Rajasthan Board RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व एवं निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व

RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 पाठ्यपुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 अतिलघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक उत्तरदायित्व किसे कहते हैं?
उत्तर:
समाज व्यवसाय जगत से जो अपेक्षाएँ रखता है प्रबन्ध उन समाज की अपेक्षाओं को अपने कौशल द्वारा पूरा करता है इसे ही सामाजिक उत्तरदायित्व कहते हैं। क्योंकि समाज, व्यवसाय की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है – तो लाजिमी है कि समाज भी व्यवसाय जगत से कुछ अपेक्षा रखता है। यही प्रबन्ध का समाज के प्रति उत्तरदायित्व है।

प्रश्न 2.
प्रबन्ध के सामाजिक उत्तरदायित्व की कोई एक परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
एण्डूज के अनुसार – ”प्रबन्ध के सामाजिक उत्तरदायित्व से तात्पर्य समाज के कल्याण के प्रति बुद्धिमता पूर्ण एवं वास्तविक लगाव से है जो किसी संस्थान को चरम विनाशकारी कार्यों को करने से रोकता है तथा मानव कल्याण की अभिवृद्धि में योगदान देने वाली दिशा की ओर प्रवृत्त करता है”।

प्रश्न 3.
सामाजिक चेतना से क्या आशय है?
उत्तर:
सामाजिक चेतना का अर्थ:
समाज के चौकन्ना, सावचेत, जागरूक अभिप्रेरित रहने से है अर्थात समाज को यह आभास होना चाहिये कि उद्योगों एवं बड़े – बड़े व्यवसायों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति समाज के द्वारा की जा रही है अतः व्यवसाय व प्रबन्ध भी समाज का ध्यान रखें। समाज कल्याण से आशय समाजोपयोगी योजनाएँ, बेरोजगारी दूर करने में सहायक, गरीबी को दूर करने के प्रयास, गुणवत्ता व प्रमापित वस्तुओं की उपलब्धता, सही मूल्य, नापतोल, जमाखोरी नहीं आदि के प्रति समाज के जागरूक रहने से है। समाज से ही व्यवसाय पैदा होता है, बढ़ता है, फलता फूलता है, यह समाज का ध्यान रखें ऐसी सोच यदि समाज की होगी तो यह सामाजिक चेतना कही जायेगी।

प्रश्न 4.
निगम से क्या आशय है?
उत्तर:
निगम एक व्यवस्था/प्रक्रिया है जिसके द्वारा कम्पनी को निर्देशित एवं नियंत्रित किया जाता है।
RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 1

RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रबन्ध की सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
प्रबन्ध समाज का आर्थिक एवं सामाजिक उत्प्रेरक है” अत: प्रबन्ध को समाज में सामाजिक एवं आर्थिक मूल्यों का विकास करने, ग्राहकों के हितों की रक्षा करने, समाज के विभिन्न वर्ग पुरुष महिला, युवा बच्चे, ग्रामीण – शहरी, कामकाजी महिला, पेशेवर गरीब बेरोजगार आदि वर्गों की आकाक्षाओं को पूरा करने एवं भावी चुनौतियों की तैयारी के लिये योजनाएँ, कार्यक्रम रणनीति, प्रशिक्षण, जागरूकता एवं अभियान चलाकर स्वैच्छिक रूप से जिम्मेदारी को वहन करना प्रबन्ध की सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा मानी जाती है।

प्रश्न 2.
प्रबन्थ की सामाजिक उत्तरदायित्व की नवीन अवधारणा की विवेचना कीजिए।
उतर:
कुछ वर्षों पूर्व तक प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व केवल कल्याणकारी कार्य करने तक ही सीमित था परन्तु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा पूरी तरह बदल गयी है जिसे नवीन अवधारणा के नाम से पुकारा जा रहा है। प्रबन्ध का वास्तविक स्वरूप सामाजिक एवं मानवीय है क्योंकि वह समाज के संसाधनों का प्रन्यासी है। अर्थात् ऐसे भी कहा जा सकता है कि प्रबन्ध की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति समाज के द्वारा की जाती है।
Land – Labour – Capital
अतः प्रबन्ध को सामाजिक आकांक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करना होगा। हाल के कुछ वर्षों में समाज ने प्रबन्ध से कुछ नई अपेक्षाएँ की हैं, जैसे – “सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन में नेतृत्व प्रदान करने की।”

आज प्रबन्ध के सामने सबसे बड़ी चुनौती निरन्तर बदल रही सामाजिक अपेक्षाओं का मूल्यांकन करके उचित सामाजिक व्यवहार बदलने की है। इस प्रकार नवीन अवधारणा के अन्तर्गत स्पष्ट है कि सामाजिक विचारधारा एक विस्तृत विचारधारा है जो प्रबन्धकों को सामाजिक हितों के मूल्यों को ध्यान में रखकर निर्णय लेने के लिये बाध्य करती है। यह समाज की मान्यताओं, जीवन स्तर, स्थिरता, एकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना व्यवसायों को संचालित करने पर बल देती है। यह प्रबन्धकों को समाज के हितों में नीतियों व कार्यक्रमों का निर्माण करने, सामाजिक समस्याओं को हल करने तथा उन्हें समाज की श्रेष्ठ रचना के लिये प्रोत्साहित करती है ताकि समाज के कल्याण में बढ़ोत्तरी हो सके।

प्रश्न 3.
व्यवसाय के स्वयं के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्ध को समाज के सभी वर्गों के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करना होता है। व्यवसाय के स्वयं के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व निम्न प्रकार हैं –

  1. सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना
  2. प्रबन्ध के पेशे के प्रति प्रतिष्ठा बनाये रखना
  3. पेशेवर संगठनों की सदस्यता ग्रहण करना
  4. पेशेवर शिष्टाचार का पालन करना
  5. प्रबन्ध आचार संहिता का पालन करना
  6. प्रबन्धकीय ज्ञान एवं शोध के प्रति विकास में योगदान करना
  7. प्रबन्ध के द्वारा समस्त मजदूर, कार्मिकों के साथ मानवीय व्यवहार करना
  8. पूर्ण निष्ठा एवं मेहनत के साथ कार्य करना।

प्रश्न 4.
व्यवसाय का ग्राहकों के प्रति दायित्वों को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
“ग्राहक बाजार का राजा होता है” ग्राहक की संतुष्टि ही व्यवसाय की सफलता का आधार है। सरकार भी उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण विभिन्न कानूनों द्वारा करती है। ग्राहक की उपेक्षा व्यवसाय के लिये घातक सिद्ध होती है।
ऐसी स्थिति में ग्राहकों के प्रति कुछ विशेष दायित्व बनते हैं जिन्हें व्यवसाय प्रबन्ध को पूरा करना चाहिये जो निम्न प्रकार हैं –

  1. ग्राहकों की रुचियों व आवश्यकताओं का अध्ययन करना
  2. उचित मूल्य पर वस्तु एवं सेवाएँ उपलब्ध करवाना
  3. प्रमाणित किस्म की वस्तुएँ उपलब्ध करवाना
  4. अनुचित प्रवृतियाँ – कम नापतोल, झूठ, दिखावटी, जमाखोरी, मिलावट आदि को त्यागना
  5. झूठे, अनैतिक विज्ञापन व भ्रामक प्रचार न करना
  6. विक्रय के समय दिये गये आश्वासनों एवं वायदों को पूरा करना
  7. विक्रय उपरान्त सेवायें प्रदान करना
  8. उपभोक्ताओं की शिकायतों को दूर करना
  9. आचार संहिताओं का पालन करना
  10. बाजार उपभोक्ता एवं वस्तुओं की उपयोगिता के बारे में शोध करना
  11. वस्तुओं की उपयोग विधियों आदि के बारे में ग्राहकों को जानकारी देना
  12. उपयोगी जीवनकाल व जीवन स्तर में वृद्धि करने वाली वस्तुओं का निर्माण करना
  13. कृत्रिम कमी उत्पन्न नहीं करना व पूर्ति को नियमित बनाए रखना
  14. उचित समये व उचित मूल्य पर उपभोक्ता को वस्तुएँ उपलब्ध करवाना
  15. ग्राहकों से मधुर एवं स्थायी संबंध स्थापित करना।

प्रश्न 5.
व्यवसाय की सरकार के प्रति दायित्वों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक प्रबन्ध एक निगमीय नागरिक है अतः प्रबन्ध के सरकार के प्रति की कुछ उत्तरदायित्व हैं जो निम्न प्रकार हैं –

  1. सभी सरकारी नियम व कानूनों की पालना करना
  2. सरकार की नीतियों के अनुरूप व्यवसाय का संचालन
  3. व्यावसायिक उत्पादक क्षमता व लाइसेंस क्षमता का पूर्ण उपयोग करना
  4. राष्ट्रीय हित में देश के आर्थिक संसाधनों का विदोहन करना
  5. सरकारी क्षेत्र व प्रक्रिया को भ्रष्ट न करना
  6. करों का सही समय पर भुगतान करना तथा व्यवसाय का सही विवरण देना
  7. राष्ट्रीय कार्यक्रम, अल्प बचत, परिवार कल्याण, आदि सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में सहयोग देना,
  8. अन्य दूसरों को भी नियम विरुद्ध कार्य करने से रोकने में सरकारी की मदद करना।

RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रबन्ध के सामाजिक उत्तरदायित्व से आप क्या समझते हैं? इसकी अवधारणाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सामाजिक उत्तरदायित्व:
समाज, व्यवसाय जगत से जो अपेक्षाएँ रखता है। प्रबन्ध उस समाज की अपेक्षाओं को अपने कौशल द्वारा पूरा करता है इसे ही सामाजिक उत्तरदायित्व कहते हैं। क्योंकि समाज, व्यवसाय की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करता है तो आवश्यक है कि समाज भी व्यवसाय से कुछ अपेक्षा रखता है। इन अपेक्षाओं को पूरी करने में खरा उतरना ही सामाजिक उत्तरदायित्व है।

सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा:
प्रबन्ध की सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा को लेकर विभिन्न प्रबन्धक, चिन्तक, एवं लेखकों के अभिमत अलग – अलग हैं। कुछ चिन्तक वस्तु एवं सेवाओं के कुशल उत्पादन, विपणन को आधार मानकर अधिकतम लाभार्जन क्षमता को ही प्रबन्ध का दायित्व मानते हैं तो कुछ विद्वान प्रबन्ध द्वारा आर्थिक निर्णय लेते समय समाजहित एवं उनकी अपेक्षाओं को ध्यान रखने (जैसे टाटा द्वारा नैनोकार की कीमत निर्धारण) को सामाजिक उत्तरदायित्व मानते हैं।

इसी तरह प्रगतिशील एवं चिन्तनशील विद्वान समाज के लोकोपयोगी एवं कल्याणकारी कार्यों की ओर प्रयास किये जाने वाले कार्यक्रम, जैसे – गरीबी उन्मूलन, ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य, स्वच्छता, प्रदूषण निवारण, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा मूल्य प्राप्ति, रोजगार, संस्कारित शिक्षा, संस्कृति की रक्षा एवं बढ़ावा आदि को सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन मानते हैं।

“प्रबन्ध, समाज का आर्थिक एवं उत्प्रेरक एजेन्ट है” अतः प्रबन्ध को समाज में सामाजिक एवं आर्थिक मूल्यों का विकास करने, ग्राहकों के हितों की रक्षा करने, समाज के विभिन्न वर्ग पुरुष – महिला, गरीब, युवा बच्चे, ग्रामीण शहरी, कामकाजी महिला, पेशेवर, बेरोजगार आदि वर्गों की आकांक्षाओं को पूरा करने एवं भावी चुनौतियों की तैयारी के लिये योजनाएँ, कार्यक्रम, रणनीति, प्रशिक्षण, जागरूकता, अभियान चलाकर, स्वैच्छिक रूप से सामाजिक जिम्मेदारी का वहन करना चाहिये।

आर. जोसेफ मेनसेन ने प्रबन्धन के सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना के विकास में निम्न चार स्तरों का उल्लेख किया है। प्रथम स्तर – इस स्तर पर प्रबन्ध उपक्रम के सन्दर्भ में व्यावसायिक कानूनों का पालन करके सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करता है। यह सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का न्यूनतम स्तर है।

द्वितीय स्तर – प्रथम स्तर से ऊपर उठकर प्रबन्ध जन आकांक्षाओं, अपेक्षाओं का अनुमान करता है एवं उनके अनुकूल दृष्टिकोण व कदम उठाता है।

तृतीय स्तर – इस स्तर पर प्रबन्ध पहले से ही जनमत व जन आकांक्षाओं का अनुमान करता है एवं उसी के अनुरूप दृष्टिकोण व कदम उठाता है।

चतुर्थ स्तर – यह सामाजिक भावना का उच्चतम स्तर है। इसमें प्रबन्ध आदर्श समाज के निर्माण को दृष्टिगत रखते हुये स्वेच्छा से नई जन आकांक्षाओं को जन्म देता है।

राबर्ट हे तथा इडग्रे ने प्रबन्ध के सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा के निम्न प्रारूपों का उल्लेख किया है –
1. अधिकतम लाभ प्रबन्ध – अधिकतम लाभ प्रबन्ध की अवधारणा एडम स्मिथ की प्रसिद्ध कृति “वेल्थ ऑफ नेशन्स” पर आधारित है। इस पुस्तक में स्मिथ ने यह विचार व्यक्त किया है कि उद्यमी समाज की इच्छानुसार उत्पादन तभी करता है जब ऐसा करने से उसे लाभ होता हो। इस प्रकार जब समाज उद्यमियों को अधिकतम लाभ अर्जित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान कर देता है तो उनकी स्वार्थ भावना ही उत्पादन बढ़ाने का आधार बन जाती है। इससे समाज को अधिकाधिक वस्तुओं की उपलब्धि हो जाती है। इस प्रकार के प्रबन्ध में यह अवधारणा होती है कि मेरे लिए जो अच्छा है वह मेरे देश के लिए अच्छा है।”

2. न्यासिता प्रबन्ध – न्यासिता प्रबन्ध की अवधारणा तीसा की मन्दी से प्रेरित है। इसमें यह स्वीकार किया गया है। कि प्रबन्ध का उत्तरदायित्व केवल लाभ अधिकतम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि कर्मचारियों, अंशधारियों, पूर्तिकर्ताओं, ग्राहकों और जन सामान्य के प्रति इसका दायित्व है। इस मत के अनुसार, प्रबन्धकों को ट्रस्टी के रूप में संगठन के परस्पर विरोधी दावेदारों के हितों की रक्षा करनी चाहिए। इस प्रकार यह मान्यता स्वीकार की गई है कि जो एक उपक्रम के लिए अच्छा है, वह सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए अच्छा है।”

3. जीवन की गुणवत्ता प्रबन्ध – प्रबन्ध का यह विचार सामाजिक उत्तरदायित्व के नवीनतम दर्शन को प्रकट करता है जो लाभ अधिकतम करने वाले प्रबन्ध तथा न्यासिता प्रबन्ध दोनों से भिन्न है। यह अवधारणा इस दर्शन को स्वीकार करती ‘ है कि “जो समाज के लिये अच्छा है वह कम्पनी के लिये अच्छा है।” इस प्रकार लाभार्जन को स्वीकार करते हुये जीवन गुणवत्ता प्रबन्ध में विश्वास रखने वाले प्रबन्ध समाज के लिये हानिप्रद माल का उत्पादन और विक्रय नहीं करेगा।

इस अवधारणा में प्रबन्ध समाज की समस्याओं को संयुक्त रूप से हल करते हुये सरकार को एक साझेदार के रूप में देखता है। इस अवधारणा को स्वीकार करने वाला प्रबन्ध समाज के जीवन स्तर में वृद्धि करने, व्यक्तियों की जीवन गुणवत्ता में सुधार, तथा हर प्रकार से समाज के उत्थान में योगदान देने के लिये तैयार रहता है। यह जन स्वीकृति के आधार पर कार्य करता है तथा समाज अपने कार्यों का मूल्यांकन चाहता है। यदि समाज उसमें कोई सुधार चाहता है तो समाज की आकांक्षाओं के अनुरूप उसमें सुधार करने का प्रयास करता है।

सामाजिक उत्तरदायित्व की नवीन अवधारणा:
कुछ वर्षों पूर्व तक प्रबन्ध का सामाजिक दायित्व केवल कल्याणकारी कार्य करने तक ही सीमित था। किन्तु बीस शताब्दी के उत्तरार्द्ध से सामाजिक दायित्व की अवधारणा पूर्णत: बदल गई है। प्रबन्ध का वास्तविक स्वरूप सामाजिक एवं मानवीय है, क्योंकि वह समाज के संसाधनों का प्रन्यासी है। अतः प्रबन्ध को सामाजिक आकांक्षाओं के अनुकूल व्यवहार करना होता है।

आर. ऑकरमैन का कथन है। कि “हाल के वर्षों में समाज ने प्रबन्ध से कुछ नयी अपेक्षाएँ की हैं इनमें प्रमुख हैं – सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन में नेतृत्व प्रदान करने की।’ एडवर्ड कोल के अनुसार, “आज प्रबन्ध के सामने सबसे बड़ी चुनौती निरन्तर बदल रही सामाजिक अपेक्षाओं का मूल्यांकन करके उचित सामाजिक व्यवहार करने की है।” स्पष्ट है कि सामाजिक दायित्व की विचारधारा एक विस्तृत विचारधारा है जो प्रबन्धकों को सामाजिक हितों के मूल्यों को ध्यान रखकर निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है।

यह समाज की मान्यताओं, जीवन किस्म, स्थिरता, एकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना व्यवसाय का संचालन करने पर बल देती है। यह प्रबन्धकों को समाज के हित में नीतियों व कार्यक्रमों का निर्माण करने, सामाजिक समस्याओं को हल करने तथा उन्हें समाज की श्रेष्ठ रचना के लिए प्रोत्साहित करती है ताकि समाज कल्याण में अभिवृद्धि.की जा सके। संक्षेप में, प्रबन्ध की सामाजिक प्रतिबद्धता अथवा सामाजिक दायित्व के निम्न तीन स्तर हैं –
1. निम्न स्तर – सामाजिक बाध्यता अथवा कर्तव्य – इस स्तर पर प्रबन्धक प्रचलित कानूनों तथा अर्थिक प्रणाली के अनुरूप ही समाज के प्रति अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों का पालन करते हैं। इसमें प्रबन्धक वैधानिक नियमों की बाध्यता, वैधानिक आवश्यकताओं अथवा अपने स्वयं के हित के कारण ही सामाजिक दायित्वों को निभाते हैं।

2. मध्ये स्तर – इस स्तर पर प्रबन्ध सामाजिक परम्पराओं – मूल्यों, आकांक्षाओं के कारण अपने दायित्वों का निर्वाह करते हैं। वे स्वैच्छिक रूप से अपने फायदे पर विचार न करके तथा कानूनी आवश्यकताओं से कुछ अधिक ही सामाजिक कल्याण के कार्य करते हैं। वे न्यासिता की भावना तथा अच्छे निगमीय नागरिक की आकांक्षा से कार्य करते हैं। किन्तु इस स्तर पर जनसमस्याओं पर विचार नहीं करते हैं। (कौशल विकास कार्यक्रम)

3. उच्चतम स्तर पर सामाजिक संवेदनशील–इस स्तर पर प्रबन्धक समाज की समस्याओं, कठिनाइयों वे महत्वपूर्ण मसलों के प्रति प्रतिसंवेदी तथा जागरूक होते हैं। उनका व्यवहार समाज के हित में कार्य करने तथा समाज को समस्या मुक्त समाज बनाने का होता है। वे समाज की समस्याओं का पूर्वानुमान करके उनके घटित होने के पूर्व ही उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं। वे दूर दृष्टि रखकर समाज की भावी समस्याओं को हल करने के उपाय ढूँढ़ते हैं।
RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 2

प्रश्न 2.
व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्वों की संक्षेप में विवेचना कीजिए।
उत्तर:
प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व का विस्तृत क्षेत्र है उसे दायित्व निर्वहन में अपनी महती भूमिका निभानी होती है – प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व किन – किन के प्रति क्या – क्या होता है इसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है –
RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 3
उपरोक्त चार्ट से स्पष्ट हो रहा है कि प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। इन सभी वर्गों समूहों के सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रबन्ध को ध्यान रखना पड़ता है।
किसके प्रति प्रबन्ध का क्या सामाजिक उत्तरदायित्व है इसे निम्न प्रकार बिन्दुवार समझा जा सकता है –
1. स्वयं के प्रति दायित्व – प्रबन्धकों के अपने स्वयं के प्रति तथा अपने पेशे के प्रति प्रमुख निम्न दायित्व होते हैं –

  1. सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना
  2. प्रबन्ध की पेशे के प्रति प्रतिष्ठा बनाये रखना
  3. पेशेवर संगठनों की सदस्यता ग्रहण करना
  4. पेशेवर शिष्टाचार का पालन करना
  5. प्रबन्ध आचार संहिता का पालन करना
  6. प्रबन्धकीय ज्ञान एवं शोध के प्रति विकास में योगदान करना
  7. अपने कार्मिकों के साथ घनिष्ठता एवं स्थायी सबंध बनाना।

2. अपनी संस्था के प्रति दायित्व – एक प्रबन्ध के अपनी संस्था के प्रति निम्न दायित्व होते हैं –

  1. संस्था के व्यवसाय का सफल संचालन करना
  2. संस्था के उत्पादों की मांग उत्पन्न करना
  3. संस्था को प्रतिस्पर्धी बनाये रखना
  4. व्यवसाय में नवाचारों को प्रोत्साहन देना
  5. संस्था का विकास एवं विस्तार करना
  6. शोध कार्य को बढ़ावा देना
  7. संस्था की लाभार्जन क्षमता में वृद्धि करना
  8. संस्था की छवि व प्रतिष्ठा को बनाये रखना।

3. स्वामियों के प्रति दायित्व – प्रबन्ध एवं स्वामित्व के पृथक – पृथक हो जाने के कारण प्रबन्धकों के स्वामियों के प्रति दायित्व उत्पन्न हो जाते हैं जो निम्न प्रकार हैं –

  1. विनियोजित पूँजी को सुरक्षा प्रदान करना
  2. निश्चित उद्देश्यों के लिए ही पूँजी का उपयोग करना
  3. अंशधारियों को उचित लाभांश का भुगतान करना
  4. अंशपूँजी में अभिवृद्धि के प्रयास करना
  5. विभिन्न प्रकार के अंशधारियों के साथ समता एवं न्याय का व्यवहार करना
  6. व्यवसाय की प्रगति की यथार्थ सूचना देना
  7. कपटपूर्ण व्यवहार न करना, गुप्त लाभ न कमाना।
  8. अंशों के हस्तान्तरण में बाधा उत्पन्न नहीं करना।

4. ऋणदाताओं के प्रति दायित्व – व्यवसाय की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति में ऋणदाताओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है। ऋणदाताओं के प्रति भी प्रबन्ध के निम्न दायित्व बनते हैं –

  1. ऋणराशि का सदुपयोग करना
  2. ऋण प्राप्ति एवं ब्याज की उचित शर्ते रखना
  3. मूल पूँजी व ब्याज का समय पर भुगतान करना
  4. बन्धक रखी गयी सम्पत्ति की पूर्ण सुरक्षा करना
  5. ऋणदाताओं को इच्छित सूचनाएँ उपलब्ध करवाना
  6. ऋणदाताओं के साथ मधुर व्यवहार रखना।

5. कर्मचारियों के प्रति दायित्व – कर्मचारी संस्था की महत्वपूर्ण निधि होते हैं, ये यांत्रिक मानव नहीं वरन संवेदनशील भावनाओं वाले प्राणी होते हैं। चार्ल्स मायर्स के अनुसार ”जो उद्यम मानवीय तत्वों की आवश्यकताओं एवं भावनाओं की उपेक्षा करते हैं वे यंत्र समूह के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं।” एक प्रबन्ध के अपने कर्मचारियों के प्रति निम्न दायित्व होते हैं –

  1. उचित वेतन का भुगतान करना
  2. प्रेरणात्मक मजदूरी योजनाओं को लागू करना
  3. कर्मचारियों को कार्य के प्रति सुरक्षा (गारन्टी) प्रदान करना
  4. स्वस्थ कार्य करने की स्थितियाँ परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना
  5. श्रम कल्याण के कार्य करना
  6. सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, ग्रेच्युटी, बीमा, भविष्य निधि आदि की व्यवस्था करना
  7. कर्मचारियों को उनकी रुचि एवं योग्यता के अनुरूप कार्य सौंपना
  8. कर्मचारियों को प्रशिक्षण उपलब्ध कराना
  9. पदोन्नति के अवसर उपलब्ध कराना
  10. कर्मचारियों को प्रबन्ध में भागीदारी उपलब्ध कराना
  11. बोनस एवं लाभों में हिस्सा देना
  12. क्षमता एवं व्यक्तित्व विकास के नये – नये अवसर प्रदान करना,
  13. अन्य प्रेरणादायी/उत्साही सुविधाएँ प्रदान करना।

6. ग्राहकों के प्रति दायित्व – ग्राहक बाजार का ‘राजा’ होता है। ग्राहक की संतुष्टि ही व्यवसाय की सफलता की आधार है। सरकार भी उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिये विभिन्न प्रकार के कानून बनाती है एवं उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण करती है। ग्राहक की उपेक्षा व्यवसाय के लिये नुकसानदेह है। ऐसी स्थिति में ग्राहकों के प्रति प्रबन्ध के निम्न उत्तरदायित्व बन जाते हैं –

  1. ग्राहकों की रुचियों व आवश्यकताओं का अध्ययन करना
  2. उचित मूल्य पर वस्तुएँ एवं सेवाएँ उपलब्ध करवाना
  3. प्रमाणित किस्म की वस्तुएँ उपलब्ध कराना
  4. अनुचित प्रवृत्तियाँ कम नापतोल, झूठ, दिखावा, जमाखोरी मिलावट आदि को त्यागना
  5. झूठे अनैतिक विज्ञापन व भ्रामक प्रचार न करना
  6. विक्रय के समय दिये गये आश्वासनों व वायदों को पूरा करना
  7. विक्रय उपरान्त सेवाएँ प्रदान करना
  8. उपभोक्ताओं की शिकायतों को दूर करना
  9. आचार संहिताओं का पालन करना
  10. बाजार उपभोक्ता एवं वस्तुओं की उपयोगिता के बारे में शोध करना
  11. वस्तु के उपयोग विधियों आदि के बारे में ग्राहकों को जानकारी देना
  12. उपयोगी जीवन काल व जीवन स्तर में वृद्धि करने वाली वस्तुओं का निर्माण करना
  13. कृत्रिम कमी उत्पन्न नहीं करना व पूर्ति को नियमित बनाए रखना
  14. उचित समय व उचित दर पर उत्पाद उपलब्ध करवाना
  15. ग्राहकों से स्थायी सम्बन्ध बनाये रखना।

7. आपूर्तिकर्ताओं के प्रति दायित्व प्रबन्ध के आपूर्तिकताओं के प्रति निम्न दायित्व होते हैं –

  1. आपूर्तिकर्ताओं को उनके माल का उचित मूल्य प्रदान करना
  2. क्रय की उचित शर्ते रखना
  3. लेन – देनों की यथासमय भुगतान करना
  4. नवीन प्रकार के कच्चे माल को प्रस्तुत करने का अवसर देना
  5. बाजार संबंधी आवश्यक सूचनाएँ आपूर्तिकर्ताओं को उपलब्ध कराना।

8. अन्य व्यवसायियों के प्रति दायित्व – प्रबन्ध के अन्य व्यवसायियों के प्रति भी दायित्व होते हैं जो निम्न प्रकार हैं –

  1. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाए रखना
  2. दूसरे व्यवसायी की निन्दी या आलोचना नहीं करना
  3. आपूर्ति पर एकाधिकार न जमाना
  4. दूसरे व्यवसायियों के ब्राण्ड, ट्रेडमार्क आदि का उपयोग नहीं करना
  5. केवल सामाजिक हितों में अभिवृद्धि एवं व्यावसायिक कुशलता के लिये संयोजन को प्रोत्साहित करना।

9. व्यावसायिक संघ तथा पेशेवर संस्थाओं के प्रति दायित्व –

  1. चैम्बर ऑफ कॉमर्स या अन्य व्यावसायिक संघों की सदस्यता ग्रहण करना
  2. इन संस्थाओं की प्रकाशित सामग्री का उपयोग करना
  3. इन संस्थाओं/संघों की आचार संहिता का पालन करना
  4. इनकी परियोज़नाओं में मौद्रिक सहयोग देना
  5. इनकी बैठकों में सहभागिता निभाते हुए विचार – विमर्श करना।

10. स्थानीय जन समुदाय के प्रति दायित्व इस वर्ग के प्रति प्रबन्ध के निम्न दायित्व होते हैं –

  1. प्राकृतिक सम्पदा की सुरक्षा करना
  2. वायु, जल, ध्वनि प्रदूषण को रोकना
  3. स्थानीय जन समुदाय के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना
  4. जन कल्याणकारी संस्था, अस्पताल, स्कूल, धर्मशाला आदि की स्थापना करना वे उनको सहयोग करना
  5. महिलाओं कमजोर वर्ग, विकलांगों को सहायता प्रदान करना
  6. स्थानीय समुदाय की परम्पराओं, नियमों का पालन करना
  7. स्थानीय जनसमुदाय की विभिन्न स्तरों पर मदद करना
  8. स्थानीय जन समुदाय से विशेष प्रकार का लगाव रखना।

11. सरकार के प्रति दायित्व – प्रत्येक प्रबन्ध एक निगमीय नागरिक है अतः प्रबंन्ध के सरकार के प्रति निम्न उत्तरदायित्व सृजित होते हैं –

  1. सभी सरकारी नियम व कानूनों की पालना करना
  2. सरकार की नीतियों के अनुरूप व्यवसाय की संचालन करना
  3. व्यावसायिक उत्पादन क्षमता व लाइसेंस क्षमता का पूर्ण उपयोग करना
  4. राष्ट्रीय हित में देश के आर्थिक संसाधनों का विदोहन करना
  5. सरकारी क्षेत्र व प्रक्रिया को भ्रष्ट नहीं करना
  6. करों का सही समय पर भुगतान करना तथा सरकार को सही विवरण प्रस्तुत करना
  7. राष्ट्रीय कार्यक्रम अल्पबचत, परिवार नियोजन आदि व सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में सहयोग करना।

12. विश्व के प्रति दायित्व – आज व्यवसाय का स्वरूप राष्ट्रीय न रहकर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है अतः प्रबन्धकों का दायित्व सम्पूर्ण विश्व के प्रति भी उत्पन्न हो गया है जो निम्न प्रकार है –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय की अभिवृद्धि में सहयोग करना
  2. अन्य राष्ट्रों की व्यावसायिक नीति तथा घरेलू मामलों में हस्तक्षेप न करना
  3. अन्तर्राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी व तकनीकी को अपनाना
  4. अन्तर्राष्ट्रीय व्यावसायिक नैतिकता व संहिताओं का पालन करना
  5. अन्य देशों के सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों का आदर करना
  6. पिछड़े राष्ट्रों में उद्योगों की स्थापना करना
  7. विकासशील व पिछड़े राष्ट्रों को तकनीकी व प्रबन्धकीय सुविधा उपलब्ध करवाना
  8. न्यायोचित व्यवहार, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा व सौहार्दपूर्ण संबंधों पर ध्यान देना।

इस प्रकार प्रबन्ध का सामाजिक उत्तरदायित्व विभिन्न वर्गों के प्रति व्यापक है।

प्रश्न 3.
कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्वों के लिये किये गये प्रावधानों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व के लिये बनाये गये प्रावधान निम्न प्रकार हैं –
(1) लागू होना – निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व संबंधी प्रावधान प्रत्येक ऐसी कम्पनी पर लागू होते हैं जिस कम्पनी की शुद्ध सम्पत्ति किसी वित्तीय वर्ष में Rs.500 करोड़ या अधिक या बिक्री Rs.1000 करोड़ या अधिक या शुद्ध लाभ Rs.5 करोड़ या इससे अधिक हो। उस कम्पनी को अपने संचालकों की एक निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व समिति का गठन करना होगा इस कमेटी में कम से कम 3 संचालक होंगे। इनमें से कम से कम एक स्वतंत्र संचालक होना चाहिए। {धारा 135 (1)}

(2) संचालकों की रिपोर्ट में प्रेषित/ व्यक्त करना – कम्पनी बनायी गयी निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व समिति के गठन की जानकारी कम्पनी के संचालक मण्डल की रिपोर्ट में सम्मिलित करनी होगी। {धारा 135 (2)}

(3) समिति के कार्य – निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व समिति निम्न कार्य करेगी –

  1. एक निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति का निर्धारण करेगी जो इस अधिनियम के अनुसूची 7 में बताये गये क्रियाकलापों में से कम्पनी द्वारा किये गये क्रियाकलापों के संबंध में संचालक मण्डल की सिफारिश करेगी।
  2. इन क्रियाकलापों पर व्यय की राशि निर्धारित करेगी।
  3. कम्पनी द्वारा निर्धारित निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति की मानीटरिंग करेगी। {धारा 135 (3)}

(4) संचालक मण्डल द्वारा कार्यवाही – संचालक मण्डल निम्न कार्यवाही करेगा –

  1. संचालक मण्डल समिति द्वारा की गयी सिफारिश पर विचार करेगी तथा कम्पनी की निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति का अनुमोदन करेगा तथा अपनी रिपोर्ट में निर्धारित तरीके से इस नीति को प्रकट करेगा। इसे कम्पनी के वेबसाइट पर भी डाला जायेगा।
  2. संचालक मण्डले यह भी सुनिश्चित करेगा कि कम्पनी की निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति में क्रियाकलाप कम्पनी द्वारा किये जायें। {धारा 135 (4)}

(5) खर्च करना – कम्पनी को अपने प्रत्येक वित्तीय वर्ष के ठीक पहले के तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभों का कम से कम 2 प्रतिशत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व पर खर्च करना होगा। संचालक मण्डल यह सुनिश्चित करेगा कि यह राशि निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति के अनुसरण में खर्च की जाये। {धारा 135 (5)}

(6) स्थानीय क्षेत्र को प्राथमिकता – कम्पनी निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति के अन्तर्गत निष्पादित किये जाने वाले क्रियाकलापों में उस स्थानीय क्षेत्र को प्राथमिकता देनी होगी जिस क्षेत्र में कम्पनी कार्यरत है {धारा 135 (5)}

(7) असफलता का उल्लेख – यदि कोई कम्पनी निर्धारित राशि को निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति के क्रियाकलापों में खर्च करने में असफल रहती है तो उसे अपनी संचालक मण्डल की रिपोर्ट में इसके कारणों का उल्लेख करना होगी। {धारा 135 (5)}

(8) शुद्ध लाभ की गणना – निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व की गतिविधियों पर व्यय की जाने वाली राशि के लिये शुद्ध लाभ की गणना कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा शुद्धलाभ प्रावधानों के अनुसार की जायेगी। {धारा 135 (5)}

(9) अन्य प्रावधान – धारा 135 के अन्तर्गत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व की नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए (निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व) नियम 2014 बनाये गये जो 1 अप्रैल, 2014 से लागू हैं। नियमों के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं –

  1. निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व सम्बन्धी प्रावधान प्रत्येक कम्पनी, उसकी सहायक या सूत्रधारी कम्पनी तथा ऐसी प्रत्येक विदेशी कम्पनी पर भी लागू होते हैं जिसकी शाखा यो परियोजना कार्यालय भारत में स्थित है।
  2. एक कम्पनी सी एस आर गतिविधियों या कार्यकलापों के निष्पादन में अन्य कम्पनियों के साथ मिलकर भी कार्य कर सकती है लेकिन इसका उसे अपनी सी एस आर कमेटी से अनुमोदन कराना होगा।
  3. निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति के अन्तर्गत केवल भारत में किये जाने वाले क्रियाकलापों के व्यय को ही सम्मिलित किया जायेगा।
  4. ऐसे क्रियाकलाप जो कम्पनी के केवल कर्मचारियों एवं उनके परिवार के लाभ के लिये किये जाते है। उन्हें सी एस आर गतिविधियों में सम्मिलित नहीं किया जायेगी।
  5. गैर सूचीबद्ध कम्पनी या निजी कम्पनी को सी एस आर समिति में स्वतंत्र संचालक की नियुक्ति की आवश्यकता नहीं होगी।
  6. यदि किसी निजी कम्पनी में केवल 02 ही संचालक हैं तो वे ही सी एस आर कमेटी के सदस्य माने जायेंगे।
  7. सी एस आर कमेटी निगमीय सामाजिक उत्तर दायित्व नीति के क्रियाकलापों के निष्पादन के संबंध में पारदर्शी निगरानी व्यवस्था कायम करेगी।
  8. कम्पनी के संचालक मण्डल को संम्बन्धित वित्तीय वर्ष के बाद अपनी सी एस आर गतिविधियों के संबंध में एक वार्षिक प्रतिवेदन देना होगा।
  9. सी एस आर गतिविधियों के व्यय के बाद कोई राशि बचती है तो उसे कम्पनी के व्यावसायिक लाभ का भाग नहीं माना जायेगा।
  10. कम्पनी को अपनी सी एस आर नीति इसके अन्तर्गत किये गये क्रियाकलापों का विवरण तरीके से अपनी वेबसाइट पर प्रकट करना होगा।

RBSE Class 12 Business Studies Chapter 14 अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व के लिये बनाये गये प्रावधान कौन सी कम्पनियों या व्यवसायों पर किस धारा के तहत लागू होते हैं?
उत्तर:
निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व संबंधी प्रावधान प्रत्येक ऐसी कम्पनी पर लागू होते हैं जिस कम्पनी की शुद्ध सम्पत्ति किसी वितीय वर्ष में Rs.500 करोड़ या उससे अधिक या बिक्री Rs.1000 करोड़ या उससे अधिक या शुद्ध लाभ Rs.5 करोड़ या इससे अधिक हो। उस कम्पनी को अपने संचालकों की एक निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व समिति का गठन करना होगा। इस कमेटी में कम से 03 संचालक होंगे इनमें से कम से कम एक स्वतंत्र संचालक होना चाहिये। उपरोक्त प्रावधान कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 की उपधारा (1) के अनुसार तय किये गये हैं।

प्रश्न 2.
कम्पनी को निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति के क्रियाकलापों में किस लाभ का कितना प्रतिशत न्यूनतम खर्च करना अनिवार्य है। ऐसे लाभों की गणना कैसे की जाती है एवं प्रावधान की धारा का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कम्पनी को अपने प्रत्येक वित्तीय वर्ष के ठीक पहले के तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभों का कम से कम 02 प्रतिशत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व गतिविधियों या क्रियाकलापों पर खर्च करना अनिवार्य है। यह प्रावधान कम्पनी अधिनियम, 2013 के अन्तर्गत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्वों के लिये धारा 135 की उपधारा 5 के तहत किया गया है।

प्रश्न 3.
कम्पनी अधिनियम, 2013 में निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्वों के लिये अधिनियम की धारा 135(3) में क्या कहा गया है?
उत्तर:
धारा 135(3) के अन्तर्गत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व समिति के कार्यों का उल्लेख किया गया है जो निम्न प्रकार हैं –

  1. समिति एक निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति का निर्धारण करेगी जो इस अधिनियम के अनुसूची 7 में बताये गये क्रियाकलापों में से कम्पनी द्वारा किये गये क्रियाकलापों के संबंध में संचालक मण्डल की सिफारिश करेगी।
  2. इन क्रियाकलापों पर व्यय की राशि निर्धारित करेगी।
  3. कम्पनी द्वारा निर्धारित निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति की मानीटरिंग करेगी।

प्रश्न 4.
प्रबन्ध को ऋणदाताओं के प्रति उत्तरदायित्व को संक्षेप में बताइए।
उत्तर:
ऋणदाताओं के प्रति दायित्व – व्यवसाय में वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति में ऋणदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है अतः प्रबन्धक को उनके प्रति भी निम्न दायित्वों को पूरा करना चाहिये

  1. ऋणराशि का सदुपयोग करना
  2. ऋण प्राप्ति एवं ब्याज की उचित शर्त रखना
  3. मूल पूँजी का ब्याज समय पर भुगतान करना
  4. बन्धक रखी गयी सम्पत्ति की पूर्ण सुरक्षा करना
  5. ऋणदाताओं को इच्छित सूचनाएँ उपलब्ध कराना
  6. ऋणदाताओं के प्रति मधुर सम्बन्ध बनाये रखना।