Chapter 6 सुभाषितानि

पाठ परिचय :

संस्कृत कृतियों के जिन पद्यों या पद्यांशों में सार्वभौम सत्य को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, उन पद्यों को सुभाषित कहते हैं। प्रस्तुत पाठ ऐसे 10 सुभाषितों का संग्रह है जो संस्कृत के विभिन्न ग्रंथों से संकलित हैं। इनमें परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, सभी वस्तुओं की उपादेयता और बुद्धि की विशेषता आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है। 

पाठ के पद्यांशों का अन्वय, कठिन शब्दार्थ एवं सप्रसंग हिन्दी अनुवाद – 

1. आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। 
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥ 

अन्वय-हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् शत्रुः आलस्यम्। उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति, यं कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में आलस्य को महान् शत्रु तथा परिश्रम को श्रेष्ठ बन्धु बताते हुए कहा गया है कि – 

हिन्दी अनुवाद –  निश्चित ही मनुष्यों के शरीर में रहने वाला महान् शत्रु आलस्य है। परिश्रम के समान कोई भी बन्धु (हितैषी) नहीं है, जिसको करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता है। 

2. गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो,
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः। 
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः, 
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥ 

अन्वय-गुणी गुणं वेत्ति, निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति, बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति, वसन्तस्य गुणं पिकः (वेत्ति), वायसः न (वेत्ति), सिंहस्य बलं करी (वेत्ति), मूषकः न। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में अनेक उदाहरणों के द्वारा यह समझाया गया है कि गुणवान् ही दूसरे के गुणों को जानता है, गुणहीन नहीं। 

हिन्दी अनुवाद – गुणवान् ही गुण को जानता है, गुणहीन गुण को नहीं जानता है। बलवान् ही बल को जानता है, बलहीन बल को नहीं जानता है। वसन्त ऋतु के गुण को कोयल ही जानती है, कौआ उसे नहीं जानता है। सिंह के बल को हाथी ही जानता है, उसे चूहा नहीं जानता है।
 
अर्थात् – इस कथन के द्वारा कवि ने यह दर्शाया है कि जिसमें स्वयं में जो गुण है वह दूसरों के भी उस गुण के महत्त्व को जानता है, और जिसमें जो गुण नहीं है वह दूसरों के भी उस गुण को नहीं जान सकता है। हिन्दी में कहावत है-“हीरे की परख जौहरी (सुनार) ही जानता है।” 

3. निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति, 
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति। 
अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै, 
कथं जनस्तं परितोषयिष्यति॥ 

अन्वय – यः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति सः तस्य अपगमे ध्रुवं प्रसीदति, यस्य मनः अकारणद्वेषि (अस्ति) जनः तं कथं परितोषयिष्यति।

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में बिना कारण के क्रोध के दुष्प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा गया है कि –

हिन्दी अनुवाद – जो किसी कारण को उद्देश्य में करके अत्यधिक क्रोध करता है वह उस कारण के समाप्त हो जाने पर निश्चित रूप से प्रसन्न होता है। किन्तु जिसका मन बिना कारण ही द्वेष करने वाला है उस मन को व्यक्ति कैसे सन्तुष्ट करेगा, अर्थात् ऐसे मन को कभी भी सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता है। 

4. उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते, 
हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः। 
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः, 
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः॥ 
अन्वय-पशुना अपि उदीरितः अर्थः गृह्यते, हया: नागाः च बोधिताः (भारं) वहन्ति, पण्डितः जनः अनुक्तम् अपि ऊहति, बुद्धयः परेङ्गितज्ञानफलाः भवन्ति। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में बुद्धिमान् के वैशिष्ट्य का उदाहरण सहित वर्णन करते हुए कहा गया है कि –  

हिन्दी अनुवाद – पशु के द्वारा भी कहे हुए अर्थ को ग्रहण कर लिया जाता है, घोड़े और हाथी समझाने पर भार का वहन कर लेते हैं। किन्तु विद्वान् व्यक्ति बिना कहे हुए को भी समझ लेता है। बुद्धिमान् लोग दूसरों के संकेतजन्य ज्ञान रूपी फल वाले होते हैं। अर्थात् बुद्धिमान् दूसरों के संकेतमात्र से ही उसके भावों को समझ लेते हैं, उनसे कहने की आवश्यकता नहीं होती है भाव यह है कि कहने पर तो पशु भी दूसरों की बात समझ लेते हैं किन्तु बिना कहे हुए संकेतमात्र से समझने वाले ही बुद्धिमान् व्यक्ति होते हैं। 

5. क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां,
देहस्थितो देहविनाशनाय। 
यथास्थितः काष्ठगतो हि वह्निः, 
स एव वह्निर्दहते शरीरम्॥ 

अन्वय-नराणां देहविनाशनाय प्रथमः शत्रुः देहस्थितः क्रोधः। यथा काष्ठगतः स्थितः वह्निः काष्ठम् एव दहते (तथैव शरीरस्थः क्रोधः) शरीरं दहते।। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में क्रोध को विनाशशील शत्रु बतलाते हुए कहा गया है कि – 

हिन्दी अनवाद-मनुष्यों के शरीर का विनाश करने के लिए पहला शत्रु शरीर में ही स्थित क्रोध है। जिस प्रकार काष्ठ के अन्दर स्थित अग्नि काष्ठ को ही जला देती है, उसी प्रकार शरीर में स्थित क्रोध शरीर को ही जला देता है। कवि ने इस कथन के द्वारा क्रोध को मनुष्यों का विनाश करने वाला परम शत्रु बतलाते हुए क्रोध का त्याग करने की प्रेरणा दी है। 

6. मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति, 
गावश्च गोभिः तुरगास्तुरङ्गैः। 
मूर्खाश्च मूखैः सुधियः सुधीभिः, 
समान-शील-व्यसनेषु सख्यम्॥ 

अन्वय-मृगाः मृगैः सङ्गम्, गावश्च गोभिः सङ्गम्, तुरगाः तुरङ्गैः सङ्गम्, मूर्खाः मूखैः सङ्गम्, सुधियः सुधीभिः सङ्गम् अनुव्रजन्ति। सख्यम् समानशीलव्यसनेषु (भवति)। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में अनेक उदाहरणों के द्वारा प्रतिपादित किया गया है कि मित्रता समान चरित्र व स्वभाव वालों में ही होती है 

हिन्दी अनुवाद – मृग मृगों के साथ, गायें गायों के साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, मूर्ख मूों के साथ और विद्वान् विद्वानों के साथ ही पीछे-पीछे जाते हैं। मित्रता समान चरित्र व स्वभाव वालों में ही होती है। 

7. सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः। 
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते॥ 

अन्वय-फलच्छाया समन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः। दैवात् यदि फलं नास्ति (वृक्षस्य) छाया केन निवार्यते। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धत किया गया है। इस पद्यांश में फ़ल एवं छायादार वृक्ष का उदाहरण देते हुए कवि ने परोपकारी व्यक्ति के महत्त्व को दर्शाया है। कवि कहता है कि 

हिन्दी अनुवाद – फल और छाया से युक्त महान् वृक्ष का ही आश्रय लेना चाहिए। भाग्य से यदि उसमें फल नहीं हैं तो भी उस वृक्ष की छाया को कौन रोक सकता है ? अर्थात् कोई नहीं। भाव यह है कि जिस प्रकार फल व छाया से युक्त वृक्ष का आश्रय लेने से यदि कदाचित् फल नहीं भी हो, तो भी वह छाया प्रदान करता ही है। उसी प्रकार परोपकारी व्यक्ति भी जो भी कुछ उसके पास है उससे वह दूसरों का भला करता ही है। 

8. अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम्। 
अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः॥ 

अन्वय-अमन्त्रम् अक्षरं नास्ति, अनौषधम् मूलं नास्ति, अयोग्यः पुरुषः नास्ति, तत्र योजकः दुर्लभः। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में सभी को योग्य दर्शाते हुए उनकी योग्यता को काम में लेने वाले को दुर्लभ बतलाया गया है। कवि कहता है कि – 

हिन्दी अनुवाद – मन्त्रहीन अक्षर नहीं है अर्थात् प्रत्येक अक्षर सार्थक होता है। बिना दवा (जड़ी-बूटी) के जड़ नहीं है अर्थात् प्रत्येक जड़ पदार्थ औषधि है। कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं होता है किन्तु उसे सही जगह पर जोड़ने वाला दुर्लभ है। आशय यह है कि प्रत्येक अक्षर, जड़-पदार्थ, मनुष्य आदि उपयोगी होते हैं, किन्तु उनका सही उपयोग करने वाले दुर्लभ होते हैं। 

9. सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता। 
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा॥ 

अन्वय-महताम् संपत्तौ विपत्तौ च एकरूपता भवति। (यथा)-सविता उदये रक्तः भवति, तथा अस्तमये च रक्तः भवति। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्य में सूर्य का उदाहरण देते हुए महापुरुषों के वैशिष्ट्य को दर्शाया गया है। कवि कहता है कि – 

हिन्दी अनुवाद – महापुरुषों की सम्पत्ति में और विपत्ति में एकरूपता रहती है। जैसे सूर्य उदय के समय रक्त (लाल) वर्ण का होता है, वैसे ही अस्त होने के समय में भी रक्त (लाल) वर्ण का ही होता है। 
आशय यह है कि महान् लोग सभी स्थितियों में एक समान ही रहते हैं। वे न तो संपत्ति के समय अधिक प्रसन्न होते हैं और न ही विपत्ति में घबराते हैं। 

10. विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिनिरर्थकम्। 
अश्वश्चेद् धावने वीरः भारस्य वहने खरः॥ 

अन्वय-विचित्रे संसारे खलु किञ्चित् निरर्थकं नास्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः, (तर्हि) भारस्य वहने खरः (वीरः) अस्ति। 

कठिन शब्दार्थ : 

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ शीर्षक पाठ से उद्धृत किया गया है। इस पद्यांश में संसार में सभी की सार्थकता को सिद्ध करते हुए कहा गया है कि –  

हिन्दी अनुवाद – इस विचित्र संसार में निश्चय ही कुछ भी निरर्थक नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में वीर है तो भार का वहन करने में गधा भी वीर है। अर्थात् संसार में सबका अपना-अपना महत्त्व है, कोई भी व्यर्थ की वस्तु नहीं है। 

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