओं को पूरा कर सकती थी। 

(ग) स्वतंत्रता प्राप्ति के नाजुक दौर में यह बहुत जरूरी था कि सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिये निष्ठावान लोकतांत्रिक विचारों वाले नेता हों ताकि इन मूल्यों की स्थापना के लिये वे दूसरों को भी प्रेरित कर सकें। अतः इस कारक का योगदान भी महत्त्वपूर्ण था। 

प्रश्न 9. 
1912 में प्रकाशित ‘विवाहित महिलाओं के लिए आचरण’ पुस्तक के निम्नलिखित अंश को पढ़ें : 
“ईश्वर ने औरत जाति को शारीरिक और भावनात्मक, दोनों ही तरह से ज्यादा नाजुक बनाया है। उन्हें आत्मरक्षा के भी योग्य नहीं बनाया है। इसलिए ईश्वर ने ही उन्हें जीवन भर पुरुषों के संरक्षण में रहने का भाग्य दिया है-कभी पिता के, कभी पति के और कभी पुत्र के। इसलिए महिलाओं को निराश होने की जगह इस बात से अनुगृहीत होना चाहिए कि वे अपने आपको पुरुषों की सेवा में समर्पित कर सकती हैं।” क्या इस अनुच्छेद में व्यक्त मूल्य संविधान के दर्शन से मेल खाते हैं या वे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं? 
उत्तर:
इस पाठ्यांश में व्यक्त मूल्य हमारे संविधान में अन्तर्निहित मूल्यों को प्रदर्शित नहीं करते। यह हमारे संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है, क्योंकि हमारा संविधान पुरुष तथा महिला को हर दृष्टिकोण से समान मानता है। 

प्रश्न 10. 
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए। क्या आप उनसे सहमत हैं? अपने कारण भी बताइए। 
(क) संविधान के नियमों की हैसियत किसी भी अन्य कानून के बराबर है। 
(ख) संविधान बताता है कि शासन व्यवस्था के विविध अंगों का गठन किस तरह होगा। 
(ग) नागरिको के अधिकार और सरकार की सत्ता की सीमाओं का उल्लेख भी संविधान में स्पष्ट रूप में है। 
(घ) संविधान संस्थाओं की चर्चा करता है, उसका मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है। 
उत्तर:
(क) यह वक्तव्य सत्य नहीं है, क्योंकि संवैधानिक नियम मौलिक नियम हैं, जबकि दूसरे अन्य नियमों की वैधानिकता इस आधार पर तय होती है कि वे संवैधानिक नियमों के अनुरूप हैं अथवा नहीं। 
(ख) यह कथन सत्य है, क्योंकि हमारे संविधान में सरकार के तीनों अंगों-विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के संगठन तथा शक्ति की विस्तृत चर्चा की गई है। 
(ग) यह वक्तव्य सही है, क्योंकि हमारे संविधान में नागरिकों को दिये गये विभिन्न मौलिक अधिकारों के लिये उपबंध किये गये हैं। साथ ही, सरकार की क्या शक्तियाँ तथा सीमाएँ हैं, इसकी भी विस्तृत चर्चा की गई है। 
(घ) यह वक्तव्य गलत है, क्योंकि संविधान जिन मूल्यों पर आधारित है उनकी चर्चा संविधान की प्रस्तावना में की गई है तथा प्रस्तावना हमारे संविधान का हिस्सा है। 

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