पत्रकारिता के विविध आयाम 11

पाठ के इस खंड में हम  पढ़ेंगे और जानेंगे

  • पत्रकारिता
    पत्रकारिता क्या है?
  • समाचार
    समाचार की कुछ परिभाषाएँ
    समाचार क्या है?
  • समाचार के तत्त्व
  • संपादन
    संपादनके सिद्धांत
  • पत्रकारिता के अन्य आयाम
    संपादकीय
    फोटो पत्रकारिता
    कार्टून कोना
    रेखांकन और कार्टोग्राफ़ी
  • पत्रकारिता के प्रमुख प्रकार
    खोजपरक पत्रकारिता
    विशेषीकृत पत्रकारिता
    एडवोकेसी पत्रकारिता
    वैकल्पिक पत्रकारिता
  • समाचार माध्यमों के मौजूदा रुझान

पत्रकारिता-एक परिचय
पत्रकारिता का संबंध सूचनाओं को संकलित और संपादित करके आम पाठकों तक पहुँचाने से है। लेकिन हर सूचना समाचार नहीं है। पत्रकार कुछ ही घटनाओं, समस्याओं और विचारों को समाचार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। किसी घटना के समाचार बनने के लिए उसमें नवीनता, जनरुचि, निकटता, प्रभाव जैसे तत्वों का होना जरूरी है।

  • पत्रकारिता समाचारों के संपादन संबंधी सिद्धांतों पर विश्वसनीयता अर्जित करती है।
  • पत्रकारिता में संपादकीय, लेख, कार्टून और फोटो भी प्रकाशित होते हैं।
  • पत्रकारिता कई प्रकार की होती है।

पत्रकारिता
अपने आसपास की चीजों, घटनाओं और लोगों के बारे में ताजा जानकारी रखना मनुष्य का सहज स्वभाव है। उसमें जिज्ञासा का भाव बहुत प्रबल होता है। यही जिज्ञासा समाचार और व्यापक अर्थ में पत्रकारिता का मूल तत्व है। जिज्ञासा नहीं रहेगी, तो समाचार की भी जरूरत नहीं रहेगी। पत्रकारिता का विकास इसी सहज जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश के रूप में हुआ। वह आज भी इसी मूल सिद्धांत के आधार पर काम करती है।

पत्रकारिता क्या है?
हम अपने पास-पड़ोस, शहर, राज्य और देश-दुनिया के बारे में जानना चाहते हैं। ये सूचनाएँ हमारे दैनिक जीवन के साथ-साथ पूरे समाज को प्रभावित करती हैं। आज देश-दुनिया में जो कुछ हो रहा है, उसकी अधिकांश जानकारी हमें समाचार माध्यमों से मिलती है। समाचार संगठनों में काम करने वाले पत्रकार देश-दुनिया में घटने वाली घटनाओं को समाचार के रूप में परिवर्तित करके हम तक पहुँचाते हैं। इसके लिए वे रोज सूचनाओं का संकलन करते हैं और उन्हें समाचार के प्रारूप में ढालकर प्रस्तुत करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को ही पत्रकारिता कहते हैं।

समाचार की कुछ परिभाषाएँ

  • प्रेरक और उत्तेजित कर देने वाली हर सूचना समाचार है।
  • समय पर दी जाने वाली हर सूचना समाचार का रूप धारण कर लेती है।
  • किसी घटना की रिपोर्ट ही समाचार है।
  • समाचार जल्दी में लिखा गया इतिहास है?

समाचार क्या है?
समाचार माध्यम कुछ लोगों के लिए नहीं, बल्कि अपने हजारों-लाखों पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों के लिए काम करते हैं। स्वाभाविक है कि वे समाचार के रूप में उन्हीं घटनाओं, मुद्दों और समस्याओं को चुनते हैं, जिन्हें जानने में अधिक-से-अधिक लोगों की रुचि होती है। यहाँ हमारा आशय उस तरह के समाचारों से है, जिनका किसी-न-किसी रूप में सार्वजनिक महत्व होता है। ऐसे समाचार अपने समय के विचार, घटना और समस्याओं के बारे में लिखे जाते हैं। ये समाचार ऐसी सम-सामयिक घटनाओं, समस्याओं और विचारों पर आधारित होते हैं, जिन्हें जानने की अधिक-से-अधिक लोगों में दिलचस्पी होती है और जिनका अधिक-से-अधिक लोगों के जीवन पर प्रभाव पड़ता है।

इसके बावजूद ऐसा कोई फ़ार्मूला नहीं है, जिसके आधार पर यह कहा जाए कि यह घटना समाचार है और यह नहीं। पत्रकार और समाचार संगठन ही किसी भी समाचार के चयन, आकार और उसकी प्रस्तुति का निर्धारण करते हैं। यही कारण है कि समाचारपत्रों और समाचार चैनलों में समाचारों के चयन और प्रस्तुति में इतना फ़र्क दिखाई पड़ता है। एक समाचारपत्र में एक समाचार मुख्य समाचार (लीड स्टोरी) हो सकता है और किसी अन्य समाचारपत्र में वही समाचार भीतर के पृष्ठों पर कहीं एक कॉलम का समाचार हो सकता है।

किसी घटना, समस्या और विचार में कुछ ऐसे तत्व होते हैं, जिनके होने पर उसके समाचार बनने की संभावना बढ़ जाती है। उन तत्वों को लेकर समाचार माध्यमों में एक आम सहमति है। इस चर्चा के उपरांत अब हम समाचार को इस तरह परिभाषित कर सकते हैं-

समाचार किसी भी ऐसी ताजा घटना, विचार या समस्या की रिपोर्ट है, जिसमें अधिक से अधिक लोगों की मचि हो और जिसका अधिक से अधिक लोगों पर प्रभाव पड़ रहा हो। समाचार के तत्त्व

सामान्य तौर पर किसी भी घटना, विचार और समस्या से जब समाज के बड़े तबके का सरोकार हो तो हम यह कह सकते हैं कि यह समाचार बनने के योग्य है। लेकिन किसी घटना, विचार और समस्या के समाचार बनने की संभावना तब बढ़ जाती है, जब उनमें निम्नलिखित में से कुछ, अधिकांश या सभी तत्व शामिल हों

  1. नवीनता
  2. निकटता
  3. प्रभाव
  4. जनरुचि
  5. टकराव या संघर्ष
  6. महत्त्वपूर्ण लोग
  7. उपयोगी जानकारियाँ
  8. अनोखापन
  9. पाठकवर्ग
  10. नीतिगत ढाँचा

1. नवीनता-किसी भी घटना, विचार या समस्या के समाचार बनने के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह नया यानी ताजा हो। कहा भी जाता है, ‘न्यू’ है इसलिए ‘न्यूज’ है। घटना जितनी ताजा होगी, उसके समाचार बनने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। इस प्रकार समाचार वही है, जो ताजा घटना के बारे में जानकारी देता है। एक घटना को एक समाचार के रूप में किसी समाचार संगठन में स्थान पाने के लिए, इसका सही समय पर सही स्थान यानी समाचार कक्ष में पहुँचना आवश्यक है। एक दैनिक समाचारपत्र के लिए आमतौर पर पिछले 24 घंटों की घटनाएँ समाचार होती हैं। एक चौबीस घंटे के टेलीविजन और रेडियो चैनल के लिए तो समाचार जिस तेजी से आते हैं, उसी तेजी से बासी भी होते चले जाते हैं। एक दैनिक समाचारपत्र के लिए वे घटनाएँ सामयिक हैं, जो कल घटित हुई हैं। आमतौर पर एक दैनिक समाचारपत्र की अपनी एक डेडलाइन (समय-सीमा) होती है जब तक के समाचारों को वह कवर कर पाता है। मसलन एक प्रात:कालीन दैनिक समाचारपत्र रात 12 बजे तक के समाचार कवर करता है तो अगले दिन के संस्करण के लिए 12 बजे रात से पहले के चौबीस घंटे के समाचार सामयिक होंगे। लेकिन अगर द्रवितीय विश्वयुद्ध या ऐसी किसी अन्य ऐतिहासिक घटना के बारे में आज भी कोई नई जानकारी मिलती है, जिसके बारे में हमारे पाठकों को पहले जानकारी नहीं थी तो निश्चय ही यह उनके लिए समाचार है।

2. निकटता-किसी भी समाचार संगठन में किसी समाचार के महत्व का मूल्यांकन अर्थात् उसे समाचारपत्र या बुलेटिन में शामिल किया जाएगा या नहीं, इसका निर्धारण इस आधार पर भी किया जाता है कि वह घटना उसके कवरेज क्षेत्र और पाठक/श्रोता/दर्शक समूह के कितने करीब हुई है? हर घटना का समाचारीय महत्व काफ़ी हद तक उसकी स्थानीयता से भी निर्धारित होता है।

3. प्रभाव-किसी घटना के प्रभाव से भी उसका समाचारीय महत्व निर्धारित होता है। किसी घटना की तीव्रता का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि उससे कितने सारे लोग प्रभावित हो रहे हैं या कितने बड़े भू-भाग पर उसका असर हो रहा है। किसी घटना से जितने अधिक लोग प्रभावित होंगे, उसके समाचार बनने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। जाहिर है जिन घटनाओं का पाठकों के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ रहा हो, उसके बारे में जानने की उनमें स्वाभाविक इच्छा होती है। जैसे सरकार के किसी निर्णय से अगर सिर्फ़ सौ लोगों को लाभ हो रहा हो तो यह उतना बड़ा समाचार नहीं है जितना कि उससे लाभान्वित होने वाले लोगों की संख्या अगर एक लाख हो।

4. जनरुचि-किसी विचार, घटना और समस्या के समाचार बनने के लिए यह भी आवश्यक है कि लोगों की उसमें दिलचस्पी हो। वे उसके बारे में जानना चाहते हों। कोई भी घटना समाचार तभी बन सकती है, जब पाठकों या दर्शकों का एक बड़ा तबका उसके बारे में जानने की रुचि रखता हो। हर समाचार संगठन का अपना एक लक्ष्य समूह (टार्गेट ऑडिएंस) होता है और वह समाचार संगठन अपने पाठकों या श्रोताओं की रुचियों को ध्यान में रखकर समाचारों का चयन करता है। आज मीडिया लोगों की रुचियों में परिवर्तन लाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है।

5. टकराव या संघर्ष-किसी घटना में टकराव या संघर्ष का पहलू होने पर उसके समाचार के रूप में चयन की संभावना बढ़ जाती है क्योंकि लोगों में टकराव या संघर्ष के बारे में जानने की स्वाभाविक दिलचस्पी होती है। इसकी वजह यह है कि टकराव या संघर्ष का उनके जीवन पर सीधा असर पड़ता है। वे उससे बचना चाहते हैं और इसलिए उसके बारे में जानना चाहते हैं। यही कारण है कि युद्ध और सैनिक टकराव के बारे में जानने की लोगों में सर्वाधिक रुचि होती है। लेकिन टकराव का अर्थ केवल खून-खराबा या खूनी संघर्ष ही नहीं है बल्कि खेलों में जब दो टीमें आपस में मुकाबला करती हैं या चुनावों में राजनीतिक दलों के बीच राजनीतिक संघर्ष होता है तो उसे भी जानने में लोगों की उतनी ही दिलचस्पी होती है।

6. महत्वपूर्ण लोग-मशहूर और जाने-माने लोगों के बारे में जानने की आम पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं में स्वाभाविक इच्छा होती है। कई बार किसी घटना से जुड़े लोगों के महत्वपूर्ण होने के कारण भी उसका समाचारीय महत्व बढ़ जाता है। लोग यह जानना चाहते हैं कि मशहूर लोग उस मुकाम तक कैसे पहुँचे, उनका जीवन कैसा होता है और विभिन्न मुद्दों पर उनके क्या विचार हैं। लेकिन कई बार समाचार माध्यम महत्वपूर्ण लोगों की खबर देने के लोभ में उनके निजी जीवन की सीमाएँ लाँघ जाते हैं। यही नहीं. महत्वपूर्ण लोगों के बारे में जानकारी देने के नाम पर कई बार समाचार माध्यम अफ़वाहें और कोरी गप प्रकाशित-प्रसारित करते दिखाई पड़ते हैं।

7. उपयोगी जानकारियाँ-अनेक ऐसी सूचनाएँ भी समाचार मानी जाती हैं, जिनका समाज के किसी विशेष तबके के लिए खास महत्व हो सकता है। ये लोगों की तात्कालिक उपयोग की सूचनाएँ भी हो सकती हैं। मसलन स्कूल कब खुलेंगे. किसी खास कॉलोनी में बिजली कब बंद रहेगी, पानी का दबाव कैसा रहेगा, वहाँ का मौसम कैसा रहेगा, आदि। ऐसी सूचनाओं का हमारे रोजमर्रा के जीवन में काफ़ी उपयोग होता है और इसलिए उन्हें जानने में आम लोगों की सहज दिलचस्पी होती है।

8. अनोखापन-निश्चय ही, अनहोनी घटनाएँ समाचार होती है। लोग इनके बारे में जानना चाहते हैं। लेकिन समाचार मीडिया को इस तरह की घटनाओं के संदर्भ में काफ़ी सजगता बरतनी चाहिए अन्यथा कई मौकों पर यह देखा गया है कि इस तरह के समाचारों ने लोगों में अवैज्ञानिक सोच और अंधविश्वास को जन्म दिया है।

9. पाठकवर्ग-समाचार संगठन समाचारों का चुनाव करते हुए अपने पाठकवर्ग की रुचियों और जरूरतों का विशेष ध्यान रखते हैं। किसी समाचारीय घटना का महत्व इससे भी तय होता है कि किसी खास समाचार का ऑडिएंस कौन है और उसका आकार कितना बड़ा है। इन दिनों अमीरों और मध्यम वर्ग में अधिक पढ़े जाने वाले समाचारों को ज्यादा महत्व मिल रहा है। इसकी वजह यह है कि विज्ञापनदाताओं की इन वर्गों में ज्यादा रुचि होती है। लेकिन इस वजह से समाचार माध्यमों में गरीब और कमजोर वर्ग के पाठकों और उनसे जुड़ी खबरों को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

10. नीतिगत ढाँचा-विभिन्न समाचार संगठनों की समाचारों के चयन और प्रस्तुति को लेकर एक नीति होती है। इस नीति को ‘संपादकीय नीति’ भी कहते हैं। संपादकीय नीति का निर्धारण संपादक या समाचार संगठन के मालिक करते हैं। समाचार संगठन, समाचारों के चयन में अपनी संपादकीय नीति का भी ध्यान रखते हैं।

समाचार के उदाहरण

पहली बार खोपड़ी का प्रतिरोपण

ह्यूस्टन, एजेंसी
अंग प्रतिरोपण के क्षेत्र में अमेरिकी डॉक्टरों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने पहली बार मानव खोपड़ी और सिर की त्वचा का प्रतिरोपण किया है। डॉक्टरों के मुताबिक, जेम्स बॉयसन नामक व्यक्ति का कैंसर के इलाज के दौरान खोपड़ी में गहरे जख्म बन गए थे, जिसके बाद उन्होंने उसकी खोपड़ी का प्रतिरोपण करने का फैसला किया। अमेरिका के एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर और ह्यूस्टन मेथोडिस्ट अस्पताल ने गुरुवार को मीडिया को इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अस्पताल में 22 मई को 55 वर्षीय जेम्स बॉयसन की खोपड़ी और सिर की त्वचा का प्रतिरोपण किया गया था। इस जटिल ऑपरेशन को दर्जनों डॉक्टरों ने 15 घंटे में अंजाम दिया। अस्पताल की ओर से जारी तस्वीर में बॉयसन के सिर के ऊपर टांके दिखाई दे रहे हैं। ये टांके उनके कानों से लगभग ढाई सेमी की ऊँचाई पर हैं, जहाँ खोपड़ी और त्वचा को जोड़ा गया है।

गिरगिट की तरह छिप सकेगाइंसान

वाशिंगटन एजेंसी
वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक तैयार की है, जो पूरी तरह शरीर का रंग बदल देगी। इस रंग की मदद से सैनिक खुद | को छिपाने वाला आवरण बदल सकते हैं।
सेंट्रल फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में भारतीय मूल के प्रोफेसर देवाशीष चंदा व उनकी टीम ने यह तकनीक तैयार की है। इस तकनीक का इस्तेमाल सामान्य कपड़ों को रंग बदलने लायक बनाने या कम बिजली से चलने वाले ई-रीडर स्क्रीन बनाने में भी हो सकता है।
लचीला है डिस्पले : तकनीक का डिसप्ले लचीला है। यह ऐसी लचीली सतह है, जो कुछ प्रकाश सोखती है व बाकी को परावर्तित कर देती है। यह लाल, हरे व नीले रंग के पूरे सम्मिश्रण वाले रंग पैदा करती है। इससे सैनिकों को दुश्मनों से छिपने में मदद मिल सकती है।

संपादन

संपादन का अर्थ है, किसी सामग्री से उसकी अशुद्धयों को दूर करके उसे पठनीय बनाना। एक उपसंपादक अपने रिपोर्टर की खबर को ध्यान से पढ़ता है और उसकी भाषा-शैली, व्याकरण, वर्तनी तथा तथ्य संबंधी अशुद्धयों को दूर करता है। वह उस खबर को महत्व के अनुसार काटता-छाँटता है और उसे कितनी और कहाँ जगह दी जाए, यह तय करता है। इसके लिए वह संपादन के कुछ सिद्धांतों का पालन करता है। संपादन के सिदधांत-संपादन के मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित हैं-

  • तथ्यों की शुद्धता (एक्युरेसी)
  • वस्तुपरकता (ऑब्जेक्टीविटी)
  • निष्पक्षता (फेयरनेस)
  • संतुलन (बैलेंस)
  • स्रोत । (सोर्सिग-एट्रीब्यूशन)

1. तथ्यों की शुद्धता या तथ्यपरकता (एक्यूरेसी)-एक आदर्श रूप में मीडिया और पत्रकारिता यथार्थ या वास्तविकता का प्रतिबिंब है। इस तरह एक पत्रकार समाचार के रूप में यथार्थ को पेश करने की कोशिश करता है।
यथार्थ को उसकी संपूर्णता में प्रतिबिंबित करने के लिए आवश्यक है कि ऐसे तथ्यों का चयन किया जाए, जो उसका संपूर्णता में प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन समाचार में हम किसी भी यथार्थ को अत्यंत सीमित चयनित सूचनाओं और तथ्यों के माध्यम से ही व्यक्त करते हैं। इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि किसी भी विषय के बारे में समाचार लिखते वक्त हम किन सूचनाओं और तथ्यों का चयन करते हैं और किन्हें छोड़ देते हैं। चुनौती यही है कि ये सूचनाएँ और तथ्य सबसे अहम हों और संपूर्ण घटना का प्रतिनिधित्व करते हों। तथ्य बिलकुल सटीक और सही होने चाहिए और उन्हें तोड़ा-मरोड़ा नहीं जाना चाहिए।

2. वस्तुपरकता (ऑब्जेक्टीविटी)-वस्तुपरकता को भी तथ्यपरकता से आँकना आवश्यक है। वस्तुपरकता और तथ्यपरकता में काफी समानता है, लेकिन दोनों के बीच के अंतर को समझना जरूरी है। एक जैसे होते हुए भी ये दोनों अलग विचार हैं। तथ्यपरकता का संबंध जहाँ अधिकाधिक तथ्यों से है वहीं वस्तुपरकता का संबंध इस बात से है कि कोई व्यक्ति तथ्यों को कैसे देखता है? किसी विषय या मुद्दे के बारे में हमारे मस्तिष्क में पहले से बनी हुई छवियाँ समाचार मूल्यांकन की हमारी क्षमता को प्रभावित करती हैं और हम इस यथार्थ को उन छवियों के अनुरूप देखने का प्रयास करते हैं।

3. निष्पक्षता (फेयरनेस)-एक पत्रकार के लिए निष्पक्ष होना भी बहुत जरूरी  है। उसकी निष्पक्षता से ही उसके समाचार संगठन की साख बनती है। यह साख तभी बनती है जब समाचार संगठन बिना किसी का पक्ष लिए सच्चाई | सामने लाते हैं। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इसकी राष्ट्रीय और  सामाजिक जीवन में अहम भूमिका है। लेकिन निष्पक्षता का अर्थ तटस्थता नहीं है। इसलिए पत्रकारिता सही और गलत, अन्याय और न्याय जैसे मसलों के बीच तटस्थ नहीं हो सकती बल्कि वह निष्पक्ष होते हुए भी सही और न्याय के साथ होती है।

4. संतुलन (बैलेंस)-निष्पक्षता की अगली कड़ी संतुलन है। प्राय: मीडिया पर आरोप लगाया जाता है कि समाचार कवरेज संतुलित नहीं है यानी वह किसी एक पक्ष की ओर झुका है। आमतौर पर समाचार में संतुलन की आवश्यकता वहीं पड़ती है जहाँ किसी घटना में अनेक पक्ष शामिल हों और उनका आपस में किसी-न-किसी रूप में टकराव हो। उस स्थिति में संतुलन का तकाजा यही है कि सभी संबद्ध पक्षों की बात समाचार में अपने-अपने समाचारीय वजन के अनुसार स्थान पाए।

5. स्त्रोत-हर समाचार में शामिल की गई सूचना और जानकारी का कोई स्रोत होना आवश्यक है। किसी भी समाचार संगठन के स्रोत होते हैं और फिर उस समाचार संगठन का पत्रकार जब सूचनाएँ एकत्रित करता है, तो उसके अपने भी स्रोत होते हैं। इस तरह किसी भी दैनिक समाचारपत्र के लिए पीटीआई (भाषा), यूएनआई (यूनीवार्ता) जैसी समाचार एजेंसियाँ और स्वयं अपने ही संवाददाताओं और रिपोर्टरों का तंत्र समाचारों का स्रोत होता है। लेकिन चाहे समाचार एजेंसी हो या समाचारपत्र, इनमें काम करने वाले पत्रकारों के भी अपने समाचार-स्रोत होते हैं।

पत्रकारिता के विविध आयाम
समाचारपत्र पढ़ते समय पाठक हर समाचार से एक ही तरह की जानकारी की अपेक्षा नहीं रखता। कुछ घटनाओं के मामले में वह उसका विवरण विस्तार से पढ़ना चाहता है तो कुछ अन्य के संदर्भ में उसकी इच्छा यह जानने की होती है कि घटना के पीछे क्या है? उसकी पृष्ठभूमि क्या है? उस घटना का उसके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा और इससे उसका जीवन तथा समाज किस तरह प्रभावित होगी? समय, विषय और घटना के अनुसार पत्रकारिता में लेखन के तरीके बदल जाते हैं। यही बदलाव पत्रकारिता में कई नए आयाम जोड़ता है। समाचार के अलावा विचार, टिप्पणी, संपादकीय, फ़ोटो और कार्टून पत्रकारिता के अहम हिस्से हैं। समाचारपत्र में इनका विशेष स्थान और महत्व है। इनके बिना कोई समाचारपत्र स्वयं को संपूर्ण नहीं कह सकता।

संपादकीय
इस पृष्ठ को समाचारपत्र का सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठ माना गया है। इस पृष्ठ पर अखबार विभिन्न घटनाओं और समाचारों पर अपनी राय रखता है। इसे ‘संपादकीय’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ महत्वपूर्ण , मुद्दों पर अपने विचार लेख के रूप में प्रस्तुत करते हैं। आमतौर पर संपादक के नाम पत्र भी इसी पृष्ठ पर प्रकाशित किए जाते हैं। वह घटनाओं पर आम लोगों की टिप्पणी होती है। समाचारपत्र उसे महत्वपूर्ण मानते हैं।

संपादकीय के उदाहरण

मणिपुर में आतंकी हमला

मणिपुर में जिस आतंकवादी हमले में 20 सैनिक मारे गए हैं, वह पिछले लंबे दौर में उत्तर-पूर्वी भारत का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला है। कई आतंकी गुटों ने मिलकर यह हमला किया है और इस तरह के हमले का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि ये गुट और ज्यादा हमलों की योजना बना रहे हों। ऐसी आशंका के लिए स्थानीय स्तर पर राज्य सरकारों को और सेना को सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे हमलों से न सिर्फ प्राणहानि होती है, बल्कि अस्थिरता और अशांति का जो माहौल बनता है, उससे आम जनता की स्थिति खराब होती है। इसके अलावा, सरकार की क्षमता में लोगों का इसका अर्थ यह कतई नहीं निकालना चाहिए कि ये आतंकवादी गुट मजबूत हो रहे हैं।

इसका अर्थ शायद यह है कि वे ज्यादा कमजोर हो रहे हों और अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए ऐसी वारदात कर रहे हों। यह वादात ऐसे वक्त पर हुई है, जब प्रतिबंधित गुटों का भारत सरकार के साथ सैनिक कार्रवाई रोकने का समझौता चल रहा है। इनमें से कुछ गुट पड़ोस के म्यांमार के जंगलों में रहते हैं, जहाँ से भारत की सीमा में घुसकर वे वारदात करते हैं। जमीनी स्तर पर इन गुटों की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है और वे अपना विचारधारात्मक आधार भी खो चुके हैं।

अलगाववाद का नारा और उसके पीछे का विचार बहुत पहले ही व्यर्थ हो चुका है, मगर ज्यादातर गुट इन्हीं नारों के नाम पर सक्रिय हैं, इसलिए वे अपना कारोबार चलाए हुए हैं। सही अर्थों में ये गुट अपराधी गिरोहों में तबदील हो चुके हैं और तस्करी, अपहरण जैसे अपराधों से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। ऐसे में, अपना आतंक बनाए रखने के लिए वे एक तरफ कबीलाई रिश्तों का दोहन करते हैं और दूसरी ओर इस तरह की वारदातें करते हैं। एक बड़ी समस्या यह है कि लंबे वक्त तक भारत सरकार का पूरा ध्यान अलगाववादी आंदोलनों से निपटने में लगा रहा. इसलिए उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रशासन को दुरुस्त करना कभी प्राथमिकता नहीं रही। ऐसे में, स्थानीय सरकारें भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का शिकार रहीं। इससे आम जनता की मुश्किलें ।

बढ़ती रहीं और इन आतंकवादी गुटों का प्रभाव बना रहा। दूसरी ओर, भारत के इस हिस्से का बहुत बड़ा क्षेत्र सेना के अधीन रहा है, इसलिए स्थानीय सुरक्षा बल भी बहुत प्रभावशाली नहीं रहे। अगर स्थानीय स्तर पर प्रशासन को ज्यादा चुस्त और जवाबदेह बना दिया जाए, तो इन गुटों का बचा-खुचा प्रभाव भी खत्म हो जाएगा, जो वैसे भी तेजी से घट रहा है। ऐसी स्थिति में यह तो जरूरी ही है कि इन गुटों से सख्ती से निपटा जाए, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि स्थानीय प्रशासन को मजबूत बनाने की कोशिश की जाए। यह भी संभव है कि इन गुटों की कोशिश शांति और समझौते की प्रक्रिया को भंग करने की रही हो, क्योंकि ये गुट बुरी तरह आपस में बंटे हुए हैं और इनके कई धड़े शाँत नहीं चाहते। एक और बड़ी कोशिश म्यांमार से उन्हें खदेड़ने की होनी चाहिए।

भारत सरकार यह कोशिश कर रही है कि म्यांमार के उन इलाकों तक पहुँच आसान हो, जिनका इस्तेमाल ये गुट करते हैं। एक बड़ी योजना म्यांमार के रास्ते उत्तर-पूर्व तक सड़क बनाने की भी है। अगर ये योजनाएँ पूरी हो गई, तो इन जंगलों में इन गुटों का शरण पाना मुश्किल हो जाएगा। मदद कर सकते हैं। उत्तर-पूर्व में अलगाववाद वैचारिक रूप से खत्म हो गया है, लेकिन उसका व्यर्थ हिंसक प्रभाव अभी तक बाकी है, अब उसे खत्म करना जरूरी है।

मैगी से मोहभंग

लोकप्रिय उत्पाद मैगी में मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) और सीसे की अधिक मात्रा पाए जाने पर जितनी खलबली मची है, उसकी वजह मैगी की असाधारण लोकप्रियता है। मैगी में हानिकारक तत्वों के पाए जाने से समाज के बहुत बड़े हिस्से को सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक झटका लगा है। मैगी यूँ तो बाजार में पाए जाने वाले तमाम फास्ट फूड उत्पादों में से एक है, लेकिन उसकी स्थिति अलग इसलिए हैं कि उसने घर-घर की रसोई में अपनी जगह बना ली थी। देश में अनेक नौजवानों के लिए वह एक बड़ा सहारा थी, खासकर जो अकेले रहते हैं। कई दुर्गम पहाड़ी इलाकों में पर्यटकों के लिए सिर्फ मैगी मिलती है, क्योंकि इसका भंडारण करना और इसे पकाना बहुत आसान है। मैगी के विज्ञापनों का जोर ही ‘सिर्फ दो मिनट’ पर था, यानी इसमें सिर्फ उबलता हुआ पानी डालना है और दो मिनट में यह तैयार हो जाएगी। ज्यादातर भारतीयों को नूडल्स | खाना मैगी ने ही सिखाया. बहुत से लोग तो किसी भी किस्म के नूडल्स को मैगी ही कहते हैं।

यह भारत की कई प्रयोगशालाओं में पता चला है कि मैगी में एमएसजी और सीसे की अधिक मात्रा है और यह इसे बनाने वाली कंपनी की लापरवाही को दिखाता है। यह समझना थोड़ा मुश्किल है कि मैगी में सीसा कहाँ से आया? हो सकता है कि जो मसाले मैगी में मिलते हों, उनमें सीसा हो या जिस पानी का इस्तेमाल इसके उत्पादन में होता हो, उसका स्रोत प्रदूषित हो। हालाँकि कुछ हद तक सीसा कृषि उत्पादों में पाया जाता है, लेकिन उससे ज्यादा यह खतरनाक हो जाता है। एमएसजी की स्थिति अलग है। एमएसजी या अजीनोमोटी के सुरक्षित होने पर विवाद है और यह अंतिम फैसला नहीं हो पाया है कि स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर होता है या नहीं! लेकिन सावधानी के चलते हर जगह यह कहा जाता है कि इसका एक सीमा से ज्यादा इस्तेमाल नहीं होनी चाहिए।

हम लोग आमतौर पर मानते हैं कि मीठा, कड़वा, खट्टा, कसैला, नमकीन और तीखा, ये छह स्वाद होते हैं। लेकिन अब माना जाता है कि एक सातवां स्वाद भी होता है, जिसे ‘उमामी’ कहते हैं। जिन खानों में स्वाभाविक रूप से यह स्वाद नहीं होता, उनमें इस स्वाद के लिए अजीनोमोटो डाला जाता है। भारतीय ‘उमामी’ के बारे में ज्यादा नहीं जानते, लेकिन यह स्वाद भारतीयों में बहुत लोकप्रिय है। इसीलिए हमारे खानों में टमाटर का बड़ा महत्व है। लैटिन अमेरिका से आया यह फल यूरोप में इतना लोकप्रिय नहीं हो पाया, उसका कैचअप बनाने के आगे यूरोपीय नहीं बढ़े. लेकिन भारतीयों ने दाल, सब्जी, चटनी हर चीज में टमाटर का खूब इस्तेमाल किया। भारत में कथित चीनी खानों की लोकप्रियता का राज भी यही स्वाद है।

देश में पाँच सितारा होटल से लेकर सड़क किनारे नूडल्स और बर्गर बेचने वाले ठेले तक में अजीनोमोटो उदारता से इस्तेमाल होता है। बेशक, बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता पर सख्त नियंत्रण रखना चाहिए, लेकिन वास्तविकता यह है कि ज्यादातर कंपनियाँ जिस देश में जितनी कड़ाई हो, उतनी ही हद तक नियमों का पालन करती हैं। आमतौर पर हम अपने पर्यावरण या अपने खाने-पीने की चीजों की गुणवत्ता और शुद्धता के प्रति बहुत सतर्क नहीं हैं, तो किसी एक कंपनी के किसी एक उत्पाद की गुणवत्ता पर विवाद खड़ा करने से बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। और क्यों मैगी में गड़बड़ी पाने के लिए बाराबंकी के किसी फूड इंस्पेक्टर की सतर्कता पर निर्भर रहना पड़े. ऐसे उत्पादों ों की केंद्रीय स्तर पर नियमित जाँच का इंतजाम भला क्यों नहीं होना चाहिए, ताकि उपभोक्ता आश्वस्त रह सकें?

फोटो पत्रकारिता
फ़ोटो पत्रकारिता ने छपाई की टेक्नॉलोजी विकसित होने के साथ ही समाचार-पत्रों में अहम स्थान बना लिया है। कहा जाता है कि जो बात हजार शब्दों में लिखकर नहीं कही जा सकती. वह एक तसवीर कह देती है। फ़ोटो टिप्पणियों का असर व्यापक और सीधा होता है। टेलीविजन की बढ़ती लोकप्रियता के बाद समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में तसवीरों के प्रकाशन पर जोर और बढ़ा है।

5,ooo जवानों ने संभाली सुरक्षा
पीटीआई, नई दिल्ली
राजपथ पर योग दिवस समारोह में पीएम नरेंद्र मोदी और हजारों लोगों ने हिस्सा लिया और इसे लेकर दिल्ली में भारी है। सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। प्रधानमंत्री की सेफ्टी के लिए : खास इंतजाम किए गए थे। प्रोग्राम में योग करने वाले लोगों ! की ही तरह कपड़े पहने एसपीजी और दिल्ली पुलिस के कुछ जवान प्रधानमंत्री के आने से पहले भीड़ का हिस्सा | थे। जैसे ही प्रधानमंत्री भीड़ में घुसे, इन सुरक्षाकर्मियों ने उनके इर्द गिर्द एक घेरा बना लिया! 霧 64 साल के मोदी के साथ मंच पर योग गुरु रामदेव मौजूद | थे। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया और उपराज्यपाल नजीब जग ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। पुलिस के मुताबिक लगभग पाँच हजार सुरक्षाकर्मी हथियारों के साथ कार्यक्रम में मौजूद लोगों की हिफाजत कर रहे थे। इसके लिए ट्रैफिक रूट भी डायवर्ट किए गए थे।

‘अार-पार’ रहे केजरीवाल और नजीब जंग

पीटीआई, नई दिल्ली
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-राज्यपाल नजीब जग राजपथ पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह में शामिल हुए, मगर दोनों ने एक-दूसरे से दूरी बनाए रखी। दोनों ने राजपथ के अलग-अलग छोर पर बैठकर योग किया। केजरीवाल और जग के बीच हाल के दिनों में कई मुद्दों पर टकराव देखने को मिला है। राजपथ पर केजरीवाल उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के साथ मौजूद थे और उन्होंने जंग से दूरी बनाए रखी। हालिया टकराव को देखते हुए एक स्थान पर दोनों की मौजूदगी को लेकर खासी दिलचस्पी थी। इस साल फरवरी में मुख्यमंत्री बनने के बाद प्राकृतिक उपचार करा चुके केजरीवाल अपने सहयोगी सिसोदिया के साथ आसन करते देखे गए। जग सड़क की दूसरी ओर बैठे थे, हालाँकि इस दौरान उनकी केजरीवाल से मुलाकात या बातचीत नहीं हुई। केजरीवाल ने कहा, ‘योग को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए। यह शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक एकाग्रता के लिए है।’ दिल्ली की आप सरकार ने योग दिवस के मौके पर किसी कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया। उसने कहा था कि जब दिल्ली में एक बड़ा आयोजन हो रहा है तो फिर दूसरे की कोई जरूरत नहीं है।

अपनी चटाई लेकर पहुँचे केजरीवाल

एजेंसियाँ, नई दिल्ली
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने रविवार को पीएम नरेंद्र मोदी के साथ राजपथ पर योग दिवस में हिस्सा लिया। हैअंतरराष्ट्रीय योग दिवस में हिस्सा लेने के ? लिए केजरीवाल अपने साथ चटाई लेकर पहुँचे। इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के बाद केजरीवाल ने कहा कि योग अच्छी चीज है और इसे सभी को करना चाहिए। पीएम नरेंद्र मोदी की तरह केजरीवाल भी लंबे समय से योग कर रहे हैं। केजरीवाल का कहना था कि उन्हें योग से तनाव कम करने में मदद मिलती है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में प्रचार के बाद केजरीवाल ने विपश्यना की शरण ली थी। सीएम बनने के बाद भी वह बेंगलुरु में नैचरोपैथी शिविर में हिस्सा लेने गए थे, वहाँ भी उन्होंने योग किया था।

कार्टून कोना
कार्टून कोना लगभग हर समाचारपत्र में होता है और उनके माध्यम से की गई सटीक टिप्पणियाँ पाठक को छूती हैं। एक तरह से कार्टून पहले पन्ने पर प्रकाशित होने वाले कड़े और धारदार संपादकीय से भी अधिक प्रभावी होती हैं।


रेखांकन और कार्टोग्राफी
रेखांकन और काटीग्राफ़ समाचारों को न केवल रोचक बनाते हैं, बल्कि उन पर टिप्पणी भी करते हैं। क्रिकेट के स्कोर से लेकर सेंसेक्स के आँकड़ों तक-ग्राफ़ से पूरी बात एक नजर में सामने आ जाती है। कार्टोग्राफ़ का उपयोग समाचार-पत्रों के अलावा टेलीविजन में भी होता है।


पत्रकारिता के कुछ प्रमुख प्रकार
पत्रकारिता के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं :

1. खोजपरक पत्रकारिता-खोजपरक पत्रकारिता का आशय ऐसी पत्रकारिता से है जिसमें गहराई से छान-बीन करके ऐसे तथ्यों और सूचनाओं को सामने लाने की कोशिश की जाती है जिन्हें दबाने या छिपाने का प्रयास किया जा रहा हो। आमतौर पर खोजी पत्रकारिता सार्वजनिक महत्व के मामलों में भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और गड़बड़ियों को सामने लाने की कोशिश करती है। खोजी पत्रकारिता का उपयोग उन्हीं स्थितियों में किया जाता है, जब यह लगने लगे कि सच्चाई को सामने लाने के लिए और कोई उपाय नहीं रह गया है। खोजी पत्रकारिता का ही एक नया रूप टेलीविजन में स्टिग ऑपरेशन के रूप में सामने आया है। अमेरिका का वाटरगेट कांड खोजी पत्रकारिता का एक नायाब उदाहरण है, जिसमें राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। भारत में भी कई केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को खोजी पत्रकारिता के कारण अपने पदों से इस्तीफ़ा देना पड़ा।

2. विशेषीकृत पत्रकारिता-पत्रकारिता का अर्थ घटनाओं की सूचना देना मात्र नहीं है। पत्रकार से अपेक्षा होती है कि वह घटनाओं की तह तक जाकर उसका अर्थ स्पष्ट करे और आम पाठक को बताए कि उस समाचार का क्या महत्व है? इसके लिए विशेषता की आवश्यकता होती है। पत्रकारिता में विषय के हिसाब से विशेषता के सात प्रमुख क्षेत्र हैं। इनमें संसदीय पत्रकारिता, न्यायालय पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता, विज्ञान और विकास पत्रकारिता, अपराध पत्रकारिता तथा फ़ैशन और फ़िल्म पत्रकारिता शामिल हैं। इन क्षेत्रों के समाचार और उनकी व्याख्या उन विषयों में विशेप्रता हासिल किए बिना देना कठिन होता है।

3. वॉचडॉग पत्रकारिता-यह माना जाता है कि लोकतंत्र में पत्रकारिता और समाचार मीडिया का मुख्य उत्तरदायित्व सरकार के कामकाज पर निगाह रखना है और कहीं भी कोई गड़बड़ी हो, तो उसका परदाफ़ाश करना है। इसे परंपरागत रूप से ‘वॉचडॉग पत्रकारिता’ कहा जाता है। इसका दूसरा छोर सरकारी सूत्रों पर आधारित पत्रकारिता है। समाचार मीडिया केवल वही समाचार देता है, जो सरकार चाहती है और अपने आलोचनात्मक पक्ष का परित्याग कर देता है। आमतौर पर इन दो बिंदुओं के बीच तालमेल के जरिये ही समाचार मीडिया और इसके तहत काम करने वाले विभिन्न समाचार संगठनों की पत्रकारिता का निर्धारण होता है।

4. एडवोकेसी पत्रकारिता-ऐसे अनेक समाचार संगठन होते हैं, जो किसी विचारधारा या किसी खास उद्देश्य या मुद्दे को उठाकर आगे बढ़ते हैं और उस विचारधारा या उद्देश्य या मुद्दे के पक्ष में जनमत बनाने के लिए लगातार और जोर-शोर से अभियान चलाते हैं। इस तरह की पत्रकारिता को ‘पक्षधर’ या ‘एडवोकेसी पत्रकारिता’ कहा जाता है। आपने अकसर देखा होगा कि भारत में भी कुछ समाचारपत्र या टेलीविजन चैनल किसी खास मुद्दे पर जनमत बनाने और सरकार को उसके अनुकूल प्रतिक्रिया करने के लिए अभियान चलाते हैं। उदाहरण के लिए जेसिका लाल हत्याकांड में न्याय के लिए समाचार माध्यमों ने सक्रिय अभियान चलाया।

5. वैकल्पिक पत्रकारिता-व्यवस्था के साथ तालमेल बैठाकर चलन वाली मीडिया को ‘मुख्यधारा का मीडिया’ कहा जाता है। इस तरह की मीडिया आमतौर पर व्यवस्था के अनुकूल और आलोचना के एक निश्चित दायरे में ही काम करती है। इसके विपरीत जो मीडिया स्थापित व्यवस्था के विकल्प को सामने लाने और उसके अनुकूल सोच को अभिव्यक्त करता है, उसे ‘वैकल्पिक पत्रकारिता’ कहा जाता है। आमतौर पर इस तरह के मीडिया को सरकार और बड़ी पूँजी का समर्थन हासिल नहीं होता है। उसे बड़ी कंपनियों के विज्ञापन भी नहीं मिलते हैं और वह अपने पाठकों के सहयोग पर निर्भर होता है।

समाचार माध्यमों में मौजूदा रुझान
देश में मध्यम वर्ग के तेजी से विस्तार के साथ ही मीडिया के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। साक्षरता और क्रय-शक्ति बढ़ने से भारत में अन्य वस्तुओं के अलावा मीडिया के बाजार का भी विस्तार हो रहा है। इस बाजार की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर तरह के मीडिया का फैलाव हो रहा है-रेडियो, टेलीविजन, समाचार-पत्र, सेटेलाइट टेलीविजन और इंटरनेट सभी विस्तार के रास्ते पर हैं। लेकिन बाजार के इस विस्तार के साथ ही मीडिया का व्यापारीकरण भी तेज हो गया है और मुनाफ़ा कमाने को ही मुख्य ध्येय समझने वाले पूँजीवादी वर्ग ने भी मीडिया के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर प्रवेश किया है।

इस कारण समाचार के नाम पर मनोरंजन बेचने के इस रुझान के कारण आज समाचारों में वास्तविक और सरोकारीय सूचनाओं और जानकारियों का अभाव होता जा रहा है।

वर्तमान में समाचार मिडिया का एक बड़ा हिस्सा लोगों को ‘ जानकार नागरिक ‘ बनाने में मदद नहीं कर रहा है बल्कि अधिकांश मौकों पर यही लगता है कि लोग ‘गुमराह उपभोक्ता’ अधिक बन रहे हैं। इसकी वजह यह है कि आज समाचार मीडिया का एक बड़ा हिस्सा एक ऐसा उद्योग बन गया है जिसका मकसद अधिकतम मुनाफ़ा कमाना है! समाचार उद्योग के लिए समाचार भी पेप्सी-कोक जैसा एक उत्पाद बन गया है जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को गंभीर सूचनाओं के बजाय सतही मनोरंजन से बहलाना और अपनी ओर आकर्षित करना हो गया है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि समाचार मीडिया में हमेशा से ही सनसनीखेज या पीत-पत्रकारिता और पेज-थ्री पत्रकारिता की धाराएँ मौजूद रही हैं। इनका हमेशा अपना स्वतंत्र अस्तित्व रहा है, जैसे ब्रिटेन का टेबलॉयड मीडिया और भारत में भी ‘ब्लिट्ज’ जैसे कुछ समाचारपत्र रहे हैं। पेज-श्री भी मुख्यधारा की पत्रकारिता में मौजूद रहा है।

यह स्थिति हमारे लोकतंत्र के लिए एक गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट पैदा कर रही है। आज हर समाचार संगठन सबसे अधिक बिकाऊ बनने की होड़ में एक ही तरह के समाचारों पर टूटता दिखाई पड़ रहा है। इससे विविधता खत्म हो रही है और ऐसी स्थिति पैदा हो रही है जिसमें अनेक अखबार हैं और सब एक जैसे ही हैं।

समाचार मीडिया के प्रबंधक बहुत समय तक इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि साख और प्रभाव समाचार मीडिया की सबसे बड़ी ताकत होती है। आज समाचार मीडिया की साख मे तेजी से हास हो रहा है और इसके साथ ही लोगों की सोच को प्रभावित करने की इसकी क्षमता भी कुंठित हो रही है। समाचारों को उनके न्यायोचित और स्वाभाविक स्थान पर बहाल करके ही समाचार मीडिया की साख और प्रभाव के हास की प्रक्रिया को रोकना आवश्यक हो गया है।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

प्रश्न 1:
किसी भी दैनिक अखबार में राजनीतिक खबरें ज्यादा स्थान क्यों घेरती हैं? इस पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर –
जनसंचार के विभिन्न माध्यमों के प्रचार-प्रसार के कारण लोगों में राजनीति के प्रति रुझान बढ़ा है। राजनीति के प्रति वे जिज्ञासु हुए हैं। देश की राजनीति का संबंध आम लोगों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमता है। वे सरकार के काम-काज के तौर-तरीकों तथा राजनीति में हो रही हलचल को जानना चाहते हैं। समाचार-पत्र लोगों की इस रुचि को ध्यान में रखकर इन खबरों को प्रमुखता से छापते हैं। ऐसे में राजनीतिक खबरों का दैनिक अखबारों में स्थान घेरना स्वाभाविक है।

प्रश्न 2:
किन्हीं तीन हिंदी समाचार-पत्रों (एक ही तारीख के) को ध्यान से पढ़िए और बताइए कि एक आम आदमी की जिंदगी में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली खबरें समाचार-पत्रों में कहाँ और कितना स्थान पाती हैं?
उत्तर –
मैंने 19 सितंबर 2014 को तीन समाचार-पत्रों-‘नवभारत टाइम्स’, ‘दैनिक जागरण’ तथा ‘पंजाब केसरी’ पढ़े। इन अखबारों में एक आम आदमी की जिंदगी में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान पाने वाली खबरें पहले दो पृष्ठों के बाद-तीसरे, चौथे और पाँचवें पृष्ठों पर है। इनके स्थान के बारे में अंतर अवश्य है। दैनिक जागरण ने इन खबरों को अधिक स्थान दिया है।

प्रश्न 3:
निम्न में से किसे आप समाचार कहना पसंद नहीं करेंगे और क्यों?
(क) प्रेरक और उत्तेजित कर देने वाली हर सूचना
(ख) किसी घटना की रिपोर्ट
(ग) समय पर दी जाने वाली हर सूचना
(घ) सहकर्मियों का आपसी कुशलक्षेम या किसी मित्र की शादी
उत्तर –
प्रश्न में दी गई प्रथम तीन सूचनाओं को मैं समाचार कहना पसंद करूंगा, चौथी अर्थात् (घ) सूचना को समाचार नहीं कहूँगा, क्योंकि ‘सहकर्मियों का आपसी कुशलक्षेम या मित्र की शादी’ जैसी सूचना का संबंध दो-चार या थोड़े-से लोगों से नहीं है। यह एक निजी मामला है, जिनमें जन-साधारण की कोई रुचि नहीं होती।

प्रश्न 4:
आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि खबरों को बनाते समय जनता की रुचि का ध्यान रखा जाता है। इसके विपरीत, जनता की रुचि बनाने-बिगाड़ने में खबरों का क्या योगदान होता है? विचार करें।
उत्तर –
प्राय: समाचार-पत्र खबरों को बनाने एवं छापने में जनता की रुचि का ध्यान रखते हैं, पर इसके विपरीत यह भी सही है कि खबरें जनता की रुचि बनाने, बिगाड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। वास्तव में देखने की बात तो यह है कि खबरों को किस तरह और किस रूप में प्रस्तुत किया जाता है। आज खेल और फ़िल्मी खबरों को इतना महत्व दिया जाने लगा है कि युवा वर्ग आम लोगों के जीवन से जुड़ी खबरों की उपेक्षा करने लगा है।

प्रश्न 5:
निम्न पंक्तियों की व्याख्या करें :
(क) इस दौर में समाचार मीडिया बाजार को हड़पने के लिए अधिकाधिक लोगों का मनोरंजन तो कर रहा है, लेकिन जनता के मूल सरोकार को दरकिनार करता जा रहा है।
(ख) समाचार मीडिया के प्रबंधक बहुत समय तक इस तथ्य की उपक्षा नहीं कर सकते कि साख और प्रभाव समाचार मीडिया की सबसे बड़ी ताकत होती हैं।
उत्तर –
(क) ‘जनता के मूल सरोकार को दरकिनार करता जा रहा है’-अंतिम पंक्ति से ही स्पष्ट है कि मीडिया की कार्य-प्रणाली पर असंतोध प्रकट किया गया है। वर्तमान में मीडिया लाभ कमाने और बाजार को हड़पने के लिए अधिक चिंतित दिखाई दे रहा है। वह अमीरवर्ग और अधिक क्रय-शक्ति वालों की खबरों को प्रमुखता से छापता है तथा सामान्य लोगों के हितों को बढ़ावा देने वाली और जन-साधारण के जन-जीवन की खबरों की उपेक्षा कर इस वर्ग के लोगों के हितों की परवाह नहीं करता।
(ख) समाचार मीडिया के प्रबंधकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वे मीडिया के प्रभाव और उसकी साख को गिरने न दें। मीडिया का लोगों पर प्रभाव और लोगों के बीच बनी साख ही उसकी ताकत है। साख और प्रभाव खो देने के बाद मीडिया का लोगों पर बना असर धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। ऐसे में मीडिया प्रबंधकों को मीडिया की साख और प्रभाव की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

पाठ पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

पत्रकारिता
प्रश्न 1:
पत्रकारिता का मूल तत्व क्या है?
उत्तर –
पत्रकारिता का मूल तत्व जिज्ञासा है।

प्रश्न 2:
मनुष्य सूचनाएँ क्यों जानना चाहता है?
उत्तर –
मनुष्य सूचनाएँ इसलिए जानना चाहता है ताकि वह भविष्य को योजनाएँ बना सके। सूचनाएँ उसके दैनिक जीवन को भी प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 3:
समाचार प्राप्त करने के माध्यम कौन-कौन से हैं?
उत्तर –
समाचार-पत्र, इंटरनेट, रेडियो, टेलीविजन आदि।

प्रश्न 4:
पत्रकारिता किसे कहते हैं?
उत्तर –
देश-विदेश में घटने वाली घटनाओं को समाचार के रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को पत्रकारिता कहते हैं।

प्रश्न 5:
समाचार क्या है?
उत्तर –
समाचार किसी भी ऐसी ताजा घटना, विचार या समस्या की रिपोर्ट है जिसमें अधिक-से-अधिक लोगों की रुचि हो और जिसका अधिक-से-अधिक लोगों पर प्रभाव पड़ रहा हो।

प्रश्न 6:
आपसी कुशल-क्षेम को समाचार क्यों नहीं माना जाता?
उत्तर –
आपसी कुशल-क्षेम व्यक्तिगत मामला होता है। इसका समाज के लिए कोई विशेष महत्व नहीं होता है। समाचार का संबंध सार्वजनिक महत्व के विषयों से है। इसलिए आपसी कुशल-क्षेम को समाचार नहीं माना जाता।

प्रश्न 7:
समाचार का निर्धारण कौन करता है?
उत्तर –
समाचार का चयन, आकार और प्रस्तुति का निर्धारण पत्रकार और समाचार संगठन करते हैं।

प्रश्न 8:
आधुनिक युग में कैसे समाचारों का प्रचलन बढ़ा है?
उत्तर –
र आधुनिक युग में मजेदार और मनोरंजक समाचारों का प्रचलन बढ़ा है।

प्रश्न 9:
समाचार के तत्व बताइए।
उत्तर –
समाचार के निम्नलिखित तत्व होते हैं-

  1. नवीनता
  2. निकटता
  3. प्रभाव
  4. जनरुचि
  5. टकराव
  6. महत्त्वपूर्ण लोग
  7. उपयोगी जानकारियाँ
  8. अनोखापन
  9. पाठक वर्ग
  10. नीतिगत ढाँचा

प्रश्न 10:
समाचार के लिए नवीनता का क्या महत्व है?
उत्तर –
किसी भी घटना, विचार या समस्या के समाचार बनने के लिए उसमें नवीनता जरूरी है। समाचार वही है जो ताजा घटना के बारे में जानकारी देता है। घटना के ताजापन से अभिप्राय है कि वह उस समय के लिहाज से नई हो।

प्रश्न 11:
समाचार और निकटता का संबंध बताइए।
उत्तर –
हर घटना का समाचारीय महत्व उसकी स्थानीयता से निर्धारित होता है। मानव का स्वभाव है कि वह अपने निकट हुपित्ताओंकोजन के लएउसुकरता है। यहा किटता भागलक के साथ-साथ सामाकि साकृतिक भी होती है।

प्रश्न 12:
पत्रकारिता के मूल्यों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
पत्रकारिता एक तरह से दैनिक इतिहास लेखन है। इसके निम्नलिखित मूल्य हैं

  1. पत्रकार को ऐसा कोई समाचार नहीं लिखना चाहिए जिससे किसी की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचता हो।
  2. समाज में अराजकता नहीं फैलनी चाहिए।
  3. बिना सबूत के कोई समाचार नहीं लिखना चाहिए।

प्रश्न 13:
पाठक वर्ग का समाचार-चयन में क्या महत्व है?
उत्तर –
पाठक वर्ग की जरूरतों व रुचियों के हिसाब से समाचारों का चयन किया जाता है। आजकल समाचारों के महत्व के आकलन में पाठक वर्ग का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। अतिरिक्त क्रय शक्ति वाले सामाजिक तबकों में पढ़े जाने वाले समाचारों को अधिक महत्व मिल रहा है तथा पीड़ित व कमजोर वर्ग उपक्षित होता जा रहा है।

संपादन
प्रश्न 14:
संपादन का अर्थ बताइए।
उत्तर –
संपादन का अर्थ है-किसी सामग्री से उसकी अशुद्धयों को दूर करके उसे पठनीय बनाना। उपसंपादक रिपोर्टर की खबर की भाषा-शैली, व्याकरण, वर्तनी तथा तथ्य संबंधी अशुद्धयों को दूर करता है।

प्रश्न 15:
संपादन के मुख्यबिंदु कौन-कौन से है?
उत्तर –
संपादन के निम्नलिखित मुख्यबिंदु होते हैं-

  1. तथ्यों की शुद्धता या तथ्यपरकता
  2. वस्तुपरकता
  3. निष्पक्षता
  4. संतुलन
  5. स्त्रोत

प्रश्न 16:
समाचार में तथ्यपरकता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर –
समाचार में तथ्यपरकता का महत्वपूर्ण स्थान है। पत्रकार को ऐसे तथ्यों को चयन करना चाहिए जो यथार्थ का संपूर्णता के साथ प्रतिनिधित्व करते हैं, परंतु समाचार में यथार्थ सीमित सूचनाओं व तथ्यों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। कड़वा सच खतरनाक होता है, क्योंकि मनुष्य यथार्थ की छवियों की दुनिया में रहता है।

प्रश्न 17:
वस्तुपरकता और तथ्यपरकता में क्या अंतर है?
उत्तर –
वस्तुपरकता का संबंध सामाजिक-सांस्कृतिक आर्थिक मूल्यों से होता है, जबकि तथ्यपरकता का संबंध अधिकाधिक तथ्यों से है। वस्तुपरकता तथ्य को देखने की दृष्टि है।

प्रश्न 18:
निष्पक्षता का पत्रकारिता के लिए क्या महत्व है?
उत्तर –
पत्रकारिता में निष्पक्षता का बहुत महत्व है। पत्रकार को हर विषय पर बिना किसी भेद-भाव के समाचार भेजने चाहिए. परंतु निष्पक्षता का अर्थ तटस्थता नहीं है।

प्रश्न 19:
समाचार की साख के लिए क्या आवश्यक है?
उत्तर –
किसी समाचार की साख के लिए आवश्यक है कि शामिल सूचना या जानकारी का कोई स्रोत हो और वह स्रोत इस तरह की सूचना या जानकारी देने का अधिकार रखता हो।

प्रश्न 20:
पत्रकारिता के अहम हिस्से कौन-कौन से हैं?
उत्तर –
समाचार, विचार, टिप्पणी, संपादकीय, फ़ोटो, कार्टून, संपादकीय, पत्रकारिता आदि।

प्रश्न 21:
संपादकीय पृष्ठ पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर –
संपादकीय पृष्ठ को समाचार-पत्र का महत्वपूर्ण पृष्ठ भाना जाता है! इस पर विभिन्न घटनाओं व समाचारों पर पत्र भी इस पृष्ठ पर होते है जो लोगों की भावनाओं को त्र्यक्त करते हैं।

प्रश्न 22:
निम्न पर टिप्पणी कीजिए-
(क) फोटो पत्रकारिता
(ख) कार्टून कोना
(ग) रेखांकन और काटोग्राफ
उत्तर –
(क) फोटो पत्रकारिता-आजकल अखबारों में फोटो का प्रचलन बढ़ रहा है। फोटो टिप्पणियों का असर व्यापक होता है। एक चित्र कई हजार बातें कह जाता है।
(ख) कार्टून कोना-यह आम आदमी की भावनाओं को व्यक्त करने का सीधा तरीका है। यह हर समाचार-पत्र में होता है। कार्टून पहले पन्न पर प्रकाशित होने वाले हस्ताक्षरित संपादकीय है।
(ग) रेखांकन और काटीग्राफ-रेखांकन समाचारों की रोचक बनाते हैं। काटीग्राफी का प्रयोग टेलीविजन में भी होता है। क्रिकेट के स्कोर से लेकर सेंसेक्स के आँकड़ों को ग्राफ से बताते हैं।

प्रश्न 23:
पत्रकारिता के प्रकार बताइए।
उत्तर –
पत्रकारिता के अनेक प्रकार हैं-खोजपरक पत्रकारिता. विशेषकृत पत्रकारिता, वॉचडॉग पत्रकारिता, एडवोकेसी पत्रकारिता, वैकल्पिक पत्रकारिता।

प्रश्न 24:
खोजपरक पत्रकारिता के विषय में बताइए।
उत्तर –
वह पत्रकारिता जो गहराई से छानबीन करके छिपी या देखी हुई खबरों को सामने लाती हैं, खोजपरक पत्रकारिता लाती है। आमतौर पर यह पत्रकारिता सार्वजनिक महत्व के मामलों में भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और गड़बड़ियों को सामने लाने की कोशिश करती है। इसका नवीनतम रूप ‘स्टिंग ऑपरेशन’ है। खोजपरक पत्रकारिता का नायाब उदाहरण अमेरिका का वाटरगेट कांड है।

प्रश्न 25:
विशेषीकृत पत्रकारिता का अर्थ बताइए।
उत्तर –
वह पत्रकारिता जो किसी विषय पर विशेष जानकारी प्रदान करती है, विशेषीकृत पत्रकारिता कहलाती है। पत्रकारिता में विषय के हिसाब से विशेषता के सात प्रमुख क्षेत्र हैं-संसदीय पत्रकारिता, न्यायालय पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता और विकास पत्रकारिता, अपराध पत्रकारिता तथा फैशन और फिल्म पत्रकारिता।

प्रश्न 26:
वॉचडॉग पत्रकारिता क्या है?
उत्तर –
वह पत्रकारिता जो सरकार के कामकाज पर निगाह रखती है और गड़बड़ियों का पर्दाफाश करती है, वॉचडॉग पत्रकारिता कहलाती है। ऐसी पत्रकारिता सरकारी समाचारों की आलोचना भी करती है।

प्रश्न 27:
एडवोकेसी पत्रकारिता पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर –
ऐसी पत्रकारिता जो किसी विचाराधारा उद्देश्य या मुद्दे को उठाकर जनमत तैयार करती है, एडवोकेसी पत्रकारिता कहलाती है। जेसिका लाल हत्याकांड, रुचिका कांड में न्याय के लिए समाचार माध्यमों ने सक्रिय भूमिका निभाई।

प्रश्न 28:
वैकल्पिक पत्रकारिता किसे कहते हैं?
उत्तर –
जो पत्रकारिता स्थापित व्यवस्था के विकल्प को सामने लाने और उसके अनुकूल सोच को अभिव्यक्त करता है, उसे वैकल्पिक पत्रकारिता कहते हैं। इस तरह की पत्रकारिता को सरकार और बड़ी पूँजी का समर्थन नहीं मिलता।

प्रश्न 29:
पीत पत्रकारिता के विषय में बताइए।
उत्तर –
यह पत्रकारिता सनसनी फैलाने का कार्य करती है। इस तरह की पत्रकारिता की शुरूआत उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में अमेरिका में हुई थी। उस समय वहाँ कुछ अखबारों के बीच पाठकों को आकर्षित करने के लिए संघर्ष छिड़ गया था। एक-दूसरे को पीछे करने की होड़ में इन अखबारों ने पीत पत्रकारिता का सहारा लिया। पीत पत्रकारिता के तहत अखबार अफवाहों, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों, प्रेम-संबंधों, भंडाफोड़ और फिल्मी गपशप को समाचार की तरह प्रकाशित करते हैं।

प्रश्न 30:
पेज थ्री पत्रकारिता क्या है?
उत्तर –
इसका तात्पर्य ऐसी पत्रकारिता से है जिसमें फैशन, अमीरों की पार्टियों, महफिलों और जाने-माने लोगों के निजी जीवन के बारे में बताया जाता है। यह आमतौर पर समाचार-पत्रों के पृष्ठ तीन पर प्रकाशित होती है। इसलिए इसे पेज श्री पत्रकारिता कहते हैं। आजकल इसकी पृष्ठ संख्या कोई भी हो सकती है, परंतु इनके विषय वही हैं।

प्रश्न 31:
डेडलाइन किसे कहते हैं?
उत्तर –
समाचार माध्यमों में किसी समाचार को प्रकाशित या प्रसारित होने के लिए पहुँचने की आखिरी समय-सीमा को डेडलाइन कहते हैं। डेडलाइन के बाद मिलने वाले समाचार के छपने की संभावना कम ही होती है।

प्रश्न 32:
न्यूजपेग का अर्थ बताइए।
उत्तर –
न्यूजपेग का अर्थ है-किसी मुद्दे पर लिखे जा रहे लेख या फीचर में उस नवीनतम घटना का उल्लेख जिसके कारण वह मुद्दा चर्चा में आ गया है।

प्रश्न 33:
स्टिंग ऑपरेशन पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर –
जब किसी टेलीविजन चैनल का पत्रकार छिपे कैमरे के जरिए किसी गैर-कानूनी, अवैध और असामाजिक गतिविधियों को फिल्माता है और फिर उसे अपने चैनल पर दिखाता है तो इसे स्टिंग ऑपरेशन कहते हैं। कई बार चैनल ऐसे ऑपरेशनों को गोपनीय कोड दे देते हैं; जैसे-ऑपरेशन चक्रव्यूह।

विभिन्न माध्यमों के लिए लेखन
प्रश्न 1:
जनसंचार माध्यम के प्रमुख प्रकार बताइए।
उत्तर –
जनसंचार माध्यम के कई प्रकार हैं-प्रिंट, टी.वी. रेडियो व इंटरनेट। प्रिंट माध्यम केवल पढ़ने के लिए है, रेडियो सुनने के लिए, टी.वी. देखने व सुनने के लिए तथा इंटरनेट पढ़ने, सुनने और देखने-तीनों के लिए है।

प्रश्न 2:
मुद्रण की शुरूआत कहाँ से हुई?
उत्तर –
चीन से।

प्रश्न 3:
आधुनिक छापेखाने का आविष्कार किसने किया?
उत्तर –
जर्मनी के गुटेनबर्ग ने।

प्रश्न 4:
भारत में पहला छापाखाना कब, कहाँ और किसने खोला?
उत्तर –
भारत में पहला छापाखाना 1556 ई. में पुर्तगालियों ने गोवा में धर्मप्रचार की पुस्तकें छापने के लिए खोला।

प्रश्न 5:
प्रिंट रीडिया के प्रमुख माध्यम कौन-से हैं?
उत्तर –
अखबार, पत्रिकाएँ, पुस्तकें आदि।

प्रश्न 6:
मुद्रित माध्यम की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर –
मुद्रित माध्यम की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  1. मुद्रित माध्यमों में छपे हुए शब्द स्थायी होते हैं। इन्हें कहीं भी, कभी भी, किसी भी अवस्था में पढ़ा जा सकता है। इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  2. मुद्रित माध्यम लिखित भाषा का विस्तार है। लिखित भाषा में व्याकरण, वर्तनी व शब्दों के उपयुक्त इस्तेमाल का ध्यान रखना होता है। यह भाषा के अनुशासन की माँग करती है।
  3. मुद्रित माध्यम चिंतन, विचार व विश्लेषण का माध्यम है। इसके जरिए हम गंभीर व गूढ़ बातें लिख सकते हैं, क्योंकि पाठक के पास विश्लेषण के लिए समय व योग्यता होती है।

प्रश्न 7:
मुद्रित माध्यम की कमियाँ बताइए।
उत्तर –
मुद्रित माध्यम की निम्नलिखित कमियाँ हैं-

  1. यह माध्यम केवल साक्षर व्यक्तियों के लिए है तथा जिसने औपचारिक या अनौपचारिक शिक्षा के जरिए एक विशेष स्तर की योग्यता हासिल की है।
  2. समय-सीमा और आवंटित जगह के अनुशासन का पालन करना जरूरी है।
  3. लेखन और प्रकाशन के बीच गलतियों और अशुद्धयूों को ठीक करना जरूरी होता है।
  4. लेखक में सहज प्रवाह के लिए तारतम्यता बनाए रखना जरूरी है।
  5. मुद्रित माध्यम के लेखकों को पाठक के भाषा-ज्ञान के साथ-साथ उनके शैक्षिक ज्ञान और योग्यता का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।

रेडियो
प्रश्न 8:
रेडियो के विषय में बताइए।
उत्तर –
रेडियो श्रव्य माध्यम है। इसमें ध्वनि, स्वर व शब्दों का मेल होता है। रेडियो पत्रकारों को श्रोताओं का ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि रेडियो का श्रोता अखबार की तरह रेडियो समाचार बुलेटिन को कभी भी और कहीं से भी नहीं सुन सकता। उसे बुलेटिन के प्रसारण समय का इंतजार करना पड़ता है। रेडियो एकरेखीय माध्यम है और रेडियो समाचार बुलेटिन का स्वरूप, ढाँचा और शैली इस आधार पर ही तय होता है।

प्रश्न 9:
रेडियो का मूल तत्व क्या है?
उत्तर –
शब्द और आवाज।

प्रश्न 10:
रेडियो समाचार की संरचना पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर –
रेडियो समाचार की संरचना उल्टा पिरामिड शैली पर आधारित होती है। इस शैली में सबसे महत्वपूर्ण तथ्यों को सबसे पहले लिखा जाता है और उसके बाद घटते हुए महत्त्वक्रम में अन्य तथ्यों या सूचनाओं को लिखा या बताया जाता है। इस शैली में कोई निष्कर्ष नहीं होता। उल्टा पिरामिड शैली में समाचार के तीन हिस्से होते हैं-इंट्रो, बॉडी व समापन। समाचार के इंट्रो या लीड को हिंदी में मुखड़ा कहते हैं। यह खबर का सबसे अहम हिस्सा होता है। इसमें खबर के मूल तत्व को शुरू की दो या तीन पंक्तियों में बताया जाता है, बॉडी में समाचार के प्रस्तुत ब्योरे को घटते हुए महत्त्व क्रम में लिखा जाता है। इस शैली में समापन अलग से नहीं होता।

प्रश्न 11:
रेडियो के लिए समाचार-लेखन में किन-किन बुनियादी बातों का ध्यान रखा जाता है?
उत्तर –
रेडियो के लिए समाचार-लेखन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

  1. रेडियो समाचार की कॉपी टाइप्ड व साफ-सुथरी होनी चाहिए अन्यथा समाचार वाचक पढ़ते समय अटकेगा।
  2. समाचार कॉपी को कंप्यूटर पर ट्रिपल स्पेस में टाइप किया जाना चाहिए। कॉपी को दोनों तरफ पर्याप्त हाशिया छोड़ा जाना चाहिए।
  3. एक लाइन में अधिकतम 12-13 शब्द होने चाहिए।
  4. पंक्ति के आखिर में कोई शब्द विभाजित नहीं होना चाहिए और पृष्ठ के आधार में कोई लाइन अधूरी नहीं होनी चाहिए।
  5. समाचार कॉपी में जटिल और उच्चारण में कठिन शब्द, संक्षिप्ताक्षर, अंक आदि नहीं लिखने चाहिए।
  6. अंक को शब्दों में लिखना चाहिए: जैसे 199 को एक सौ निन्यानबे। इसी तरह % तथा $ आदि संकेत चिहनों को क्रमश: प्रतिशत और डॉलर लिखना चाहिए। दशमलव को उसके नजदीकी पूर्णाक में लिखना चाहिए।
  7. रेडियो समाचार में अत्यधिक आँकड़ों व संख्या का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  8. रेडियो में समाचार के समय संदर्भ का ध्यान रखना चाहिए। इस पर खबर का चौबीस घंटे प्रसारण होता है। श्रोता के लिए समय का फ्रेम हमेशा आज होता है। इसलिए समाचार में आज, आज सुबह, आज दोपहर आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

टी.वी.
प्रश्न 12:
टी.वी. में किसकी प्रमुखता होती है?
उत्तर –
दृश्य की।

प्रश्न 13:
टेलीविजन समाचार-लेखन के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना होता है?
उत्तर –
टेलीविजन समाचार-लेखन के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना होता है-

  1. टेलीविजन में शब्द परदे पर दिखने वाले दृश्य के अनुकूल होने चाहिए।
  2. इसमें कम-से-कम शब्दों में ज्यादा-से-ज्यादा खबर बताने की कला का इस्तेमाल होता है।

प्रश्न 14:
टेलीविजन पर खबर पेश करने के तरीके बताइए।
उत्तर –
टेलीविजन पर खबर दो तरीके से पेश की जाती है-

  1. शुरूआती हिस्सा-इसमें मुख्य खबर होती है तथा न्यूजरीडर या एंकर बिना दृश्य के इसे पढ़ता है।
  2. इसके दूसरे हिस्से में परदे पर एंकर की जगह खबर से संबंधित दृश्य दिखाए जाते हैं।

प्रश्न 15:
टी.वी. खबर की प्रस्तुति के तरीके बताइए।
उत्तर –
टी.वी. खबर की प्रस्तुति के निम्नलिखित तरीके हैं-

  1. फ्लैश या ब्रेकिंग न्यूज
  2. ड्राई एंकर
  3. फोन-इन
  4. एंकर-विजुअल
  5. एंकर बाइट
  6. लाइव।
  7. एंकर पैकेज

प्रश्न 16:
फ्लैश या ब्रेकिंग न्यूज से क्या आशय है?
उत्तर –
कम-से-कम शब्दों में सिर्फ सूचना देने के लिए जो बड़ी खबर दर्शकों को पहुँचाई जाती है, उसे ब्रेकिंग न्यूज या फ्लैश कहा जाता है।

प्रश्न 17:
ड्राई एंकर से क्या तात्पर्य है?
उत्तर –
ड्राई एंकर वह है जो खबर को सीधे-सीधे दर्शकों को बताता है कि कहाँ, क्या, कब और कैसे हुआ। इसमें दृश्य नहीं होते।

प्रश्न 18:
फोन-इन से क्या आशय है?
उत्तर –
फोन-इन के माध्यम से रिपोर्टर फोन पर बात करके सूचनाएँ दर्शकों तक पहुँचाता है। वह घटना वाली जगह पर मौजूद होता है।

प्रश्न 19:
एंकर-विजुअल से क्या आशय है?
उत्तर –
जब घटना के दृश्य मिल जाते हैं तो उन दृश्यों के आधार पर खबर लिखी जाती है जिसे एंकर पढ़ता है। इस खबर की शुरूआत भी प्रारंभिक सूचना से होती है और बाद में कुछ वाक्यों पर प्राप्त दृश्य दिखाए जाते हैं।

प्रश्न 20:
एंकर-बाइट से क्या आशय है?
उत्तर –
बाइट का अर्थ है-कथन। टेलीविजन पत्रकारिता में किसी घटना की सूचना देने और उसके दृश्य दिखाने के साथ ही इस घटना के बारे में प्रत्यक्षदर्शियों या संबंधित व्यक्तियों का कथन दिखा और सुनाकर खबर को प्रमाणिकता प्रदान की जाती है।

प्रश्न 21:
लाइव से क्या तात्पर्य है?
उत्तर –
किसी खबर का घटनास्थल से सीधा प्रसारण होने को लाइव कहा जाता है। इसके लिए मौके पर मौजूद रिपोर्टर और कैमरामैन ओ.बी. वैन के जरिए घटना के बारे में सीधे दर्शकों को दिखाते और बताते हैं।

प्रश्न 22:
एंकर पैकेज से क्या आशय है?
उत्तर –
किसी भी खबर को संपूर्णता के साथ पेश करने का माध्यम पैकेज है। इसमें संबंधित घटना के दृश्य, इससे जुड़े लोगों की बाइट, ग्राफिक के जरिए जरूरी सूचनाएँ आदि होती हैं।

प्रश्न 23:
रेडियो और टेलीविजन समाचार की भाषा-शैली कैसी होनी चाहिए?
उत्तर –
रेडियो और टेलीविजन आम आदमी के माध्यम हैं। अत: रेडियो व टेलीविजन समाचार की भाषा-शैली ऐसी होनी चाहिए कि वह सभी को आसानी से समझ में आ सके, लेकिन साथ ही भाषा के स्तर और गरिमा के साथ कोई समझौता भी न करना पड़े। वाक्य छोटे-छोटे हों तथा एक वाक्य में एक ही बात कही जा सके। वाक्यों में तारतम्य ऐसा हो कि कुछ टूटता या छूटता हुआ न लगे। भाषा में तथा, एवं, अथवा, व, किंतु, परंतु आदि शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए। गैरजरूरी विशेषणों, सामासिक और तत्सम शब्दों, अतिरंजित उपमाओं आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। प्रचलित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।

इंटरनेट
प्रश्न 24:
इंटरनेट क्या है?
उत्तर –
इंटरनेट एक टूल है जिसे मानव सूचना, मनोरंजन, ज्ञान और व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक संवादों के आदान-प्रदान के लिए प्रयोग करता है।

प्रश्न 25:
इंटरनेट पत्रकारिता से क्या आशय है?
उत्तर –
इंटरनेट पर अखबारों का प्रकाशन या खबरों का आदान-प्रदान ही इंटरनेट पत्रकारिता कहते हैं। इसे ऑन लाइन पत्रकारिता, साइट पत्रकारिता या वेब पत्रकारिता कहते हैं।

प्रश्न 26:
इंटरनेट पत्रकारिता की शुरूआत कब हुई?
उत्तर –
सन् 1983 में

प्रश्न 27:
इंटरनेट की मुख्य तकनीक के तत्व बताइए।
उत्तर –
एच. टी. एम. एल. इंटरनेट ई-मेल, इंटरनेट एक्सप्लोरर, नेटस्केप आदि।

प्रश्न 28:
भारत में इंटरनेट पत्रकारिता की शुरूआत कब हुई?
उत्तर –
1993 ई. से।

प्रश्न 29:
भारत में कौन-कौन-से समाचार-पत्र इंटरनेट पर उपलब्ध हैं?
उत्तर –
टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिंदू, ट्रिब्यून आदि।

प्रश्न 30:
भारत की पेड-साइट (भुगतान साइट) कौन-सी है?
उत्तर –
इंडिया टुडे।
प्रश्न 31:
भारत की पहली वेब पत्रकारिता साइट कौन-सी है?
उत्तर –
रीडिफ।

प्रश्न 32:
वेब साइट पर विशुद्ध पत्रकारिता की शुरूआत किसने की?
उत्तर –
तहलका डॉटकॉम।

प्रश्न 33:
भारत में नियमित अपडेट होने वाली साइटें बताइए।
उत्तर –
हिंदू जी न्यूज, आज तक, एन डी टीवी, आउटलुक।

प्रश्न 34:
हिंदी का संपूर्ण पोर्टल कौन-सा है?
उत्तर –
नयी दुनिया (इंदौर)।

प्रश्न 35:
भारत का कौन-सा अखबार सिर्फ इंटरनेट पर उपलब्ध है?
उत्तर –
प्रभासाक्षी।

प्रश्न 36:
हिंदी की सर्वश्रेष्ठ साइट कौन-सी है?
उत्तर –
बी.बी.सी.।

प्रश्न 37:
हिंदी वेब जगत में कौन-कौन-सी साहित्यिक पत्रिकाएँ चल रही हैं?
उत्तर –
अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिंदी नेस्ट, सराय।

प्रश्न 38:
हिंदी वेब पत्रकारिता की समस्याएँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर –
हिंदी के फोंट, की-बोर्ड का मानकीकरण न होना, उपलब्ध न होना आदि समस्याएँ हैं।

पत्रकारिता लेखन के विभिन्न रूप और लेखन प्रक्रिया

प्रश्न 1:
पत्रकारिता लेखन किसे कहते हैं?
उत्तर –
वह लेखन जो अखबार या अन्य समाचार माध्यमों में काम करने वाला पत्रकार अपने पाठकों, दर्शकों तथा श्रोताओं तक सूचनाएँ पहुँचाने के लिए लेखन के विभिन्न रूपों का प्रयोग करता है, पत्रकारिता लेखन कहा जाता है।

प्रश्न 2:
पत्रकार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर –
पत्रकार तीन तरह के होते हैं-पूर्णकालिक, अंशकालिक तथा फ्रीलांसर।
(क) पूक्लिक पिश्कर-ये प्रकर की समाचरसंमान में कमकने वाले नाम बेनोग कर्मचारी होते हैं।
(ख) अंशकालिक पत्रकार-ये किसी समाचार संगठन के लिए एक निश्चित मानदेय पर कार्य करते हैं।
(ग) फ्रीलांसर या स्वतंत्र पत्रकार-ये पत्रकार भुगतान के आधार पर अलग-अलग अखबारों के लिए लिखते हैं।

प्रश्न 3:
पत्रकारिता लेखन साहित्यिक सृजनात्मक लेखन से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर –
पत्रकारिता लेखन का संबंध समसामयिक और वास्तविक घटनाओं, समस्याओं और मुद्दों से है। यह अनिवार्य रूप से तात्कालिकता और पाठकों की रुचियों तथा जरूरतों को ध्यान में रखकर रचा जाता है, जबकि साहित्यिक-सृजनात्मक लेखन में लेखक को काफी छूट होती है।

प्रश्न 4:
पत्रकारीय लेखक की भाषा कैसी होनी चाहिए?
उत्तर –
पत्रकारीय लेखक की भाषा आम बोलचाल की भाषा होनी चाहिए। उसकी लेखन-शैली, भाषा और गूढ़-से-गूढ़ विषय की प्रस्तुति ऐसी सहज, सरल और रोचक होनी चाहिए कि वह सबकी समझ में आ जाए। वाक्य छोटे व सहज होने चाहिए तथा सरल शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। पत्रकार को आलंकारिक भाषा से बचना चाहिए।

प्रश्न 5:
संवाददाता या रिपोर्टर किसे कहते हैं?
उत्तर –
अखबारों में स्थानिक घटनाओं का विवरण भेजने वाले व्यक्ति को संवाददाता कहते हैं।

प्रश्न 6:
उल्टा पिरामिड शैली का प्रयोग कब शुरू हुआ?
उत्तर –
इस शैली का प्रयोग 19 वीं सदी के मध्य से शुरू हुआ।

प्रश्न 7:
समाचार लेखन के छह ककार कौन-से हैं?
उत्तर –
समाचार लेखन के छह ककार निम्नलिखित हैं

  1. वया
  2. किसके या कौन
  3. कहाँ
  4. कब
  5. क्यों
  6. कैसे

प्रश्न 8:
समाचार में छह ककारों का क्या महत्व है?
उत्तर –
समाचार लेखन में छह ककारों का प्रयोग किया जाता है। समाचार के मुखड़े में आमतौर पर तीन या चार ककारों को आधार बनाकर खबर लिखी जाती है। ये चार ककार हैं-क्या, कौन, कब, और कहाँ समाचार की बॉडी में कैसे और क्यों का जवाब दिया जाता है। पहले चार ककार-क्या, कौन, कब, और कहाँ-सूचनात्मक और तथ्यों पर आधारित होते हैं, जबकि बाकी दो ककारों-कैसे और क्यों-में विवरणात्मक, व्याख्यात्मक और विश्लेषणात्मक पहलू पर जोर दिया जाता है।

प्रश्न 9:
संपादकीय किसे कहते हैं?
उत्तर –
संपादकीय वह लेख है जिसके जरिए समाचार-पत्र किसी घटना, समस्या या मुद्दे के प्रति अपनी राय प्रकट करते हैं। यह किसी व्यक्ति विशेष का विचार नहीं होता।

प्रश्न 10:
संपादक किसे कहते हैं?
उत्तर –
वह व्यक्ति जो समाचार-पत्र के संपादकीय कार्य का निर्देशन, नियंत्रण व निरीक्षण करता है, उसे संपादक कहते हैं। यह समाचार-पत्र में प्रकाशित सामग्री के लिए उत्तरदायी होता है। यह संपादकीय विभाग का प्रमुख प्रशासनिक एवं विधिक अधिकारी होता है।

प्रश्न 11:
स्तंभ-लेखन क्या है?
उत्तर –
स्तंभ-लेखन विचारपरक लेखन का प्रमुख रूप है। खास शैली के कुछ लेखक अखबार में नियमित लेख देते हैं। इस लेख का विषय व विचार स्तंभ लेखक की मजी से होता है। स्तंभ लेख लेखक के नाम पर जाने और पसंद किए जाते हैं।

प्रश्न 12:
‘संपादक के नाम पत्र’ पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर –
समाचार-पत्र के संपादकीय पृष्ठ पर पाठकों के पत्र भी प्रकाशित होते हैं। इस स्तंभ के जरिए पाठक अपनी राय विभिन्न मुद्दों पर जाहिर करते हैं। वे जनसमस्याएँ भी उठाते हैं। यह स्तंभ जनमत को प्रतिबिंबित करता है।

प्रश्न 13:
पत्रकारीय साक्षात्कार व सामान्य बातचीत में अंतर बताइए।
उत्तर –
साक्षात्कार में एक पत्रकार किसी दूसरे व्यक्ति से तथ्य, उसकी राय व भावनाएँ जानने के लिए प्रश्न पूछता है, जबकि सामान्य बातचीत में प्रश्नात्मक शैली नहीं होती।

प्रश्न 14:
सफल साक्षात्कार के लिए पत्रकार में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
उत्तर –
पत्रकार में ज्ञान, संवेदनशीलता, कूटनीति, धैर्य और साहस जैसे गुण भी होने चाहिए।

समाचार लेखन के उदाहरण
(1) सूचनाएँ

  1. रुपये की पहचान के लिए चिहन की खोज।
  2. आर. बी. आई ने बनाई समिति।
  3. मार्च में रुपये का चिहन संभव।
  4. विश्व की अन्य मुद्राओं के समान होगा रुपया।

मार्च में मिलेगी रुपये को पहचान

रिजर्व बैंक की विशेष समिति ने पाँच प्रतीक चिहनों को छाँटा, इन्हीं में से तय होगा प्रतीक मनोजित साहा और वृष्टि ब्रेनीवाल डॉलर और पाउंड की तर्ज पर अगर आपको रुपये के भी किसी प्रतीक चिहन का इंतजार है, तो बस मार्च तक और घड़ियाँ गिनिए। मार्च में रुपये का चिहन मिल जाएगा।

भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर उषा थोराट की अध्यक्षता वाली एक समिति ने करीब 4000 प्रविष्टियों में से पाँच को रुपये का निशान बनाने के लिए छाँटा है। इनमें से किसी एक के डिजाइन पर ही अंतिम मुहर लगेगी और विजेता के नाम का ऐलान जनवरी में कर दिया जाएगा, लेकिन वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक मार्च से पहले तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाएगी। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है-‘आरबीआई ने अपनी सिफारिशें सौंप दी हैं, लेकिन अभी इस पर वित्त मंत्रालय के साथ-साथ कैबिनेट की मुहर लगना बाकी है। इस प्रक्रिया में दो से तीन महीने का वक्त लग सकता है।”

अधिकारी का यह भी कहना है कि आधिकारिक तौर से इसकी शुरूआत में और भी वक्त लग सकता है, क्योंकि नए चिहन के लिए सॉफ्टवेयर की भी जरूरत होगी। इसके अलावा इस पर फैसला लिया जाना है कि करेंसी नोट और सिक्कों पर भी इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए या नहीं। जिन पाँच डिजाइनरों के डिजाइन को अंतिम पाँच में चुना गया है, कुछ दिनों पहले नई दिल्ली में उनका साक्षात्कार भी हो चुका है। इन सभी डिजाइनरों की पृष्ठभूमियाँ काफी अलग हैं। इनमें से दो तो पेशेवर डिजाइनर हैं, जबकि एक आई आई टी. बंबई में इंडस्ट्रियल डिजाइनर में पी-एच. डी. के छात्र हैं।

बाकी में एक एम. आई. टी. से प्रशिक्षण ले चुके आर्किटेक्ट तो दूसरे थैलासेरी के एक हाईस्कूल में कंप्यूटर अध्यापक हैं। इन सभी को 25,000 रुपये की राशि दी गई है और विजेता को 2.5 लाख रुपये दिए जाएँगे। इनमें से जितेश पद्मशाली, शाहरुख जे. ईरानी, डी उदय कुमार और नंदिता कोरिया मेहरोत्रा मुंबई से ताल्लुक रखते हैं, जबकि शिबिन के. के. केरल में अध्यापक हैं। यह प्रतियोगिता 15 अप्रैल को बंद हो गई थी, जिसमें सभी भारतीय नागरिकों को शामिल होने की छूट दी गई थी। डॉलर, पाउंड, येन और यूरो जैसी दुनिया के दूसरे देशों की मुद्राओं के पास अपना खास चिहन है और अभी तक रुपया इस मामले में पिछड़ा रहा है। भारतीय रुपये को वैश्विक बाजारों में अंग्रेजी में आर. एस. या फिर आई. एन. आर. (इंडियन नेशनल रुपीज) कहा जाता है, लेकिन चिन्ह मिलने पर उसे भी पहचान मिल जाएगी।

(2) सूचनाएँ

  1. डी. जी. सी. ए. की रिपोर्ट।
  2. नबंबर में विदेशी व घरेलू एयरलाइनों ने उड़ानें रद्द कीं।
  3. जेट एयरवेज ने सर्वाधिक उड़ानें रद्द कीं।
  4. समय पर वायुयान उड़ानों में पैरामाउंट व कैथे पेसिफिक सबसे आगे।

उड़ानें रदद करने में भी टॉप है जेट

नवंबर माह में घरेलू एयरलाइनों के साथ-साथ विदेशी एयरलाइनें भी विभिन्न कारणों से अपनी उड़ानें रद्द करने में आगे रही हैं। नागरिक उड्डयन महानिदेशालाय (डी०जी०सी०ए०) की ओर से जारी आँकड़ों से पता लगता है कि नवंबर माह में यात्रियों को ढोने में टॉप पर रही जेट एयरवेज उड़ानों को रद्द करने के मामले में भी टॉप पर रही है। नवंबर में औसतन रद्द उड़ानों की संख्या 1.6 फीसदी है। इसमें स्पाइस जेट 0.3 फीसदी, गो एयर 0.6 फीसदी, इंडिगो 0.6 फीसदी और पैरामाउंट विमान द्वारा उड़ाने कैंसल करने की दर 1.6 फीसदी है, लेकिन जेट एयरवेज की दर 2 फीसदी और जेट लाइट की दर 2.2 फीसदी रही है। इनमें 40 फीसदी उड़ानों को रद्द करने का तकनीकी कारण रहा है, जबकि मौसम के कारण 189 फीसदी उड़ानें रद्द हुई हैं। 41 फीसदी विमान अन्य व्यावसायिक कारणों से नहीं उड़ पाए हैं।

समय पर विमानों को उड़ानें के मामले में पैरामाउंट 85.9 फीसदी के साथ अव्वल रही है, जबकि किंगफिशर 82.5 फीसदी, स्पाइस जेट 80.3 फीसदी, इंडिगो 78.4 फीसदी और गो एयर ने 73.3 फीसदी विमानों को समय पर उड़ाया है। घरेलू के अलावा अंतर्राष्ट्रीय विमानों ने भी अपने परिचालन समय में काफी खामियाँ पेश की हैं। इसमें कैश्रे पैसिफिक के 95 फीसदी, के. एल. एम. के 90 फीसदी, सिंगापुर एयरलाइंस के 872 फीसदी और सिल्कएयर के 94.1 फीसदी विमानों ने समय से उड़ान भरी हैं।

(3) सूचनाएँ

  1. ग्रामीणों को चिकित्सा स्वास्थ्य के लिए एंबुलेंस स्कीम 102 शुरू
  2. गर्भवती महिलाओं को मिलेगी मुफ्त वाहन सेवा।
  3. स्वास्थ्य विभाग की पहल।

कारगर बनी 1o2 की हेल्पलाइन सेवा

गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य विभाग सुविधा उपलब्ध करा रहा है : मुफ्त वाहन सेवा, अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों से ए. एन. एम. दवारा गर्भवती महिलाओं को वाउचर प्रदान करना।
अगर आप गर्भवती हैं और अस्पताल से दूर किसी गाँव में रहती हैं तो घबराएँ मत। स्वास्थ्य विभाग ने ऐसी महिलाओं को हेल्थ वाउचर देने का निर्णय लिया है, ताकि उनकी डिलीवरी सही ढंग से और समय पर हो सके। इसके लिए गर्भवती महिलाओं को मुफ्त वाहन सेवा उपलब्ध कराई जा रही है। ग्रामीणों को शीघ्र चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए एंबुलेंस स्कीम 102 शुरू की गई है। इस स्कीम के तहत अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात ए. एन. एम. गाँव की गर्भवती महिलाओं को वाउचर देगी। इस वाउचर में गर्भवती महिला का पूरा ब्यौरा लिखा जाएगा। इसमें एक परफोर्मा ए. एन. एम. के पास रहेगा और दूसरा महिला के पास होगा।

गर्भवती महिला का डिलीवरी का समय नजदीक आएगा; वैसे ही ए. एन. एम. उसके संपर्क में रहेगी। इससे कर्मचारियों को इस बात की जानकारी रहेगी कि किस गाँव में डिलीवरी होनी है। इसके बाद ए. एन. एम. संबंधित एरिया की एंबुलेंस को इसकी सूचना देगी ताकि डिलीवरी कराने वाली महिला को समय से पूर्व अस्पताल में पहुँचाया जा सके। “स्वास्थ्य मंत्रालय ने गर्भवती महिलाओं को शीघ्र डिलीवरी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए मुफ्त स्वास्थ्य वाहन सेवा उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है। इसका रिकॉर्ड ए. एन. एम. अपने पास रखेगी ताकि अस्पताल से दूर रहने वाली महिलाओं की समय पर डिलीवरी हो सके।”

(4) सूचनाएँ

  1. गृह मंत्रालय द्वारा राज्यों को चेतावनी।
  2. अवैध खनन पर शिकजा कसने के लिए दबाव।
  3. अवैध खनन से हुए मुनाफे से अपराधों में बढ़ावा।
  4. 17 राज्यों में अवैध खनन जारी।

‘मुफ्त’ की खनन पर उमेठे जाएँगे कान

अवैध खनन का जोर पकड़ता चलन कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा न बन जाए। इस बात ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के कान खड़े कर दिए हैं। मंत्रालय ने राज्यों को सख्त ताकीद किया है कि अवैध खनन पर अंकुश लगाया जाए। सरकारी एजेंसियों के मुताबिक कई राज्यों में अवैध खनन का धंधा बेहद तेजी से बढ़ रहा है और इससे हो रहे मुनाफे का इस्तेमाल राष्ट्रविरोधी हरकतों को अंजाम देने में किया जा सकता है।

राज्यों के साथ हालिया बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि अवैध खनन से भारी मात्रा में पैसा बनाया जा रहा है और माफिया इसका इस्तेमाल आपराधिक तत्वों को बढ़ावा देने में कर रहे हैं। एक उच्चस्तरीय सरकारी सूत्र का कहना है कि भारतीय खनन ब्यूरो (आई.बी.एम.) ने करीब 17 राज्यों को चिहनित किया है जहाँ पर अवैध खनन का काम चल रहा है। इसमें कर्नाटक के बेल्लारहोस्यात, आध्र प्रदेश के ओबुल्लापुरम, कुरनूल और कड़प्पा, उड़ीसा के बारबिल और झारखंड के पश्चिमी सिंहभूमि और गोड्डा जिलों के नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं।

हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं और केंद्र ने राज्यों को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने इस मामले में सख्त कदम नहीं उठाए तो फिर केंद्र को ही कुछ दखल देना होगा। राज्यों और केंद्र के बीच अब 26 दिसंबर को इस मसले पर बैठक होनी है और केंद्र उम्मीद कर रहा है कि इस बैठक में राज्य किसी कारगर फॉर्मूले के साथ आएँगे।

संपादकीय लेखन के उदाहरण

1. लोकसभा चुनाव में अनेक उम्मीदवार चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा से कम खर्च दिखा रहे हैं, जबकि यथार्थ कुछ और है। संपादकीय लिखिए।

चुनाव में सीमा से भी बहुत कम खर्च

हमारे उम्मीदवार एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में खर्च की अधिकतम सीमा 25 लाख रुपये से भी बहुत कम धनराशि खर्च कर रहे हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव के बाद विभिन्न पार्टियों के उम्मीदवारों ने चुनाव में किए गए खचों का जो ब्यौरा दिया, उसका विश्लेषण नेशनल इलेक्शन वॉच नाम की एक स्वतंत्र संस्था ने किया है। उसके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं और हमारी चुनाव प्रणाली में फिर से जड़ें जमाती एक गंभीर बीमारी की ओर इशारा करते हैं। हमारे उम्मीदवार एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में खर्च की अधिकतम सीमा 25 लाख रुपये से भी बहुत कम धनराशि खर्च कर रहे हैं, बल्कि यह कहना शायद ज्यादा सही होगा कि वे हकीकत से कम खर्च दिखा रहे हैं।

जिन लगभग साढ़े छह हजार लोकसभा उम्मीदवारों ने अब तक चुनाव आयोग के सामने खर्च के ब्यौरे पेश किए हैं, उन्होंने अपने चुनाव पर निर्धारित अधिकतम सीमा से आधे से भी कम खर्च दिखाया है। अगर इसमें कम महत्वपूर्ण और पराजित उम्मीदवारों को छोड़ दें, तो केवल जीतने वाले उम्मीदवारों के खर्च का ब्यौरा भी लगभग यही कहानी कहता है। विजेता उम्मीदवारों ने चुनाव पर औसत 13.9 लाख रुपये (कांग्रेस), 15.04 लाख रुपये (भाजपा), 14.32 लाख रुपये (बसपा) और 16.31 लाख रुपये (सपा) खर्च किए।

एक समय था जब राजनीतिज्ञों ने चुनाव खर्च की सीमा को बहुत कम बताते हुए इसे बढ़ाने की माँग की थी। तब चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाते हुए ऐसी व्यवस्था की गई थी जिसमें ऑडीटर चुनाव के दौरान उनके खर्च पर निगाह रखेंगे। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन के समय में यह काम कड़ाई से होता था और उम्मीदवारों के खर्च से जुड़े इस जरूरी चुनाव सुधार का बहुत अच्छा प्रभाव देखने में आया था। चुनाव प्रचार में आज भी धन जिस तरह खर्च किया जाता है, उसका गवाह हरेक नागरिक और मतदाता है, लेकिन वह आधिकारिक रूप से प्रस्तुत खर्च के ब्यौरों में दिखाई नहीं दे रहा है।

इस तरह न सिर्फ एक जरूरी चुनाव सुधार निरर्थक हो रहा है, बल्कि धनवान और निर्धन उम्मीदवारों के बीच गैर-बराबर मुकाबले का खतरा फिर सिर उठा रहा है। उम्मीदवारों के बीच धन के मामले से मुकाबला एकसमान और बराबर रहे, इसलिए खर्च सीमा से जुड़ा यह सुधार किया गया था। इस नयी परिस्थिति पर राजनीतिक दलों को आत्मचिंतन करना चाहिए, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के इस मामले में वे ऐसा करेंगे, इसमें संदेह है। इसलिए चुनाव आयोग को इस पर विचार करके और देश में बहस चलाकर जरूरी उपाय करने होंगे।

2. पाकिस्तान में घरेलू हालात खराब हैं। इसमें भारत की क्या भूमिका हो सकती है? इस पर संपादकीय लिखिए।

राजनीतिक संकट के मुहाने पर पाकिस्तान

दिक्कत यह है कि भारत पर पाकिस्तान की गतिविधियों का सीधा असर होता है, किंतु फिलहाल सिर्फ नजर रख सकता है, कुछ कर नहीं सकता।

आने वाले दिन पाकिस्तान के लिए मुश्किलों भरे हैं। सरकार संकट में है, राष्ट्रपति समेत बड़े नेताओं के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं। मध्यावधि चुनाव के डर से विपक्षी दल भी सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं हैं। सेना सब कुछ देख रही है, पर उसका अगला कदम स्पष्ट नहीं है। उधर अमेरिका चाहता है कि पाक सेना उत्तरी वजीरिस्तान में और बलूचिस्तान में आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करे।

दक्षिणी वजीरिस्तान में ऑपरेशन खत्म माना गया है। पाकिस्तान तालिबान को बहुत नुकसान नहीं हुआ है, वे बस अभी शांत बैठ गए हैं। यह बात अमेरिका को भी मालूम है। ओबामा जल्दी में है। वे इस युद्ध को अपने पूरे कार्यकाल तक देखना नहीं चाहते, पर पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता के दौरान अमेरिका की जल्दी एक खराब संयोग है। अभी कोई भी सैनिक कार्रवाई अस्थिरता को और बढ़ावा देगी। मगर आर्थिक संकट के कारण पाकिस्तान को अमेरिका से आर्थिक सहयोग की भी दरकार है, जो बिना सैनिक कार्रवाई के नहीं मिलेगा। आका अमेरिका की सुने या अपने नागरिकों की, यह न जरदारी को समझ आ रहा है न सेना की।

भारत में सरकार और ज्यादातर नागरिक मानते रहे हैं कि स्थिर और खुशहाल पाकिस्तान भारत के हित में है। वहीं कई चिंतकों का मानना है कि पाकिस्तान की स्थिरता कभी भारत के हित में नहीं रही और मजबूत पाकिस्तान भारत के लिए मुसीबत है। दोनों पक्षों के आधार हैं और इसमें इनकार नहीं किया जा सकता कि तालिबानियों के नियंत्रण में पाकिस्तान ज्यादा घातक होगा। लोकतांत्रिक सरकारें और यहाँ तक कि सैनिक तानाशाह भी एक सीमा के भीतर ही भारत का नुकसान करते हैं। कश्मीर में आतंक फैलाने का काम इस्लामाबाद में बैठी हर तरह की शक्ति करती आई है। भारत पर होने वाले आतंकवादी हमलों को उकसाने और समर्थन देने का काम भी सबने किया है।

लेकिन जब आतंकी ही सत्ता में बैठे हों तो फिर युद्ध की संभावना प्रबल हो जाएगी और परमाणु अस्त्रों का इस्तेमाल होने का दु:स्वप्न हकीकत बन सकता है। शायद इसीलिए पाकिस्तान का एक रहना और स्थिर रहना भारत के हित में गिनाया जाता है। यही खतरा है जिसके चलते जब भी पाकिस्तान अस्थिर होता है, दिल्ली में चिंता की लकीरें उभरने लगती हैं। दिक्कत यह है कि भारत जिस पर पाकिस्तान की गतिविधियों का सीधा असर होता है, सिर्फ नजर रख सकता है, कुछ कर नहीं सकता।

पत्रकारिता के विविध आयाम का 217

3. कोपेनहेगन में पर्यावरण संबंधी विश्व सम्मेलन हुआ। इसकी सफलता व असफलता के संबंध में संपादकीय लिखिए।

लक्ष्य में परिवर्तन

दो महीने पहले टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर दी थी कि पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का सुझाव है कि भारत क्योटो समझौते से छुटकारा पाए. जी-77 से अपने आपको अलग करे और नए समझौते के तहत ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती का वादा करे और वह भी वित्त व तकनीक की काउंटर गारंटी के बिना। अखबार के मुताबिक रमेश ने तर्क दिया था कि क्योटो समझौते के तहत उत्सर्जन में कटौती की जिम्मेदारी सिर्फ विकसित देशों की ही है। उन्होंने कहा कि अमेरिका से बेहतर तालमेल में भी इससे मदद मिलेगी। अखबार ने मंत्री को उद्धरित करते हुए लिखा-अमेरिका को केंद्र में लाने के लिए की जाने वाली पहल का हम निश्चित रूप से स्वागत करेंगे।

पिछले हफ्ते के आखिर में हुए कोपेनहेगन समझौते से संकेत मिलता है कि प्रधानमंत्री ने भारत के रुख में उस बदलाव को मोटे तौर पर स्वीकार कर लिया, जिसकी सिफारिश पर्यावरण मंत्री ने अक्टूबर में की थी। हालाँकि क्योटो समझौते को कबाड़ में नहीं डाला गया है, लेकिन निश्चित तौर पर इसे हल्का कर दिया गया है और हो सकता है कि मैक्सिको सिटी में होने वाली अगली सालाना बैठक में इससे छुटकारा पा लिया जाए। इसके साथ ही भारत जिसे एकपक्षीय उत्सर्जन कटौती कहता रहा है उस बाबत अब कोपेनहेगन सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय निगरानी पर सहमति जता दी है और जी-77 के सदस्य देशों को नाखुश कर दिया है। इस तरह से भारत ने अमेरिका को केंद्र में ला दिया है।

आप चाहे इसे मंजूर करते या नहीं यह मौलिक रूप से इस पर निर्भर करता है कि क्या इससे बेहतर नतीजे मुमकिन थे। आखिर किसके निर्देश पर लक्ष्य में बदलाव किया गया और यह विवाद से परे है कि भारत ने अमेरिका को और ज्यादा जमीन मुहैया कराई है।

दूसरी वास्तविकता यह है कि ऐसे समय में जब वैश्विक समस्या के लिए वैश्विक समाधान की जरूरत है तो फिर पराए व्यक्ति ने कार्रवाई का एजेंडा तय कर दिया। ज्यादा सहयोगी देश (मसलन यूरोपीय देश) भी शक्तिहीन मसलन अफ्रीकी देशों आदि के साथ खड़े हो गए। क्या किया जा सकता है और क्या नहीं उसने तय कर दिया जो चरम स्थिति अपना चुका है-मसलन अमेरिका और चीन। यह भविष्य में वैश्विक सहयोग की बाबत कमजोर संकेत है, यह कड़ा रुख अपनाने के लिए देशों को प्रोत्साहित करेगा। ऐसी चीजें दोहरे दौर की कारोबार वार्ता में नजर आएँगी।

4. रूस ने मृत्युदंड पर रोक लगा दी। विश्व के अन्य देशों को क्या करना चाहिए। इस पर संपादकीय लिखिए।

रूस ने की मृत्युदंड पर रोक की पहल

रूस ने ऐसा करके कई लोकतांत्रिक देशों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशीलता दिखाई है।
मृत्युदंड पर रोक के एक दशक पुराने आदेश को रूस की संविधान अदालत द्वारा विस्तार देना मौत की सजा को समाप्त करने के वैश्विक रुझान को अभिव्यक्त करता है। रूस की न्यायपालिका की यह पहल 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव के साथ दृढ़ता से खड़ा होना है, जिसमें उन देशों से मृत्युदंड को लबित करने का आहवान किया गया है। जहाँ कानून की किताबों में अब भी इस सजा का प्रावधान है। रूस के इस कदम से मानवाधिकार पर यूरोपीय सम्मेलन के प्रोटोकॉल 6 के अनुमोदन में मदद मिलनी चाहिए। यूरोप परिषद की सदस्यता पाने के लिए सदस्य देशों को मृत्युदंड के बर्बर प्रावधान का उन्मूलन करना अनिवार्य है।

इसके लिए आपराधिक संहिता में से मृत्युदंड के प्रावधान को पूरी तरह से हटाना होगा। हालाँकि हाल ही में चेचेन्या ने जिस अदालती प्रक्रिया को अपनाया है, उसके तहत किसी दोषी को मृत्युदंड दिया जा सकता है। इसके मद्देनजर आशंका है कि अन्य रूसी प्रांत भी इसका अनुसरण कर सकते हैं। रूसी संघ में अंतिम बार 1996 में मृत्युदंड की सूजा पर अमल किया गया था। हाल की घटना अच्छा शगुन है। ऐसा करके रूस ने उन लोकतांत्रिक देशों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशीलता दिखाई है, जहाँ मृत्युदंड के प्रावधान को बनाए रखा गया है। अब वक्त आ गया है कि सभी सभ्य समाज अपनी कानून की किताबों को उदार मूल्यों के अनुरूप बनाएँ और मानवाधिकारों का सम्मान करें।

5. पत्रिका का संपादकीय
प्रिय पाठको,

भारतीय संस्कृति में षष्ठिपूर्ति का विशेष महत्व है। इस मौके पर विशेष आयोजन होते हैं और व्यक्ति की उपलब्धियों का लेखा-जोखा किया जाता है। आजादी की हीरक जयंती मनाते हुए लोग अपनी-अपनी तरह से 60 साल की उपलब्धियों का आकलन कर रहे हैं।

आशावादियों के चेहरे खिले हुए हैं। उनके पास आँकड़ों की चमक है। वे गर्व से बताते हैं कि हम ट्रिलियन क्लब के सदस्य बन चुके हैं, कि हमारी विकास दर लगभग 9 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, कि हमारा शेयर बाजार कुलाँचे ले रहा है और हमारे उद्योगपति विदेशी कंपनियों का धड़ाधड़ अधिग्रहण कर रहे हैं। हमारे आई. टी. विशेषज्ञों के दम पर सिलिकॉन वैली का करोबार चल रहा है। औसत आयु जो वर्ष 1951 में 33 थी, बढ़कर करीब 66 वर्ष हो गई है।

इसके बरक्स यथार्थवादी चिंतकों के पास भी दिखाने के लिए बहुत कुछ है। उनके पास आँकड़ों का अँधेरा है। इस अँधेरे में आत्महत्या करते किसान हैं, रिश्वत लेकर सवाल पूछते सांसद हैं, बंधुआ मजदूर हैं, माँ की कोख में मार दी जाती बेटियाँ हैं, दंगों में मरती मानवता है। वे ऐसे कोने दिखाते हैं जहाँ जातिवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, फाँसीवाद जैसे कई वाद फल-फूल रहे हैं। दोनों पक्ष सही हैं, लेकिन कोई भी एक पक्ष भारत की पूरी तस्वीर पेश नहीं करता है। ऐसे में आजादी की हीरक जयंती पर राष्ट्र-चिंतन की दिशा क्या हो? इस सवाल पर विचार करते हुए हमें लगा कि बीते 60 साल की उपलब्धि यों-विफलताओं को आकलन करना ही काफी नहीं है।

इतिहास गर्व करने या शर्म करने के लिए ही नहीं होता, बल्कि सही मायने में यह सबक लेने के लिए होता है।
इतिहास से सबक लेकर वर्तमान की जमीन पर भविष्य की योजनाएँ तैयार की जाती हैं। ऐसे में राष्ट्र-चिंतन के ‘कल, आज और कल’ से बेहतर सूत्र-वाक्य क्या हो सकता है। भारत के भू-वर्तमान और भविष्य की एक मुकम्मल तस्वीर लोगों के सामने आ सके, इसके लिए हमने देश से ऐसे लोगों को चुना जो अपने-अपने क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोग हैं और विषय का सटीक विश्लेषण कर सकते हैं। हैमारे आग्रह पर सबने जिस मनोयोन से भारत के ‘कल, आज और कल’ का आकलन किया है, उसे आप स्वयं महसूस करेंगे।

हमारी कोशिश यही है कि जीवन और समाज के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों का आकलन हो सके, पर आप जानते हैं कि भारत इतना विविधवर्णी है कि इसके एक-एक पहलू पर वृहद ग्रंथ रचे जा सकते हैं।
यह पत्रिका राष्ट्र के सम्मान में अर्पितु एक पुष्पगुच्छ है, जिसमें अतीत के रंग और वर्तमान के काँटों के बीच भविष्य की खुशबू है।

विशेष लेखन : स्वरूप और प्रकार
प्रश्न 1:
विशेष लेखन क्या है?
उत्तर –
वे लेखन जो किसी खास विषय पर सामान्य लेखन से हटकर किया जाए, विशेष लेखन कहलाता है। हर जनसंचार माध्यम में विशेष लेखन के लिए अलग डेस्क होता है और पत्रकार भी अलग होते हैं।

प्रश्न 2:
बीट किसे कहते हैं?
उत्तर –
समाचार-पत्र या अन्य समाचार माध्यमों द्वारा संवाददाता को किसी क्षेत्र या विषय की दैनिक रिपोर्टिग की जिम्मेदारी बीट होती है। यह रिपोर्टर का कार्यक्षेत्र निश्चित करता है। बीट रिपोर्टिग के लिए उस विषय की गहरी जानकारी, उससे संबंधित भाषा व शैली पर भी पूरा अधिकार होना चाहिए।

प्रश्न 3:
बीट रिपोटिंग व विशेषीकृत रिपोर्टिग में अंतर बताइए।
उत्तर –
बीट रिपोर्टिग के लिए संवाददाता को उस क्षेत्र व विषय की जानकारी होनी चाहिए। रिपोर्टर आमतौर पर बीट से जुड़ी सामान्य खबरें लिखता है, जबकि विशेषीकृत रिपोर्टिग में रिपोर्टर को विशेष क्षेत्र या विषय से जुड़ी घटनाओं, मुद्दों और समस्याओं का बारीकी से विश्लेषण किया जाता है।

प्रश्न 4:
विशेष लेखन की भाषा-शैली पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर –
विशेष लेखन का संबंध तकनीकी रूप से जटिल क्षेत्रों से होता है और इन क्षेत्रों से जुड़ी घटनाएँ समझना आम पाठक के लिए मुश्किल होता है। अत: आम पाठक के लिए विशेष लेखन की जरूरत होती है। इस लेखन में विषय विशेष की तकनीकी शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। इसकी कोई निश्चित शैली नहीं होती है। विशेष लेख किसी भी शैली में लिखा जाए, परंतु उसे आम लेख से अलग होना चाहिए।

प्रश्न 5:
विशेष लेखन के क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
उत्तर –
अर्थ व्यापार, खेल, कृषि, विदेश, रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध, फिल्म–मनोरंजन, सामाजिक मुद्दे आदि।

प्रश्न 6:
पत्रकारीय विशेषज्ञता का अर्थ बताइए।
उत्तर –
इसका अर्थ है कि व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित न होने के बावजूद उस विषय में जानकारी और अनुभव के आधार पर अपनी समझ को इस हद तक विकसित करना कि उस विषय या क्षेत्र में घटने वाली घटनाओं व मुद्दों की व्याख्या पाठक की समझ के अनुरूप की जा सके।

प्रश्न 7:
पत्रकारीय विशेषज्ञता कैसे हासिल की जा सकती है?
उत्तर –
पत्रकारीय विशेषज्ञता हासिल करने के तरीके निम्नलिखित हैं

  1. इच्छित क्षेत्र में रुचि होनी चाहिए।
  2. रुचि के विषय में संबंधित पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए।
  3. विशेष लेखन के लिए खुद को अपडेट करना जरूरी है।
  4. विषय क्षेत्र से संबंधित खबरें-घटनाएँ, लेख आदि का संग्रह उचित तरीके से करना चाहिए।
  5. विषय क्षेत्र से जुड़े सरकारी संस्थान, लेखक, विशेषज्ञ आदि के पते व फोन नंबर रखने चाहिए।

प्रश्न 8:
आर्थिक पत्रकारिता का महत्व बढ़ने का क्या कारण है?
उत्तर –
देश की राजनीति व अर्थव्यवस्था का गहरा रिश्ता है। आर्थिक उदारीकरण और खुली अर्थव्यवस्था लागू होने से देश की राजनीति में भी बदलाव आया है। अर्थनीति भी राजनीति को प्रभावित करने लगी है। अत: आज के समय में आर्थिक पत्रकारिता का महत्व बढ़ रहा है।

प्रश्न 9:
खेल पत्रकारिता के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर –
खेल पत्रकारिता के लिए पत्रकार को खेल की तकनीक, उसके नियमों, बारीकियों व उससे जुड़ी तमाम बातों से भलीभाँति परिचित होना चाहिए। संबंधित खेल की जानकारी होनी चाहिए तथा खेल के कीर्तिमानों का ज्ञान होना चाहिए। खेल की रिपोर्टिग में ऊर्जा, जोश, रोमांच व उत्साह दिखना चाहिए। खेल की खबर उल्टा पिरामिड शैली में शुरू होती है, परंतु दूसरे पैराग्राफ में वह घटनानुक्रम शैली में चली जाती है।

प्रश्न 10:
विशेष लेखन के लिए सूचनाओं के स्रोत कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर –
विशेष लेखन के लिए सूचनाओं के स्रोत निम्नलिखित होते हैं

  1. मंत्रालय के सूत्र
  2. प्रेस कांफ्रेंस और विज्ञप्तियाँ
  3. साक्षात्कार
  4. सर्वे व जाँच समितियों की रिपोट्र्स
  5. उस क्षेत्र में सक्रिय संस्थाएँ और व्यक्ति
  6. संबंधित विभागों और संगठनों से जुड़े व्यक्ति
  7. इंटरनेट और दूसरे संचार माध्यम
  8. स्थायी अध्ययन प्रक्रिया

अन्य लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1:
प्रिंट माध्यम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर –
प्रिंट माध्यम जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में सबसे प्राचीन हैं। इसमें पुस्तकें, पत्रिकाएँ समाचार-पत्र आदि होते हैं।

प्रश्न 2:
हिंदी में प्रकाशित होने वाले किन्हीं चार राष्ट्रीय समाचार-पत्रों के नाम लिखिए।
उत्तर –
दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, पंजाब केसरी, हरिभूमि।

प्रश्न 3:
अंशकालिक संवाददाता किसे कहा जाता है?
उत्तर –
वह संवाददाता जो किसी समाचार-पत्र में निश्चित मानदेय पर अल्पकाल के लिए कार्य करता है, उसे अंशकालिक संवाददाता कहा जाता है।

प्रश्न 4:
छापेखाने के आविष्कार का श्रेय किसको है?
उत्तर –
छापेखाने के आविष्कार का श्रेय गुटेनबर्ग को है।

प्रश्न 5:
मुद्रित माध्यमों की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर –
मुद्रित माध्यमों की दो विशेषताएँ हैं-स्थायित्व तथा लिखित भाषा का विस्तार।

प्रश्न 6:
पत्रकारीय लेखन और साहित्यिक-सृजनात्मक लेखन में अंतर बताइए।
उत्तर –
पत्रकारीय लेखन में पाठकों, दर्शकों व श्रोताओं तक सूचनाएँ पहुँचाने के लिए लेखन के विभिन्न शैलियों का प्रयोग किया जाता है, जबकि साहित्यिक-सृजनात्मक लेखन में चिंतन के द्वारा नई रचना का उद्भव होता है।

प्रश्न 7:
जनसंचार के मुद्रित माध्यमों की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर –
मुद्रित माध्यम की सबसे बड़ी विशेषता इसके स्थायित्व की है।

प्रश्न 8:
उल्टा पिरामिड शैली क्या होती है?
उत्तर –
यह समाचार लिखने की वह शैली है, जिसमें पहले इंट्रो, मध्य में बॉडी तथा अंत में समाचार होता है। इसमें महत्वपूर्ण तथ्य इंट्रो में आ जाते हैं।

प्रश्न 9:
पत्रकार की लेखन-शैली की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर –
पत्रकार की लेखन-शैली में तथ्य, भाषा की सहजता व सरलता होनी चाहिए।

प्रश्न 10:
मुद्रित माध्यमों के अंतर्गत आने वाले किन्हीं दो माध्यमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर –
समाचार-पत्र, पत्रिका, पुस्तकें।

प्रश्न 11:
समाचार-लेखन के ‘छह ककार’ कौन-से हैं?
उत्तर –
क्या, कौन, कहाँ, कब, कैसे और क्यों-छह ककार हैं।

प्रश्न 12:
फ्रीलांसर पत्रकार किसको कहते हैं?
उत्तर –
वे पत्रकार जो भुगतान के आधार पर अलग-अलग अखबारों में लिखते हैं, फ्रीलांसर पत्रकार कहलाते हैं।

प्रश्न 13:
स्तंभ लेखन का क्या तात्पर्य है?
उत्तर –
महत्वपूर्ण लेखकों के लेखों की नियमित श्रृंखला को स्तंभ लेखन कहते हैं। इसमें लेखक के निजी विचार होते हैं।

प्रश्न 14:
संपादकीय में लेखक का नाम क्यों नहीं दिया जाता?
उत्तर –
संपादकीय किसी समाचार-पत्र की विचारधारा को व्यक्त करता है। यह व्यक्ति विशेष के दृष्टिकोण को व्यक्त नहीं करता। इसी कारण संपादकीय में लेखक का नाम नहीं दिया जाता।

प्रश्न 15:
संपादकीय लेखन क्या होता है?
उत्तर –
वह लेख जो किसी घटना, समस्या या मुद्दे पर अखबार की राय व्यक्त करता है, संपादकीय लेखन कहलाता है।

प्रश्न 16:
संसार में मुद्रण की शुरूआत कहाँ से हुई?
उत्तर –
चीन से।

प्रश्न 17:
खोजी पत्रकारिता का क्या आशय है?
उत्तर –
वह पत्रकारिता जो ऐसे तथ्यों की छानबीन करती है कि जिन्हें दबाने या छिपाने का प्रयास किया जाता है, खोजी पत्रकारिता कहलाती है।

प्रश्न 18:
हिंदी में प्रसारण करने वाले किन्हीं दो समाचार चैनलों के नाम लिखिए।
उत्तर –
आज तक, जी न्यूज, स्टार न्यूज।

प्रश्न 19:
विशेषीकृत रिपोर्टिग की एक विशेषता लिखिए।
उत्तर –
इस रिपोर्टिग में विशेष क्षेत्र से जुड़ी घटनाओं, मुद्दों तथा समस्याओं का सूक्ष्म विश्लेषण करके उसे पाठकों/दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

प्रश्न 20:
संचार माध्यमों में प्रयुक्त हिंदी की एक विशेषता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर –
संचार माध्यमों में आम बोल-चाल की हिंदी का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 21:
हिंदी में प्रकाशित होने वाले दो दैनिक समाचार-पत्रों तथा दो समाचार-केंद्रित पत्रिकाओं के नाम लिखिए।
उत्तर –
दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण—दैनिक समाचार–पत्र इंडिया टुडे, आउट लुक-समाचार पत्रिका।

प्रश्न 22:
जनसंचार के प्रचलित माध्यमों में सबसे पुराना माध्यम क्या है?
उत्तर –
प्रिट माध्यम।

प्रश्न 23:
मुद्रित माध्यमों को स्थायी माध्यम क्यों कहा गया है?
उत्तर –
इस माध्यम में छपे हुए शब्दों में स्थायित्व होता है। इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इस कारण इसे स्थायी माध्यम कहा गया है।

प्रश्न 24:
रिपोर्ट लेखन की भाषा की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर –
सरल सहज व आम बोलचाल की भाषा।

प्रश्न 25:
भारत में पहला छापाखाना कहाँ और कब खुला?
उत्तर –
भारत में पहला छापाखाना गोवा में 1550 ई. में खुला।

प्रश्न 26:
‘एंकर बाइट’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर –
इसका अर्थ है-किसी घटना की सूचना देने और उसके दृश्य दिखने के साथ ही उस घटना के बारे में प्रत्यक्षदर्शियों या संबंधित व्यक्तियों का कथन दिखाकर व सुनाकर खबर को प्रमाणिकता प्रदान करना।

प्रश्न 27:
पत्रकारिता में बीट किसे कहते हैं?
उत्तर –
समाचार – पत्र अपने अनेसंवादाताओों को उनकी दिलचस्पी व ज्ञान के अनुरूप काम का विभाजन करता है। इसे बीट कहते हैं।

प्रश्न 28:
विशेष लेखन के दो प्रकार बताइए।
उत्तर –
खोजी रिपोर्ट, इन डेप्थ रिपोर्ट।

प्रश्न 29:
समाचार और फीचर में क्या अंतर होता है?
उत्तर –
समाचार में पाठकों को तात्कालिक घटनाक्रम के बारे में जानकारी दी जाती है, परंतु फीचर में पाठक का मनोरंजन करते हुए उन्हें शिक्षित किया जाता है।

प्रश्न 30:
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम प्रिंट माध्यम की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय क्यों है?
उत्तर –
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम दिन में 24 घंटे चित्र व ध्वनि के माध्यम से सूचना को रोचक ढंग से प्रसारित करते हैं, जबकि प्रिंट माध्यम के पास समय व स्थान का बंधन होता है। अत: इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अधिक लोकप्रिय है।

प्रश्न 31:
पीत पत्रकारिता का क्या आशय है?
उत्तर –
पीत पत्रकारिता में सनसनी फैलाने के लिए अफवाहें, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों, भंडाफोड़ आदि को प्रकाशित किया जाता है।

प्रश्न 32:
इंट्रो से आप क्या समझते हैं?
उत्तर –
यह समाचार का प्रारंभिक भाग है जिसमें खबर की मुख्य बातें दो-तीन पंक्तियों में बताई जाती हैं।

प्रश्न 33:
फ्लैश किसे कहते हैं?
उत्तर –
फ्लैश वह खबर है जो कम-से-कम शब्दों में दर्शकों तक तत्काल सिर्फ सूचना के रूप में दी जाती है।

पत्रकारिता के विविध आयाम 11