Chapter 6 खानाबदोश

Textbook Questions and Answers

Chapter 6 खानाबदोश

प्रश्न 1. 
जसदेव की पिटाई के बाद मजदूरों का समूचा दिन कैसा बीता? 
उत्तर : 
जसदेव की पिटाई के बाद सभी मजदूर डर गए थे। उन्हें लग रहा था कि सूबेसिंह किसी भी वक्त लौटकर आ सकता है। शाम होते ही भट्टे पर सन्नाटा छा गया था, सारे मजदूर अपने-अपने खोल में चले गए थे। बूढ़ा बिलसिया जो अकसर बाहर पेड़ के नीचे देर रात तक बैठा रहता था, आज शाम होते ही अपनी झोंपड़ी में जाकर लेट गया था। वह धीमी आवाज में खाँस रहा था। किसनी के ट्रांजिस्टर की आवाज भी नहीं आ रही थी। 

प्रश्न 2.
मानो अभी तक भट्टे की जिंदगी से तालमेल क्यों नहीं बैठा पाई थी? 
उत्तर : 
सुकिया और मानो जिस कारण अपना घर छोड़कर महीना भर पहले भट्टे पर आए, यहाँ की स्थिति तो और भी दुखदायी थी। मजदूरों को रहने के लिए मकान नहीं थे, केवल दड़बेनुमा छोटी-छोटी झोंपड़ियाँ थीं जिनमें प्रकाश का अभाव था। केवल टिमटिमाती ढिबरियाँ थीं जिनसे अँधेरा दूर नहीं होता था। साँझ होते ही चारों तरफ सन्नाटा फैल जाता और साँय-साँय की ध्वनि सुनाई पड़ती। दिनभर के थके मजदूर अपने-अपने दड़बों में घुस जाते। आपस के दुख-सुख बाँटने का अवसर किसी के पास नहीं था। चारों तरफ जंगल था, इस कारण साँप-बिच्छू का डर रहता। ईंटों को जोड़कर बनाए हुए चूल्हे थे। काम की भी निश्चितता नहीं थी। इस प्रकार मानो का भट्टे की जिन्दगी से तालमेल नहीं बन पाई थी। 

प्रश्न 3. 
असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबेसिंह क्यों बिफर पड़ा और जसदेव को मारने का क्या कारण था? 
उत्तर :
कामातुर सूबेसिंह ने मानो को बुलाने के लिए असगर ठेकेदार को भेजा था। ठेकेदार की बात सुनकर सुकिया और मानो ने एक दूसरे को देखा। मानो भयभीत थी और सुकिया को क्रोध आ गया। सुकिया को क्रोधित देखक ठेकेदार के साथ चला गया। अपनी आज्ञा का उल्लंघन देखकर सबेसिंह बिफर पड़ा और बोला मैंने तुझे कब बलाया था। जसदेव ने सहज रूप में कहा कि मैं आपका काम कर दूँ । सूबेसिंह ने अपशब्दों का प्रयोग किया। जसदेव ने उसके अपशब्दों का विरोध किया। तब कामान्ध सूबेसिंह ने लात-घूसों से उसकी पिटाई की और अधमरा कर दिया। 

प्रश्न 4. 
जसदेव ने मानो के हाथ का खाना क्यों नहीं खाया ? 
उत्तर : 
सूबेसिंह के हाथों पिटाई के बाद जसदेव की दशा बहुत दयनीय हो गई थी। उसका सारा शरीर दुख रहा था। तब मानो ने उसकी चोटों की सिकाई की थी। मानो को जसदेव से गहरी सहानुभूति हो गई थी। वह उसे खिलाने चली तो सुकिया ने पूछा कि वह कहाँ जा रही थी ? जब उसने भूखे जसदेव का नाम लिया तो सुकिया ने उससे कहा कि वह पागल है, भला एक वामन उसके हाथ का बना खाना कैसे खा लेगा। मानो को विश्वास नहीं हुआ। उसने तो यहाँ तक कह दिया कि हम सबकी एक ही जाति है - मजदूर। 

मानो खाना लेकर पहुँची। उसने जसदेव की बड़ाई करते हुए, उससे बड़े स्नेह के साथ खाना खाने का अनुरोध किया। जसदेव ने कहा कि उसे भूख नहीं थी। मानो जानती थी कि असल बात वही थी जो सुकिया ने बताई थी। जसदेव स्वीकार नहीं कर पाया था कि वह ब्राह्मण नहीं केवल एक मजदूर है। उसमें साहस नहीं था कि उच्च जाति के मिथ्या अहंकार से मुक्त होकर, उस सहानुभूति भरी नारी के हाथ का बना खाना खा सके।
 

प्रश्न 5. 
लोगों को क्यों लग रहा था कि किसी ने जानबूझ कर मानो की ईंटें गिराकर रौंदा है ? 
उत्तर :
मानो और सुकिया से सूबेसिंह बहुत चिढ़ा हुआ था। वह उनको हर तरह परेशान करने पर आमादा था। जब सुबह मानो ने अपनी थापी हुई ईंटों को जाकर देखा तो कच्ची ईंटें टूटी-फूटी पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे ईंटों को किसी ने जानबूझकर गिराया था। लोग कह रहे थे कि रात में कोई आँधी-तूफान नहीं आया और वह किसी जंगली जानवर का भी काम नहीं लग रहा था। अनेक लोग मानते थे कि ईंटें जानबूझकर तोड़ी गई थीं। सब जानते थे कि वह करतूत सूबेसिंह के अलावा और किसी की नहीं थी। 

प्रश्न 6. 
मानो को क्यों लग रहा था कि किसी ने उसकी पक्की ईंटों के मकान को धराशाई कर दिया 
उत्तर : 
मानो अपने ईंटों से बने घर की कल्पना को साकार करने के लिए जी-जान से जुटी हुई थी। सुकिया भी उसका पूरा साथ दे रहा था। लाल-लाल ईंटों से बना अपना घर बाहर भले न बन पाया हो लेकिन सुकिया के सपनों में प्रतिक्षण साकार था। उसने पसीना बहाकर ईंटें थापी थीं। बड़ी लगन से उन्हें दीवार के रूप में खड़ा किया था। जब उसने उन्हीं ईंटों की दुर्दशा देखी तो वह मर्माहत हो उठी। उसे लगा जैसे वे ईंटें नहीं गिराई गई हैं बल्कि किसी आतताई ने उन ईंटों से बना उसका पक्का मकान ही गिरा दिया था। उसकी सारी मेहनत, उसके सपने, कल्पना में साकार अपना घर, सब कुछ सूबेसिंह ने तहस-नहस कर डाला था। 

प्रश्न 7.
'चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देंगे।' सुकिया के इस कथन के आधार पर कहानी की मूल संवेदना स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर : 
कहानी के सुकिया और मानो शोषित मजदूर वर्ग के प्रतीक हैं। सूबेसिंह तथा असगर ठेकेदार शोषक वर्ग के प्रतीक हैं। कहानी की मूल संवेदना उस परिश्रमी मजदूर वर्ग का चित्रण करना है जो शोषण और यातना का शिकार है और मेहनत-मजदूरी करके भी अपनी गुजर-बसर नहीं कर पा रहा है। यदि मजदूर वर्ग लगन तथा ईमानदारी के साथ मजदूरी करना चाहता है तो सबेसिंह और असगर जैसे शोषक उन्हें काम नहीं करने देते, उन्हें इज्जत के साथ जीने नहीं है विलासी हैं और मजदूरों का देह-शोषण करते हैं। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि मजदूर वर्ग आज भी जातिवादी मानसिकता से उबर नहीं पाया है। कहानीकार दलित-शोषित वर्ग के प्रति मानवीय संवेदना जगाना चाहता है। कहानी की .यही मूल संवेदना है। 

प्रश्न 8. 
'खानाबदोश' कहानी में आज के समाज की किन-किन समस्याओं को रेखांकित किया गया है? इन समस्याओं के प्रति कहानीकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर :
'खानाबदोश' कहानी शोषित मजदूर वर्ग की दर्दनाक कहानी है। कहानीकार ने आज के समाज की कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याओं का चित्रण इस कहानी में किया है। आज के समाज में बेरोजगारी की बड़ी भयंकर समस्या है। मजदूर वर्ग विवश होकर अपना घर छोड़कर दूसरी जगह मजदूरी करने जाते हैं। घर से दूर जाकर मजदूरों को बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। परिश्रम करके भी वे अच्छी तरह जीवन यापन नहीं कर पाते। उन्हें मालिक के अभद्र व्यवहार को भी सहन करना पड़ता है। मालिक के डर से मजदूर वर्ग में एकता नहीं हो पाती कहानीकार ने कहानी में उपर्युक्त सभी समस्याओं का वर्णन किया है। 

लेखक की मजदूरों के प्रति सहानुभूति है। वह चाहता है मजदूरों के रहने की अच्छी व्यवस्था हो। मजदूरी करने वाली स्त्रियों का देह-शोषण न हो। उन्हें समय पर और अच्छी मजदूरी मिले। मालिक मजदूरों के साथ मानवीय व्यवहार करें। मजदूरों को अकारण तंग न करें। मालिक और मजदूर के बीच सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार हो। लेखक ने अप्रत्यक्ष रूप से अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। 

प्रश्न 9.
सुकिया ने जिन समस्याओं के कारण गाँव छोड़ा, वही समस्या शहर में भट्टे पर उसे झेलनी पड़ी - मूलतः वह समस्या क्या थी ? 
उत्तर :
कहानी में सुकिया को भट्टे पर घटी घटनाओं ने बहुत चिंतित कर दिया था। सूबेसिंह द्वारा जसदेव की पिटाई ने और मानो पर पड़ी उसकी कुदृष्टि ने उसे बहुत चिंतित कर रखा था। जिन समस्याओं से त्रस्त होकर उसने अपना गाँव छोड़ा था वे शहर में भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही थीं। इन समस्याओं में सबसे अधिक चिंतित करने वाली समस्या थी, दुश्चरित्र ठेकेदारों और मालिकों से मानो की सुरक्षा। सुकिया ने महेश की पत्नी किसनी के साथ हुए काण्ड को देखा था। यह संकट अब मानो तक पा। वह महेश नहीं बन सकता था और न मानो ही किसनी बनने को तैयार थी। 

किया के सामने मल समस्या अपने आत्म-सम्मान को, एक स्त्री की इज्जत को बचाने की ठानी थी। वह अय्यास सूबे के सामने समर्पण करने को तैयार नहीं था। अतः खानाबदोश बने रहने के अलावा इस समस्या का और कोई समाधान सुकिया को नहीं सूझ रहा था। 

प्रश्न 10. 
'स्किल इंडिया जैसा कार्यक्रम होता तो क्या तब भी सुकिया और मानो को खानाबदोश जीवन व्यतीत करना पड़ता ? 
उत्तर :
'स्किल इंडिया' कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य भारत के सभी श्रम शक्ति को किसी विशेष कार्य में माँग के अनुरूप कार्यकुल बनाना है। साधारण मजदूर की अधिक पूछ नहीं होती क्योंकि ऐसे लोग सरलता से मिल जाते हैं। साधारण मजदर को नियोक्ता चाहे जब निभाता देते हैं। अतः उनको नौकरी के लिए खानाबदोशों की भाँति भटकना पडता है। जो कर्मचारी माँग और विकास के अनुरूप अपने काम में दक्ष होता है, उसे नौकरी पाने में विशेष श्रम नहीं करना पड़ता है। अतः उस समय यदि 'स्किल इंडिया' जैसा कार्यक्रम उस समय चल रहा होता तो सुकिया और मानो किसी भी धंधे में विशेष योग्यता पा लेते और टिककर एक ही ठिकाने पर काम करते। उन्हें 'खानाबदोश' नहीं बनना पड़ता। 

प्रश्न 11. 
निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए - 
(क) 'अपने देश की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है।' 
आशय - यह कथन मानो का है जो पति के साथ भट्टे पर काम करने आई है। उसका कथन है कि जो संतोष अपने घर रूखी-सूखी रोटी खाने में होता है, वह परदेश में रहकर प्राप्त नहीं होता। बड़े लाभ के लिए परदेश में जाने पर परेशानियाँ अधिक होती हैं। रहने और खाने की अच्छी सुविधा नहीं मिलती। भट्टे के माहौल को देखकर मानो ने यह बात कही थी। 

(ख) 'इत्ते ढेर-से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने।' 
आशय - मानो गाँव में पक्का ईंटों का मकान बनाना चाहती थी उसने अपनी इच्छा सुकिया के समक्ष व्यक्त की। सुकिया ने उसे समझाते हुए कहा कि पक्का मकान बनाना आसान नहीं है, उसके लिए बहुत सारे रुपए, लोहा, सीमेंट और लकड़ी चाहिए। यह हमारे बूते की बात नहीं है। अपनी क्षमता से अधिक सोचना, कल्पना करना अनुचित है। जैसे एक गरीब आदमी हाथी नहीं खरीद सकता, उसके लिए अधिक रुपये चाहिए। इसी प्रकार हमारे लिए मकान बनाना हाथी खरीदने के समान है। हम मजदूरी करके मकान नहीं बना सकते। 

(ग) उसे एक घर चाहिए था-पक्की ईंटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के सपने देखती थी।' 
आशय - भट्टे से निकली लाल-लाल पकी ईंटों को देखकर मानो के मन में एक बिजली-सी कौंध गई। उसके मन में अपना मकान बनाने की इच्छा जाग्रत हो गई। वह दिन-रात मेहनत करके ईंट पाथ कर पैसा कमाना चाहती थी। वह भी पक्के मकान में अपने परिवार के साथ सुख से जीवन व्यतीत करने की कल्पना करती थी। इसी कारण वह अधिक परिश्रम करती थी। 

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