Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Intext Questions and Answers 

प्रश्न 1.
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि वायुमण्डल में ओजोन की अनुपस्थिति से हमारे ऊपर क्या प्रभाव होगा?
उत्तर:
ओजोन, वायुमण्डल में पाई जाने वाली गैसों में सबसे महत्त्वपूर्ण गैस है जो कि पृथ्वी की सतह से 10 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई के मध्य पाई जाती है। यह गैस एक फिल्टर के समान कार्य करती है। यह गैस सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है तथा उनको पृथ्वी पर पहुँचने से रोकती है जिससे मानव जीवन को हानि नहीं पहुँचती। यदि वायुमण्डल में ओजोन गैस की अनुपस्थिति होगी तो सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणें धरातल पर तापमान में भीषण वृद्धि कर देंगी, साथ ही मानव जीवन के साथ-साथ धरातल को भी विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर देंगी। अनेक प्रकार की चर्म सम्बन्धी बीमारियाँ व कैंसर उत्पन्न होने लगेंगे।

Textbook Questions and Answers 

1. बहुविकल्पीय प्रश्न  

(i) निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है ? 
(क) ऑक्सीजन
(ख) आर्गन 
(ग) नाइट्रोजन
(घ) कार्बन डाइ-ऑक्साइड। 
उत्तर:
(ग) नाइट्रोजन

(ii) वह वायुमण्डलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है
(क) समतापमण्डल 
(ख) क्षोभमण्डल 
(ग) मध्यमण्डल 
(घ) आयनमण्डल। 
उत्तर:
(ख) क्षोभमण्डल 

(iii) 
समुद्री नमक पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी किससे सम्बन्धित है ?
(क) गैस
(ख) जलवाष्प 
(ग) धूलिकण 
(घ) उल्कापात। 
उत्तर:
(ग) धूलिकण 

(iv) निम्नलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है ?
(क) 90 किमी. 
(ख) 100 किमी. 
(ग) 120 किमी. 
(घ) 150 किमी.
उत्तर:
(ग) 120 किमी. 

(v) निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी है ?
(क) ऑक्सीजन
(ख) नाइट्रोजन 
(ग) हीलियम
(घ) कार्बन डाइ-ऑक्साइड। 
उत्तर:
(घ) कार्बन डाइ-ऑक्साइड। 

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिएप्रश्न 

(i) वायुमण्डल से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वायुमण्डल पृथ्वी के चारों ओर फैला हुआ गैसों का एक आवरण है। वायुमण्डल पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा उसके चारों ओर स्थित है। इसके द्वारा ही पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों का अस्तित्व सम्भव हो सका है। यदि पृथ्वी पर वायुमण्डल नहीं होता तो पृथ्वी अन्य ग्रहों की भाँति जीवन शून्य होती। वायुमण्डल में गैसों के अलावा जलवाष्प एवं धूलिकण भी पाये जाते हैं।

प्रश्न (ii) 
मौसम एवं जलवायु के तत्व कौन से हैं ?
उत्तर:
मौसम किसी स्थान की परिवर्तनशील भौतिक दशाओं (तापक्रम, वर्षा, आर्द्रता, पवन की दिशा एवं गति तथा बादलों की दिशा) को सूचित करता है जबकि जलवायु में ये दशायें लम्बे समय तथा लगभग स्थिर दशा में रह सकती हैं। दूसरे शब्दों में, मौसम निरन्तर परिवर्तनशील होता है जबकि जलवायु लगभग स्थिर होती है। सामान्यतः मौसम एवं जलवायु के तत्व समान होते हैं, केवल उनमें समय का अन्तर होता है। मौसम एवं जलवायु के अन्तर्गत तापमान एवं वर्षा, आर्द्रता, वायु की दिशा एवं गति, वायुदाब तथा बादलों की दिशा आदि तत्वों को सम्मिलित किया जाता है।

प्रश्न (iii) 
वायुमण्डल की संरचना के बारे में लिखें।
उत्तर:
नवीन आविष्कारों राडार, स्पूतनिक (कृत्रिम उपग्रह) आदि द्वारा वायुमण्डल की संरचना के बारे में जानकारी प्राप्त करने के प्रयास किये गये हैं। वायुमण्डल की संरचना विभिन्न तापमान एवं घनत्व वाली परतों द्वारा हुई है। पृथ्वी के निचले भाग में घनत्व सर्वाधिक होता है किन्तु जैसे-जैसे ऊँचाई पर जाते हैं, घनत्व सामान्यतः कम होता जाता है। इसका कारण यह है कि वायुमण्डल के निचले भाग में ही भारी गैसों, जलवाष्प एवं धूलिकणों की मात्रा अधिक होती है। ऊँचाई के साथ-साथ यह विरल होती जाती है। तापमान एवं दबाव के आधार पर वायुमण्डल की संरचना निम्न परतों को मिलाकर हुई है

  1. क्षोभमण्डल
  2. समतापमण्डल
  3. मध्यमण्डल 
  4. आयनमंडल (बाह्यमण्डल) 
  5. बहिर्मण्डल। 

प्रश्न (iv) 
वायुमण्डल के सभी संस्तरों में क्षोभमण्डल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है ?
उत्तर:
क्षोभमण्डल वायुमण्डल की सबसे निचली परत है। इसे परिवर्तन मण्डल भी कहा जाता है क्योंकि इसमें ऊँचाई के साथ-साथ तापमान में परिवर्तन होता जाता है। यह धरातल से सम्बन्धित परत है। धरातलीय जीवों का सम्बन्ध इसी परत से होता है। मौसम सम्बन्धी घटनाएँ भी यहीं (परिवर्तन) होती हैं; जैसे-बिजली चमकना, बादल बनना, वर्षा होना, इन्द्रधनुष का बनना आदि का सम्बन्ध क्षोभमण्डल से ही होता है। भारी गैसों का अधिकांश संघटन इसी परत में प्राप्त होता है। जलवाष्प की अधिकांश मात्रा (90% से अधिक) इसी मण्डल में मिलती है। इसी प्रकार धूलिकण अधिकांश रूप से इसी मण्डल में पाये जाते हैं। धरातलीय जीवों का सम्बन्ध भी इसी मण्डल से होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि क्षोभमण्डल, वायुमण्डल की सबसे महत्त्वपूर्ण परत है। 

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न (i) 
वायुमण्डल के संघटन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
1. वायुमण्डल के संघटन से अभिप्राय वायुमण्डल में विद्यमान गैसों व घटक तत्वों से है जिनसे वायुमण्डल की रचना हुई है। वायुमण्डल के विभिन्न स्तरों पर तत्वों की विभिन्नता पाई जाती है। वायुमण्डल के संघटन में विभिन्न गैसों, जलवाष्प तथा धूलिकणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, जो निम्नलिखित हैं वायुमण्डल में गैसें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। गैसों में भारी गैसें वायुमण्डल के निचले भाग में पाई जाती हैं, ऊपर हल्की गैसें प्राप्त होती हैं। 120 किमी. की ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है। इसी प्रकार कार्बन डाइ-ऑक्साइड एवं जलवाष्प धरातल में 90 किमी. की ऊँचाई तक ही प्राप्त होते हैं। वायुमण्डल में स्थायी गैसों की मात्रा तालिका में दी गयी है
 

गैसें

सूत्र

द्रव्यमान (प्रतिशत)

नाइट्रोजन

N2

78.8

ऑक्सीजन

O2

20.95

ऑर्गन

Ar

0.93

कार्बन डाइऑक्साइड

CO2

0.036

नीऑन

Ne

0.002

हीलियम

He

0.0005

क्रिप्टॉन

Kr

0.001

जीनॉन

Xe

0.00009

हाइड्रोजन

H2

0.00005


वायुमण्डल में सर्वाधिक मात्रा नाइट्रोजन गैस की है। दूसरा स्थान ऑक्सीजन गैस का है। नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन को मिलाकर इनका प्रतिशत लगभग 99 हो जाता है। शेष 1 प्रतिशत में अन्य गैसें प्राप्त होती हैं। मौसम विज्ञान की दृष्टि से कार्बन डाइऑक्साइड महत्त्वपूर्ण गैस है। कार्बन डाइऑक्साइड सौर विकिरण के लिए पारदर्शी होती है किन्तु पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी होती है। ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए कार्बन डाइऑक्साइड गैस सर्वाधिक उत्तरदायी है। विगत कुछ वर्षों में वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिससे धरातल के तापमान में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यह स्थिति भविष्य के लिए संकट की सूचना है। ओजोन गैस वायुमण्डल की अन्य महत्त्वपूर्ण गैस है। यह सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों का अवशोषण कर लेती है जिससे धरातल का तापमान सामान्य बना रहता है। यदि यह इन किरणों का अवशोषण न करे तो तापमान अधिक बढ़ जाने से धरातल पर अनेक समस्यायें उत्पन्न होंगी। 

2. जलवाष्प-वायुमण्डल के संघटन में दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्व जलवाष्प है। यह जलवाष्प पौधों, वनस्पतियों, जलाशयों एवं जीव-जन्तुओं के माध्यम से वायुमण्डल में पहुँचता है। वायुमण्डल में प्राप्त कुल जलवाष्प का 90 प्रतिशत केवल 5 किमी. की ऊँचाई तक प्राप्त होता है। जलवाष्प का बड़ा महत्त्व है। वर्षण सम्बन्धी सभी प्रक्रियायें वायुमण्डल में जलवाष्प की उपस्थिति के कारण ही सम्पन्न होती हैं। यह जलवाष्प सूर्य की किरणों के लिए पारदर्शी होता है किन्तु पार्थिव विकिरण के लिए बाधा का काम करता है। अतः बादलों के दिनों में निचला वायुमण्डल अधिक गर्म रहता है।

3. धूलिकण-वायुमण्डल का तीसरा महत्त्वपूर्ण तत्व छोटे-छोटे कण हैं जिसमें धूलिकण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वायुमण्डल में सूर्य की किरणों का परावर्तन, विकिरण एवं अवशोषण इन्हीं कणों द्वारा सम्पन्न होता है। नमक एवं धुएँ के कण जलवाष्प को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। यह जलाकर्षक केन्द्रक (Hydroscopic Neuclie) कहलाते हैं। वायुमण्डल के विभिन्न दृश्य सुबह एवं शाम की लालिमा, इन्द्रधनुष आदि क्रियायें वायुमण्डल में धूलिकण की उपस्थिति के कारण ही सम्पन्न होती हैं।

प्रश्न (ii) 
वायुमण्डल की संरचना का चित्र खींचें एवं व्याख्या करें।
उत्तर:
वायुमण्डल के बारे में जानकारी राडार, स्पूतनिक (कृत्रिम उपग्रह) के द्वारा सम्भव हो सकी है। धरातल से ऊँचाई पर जैसे-जैसे जाते हैं गैसों, जलवाष्प तथा धूलिकणों की मात्रा में कमी होती जाती है। तापमान तथा दबाव के आधार पर वायुमण्डल में निम्नलिखित परतें प्राप्त होती हैं

  1. क्षोभमण्डल या परिवर्तन मण्डल
  2. समतापमण्डल
  3. मध्यमण्डल
  4. आयनमण्डल
  5. बहिर्मण्डल।

1. क्षोभमण्डल-वायुमण्डल की सबसे निचली परत को क्षोभमण्डल या परिवर्तन मण्डल कहते हैं। इसकी औसत ऊँचाई धरातल से 13 किमी. तक मानी गयी है। क्षोभमण्डल का विशेष महत्त्व है। धरातलीय जीवों का सम्बन्ध इसी मण्डल से है। वायुमण्डल की समस्त जलवायु एवं मौसम सम्बन्धी घटनाएँ इसी मण्डल में घटित होती हैं। गैसों, धूलिकणों एवं जलवाष्प की अधिकांश मात्रा इसी मण्डल में पायी जाती है। इसी भाग में प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर जाने पर तापमान 1° सेग्रे. कम हो जाता है, इसीलिए इसे परिवर्तन मण्डल भी कहा जाता है। क्षोभमण्डल के ऊपर लगभग डेढ़ किमी. मोटी परत प्राप्त होती है जिसे ट्रोपोपॉज (क्षोभ सीमा) कहते हैं। इस भाग में तापमान के परिवर्तन सम्बन्धी क्रियाएँ नहीं हो पाती हैं। यह क्षोभमण्डल एवं समतापमण्डल को विभाजित करने वाली सीमा है।

2. समतापमण्डल-समतापमण्डल की अवस्थिति क्षोभ सीमा के ऊपर पाई जाती है। यहाँ पर तापमान में परिवर्तन तथा ऊँचाई के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। स्ट्राहलर महोदय ने समताप मण्डल की ऊँचाई 50 किमी. बताई है। इन्होंने बताया कि इस भाग में तापमान धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और 50 किमी. की ऊँचाई पर तापमान 0° सेग्रे. हो जाता है। इस सीमा को स्ट्रैटोपोज कहते हैं। समतापमण्डल के निचले भाग में ओजोन गैस वाला ओजोन मण्डल पाया जाता है। यह गैस महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करके धरातल के तापमान को सामान्य बनाये रखने में योगदान करती है। नवीन आविष्कारों के परिणामस्वरूप वायुमण्डल में ओजोन गैस का क्षरण हो रहा है जिससे वायुमण्डल में तापमान बढ़ता जा रहा है।

3. मध्यमण्डल-समतापमण्डल के ऊपर मध्यमण्डल की अवस्थिति पाई जाती है। इसकी अधिकतम ऊँचाई 80 किमी. तक मानी गयी है। इस भाग में तापमान धीरे-धीरे घटने लगता है और 80 किमी. की ऊँचाई पर तापमान सबसे कम-100° से. हो जाता है। इस ऊपरी सीमा को ‘मध्यमंडलसीमा’ (मेसोपॉज) कहते हैं।

4. आयनमण्डल-मध्यमण्डल के ऊपर 80 से 400 किमी. की ऊँचाई के मध्य आयनमण्डल की अवस्थिति मिलती है। इसमें विद्युत आवेशित कण मिलते हैं जिन्हें आयन कहते हैं। इस मण्डल से रेडियो की लघु एवं दीर्घ तरंगें टकराकर धरातल पर वापस आ जाती हैं। यदि आयनमण्डल की अवस्थिति न होती तो ये तरंगें वायुमण्डल में शून्य में चली जार्ती और हम रेडियो प्रसारण नहीं सुन पाते। इस मण्डल में ब्रह्माण्ड किरणों की अवस्थिति पाई जाती है।

5. बहिर्मण्डल-वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत बहिर्मण्डल कहलाती है। इस मण्डल के बारे में अभी तक विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है। इस मण्डल के ऊपरी भाग की ऊँचाई अनिश्चित है क्योंकि यहाँ की हवा अत्यधिक विरल होती है तथा धीरे-धीरे बाह्य अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है।

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