Chapter 5 पुष्पी पादपों की आकारिकी

Textbook Questions and Answers 

प्रश्न 1. 
मूल के रूपांतरण से आप क्या समझते हैं? निम्नलिखित में किस प्रकार का रूपांतरण पाया जाता है?
(अ) बरगद 
(ब) शलजम 
(स) मैग्रोव वृक्ष।
उत्तर:
मूल का मुख्य कार्य जल व खनिज लवणों का अवशोषण करना तथा पौधे को भूमि में स्थिरीकरण करने का होता है। किन्तु इसके अतिरिक्त भी कभी – कभी अन्य कार्यों को करने के लिये अपने आकार तथा संरचना में रूपान्तरण करना पड़ता है, जैसे: भोजन संचय करने के लिये गाजर व शलजम की मूसला मूल तथा शकरकंद की अपस्थानिक मूल फूल जाती है। बरगद से लटकने वाली प्रोपल्ट सहारा प्रदान करती है। मक्का, गने से निकली अवस्तंभ मूल भी सहारा देती है। अनूप धेत्रों में जो राइनोफोरा में श्वसन मूल होती है।
(अ) बरगद में प्रोपरूट (सहारा प्रदान करने वाली) मूल।
(ब) शलजम में कुम्भीरूप (Napiform) मूल भोजन संचित करती है।
(स) मैंग्रोव वृक्ष में न्यूमेटोफोर (Pneumatophaare) मूल श्वसन कार्य हेतु होती है।

प्रश्न 2. 
बाह्य लक्षणों के आधार पर निम्नलिखित कथनों की पुष्टि करें
(i) पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते। 
(ii) फूल एक रूपांतरित प्ररोह है।
उत्तर:
(i) पौधे के सभी भूमिगत भाग सदैव मूल नहीं होते: यह सत्य है कि मूल सदैव भूमिगत होती है परन्तु अनेक जने भोजन संचय कार्य हेतु रूपांतरित होकर भूमिगत होते हैं। उदाहरण-आलू, हल्दी, जामीकंद, आरवी, प्याज, लहसून आदि। भोजन संचय के लिये भूमिगत तनों के रूपानारणों में प्रकन्द (Rhinome, उदाहरण अदरक, हल्दी, अरबी), धनकंद (Com, उदाहरण – जामीकंद, केसर), कंद (Tuber, उदाहरण आलू) तथा शल्ककंद (Bulb, उदाहरण प्याज, लहसुग, दयूलिप) हैं। ये सभी तनों के भूमिगत रूपान्तरण हैं।

(ii) फूल एक रूपांतरित प्ररोह है: गोथे के अनुसार पुण्य एक रूपांतरित प्ररोह है। पुण में उपस्थित चारों चक्र बाहादल (sepals), दल (petals), पुंकेसर (stamen) व अण्डप (carpel) की तुलना कायिक प्ररोह में उपस्थित पत्तियों से की जा सकती है। ये विभिन्न कार्यों के लिये रूपान्तरित होकर पुष्पासन पर पास-पास में लगी होती हैं। अनेक ऐसे तथ्य हैं जिनसे प्रमाणित होता है कि पुष्य एक रूपांतरित प्ररोह है।

प्रश्न 3. 
एक पिच्छाकार संयुक्त पत्ती हस्ताकार संयुक्त पत्ती से किस प्रकार भिन है?
उत्तर:
पिच्छाकार संयुक्त पत्तियों में अनेक पत्रक एक ही अक्ष अर्थात् मध्यशिरा पर स्थित होते हैं। उदाहरण- गौम। हस्ताकार संयुक्त पत्तियों में पत्रक पर्णसन्त के शीर्ष पर एक ही बिन्दु से जुड़े रहते हैं। उदाहरक- सिल्क कॉटन वृक्ष।

प्रश्न 4. 
विभिन्न प्रकार के पर्णविन्यास का उदाहरण सहित वर्णन करो।
उत्तर: 
पर्णविन्यास तने या शाखा की पर्वसन्धियों पर पत्तियाँ एक विशिष्ट क्रम में लगी होती हैं। इसे पर्णविन्यास कहते हैं। पर्वसन्धि पर पत्तियों की संख्या एक, दो अथवा दो से अधिक होती है। पर्ण विन्यास निम्नलिखित प्रकार को होता है  

  1. एकान्तर (Alternate): जब एक पर्वसन्धि पर एक पत्ती होती है तथा अगली और पिछली पर्वसन्धि पर लगी पत्ती से इसकी दिशा विपरीत होती है; जैसे-गुड़हल, सरसों आदि। 
  2. अभिमुख (Opposite): जब एक पर्वसन्धि पर दो पत्तियाँ होती हैं, तब दो प्रकार की स्थिति हो सकती हैं: 
    • अध्यारोपित (Superposed): जब पत्तियों की दिशा प्रत्येक पर्वसन्धि पर एक ही होती है; जैसे: अमरूद। 
    • क्रॉसित (Decussate): जब दो पत्तियों की दिशा प्रत्येक पर्वसन्धि पर पिछली तथा अगली पर्वसन्धि की अपेक्षा समकोण पर होती है; जैसे-आक। 
  3. चक्रिक (Whorled): जब एक पर्वसन्धि पर दो से अधिक पत्तियाँ होती हैं; जैसे: कनेर।

प्रश्न 5. 
निम्नलिखित की परिभाषा लिखो
(अ) पुष्ष दल विन्यास 
(ब) बीजांडासन 
(स) त्रिन्या सममित 
(द) एकव्यास सममित 
(य) ववती
(२) परिजायांगी पुष्प 
(ल) दललग्न पुंकेसर।
उत्तर:
(अ) पुष्प दल विन्यास (Aestivation): पुष्पकली में दलों की व्यवस्था को पुष्प दल विन्यास कहते हैं।
(ब) बीजांडासन (Placenta): अण्डाशय का यह क्षेत्र अथवा भाग जिस पर एक या अनेक बीजाण्ड लगे होते हैं।
(स) त्रिय सममित (Actinamorphic): ऐसा पुष्प ने एक से अधिक मध्य अनुदैर्घ्य वालों (median longitudinal plames) में काटने पर दो समान भागों में काटा जा सकता हो, जैसे – सरसों।
(द) एकव्यास सममित (Zygomorphic): ऐया. पुष्प, जो केवल एक मध्य अनुदैव्यं तल में काटने पर ही दो समान भागे में बांटा जा सकता हो, जैसे – मटर।
(य) अध्यक्ती (Superior): जब अंडाश्य पुम के बादलों (sopals), दलों (petals) एवं पुंकेसरों (Stamens) के ऊपर हो अर्थात् इसमें जायांग सर्वोच्च स्थान पर स्थित होता है और अन्य अंग नोचे होते हैं। ऐसे अंडाशय को गर्वको कहते हैं।
(२) परिजायांगी पुष्प (Perigenous flower): पुण के शेष सब भाग अंडाशय के नीचे स्थित न होकर उसके समान स्तर पर होने है या अंडाशय मध्य में होता है और अन्य भाग पुण्यासन के किनारे पर स्थित होते हैं तथा ये लगभग समान ऊँचाई तक होते हैं, जैसे-गुलाब।
(ल) दलालग्न पुंकेसर (Epipetalcers stamen): जब पुष्प में पुंकेसर दल (petal) से जुड़े होते हैं तो उसे दललन पुंकेसर कहते हैं।

प्रश्न 6. 
निम्नलिखित में अंतर लिखो
(अ) असीमाक्षी तथा ससीमाक्षी पुष्पक्रम 
(ब) झकड़ा जड़ (मूल) तथा अपरथानिक मूल 
(स) वियुक्तांडपी तथा युक्तांडपी अंडाशय।
उत्तर:
(अ) असीमाक्षी तथा ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose and cymose inflorescence): ऐसा पुष्पक्रम, जिसका मुख्य अश पुष्प में समाप्त नहीं होता बल्कि यह निरन्तर बढ़ता रहता है और पाश्च में पुष्यों को अग्राभिसारी (acropetal) अनुक्रम में बनाता रहता है। ससीमाक्षी पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष की वृद्धि उसके शीर्ष पर पुष्प के बनने से रुक जाती है। पाश्वीय अम, जो शीर्षस्थ पुष्ण के नीचे से निकलती है, भी युग्म में अन्त हो जाती है, अत: उसकी सृद्धि भी सीमित हो जाती है। पुष्प तलाभिसारी (basipetal) अनुक्रम में लगते हैं।

(ब) झकड़ा जड़ (मूल) तथा अपस्थानिक मूल (Fibrous root and Adventitious root): शकड़ा मूल में प्राथमिक मूल अल्पजीवी होती है और बहुत-सी पतली जड़ें इसे प्रतिस्थापित कर देती हैं। ये बड़े तने के आधार से परिवर्धित होती हैं। उदाहरण गेहूं। अपस्थानिक मूल मूलांकुर की बजाय पौधे के अन्य भाग से निकलती है। उदाहरण- बास तथा बरगद।

(स) वियुक्तांडपी तथा युक्तांडपी अंडाशय (Apocarpous and Syncarpous ovary): जब एक से अधिक आण्डप (carpel) उपस्थित हों तथा प्रत्येक स्वतंत्र अर्थात् प्रत्येक अण्डप के अण्डाशय, वर्तिका व वर्तिकान पृथक् हो तो उसे नियुक्तांडपी अंडाशय कहते हैं। उदाहरण-चम्पा। एक से अधिक मण्डप संयुका होकर जायांग बनाते हैं तो उसे युकांडपी अंडाशय कहते हैं। उदाहरण-गुडहल, बैंगन आदि।

प्रश्न 7. 
निम्नलिखित के चिहित चित्र बनाओ
(अ) चने के बीज तथा 
(ब) मक्के के बीज का अनुष्य काट।
उत्तर:
सतहें होती हैं –
बाहरी आवरण को बीजचोल (testa) तथा भीतरी परत को टेगमेन (tegmen) कहते हैं। बीज के ऊपर एक क्षत चिन्ह की तरह  का ऊर्ध्व होता है जिसके द्वारा बीज फल से जुड़ा रहता है। इसे नाभिक  कहते हैं। प्रत्येक बीज में नाभिक के ऊपर छिद्र होता है जिसे बीजाण्डद्वार बीजपत्र गदेदार होते हैं जिनमें भोजन संग्रहित होता है (चित्र 5.29)। अक्ष के निचले भाग को मूलांकुर तथा ऊपरी भाग को प्रांकुर कहते हैं। इनमें भ्रूणपोष का निर्माण द्विनिषेचन के कारण होता है तथा इनकी ऊतकों में ही भोजन का संग्रह होता है। चने, सेम तथा मटर में भ्रूणपोष नहीं होता है अतः ये बीज अभ्रूणपोषी होते हैं परन्तु अरंड में भ्रूणपोष होता है अतः यह बीज कहते हैं। जैसे ही बीजावरण हटाते हैं तो दो बीजपत्रों के बीच अक्ष होती है। भ्रूणपोषी होता है।

एकबीजपत्री बीज की संरचना (Structure of Monocotyledons seed):
एकबीजपत्री बीज भ्रूणपोषी होता है परन्तु कुछ अभ्रूणपोषी भी होते हैं। अनाज के बीज जैसे मक्का में बीजावरण झिल्लीदार तथा फलभित्ति से संगलित होता है। इनमें भ्रूणपोष स्थूल होता है जो भोजन का संग्रह करता है। भ्रूणपोष की बाहरी भित्ति भ्रूण से एक प्रोटीन सतह द्वारा पृथक् होती है जिसे एल्यूरोन सतह (Aleurone layer) कहते हैं। भ्रूण आकृति में छोटा तथा भ्रूणपोष के एक सिरे पर खांचे में स्थित होता है। इसमें एक बड़ा तथा ढालाकार आकृति का बीजपत्र होता है जिसे स्कुटेलम कहते हैं। इसमें एक छोटा अक्ष होता है जिसमें प्रांकुर (plumule) तथा मूलांकुर (radical) होते हैं। प्रांकुर तथा मूलांकुर एक चादर से ढके होते हैं, जिसे क्रमशः प्रांकुर चोल (Coleoptile) तथा मूलांकुर चोल (Coleorhiza) कहते हैं।

प्रश्न 8. 
उचित उदाहरण सहित तने के रूपांतरों का वर्णन करो।
उत्तर:
तने के रूपान्तरण तने का मुख्य कार्य पत्तियों, पुष्पों एवं फलों को धारण करना; जल एवं खनिज तथा कार्बनिक भोज्य पदार्थों का संवहन करना है। हरा होने पर तना भोजन निर्माण का कार्य भी करता है। तने में थोड़ी मात्रा में भोजन भी संचित रहता है। विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न करने के लिए तने रूपान्तरित हो जाते हैं। कभी – कभी तो रूपान्तरण के पश्चात् तने को पहचानने में भी कठिनाई होती है। सामान्यतया तनों में भोजन संचय, कायिक जनन, बहुवर्षीयता प्राप्त करने हेतु, आरोहण एवं सुरक्षा हेतु रूपान्तरण होता है। भूमिगत रूपान्तरित तने भूमिगत तने चार प्रकार के पाए जाते हैं:

1. प्रकन्द (Rhizome): भूमि के अन्दर भूमि के क्षैतिज तल के समानान्तर बढ़ने वाले ये तने भोजन संग्रह करते हैं। इनमें पर्वसन्धि तथा पर्व स्पष्ट देखे जा सकते हैं। अग्रस्थ कलिकाओं के द्वारा इनकी लम्बाई बढ़ती है तथा शाखाएँ कक्षस्थ कलिकाओं के द्वारा। कुछ कलिकाएँ। आवश्यकता पड़ने पर वायवीय प्ररोह का निर्माण करती हैं; जैसे-अदरक, केला, केली, फर्न, हल्दी आदि।  

2. घनकन्द (Corm): इनके लक्षण प्रकन्द की तरह होते हैं, किन्तु ये ऊर्ध्वाधर रूप में बढ़ने वाले भूमिगत तने होते हैं। इस प्रकार के तनों में भी पर्वसन्धियाँ तथा पर्व होते हैं। यह भोजन संगृहीत रहता है। कलिकाएँ होती हैं। कक्षस्थ कलिकाएँ विरोहक बनाती हैं। उदाहरण-अरवी, बण्डा, जिमीकन्द इत्यादि।  

3. तना कन्द (Stem Tuber): ये भूमिगत शाखाओं के अन्तिम सिरों पर फूल जाने के कारण बनते हैं। इनका आकार अनियमित होता है। कन्द पर पर्व या पर्वसन्धियाँ होती हैं जो अधिक मात्रा में भोजन संग्रह होने के कारण स्पष्ट नहीं होतीं। आलू की सतह पर अनेक आँखें (eyes) होती हैं, जिनमें कलिकाएँ तथा इन्हें ढकने के लिए शल्क पत्र होते हैं। कलिकाएँ वृद्धि करके नए वायवीय प्ररोह बनाती हैं।  

4. शल्क कन्द (Bulbs): इस प्रकार के रूपान्तर में तना छोटा (संक्षिप्त शंक्वाकार या चपटा) होता है। इसके आधारीय भाग से अपस्थानिक जड़े निकलती हैं। इस तने पर उपस्थित अनेक शल्क पत्रों में भोजन संगृहीत हो जाता है। तने के अग्रस्थ सिरे पर उपस्थित कलिका से अनुकूल परिस्थितियों में वायवीय प्ररोह का निर्माण होता है। शल्क पत्रों के कक्ष में कक्षस्थ कलिकाएँ भी बनती हैं। उदाहरण-प्याज (Onion), लहसुन (garlic), लिली (lily) आदि के शल्क कन्द।  

II. अर्द्धवायवीय रूपान्तरित तने कुछ पौधों के तने कमजोर तथा मुलायम होते हैं। ये पृथ्वी की सतह के ऊपर या आंशिक रूप से मिट्टी के नीचे रेंगकर वृद्धि करते हैं। ये तने कायिक प्रजनन में भाग लेते हैं। इनकी पर्वसन्धियों से अपस्थानिक जड़े निकलकर मिट्टी में फँस जाती हैं। पर्व के नष्ट होने या कट जाने पर नए पौधे बन जाते हैं। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं 

1. उपरिभूस्तारी (Runner): इसका LEAF तना कमजोर तथा पतला होता है। यह भूमि की सतह पर फैला रहता है है। पर्वसन्धियों से पत्तियाँ, शाखाएँ । तथा अपस्थानिक जड़े निकलती हैं। STEM शाखाओं के शिखर पर शीर्षस्थ कलिका होती है। पत्तियों के कक्ष में कक्षस्थ कलिका होती है; जैसे-दुबघास (Cynodon), खट्टी-बूटी (Oxalis), ब्राह्मी (Centella asiatica) आदि।  

2. भूस्तारी (Stolon): इसमें भूमिगत तने की पर्वसन्धि से कक्षस्थ कलिका विकसित होकर शाखा बनाती है। यह शाखा प्रारम्भ में सीधे। ऊपर की ओर वृद्धि करती है, परन्तु बाद में – झुककर क्षैतिज के समानान्तर हो जाती है। इस BUD शाखा की पर्वसन्धि से कक्षस्थ कलिकाएँ तथा अपस्थानिक जड़े निकलती हैं; जैसे—स्ट्रॉबेरी, अरवी (घुइयाँ)।  

3. अन्त:भूस्तारी (Sucker): इनमें पौधे के भूमिगत तने की आधारीय पर्वसन्धियों पर स्थित कक्षस्थ कलिकाएँ वृद्धि करके नए वायवीय भाग बनाती हैं। ये प्रारम्भ में क्षैतिज दिशा में वृद्धि करते हैं, फिर तिरछे होकर भूमि से बाहर आ जाते हैं और वायवीय शाखाओं की तरह वृद्धि करने लगते हैं। इनकी पर्व सन्धियों से अपस्थानिक जड़े निकलती हैं; जैसे—पोदीना (Mentha grvensis), गुलदाउदी (Chrysanthemum) आदि।  

4. भूस्तारिका (Offset): जलीय पौधों में पाया जाने वाला उपरिभूस्तारी की तरह का रूपान्तरित तना है। मुख्य तने से पाश्र्व शाखाएँ निकलती हैं। पर्वसन्धि पर पत्तियाँ तथा अपस्थानिक जड़े निकल आती हैं। इनके पर्व छोटे होते हैं। गलने या । टूटने से नए पौधे स्वतन्त्र हो जाते हैं। उदाहरण समुद्र सोख (water hyacinth = Etchhornia sp.), जलकुम्भी (Pistic sp.) आदि।  

III. वायवीय रूपान्तरित तने कुछ पौधों में तने का वायवीय भाग विभिन्न कार्यों के लिए रूपान्तरित हो जाता है। रूपान्तरण के फलस्वरूप इन्हें तना कहना आसान नहीं होता है। इनकी स्थिति एवं उद्भव के आधार पर ही इनकी पहचान होती है। ये निम्नलिखित प्रकार के होते हैं 

1. पर्णाभ स्तम्भ और पर्णाभ – पर्व (Phylloclade and Cladode): शुष्क स्थानों में उगने वाले पौधों में जल के वाष्पोत्सर्जन को कम करने के लिए पत्तियाँ प्रायः कंटकों में रूपान्तरित हो जाती हैं। पौधे का तना चपटा, हरा व मांसल हो जाता है, ताकि पौधे के लिए खाद्य पदार्थों का निर्माण प्रकाश संश्लेषण के द्वारा होता रहे। तने पर प्रायः मोटी उपचर्म (cuticle) होती है  जो वाष्पोत्सर्जन को रोकने में सहायक होती है। पत्तियों का कार्य करने के कारण इन रूपान्तरित तनों को पर्णाभि या पर्णायित स्तम्भ कहते हैं। प्रत्येक पर्णाभ में पर्वसन्धियाँ तथा पर्व पाए जाते हैं।

प्रत्येक पर्वसन्धि से पत्तियाँ निकलती हैं जो शीघ्र ही गिर जाती हैं (शीघ्रपाती) या काँटों में बदल जाती हैं। पत्तियों के कक्ष से पुष्प निकलते हैं। उदाहरण-नागफनी (Opuntia) तथा अन्य अनेक कैक्टाई (cactii), अनेक यूफोर्बिया (Euphorbia sp.), कोकोलोबा (Cocoloba), कैजुएराइना (Casuarina) आदि। पर्णाभ-पर्व केवल एक ही पर्व के पर्णाभ स्तम्भ हैं। इनके कार्य भी पर्णाभ स्तम्भ की तरह ही होते हैं। उदाहरण—सतावर (Asparagus) में ये सुई की तरह होते हैं। यहाँ पत्ती एक कुश में बदल जाती है। कोकोलोबा की कुछ जातियों में भी इस प्रकार के पर्णाभ-पर्व दिखाई पड़ते हैं। 

2. स्तम्भ प्रतान (Stem Tendril): प्रतान लम्बे, पतले आधार के चारों ओर लिपटने वाली संरचनाएँ हैं। तने के रूपान्तर से बनने वाले प्रतानों को स्तम्भ प्रतान कहते हैं। स्तम्भ प्रतान आधार पर मोटे होते हैं। इन पर पर्व वे पर्वसन्धियाँ हो सकती हैं, कभी-कभी पुष्प भी लगते हैं। ये सामान्यतयः कक्षस्थ कलिका से और कभी-कभी अग्रस्थ कलिकाओं से बनते हैं; जैसे–झुमकलता (Passiflora) में कक्षस्थ कलिका से, किन्तु अंगूर की जातियों (Vitis sp.) में अग्रस्थ कलिका से रूपान्तरित होते हैं। काशीफल (Cucurbita) और इस कुल के अनेक पौधों के प्रतान अतिरिक्त कक्षस्थ कलिकाओं के रूपान्तर से बनते हैं। एण्टीगोनॉन (Antigonon) में तो पुष्पावली वृन्त ही प्रतान बनाता है।  

3. स्तम्भ कंटक (Stem thorns): कक्षस्थ या अग्रस्थ कलिकाओं से बने हुए काँटे स्तम्भ कंटक कहलाते हैं। स्तम्भ कंटक सुरक्षा, जल की हानि को रोकने अथवा कभी-कभी आरोहण में सहायता करने हेतु रूपान्तरित संरचनाएँ हैं। कंटक प्रमुखतः मरुद्भिदी पौधों का लक्षण है।  
उदाहरण: 

4. पत्र प्रकलिकाएँ (Bulbils): ये कलिकाओं में । भोजन संगृहीत होने से बनती हैं। इनका प्रमुख कार्य कायिक प्रवर्धन है। ये पौधे से अलग होकर अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर नया पौधा बना लेती हैं; जैसे—लहसुन, केतकी (Agave), रतालू (Dioscoria), खट्टी – बूटी (Oxalis), अनन्नास आदि। 

प्रश्न 9. 
फाबेसी तथा सोलनेसी कुल के एक – एक पुष्य को उदाहरण के रूप में लो तथा उनका अर्द्धतकनीकी विवरण प्रस्तुत करो। अध्ययन के पश्चात् उनके पुष्पीय चित्र भी बनाओ।
उत्तर:
फाबेसी (Fabaceae):
यह लेग्यूमिनोसी (Leguminoceae) का उपकुल है। इस उपकुल को पहले पैपिलियोनेटी (Papilionatae) कहते थे, अब इसे फाबेसी कहते हैं। कुल के सदस्य सम्पूर्ण विश्व में पाये जाते हैं। कायिक अभिलक्षण (Vegetative characters):
स्वभाव (Habit): अधिकांश पौधे शाक, कुछ पौधे आरोही, क्षुप (shrub) अथवा वृक्ष होते हैं।
जड़ (Root): मूसला जड़, जड़ ग्रन्थिकाएँ (nodules) पायी जाती हैं। इनमें राइजोबियम लेग्यूमिनोसेरम नामक सहजीवी जीवाणु मिलते हैं, यह जीवाणु नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर भूमि की मुक्त नाइट्रोजन को नाइट्रेट में बदल कर उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं।

स्तम्भ (Stem): सीधा, बेलनाकार, ठोस, कुछ में आरोही।
पत्तियाँ (Leaves): एकान्तर, अनुपर्णी, सरल अथवा संयुक्त पिच्छाकार, पर्णाधार तल्पयुक्त, जालिका शिराविन्यास। पुष्पी अभिलक्षण (Floral characters):
पुष्पक्रम (Inflorescence): असीमाक्षी (racemose), असीमाक्ष (raceme) या एकल कक्षीय (solitary axillary) होता है।
पुष्प (Flower): सह पत्री (bracteate), सह पत्रिकायुक्त (bracteolate), पूर्ण, एकव्याससममित (zygomorphic), द्विलिंगी (bisexual), पंचतयी (pentamerous), जायांगधर (hypogynous), कुछ में परिजायांगी (perigynous) होते हैं ।

बाह्यदलपुंज (Calys): पाँच संयुक्त बाह्यदली, कोरस्पर्शी (valvate), विषम बाह्यदल (odd sepal) अग्र (anterior) होता है।
दलपुंज (Corolla): पाँच, पृथक्दली (polypetalous), पेपिलियोनेसियस (तितलीकार आकृति), दल विन्यास अवरोही कोरछादी (descending imbricate) या वैक्सीलरी (vexillary), पाँच दलों में सबसे बाहर की ओर एक पश्च दल (posterior petal) सबसे बड़ा होता है, जिसे ध्वजक (standard or vexillum) कहते हैं, पार्श्व में स्थित दो पक्ष (wings) तथा दो छोटे अग्रदल (anterior petals) आपस में जुड़कर नोकदार रचना नोतल या कील (keel) बनाते हैं, जो दोनों पार्श्व पक्षों से ढके रहते हैं।
पुमंग (Androecium): दस पुंकेसर, द्विसंघी (diadelphous), नौ पुंकेसर अण्डाशय को घेरते हुए लम्बी नली का निर्माण करते हैं व दसवाँ पश्च पुंकेसर (posterior stamen) मुक्त रहता है। परागकोश द्विकोष्ठीय, अन्तर्मुखी (introrse), अन्त:स्थित (inserted) व पृष्ठलग्न (dorsifixed) होते हैं।

जायांग (Gynoecium): एकअण्डपी (monocarpellary), एककोष्ठकी (unilocular), ऊर्ध्ववर्ती (superior), बीजाण्डन्यास सीमान्त (marginal) होता है। अभ्यक्ष सीवन (ventral suture) पर अनेक बीजाण्ड स्थित होते हैं। वर्तिका एक, वर्तिकान समुंड होती है।
फल (Fruit): शिम्ब (Legume)। 
बीज (Sced): अभ्रूणपोषी (non – endospermic) होता है। 
पुष्पी सूत्र (Floral formula):

आर्थिक महत्त्व (Economic importance): 
1. दालें (Pulses): दालों में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने से अधिक उपयोगी होती हैं। विभिन्न प्रकार की दालें निम्न पौधों से प्राप्त की जाती हैं:

2. तेल (Oil):

3. रंग (Dye):

4. तन्तु (Fibres):

5. चारा (Fodder):

6. औषध (Medicine):

7. सजावटी पुष्य (Omamental flower)
ल्यूपिन, मीठी मटर (लेथाईरस ओडोरेटस, Lathyrus odoratus) 

सोलनेसी (Solanaceac):
इस कुल को आलू कुल भी कहते हैं। इसके सदस्य उष्णकटिबंधीय, उपोष्ण तथा शीतोष्ण क्षेत्रों में पाये जाते हैं। 
कायिक लक्षण (Vegetative characters):
स्वभाव (Habit): अधिकांश पौधे एकवर्षीय शाक, जैसे तम्बाकू, रसभरी अथवा बहुवर्षीय शाक (सोलेनम नाइग्रम, असगंध), क्षुप (रात की रानी) होते हैं।
जड़ (Root): मूसला मूल पायी जाती है।
स्तम्भ (Stem): प्राय: सीधा (ऊर्ध्व), शाखित, रोमिल, शाकीय, भूमिगत (आलू), होते हैं।
पत्ती (Leaf): सरल, अननुपर्णी (exstipulate), एकान्तरित, एकशिरीय जालिकावत शिराविन्यास, सरल कभी संयुक्त पिच्छाकार होती हैं।

पुष्पी लक्षण (Floral characters):

पुष्यक्रम (Inflorescence): एकल, कक्षीय, ससीमाक्ष (eymose) होता है, जो कि युग्मशाखित ससीमाक्ष (dischasial cyme) जैसे-धतूरा में, वृश्चिकी एकलशाखी (scorpioid monochasial), जैसे—एट्रोपा में, कुण्डलिनि एकलशाखी (helicoid monochasial), जैसे-सोलेनम में मिलता है।

पुष्प (Flower): सहपत्ररहित (ebracteate) या सहपत्री (bracteate), सवन्त, पूर्ण, त्रिज्या, सममित, उभयलिंगी, पंचतयी, जायांगधर व चक्रीय (cyclic) होते हैं।

बाह्यदलपुंज (Calyx): पाँच बाह्यदल, संयुक्त, कोरस्पर्शी, चिरलग्न (persistent), बैंगन में बादल अपातजीणी (marcescent) होते हैं एवं रसभरी में उत्तरवर्षी (accrescent) होते हैं, इसमें फलन अवस्था में बाह्यदल बड़े होकर फल को पूरी तरह से ढककर गुब्बारे जैसा उपांग बनाते हैं।

दलपुंज (Corolla): पाँच दल, संयुक्तदली, व्यावर्तित (twisted), सोलेनम नाइग्रम में चक्राकार, धतूरा में कोरछादी, पिटुनिया में दलपुंज कीपाकार (infundibulum), रसभरी में घंटाकार होते हैं।

पुमंग (Androccium): पाँच पुंकेसर, पृथक्, दललग्न, परागकोश द्विकोष्ठी, आधारलग्न (basifixed), अन्तर्मुखी होते हैं।

जायांग (Gynoccium): द्विअण्डपी व संयुक्ताण्डपी, ऊर्ध्ववर्ती व द्विकोष्ठी, प्रत्येक कोष्ठक में अनेक बीजाण्ड, बीजाण्डन्यास स्तम्भीय होता है, फूला हुआ बीजाण्डासन, वर्तिका सरल, वर्तिकान द्विपालित या समुण्ड होती है। कुल में अण्डाशय तिरछा (oblique) होता है। अण्डाशय अपने मुख्य अक्ष पर दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में 45° के कोण पर घूम जाता है, जिससे यह तिरछा हो जाता है।

फल (Fruit): प्राय: सरस फल जैसे-टमाटर एवं बैंगन में बेरी (Berry) होता है। धतूरा व पिटुनिया में पटभंजक सम्पुट (septifragal capsule) फल होता है।
बीज (Scod): भ्रूणपोषी (endospermic) होते हैं।
पुष्पी सूत्र (Floral formula): 

आर्थिक महत्त्व (Economic importance):
1. भोजन के रूप में (As food):

2. औषधीय पौधे (Medicinal plants)

3. सजावटी पौधे (Ornamental plants)

प्रश्न 10. 
पुष्पी पादपों में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के बीजांडन्यासों का वर्णन करो।
उत्तर:
बीजाण्डन्यास अण्डाशय में मृदूतकीय जरायु (placenta) पर बीजाण्डों के लगने के क्रम को बीजाण्डन्यास (placentation) कहते हैं। यह निम्नलिखित प्रकार का होता है: 
1. सीमान्त (Marginal): यह एकअण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है। अण्डाशय एककोष्ठीय होता है, बीजाण्ड अक्षीय सन्धि पर विकसित होते हैं; जैसे- चना, मटर, सेम आदि के शिम्बे फलों में। 

2. स्तम्भीय (Axile): यह द्विअण्डपी, त्रिअण्डपी या बेहुअण्डपी, युक्ताण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है। अण्डाशय में जितने अण्डप होते हैं, उतने ही कोष्ठकों का निर्माण होता है। बीजाण्ड अक्षवर्ती जरायु से लगे रहते हैं; जैसे- आलू, टमाटर, मकोय, गुड़हल आदि में।  

3. भित्तीय (Parietal): यह बहअण्ड्यी , एककोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है। इसमें जहाँ अण्डपों के तट मिलते हैं, वहाँ जरायु विकसित हो जाता है। जरायु (बीजाण्डासन) पर बीजाण्ड लगे होते हैं, अर्थात् बीजाण्ड अण्डाशय की भीतरी सतह पर लगे रहते हैं; जैसे- पपीता, सरसों, मूली आदि में। 

4. मुक्त स्तम्भीय (Free central): यह बहुअण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है। इसमें बीजाण्ड केन्द्रीय अक्ष के चारों ओर लगे होते हैं। केन्द्रीय अक्ष का सम्बन्ध अण्डाशय भित्ति से नहीं होता; जैसे- डायएन्थस, प्रिमरोज आदि। 

5. आधारलग्न (Basifixed): यह द्विअण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है जिसमें केवल एक बीजाण्ड पुष्पाक्ष से लगा रहता है; जैसे- कम्पोजिटी कुल के सदस्यों में। 

6. धरातलीय (Superficial): यह बहुअण्डपी, बहुकोष्ठीय अण्डाशय में पाया जाता है। इसमें बीजाण्डासन या जरायु कोष्ठकों की भीतरी सतह पर विकसित होते हैं, अर्थात् बीजाण्ड कोष्ठकों की भीतरी सतह पर व्यवस्थित रहते हैं; जैसे- कुमुदिनी (water lily) में।

प्रश्न 11. 
पुष्प क्या है? एक प्ररूपी पंजिवोस्पर्म पुष्प के भागों का वर्णन करो।
उत्तर:
पुष्य एक रूपांतरित प्ररोह है। क्योंकि कायिक कलिका के समान ही पुष्प कलिका की स्थिति कमोय या अनस्थ होती है। अगेय में पुष्प कतिका प्रजनन हेतु पर प्रकलिकाओं में रूपान्तरित हो जाती है। पुष्प में पर्य व पर्व सन्धिर्षा अत्यधिक संघनित होने के कारण माटत: दृष्टिगत नहीं होती हैं परन्तु कुछ पुरुषों जैसे गाइनेन्ड्रोप्सिस में पुमंगधर (दलपुंव व पुमंग के बीच पर्व) एवं जायांगधर (पुर्मग व वार्याग के योच पर्व) स्पष्ट होते हैं। गुणाय में पुष्पासन वृद्धि का पर्णिल प्ररोह बनाना है। म्यूसेण्डा में एक बादादल पर्ष के समान आवर्धित होता है परन्तु दल के समान रंगीन होता है। ये सभी इसके प्रमाण हैं कि पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह है। एक प्रारूपिक पुष्प के भाग एक प्रारूपिक पुष्ण में पुष्पोय पों के चार चक्र होते हैं जो पुष्पासन से गड़े रहते हैं। इन्हें दो समूहों में बांटा जा सकता है

1. सहायक चक्र (Accessory whort): ये चक्र अन्दर के जनन चक्रों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। 
ये दो प्रकार के होते हैं:

ऐसे पुष्यों में, जिनमें बाहादल व दलों में विभेद नहीं किया जा सके, उस सहायक चक्र को परिदलपुंज (pernianth) कहते हैं व इसके प्रत्येक सदस्य को परिदल (tepal) कहते हैं, जैसे-ज्याव।

2. आवश्यक चक्र (Essential wharts) ये चक्र जनन अंगों के होते हैं अतः ये आवश्यक चक्र होते हैं:

  1. पुमंग (Androecium): पुरम का तीसरा आन्तरिक चक्र नर भाग पुमंग कहलाता है। इस चक्र के प्रत्येक सदस्य को पुंकेसर (stamen) कहते हैं। प्रत्येक पुंकेसर एक पतले वृन्त पुतन्तु (flament) एक अण्डी सदश संरचना परागकोश (ancher) से निर्मित होता है। परागकोश में परागकण बनते हैं।
  2. जायांग (Gynaecium): पुष्पोय पणे च सबसे अन्तिम चक्र मादा भाग जायंग कहलाता है। इसके एक सदस्य को अनुप (capel) करते हैं। प्राय: जायांग को बनने के बाद पुष्पासना की वृद्धि रक जाती है। अण्डप के तीन भाग होते है:

प्रश्न 12. 
पत्तियों के विभिन्न रूपांतरण पौधे की कैसे सहायता करते हैं?
उत्तर:
पत्तियों के रूपान्तरण पत्तियों का प्रमुख कार्य प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन निर्माण करना है। इसके अतिरिक्त वाष्पोत्सर्जन, श्वसन आदि सामान्य कार्य भी पत्तियाँ करती हैं, किन्तु कभी-कभी विशेष कार्य करने के लिए इनका स्वरूप ही बदल जाता है। ये रूपान्तरण सम्पूर्ण पत्ती या पत्ती के किसी भाग या फलक के किसी भाग में होते हैं। उदाहरण के लिए 
1. प्रतान (Tendril): सम्पूर्ण पत्ती या उसका कोई भाग, लम्बे, कुण्डलित तन्तु की तरह की रचना में बदल जाता है। इसे प्रतान (tendril) कहते हैं। प्रतान दुर्बल पौधों की आरोहण में सहायता करते हैं। जैसे 


2. कंटक या शूल (Spines): वाष्पोत्सर्जन को कम करने और पौधे की सुरक्षा के लिए पत्तियों अथवा उनके कुछ भाग कॉटों में बदल जाते हैं। जैसे 

3. पर्ण घट (Leaf Pitcher): कुछ कीटाहारी पौधों में कीटों को पकड़ने के लिए सम्पूर्ण पत्ती प्रमुखतः पर्णफलक एक घट (pitcher) में बदल जाता है; जैसे-नेपेन्थीज (Nepenthes)।  डिस्कोडिया (Dischidia rufflesigng) एक उपरिरोही पादप है। इसकी कुछ पत्तियाँ घटों (pitchers) में बदल जाती हैं। इसमें वर्षा का जल तथा अन्य कार्बनिक व अकार्बनिक पदार्थ एकत्रित होते रहते हैं। पर्वसन्धि से जड़े निकलकर घट के अन्दर घुस जाती हैं तथा विभिन्न पदार्थों को अवशोषित करती हैं। 

4. पर्ण थैली (Leaf bladders): कुछ पौधों में पत्तियाँ या इनके कुछ भाग रूपान्तरित होकर थैलियों में बदल जाते हैं। इस प्रकार का अच्छा उदाहरण ब्लैड़रवर्ट या यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) है। यह पौधा इन थैलियों के द्वारा कीटों को पकड़ता है। अन्य कीटाहारी पौधों में पत्तियाँ विभिन्न प्रकार से रूपान्तरित होकर कीट को पकड़ती हैं। उदाहरण-ड्रॉसेरा (Drosera), डायोनिया (Dioned), बटरवर्ट या पिन्यूयीक्यूला (Pinguicula) आदि।  

5. पर्णाभ वृन्त (Phyllode): इसमें पर्णवृन्त हरा, चपटा तथा पर्णफलक के समान हो जाता है; और पत्ती की तरह भोजन निर्माण का कार्य करता है; जैसे- ऑस्ट्रेलियन बबूल में। 

6. शल्कपत्र (Scale Leaves): ये शुष्क भूरे रंग की, पर्णहरितरहित, अवृन्त छोटी-छोटी पत्तियाँ होती हैं। ये कक्षस्थ कलिकाओं की सुरक्षा करती हैं; जैसे- अदरक, हल्दी आदि में।

प्रश्न 13. 
पुष्पक्रम की परिभाषा करो। पुष्पी पादपों में विभिन्न प्रकार के पुष्पक्रमों के आधार का वर्णन करो।
उत्तर:
पुष्पी अक्ष पर पुष्पों के लगने के क्रम को पुष्पक्रम कहो हैं। पुष्प सामान्यतः शीर्षस्थ (terminal) या कमस्थ (axillary) कलिका से बनता है। जब पुष शाखा पर एक ही होता है ते एकल — solitary) कहलाता है। जब शमा पर अनेक पुण्य होते तो ऐसी अवस्था में पुष्प अन पर पणों की व्यवस्था को पराक्रम करते हैं। जिस शाखा पर ये पुष्प लगते हैं उसे पुष्पावरली वृत (peduncle) कहते है तथा एक पुष्प धारण करने वाला वृत्त पुष्प यन (podicel) कहलाना है। मुख्य अथ की वृद्धि के अनुसार पुष्पकम दो प्रकार के होते हैं:

1. असीमाक्षी (Racemose): ऐस पुष्पक्रम, जिसका मुख्य अश पुष्य में समाप्त नहीं होता बल्कि वह निरन्तर बता रहता है और पार्व में पुष्यों को स्याभिसारी (cropseal) अनुक्रम में बात रहता है।

2. ससीमाक्षी (Cymose): ऐसे पुष्पक्रम में मुख्य अक्ष की वृद्धि उसके शीर्ष पर पुष्प बनने से रुक जाती है। शीर्षरय पुष्प के ठीक नीचे पाश्वं शाखाएं निकलती है और वे भी पुष्प में समाप्त हो जाती हैं। पुष्पकम अक्ष पर पुष्प तलाभिसारी क्रम (basipetal manner) मे लगे होते हैं।

प्रश्न 14. 
ऐसे फूल का सूत्र लिखो जो त्रिच्या सममित, उभयलिंगी, अधोजावांगी, 5 संयुक्त बाह्य दली, 5 मुक्त दली, 5 मुक्त पुंकेसरी, द्वि बुक्ताडपी तथा अध्वंबी अण्डाशय हो।
उत्तर:

प्रश्न 15. 
पुष्पासन पर स्थिति के अनुसार लगे पुष्षी भागों का वर्णन करो।
उत्तर:
पुष्प के पुष्पासन पर पुष्प के चार चक्र होते हैं- बाशादाला पुंज (calyx), दलपुंज (cerolla), पुमंग (androecium) तथा जायांग (gynoecium) पुण्मासन पर इनकी सापेक्ष स्थिति के आधार पर पुष्प को अधोजायांगता (hypogenous), परिजायांगत (perigynous) तथा अधिवायांगता (epigynous) कहते हैं। 
1. अधोजायांगता (Hypogynous): इसे जायांगभर भी कहते हैं। इसमें पुष्मासन फूला हुआ, शंक्वाकार व जल होने के कारण गयांग सबसे ऊपर स्थित होता है तथा अन्य पुम पत्र जावांग के नीचे से परिवर्धित होते प्रतीत होते हैं, इस प्रकार के निवेशन को जायांगधर कहते हैं। इस स्थिति में अपहाशाय सबसे ऊपर स्थित होता है, इस कारण अण्डाशय कर्ववर्ती ( superior) कहलाता है। उदाहरण सरसों, धतूरा, बैंगन।

2. परिजार्यागता या परिजायांगी (Perigynous): कभी – कभी पुष्मासन वोड़ा दबा हुआ माले के समान होता है। जयांग इसकी अचल्ल सतह पर एवं अन्य पुणांग इसके किनारों पर परिवर्धित होते है। अण्डाशय को दीवार पुष्पासन से संलवित नहीं होती। फलस्वरूप जायांग की स्थिति यहां भी जयवर्ती (कभी – कभी आई – अधोवी कहलाता है) होती है। उदाहरक- मटय एवं गुलाब।

3. जावांगोपरिक वा अधिजायांगता (Epigynous): पुण्यासन प्यालेनुम होता है तथा इसके केन्द्र में जायांग स्थित होता है। अण्डाशय की दीवार पार्श्व में पुष्पारन के साथ संलयित होती है। मा; अन्य पुष्पपा बादल, दल व पुंकेसर आण्डाशय के ऊपर से परिवर्धित होते हैं। जायांग को इस स्थिति में अधोवी एवं अन्य पुष्पांगों को अचीवर्ती कहते हैं। उदाहरण खीरा, अमरूद, सूर्यमुखी।

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