Chapter 7 कंपनी निर्माण

Textbook Questions and Answers

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
कम्पनी के निर्माण की विभिन्न स्थितियों के नाम लिखें। 
उत्तर:
कम्पनी के निर्माण की विभिन्न स्थितियाँ निम-

प्रश्न 2. 
कम्पनी समामेलन के लिए आवश्यक प्रलेखों को सूचीबद्ध करें। 
उत्तर:
कम्पनी के समामेलन के लिए आवश्यक प्रलेख- 

प्रश्न 3. 
प्रविवरण पत्र क्या है? क्या प्रत्येक कम्पनी के लिए प्रविवरण पत्र जमा कराना आवश्यक है? 
उत्तर:
प्रविवरण पत्र का अर्थ-प्रविवरण पत्र ऐसा कोई भी दस्तावेज है, जिसमें कोई भी सूचना, परिपत्र, विज्ञापन और अन्य दस्तावेज शामिल है जो जनता से जमा आमन्त्रित करता है या एक निगमित संस्था के अंश या ऋण-पत्र खरीदने के लिए जनता से प्रस्ताव आमन्त्रित करता है। अन्य शब्दों में, यह जनसाधारण से कम्पनी की प्रतिभूतियाँ खरीदने के लिए प्रस्ताव आमंत्रित करता है। 

क्या प्रत्येक कम्पनी के लिए प्रविवरण पत्र जमा कराना आवश्यक है?-इस सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि निजी कम्पनी तो प्रविवरण पत्र जमा कराती ही नहीं है क्योंकि वह जनता से पूँजी आमन्त्रित नहीं कर सकती है। जहाँ तक सार्वजनिक कम्पनी का प्रश्न है उसी सार्वजनिक कम्पनी को कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ प्रविवरण पत्र की प्रति जमा कराना आवश्यक होता है। जो जनता से पूँजी आमन्त्रित करती है। जो सार्वजनिक कम्पनी अपने स्वयं के संसाधनों से पूँजी एकत्रित करती है उसे प्रविवरण पत्र कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ जमा कराना आवश्यक नहीं है। ऐसी कम्पनी को स्थानापन्न प्रविवरण ही कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ जमा कराना होता है। 

प्रश्न 4. 
‘आबंटन विवरणी’ शब्द को संक्षेप में समझाइये। 
उत्तर:
आबंटन विवरणी-यदि कोई अंश ली कम्पनी अपनी प्रतिभूतियों का आबंटन करती है तो उसे निर्धारित की गई रीति से आबंटन विवरणी कम्पनी रजिस्ट्रार के पास फाइल करनी होती है। [कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 39(4)] 

एमसीए द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार कम्पनी जब अपनी प्रतिभूतियों का आबंटन करती है तो वह उसके 30 दिनों के भीतर कम्पनी रजिस्ट्रार के पास आबंटन विवरणी फार्म PAS-3 में निर्धारित शुल्क के साथ फाइल करेगी। इस आबंटन विवरणी में प्रत्येक आबंटी (प्रतिभूति धारक) का नाम, पता, स्थायी लेखा संख्या (PAN) तथा ई-मेल पता, धारित प्रतिभूतियों की संख्या, प्रतिभूति आबंटन की तिथि, धारित प्रतिभूतियों की श्रेणी, प्रतिभूतियों का अंकित मूल्य तथा उन पर प्रदत्त राशि तथा यदि प्रतिभूतियां नकद के अतिरिक्त किसी अन्य प्रतिफल पर जारी की गई हैं तो उस प्राप्त प्रतिफल के विवरण का उल्लेख होगा। 

इस प्रकार ऐसी विवरणी जिसमें आबंटियों का नाम, पता तथा उन्हें आबंटित अंशों की संख्या आदि लिखा होता है और जो कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ प्रस्तुत की जाती हैं आबंटन विवरणी कहलाती है। 

प्रश्न 5. 
कम्पनी निर्माण के किस स्तर पर उसे सेबी (SEBI) से सम्पर्क करना होता है? 
उत्तर:
जब सार्वजनिक कम्पनी जनता से धन एकत्रित करना चाहती है अर्थात् जनता को अपने अंश खरीदने के लिए आमंत्रित करना चाहती है तो उसे सभी आवश्यक सूचनाएँ भली-भाँति प्रकट कर देनी चाहिए एवं सम्मानित निवेशकों से कोई सारयुक्त सूचना नहीं छिपानी चाहिए। निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए यह आवश्यक है। इसीलिए जनता से धन जुटाने या अंश खरीदने के लिए आमंत्रित करने से पहले भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) से सम्पर्क कर उसकी पूर्वानुमति लेना आवश्यक होता है। 

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
प्रवर्तन शब्द का क्या अर्थ है? प्रवर्तकों ने जिस कम्पनी का प्रवर्तन किया है उसके सन्दर्भ में उनकी कानूनी स्थिति की चर्चा कीजिए। 
उत्तर:
प्रवर्तन शब्द का अर्थ-प्रवर्तन का अर्थ है व्यावसायिक सुअवसरों की खोज एवं कम्पनी की स्थापना के लिए पहल करना जिससे कि व्यवसाय के प्राप्त सुअवसरों को व्यवहारिक स्वरूप प्रदान किया जा सके। इस प्रकार प्रवर्तन का कार्य सशक्त व्यवसाय के अवसर की खोज से शुरू होता है और तब तक चलता रहता है जब तक कि कम्पनी व्यवसाय प्रारम्भ करने की स्थिति को प्राप्त नहीं कर ले। प्रवर्तन सम्बन्धी कार्यों को करने वाले व्यक्ति प्रवर्तक कहलाते हैं। अन्य शब्दों में, ऐसा कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह अथवा एक कम्पनी, कम्पनी की स्थापना की दशा में कदम बढ़ाती है, तो उन्हें कम्पनी का प्रवर्तक कहा जाता है। 

प्रवर्तक की स्थिति-प्रवर्तक कम्पनी को पंजीकृत कराने एवं उसे व्यापार प्रारम्भ करने की स्थिति तक लाने के लिए विभिन्न कार्यों को करता है। लेकिन प्रवर्तक न तो कम्पनी के एजेण्ट के रूप में कार्य करता है और न ही वह ट्रस्टी के रूप में कार्य करता है अर्थात् उसकी स्थिति न तो एजेण्ट की होती है और न ही प्रन्यासी की। प्रवर्तक कम्पनी का एजेण्ट तो इसलिए नहीं हो सकता है, क्योंकि अभी कम्पनी का समामेलन नहीं हुआ है और कम्पनी अस्तित्व में नहीं आयी है। यही कारण है कि प्रवर्तक उन सभी समामेलन से पूर्व किये गये समझौतों के लिए उत्तरदायी होते हैं, जिनको कम्पनी ने समामेलन के पश्चात् मान्यता नहीं दी है।

इसी प्रकार प्रवर्तक कम्पनी के ट्रस्टी भी नहीं होते हैं क्योंकि जब कम्पनी अस्तित्व में है ही नहीं तो वह समामेलन से पूर्व कैसे उसी को अपना ट्रस्टी बना सकती है प्रवर्तकों की स्थिति एक न्यासी के समान होती है। कम्पनी और प्रवर्तकों के बीच विश्वासाश्रित सम्बन्ध होते हैं। अतः प्रवर्तकों से यह आशा की जाती है कि वे ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे जिससे आगे चलकर कम्पनी के साथ विश्वासघात हो। उन्हें अपनी स्थिति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए और न ही कोई गुप्त लाभ कमाना चाहिए। कम्पनी से भी वे आशा रख सकते हैं कि जब कम्पनी का विधिवत् समामेलन हो जाये तो उनके द्वारा किये गये कार्यों की पुष्टि वह कर देगी। इसी उम्मीद में प्रवर्तक कम्पनी के निर्माण एवं समामेलन सम्बन्धी कार्यवाही को सम्पन्न करते हैं। 

प्रवर्तक कम्पनी के प्रवर्तन के समय किये गये व्यय को प्राप्त करने का कानूनी रूप से दावा नहीं कर सकते हैं। क्योंकि उन्हें यह सब कार्य करने का अधिकार कम्पनी प्रदान नहीं करती है। वैसे कम्पनी चाहे तो समामेलन से पूर्व किये गये व्ययों का भुगतान कर सकती है। कम्पनी प्रवर्तकों के माध्यम से क्रय की गई सम्पत्ति की क्रय राशि अथवा अंशों की बिक्री पर उनकी सेवाओं के बदले एक-मुश्त राशि अथवा कमीशन का भुगतान कर सकती है। कम्पनी उन्हें अंशों या ऋण-पत्रों का आवंटन भी कर सकती है या फिर भविष्य में प्रतिभूतियों के क्रय करने की सुविधा दे सकती है। 

प्रश्न 2. 
कम्पनी के प्रवर्तन के लिए प्रवर्तक क्या कदम उठाते हैं? उनको समझाइये। 
उत्तर:
कम्पनी के प्रवर्तन के लिए प्रवर्तक द्वारा उठाये गये कदम 
कम्पनी के प्रवर्तन के लिए प्रवर्तक द्वारा उठाये जाने वाले कदमों को निम्न प्रकार से समझाया जा सकता है-

1. व्यवसाय के अवसर की पहचान करना-एक प्रवर्तक का कम्पनी के प्रवर्तन के लिए पहला कार्य व्यवसाय के अवसर की पहचान करना है। यह अवसर एक नई वस्तु अथवा सेवा के उत्पादन का हो सकता है या फिर किसी उत्पाद का किसी अन्य माध्यम के द्वारा उपलब्ध कराने का अथवा अन्य कोई अवसर जिसमें निवेश की सम्भावना हो, हो सकता है। प्रवर्तक इसमें अवसर की तकनीकी एवं प्राथमिक संभावना को देखकर इसका विश्लेषण करते हैं। 

2. सम्भाव्यता का अध्ययन करना-प्रवर्तक जिन व्यवसायों को प्रारम्भ करना चाहते हैं उनके सभी पहलुओं की जांच-पड़ताल करने के लिए विस्तृत सम्भाव्य अध्ययन करते हैं। इसकी जाँच के लिए कि क्या उपलब्ध व्यावसायिक अवसर में लाभ उठाया जा सकता है। इसमें इंजीनियरिंग, चार्टर्ड एकाउन्टेंट्स आदि विशेषज्ञों की सहायता ली जा सकती है। 

(i) तकनीकी संभाव्यता-कभी-कभी कोई विचार अच्छा होता है लेकिन उसका क्रियान्वयन तकनीकी रूप से सम्भव नहीं होता है। क्योंकि आवश्यक कच्चा माल अथवा तकनीक सरलता से उपलब्ध नहीं होता है। 

(ii) वित्तीय संभाव्यता-पहचान करा लिये गये व्यवसाय के अवसर के लिए प्रवर्तकों को धन की आवश्यकता का अनुमान लगाना होता है। यदि परियोजना में होने वाला व्यय इतना अधिक है कि इसे उपलब्ध साधनों से आसानी से नहीं जुटाया जा सकता तो परियोजना के विचार को त्यागना पड़ सकता है। 

(iii) आर्थिक सम्भाव्यता-यदि परियोजना तकनीकी एवं वित्तीय रूप से व्यावहारिक है लेकिन इसकी लाभदेयता की सम्भावना बहत कम है। ऐसी परिस्थिति में भी यह विचार त्यागना होगा। इन विषयों के अध्ययन के लिए प्रवर्तक सामान्यतया विशेषज्ञों की सहायता लेते हैं। 
जब उपर्युक्त जाँच-पड़तालों के परिणाम सकारात्मक निकलें तो प्रवर्तक कम्पनी के निर्माण का निर्णय ले सकता है। 

3. नाम का अनुमोदन-चूँकि कम्पनी को कानून एक व्यक्ति मानता है अतः व्यक्ति की भाँति ही कम्पनी का एक नाम होना चाहिए। इसके लिए प्रवर्तकों को एक नाम का चुनाव करना होगा एवं इसके अनुमोदन के लिए जिस राज्य में कम्पनी का पंजीकृत कार्यालय होगा, उस राज्य के कम्पनी रजिस्ट्रार के पास एक आवेदन-पत्र जमा कराना होगा।

4. उद्देश्य पत्र (पार्षद सीमा नियम) पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में निर्णय लेना-प्रवर्तक को उन व्यक्तियों या सदस्यों के सम्बन्ध में निर्णय लेना होगा जो प्रस्तावित कम्पनी के उद्देश्य पत्र अर्थात् पार्षद सीमा नियम पर हस्ताक्षर करेंगे। सामान्यतः हस्ताक्षर करने वाले सदस्य ही प्रथम निदेशक होते हैं। इनकी निदेशक बनने एवं कम्पनी के योग्यता अंश खरीदने के सम्बन्ध में लिखित स्वीकृति लेनी आवश्यक है। 

5. कुछ पेशेवर लोगों की नियुक्ति-प्रवर्तक उन आवश्यक प्रलेखों को तैयार करने में जिन्हें कम्पनी रजिस्ट्रार के पास जमा कराना होता है, उनकी सहायता करने के लिए मर्केटाइल बैंकर्स, अंकेक्षक आदि पेशेवर लोगों की नियुक्ति करते हैं। 
कम्पनी रजिस्ट्रार के पास एक विवरणी (आवंटन विवरणी) भी जमा करानी होगी जिसमें अंशधारियों के नाम और उनके पते तथा आवंटित अंशों की संख्या लिखी होगी। 

6. आवश्यक प्रलेखों को तैयार करना-प्रवर्तक द्वारा कम्पनी के पंजीयन के लिए आवश्यक प्रलेखों को तैयार करवाकर इन्हें कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ जमा करवाना पड़ता है। ये प्रलेख निम्नलिखित हैं- 
(i) संस्थापन प्रलेख/पार्षद सीमा-नियम-यह कम्पनी का प्रमुख प्रलेख होता है जो कम्पनी के उद्देश्यों को स्पष्ट करता है। इसमें नाम खण्ड, पंजीकृत कार्यालय खण्ड, उद्देश्य खण्ड, दायित्व खण्ड, पूँजी खण्ड तथा संघ खण्ड उल्लेखित किये हुए होंगे। सार्वजनिक कम्पनी की स्थिति में कम से कम 7 तथा निजी कम्पनी की दशा में कम से कम 2 व्यक्तियों के हस्ताक्षर होने आवश्यक हैं। 

(ii) कम्पनी के अन्तर्नियम-अन्तर्नियम कम्पनी के संस्थापन प्रलेख (पार्षद सीमा नियम) के सहायक नियम होते हैं। कम्पनी के अन्तर्नियम में कमपनी के आन्तरिक मामलों के प्रबन्धन से सम्बन्धित नियम दिये होते हैं। ये संस्थापन प्रलेख में वर्णित किसी भी व्यवस्था के न तो विरोध में होंगे और नही उनसे ऊपर होंगे। ये कम्पनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची की सारणी एफ, जी, एच, आई तथा जे में दिये गये प्रारूप के अनुसार होने चाहिए। अन्तर्नियमों की प्रति पर मोहर लगी हुई हो तथा संस्थापन प्रलेख पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों के हस्ताक्षर हों तभी इसे पंजीयन के लिए प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 

(iii) प्रस्तावित निदेशकों की सहमति-प्रस्तावित निदेशकों की लिखित सहमति कि वे कम्पनी में निदेशक के पद पर कार्य करने एवं अपने योग्यता अंश क्रय करने व उनका भुगतान करने के लिए सहमत हैं। यह भी कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ प्रस्तुत करनी होती है। 

(iv) समझौता-प्रस्तावित महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों जैसे प्रबन्ध निदेशक, पूर्णकालिक संचालक या प्रबन्धक आदि के साथ हुए समझौते की प्रति कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ प्रस्तुत करनी होती है।। 

7. वैधानिक घोषणा-कम्पनी के पंजीयन के लिए उपर्यक्त प्रलेखों के अतिरिक्त एक वैधानिक घोषणा भी इस आशय की कम्पनी रजिस्ट्रार के यहाँ जमा करानी होती है कि कम्पनी ने उपर्युक्त सभी औपचारिकताएँ विधिवत् पूरी कर ली हैं। इस घोषणा पर कोई भी व्यक्ति जो वकील, चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट, लागत लेखाकार, प्रेक्टिस करने वाला कम्पनी सचिव तथा अन्तर्नियमों में नामित निदेशक. प्रबन्धक अथवा कम्पनी सचिव हो. हस्ताक्षर कर सकता है। 

8. फीस भुगतान की रसीद-कम्पनी के पंजीयन के लिए कम्पनी रजिस्ट्रार के पास उपर्युक्त वर्णित प्रलेखों के अतिरिक्त आवश्यक फीस भी जमा करायी जाती है। इस फीस की राशि कम्पनी की अधिकृत पूँजी पर निर्भर करेगी। 

9. प्रारम्भिक प्रसंविदा करना-प्रवर्तक कम्पनी के प्रवर्तन के लिए कम्पनी की ओर से बाहर के लोगों के साथ प्रसंविदा करता है। इन्हें प्रारम्भिक प्रसंविदा कहा जाता है। 

प्रश्न 3. 
कम्पनी के सीमानियम क्या हैं? इसकी धाराओं को संक्षेप में समझाइये। 
उत्तर:
पार्षद सीमानियम का अर्थ-पार्षद सीमानियम कम्पनी का वह महत्त्वपूर्ण एवं आधारभूत प्रलेख होता है जो कम्पनी के उद्देश्यों को परिभाषित करता है। इसे संस्थापन प्रलेख भी कहते हैं। कानूनन कोई भी कम्पनी संस्था के सीमानियम से हटकर कोई कार्य नहीं कर सकती है। यह प्रत्येक कम्पनी के लिए बनाना अनिवार्य होता है। कम्पनी रजिस्ट्रार बिना इस प्रलेख के कम्पनी का पंजीयन नहीं कर सकता है। 

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2. (56) के अनुसार पार्षद सीमा नियम से आशय एक कम्पनी के ऐसे पार्षद सीमा नियम से है जो इस अधिनियम अथवा इससे पूर्व के किसी कम्पनी अधिनियम के अनुसरण में मूल रूप से बनाया गया हो अथवा सामय-समय पर संशोधित किया गया हो। 

पार्षद सीमानियम अथवा संस्थापन प्रलेख की धाराएँ/खण्ड/वाक्य-पार्षद सीमानियम में विभिन्न धाराएँ या खण्ड या वाक्य निम्नलिखित होते हैं- 
1. नाम खण्ड-पार्षद सीमानियम के इस खण्ड में कम्पनी का वह नाम दिया होता है जिस नाम से कम्पनी जानी जायेगी और जिसका अनुमोदन कम्पनी रजिस्ट्रार ने कर दिया है। 

2. पंजीकृत कार्यालय खण्ड-सीमा-नियम के इस खण्ड में उस राज्य का नाम दिया हुआ होता है जिस राज्य में कम्पनी का पंजीकृत कार्यालय होगा। कम्पनी के समामेलन के 30 दिन के भीतर कम्पनी रजिस्ट्रार को कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के पूरे पते की सूचना दे देनी चाहिए। 

3. उद्देश्य खण्ड-सीमानियम के इस खण्ड में उन उद्देश्यों का वर्णन होता है, जिन उद्देश्यों को लेकर कम्पनी का निर्माण किया गया है। इन उद्देश्यों से हटकर कोई कम्पनी कार्य नहीं कर सकती है। ये उद्देश्य निम्न प्रकार से उल्लेखित किये जायेंगे- 
(i) मुख्य उद्देश्य-इस उपखण्ड में उन मुख्य उद्देश्यों को सूचीबद्ध किया जाता है जिनको लेकर कम्पनी का निर्माण किया गया है। 

(ii) अन्य उद्देश्य-जिन उद्देश्यों को प्रमुख उद्देश्यों में सम्मिलित नहीं किया गया है उन्हें इस उप-खण्ड में रखा जाता है। यदि कम्पनी इन उद्देश्यों के लिए कार्य करना चाहे तो उसे या तो विशेष प्रस्ताव पारित करना होगा या साधारण प्रस्ताव पारित कर केन्द्रीय सरकार की अनुमति प्राप्त करनी होगी। 

4. दायित्व खण्ड-सीमानियम के दायित्व खण्ड में यह उल्लेख किया जाता है कि सदस्यों का दायित्व कम्पनी में किस प्रकार रहेगा? सामान्यतः कम्पनी इस खण्ड के द्वारा सदस्यों की देयता को उनके स्वामित्व के अंशों पर अदत्त राशि तक सीमित करती है। उदाहरणार्थ, एक अंशधारक ने कम्पनी के 500 अंश 10 रुपये में प्रति अंश से क्रय किये हैं एवं 6 रुपये प्रति अंश से उनका भुगतान कर चुका है। ऐसे में उसकी देनदारी 4 रुपए प्रति अंश होगी। 

5. पूँजी खण्ड-सीमानियम के इस वाक्य में उस अधिकतम पँजी का वर्णन किया जाता है जिसे अंशों के निर्गमन द्वारा जुटाने के लिए कम्पनी अधिकृत होगी। प्रस्तावित कम्पनी की अधिकृत पूँजी को एक निर्धारित अंकित मूल्य के कितने अंशों में विभक्त किया गया है, का इस खण्ड में उल्लेख किया जाता है। 

6. संघ खण्ड-सीमानियम के इस अन्तिम खण्ड में सीमानियम पर हस्ताक्षरकर्ता कम्पनी निर्माण के लिए इच्छा. दर्शाते हैं एवं योग्यता अंशों के क्रय के लिए भी अपनी सहमति दर्शाते हैं। एक कम्पनी के संस्थापन प्रलेख अनुसूची-I की सारणी अ, ब, स, द और ई में विशिष्टीकृत किये गये प्रारूप में होने चाहिए, जो ऐसी कम्पनियों के अनुरूप हो। 

पार्षद सीमानियम पर सार्वजनिक कम्पनी की दिशा में कम से कम सात एवं निजी कम्पनी की दशा में दो व्यक्तियों के हस्ताक्षर होने आवश्यक हैं। 

प्रश्न 4. 
सीमानियम एवं अन्तर्नियम में अन्तर कीजिए।
उत्तर:

प्रश्न 5. 
क्या एक सार्वजनिक कम्पनी के लिए अपने शेयरों का किसी स्कंध विनिमय/स्टॉक एक्सचेंज में सूचीयन आवश्यक है? एक सार्वजनिक कम्पनी जो सार्वजनिक निर्गमन करने जा रही है, यदि प्रतिभूतियों में व्यापार की अनुमति के लिए स्टॉक एक्सचेंज में आवेदन नहीं कर पाती है अथवा उसे इसकी अनुमति नहीं मिलती है तो इसके क्या परिणाम होंगे? 
उत्तर:
एक सार्वजनिक कम्पनी जनता से पूँजी प्राप्त करने के लिए जनता को अपने अंश एवं ऋण-पत्र खरीदने के लिए प्रविवरण जारी करके जनता से प्रस्ताव आमन्त्रित करती है। ऐसी कम्पनी अपने प्रविवरण में यह उल्लेख करती है कि उसके अंश किन-किन स्कन्ध विनिमय केन्द्रों/स्टॉक एक्सचेंजों में खरीदे व बेचे जा सकते हैं। जब कम्पनी प्रविवरण में स्कन्ध विनिमय केन्द्रों का उल्लेख करती है तो कम्पनी को उन स्टॉक एक्सचेंजों में अपने अंशों का सूचीयन करवाना आवश्यक होता है।

कम्पनी को स्टॉक एक्सचेंज से अभिदान सूची के बंद होने के दस सप्ताह के भीतर अंशों व ऋणपत्रों के क्रय-विक्रय की अनुमति मिल जानी चाहिए। परन्तु यदि किन्हीं कारणों से कम्पनी के अंशों एवं ऋणपत्रों का सूचीयन नहीं हो पाता है तो ऐसा नहीं है कि कम्पनी अंशों के आवंटन का कार्य शुरू नहीं कर पाये। परन्तु भविष्य में कम्पनी को स्टॉक एक्सचेंज/स्टॉक एक्सचेंजों के पास अंशों का सूचीयन करना अनिवार्य है। यदि किन्हीं दशाओं में कम्पनी के संचालक जनता तथा अन्य लोगों से झूठ बोलकर आबंटन कर देते हैं और सूचीयन नहीं हो पाये तो कम्पनी तथा प्रत्येक दोषी अधिकारी दण्ड का भागीदार माना जाता है। 

सत्य/असत्य उत्तरीय प्रश्न-

1. चाहे कम्पनी निजी है अथवा सार्वजनिक, प्रत्येक का समामेलन कराना अनिवार्य है। 
2. स्थानापन्न प्रविवरण-पत्र को सार्वजनिक निर्गमन करने वाली सार्वजनिक कम्पनी जमा कर सकती है। 
3. एक निजी कम्पनी समामेलन के उपरान्त व्यापार प्रारम्भ कर सकती है। 
4. एक कम्पनी के प्रवर्तन में प्रवर्तकों की सहायता करने वाले विशेषज्ञों को भी प्रवर्तक कहते हैं। 
5. एक निजी कम्पनी समामेलन के उपरान्त प्रारम्भिक अनुबन्धों का अनुमोदन कर सकती है। 
6. यदि कम्पनी का छद्म नाम से पंजीयन कराया जाता है तो इसका समामेलन अमान्य होगा। 
7. कम्पनी के अन्तर्नियम इसके प्रमुख दस्तावेज होते हैं। 
8. प्रत्येक कम्पनी के लिए अन्तर्नियम जमा कराना अनिवार्य है। 
9. कम्पनी के समामेलन से पूर्व अल्पकालिक अनुबन्ध पर प्रवर्तकों के हस्ताक्षर होते हैं। 
10. यदि कम्पनी को भारी हानि उठानी पड़ती है तथा इसकी परिसम्पत्तियाँ इसकी देयताओं को चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं तो शेष को इसके सदस्यों की निजी सम्पत्ति से वसूला जा सकता है। 
उत्तर:
1. (सत्य) 
2. (सत्य) 
3. (सत्य) 
4. (असत्य) 
5. (सत्य) 
6. (असत्य) 
7. (असत्य) 
8. (असत्य) 
9. (सत्य) 
10. (असत्य)

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