Chapter 8 Infrastructure (आधारिक संरचना)

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्नोत्तर 

प्रश्न 1.
आधारित संरचना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर
आधारित संरचना से अभिप्राय उन सुविधाओं, क्रियाओं तथा सेवाओं से है जो अन्य क्षेत्रों के संचालन तथा विकास में सहायक होती हैं। ये समाज के दैनिक जीवन में भी सहायक होती हैं। इन सेवाओं में सड़क, रेल, बन्दरगाह, हवाई अड्डे, बाँध, बिजली-घर, तेल व गैस पाइप लाइन, दूरसंचार सुविधाएँ, शिक्षण संस्थान, अस्पताल के स्वास्थ्य व्यवस्था, सफाई, पेयजल और बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाएँ तथा मुद्रा प्रणाली सम्मिलित हैं।

प्रश्न 2.
आधारित संरचना को विभाजित करने वाले दो वर्गों की व्याख्या कीजिए। दोनों एक-दूसरे पर कैसे निर्भर हैं?
उत्तर
आधारित संरचना निम्न दो प्रकार की होती है
1. सामाजिक आधारित संरचना- सामाजिक आधारित संरचना से अभिप्राय सामाजिक परिवर्तन जैसे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, नर्सिंग होम; के मूल तत्त्वों से है जो किसी देश के सामाजिक विकास की प्रक्रिया के लिए आधारशिला का कार्य करते हैं। इस प्रकार की संरचना आदमी की कुशलता एवं उत्पादकता को बढ़ाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आवास मुख्य रूप से सामाजिक आधारित संरचना के भाग हैं। ये अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक क्रियाओं में सहयोग करते हैं।

2. आर्थिक आधारित संरचना– आर्थिक आधारित संरचना से अभिप्राय आर्थिक परिवर्तन के उन सभी तत्त्वों (जैसे शक्ति, परिवहन तथा संचार) से है जो आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया के लिए एक आधारशिला का कार्य करते हैं। इस प्रकार की संरचना उत्पादन पर सीधा प्रभाव डालती है। शक्ति, ऊर्जा, परिवहन एवं दूरसंचार आदि को आर्थिक आधारिक संरचना में सम्मिलित किया जाता है। आर्थिक आधारिक संरचना संवृद्धि की प्रक्रिया में वृद्धि लाती है जबकि सामाजिक आधारिक संरचना मानव विकास की प्रक्रिया में वृद्धि लाती है इसीलिए आर्थिक तथा सामाजिक आधारिक संरचना एक-दूसरे की पूरक हैं। दोनों एक-दूसरे के प्रभाव को प्रबल बनाती हैं एवं सहायता प्रदान करती हैं।

प्रश्न 3.
आधारिक संरचना उत्पादन का संवर्द्धन कैसे करती है?
उत्तर
आधारिक संरचना ऐसी सहयोगी प्रणाली है, जिस पर एक आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की कार्यकुशल प्रणाली निर्भर करती है। संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।

प्रश्न 4.
किसी देश के आर्थिक विकास में आधारिक संरचना योगदान करती है। क्या आप सहमत| हैं? कारण बताइए।
उत्तर
आधारिक संरचना कसी देश के आर्थिक विकास की आधारशिला है। यह औद्योगिक व कृषि उत्पादन, घरेलू व विदेशी व्यापार तथा वाणिज्य के प्रमुख क्षेत्रों में सहयोगी सेवाएँ उपलब्ध कराती है। इस संरचना से विकास के लिए उपयुक्त एवं पर्याप्त वातावरण तैयार होता है। इस संरचना की भूमिका निम्न प्रकार है

  1. संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।
  2. जलापूर्ति और सफाई में सुधार से प्रमुख जल संक्रमित बीमारियों में अस्वस्थता में कमी आती है। | और बीमारी के होने पर भी उसकी गम्भीरता कम होती है।
  3. परिवहन और संचार के साधनों से कच्चा माल व तैयार माल आसानी से एक जगह से दूसरी जगह | पहुँचाया जा सकता हैं।
  4. अर्थव्यवस्था की वित्त-प्रणाली सभी क्रियाकलापों के लिए मौद्रिक आपूर्ति करती है। मौद्रिक आपूर्ति जितनी अधिक मात्रा में सुगमता से उपलब्ध होती है, उतनी ही जल्दी आर्थिक परियोजनाएँ सफल होती हैं।
  5. किसी भी देश की औद्योगिक प्रगति बिजली उत्पादन, परिवहन व संचार के विकास पर निर्भर करती है।
  6. मानव संसाधन की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 5.
भारत में ग्रामीण आधारिक संरचना की क्या स्थिति है?
उत्तर
भारत में ग्रामीण आधारिक संरचना की स्थिति ग्रामीण भारत आर्थिक व सामाजिक दोनों ही आधारिक संरचनाओं में बहुत पिछड़ा हुआ है। सन् 2001 की जनगणना के आँकड़े यह बताते हैं कि ग्रामीण भारत में केवल 56 प्रतिशत परिवारों के लिए ही बिजली की सुविधा है जबकि 43 प्रतिशत परिवारों में आज भी मिट्टी के तेल का प्रयोग होता है। ग्रामीण क्षेत्र में लगभग 90 प्रतिशत परिवार खाना बनाने में जैव ईंधन का इस्तेमाल करते हैं। केवल 24 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में लोगों को नल का पानी उपलब्ध है। लगभग 76 प्रतिशत लोग पानी के खुले स्रोतों से पानी पीते हैं। गाँव में टेलीफोन घनत्व बहुत कम है। ग्रामीण साक्षरता का स्तर भी निम्न है। इस प्रकार सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्र अभी भी अविकसित हैं।

प्रश्न 6.
‘ऊर्जा का महत्त्व क्या है? ऊर्जा के व्यावसायिक और गैर-व्यावसायिक स्रोतों में अन्तर कीजिए।
उत्तर

ऊर्जा का महत्त्व

आर्थिक आधारित संरचना का बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण संघटक ऊर्जा है। किसी राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है, साथ ही यह उद्योगों के लिए भी अनिवार्य है। आज ऊर्जा का कृषि और उससे सम्बन्धित क्षेत्रों जैसे खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरणों के उत्पादन और यातायात; में उपयोग भारी स्तर पर हो रही है। इस प्रकार प्रत्येक गतिविधि को सम्पन्न करने हेतु ऊर्जा आवश्यक है। ऊर्जा के उपभोग स्तर से सामाजिक एवं आर्थिक संवृद्धि निर्धारित होती है।

आधार

व्यावसायिक ऊर्जा

गैर-व्यावसायिक ऊर्जा

1

घटक  कोयला, बिजली, प्राकृतिक गैस व पेट्रोलियम पदार्थ।।

ईंधन की लकड़ी, पशु व कृषि अपशिष्ट।

2

प्रयोग  मुख्यतः वाणिज्यिक व औद्योगिक उद्देश्यों के लिए।

मुख्यतः घरेलू तथा उपभोग उद्देश्यों के लिए।

3

प्रकृति  वाणिज्यिक ऊर्जा वाली वस्तुओं का कीमत होती है है और इन वस्तुओं की प्राप्त हो जाती हैं।

ये सामान्यतः ग्रामवासियों को नि:शुल्क प्राप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 7.
विद्युत के उत्पादन के तीन बुनियादी स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर
विद्युत के उत्पादन के तीन बुनियादी स्रोत इस प्रकार हैं

  1. तापीय विद्युत (कोयला),
  2. जलविद्युत (जल) तथा
  3. आणविक ऊर्जा (नाभिकीय विखण्डन)।

प्रश्न 8.
संचारण और वितरण हानि से आप क्या समझते हैं? उन्हें कैसे कम किया जा सकता है?
उत्तर
संचारण और वितरण हानि से आशय संचारण और वित्: नि से आशय विद्युत की चोरी से है। यह हानि विद्युत के कुछ भाग में तकनीकी खराबी के कारण तथा कुछ बिजली कर्मचारियों की सहायता से होने वाली बिजली चोरी के कारण होती है। आज विद्युत संचारण एवं वितरण से होने वाले घाटे सर्वविदित हैं।।
 नियन्त्रण के उपाय संचारण और वितरण हानि को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए

  1. उत्पादक क्रियाओं के लिए बिजली की दर ऊँची कर देनी चाहिए।
  2. संचारण एवं वितरण की हानि को तकनीकी में सुधार करके कम कर देना चाहिए।
  3. वितरण का निजीकरण करके बिजली चोरी को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
ऊर्जा के विभिन्न गैर-व्यावसायिक स्रोत कौन-से हैं?
उत्तर
ऊर्जा के गैर-व्यावसायिक स्रोतों में जलाऊ लकड़ी, कृषि का कूड़ा-कचरा और सूखा गोबर आते हैं। ये गैर-व्यावसायिक हैं, क्योंकि ये हमें प्रकृति/जंगलों में मिलते हैं।

प्रश्न 10.
इस कथन को सही सिद्ध कीजिए कि ऊर्जा के पुनर्नवीनीकृत स्रोतों के इस्तेमाल से ऊर्जा संकट दूर किया जा सकता है?
उत्तर
पुनर्नवीनीकृत (गैर-परम्परागत) ऊर्जा संसाधन है-सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायो ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि। नव्यकरणीय साधन होने के नाते, ये ऊर्जा के विश्वसनीय संसाधन हैं। यह सही है कि उनके प्रयोग से ऊर्जा संकट दूर किया जा सकता है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं

  1. अनव्यीकृतं साधन (परम्परागत साधन) क्षयशील हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं। इसके विपरीत पुनर्नवीनीकृत साधनों को पूर्णत: कभी भी क्षय नहीं होगा; उदाहरण के लिए सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। जब तक ब्रह्माण्ड में सूर्य विद्यमान रहेगा, सौर ऊर्जा प्राप्त की जाती रहेगी।
  2. वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ-साथ इन संसाधनों का भी विकास किया जाता रहेगा।
  3. इनको निरन्तर उपयोग किया जाना सम्भव है।
  4. ये ऊर्जा के अक्षयी संसाधन हैं। अत: इनसे अनवरत ऊर्जा की आपूर्ति होती रहेगी।
  5. ऊर्जा के ये साधन प्रदूषण नहीं फैलाते। अत: इनका मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं| पड़ता।

स्पष्ट है कि इन संसाधनों के अधिकाधिक उत्पादन एवं प्रयोग से हम ऊर्जा संकट को समाप्त कर सकते हैं। परन्तु आधुनिक तकनीक के अभाव में, इनकी पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद हम इनका व्यापक उपभोग नहीं कर पा रहे हैं। अतः ऊर्जा संकट से छुटकारा पाने के लिए इस ओर अधिकाधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 11.
पिछले वर्षों के दौरान ऊर्जा के उपभोग प्रतिमानों में कैसे परिवर्तन आया है?
उत्तर
1953-54 में ऊर्जा के कुल उपभोग के 55 प्रतिशत में कोयले का प्रयोग होता था। पेट्रोलियम तथा विद्युत ऊर्जा का उपभोग क्रमशः 16.7 प्रतिशत व 3.2 प्रतिशत था। इस समय प्राकृतिक गैस का प्रयोग नहीं किया जाता था। 1960-61 ई० में ऊर्जा स्रोत के रूप में कोयले के उपभोग में कमी हुई। इसके विपरीत पेट्रोलियम तथा विद्युत ऊर्जा के उपभोग में मामूली-सी वृद्धि हुई। सत्तर के दशक में यह वृद्धि 1953-54 की तुलना में दो गुनी हो गई तथा कोयले का उपभोग 56.1 प्रतिशत रह गया। इसी दशक में प्राकृतिक गैस का भी ऊर्जा के रूप में उपयोग होने लगा। यही वृद्धि अस्सी वे नब्बे के दशक में भी जारी रही। वर्तमान में भारत में कुल ऊर्जा उपभोग का 65 प्रतिशत व्यावसायिक ऊर्जा से पूरा होता है। इसमें कोयले का अंश सर्वाधिक (55 प्रतिशत) है। इसके अतिरिक्त इसमें तेल (31 प्रतिशत), प्राकृतिक गैस (11 प्रतिशत) और जल ऊर्जा (3 प्रतिशत) सम्मिलित हैं। जलाऊ लकड़ी, गाय का गोबर और कृषि का कूड़ा-कचरा आदि गैर-व्यावसायिक ऊर्जा स्रोतों का उपभोग भारत में कुल ऊर्जा उपभोग का 30 प्रतिशत से ज्यादा है।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के उपभोगे और आर्थिक संवृद्धि की दरें कैसे परस्पर सम्बन्धित हैं?
उत्तर
किसी राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण स्थान है, साथ ही यह उद्योगों के लिए भी अनिवार्य है। आज ऊर्जा का उपभोग कृषि और उससे सम्बन्धित क्षेत्रों जैसे खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरणों के उत्पादन और यातायात में भारी स्तर पर हो रहा है। घरों में इसकी आवश्यकता भोजन बनाने, घरों को प्रकाशित करने और गर्म करने के लिए होती है। संक्षेप में ऊर्जा के अधिक इस्तेमाल का मतलब अधिक आर्थिक विकास होता है। ऊर्जा के नवीनीकृत स्रोतों के इस्तेमाल से धारणीय आर्थिक विकास होता

प्रश्न 13.
भारत में विद्युत क्षेत्रक किन समस्याओं का सामना कर रहा है?
उत्तर
भारत में विद्युत क्षेत्रक में उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली पर सरकार का एकाधिकार है। राज्य विद्युत बोर्ड, जो बिजली का वितरण करते हैं, वित्तीय घाटा उठा रहे हैं। इस वित्तीय घाटे के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. विभिन्न पॉवर स्टेशनों द्वारा जनित बिजली का पूरा उपभोग उपभोक्ता नहीं करते।
2. बिजली के सम्प्रेषण में विद्युत का क्षय होता है।
3. किसानों व लघु उद्योगों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता कम है।

इस वित्तीय घाटे को कम करने के लिए सरकार निजी व विदेशी क्षेत्रक को विद्युत उत्पादन व वितरण में सहभागिता बढ़ाने को प्रोत्साहित कर रही है। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त भारत में बिजली से जुड़ी कुछ और समस्याएँ निम्नलिखित हैं

  1. भारत की वर्तमाने बिजली उत्पादन क्षमता 7 प्रतिशत की प्रतिवर्ष आर्थिक क्षमता अभिवृद्धि के लिए | पर्याप्त नहीं है।
  2. राज्य विद्युत बोर्ड जो विद्युत वितरण करते हैं, की लाइन हानि पाँच सौ मिलियन से ज्यादा है। | इसका कारण सम्प्रेषण और वितरण में क्षय, बिजली की अनुचित कीमतें और अकार्यकुशलता है।
  3. बिजली के क्षेत्र में निजी व विदेशी क्षेत्रक की भूमिका बहुत कम है।
  4. भारत के विभिन्न भागों में बिजली की ऊँची दरें और लम्बे समय तक बिजली गुल होने से आमतौर | पर जनता में असन्तोष है।
  5. तापीय संयन्त्रों में कच्चे माल एवं कोयले की आपूर्ति कम है।

प्रश्न 14.
भारत में ऊर्जा संकट से निपटने के लिए किए गए सुधारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर
निरन्तर आर्थिक विकास और जनसंख्या वृद्धि से भारत में ऊर्जा की माँग में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। यह माँग वर्तमान में देश में उत्पन्न हो रही ऊर्जा की तुलना में बहुत अधिक है। अत: भारत ऊर्जा के संकट खे गुजर रहा है।

ऊर्जा संकट से बचाव के उपाय

इस संकट से बचने के लिए निम्नलिखित सुधार किए गए हैं

  1. भारत ने निजी व विदेशी क्षेत्रकों को बिजली उत्पादन तथा वितरण के लिए अनुमति दे दी है।
  2. सरकार गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के उपभोग को प्रोत्साहन दे रही है।
  3. सरकार विद्युत वितरण में होने वाली हानि (लाइन लॉस) को कम करने का प्रयास कर रही है।
  4.  विद्युत उत्पादन की समस्या से बचने के लिए केन्द्रीय विद्युत अथॉरिटी एवं केन्द्रीय नियमन आयोग की स्थापना की गई है।

प्रश्न 15.
हमारे देश की जनता के स्वास्थ्य की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर
स्वास्थ्य सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण की अवस्था है। इसका अर्थ केवल बीमारी का न होना ही नहीं है, बल्कि इससे अभिप्राय एक व्यक्ति की स्वस्थ शारीरिक एवं मानसिक अवस्था  से है। स्वास्थ्य राष्ट्र की समग्र संवृद्धि और विकास से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। एक देश की स्वास्थ्य की स्थिति को शिशु मृत्यु दर, मातृत्व मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, पोषण स्तर, छूत एवं अछूत की बीमारियों के आधार पर आँका जाता है। हमारे देश भारत में कुछ स्वास्थ्य सूचक निम्नलिखित तालिका में दर्शाए गए हैं

क्र०सं०

सूचक

1

शिशु मृत्यु दर/प्रति 1000 शिशु

68

2

पाँच वर्ष के नीचे मृत्यु दर/प्रति 1000 शिशु

87

3

प्रशिक्षित परिचारिका द्वारा जन्म

43

4

पूर्ण प्रतिरक्षित

67

5

सकल घरेलू उत्पाद में स्वास्थ्य पर व्यय (%)

4.8

6

कुल व्यय में सरकारी हिस्सेदारी

21.3

7

कुल स्वास्थ्य व्यय में सरकारी हिस्सेदारी।।

8

स्वास्थ्य पर व्यय (अन्तर्राष्ट्रीय डॉलर में प्रति व्यक्ति आय)

96

प्रश्न 16.
रोग वैश्विक भार (GDB) क्या है?
उत्तर
विश्व रोग भार (GDB) एक सूचक है जिसका प्रयोग विशेषज्ञ किसी विशेष रोग के कारण असमय मरने वाले लोगों की संख्या के साथ-साथ रोगों के कारण असमर्थता में बिताए सालों की संख्या जानने के लिए करते हैं।

प्रश्न 17.
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ क्या हैं?
उत्तर
हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की प्रमुख कमियाँ इस प्रकार हैं

1. यद्यपि देश की 72 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है परन्तु ग्रामीण जनसंख्या की तुलना में शहरी जनसंख्या को अधिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
2. अधिकतर सरकारी अस्पताल शहरों में स्थित हैं।
3. गाँवों में कुल अस्पताल को 30 प्रतिशत तथा बिस्तर का 25 प्रतिशत से अधिक नहीं है।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक 1 लाख लोगों पर 0.36 अस्पताल हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 3.6 । अस्पतालों की है।
5. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों में एक्स-रे या खून की जाँच करने जैसी | सुविधाएँ नहीं हैं।
6. ग्रामीणों को शिशु चिकित्सा, स्त्री रोग चिकित्सा, संवेदनाहरण तथा प्रसूति विद्या जैसी विशिष्ट चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं।
7. गाँवों में चिकित्सक का हमेशा अभाव रहता है।
8. भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले निर्धनतमे लोग अपनी आय का 12 प्रतिशत स्वास्थ्य सुविधाओं पर व्यय करते हैं जबकि धनी केवल 2 प्रतिशत व्यय करते हैं।

प्रश्न 18.
महिलाओं का स्वास्थ्य गहरी चिन्ता का विषय कैसे बन गया है?
उत्तर
भारत की जनसंख्या का लगभग आधा भाग महिलाओं का है। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी, पुरुषों की अपेक्षा काफी कम है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश में शिशु-लिंग अनुपात प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएँ 943 हैं। 15 वर्ष से कम आयु वर्ग की लगभग 3 लाख लड़कियाँ न केवल शादीशुदा हैं बल्कि कम-से-कम एक बच्चे की माँ भी हैं। विवाहित महिलाओं में 50 प्रतिशत से ज्यादा रक्ताभाव एवं रक्तक्षीणता से पीड़ित हैं। इसी कारण महिलाओं का स्वास्थ्य गहरी चिन्ता बन गया है।

प्रश्न 19.
सार्वजनिक स्वास्थ्य का अर्थ बतलाइए। राज्य द्वारा रोगों पर नियन्त्रण के लिए उठाए गए प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों को बताइए।
उत्तर
सार्वजनिक स्वास्थ्य का अर्थ सार्वजनिक स्वास्थ्य से आशय देश के समस्त लोगों के स्वास्थ्य से है। किसी देश के लोगों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं

  1. माँ का स्वास्थ्य उत्तम हो ताकि बच्चे भी नीरोगी व स्वस्थ पैदा हों।
  2. बच्चों को भयानक बीमारियों; जैसे-मलेरिया, तपेदिक, चेचक, पोलियो आदि; से बचाव के लिए | उन्हें समय पर उचित टीके लगाए जाने चाहिए।
  3. लोगों को खाने के लिए पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन प्राप्त होना चाहिए। सन्तुलित भोजन से बच्चों | की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  4. बीमारी के समय उचित उपचार की सुविधा होनी चाहिए, इससे रोग संक्रामक नहीं हो पाएँगे।

रोगों के नियन्त्रण सम्बन्धी कार्यक्रम

राज्य द्वारा रोगों को नियन्त्रित करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए गए हैं

1. मलेरिया नियन्त्रण-यह मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारी के विरुद्ध विश्व का सबसे बड़ा स्वास्थ्य कार्यक्रम है।
2. राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम-कुष्ठ प्रभावित व्यक्तियों की दृष्टि से विश्व के कुल प्रभावित व्यक्तियों का लगभग 67% भारत में है। इसे दूर करने के लिए सन् 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठ निवारण कार्यक्रम आरम्भ किया गया।
3. तपेदिक नियन्त्रण कार्यक्रम-अनुमान है कि देश में लगभग 64 मिलियन लोग सक्रिय तपेदिक  से प्रभावित हैं। इस कार्यक्रम के द्वारा तपेदिक अब लाइलाज बीमारी नहीं रह गई है।
4. अन्धता नियन्त्रण–देश में अन्धता नियन्त्रण पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने के कारण अब अन्धता | दर में निरन्तर कमी आ रही है। 5. एच०आई०वी०/एड्स नियन्त्रण-सन् 1987 से प्रारम्भ इस कार्यक्रम के अन्तर्गत इस रोग से ग्रसित रोगियों का पता लगाने, रोग के संक्रमण को नियन्त्रित करने तथा रोगियों का समुचित उपचार करने के लिए, सरकार बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम चला रही है।
6. पोलियो नियन्त्रण-पोलियो की प्रभावदर को शून्य करने के लिए 5 वर्ष तक के बच्चों को प्रतिमाह पोलियो की खुराक पिलाई जा रही है।

प्रश्न 20.
चिकित्सा की छ: भारतीय प्रणालियों की सूची बनाइए।
उत्तर
चिकित्सा की भारतीय प्रणाली में निम्नलिखित छः व्यवस्थाएँ हैं

1. आयुर्वेद।
2. योग।
3. यूनानी।
4. सिद्ध।
5. प्राकृतिक चिकित्सा।
6. होम्योपैथी।

प्रश्न 21.
हम स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को कैसे बढ़ा सकते हैं?
उत्तर
किसी व्यक्ति के काम करने की योग्यता एवं क्षमता काफी सीमा तक उसके स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। अच्छा स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का निर्धारण शिशु एवं मातृ मृत्युदर, जीवन प्रत्याशा, पोषण स्तर, छूत एवं अछूत बीमारियों के स्तर से होता है। उपर्युक्त सूचकों के स्तर के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को बढ़ाने की आवश्यकता है। इसे निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

1. स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी व्यय सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 5 प्रतिशत है। यह अन्य देशों के मुकाबले काफी कम है। स्वास्थ्य सुविधा कार्यक्रमों की सफलता के लिए सरकार को स्वास्थ्य व्यय बढ़ाना चाहिए।
2. बच्चों को भयानक बीमारियों; जैसे—मलेरिया, क्षयरोग (TB), चेचक, पोलियो आदि; से बचाव के लिए उन्हें उचित टीके लगाए जाने चाहिए।

  1. गरीब लोगों को खाने के पर्याप्त एवं सन्तुलित भोजन की आपूर्ति करनी चाहिए जिससे कुपोषण से होने वाली बीमारियों को रोका जा सके।
  2. स्वास्थ्य व सफाई के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा की जानी चाहिए।
  3. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ विकेन्द्रित होनी चाहिए।
  4. स्वास्थ्य सुविधाओं का शहरों एवं गाँवों में स्पष्ट विभाजन होना चाहिए।

परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर

बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
विद्युत के उत्पादन का बुनियादी स्रोत है
(क) तापीय विद्युत
(ख) जलविद्युत
(ग) आणविक ऊर्जा
(घ) ये सभी
उत्तर
(घ) ये सभी

प्रश्न 2.
सन् 2011 की जनगणना के अनुसर शिशु लिंग अनुपात प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएँ
(क) 900
(ख) 943
(ग) 950
(घ) 955
उत्तर
(ख) 943

प्रश्न 3.
खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र नहीं है
(क) उत्तर प्रदेश
(ख) राजस्थान
(ग) गुजरात
(घ) डिगबोई
उत्तर
(क) उत्तर प्रदेश ।

प्रश्न 4.
विश्व में सम्भाव्ये जल-शक्ति की दृष्टि से भारत का कौन-सा स्थान है?
(क) पहला
(ख) दूसरा
(ग) तीसरा
(घ) पाँचवाँ
उत्तर
(घ) पाँचवाँ,

प्रश्न 5.
भारत में सर्वप्रथम परमाणु ऊर्जा केन्द्र कहाँ स्थापित किया गया?
(क) तारापुर में
(ख) रावतभाटा में
(ग) काकरापाड़ा में
(घ) नरौरा में
उत्तर
(क) तारापुर में ।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधारिक संरचना क्या है?
उत्तर
किसी अर्थव्यवस्था के पूँजी स्टॉक के उस भाग को जो विभिन्न प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने की दृष्टि से अनिवार्य होता है, आधारिक संरचना कहा जाता है।

प्रश्न 2.
आधारिक संरचना के कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर
आधारिक संरचना के कुछ उदाहरण हैं-परिवहन सुविधाएँ प्रदान करने वाली सड़कें, बसें, रेलवे, स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने वाले अस्पताल, सिंचाई की सुविधा प्रदान करने वाली नहरें, कुएँ आदि पूँजी स्टॉक आधारिक संरचना हैं।

प्रश्न 3.
आर्थिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
आर्थिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं जो उत्पादन तथा वितरण की प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक दूसरा सहयोगी ढाँचा प्रदान करती हैं। इसके मुख्य घटक हैं
1. परिवहन एवं संचार तन्त्र,
2. विद्युत और सिंचाई तथा
3. मौद्रिक व वित्तीय संस्थाएँ।

प्रश्न 4.
सामाजिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
सामाजिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं जो आर्थिक सुविधाओं को अप्रत्यक्ष रूप से तथा उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली को बाहर से अपना योगदान करती हैं। ये सेवाएँ अर्थव्यवस्था के  एक महत्त्वपूर्ण सहायक ढाँचे का निर्माएँ करती हैं। इसके प्रमुख घटक हैं
1. शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुसन्धान,
2. स्वास्थ्य,
3. आवास,
4. नागरिक सुविधाएँ तथा
5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।।

प्रश्न 5.
संरचनात्मक सुविधाओं का देश के आर्थिक विकास में क्या महत्त्व है?
उत्तर
संरचनात्मक सुविधाएँ एक देश के आर्थिक विकास में उत्पादन के तत्त्वों की उत्पादकता में वृद्धि करके और उसकी जनता के जीवन व गुणवत्ता में सुधार करके अपना योगदान करती हैं।

प्रश्न 6.
जलापूर्ति एवं सफाई में सुधार का क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर
जलापूर्ति एवं सफाई में सुधार से प्रमुख जल संक्रमित बीमारियों से अस्वस्थता में कमी आती है। और बीमारी के हो जाने पर भी उसकी गम्भीरता कम होती है।

प्रश्न 7.
आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
उत्तर
आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए सरकार को आधारिक संरचना सुविधाओं में निवेश को बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 8.
आय में वृद्धि के साथ आधारिक संरचना में क्या महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आते हैं?
उत्तर
अल्प आय वाले देशों के लिए सिंचाई, परिवहन व बिजली अधिक महत्त्वपूर्ण है जबकि उच्च आय वाले देशों में बिजली और दूरसंचार अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इस प्रकार आधारिक संरचना का विकास और आर्थिक विकास साथ-साथ होते हैं।

प्रश्न 9.
आर्थिक आधारिक संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक क्या है?
उत्तर
आर्थिक आधारिक संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक ‘ऊर्जा’ है क्योंकि इसके बिना औद्योगिक उत्पादन सम्भव नहीं है।

प्रश्न 10.
वाणिज्यिक और गैर-वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक बताइए।
उत्तर
1. वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक– कोयला, पेट्रोलियम उत्पाद, प्राकृतिक गैस तथा बिजली।
2. गैर-वाणिज्यिक ऊर्जा के महत्त्वपूर्ण घटक– ईंधन की लकड़ी, कृषि अवशिष्ट (भूसा) और पशु अवशिष्ट (गोबर)।

प्रश्न 11.
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत क्या हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत वे हैं जिनकी हमें जानकारी है और जिनका प्रयोग हम बहुत लम्बे समय से कर रहे हैं; जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और बिजली।।

प्रश्न 12.
ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोत क्या हैं? उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर
ऊर्जा के गैर-पारम्परिक स्रोत वे हैं जिनकी खोज हाल ही के वर्षों में की गई है और जिनकी लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ रही है; जैसे—सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा, बायोमास।

प्रश्न 13.
भारतीय कोयले का मुख्य दोष क्या है?
उत्तर
भारतीय कोयले का मुख्य दोष यह है कि इसमें राख बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है और उष्णता कम मात्रा में इसका तापविद्युत स्टेशनों की कुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 14.
प्राकृतिक गैस का प्रयोग किस रूप में होता है? इसके भण्डार कहाँ हैं?
उत्तर
प्राकृतिक गैस का प्रयोग उर्वरक तथा पेट्रोलियम पदार्थों में कच्चे माल के रूप में होता है। इसके मुख्य भण्डार मुम्बई, गुजरात, त्रिपुरा, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान में पाए जाते हैं।

प्रश्न 15.
भारत में बिजली प्राप्ति के मुख्य स्रोत क्या हैं?
उत्तर
भारत में बिजली प्राप्ति के तीन मुख्य स्रोत हैं-

  1. तापविद्युत स्टेशन,
  2. जल विद्युत स्टेशन तथा
  3. आणविक शक्ति स्टेशन।

प्रश्न 16.
भारत में आणविक शक्ति स्टेन के कुछ प्रमुख स्थान बताइए।
उत्तर
भारत में आणविक शक्ति स्टेशन के कुछ प्रमुख स्थान हैं-

  1. मुम्बई के पास, तारापुर में,
  2. कोटा (राजस्थान) के पास राणाप्रताप सागर बाँध,
  3. चेन्नई (तमिलनाडु) के समीप कलपक्कम में,
  4. बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) के पास नरौरा में।।

प्रश्न 17.
पर्यावरण की दृष्टि से ऊर्जा के परम्परागत और गैर-परम्परागत स्रोतों के बीच मुख्य अन्तर| क्या है?
उत्तर
ऊर्जा के परम्परागत स्रोत (विशेष रूप से कोयला और पेट्रोलियम) पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। जबकि ऊर्जा के गैर-परम्परागत स्रोत पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करते।

प्रश्न 18.
बायो ऊर्जा से क्या आशय है?
उत्तर
बायो ऊर्जा जीव तथा जैव पदार्थ से प्राप्त की जाती है। यह दो प्रकार की होती है-
1. बायो गैस–इसे गोबर गैस प्लाण्ट में गोबर डालकर प्राप्त किया जाता है।
बायो मास-इसे पौधों तथा वृक्षों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 19.
ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत क्या हैं?
उत्तर
ऊर्जा के प्राथमिक वे स्रोत हैं जो प्रकृति से नि:शुल्क उपहार के रूप में प्राप्त होते हैं। इनका प्रत्यक्ष प्रयोग होता है; जैसे—कोयला, लिग्नाइट, पेट्रोलियम आदि।

प्रश्न 20.
ऊर्जा के अन्तिम स्रोत क्या हैं?
उत्तर
ऊर्जा के अन्तिम स्रोत वे हैं जिनका प्रयोग अन्तिम उत्पाद के रूप में किया जाता है जैसे विद्युत शक्ति ।

प्रश्न 21.
प्राकृतिक गैस के उपयोग बताइए।
उत्तर
प्राकृतिक गैस तरल पदार्थ के रूप में होती है। इसका प्रयोग अधिकतर घरों में ईंधन के रूप में किया जाता है। वर्तमान में इसंका व्यावसायिक उपयोग भी बढ़ता जा रहा है; जैसे-स्टील निर्माण में, हल्के वाहनों को चलाने आदि में।।

प्रश्न 22.
स्वास्थ्य से क्या आशय है?
उत्तर
स्वास्थ्य सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण की अवस्था है। इसका आशय एक व्यक्ति की स्वस्थ शारीरिक तथा मानसिक अवस्था से है।

प्रश्न 23.
अच्छे स्वास्थ्य का क्या महत्त्व है?
उत्तर
अच्छा स्वास्थ्य जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि लाता है। यह मानव संसाधन विकास का एक महत्त्वपूर्ण घटक है और राष्ट्र की एक परिसम्पत्ति है।

प्रश्न 24.
बिजली के संचालन तथा वितरण में होने वाली हानि के क्या कारण हैं?
उत्तर
बिजली के संचालन तथा वितरण में होने वाली हानि के कारण हैं
1. पारेषण की पिछड़ी तकनीक तथा
2. बिजली कर्मचारियों की सहायता से बिजली की चोरी। |

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक आधारिक संरचना एवं आर्थिक आधारिक संरचना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर
आधारिक संरचना दो प्रकार की होती है-
1. सामाजिक आधारिक संरचना एवं
2. आर्थिक आधारिक संरचना।
1. सामाजिक आधारिक संरचना– सामाजिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं, जो आर्थिक प्रक्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से तथा उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली को बाहर से अपना योगदान प्रदान करती हैं। ये सेवाएँ अर्थव्यवस्था के एक महत्त्वपूर्ण सहायक ढाँचे का निर्माण करती हैं । सामाजिक आधारिक संरचना के प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं

2. आर्थिक आधारिक संरचना– आर्थिक आधारिक संरचनाएँ वे सुविधाएँ तथा सेवाएँ हैं, जो उत्पादन तथा वितरण की प्रणाली को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ये सेवाएँ बाहर स्थित न होकर उत्पादन एवं वितरण की प्रणाली के अन्दर ही स्थित होती हैं। ये अर्थव्यवस्था के लिए एक दूसरा सहयोगी ढाँचा प्रदान करती हैं।

आर्थिक आधारिक संरचना के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं

  1.  परिवहन और संचार तन्त्र,
  2. विद्युत और सिंचाई तथा
  3. मौद्रिक और वित्तीय संस्थाएँ।

प्रश्न 2.
ऊर्जा संसाधन से क्या तात्पर्य है? इन्हें कितने भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर
जिन पदार्थों से मनुष्य को कृषि, उद्योग तथा परिवहन साधनों हेतु ऊर्जा की प्राप्ति होती है, उन्हें ऊर्जा संसाधन (Energy Resources) कहा जाता है। प्राचीन काल में मानव ऊर्जा के लिए मानव शक्ति, पशु शक्ति तथा लकड़ी आदि पर निर्भर करता था, परन्तु आज वह जिन पदार्थों से ऊर्जा प्राप्त कर रहा है, उनमें कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम), प्राकृतिक गैस, पनविद्युत, परमाणु खनिज, सूर्यातप, पवन, भू-गर्भीय ताप, ज्वारीय तरंगें, गन्ने की खोई एवं कूड़ा-कचरा आदि का प्रमुख स्थान है।
ऊर्जा संसाधनों का वर्गीकरण – उपलब्धता के आधार पर ऊर्जा संसाधनों को दो भागों में विभाजित किया जाता है1. परम्परागत ऊर्जा संसाधन–इनमें कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम), प्राकृतिक गैस एवं

  1. परमाणु खनिज सम्मिलित किए जाते हैं जो भू- गर्भ से निकाले जाते हैं। इन ऊर्जा संसाधनों के भण्डार सीमित हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं अर्थात् ये अविश्वसनीय ऊर्जा संसाधन हैं।
  2. गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधन– इनके अन्तर्गत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायो ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा आदि को सम्मिलित किया जाता है। वास्तव में ये ऊर्जा के नव्यकरणीय संसाधन हैं। इसी कारण इन्हें ऊर्जा के विश्वसनीय संसाधन कहा जाता है।

प्रश्न 3.
जीवाश्मीय ईंधनों में कौन-से अवगुण पाए जाते हैं?
उत्तर
कोयला, खनिज तेल (पेट्रोलियम) तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैव पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) भी कहा जाता है। जीवाश्मीय ईंधनों में निम्नलिखित अवगुण पाए जाते हैं

  1. ये ऊर्जा के क्षयी संसाधन हैं अर्थात् इनके भण्डार कभी भी समाप्त हो सकते हैं।
  2. जीवाश्मीय ईंधन के प्रयोग से राख, धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न होती है जिनसे पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है।
  3. एक बार उपभोग करने के बाद ये सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अर्थात् इनका नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है (पनविद्युत को छोड़कर)।
  4. इनके आवागमन में भारी व्यय करना पड़ता है, परन्तु इनसे ताप शक्ति की प्राप्ति अधिक होती है।
  5. जीवाश्मीय ईंधनों के उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि होती जा रही है जो आधुनिक युग की सबसे ज्वलन्त समस्या है जिसका सामना विश्व के सभी देश कर रहे हैं।

प्रश्न 4.
कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस को जीवाश्मीय ईंधन क्यों कहते हैं? इनके दो। विशेष अवगुण कौन-से हैं?
उत्तर
कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैव पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्मीय ईंधन कहा जाता है। कोयले की उत्पत्ति प्राचीन काल (कार्बोनिफेरस युग) में प्राकृतिक वनस्पति के भू-गर्भ में दबकर कालान्तर में रूपान्तरित और कठोर हो जाने के फलस्वरूप हुई है। दबाव के कारण इसे वनस्पति की

जलवाष्प समाप्त हो गई तथा वह कोयले में परिणत हो गई। कोयला जितने समय तक भू-गर्भ में दबा रहता है, उतना ही उत्तम और कार्बनयुक्त होता जाता है। इस प्रकार खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति भी भू-गर्भ में दबी हुई वनस्पति तथा जलजीवों के रासायनिक परिवर्तनों के कारण हुई आसवन क्रिया का परिणाम है। भू-गर्भ से निकलने के कारण इनमें अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं, अत: उपभोग करने से पूर्व इन्हें परिष्करणशालाओं में रासायनिक क्रियाओं द्वारा साफ किया जाता है।

जीवाश्मीय ईंधन के अवगुण

कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस के दो विशेष अवगुण इस प्रकार हैं

  1. एक बार उपभोग करने के उपरान्त ये सदैव के लिए समाप्त हो जाते हैं अर्थात् इनका नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है।
  2. कोयला, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस, ऊर्जा के ऐसे संसाधन हैं; जिनके उपयोग से राख, धुआँ, | गन्दगी आदि पदार्थ निकलते हैं, जिनसे पर्यावरण प्रदूषित होता है।

प्रश्न 5.
परमाणु ऊर्जा के निर्माण में किन खनिजों को प्रयुक्त किया जाता है? भारत के ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर
परमाणु ऊर्जा के निर्माण में प्रयुक्त खनिज परमाणु ऊर्जा के निर्माण में यूरेनियम, थोरियम, जिरकेनियम, बेरियम, जिरकॉन, एण्टीमनी, बेरीलियम, प्लूटोनियम, चेरोलिट, इल्मेनाइट तथा ग्रेफाइट नामक खनिज प्रयुक्त किए जाते हैं। इनमें यूरेनियम, थोरियम तथा प्लूटोनियम प्रमुख परमाणु खनिज हैं।

भारत में परमाणु ऊर्जा का महत्त्व

भारत में परमाणु ऊर्जा के महत्त्व को निम्नलिखित तथ्यों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है

  1. भारत में ऊर्जा के आपूर्ति संसाधनों; यथा—उत्तम कोटि के कोयले, खनिज तेल तथा प्राकृतिक गैस की पर्याप्त कम है। इनके भण्डार सीमित हैं। अत: हमें जल शक्ति अथवा परमाणु ऊर्जा पर निर्भर रहना पड़ेगा।
  2. परमाणु शक्ति केन्द्र ऐसे क्षेत्रों में सरलता से स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ शक्ति के अन्य संसाधन या तो हैं ही नहीं अथवा उनकी अत्यधिक कमी है।
  3. अन्य ऊर्जा संसाधनों की अपेक्षा परमाणु खनिजों के विघटन से अत्यधिक ऊर्जा शक्ति की प्राप्ति होती है।
  4. चिकित्सा तथा कृषि जैसे क्षेत्रों में परमाणु ऊर्जा के शान्तिपूर्ण उपयोग में भारत विश्व में अग्रणी स्थान रखता है।

प्रश्न 6.
भारत में परमाणु ऊर्जा केन्द्र कहाँ-कहाँ स्थापित किए गए हैं?
उत्तर
भारत में परमाणु ऊर्जा के केन्द भारत में परमाणु शक्ति बोर्ड द्वारा देश के विभिन्न भागों में परमाणु ऊर्जा केन्द्र स्थापित किए गए हैं। यहाँ सव्रप्रथम सन् 1960 में मुम्बई के निकट तारापुर में परमाणु ऊर्जा केन्द्र स्थापित किया गया था। इसके पश्चात् राजथान में कोटा के निकट रावतभाटा नामक स्थान पर, चन्नई के निकट कलपक्कम नामक स्थान पर, उत्तर प्रदेश में बुलन्दशहर के निकट नरौरा नामक स्थान पर तथा गुजरात में काकरापाड़ा नामक स्थान पर परमाणु ऊर्जा केन्द्रों की स्थापना की गई है। इस प्रकार से भारत में छः स्थानों;

  1. तारापुर एवं ट्रॉम्बे (महराष्ट्र),
  2. रावतभाटा (कोटा-राजस्थान),
  3. कलपक्कम (चेन्नई- तमिलनाडु),
  4. नरौरा (बुलन्दशहर-उत्तर प्रदेश),
  5. काकरापाड़ा (गुजरात),
  6. कैगा (कर्नाटक) में परमाणु ऊर्जा के केन्द्र स्थापित किए गए हैं। वर्तमान में देश में 14 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर्स काम कर रहे हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 2,720 मेगावाट है। देश में अन्य परमाणु ऊर्जा के रिएक्टर्स निर्माणाधीन हैं जिनकी स्थापना के बाद देश की परमाणु विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़कर 7300 मेगावाट हो जाएगी।

प्रश्न 7.
जलविद्युत शक्ति, कोयला एवं खनिज तेल की तुलना में अधिक सुविधाजनक है। क्यों?
उत्तर
जलविद्युत शक्ति, कोयले एवं खनिज तेल की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक है; क्योंकि

  1. जलविद्युत, शक्ति का अक्षय एवं अविरल स्रोत है, जबकि कोयला एवं खनिज तेल कभी भी | समाप्त हो सकते हैं।
  2. जलविद्युत उत्पादक परियोजना (बहुउद्देशीय परियोजना) का एक बार विकास हो जाने पर उसका उपयोग सदैव तथा सतत रूप में किया जा सकता है।
  3. तारों (केबिल्स) के माध्यम से जलविद्युत शक्ति को कम खर्च में दुर्गम एवं दूरवर्ती स्थानों तक ले जाया जा सकता है, जबकि कोयला या खनिज तेल का परिवहन व्यय बहुत अधिक होता है।
  4. जलविद्युत के उपयोग में धुआँ एवं गन्दगी आदि न उत्पन्न होने से यह स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त । रहती है, जबकि कोयला तथा खनिज तेल धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न कर पर्यावरण को प्रदूषित करते
  5. कोयला एवं खनिज तेल के भण्डारण में पर्याप्त व्यय करना पड़ता है, जबकि जलविद्युत में इस प्रकार का कोई व्यय नहीं करना पड़ता है।
  6. खनिज तेल की प्राप्ति ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव पैदा किए हैं, जबकि जलविद्युत शक्ति के साथ ऐसा कोई तथ्य नहीं है। इसका प्रमुख उदाहरण इराक-अमेरिकी युद्ध है।

प्रश्न 8.
ऊर्जा के परम्परागत एवं गैर-परम्परागत साधनों की तुलना कीजिए। अथवा गैर-पारम्परिक ऊर्जा के साधन अनन्त काल तक प्रयोग में लाए जा सकते हैं।” उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

ऊर्जा के परम्परागत तथा गैर-परम्परागत साधनों की तुलना

UP Board Solutions for Class 11 Economics Indian Economic Development Chapter 8 Infrastructure 1

प्रश्न 9.
जलविद्युत, ऊर्जा के गैर-पारम्परिके साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर
जलविद्युत, ऊर्जा के गैर-पारम्परिक साधनों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि

  1. जलविद्युत, ऊर्जा का अक्षय एवं अविरल स्रोत है अर्थात् जलविद्युत नव्यकरणीय ऊर्जा संसाधन है, जबकि ऊर्जा के अन्य पारम्परिक साधन कभी भी समाप्त हो सकते हैं अर्थात् उनका नवीनीकरण | नहीं किया जा सकती है।
  2. जलविद्युत उत्पादक शक्तिगृह का एक बार विकास हो जाने पर उसका उपयोग सदैव एवं सतत | रूप में किया जा सकता है अर्थात् उसे परे बार-बार व्यय नहीं करना पड़ता है।
  3. जलविद्युत शक्ति का उत्पादन जल से किया जाता है तथा जल ऊर्जा को स्थायी स्रोत है। अतः जलविद्युत शक्ति के उत्पादन में पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता है, जबकि ऊर्जा के अन्य पारम्परिक साधन; यथा-कोयला, खनिज तेल आदि; धुआँ एवं गन्दगी उत्पन्न कर वायु प्रदूषण को जन्म देते
  4. जलविद्युत, ऊर्जा का एक ऐसा स्रोत है, जिसे तारों (केबिल्स) के माध्यम से दुर्गम क्षेत्रों में भी उपभोक्ताओं को सुलभ कराया जा सकता है, जबकि पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों को दूरवर्ती उपभोक्ताओं तक भेजने में बार-बार परिवहन व्यय करना पड़ता है।
  5. जलविद्युत, शक्ति के विकास के लिए एक बार ही व्यय करना पड़ता है, जबकि पारम्परिक ऊर्जा | संसाधनों के दोहन में बार-बार पर्याप्त व्यय करना पड़ता है।
  6.  पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों के उपभोग से पूर्व भण्डारण, निस्तारण तथा परिवहन में अत्यधिक व्यय करना पड़ता है, जबकि जलविद्युत शक्ति के उपभोग हेतु इस प्रकार का कोई व्यय नहीं करना पड़ता है।
  7. पारम्परिक ऊर्जा संसाधन (खनिज तेल) ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव उत्पन्न किए हैं, जैसा कि दक्षिण-पश्चिमी एशिया में, जबकि जलविद्युत शक्ति के साथ ऐसा कोई तथ्य नहीं है।
  8. जलविद्युत शक्ति के उत्पादन के बाद जो जल शेष बचता है, उसके भौतिक एवं रासायनिक गुणों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अत: इस जल का उपयोग सिंचन तथा अन्य कार्यों में आसानी से किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के सन्दर्भ में बताइए।
उत्तर

भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ

स्वास्थ्य सेवाएँ सामाजिक आधारिक संरचना का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। अच्छा स्वास्थ्य लोगों को अधिक कार्य कुशल बनाता है। इसके लिए एक उपयुक्त स्वास्थ्य ढाँचे का होना आवश्यक है। इस ढाँचे का निर्माण करते समय हमारे पास दो विकल्प होते हैं-

  1. बीमारियों को रोकथाम पर ध्यान देना तथा
  2. अस्पताल/समुदाय आधारित स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान देना। भारत में अस्पताल आधारित स्वास्थ्य सेवाएँ केवल देश के बड़े शहरों तक ही सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, समुदाय आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को तेजी से विस्तार हो रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, उपकेन्द्र व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बड़ी मात्रा में स्थापित किए जा रहे हैं; किन्तु हमें बीमारियों की रोकथाम पर भी विशेष ध्यान देना होगा।

प्रश्न 11.
देश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर
देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँची उस देश की सामाजिक प्राथमिकताओं को प्रकट करता है। अच्छा स्वास्थ्य लोगों को अधिक कार्यकुशल व उत्पादक बनाता है। अत: यह आवश्यक है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं के उपयुक्त ढाँचे का निर्माण हो। इसके लिए सीमित साधनों की दशा में हमें सुविचारित ढंग से स्वास्थ्य सेवाओं पर निवेश करना होगा। सर्वप्रथम हमें बीमारियों की रोकथाम पर ध्यान देना होगा। देश के सभी लोगों के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ, अधिक अच्छी जन-सुविधाएँ तथा स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करनी होगी। प्राथमिक केन्द्रों एवं उपकेन्द्रों के साथ ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का भी तेजी से विस्तार होगा तथा परिवार कल्याण कार्यक्रम को अधिक सफल बनाना होगा।

प्रश्न 12.
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था भारत की स्वास्थ्य आधारिंक संरचना और स्वास्थ्य सुविधाओं की त्रिस्तरीय व्यवस्था है—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। प्राथमिक क्षेत्रक सुविधाओं में प्रचलित स्वास्थ्य समस्याओं का ज्ञान तथा उन्हें पहचानने, रोकने तथा नियन्त्रित करने की विधि, खाद्य पूर्ति और उचित पोषण और जल की पर्याप्त पूर्ति तथा मूलभूत स्वच्छता, शिशु एवं मातृत्व देखभाल, प्रमुख संक्रामक बीमारियों और चोटों से प्रतिरोध तथा मानसिक स्वास्थ्य का संवर्द्धन और आवश्यक दवाओं का प्रावधान सम्मिलित है। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक चिकित्सा केन्द्र और उपकेन्द्र स्थापित किए गए हैं। द्वितीयक क्षेत्रक में वे अस्पताल आते हैं जिनमें शल्य चिकित्सा, एक्स-रे, ई०सी०जी० जैसी बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं। इन्हें माध्यमिक चिकित्सा संस्थाएँ कहते हैं। ये प्राथमिक चिकित्सा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ दोनों ही प्रदान करते हैं। ये प्रायः जिला मुख्यालय और बड़े कस्बों में पाए जाते हैं। तृतीय क्षेत्रक में, उच्चस्तरीय उपकरणों से युक्त अस्पताल, मेडिकल कॉलेज व अन्य संस्थान आते हैं। जो मेडिकल शिक्षा के साथ-साथ विशिष्ट स्वास्थ्य सेवाएँ भी प्रदान करते हैं। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आधारिक संरचना से क्या आशय है? यह कितने प्रकार की होती है?
उत्तर

आधारिक संरचना से आशय

किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन करने के लिए अनेक वस्तुओं तथा सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है। ये वस्तुएँ तथा सेवाएँ ही आधारिक संरचना (Infrastructure) कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में—“आधारिक संरचना के अन्तर्गत ने वस्तुएँ, सुविधाएँ तथा सेवाएँ सम्मिलित की जाती हैं जो आर्थिक क्रियाओं को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपना योगदान प्रदान करती हैं।” उत्पादन उत्पत्ति के साधनों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है अर्थात् उत्पादक को उत्पादन क्रिया के लिए विभिन्न उपादानों की आवश्यकता पड़ती है; उदाहरण के लिए उत्पादन के लिए सर्वप्रथम भूमि चाहिए, फिर पूँजी चाहिए जिससे हल, ट्रैक्टर, मशीनें व औजार क्रय किए जा सकें; कार्य करने के लिए श्रमिक चाहिए, उत्पादन व्यवस्था के प्रबन्धक चाहिए और उत्पादन कार्य में निहित जोखिम वहन करने के लिए उद्यमी। केवल इन साधनों की समुचित उपलब्धि ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उत्पादित वस्तुओं को उपभोक्ता क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए परिवहन, परिवहन के साधन-टूक, रेलगाड़ी आदि चाहिए। पत्र-व्यवहार व अद्यतन सूचनाओं के लिए संचार के साधन (डाक, तार व टेलीफोन आदि) चाहिए। धन सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बैंक व वित्तीय संस्थाएँ चाहिए। अनिश्चितता और जोखिमों के भार को वहन करने के लिए बीमा कम्पनियाँ चाहिए। वस्तुओं की बिक्री को बढ़ाने के लिए विज्ञापन के साधन भी महत्त्वपूर्ण हैं।

संक्षेप में, वस्तुओं के उत्पादन व वितरण के लिए दो चीजें चाहिए-1. वस्तु व 2. सेवाएँ। आधारिक संरचना से आशय उन सेवाओं से है जिनका वस्तु के उत्पादन व वितरण के दौरान प्रयोग होता है जैसे कच्चा माल व निर्मित उत्पादों को लाने व ले जाने के लिए परिवहन सेवाएँ अथवा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन सेवाएँ। ये सेवाएँ उत्पादन व वितरण प्रक्रिया में सहायता पहुँचाती हैं और वस्तुओं के मूल्य में भी वृद्धि करती हैं, इसलिए इन्हें ‘उत्पादक सेवाएँ’ कहा जाता है। कुछ ऐसी सेवाएँ होती हैं जिन्हें हम एक वस्तु की तरह खरीदते हैं तथा उनका प्रयोग करते हैं। जब हम एक सेवा वस्तु की भाँति खरीदते हैं जैसे यात्रियों द्वारा परिवहन के साधनों का प्रयोग, मरीजों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अस्पतालों एवं चिकित्सालयों का उपयोग तो वह उपभोक्ता सेवा कहलाती है। उपर्युक्त दोनों ही प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने के लिए कुछ सुविधाओं (जैसे सड़कें, बस, विद्यालय, अस्पताल आदि) का निर्माण करना आवश्यक होता है। ये अर्थव्यवस्था के पूँजी ढाँचे का उसी प्रकार से एक भाग होती हैं जिस प्रकार से वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियाँ और मशीनें तथा खेत पर

आधारित उद्योगों का विस्तार होता है और नए-नए उद्योगों की स्थापना होती है। इसके फलस्वरूप उत्पादन में वृद्धि होती है, राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है, उपभोग स्तर एवं जीवन-स्तर में वृद्धि होती है तथा निर्धनता एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान होता है। इस प्रकार आधारित संरचना का विकास देश के आर्थिक विकास में सहायक होता है।

प्रश्न 3.
पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों से क्या अभिप्राय है? प्रमुख पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर
पारम्परिक ऊर्जा संसाधनों से आशय कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु शक्ति ऊर्जा के प्रमुख खनिज संसाधन हैं। ये सभी संसाधन भू-गर्भ से निकाले जाते हैं तथा इनके भण्डार सीमित हैं और कभी भी समाप्त हो सकते हैं। इन्हें ‘परम्परागत ऊर्जा संसाधन’ भी कहा जाता है। अतः इन संसाधनों का उपयोग बड़ी मितव्ययिता से किया जाना चाहिए। भू-गर्भ से निकाले जाने के कारण इन्हें ऊर्जा के खनिज संसाधन कहा जाता है। कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस की उत्पत्ति जैविक पदार्थों से हुई है। इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है। इसी कारण इन्हें जीवाश्म ईंधन’ भी कहा जाता है।
पारम्परिक ऊर्जा संसाधन प्रमुख पारम्परिक ऊर्जा संसाधन हैं-

  1. कोयला,
  2. पेट्रोलियम,
  3. प्राकृतिक गैस तथा
  4. बिजली। 

1. कोयला
कोयला औद्योगिक ऊर्जा का प्रमुख साधन है। लोहा, इस्पात तथा रासायनिक उद्योगों के लिए कोयला अनिवार्य है। भारत में व्यावसायिक शक्ति का 67% से भी अधिक भाग कोयले एवं लिग्नाइट के द्वारा पूरा होता है।
भारत का 98% कोयला शोण्डवानायुगीन है। यहाँ 75% कोयला भण्डार दामोदर नदी घाटी क्षेत्र में स्थित है। यहाँ रानीगंज, झरिया गिरिडीह, बोकारो तथा कर्णपुरा में कोयले की प्रमुख खाने हैं। गोदावरी, महानदी, सोन तथा वर्धा नदियों को घाटियों में भी कोयले के भण्डार पाए जाते हैं। सतपुड़ा पर्वतश्रेणी तथा छत्तीसगढ़ के मैदानों में कोयले के विशाल भण्डार हैं। कोयले के संचित भण्डार की दृष्टि से भारत का विश्व में छठा स्थान है। देश में कोयले के सुरक्षित भण्डार 24,784.7 करोड़ टन आँके गए हैं। जिसका 29.6% झारखण्ड, 24.6% ओडिशा, 11.3 पश्चिम बंगाल, 23.4% छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश तथा शेष 11.1% अन्य राज्यों में पाया जाता है।

2. पेट्रोलियम
(खनिज तेल) खनिज तेल ऊर्जा का महत्त्वपूर्ण संसाधन है। कृषि व औद्योगिक मशीनों एवं वाहनों में खनिज तेल चालकशक्ति के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यह भू-गर्भीय चट्टानों से निकाला जाता है। भू-गर्भ से निकले हुए कच्चे तेल में अनेक अशुद्धियाँ मिली होती हैं। अतः तेल शोधनशालाओं में इन अशुद्धियों को रासायनिक क्रियाओं द्वारा शुद्ध किया जाता है जिससे पेट्रोल, मिट्टी का तेल, मोबिल ऑयल, ग्रीस, डीजल आदि अनेक उपयोगी पदार्थ प्राप्त होते हैं। खनिज तेल का उपयोग वायुयान, जलयान, रेलगाड़ियों, मोटर तथा अन्य वाहनों के संचालन में किया जाता है। इससे निकले पदार्थों से फिल्म, प्लास्टिक, वार्निश, पॉलिश, मोमबत्ती, वैसलीन आदि अनेक पदार्थ प्राप्त होते हैं। खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र–भारत के प्रमुख खनिज तेल उत्पादक क्षेत्र निम्नलिखित हैं

1. असम तेल क्षेत्र—

(क) डिगबोई तेल क्षेत्र,
(ख) नहरकटिया तेल क्षेत्र तथा
(ग) सुरमा घाटी तल क्षेत्र–मसीपुर, बदरपुर एवं पथरिया।

2. गुजरात तेल क्षेत्र—

(क) अंकलेश्वर तेल क्षेत्र,
(ख) लुनेज तेल क्षेत्र (खम्भात तेल क्षेत्र),
(ग) अहमदाबाद-कलोल तेल क्षेत्र तथा
(घ) वड़ोदरा तेल क्षेत्र 

3. अरब सागर-अपतटीय तेल क्षेत्र-

(क) बॉम्बे हाई तेल क्षेत्र तथा
(ख) अलियाबेट तेल क्षेत्र।

 4. अन्य तेल क्षेत्र- राजस्थान, हिमाचल प्रदेश तथा अरुणाचल प्रदेश।
5. नवीन सम्भावित,तेल क्षेत्र- गंगा नदी की घाटी, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा और महनदी के डेल्टाई भागों के समीप गहरे सागरीय क्षेत्र तथा असम राज्य।

3. प्राकृतिक गैस
प्राकृतिक गैस ऊर्जा का संसाधन होने के साथ-साथ पेट्रो-रसायन उद्योगों के लिए कच्चा माल भी है। वर्तमान में प्रकृतिक गैस का उत्पादन लगभग 30 अरब घन मीटर हो गया है तथा इसका उपयोग रासायनिक उर्वरकों के निर्माण में भी किया जाने लगा है। इसके अनुमानित भण्डार 638 अरब घन मीटर है। वास्तव में, ऊर्जा संसाधनों की कमी वाले देशों में प्राकृतिक गैस की उपलब्धि एक अनमोल उपहार है। प्राकृतिक गैस के भण्डार प्रायः खनिज तेल के साथ ही पाए जाते हैं। परन्तु खनिज तेल क्षेत्रों से अलग केवल प्राकृतिक गैस के भण्डार त्रिपुरा एवं राजस्थान राज्यों में पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश तथा ओडिशा के तटों से दूर गहरे सागर में भी प्राकृतिक गैस के भण्डार पाए गए हैं। प्राकृतिक गैस का संरक्षण कठिन होता है। इसे सिलिण्डरों में भरकर रसोई ईंधन के रूप में सुरक्षित तो रखा जा सकता है, परन्तु अधिक समय तक उसे सँभालकर रखने में आग लगने की आशंका बनी रहती है। अतः प्राकृतिक गैस का तुरन्त उपयोग करना ही श्रेयस्कर रहता है। पेट्रो-रसायन एवं रासायनिक उर्वरक उद्योगों द्वारा इसके अधिक उपयोग से इसका संरक्षण सम्भव हो पाया है। 4. विद्युत (बिजली) विश्व में सम्भाव्य जल शक्ति की दृष्टि से भारत का पाँचवाँ स्थान है। वर्ष 2010-11 की अवधि में 811-14 अरब यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ जिसमें 665.01 अरब यूनिट ताप बिजली, 114.26 अरब यूनिट पनबिजली, 2627 अरब यूनिट परमाणु बिजली और 5.61 अरब यूनिट भूटान से आयातित बिजली शामिल है। जलविद्युत भारत में ऊर्जा का सबसे उपयोगी एवं सुविधाजनक साधन है। भारत में बिजली के तीन स्रोत हैं

  1. ताप विद्युत (Thermal Power),
  2. जल विद्युत (Hydro-electricity),
  3. आणविक शक्ति (Atomic Power)।

प्रश्न 4.
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधन से आप क्या समझते हैं? प्रत्येक को संक्षेप में समझाइए। आधुनिक समय में इन साधनों का क्या महत्त्व है?
उत्तर
ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधन से आशय सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा तथा कृषि अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा एवं आदि ऊर्जा के गैर-परम्परागत संसाधन कहलाते हैं। ये नव्यकरणीय (अक्षय) ऊर्जा स्रोत हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है-

1. पवन ऊर्जा- नौ-परिवहन पवन और प्रवाहित जल का उपयोग प्राचीनकाल से होता चला आ रहा है। प्राचीनकाल में अनाज (आटा) पीसने के लिए पवनचक्कियों का उपयोग किया जाता था। भू-गर्भ से जल खींचने में भी पवनचक्कियों का प्रचलन था। वास्तव में, ऊर्जा के ये ऐसे संसाधन हैं। जिनको बार-बार नवीनीकरण किया जा सकता है। अन्य संसाधनों की अपेक्षा इनसे ऊर्जा प्राप्त करने में व्यय कम करना पड़ता है। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि पवन के उपयोग से 200 मेगावाट तक विद्युत शक्ति उत्पन्न की जा सकती है।

2. ज्वारीय ऊर्जा– भारत की समुद्री सीमा लगभग 6,100 किमी लम्बी है। तटीय क्षेत्रों में ज्वार-भाटे की प्रक्रिया द्वारा ज्वारीय ऊर्जा का उत्पादन सुगमता से किया जा सकता है। यदि ज्वार-भाटे के समय किसी संयन्त्र के माध्यम से ऊर्जा प्राप्त कर ली जाए तो प्राप्त ऊर्जा शक्ति का उत्पादन बहुत ही सस्ता पड़ता है। यह ऊर्जा का अक्षय संसाधन है। भारत में कच्छ एवं खम्भात की खाड़ियाँ ज्वारीय ऊर्जा के उत्पादन में ओदर्श दशाएँ प्रस्तुत करती हैं, क्योंकि यहाँ सँकरी खाड़ियों में ज्वारीय जल बहुत-ही तीव्रता से ऊपर उठता है।।

3. भू-तापीय ऊर्जा- भूताषीय ऊर्जा केवल उन्हीं क्षेत्रों में सम्भव है जहाँ गर्म जल के स्रोत उपलब्ध हैं। वास्तव में गर्म जल के स्रोत ज्वालामुखी क्षेत्रों में ही उपलब्ध हो सकते हैं। भारत इस संसाधन में धनी नहीं है। हिमाचल प्रदेश में मणिकरण नामक गर्म जल स्रोत से ऊर्जा प्राप्ति के प्रयास चल रहे हैं।

4. जैव पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा- बंजर भूमि तथा कृषि अयोग्य अपरदित भूमि का उपयोग वृक्षारोपण के लिए किया जा सकता है। इन पर ऐसे वृक्ष रोपे जा सकते हैं जिनकी वृद्धि शीघ्र हो सके तथा उनमें तापजन्य गुण भी हों। इनसे ईंधन की लकड़ी, काष्ठ कोयला और शक्ति प्राप्त की जा सकती है। भारत में इन वृक्षों का उपयोग करके लगभग 1.5 मेगावाट शक्ति का उत्पादन किया जाता है।

5. अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा- बड़े-बड़े नगरों एवं महानगरों में लाखों टन कूड़ा-कचरा एकत्र होता है, जिसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। दिल्ली महागनर में ठोस पदार्थों के रूप में प्राप्त कूड़े-कचरे से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए परीक्षण के रूप में एक संयन्त्र कार्यशील है। जिससे प्रतिवर्ष 4 मेगावाट ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है। इससे प्रोत्साहित होकर अन्य नगरों एवं महानगरों में ऐसे संयन्त्रों की स्थापना के प्रयास किए जा रहे हैं।

6. कृषि अपशिष्टों से प्राप्त ऊर्जा– वर्तमान में भारत में चीनी मिलों से भारी मात्रा में खोई (बैगास) की प्राप्ति होती है। अतः गन्ने के पेराई मौसम में इस खोई से 2000 मेगावाट विद्युत शक्ति का उत्पादन किया जा सकता है। कृषि, पशुओं तथा मानव के अपशिष्टों द्वारा उत्पादित ऊर्जा ग्रामीण क्षेत्रों की ऊर्जा आवश्यकता में प्रयुक्त की जा सकती है। इस दिशा में बायो गैस संयन्त्रों का संचालन महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

7. सौर ऊर्जा- सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्रोत है। इससे विपुल मात्रा में अनवरत रूप से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। वास्तव में, सौर ऊर्जा भविष्य के लिए ऊर्जा का सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन सिद्ध हो सकता है क्योंकि ऊर्जा संसाधन जैसे कोयला एवं खनिज तेल आदि; जीवाश्मीय ईधन कभी भी पूर्ण रूप से समाप्त हो सकते हैं। परन्तु ब्रह्माण्ड में जब तक सूर्य विद्यमान रहेगा, उससे भारी मात्रा में सौर ऊर्जा प्राप्त की जाती रहेगी। इस प्रकार उपर्युक्त ऊर्जा संसाधनों की विशेषताओं का ध्यान में रखते हुए नि:सन्देह कहा जा सकता है कि हमारा भविष्य ऊर्जा के लिए इन्हीं गैर-परम्परागत ऊर्जा संसाधनों पर निर्भर रहेगा।

ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों का महत्त्व

अधुनिक समय में, गैर परम्परागत ऊर्जा संसाधनों के महत्त्व को निम्नलिखित रूपों में व्यक्त किया जा सकता है

1. सौर ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायो ऊर्जा (कूड़-कचरा, मल-मूत्र एवं गोबर आदि से निर्मित) ऊर्जा के प्रमुख गैर-परम्परागत संसाधन हैं।
2. ऊर्जा के गैर परम्परागत साधनों का विकास वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ-साथ किया जा | सर्केता है।
3. ऊर्जा के गैर परम्परागत साधन नव्यकरणीय होते हैं। इनका निरन्तर उपयोग किया जाता रहेगा; जैसे—जब तक बाह्माण्ड में सूर्य विद्यमान रहेगा, सौर ऊर्जा अनवरत रूप से प्राप्त होती रहेगी।
4. इन्हें ऊर्जा के ‘अक्षीय संसाधन’ कहा जाता है।
5. वर्तमान में ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों की उपलब्धता तो पर्याप्त मात्रा में है परन्तु तकनीकी । विकास की कमी के कारण उनका उपभोग व्यापक नहीं हो पाया है।
6. ऊर्जा के ये साधन पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से मुक्त हैं अर्थात् इनसे प्रदूषण नहीं होता है। इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि ऊर्जा साधनों की प्राप्ति के लिए भारत का भविष्य गैर-परम्परागत ऊर्जा साधनों में ही सुरक्षित है। हमें इसी ओर अधिकाधिक प्रयास करने की आवश्यकता

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