Chapter 2 Era of One Party Dominance (एक दल के प्रभुत्व का दौर)

Text Book Questions

प्रश्न 1.
सही विकल्प को चुनकर खाली जगह भरें-
(क) 1952 के पहले आम चुनाव में लोकसभा के साथ-साथ …….. के लिए भी चुनाव कराए गए थे। (भारत के राष्ट्रपति पद/राज्य विधानसभा/राज्यसभा/प्रधानमन्त्री)
(ख) ……….. लोकसभा के पहले आम चुनाव में 16 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही। (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी/भारतीय जनसंघ/भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी/भारतीय जनता पार्टी)
(ग) ……… स्वतन्त्र पार्टी का एक निर्देशक सिद्धान्त था। (कामगार तबके का हित/रियासतों का बचाव/राज्य के नियन्त्रण से
मुक्त अर्थव्यवस्था/संघ के भीतर राज्यों की स्वायत्तता)।
उत्तर:
(क) राज्य विधानसभा,
(ख) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,
(ग) राज्य के नियन्त्रण में मुक्त अर्थव्यवस्था।

प्रश्न 2.
यहाँ दो सूचियाँ दी गई हैं। पहले में नेताओं के नाम दर्ज हैं और दूसरे में दलों के। दोनों सूचियों में मेल बैठाएँ

उत्तर:

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प्रश्न 3.
एकल पार्टी के प्रभुत्व के बारे में यहाँ चार कथन, लिखे गए हैं। प्रत्येक के आगे सही या गलत का चिह्न लगाएँ
(क) विकल्प के रूप में किसी मजबूत राजनीतिक दल का अभाव एकल पार्टी-प्रभुत्व का कारण था।
(ख) जनमत की कमजोरी के कारण एक पार्टी का प्रभुत्व कायम हुआ।
(ग) एकल पार्टी प्रभुत्व का सम्बन्ध राष्ट्र के औपनिवेशिक अतीत से है।
(घ) एकल पार्टी-प्रभुत्व से देश में लोकतान्त्रिक आदर्शों के अभाव की झलक मिलती है।
उत्तर:
(क) सही,
(ख) गलत,
(ग) सही,
(घ) गलत।

प्रश्न 4.
अगर पहले आम चुनाव के बाद भारतीय जनसंघ अथवा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी होती तो किन मामलों में इस सरकार ने अलग नीति अपनाई होती? इन दोनों दलों द्वारा अपनाई गई नीतियों के बीच तीन अन्तरों का उल्लेख करें।
उत्तर:
यदि पहले आम चुनावों के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी या जनसंघ की सरकार बनती तो विदेश नीति के मामलों में इस प्रकार से अलग नीति अपनायी गयी होती। दोनों दलों द्वारा अपनाई गई नीतियों में तीन प्रमुख अन्तर अग्रलिखित होते
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प्रश्न 5.
कांग्रेस किन अर्थों में एक विचारधारात्मक गठबन्धन थी? कांग्रेस में मौजूद विभिन्न विचारधारात्मक उपस्थितियों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारत जब स्वतन्त्र हुआ तब तक कांग्रेस एक गठबन्धन का आकार ले चुकी थी तथा इसमें सभी प्रकार की विचारधाराओं का समर्थन करने वाले विचारकों व समूहों ने अपने को कांग्रेस के साथ मिला दिया। कांग्रेस को निम्नांकित अर्थों में एक विचारधारात्मक गठबन्धन की संज्ञा दी जा सकती है-

(1) प्रारम्भ में ही अनेक समूहों ने अपनी पहचान को कांग्रेस के साथ समाहित कर लिया। अनेक बार किसी समूह ने अपनी पहचान को कांग्रेस के साथ एकसार नहीं किया तथा अपने-अपने विश्वासों पर विचार करते हुए एक व्यक्ति या समूह के रूप में कांग्रेस के भीतर बने रहे। इस अर्थ में कांग्रेस एक विचारधारात्मक गठबन्धन था।

(2) सन् 1924 में भारतीय साम्यवादी दल की स्थापना हुई। सरकार ने इसे प्रतिबन्धित कर दिया। यह दल सन् 1942 तक कांग्रेस को एक गुट के रूप में रहकर ही काम करता रहा। सन् 1942 में इस गुट को कांग्रेस से अलग करने के लिए सरकार ने इस पर से प्रतिबन्ध हटाया। कांग्रेस ने शान्तिवादी और क्रान्तिकारी, रूढ़िवादी और परिवर्तनकारी, गरमपन्थी और नरमपन्थी, दक्षिणपन्थी और वामपन्थी तथा प्रत्येक धारा के मध्यमार्गियों को समाहित कर लिया गया।

(3) कांग्रेस ने समाजवादी समाज की स्थापना को अपना लक्ष्य बनाया। इसी कारण स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् कई समाजवादी पार्टियाँ बनीं लेकिन विचारधारा के आधार पर वे अपनी स्वतन्त्र पहचान नहीं स्थापित कर सकी तथा कांग्रेस के प्रभुत्व व वर्चस्व को नहीं हिला सकीं। इस प्रकार कांग्रेस एक ऐसा मंच था जिस पर अनेक हित समूह और राजनीतिक दल एकत्रित होकर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेते थे। आजादी से पहले अनेक संगठन और पार्टियों को कांग्रेस में रहने की अनुमति प्राप्त थी।

(4) कांग्रेस में अनेक ऐसे समूह थे जिनके अपने स्वतन्त्र संविधान थे और संगठनात्मक ढाँचा भी अलग था जैसे कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। फिर भी उन्हें कांग्रेस के एक गुट में बनाए रखा गया। वर्तमान में विभिन्न दलों के गठबन्धन बनते हैं और सत्ता की प्राप्ति के प्रयत्न करते हैं परन्तु स्वतन्त्रता के समय कांग्रेस ही एक प्रकार से एक विचारधारात्मक गठबन्धन था।
जहाँ तक कांग्रेस में मौजूद विभिन्न विचारधारात्मक उपस्थिति के उल्लेख का सम्बन्ध है इसके लिए निम्नलिखित तथ्य प्रकाश में लाए जा सकते हैं-

(i) कांग्रेस का उदय सन् 1885 में हुआ था। उस समय यह नवशिक्षित, कार्यशील और व्यापारिक वर्गों का मात्र हित-समूह थी परन्तु बीसवीं सदी में इसने जन आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। इसी कारण से कांग्रेस ने एक जनव्यापी राजनीतिक पार्टी का रूप ले लिया और राजनीतिक व्यवस्था में इसका वर्चस्व स्थापित हुआ।

(ii) प्रारम्भ में कांग्रेस में अंग्रेजी संस्कृति में विश्वास रखने वाले उच्च वर्ग के शहरी लोगों का वर्चस्व था। परन्तु कांग्रेस ने जब भी सविनय अवज्ञा जैसे आन्दोलन चलाए उसमें सामाजिक आधार बढ़ा। कांग्रेस ने परस्पर हितों के अनेक समूहों को एक साथ जोड़ा। कांग्रेस में किसान व उद्योगपति, शहर के नागरिक तथा गाँव के निवासी मजदूर और मालिक तथा मध्य, निम्न व उच्च वर्ग आदि सभी को स्थान मिला।

(iii) धीरे-धीरे कांग्रेस का नेतृत्व विस्तृत हुआ तथा यह अब केवल उच्च वर्ग या जाति के पेशेवर लोगों तक ही सीमित नहीं रहा। इसमें कृषि व कृषकों की बात करने वाले तथा गाँव की ओर रुझान रखने वाले नेता भी उभरे। स्वतन्त्रता के समय तक कांग्रेस एक सामाजिक गठबन्धन का रूप धारण कर चुकी थी तथा वर्ग, जाति, धर्म, भाषा व अन्य हितों के आधार पर इस सामाजिक गठबन्धन से भारत की विविधता की झलक प्राप्त होती थी।

प्रश्न 6.
क्या एकल पार्टी-प्रभुत्व की प्रणाली का भारतीय राजनीति के लोकतान्त्रिक चरित्र पर खराब असर हुआ?
उत्तर:
एकल पार्टी प्रभुत्व की प्रणाली का भारतीय राजनीति की लोकतान्त्रिक प्रवृत्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा प्रभुत्व प्राप्त दल विपक्षी पार्टियों की आलोचना की परवाह न करके मनमाने ढंग से शासन चलाने लगता है व लोकतन्त्र को तानाशाही शासन में बदलने की सम्भावना विकसित होती है, परन्तु हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ। पहले तीन आम-चुनावों में कांग्रेस के प्रभुत्व के भारतीय राजनीति पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़े तथा इसने भारतीय लोकतन्त्र लोकतान्त्रिक राजनीति व लोकतान्त्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इस प्रकार एकल पार्टी-प्रभुत्व प्रणाली के अच्छे परिणामों की पुष्टि निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर होती है-

  1. कांग्रेस राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान किए गए वायदों को पूर्ण करने में सफल रही। जनमानस में कांग्रेस एक विश्वसनीय दल था, जनमानस की आशाएँ उसी से जुड़ी थीं, अतः मतदाताओं ने उसे ही चुना।
  2. तत्कालीन भारत में लोकतन्त्र और संसदीय शासन-प्रणाली अपनी शैशवावस्था में थी। यदि उस समय कांग्रेस का प्रभुत्व न होता और सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा होती तो जनसाधारण का विश्वास लोकतन्त्र और संसदीय शासन-प्रणाली में उठ जाता।
  3. तत्कालीन मतदाता राजनीतिक विचारधाराओं के सम्बन्ध में पूर्ण शिक्षित नहीं था, उसका मात्र 15% भाग ही शिक्षित था। मतदाताओं को कांग्रेस में ही आस्था थी। अतः जनता का मानना था कि कांग्रेस से ही जनकल्याण की आशा की जा सकती है।
  4. प्रभुत्व की स्थिति प्राप्त होने के कारण विपक्षी दलों द्वारा सरकार की आलोचना होने पर भी सरकार अपना कार्य करती रही। इसने भारतीय लोकतन्त्र, संसदीय शासन-प्रणाली व भारतीय राजनीति की लोकतान्त्रिक प्रकृति को सुदृढ़ करने में योगदान दिया।

प्रश्न 7.
समाजवादी दलों और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच के तीन अन्तर बताएँ। इसी तरह भारतीय जनसंघ और स्वतन्त्र पार्टी के बीच के तीन अन्तरों का उल्लेख करें।
उत्तर:
समाजवादी दल और कम्युनिस्ट पार्टी में अन्तर
समाजवादी दल की जड़ों को स्वतन्त्रता से पहले के उस समय में ढूँढा जा सकता है जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जन-आन्दोलन चला रही थी। वहीं दूसरी ओर 1920 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में भारत के विभिन्न भागों में कम्युनिस्ट ग्रुप (साम्यवादी समूह) उभरे। इन दोनों पार्टियों के बीच निम्नलिखित अन्तर हैं-
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भारतीय जनसंघ और स्वतन्त्र पार्टी में अन्तर

भारतीय जनसंघ का गठन सन् 1951 में हुआ था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी इसके संस्थापक अध्यक्ष थे। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जमीन की हदबन्दी, खाद्यान्न के व्यापार, सरकारी अधिग्रहण और सहकारी खेती का प्रस्ताव पारित हुआ था। इसके बाद अगस्त 1959 में स्वतन्त्र पार्टी अस्तित्व में आई। इन दोनों : पार्टियों में प्रमुख अन्तर अग्रलिखित हैं-
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प्रश्न 8.
भारत और मैक्सिको दोनों ही देशों में एक खास समय तक एक पार्टी का प्रभुत्व रहा।बताएँ कि मैक्सिको में स्थापित एक पार्टी का प्रभत्व कैसे भारत की एक पार्टी के प्रभत्व से अलग था।
उत्तर:
इंस्टीट्यूशनल रिवोल्यूशनरी पार्टी जिसे स्पेनिश में पी० आर० आई० कहा जाता है का मैक्सिको में लगभग 60 वर्षों तक शासन रहा। इस पार्टी की स्थापना सन् 1929 में हुई थी तब इसे ‘रिवोल्यूशनरी पार्टी’ कहा जाता था। मूलत: पी० आर० आई० राजनेता व सैनिक नेता, मजदूर तथा किसान संगठन व अनेक राजनीतिक दलों सहित विभिन्न किस्म के हितों का संगठन था। समय बीतने के साथ-साथ पी० आर० आई० के संस्थापक प्लूटार्क इलियास कैलस ने इसके संगठन पर कब्जा कर लिया व इसके पश्चात् नियमित रूप से होने वाले चुनावों में प्रत्येक बार पी० आर० आई० ही विजय प्राप्त करती रही। शेष पार्टियाँ नाममात्र की थी जिससे कि शासक दल को वैधता प्राप्त होती रहे। चुनाव के नियम भी इस प्रकार तय किए गए कि पी० आर० आई० की जीत हर बार निश्चित हो सके। शासक दल ने अक्सर चुनावों में हेर-फेर और धाँधली की। पी० आर० आई० के शासन को ‘परिपूर्ण तानाशाही’ कहा जाता है। अन्ततः सन् 2000 में हुए राष्ट्रपति पद के चुनाव में इस पार्टी को पराजय का मुँह देखना पड़ा। मैक्सिको अब एक पार्टी के प्रभुत्व वाला देश नहीं रहा फिर भी अपने प्रभुत्व के काल में पी० आर० आई० ने जो तरीके अपनाए थे उनका लोकतन्त्र की सेहत पर बहुत प्रभाव पड़ा। मुक्त और निष्पक्ष चुनाव की बात पर अब भी वहाँ के नागरिकों का पूर्ण विश्वास नहीं जम पाया है।

भारत में स्वतन्त्रता संघर्ष से लेकर लगभग सन् 1967 तक देश की राजनीति पर एक ही पार्टी (कांग्रेस) का प्रभुत्व रहा। यहाँ हम मैक्सिको की तुलना भारत में कांग्रेस के प्रभुत्व से करते हैं तो दोनों में अनेक प्रकार के अन्तर मिलते हैं जिनमें से निम्नलिखित प्रमुख हैं-

(1) भारत और मैक्सिको में एकल पार्टी का प्रभुत्व सम्बन्धी अन्तर यह है कि भारत में कांग्रेस का प्रभुत्व एक साथ नहीं रहा, जबकि मैक्सिको में पी० आर० आई० का शासन निरन्तर 60 वर्षों तक चला।

(2) भारत और मैक्सिको में एक पार्टी के प्रभुत्व के मध्य एक बड़ा अन्तर यह है कि मैक्सिको में एक पार्टी का प्रभुत्व लोकतन्त्र की कीमत पर कायम हुआ, जबकि भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ। भारत में कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ प्रारम्भ से ही अनेक पार्टियाँ चुनाव में राष्ट्रीय स्तर व क्षेत्रीय स्तर के रूप में भाग लेती रहीं जबकि मैक्सिको में ऐसा नहीं हुआ।

(3) भारत में प्रजातान्त्रिक संस्कृति व प्रजातान्त्रिक प्रणाली के अन्तर्गत कांग्रेस का प्रभुत्व रहा जबकि मैक्सिको में शासक दल की तानाशाही के कारण इसका प्रभुत्व रहा।

इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन के द्वारा स्पष्ट होता है कि भारत और मैक्सिको दोनों ही देशों में लम्बे समय तक एक ही पार्टी का प्रभुत्व रहा। परन्तु कुछ दृष्टियों में दोनों के प्रभुत्व में अन्तर था।

प्रश्न 9.
भारत का एक राजनीतिक नक्शा लीजिए (जिसमें राज्यों की सीमाएँ दिखाई गई हों) और उसमें निम्नलिखित को चिह्नित कीजिए
(क) ऐसे दो राज्य जहाँ सन् 1952-67 के दौरान कांग्रेस सत्ता में नहीं थी।
(ख)दो ऐसे राज्य जहाँ इस पूरी अवधि में कांग्रेस सत्ता में रही।
उत्तर:
(क) (i) जम्मू और कश्मीर,
(ii) केरल।

(ख) (i) महाराष्ट्र,
(ii) मध्य प्रदेश।
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प्रश्न 10.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़कर इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
कांग्रेस के संगठनकर्ता पटेल कांग्रेस को दूसरे राजनीतिक समूह में निसंग रखकर उसे एक सर्वांगसम तथा अनुशासित पार्टी बनाना चाहते थे। वे चाहते थे कि कांग्रेस सबको समेटकर चलने वाला स्वभाव छोड़े और अनुशासित कॉडर से युक्त एक सगुंफित पार्टी के रूप में उभरे। ‘यथार्थवादी’ होने के कारण पटेल व्यापकता की जगह अनुशासन को ज्यादा तरजीह देते थे। अगर “आन्दोलन को चलाते चले जाने” के बारे में गांधी के ख्याल हद से ज्यादा रोमानी थे तो कांग्रेस को किसी एक विचारधारा पर चलने वाली अनुशासित तथा धुरन्धर राजनीतिक पार्टी के रूप में बदलने की पटेल की धारणा भी उसी तरह कांग्रेस की उस समन्वयवादी भूमिका को पकड़ पाने में चूक गई जिसे कांग्रेस को आने वाले दशकों में निभाना था। – रजनी कोठारी
(क) लेखकक्यों सोच रहा है कि कांग्रेस को एक सर्वांगसमतथाअनुशासित पार्टी नहीं होना चाहिए?
(ख) शुरुआती सालों में कांग्रेस द्वारा निभाई गई समन्वयवादी भूमिका के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(क) लेखक का यह विचार है कि कांग्रेस को एक सर्वांगसम तथा अनुशासित पार्टी नहीं होना चाहिए क्योंकि एक अनुशासित पार्टी में किसी विवादित विषय पर स्वस्थ विचार-विमर्श सम्भव नहीं हो पाता, जो कि देश एवं लोकतन्त्र के लिए अच्छा होता है। लेखक का यह विचार है कि कांग्रेस पार्टी में सभी धर्मों, जातियों, भाषाओं एवं विचारधाराओं के नेता शामिल हैं, उन्हें अपनी बात कहने का पूरा हक है तभी देश का वास्तविक लोकतन्त्र उभरकर सामने आएगा इसलिए लेखक कहता है कि कांग्रेस पार्टी को सर्वांगसम एवं अनुशासित पार्टी नहीं होना चाहिए।

(ख) कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारम्भिक वर्षों में कई विषयों में समन्वयकारी भूमिका निभाई। इसने देश के नागरिकों एवं ब्रिटिश सरकार के मध्य एक कड़ी का कार्य किया। कांग्रेस ने अपने अन्दर क्रान्तिकारी और शान्तिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपन्थी और नरमपन्थी, दक्षिणपन्थी, वामपन्थी और हर धारा के मध्यवर्गियों को समाहित किया। कांग्रेस एक मंच की तरह थी, जिस पर अनेक समूह हित और राजनीतिक दल तक आ जुटते थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेते थे। इसी प्रकार कांग्रेस समाज के प्रत्येक वर्ग-कृषक, मजदूर, व्यापारी, वकील, उद्योगपति, सभी को साथ लेकर चली। इसे सिक्ख, मुस्लिम जैसे अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति एवं जनजातियों, ब्राह्मण, राजपूत व पिछड़ा वर्ग सभी का समर्थन प्राप्त हुआ।

UP Board Class 12 Civics Chapter 2 InText Questions

UP Board Class 12 Civics Chapter 2 पाठान्तर्गत प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
हमारे लोकतन्त्र में ही ऐसी कौन-सी खूबी है? आखिर देर-सबेर हर देश ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपना ही लिया है। है न?
उत्तर:
भारत में राष्ट्रवाद की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए दुनिया के अन्य राष्ट्रों (को उपनिवेशवाद के चंगुल से आजाद हुए) ने भी देर-सबेर लोकतान्त्रिक ढाँचे को अपनाया। लेकिन भारत की चुनौतियों से सबक सीखते हुए उन्होंने राष्ट्रीय एकता की स्थापना को प्रथम प्राथमिकता दी और इसके बाद धीरे-धीरे लोकतन्त्र की स्थापना करने का निर्णय लिया। हमारे लोकतन्त्र की खूबी यह थी कि हमारे स्वतन्त्रता संग्राम की गहरी प्रतिद्वन्द्विता लोकतन्त्र के साथ थी। हमारे नेता लोकतन्त्र में राजनीति की निर्णायक भूमिका को लेकर सचेत थे। वे राजनीति को समस्या के रूप में नहीं देखते थे, वे राजनीति को समस्या के समाधान का उपाय मानते थे। भारतीय नेताओं ने विभिन्न समूहों के हितों के मध्य टकराहट को दूर करने का एकमात्र उपाय लोकतान्त्रिक राजनीति को माना। इसीलिए हमारे नेताओं ने इसी रास्ते को चुना।

प्रश्न 2.
क्या आप उन जगहों को पहचान सकते हैं जहाँ कांग्रेस बहुत मजबूत थी? किन प्रान्तों में दूसरी पार्टियों को ज्यादातर सीटें मिलीं? उत्तर:
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नोट-यह नक्शा किसी पैमाने के हिसाब से बनाया गया भारत का मानचित्र नहीं है। इसमें दिखाई गई भारत की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा को प्रामाणिक सीमा रेखा न माना जाए।

  1. 1952 से 1967 के दौरान कांग्रेस शासित राज्य थे-पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, मणिपुर, उड़ीसा, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, मैसूर, पाण्डिचेरी, मद्रास आदि।
  2. जिन राज्यों में अन्य दलों को सीटें प्राप्त हुईं वे थे-केरल में केरल-डेमोक्रेटिक सेफ्ट फ्रंट (1957-1959) तथा जम्मू और कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी।

प्रश्न 3.
पहले हमने एक ही पार्टी के भीतर गठबन्धन देखा और अब पार्टियों के बीच गठबन्धन होता देख रहे हैं। क्या इसका मतलब यह हुआ कि गठबन्धन सरकार 1952 से ही चल रही है?
उत्तर:
भारत में ‘पार्टी में गठबन्धन’ और ‘पार्टियों का गठबन्धन’ का सिलसिला 1952 से ही चला आ रहा है लेकिन इस गठबन्धन के स्वरूप एवं प्रकृति में व्यापक अन्तर है।

आजादी के समय एक पार्टी अर्थात् कांग्रेस के अन्दर गठबन्धन था। इस पार्टी में प्रारम्भ में नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारियों का बोलबाला रहा। इसके पश्चात् उद्योगपति, किसान, मजदूरों, निम्न और उच्च वर्ग के लोगों को जगह मिली। कांग्रेस ने अपने अन्दर क्रान्तिकारी और शान्तिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपन्थी और नरमपन्थी, दक्षिणपन्थी, वामपन्थी और हर प्रकार की विचारधाराओं के लोगों को समाहित किया। कांग्रेस एक मंच की तरह थी, जिस पर अनेक समूह हित और राजनीतिक दल आ जुटते थे और राजनीतिक कार्यों में भाग लेते थे। कांग्रेस पार्टी ने इन विभिन्न वर्गों, समुदायों एवं विचारधारा के लोगों में आम सहमति बनाए रखी।

लेकिन सन् 1967 के बाद अनेक राजनीतिक दलों का विकास हुआ और गठबन्धन की राजनीति शुरू हुई जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थन के आधार पर सरकारों का गठन किया जाने लगा। लेकिन यह गठबन्धन निजी स्वार्थों व शर्तों पर आधारित होते हैं जिनमें परस्पर आम सहमति कायम रखना बहुत ही कठिन कार्य है। यही कारण है कि वर्तमान बहुदलीय व्यवस्था में राजनीतिक स्थायित्व का अभाव पाया जाता है।

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UP Board Class 12 Civics Chapter 2 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रथम तीन आम चुनावों के सन्दर्भ में एक दल की प्रधानता का वर्णन कीजिए तथा इस प्रधानता के कारकों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में सर्वप्रथम सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। अपने प्रारम्भिक रूप में यह नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों का हित समूह भर थी, लेकिन 20वीं सदी में इसने जन-आन्दोलन का रूप धारण कर लिया और इसने एक जनव्यापी राजनीतिक पार्टी का रूप ले लिया। स्वतन्त्रता के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस का वर्चस्व लगातार तीन दशकों तक कायम रहा।

भारत में एक दल की प्रधानता के कारण

भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् चुनावों में एक दल के प्रभुत्व के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

1. कांग्रेस पार्टी को सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व प्राप्त था-कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि इसमें देश के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था। कांग्रेस पार्टी उदारवादी, गरमपन्थी, दक्षिणपन्थी, साम्यवादी तथा मध्यमार्गी नेताओं का एक महान मंच था जिसके कारण लोग इसी पार्टी को मत दिया करते थे।

2. अधिकांश राजनीतिक दलों का निर्माण कांग्रेस पार्टी से ही हुआ-स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक वर्षों में जितने भी विरोधी राजनीतिक दल थे उनमें से अधिकांश राजनीतिक दल कांग्रेस से ही निकले; जैसे-सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा समाजवादी पार्टी, संयुक्त समाजवादी पार्टी, जनसंघ, राम राज्य परिषद् तथा हिन्दू महासभा आदि।

3. कांग्रेस का चामत्कारिक नेतृत्व-कांग्रेस में पं० जवाहरलाल नेहरू थे जो भारतीय राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। नेहरू ने कांग्रेस पार्टी के चुनाव अभियान की अगुवाई की तथा पूरे देश का दौरा किया। वह किसी भी प्रतिद्वन्द्वी से चुनावी दौड़ में बहुत आगे रहे। फलत: कांग्रेस को तीनों प्रथम आम चुनावों में अभूतपूर्व सफलता मिली।

4. राष्ट्रीय आन्दोलन की विरासत-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चामत्कारिक नेतृत्व में भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। राष्ट्रीय आन्दोलन का केन्द्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रही। इसलिए कांग्रेस पार्टी को स्वतन्त्रता संग्राम की विरासत प्राप्त थी। तब के दिनों में यही एकमात्र पार्टी थी जिसका संगठन सम्पूर्ण भारत में था। इसका लाभ चुनावों में कांग्रेस पार्टी को मिला।

5. गुटों में तालमेल और सहनशीलता–कांग्रेस के गठबन्धनी स्वभाव ने असें तक इसे असाधारण ताकत दी। गठबन्धन के कारण कांग्रेस सर्व-समावेशी स्वभाव और सुलह समझौते के द्वारा गुटों के सन्तुलन कायम करती रही। अपने गठबन्धनी स्वभाव के कारण कांग्रेस विभिन्न गुटों के प्रति सहनशील थी और इस स्वभाव से विभिन्न गुटों को बढ़ावा भी मिला। इसलिए विभिन्न हित और विचारधाराओं की नुमाइंदगी कर रहे नेता कांग्रेस के भीतर ही बने रहे। इस तरह कांग्रेस एक भारी-भरकम मध्यमार्गी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आती थी। दूसरी पार्टियाँ कांग्रेस के इस या उस गुट को प्रभावित करने की कोशिश करती थीं। इस तरह वे हाशिये पर ही रहकर नीतियों और फैसलों को अप्रत्यक्ष रीति से प्रभावित कर पाती थीं। अत: वे कांग्रेस का कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं कर पाती थीं। फलतः कांग्रेस को प्रथम तीन चुनावों तक अभूतपूर्व सफलता मिलती रही।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत के लोकतान्त्रिक प्रणाली अपनाने के प्रतिकूल कौन-कौन सी चुनौतियाँ थीं? विस्तारपूर्वक उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्र भारत का जन्म अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में हुआ। देश के सामने प्रारम्भ से ही राष्ट्र-निर्माण की चुनौती थी। ऐसी अनेक चुनौतियों की चपेट में आकर कई अन्य देशों के नेताओं ने फैसला किया कि उनके देश में अभी लोकतन्त्र को ही नहीं अपनाया जा सकता है। इन नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय एकता हमारी पहली प्राथमिकता है और लोकतन्त्र को अपनाने से मतभेद और संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा। उपनिवेशवाद के चंगुल से आजाद हुए कई देशों में इसी कारण अलोकतान्त्रिक शासन-व्यवस्था कायम हुई। इस अलोकतान्त्रिक शासनव्यवस्था के कई रूप थे। अलोकतान्त्रिक शासन व्यवस्थाओं की शुरुआत इस वायदे से हुई कि शीघ्र ही लोकतन्त्र कायम कर दिया जाएगा।

भारत में भी परिस्थितियाँ बहुत अलग नहीं थीं, परन्तु स्वतन्त्र भारत के नेताओं ने अपने लिए कहीं अधिक कठिन रास्ता चुनने का फैसला लिया। नेताओं ने कोई और रास्ता चुना होता तो वह अचम्भित करने वाली बात होती क्योंकि हमारे स्वतन्त्रता-संग्राम की गहरी प्रतिबद्धता लोकतन्त्र से थी। हमारे नेताओं ने राजनीति को समस्या के रूप में नहीं देखा तथा वे लोकतन्त्र में राजनीति की निर्णायक भूमिका को लेकर सचेत थे। वे राजनीति को समस्या के समाधान का उपाय मानते थे। किसी भी समाज में कई समूह होते हैं, इनकी आकांक्षाएँ अक्सर अलग-अलग एक-दूसरे के विपरीत होती हैं। हर समाज के लिए यह फैसला करना आवश्यक होता है कि उसका शासन कैसे चलेगा और वह किन कायदे-कानूनों पर अमल करेगा। सत्ता और प्रतिस्पर्धा राजनीति की दो सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण चीजें हैं। परन्तु राजनीतिक गतिविधि का उद्देश्य जनहित का फैसला करना और उस पर अमल करना होता है। अतः हमारे नेताओं ने लोकतान्त्रिक राजनीति के रास्ते को चुनने का फैसला किया। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय निम्नलिखित परिस्थितियाँ थीं जो लोकतन्त्र की सफलता में बाधक या चुनौती थीं-

1. निरक्षरता-लोकतन्त्र की सफलता शिक्षित समाज पर ही निर्भर करती है। स्वतन्त्रता के समय, सन् 1951 की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता की दर 18 प्रतिशत थी तथा इसमें भी महिला साक्षरता का 8-9 प्रतिशत था। इतनी संख्या में अशिक्षित जनता को मत देने का अधिकार बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहा जा सकता क्योंकि अशिक्षित व्यक्ति अपने मत का दुरुपयोग भी कर सकते हैं, उनका वोट खरीदा भी जा सकता है। अशिक्षित व्यक्ति राजनीतिक विचारधाराओं व शासन की वास्तविकताओं को भली-भाँति समझ नहीं पाता तथा राजनीतिक दलों के झांसे में आ जाता है। इस तरह निरक्षरता एक बड़ी चुनौती थी।

2. निर्धनता—ब्रिटिश शासन काल के दौरान अंग्रेजों द्वारा देश का अत्यधिक शोषण किया गया था। स्वतन्त्रता के समय देश की अर्थव्यवस्था अत्यन्त दयनीय थी। इस प्रकार की स्थिति में गरीब मतदाताओं के प्रभावित होने की गुंजाइश थी। इनके वोट को खरीदा भी जा सकता था।

3. जातिवाद-भारत के सम्पूर्ण राज्यों की राजनीति जातिवाद के कुप्रभाव से प्रभावित थी। जातिवाद लोगों की आँखों पर पट्टी बाँध देता है तथा उन्हें योग्य व चरित्रवान व्यक्ति दिखाई नहीं देता। केवल अपनी जाति का ही उम्मीदवार दिखाई देता है चाहे वह कैसा भी क्यों न हो। जातिवाद के आधार पर ही राजनीतिक दल टिकट देते हैं तथा मतदाता भी इसी आधार पर मतदान करते हैं। जातिवाद के कारण कभी-कभी हिंसक घटनाएँ भी हो जाती हैं।

4. क्षेत्रवाद-क्षेत्रवाद की भावना संकीर्ण विचारों व मानसिकता पर आधारित होती है। क्षेत्रीय आधार पर नई-नई क्षेत्रीय पार्टियों का निर्माण किया जाता है। ये पार्टियाँ क्षेत्रवाद को बढ़ावा देती हैं। वर्तमान में गठबन्धन की राजनीति ने इन क्षेत्रीय दलों के महत्त्व में अप्रतिम वृद्धि की है।

5. साम्प्रदायिकता-साम्प्रदायिकता धार्मिक आधार पर एक संकीर्ण विचारधारा है तथा लोकतन्त्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। हमारे देश में अनेक दलों जैसे हिन्दू सभा, मुस्लिम लीग, अकाली दल, शिव सेना, विश्व हिन्दू परिषद् आदि का निर्माण साम्प्रदायिक आधार पर किया गया। तमिलनाडु के डी० एम० के० तथा ए० आई० ए० डी० एम० के० गैर-ब्राह्मण लोगों की पार्टियाँ हैं। राजनीतिक दल साम्प्रदायिक आधार पर मतदाताओं को प्रभावित करते हैं जो कि लोकतन्त्र की सफलता में बाधक है।

6. स्त्री-पुरुष असमानता-लोकतन्त्र सभी नागरिकों के लिए समानता के सिद्धान्त पर आधारित है परन्तु भारतीय समाज में स्त्रियों को पुरुषों के समान नहीं समझा जाता था तथा उन्हें अपनी इच्छाएँ बताने की भी स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं थी। अतः वे राजनीति में कम भाग लेती थीं तथा परिवार के पुरुषों की इच्छाओं के अनुरूप ही मतदान करती थीं।

प्रश्न 3.
स्वतन्त्रता पूर्व से सन् 1967 तक मिली-जुली सरकारों के उदाहरण प्रस्तुत कीजिए तथा बताइए कि भारतीय राज्यों में मिली-जुली सरकारों की राजनीति सन् 1967 के पश्चात् क्यों प्रारम्भ हुई।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व मिली-जुली सरकार भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में मिली-जुली सरकार के गठन का इतिहास स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व से प्रारम्भ होता है। स्वतन्त्र भारत में नियमों व विधानों के निर्माण हेतु तथा नवीन संविधान की रचना हेतु कैबिनेट मिशन के द्वारा एक अन्तरिम सरकार का गठन किया गया था।

इस सरकार में भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, अकाली दल आदि को शामिल किया गया था। इस अन्तरिम सरकार के सभी दलों को मिलाकर कुल 14 प्रतिनिधि शामिल किए गए जिसमें कांग्रेस के 6, मुस्लिम लीग के 5, अकाली दल का 1, एंग्लो इण्डियन समुदाय का 1 तथा पारसी समुदाय का 1 प्रतिनिधि था। अन्तरिम सरकार का अध्यक्ष गवर्नर जनरल को बनाया गया। भारतीय प्रशासन के सभी विभाग अन्तरिम सरकार को सौंपे गए। इस अन्तरिम सरकार के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू थे। इस अन्तरिम सरकार ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद तब तक यह कार्य किया जब तक कि संविधान लागू नहीं हुआ।

1952 से 1967 तक मिली-जुली सरकार भारत के प्रथम आम-चुनाव 1952 में हुए। इन चुनावों में चुनाव आयोग ने 14 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल के रूप में मान्यता प्रदान की। इन चुनावों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ, क्योंकि उस समय राजनीतिक दल कांग्रेस के समान व्यापक स्तर के नहीं थे फिर भी पं० जवाहरलाल नेहरू ने डॉ० बी० आर० अम्बेडकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, गोपाला स्वामी आयंगर जैसे गैर-कांग्रेसी सदस्यों को भी अपने मन्त्रिमण्डल में शामिल किया। भारतीय राज्यों में मिली-जुली सरकारों की राजनीति सन् 1967 के बाद प्रारम्भ हुई। इसके उदय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

1. एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न होना-चौथे आम-चुनावों के समय उत्तर प्रदेश, उड़ीसा (वर्तमान ओडिशा), मध्य प्रदेश, प० बंगाल, केरल व गुजरात में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो सका। इसलिए अनेक दलों ने परस्पर सहयोग कर सरकारों का गठन किया।

2. कांग्रेस के एकाधिकार को समाप्त करना-विभिन्न दलों का उद्देश्य कांग्रेस की आलोचना करके कांग्रेस के एकाधिकार को समाप्त करना था। इनका उद्देश्य सत्ता प्राप्ति भी था। इसमें क्षेत्रीय दलों को भी सफलता प्राप्त हुई और राज्यों में मिली-जुली सरकारों का उदय भी हुआ।

3. दल-बदल की राजनीति-राज्य में मिली-जुली सरकारों के उदय का प्रमुख कारण दल-बदल की राजनीति भी रहा है। सन् 1952 से 1956 के मध्य भी 542 बार दल-बदल हुआ। यह दल-बदल कांग्रेस के पक्ष में रहा। परन्तु 1967 के आम चुनावों में एक वर्ष के अन्दर ही 438 बार सदस्यों ने दल-बदल किया। दल-बदल ने केन्द्र एवं राज्यों की राजनीति एवं शासन में अस्थिरता ला दी व इसके कारण भारतीय राजनीति के शब्दकोश में ‘आयाराम-गयाराम’ जैसा शब्द जुड़ गया।

4. केन्द्र व राज्य के मध्य मतभेद की भावना-राज्यों में मिली-जुली सरकारों के उदय का एक कारण केन्द्र व राज्य के सम्बन्धों में कटुता की भावना का उदय होना भी रहा। यदि कोई भी राज्य सरकार केन्द्र सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन नहीं करती थी, तो वहाँ जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता था। केन्द्र व राज्य के मध्य मतभेद उत्पन्न होने के कुछ अन्य कारण भी थे; जैसे-राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति, आर्थिक सहायता आदि।

5. सत्ता-प्राप्ति का लालच-सत्ता प्राप्ति के लोभ ने मिली-जुली सरकारों के उदय में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। प्रायः उन नेताओं ने मिली-जुली सरकारों के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिन्हें कांग्रेस के शासन-काल में सत्ता सुख प्राप्त नहीं हुआ था। इसी कारण अनेक दलों ने मिलकर मिली-जुली सरकारों का गठन किया ताकि सत्ता सुख प्राप्त हो सके।

इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि सन् 1967 के बाद राज्यों में मिली-जुली सरकारों की स्थापना हुई।

प्रश्न 4.
भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा एवं कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी-5 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व जनसंघ के सदस्यों का नई दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन हुआ और एक नई पार्टी बनाने का निश्चय किया जिसमें 6 अप्रैल, 1980 को तत्कालीन विदेशमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का गठन किया गया। भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में अनेक कार्यक्रमों को स्वीकृति प्रदान की गई।

भारतीय जनता पार्टी की नीतियाँ एवं कार्यक्रम

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में विभिन्न मुद्दों को दृष्टिगत रखते हुए निम्नलिखित नीतियाँ एवं कार्यक्रम निर्धारित किए गए-

(क) राजनीतिक कार्यक्रम-भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख राजनीतिक कार्यक्रम निम्नलिखित हैं-

  1. सत्ता की पुनः स्थापना करना-घोषणा-पत्र में कहा गया है कि पार्टी का सबसे पहला काम राज्य की सत्ता को पुनः स्थापित करना।
  2. राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता-चुनाव घोषणा-पत्र में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी देश की एकता और अखण्डता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
  3. संवैधानिक सुधार–पार्टी पिछले कुछ वर्षों के अनुभवों के आधार पर कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर संविधान की समीक्षा करने के पक्ष में है।
  4. सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता—भारतीय जनता पार्टी सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखती है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्महीन राज्य नहीं है। पार्टी सभी धर्मों को समान मानने में विश्वास रखती है।
  5. पंचायती राज को सुदृढ़ करना-भाजपा पंचायती राज को सुदृढ़ करने के लिए 73वें तथा 74वें संविधान संशोधन में परिवर्तन करेगी। पंचायती राज को आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ करने का प्रयास करेगी।
  6. प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार–पार्टी जनता का हित चिन्तक, निष्पक्ष और जवाबदेह बनने के लिए तथा नागरिकों को उत्तम सेवाएँ उपलब्ध कराने के लिए प्रशासनिक सुधार करेगी।

(ख) आर्थिक कार्यक्रम एवं नीतियाँ-भाजपा के आर्थिक कार्यक्रम एवं नीतियाँ इस प्रकार हैं-

  1. देश में भुखमरी की समस्या का समाधान करने पर बल।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र का व्यावसायिक आधार पर प्रबन्धन करने पर बल।
  3. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के बारे में राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए नीतियों का निर्धारण करना।
  4. भाजपा देश में कृषिगत क्षेत्र के विस्तार तथा किसानों की स्थिति में सुधार एवं उनके कृषिगत उत्पादों के उचित मूल्य दिलवाने हेतु कटिबद्ध है।
  5. भाजपा चुनावी घोषणा-पत्र में उद्योगों के चहुंमुखी विकास के बारे में विशेष कार्यक्रमों की व्यवस्था
    की गई है।
  6. पार्टी ने नागरिकों को काम के मौलिक अधिकार को स्वीकार करते हुए कहा है कि उसकी सभी नीतियाँ रोजगारोन्मुखी होंगी।
  7. पार्टी ग्रामीण व नगरीय विकास हेतु कटिबद्ध है।

(ग) सामाजिक कार्यक्रम-सामाजिक कार्यक्रम के अन्तर्गत पार्टी-

  1. अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु वचनबद्ध है,
  2. यह महिलाओं के सशक्तीकरण हेतु कार्यक्रमों व योजनाओं के निर्माण पर बल देती है, यह 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा, महिला शिक्षा व ग्रामीण क्षेत्रों में । शिक्षा की उचित व्यवस्था करने के पक्ष में है।
  3. राष्ट्रीय सुरक्षा-पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में बड़ी जिम्मेदारी से काम करेगी। पार्टी सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील सीमावर्ती राज्यों; जैसे-जम्मू-कश्मीर, पंजाब, पूर्वोत्तर प्रदेश तथा असोम की सामाजिक एवं राजनीतिक गड़बड़ियों को दूर करने की कोशिश करेगी।

(ङ) विदेश नीति–पार्टी स्वतन्त्र विदेशी नीति की पक्षधर है तथा विश्व शान्ति, नि:शस्त्रीकरण, गुटनिरपेक्षता को मजबूत करने और पड़ोसी देशों के साथ शान्ति एवं मित्रता की नीति अपनाने, SAARC व आसियान जैसे क्षेत्रीय समूहीकरण को बढ़ावा देने के लिए वचनबद्ध है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
प्रथम आम चुनाव में कांग्रेसको भारी सफलता प्राप्त होने के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता प्राप्त होने के प्रमुख कारण निम्नांकित हैं-

  1. कांग्रेस दल ने प्रथम आम चुनाव में लोकसभा की कुल 489 सीटों में से 364 सीटें जीतीं और इस प्रकार वह किसी भी प्रतिद्वन्द्वी से चुनावी दौड़ में आगे निकल गई।
  2. लोकसभा के चुनाव के साथ-साथ विधानसभा के चुनाव भी कराए गए थे। विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को बड़ी जीत प्राप्त हुई।
  3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रचलित नाम कांग्रेस पार्टी था और इस पार्टी को स्वाधीनता संग्राम की विरासत प्राप्त थी। उस समय एकमात्र यही पार्टी थी, जिसका संगठन सम्पूर्ण देश में था।
  4. कांग्रेस पार्टी के लिए स्वयं जवाहरलाल नेहरू, जो भारतीय राजनीति के सबसे लोकप्रिय नेता थे, ने चुनाव अभियान की अगुवाई की और पूरे देश का दौरा किया। जब चुनावी परिणामों की घोषणा हुई तो कांग्रेस पार्टी की भारी-भरकम जीत से बहुतों को आश्चर्य हुआ।

प्रश्न 2.
एक प्रभुत्व वाली दल प्रणाली के लाभ व दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
एक प्रभुत्व वाली दल प्रणाली के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-

एक प्रभुत्व वाली दल प्रणाली के कुछ मुख्य दोष (हानियाँ) निम्नलिखित हैं-

प्रश्न 3.
सन् 1967 के बाद भारतीय राजनीति में कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सन् 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को केवल इतनी ही सीटें प्राप्त हुईं कि वह साधारण बहुमत द्वारा सरकार गठित कर सके। कांग्रेस के प्रभुत्व में इस गिरावट के निम्नलिखित कारण थे –

  1. सन् 1964 में पण्डित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस में कोई प्रभावशाली व्यक्तित्व दिखाई नहीं देता था।
  2. देश के विभिन्न भागों में क्षेत्रवादी भावनाएँ पनपने लगी थीं, इससे अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों का संगठन होने लगा।
  3. सन् 1964 में देश के अन्य राजनीतिक दलों; जैसे-साम्यवादी दल, भारतीय जनसंघ, मुस्लिम लीग तथा समाजवादी दल के प्रभाव में वृद्धि हुई।
  4. केन्द्र में विरोधी दलों के विरुद्ध कांग्रेस की सरकार ने संविधान के कुछ प्रावधानों का दुरुप्रयोग किया जिससे लोगों में नकारात्मकता उत्पन्न हुई।
  5. विभिन्न राज्यों में मिली-जुली सरकारों के गठन की राजनीति प्रारम्भ हो गई थी।
  6. 1975 से 1977 तक आपातकालीन परिस्थितियों ने भी जनता पर कांग्रेस के विरुद्ध प्रतिकूल प्रभाव डाला।

प्रश्न 4.
प्रारम्भ से ही कांग्रेस पार्टी का भारतीय राजनीति में केन्द्रीय स्थान रहा है। क्यों?
उत्तर:
कांग्रेस एशिया का सबसे पुराना राजनीतिक दल रहा है। भारतीय राजनीति के केन्द्र में यह दो दृष्टिकोणों से प्रमुख है-
प्रथम-अनेक दल तथा गुट कांग्रेस के केन्द्र से विकसित हुए हैं और इसके इर्द-गिर्द अपनी नीतियों तथा अपनी गुटीय रणनीतियों को विकसित किया, तथा – द्वितीय-भारतीय राजनीति के वैचारिक वर्णक्रम के केन्द्र का अभियोग करते हुए यह एक ऐसे केन्द्रीय दल के रूप में स्थित है, जिसके दोनों तरफ अन्य दल तथा गुट नजर आते हैं। भारत में केवल एक केन्द्रीय दल उपस्थित है और वह है-कांग्रेस पार्टी।

लेकिन वर्तमान समय में दलीय व्यवस्था के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आया है जिसमें बहुदलीय व्यवस्था और क्षेत्रीय दलों के विकास ने एकदलीय प्रभुत्व की स्थिति को कमजोर बना दिया है लेकिन फिर भी अन्य दलों के मुकाबले कांग्रेस का भारतीय राजनीति में केन्द्रीय स्थान है।

प्रश्न 5.
प्रथम तीन आम चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मजबूत स्थिति के पीछे उत्तरदायी कारणों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कांग्रेस की प्रधानता के लिए उत्तरदायी कारण-कांग्रेस पार्टी सन् 1920 से लेकर 1967 तक भारतीय राजनीति पर अपनी छत्रच्छाया कायम रखने में सफल रही। इसके पीछे अनेक कारण जिम्मेदार रहे, इनमें प्रमुख हैं-

  1. प्रथम कारण यह है कि कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रीय आन्दोलन के वारिस के रूप में देखा गया। आज़ादी के आन्दोलन के अग्रणी नेता अब कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे।
  2. दूसरा कारण यह था कि कांग्रेस ही ऐसा दल था जिसके पास राष्ट्र के कोने-कोने व ग्रामीण स्तर पर फैला हुआ संगठन था।
  3. तीसरा कारण यह था कि कांग्रेस एक ऐसा संगठन था जो अपने आपको स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल ढाल सके।
  4. कांग्रेस पहले से ही एक सुसंगठित पार्टी थी। बाकी दल अभी अपनी रणनीति बना ही रहे होते थे कि कांग्रेस अपना अभियान शुरू कर देती।

इस प्रकार कांग्रेस को ‘अव्वल और इकलौता’ होने का फायदा मिला।

प्रश्न 6.
भारत में राजनीतिक दलों द्वारा अपने कार्यों का निर्वहन करने में आने वाली कठिनाइयों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
राजनीतिक दलों की समस्याएँ-भारत में राजनीतिक दलों की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं-

  1. दलीय व्यवस्था में अस्थिरता-भारतीय दलीय व्यवस्था निरन्तर बिखराव और विभाजन का शिकार रही है। सत्ता प्राप्ति की लालसा ने राजनीतिक दलों को अवसरवादी बना दिया है जिससे यह संकट उत्पन्न हुआ है।
  2. राजनीतिक दलों में गुटीय राजनीति-भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों में तीव्र आन्तरिक गुटबन्दी विद्यमान है। इन दलों में छोटे-छोटे गुट पाए जाते हैं।
  3. दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव-भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव है और वे घोर अनुशासनहीनता से पीड़ित हैं। भारत में अधिकांश राजनीतिक दल नेतृत्व की मनमानी प्रवृत्ति और सदस्यों की अनुशासनहीनता से पीड़ित हैं।

प्रश्न 7.
भारत में 91वें संवैधानिक संशोधन द्वारा दल-बदल को रोकने के लिए क्या-क्या उपाय किए गए हैं?
उत्तर:
भारत में दल-बदल को रोकने के लिए 52वें संवैधानिक संशोधन द्वारा बनाया गया कानून पूरी तरह असफल रहा। इसी कारण से दल-बदल को और अधिक कठोर बनाने के लिए दिसम्बर 2003 में संविधान में 91वाँ संशोधन किया गया। इस संवैधानिक संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई कि दल-बदल करने वाला कोई सांसद या विधायक सदन की सदस्यता खोने के साथ-साथ अगली बार चुनाव जीतने तक अथवा सदन के शेष कार्यकाल तक (जो पहले हो) मन्त्री पद या लाभ का कोई अन्य पद प्राप्त नहीं कर सकेगा। इस कानून में सांसदों या विधायकों के दल-बदल करने के लिए एक-तिहाई संख्या की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 8.
1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 2004 के आम चुनाव तक मतदान के तरीके में क्या बदलाव आए हैं?
उत्तर:1
952 से लेकर 2004 के आम चुनाव तक मतदान के तरीकों में निम्नलिखित बदलाव आए हैं-

  1. 1952 के पहले आम चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार के नाम व चुनाव चिह्न की एक मतपेटी रखी गईं थी। हर मतदाता को एक खाली मत-पत्र दिया गया जिसे उसने अपने पसन्द के उम्मीदवार की मतपेटी में डाला। शुरुआती दो चुनावों के बाद यह तरीका बदल दिया गया।
  2. बाद के चुनावों में मत-पत्र पर हर उम्मीदवार का नाम व चुनाव चिह्न अंकित किया गया। मतदाता को मत-पत्र में अपने पसन्द के उम्मीदवार के आगे मुहर लगानी होती थी। मतदान पूर्णत: गुप्त रखा जाता था।
  3. 1990 के दशक के अन्त में चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोग शुरू कर दिया और 2004 के आम चुनावों में मशीनों से वोट डाले गए।

प्रश्न 9.
भारतीय दलीय व्यवस्था की कमियों का उल्लेख कीजिए। अथवा सरकारों की अस्थिरता के लिए उत्तरदायी भारतीय दलीय व्यवस्था की कमियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारतीय दलीय व्यवस्था की कमियाँ-भारतीय दलीय व्यवस्था की कमियाँ निम्नलिखित हैं जो कि सरकार की अस्थिरता के लिए उत्तरदायी हैं-

1. राजनीतिक दल-बदल-भारतीय राजनीतिक दलों में वैचारिक प्रतिबद्धता का अभाव तीव्र आन्तरिक गुटबन्दी और गहरी सत्ता लिप्सा ने दलीय व्यवस्था में राजनीतिक दल-बदल को जन्म दिया है। इस दल-बदल की स्थिति ने राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया। ।

2. नेतृत्व संकट-भारत के राजनीतिक दलों के समक्ष नेतृत्व का संकट भी है। अधिकांश राजनीतिक दलों के पास ऐसा नेतृत्व नहीं है जिसका अपना कोई ऊँचा राजनीतिक कद हो। नेतृत्व का बौना कद दल को एकजुट रखने में असमर्थ रहता है।

3. वैचारिक प्रतिबद्धता का अभाव-भारतीय राजनीतिक दलों में कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है। व्यवहार में विचारधारा पर आधारित दलों; जैसे-मार्क्सवादी दल, भारतीय साम्यवादी दल, भाजपा आदि ने भी घोर अवसरवादी राजनीति का परिचय दिया है। इन सभी राजनीतिक दलों का उद्देश्य येन-केन प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना है और ये सत्ता प्राप्त करने के लिए अपने तथाकथित सिद्धान्तों को तिलांजलि देने को तत्पर हैं।

प्रश्न 10.
भारतीय जनसंघ के गठन व विचारधारा पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारतीय जनसंघ का गठन-भारतीय जनसंघ का गठन सन् 1951 में हुआ था। इसके संस्थापक अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे। प्रारम्भिक वर्षों में इस पार्टी को हिन्दी भाषी राज्यों; जैसे-राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में समर्थन मिला। जनसंघ के नेताओं ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और बलराज मधोक के नाम शामिल हैं।

जनसंघ की विचारधारा

  1. जनसंघ ने ‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’ के विचार पर बल दिया। इसका मानना था कि देश भारतीय संस्कृति और परम्परा के आधार पर आधुनिक, प्रगतिशील और ताकतवर बन सकता है।
  2. जनसंघ ने भारत और पाकिस्तान को एक करके ‘अखण्ड भारत’ बनाने की बात कही।
  3. जनसंघ अंग्रेजी को हटाकर हिन्दी को राजभाषा बनाने का पक्षधर था।
  4. इसने धार्मिक व सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को रियायत देने की बात का विरोध किया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
भारतीय दलीय व्यवस्था की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारतीय दलीय व्यवस्था की. प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. भारत में बहुदलीय व्यवस्था है और राजनीतिक दल विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  2. भारतीय दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों का भी अस्तित्व है।

प्रश्न 2.
उपनिवेशवाद से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उपनिवेशवाद-वह विचारधारा जिससे प्रेरित होकर प्राय: एक शक्तिशाली राष्ट्र अन्य राष्ट्र या किसी राष्ट्र विशेष के किसी भाग पर अपना वर्चस्व स्थापित कर, उसके आर्थिक एवं प्राकृतिक संसाधनों का शोषण अपने हित में करता है उसे ‘उपनिवेशवाद’ कहते हैं।

प्रश्न 3.
भारत के पहले तीन चुनावों में कांग्रेस के प्रभुत्व के दो कारण बताइए।
उत्तर:

  1. राष्ट्रीय संघर्ष में कांग्रेसी नेताओं का जनता में अधिक लोकप्रिय होना उसकी प्रधानता का प्रमुख कारण था।
  2. कांग्रेस ही ऐसा दल था जिसके पास राष्ट्र के कोने-कोने व ग्रामीण स्तर तक फैला हुआ संगठन था।

प्रश्न 4.
भारत में एकदलीय प्रधानता का युग कंब समाप्त हुआ? इसके क्या कारण थे?
उत्तर:
भारत में सन् 1977 में एकदलीय प्रधानता का युग समाप्त हुआ। इसके मुख्य कारण थेआपातकाल के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार की लोगों पर ज्यादतियाँ/अन्याय। दूसरा कारण था-तत्कालीन सरकार के तानाशाही दृष्टिकोण से लोग नाराज हो गए और विपक्षी पार्टियाँ एक गठबन्धन के रूप में सामने आईं।

प्रश्न 5.
1977 के चुनावों में कांग्रेस की हार के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
सन् 1977 के चुनावों में कांग्रेस की हार के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

  1. सरकार की तानाशाही पद्धति, मौलिक अधिकारों को भंग करना।
  2. आवश्यक वस्तुओं का बाजार से गायब होना, जमाखोरी तथा आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में उछाल।
  3. सन् 1975 के आपातकाल की ज्यादतियाँ/परिवार नियोजन जबरदस्ती से करना।

प्रश्न 6.
क्या क्षेत्रीय दल आवश्यक हैं? अपने उत्तर के पक्ष में कोई दो तर्क दीजिए।
उत्तर:
भारत में क्षेत्रीय दलों का होना अति आवश्यक है। क्षेत्रीय दलों के होने के दो महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं-

  1. भारत में विभिन्न भाषाओं, धर्मों तथा जातियों के लोग रहते हैं। अनेक क्षेत्रीय दलों का निर्माण जाति, धर्म एवं भाषा के आधार पर हुआ है।
  2. भारत की भौगोलिक बनावट में विभिन्नता पायी जाती है। विभिन्न क्षेत्रों की अपनी समस्याएँ तथा आवश्यकताएँ हैं। इनकी पूर्ति के लिए क्षेत्रीय दलों का होना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
आलोचक ऐसा क्यों सोचते थे कि भारत में चुनाव सफलतापूर्वक नहीं कराए जा सकेंगे? किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं कराए जा सकने के सम्बन्ध में आलोचकों के निम्नलिखित तर्क थे-

  1. भारत क्षेत्रफल तथा जनसंख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा देश है तथा शुरू से ही नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान कर दिया गया है। इतने बड़े निर्वाचक मण्डल के लिए व्यवस्था करना बहुत कठिन होगा।
  2. भारत के अधिकांश मतदाता अशिक्षित थे। वे स्वतन्त्रतापूर्वक व समझदारी से मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे, इस पर उन्हें सन्देह था।

प्रश्न 8.
निर्दलियों की बढ़ती संख्या एक चुनौती है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
चुनाव में राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न होने की स्थिति में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हो रही है। ये निर्दलीय उम्मीदवार भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। यह भारतीय दलीय व्यवस्था के हित में नहीं है।

प्रश्न 9.
सी० राजगोपालाचारी के व्यक्तित्व पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सी० राजगोपालाचारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं प्रसिद्ध साहित्यकार थे। ये संविधान सभा के सदस्य थे तथा भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने। ये केन्द्र सरकार के मन्त्री तथा मद्रास के मुख्यमन्त्री भी रहे। सन् 1959 में इन्होंने स्वतन्त्र पार्टी की स्थापना की। इनकी सेवाओं के लिए इन्हें ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया।

प्रश्न 10.
श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सम्बन्ध में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
श्यामाप्रसाद मुखर्जी संविधान सभा के सदस्य थे। ये हिन्दू महासभा के महत्त्वपूर्ण नेता तथा भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। ये कश्मीर को स्वायत्तता देने के विरुद्ध थे। कश्मीर नीति पर जनसंघ के प्रदर्शन के दौरान इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1953 में हिरासत में ही इनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 11.
मौलाना अबुल कलाम आजाद पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मौलाना अबुल कलाम आजाद (1888-1958) का पूरा नाम अबुल कलाम मोहियुद्दीन अहमद था। ये इस्लाम के विद्वान थे। साथ ही ये एक स्वतन्त्रता सेनानी व कांग्रेस के प्रमुख नेता थे। ये हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे तथा भारत विभाजन के विरोधी थे। ये संविधान सभा के सदस्य रहे तथा स्वतन्त्र भारत के पहले शिक्षा मन्त्री के पद पर आसीन हुए।

प्रश्न 12.
सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के मध्य दो अन्तर बताइए।
उत्तर:

  1. सोशलिस्ट पार्टी लोकतान्त्रिक विचारधारा में विश्वास करती है जबकि कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवादी लोकतन्त्र में विश्वास करती है।
  2. सोशलिस्ट पार्टी पूँजीपतियों और पूँजी को अनावश्यक और समाज विरोधी नहीं मानती जबकि कम्युनिस्ट पार्टी निजी पूँजी और पूँजीपतियों को पूर्णतया अनावश्यक और समाज विरोधी मानती है।

बहविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
1952 के चुनावों में कुल मतदाताओं में केवल साक्षर मतदाताओं का प्रतिशत था-
(a) 35 प्रतिशत
(b) 25 प्रतिशत
(c) 15 प्रतिशत
(d) 75 प्रतिशत।
उत्तर:
(c) 15 प्रतिशत।

प्रश्न 2.
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक थे-
(a) श्यामाप्रसाद मुखर्जी
(b) आचार्य नरेन्द्र देव
(c) ए० वी० वर्धन
(d) कु० मायावती।
उत्तर:
(b) आचार्य नरेन्द्र देव।

प्रश्न 3.
1948 में भारत में गवर्नर जनरल पद की शपथ किसने ली-
(a) लॉर्ड लिटन
(b) लॉर्ड माउण्टबेटन
(c) लॉर्ड रिपन
(d) चक्रवर्ती राजगोपालाचारी।
उत्तर:
(d) चक्रवर्ती राजगोपालाचारी।

प्रश्न 4.
भारत का संविधान तैयार हुआ-
(a) 26 जनवरी, 1950
(b) 26 नवम्बर, 1949
(c) 15 अगस्त, 1947
(d) 30 जनवरी, 1948
उत्तर:
(b) 26 नवम्बर, 1949.

प्रश्न 5.
भारत में दलितों का मसीहा किसे कहा जाता है-
(a) राजा राममोहन राय
(b) दयानन्द सरस्वती
(c) डॉ० बी० आर० अम्बेडकर
(d) गोपालकृष्ण गोखले।
उत्तर:
(c) डॉ० बी० आर० अम्बेडकर।

प्रश्न 6.
स्वतन्त्र भारत के पहले शिक्षामन्त्री थे-
(a) मौलाना अबुल कलाम
(b) डॉ० बी० आर० अम्बेडकर
(c) सरदार पटेल
(d) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद।
उत्तर:
(a) मौलाना अबुल कलाम।

प्रश्न 7.
स्वतन्त्र पार्टी का गठन किया-
(a) सी० राजगोपालाचारी
(b) श्यामाप्रसाद मुखर्जी
(c) पं० दीनदयाल उपाध्याय
(d) रफी अहमद किदवई।
उत्तर:
(a) सी० राजगोपालाचारी।

प्रश्न 8.
भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे-
(a) मोरारजी देसाई
(b) मीनू मसानी
(c) अटल बिहारी वाजपेयी
(d) श्यामाप्रसाद मुखर्जी।
उत्तर:
(d) श्यामाप्रसाद मुखर्जी।

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