Chapter 11 पौधों में परिवहन

Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1. 
विसरण की दर को कौनसे कारक प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
विसरण क्रिया में ऊर्जा का व्यय नहीं होता है तथा इसमें अणु अनियमित रूप से गति करते हैं। इस कारण पदार्थ उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र में जाते हैं। विसरण की दर सांद्रता की प्रवणता, विसरण कर रहे पदार्थों के घनत्व, विसरण माध्यम आदि से प्रभावित होती है।

प्रश्न 2. 
पोरीन्स क्या हैं? विसरण में ये क्या भूमिका निभाते है?
उत्तर:
पोरीन्स (Porins): कोशिका झिल्ली में उपस्थित प्रोटीन्स जिनसे होकर प्रोटीन्स के छोटे अणु या अन्य पदार्थ जिनमें होकर आजा सकती हो, उन्हें पोरीन्स कहते हैं। बाह्य कोशिका अणु परिवहन प्रोटीन पर अनुबन्धित होकर झिल्ली की भीतरी सतह पर पहुँचकर अणु को मुक्त कर देती है। तन्त्रिका कोशिकाओं में तन्त्रिका कला से सोडियम पोटेशियम का आवागमन विद्युत विभव परिवर्तन द्वारा नियन्त्रित होता है Na+ तथा K+ गेट विद्युत परिवर्तनों के फलस्वरूप खुलते और बन्द होते हैं।

प्रश्न 3. 
पादपों में सक्रिय परिवहन के दौरान प्रोटीन पंप के द्वारा क्या भूमिका निभाई जाती है? व्याख्या करें।
उत्तर:
सक्रिय परिवहन सांद्रता प्रवणता के विरुद्ध अणुओं को पंप करने में ऊर्जा का उपयोग करता है। सक्रिय परिवहन झिल्ली प्रोटीन द्वारा पूर्ण किया जाता है। अत: झिल्ली के विभिन्न प्रोटीन सक्रिय तथा निष्क्रिय दोनों परिवहन में मुख्य भूमिका निभाते हैं। पंप एक तरह का प्रोटीन है जो पदार्थों को झिल्ली के पार कराने में ऊर्जा का प्रयोग करता है। ये पंप प्रोटीन पदार्थों का कम सांद्रता से अधिक सांद्रता तक परिवहन करा सकते हैं। परिवहन की गति अधिकतम तब होती है जब परिवहन करने वाले सभी प्रोटीन का प्रयोग हो रहा हो या वह संतृप्त ही क्यों न हो। एंजाइमों की भांति वाहक प्रोटीन झिल्ली को पार करने वाले पदार्थों के प्रति बहुत अधिक विशिष्ट होती है। यह प्रोटीन निरोधकों के प्रति भी संवेदनशील होती है जो पार्श्व श्रृंखला से प्रतिक्रिया करते हैं।

प्रश्न 4. 
शुद्ध जल का सबसे अधिक जल विभव क्यों होता है? वर्णन करें।
उत्तर:
जल विभव को सुनिश्चित करने वाले दो मुख्य कारक हैं। जल के अणुओं में गतिज ऊर्जा पाई जाती है। द्रव तथा गैस की अवस्था में वे अनियमित गति करते हुए पाये जाते हैं, यह गति तीव्र तथा स्थिर दोनों तरह की हो सकती है। किसी तंत्र में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें अधिक गतिज ऊर्जा तथा जल विभव होगा। अत: यह सुनिश्चित है कि शुद्ध जल में सबसे ज्यादा जल विभव होगा। यदि कोई दो अंतर्विष्ट जल तंत्र सम्पर्क में हों तो पानी के अणु में अनियमित गति के कारण जल के वास्तविक गति की त्वरित गति ज्यादा ऊर्जा वाले भाग से कम ऊर्जा वाले भाग में होगी। अतः जल उच्च जल विभव वाले अंतर्विष्ट जल के तंत्र से कम जल विभव वाले तंत्र की ओर जाएगा। पदार्थ की गति की यह प्रक्रिया ऊर्जा की प्रवणता के अनुसार होती है और विसरण कहलाती है। जल विभव को ग्रीक चिन्ह Psi या से चिन्हित किया गया है और इसे पास्कल्स जैसी दाब इकाई में व्यक्त किया गया है। परंपरा के अनुसार शुद्ध जल के जल विभव को एक मानक ताप पर जो किसी दाब में नहीं है, पर शुन्य माना गया है।

प्रश्न 5. 
निम्न के बीच अंतर स्पष्ट करें
(क) विसरण एवं परासरण 
(ख) वाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण 
(ग) परासरी दाब तथा परासरी विभव 
(घ) विसरण एवं अंतःशोषण
(च) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ
(छ) बिंदुनाव एवं परिवहन (अभिगमन )।
उत्तर:
(क) विसरण एवं परासरण में अंतर

विसरण (Diffusion)

परासरण (Osmosis)

विसरण द्वारा गति निष्क्रिय होती है तथा यह कोशिका के एक भाग से दूसरे भाग तक या कोशिका से अन्य कोशिका तक कम दूरी तक या ऐसा कह सकते हैं कि पत्तियों के अंतरकोशिकीय स्थान से बाह्य पर्यावरण तक कुछ भी हो सकती है। इसमें ऊर्जा का व्यय नहीं होता। विसरण में अणु अनियमित रूप से गति करते हैं, परिणामस्वरूप पदार्थ उच्च सांद्रता से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र में जाते हैं। विसरण एक धीमी प्रक्रिया है तथा वह जीवित तंत्र पर निर्भर नहीं करती। विसरण गैस व द्रव में स्पष्ट परिलक्षित होती है जबकि ठोस में ठोस का विसरण कुछ अंश तक ही संभव है। पौधों के लिये विसरण अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पादप शरीर में गैसीय गति का यह अकेला माध्यम है।

परासरण विशेष रूप से एक विभेदक या अर्ध पारगम्य झिल्ली के आर – पार जल के विसरण के लिये संदर्भित किया जाता है। परासरण स्वतः ही प्रेरित बल की अनुक्रिया से पैदा होता है। परासरण की दिशा एवं गति दाब प्रवणता एवं सांद्रता प्रवणता पर निर्भर करती है। जल अपने उच्च रासायनिक विभ (या सांद्रता) से निम्न रासायनिक विभव में तब तक संचालित होता है जया तक कि साम्यता पर न पहुँच जाए। साम्यता पर दो कक्षों का जल विभक एक – समान होना चाहिए।

(ख) बाष्पोत्सर्जन एवं वाष्पीकरण में अंतर

वाष्पोत्सर्जन (Transpiration)

वाष्पीकरण (Evaporation)

1. यह एक जैविक क्रिया है।

1. यह भोतिक क्रिया है।

2. जल पर्ण के रन्ध्रों से वाष्पित होता है।

2. जल किसी भी सतह से वाष्पित हो सकता है।

3. वामन दाब, विसरण दाब व परासरण दाब इत्यादि प्रयुक्त होते हैं।

3. किसी प्रकार का दाव आवश्यक नहीं है।

4. इसके कारण पत्ती के चारों ओर नमी का वातावरण रहता है जिससे पत्ती झुलसती नहीं है।

4. यह सूखापन करती है जिससे जीवित कोशिका झुलस जाती है।

5. द्वार कोशिकायें वाष्पोत्सर्जन में भाग लेती हैं।

5. ऐसा नहीं है।


(ग) परासरी दाब तथा परासरी विभव में अन्तर

परासरी दाब (Osmotic Pressure) = OP

परासरी विभव (Osmotic Potential) = Ψs

1. परासरण दाब ‘धनात्मक बार’ द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

1. इसे ‘ऋणात्मक बार’ द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

2. इसे मापा जा सकता है। इसे bar में मापते हैं।

2. इसे मापा नहीं जा सकता।

3. शुद्ध विलयन का परासरी दाब शून्य होता है। विलेय की सांद्रता बढ़ने के साथ – साथ यह बढ़ता है।

3. विलेय की सांद्रता बढ़ने से इसका नकारात्मक मूल्य बढ़ता है अर्थात् मान घटता है।

4. दो विभिन्न सांद्रता वाले विलयन जो अई पारगम्यझिल्ली द्वारा विलगित हों तो जल अणु कम परासरी दाब वाले विलयन की ओर गति करेंगे।

4. समान स्थिति में जल के अणु अधिक परासरी विभव वाले विलयन से कम परासरी विभव वाले विलयन की ओर गति करेंगे।


(घ) विसरण एवं अंतःशोषण में अन्तर

विसरण (Diffusion)

अंतःशोषण (Imbibition)

1. यह क्रिया अणुओं के एक उच्च सांद्रता वाले क्षेत्र से निम्न सांद्रता वाले क्षेत्र में अनियन्त्रित गति के फलस्वरूप सम्पन्न होती है।

जल अणु के अवशोषण हेतु एक अधिशोषण (adsorbant) की आवश्यकता होती है, जैसे – शुष्क पादप पदार्थ।

2. विसरण किसी भी माध्यम में हो सकता है तथा विसरित अणु ठोस, द्रव या गैस हो सकता है।

इसमें पदार्थ के ठोस कणों द्वारा किसी द्रव का बिना विलयन बनाये अन्तःशोषण होता है।

3. इसमें अणुओं या आयनों के मध्य आकर्षण आवश्यक नहीं होता।

इसमें अन्तःशोषण तथा माध्यम के अणुओं के बीच आकर्षण होना जरूरी है।

(च) पादपों में पानी के अवशोषण का एपोप्लास्ट और सिमप्लास्ट पथ

एपोप्लास्ट (Apoplast)

सिमप्लास्ट (Symplast)

1. एपोप्लास्ट निकटवर्ती कोशिका भित्ति का तंत्र है।

सिमप्लास्ट अंत:सम्बन्धित जीवद्रव्य का तंत्र है।

2. जड़ों की अंतस्त्वचा में उपस्थित कैस्पैरो पट्टी को छोड़कर पूरे पौधे में फैला रहता है।

निकटस्थ कोशिकाएँ कोशिका लड़ी से जुड़ी होती हैं जो कि जीवद्रव्य तंतु तक विस्तृत रूप से फैली रहती हैं।

3. जल का एपोप्लास्टिक परिवहन केवल अंतर – कोशिकीय जगहों और कोशिकाओं की भित्ति में उत्पन्न होता है।

सिमप्लास्टिक परिवहन में जल कोशिकाओं के जीवद्रव्य के माध्यम से तथा अंतरकोशिकीय परिवहन में यह जीवद्रव्य तंतु के माध्यम से आगे बढ़ता है।

4. एपोप्लास्ट के माध्यम से होने वाला परिवहन कोशिका झिल्ली को पार नहीं करता है। यह गति प्रवणता पर निर्भर करती है।

जल कोशिकाओं के अंदर कोशिका झिरन्ली के माध्यम से प्रवेश करता है, अत: इस प्रकार का परिवहन अपेक्षाकृत धीमा होता है।

5. एपोप्लास्ट जल के परिवहन में कोई भी बाधा नहीं डालता है और जल्न परिवहन सामूहिक प्रवाह के माध्यम से होता रहता है। जैसे ही जल अंतरकोशिकीय गुहा या वातावरण से वाष्पित होता है तो एपोप्लास्ट के सतत् जल प्रवाह में तनाव उत्पन्न हो जाता है।

सिमप्लास्टिक को परिवहन में कोशिकाद्रव्यी प्रवाह सहायता करता है। कोशिकाद्रव्यो प्रवाह को हम हाइडिला की पर्ण की कोशिका में देख सकते हैं।


(छ) बिंदुनाव एवं परिवहन ( अभिगमन ) में अंतर

बिन्दुस्राव (Guttation)

परिवहन (Transportation)

मूल दाब का प्रभाव रात्रि तथा सुबह के समय भी देखा जा सकता है, जब वाष्पीकरण की प्रक्रिया कम होती है और अतिरिक्त जल घास के तिनकों की नोक पर विशेष छिद्रों (हाइडोथोड) से सावित जल बूंदों के रूप में लटकने लगता है। इस प्रकार द्रव के रूप में जल का क्षय बिन्दुनाव (guttation) कहलाता है।

यह क्रिया सदैव (दिन, रात) को होती रहती है। इसमें जल एक स्थान से (मूल) पौधे के शीर्ष (पत्ती) तक जाता है। इसमें कोई विशेष छिद्र नहीं होते। यह जल का परिवहन है।


प्रश्न 6. 
जल विभव का संक्षिप्त वर्णन करें। कौनसे कारक इसे प्रभावित करते हैं? जल विभव, विलेय विभव तथा दाब विभव के आपसी सम्बन्धों की व्याख्या करें।
उत्तर:
जन विभव जल की गति या परिवहन को समझने के लिये आधारभूत धारणा है। विलेय विभव या विलेय अंतःशक्ति तथा दाब विभव या दाब अंत:शक्ति जल विभव को सुनिश्चित करने वाले दो मुख्य जल के अणुओं में गतिज ऊर्जा पाई जाती है। द्रव तथा गैस की अवस्था में वे अनियमित गति करते हुए पाये जाते हैं, यह गति तीव्र तथा स्थिर दोनों तरह की हो सकती है। किसी तंत्र में यदि अधिक मात्रा में जल हो तो उसमें अधिक गतिज ऊर्जा तथा जल विभव होगा। अत: यह सुनिश्चित है कि शद्ध जल में सबसे ज्यादा जल विभव होगा। यदि कोई दो अंतर्विष्ट जल तंत्र सम्पर्क में हों तो जल के अणु की अनियमित गति के कारण जल के वास्तविक गति की त्वरित गति ज्यादा ऊर्जा वाले भाग से कम ऊर्जा वाले भाग में होगी। अत: जल उच्च जल विभव वाले अंतर्विष्ट जल के तंत्र से कम जल विभव वाले तंत्र की ओर जाएगा।

पदार्थ की गति की यह प्रक्रिया ऊर्जा की प्रवणता के अनुसार होती है और विसरण कहलाती है। जल विभव को ग्रीक चिन्ह Psi या Ψ से चिन्हित किया जाता है और इसे पास्कल्स जैसी दाब इकाई में व्यक्त किया जाता है। परंपरा के अनुसार शुद्ध जल के जल विभव को एक मानक ताप पर जो किसी दाब में नहीं है, पर शून्य माना जाता है। सभी विलयनों में शुद्ध जल की अपेक्षा जल विभव निम्न होता है। इस निम्नता का परिणाम एक विलेय के द्रवीकरण के कारण है जिसे विलेय विभव कहा जाता है या Ψs सदैव ऋणात्मक होता है, जब विलय के अणु अधिक होते हैं तो Ψs अधिक ऋणात्मक होता है। वायुमण्डलीय दबाव पर विलेय या घोल का जल विभव Ψs = विलेय विभव Ψs होता है। जब विसरण के कारण पौधे की कोशिका में जल प्रवेश करता है और वह कोशिका भित्ति की ओर बढ़ा देता है और कोशिका को स्फीत (फुला) कर देता है। यह दाब विभव को बढ़ा देता है। दाय विभव अधिकांशत: सकारात्मक होता है। यद्यपि पौधों में ऋणात्मक विभव या जाइलम के जल खण्ड में तनाव एक तने में जल के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दाब विभव को से चिन्हित किया गया है। कोशिका का जल विभव, विलेय एवं दाब विभव दोनों ही से प्रभावित होता है। इन दोनों के बीच सम्बन्ध निम्न प्रकार से होता है
Ψ = Ψs + Ψp

प्रश्न 7.
तब क्या होता है जब शुद्ध जल के विलवन पर पर्यावरण के दाब की अपेक्षा अधिक दाब लागू किया जाता है?
उत्तर:
यदि शुद्ध जल या विलयन पर पर्यावरण (वायुमंडलीय) के दाय की अपेक्षा अधिक दबाव लगाया जाए तो उसका जल विभव बढ़ जाता है। यह एक जगह से दूसरी जगह पानी पम्प करने के बराबर होता है। जब विसरण के कारण पौधे की कोशिका में जल प्रवेश करता है और वह कोशिकाभित्ति की ओर बढ़ा देता है और कोशिका को स्फीत बना (फुला) देता है। यह दाय विभव को बढ़ा देता है। दाब विभव ज्यादातर सकारात्मक होता है। यद्यपि पादपों में नकारात्मक विभव या जाइलम के जल खण्ड में तनाव एक तने में जल के परिवहन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दाब विभव को पसे चिन्हित किया गया है। कोशिका का जल विभव, विलेय एवं दाब विभव दोनों ही प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 8.  
(क) रेखांकित चित्र की सहायता से पौधों की जीवद्रव्य कंचन की विधि का वर्णन उदाहरण देकर करें।
(ख) यदि पौधे की कोशिका को उच्च जल विभव वाले बिलयन में रखा जाए तो क्या होगा?
उत्तर:
(क) जीवद्रव्य कुंचन तय होता है जब कोशिका से जल बाहर गति कर जाए तथा पादप कोशिका की कोशिका झिल्ली सिकुड़कर कोशिकाभित्ति से अलग हो जाती है। यह तब होता है जब कोशिका (या उत्तक) को अतिपरासरी घोल में डाला जाता है। सर्वप्रथम जीवद्रव्य से जल बाहर आता है फिर रसधानी से। जब कोशिका से विसरण द्वारा जल निकलकर बाहरी कोशिकाद्रव्य में जाता है, तब जीवद्रव्य कोशिकाभित्ति से अलग हो जाता है और इसे कोशिका का जीवद्रव्यकुंचन कहा जाता है। जल का परिवहन झिल्ली के आर-पार उच्चतर जल विभव क्षेत्र (अर्थात् कोशिका) से निम्नतर जल विभव क्षेत्र में कोशिका के बाहर जाता है। 


(ख) जीवद्रव्य संकुचन की प्रक्रिया प्रायः प्रतिवती होती है। जब कोशिकाओं को अल्पपरासरी (उच्च जल विभव या जीवद्रव्य की तुलना में तनुकत) विलयन में रखा जाता है तो कोशिका में जल विसरित होता है और जीवद्रव्य को भित्ति के विरुद्ध दबाव बनाने का कारण बनता है जिसे स्फीति दाब कहा जाता है। जल प्रवेश करने के कारण जीवद्रव्य द्वारा प्रकट की गई कठोर भित्ति के विपरीत दाब को दाय विभव या Ψp कहते हैं। कोशिका भित्ति की दृढ़ता के कारण कोशिका नहीं फटती है। यह स्फीति दाब अंततः कोशिकाओं के विस्तार एवं फैलाव के लिये उत्तरदायी होता है।

प्रश्न 9. 
पादप में जल एवं खनिज के अवशोषण में माइकोराइजलीय (कवकमूल सहजीवन) संबंध कितने सहायक हैं?
उत्तर:
कुछ पौधों में अतिरिक्त संरचनाएँ जुड़ी होती हैं जो उनें जल एवं खनिजों के अवशोषण में सहायता करती हैं। माइकोराइजा (कवक मूल) जड़ के साथ कवक (Fungi) का सहजीव संबंध होता है। कवकतन्तु नई जड़ों के आस-पास नेटवर्क बनाते हैं या वे मूल कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं। कवक तंतु का एक बड़ा व्यापक तल क्षेत्र होता है जो भूमि से खनिज आयन एवं जल को मूल से अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेता है। ये कवक जड़ को जल एवं खनिज उपलब्ध कराते हैं और बदले में जड़ें भी माइकोराइजी को शर्करा तथा नाइट्रोजन समाहित यौगिक प्रदान करते हैं। कुछ पौधों का कवक मूल के साथ अविकल्पी संबंध होता है। उदाहरण के लिये, माइकोराइजा की उपस्थिति के बिना चीड़ का बीज न तो अंकुरित हो सकता है और न ही स्थापित हो सकता है।

प्रश्न 10. 
पादप में जल परिवहन हेतु मूलदाब क्या भूमिका निभाता है?
उत्तर:
जैसे कि मृदा में विभिन्न आयन सक्रियता के साथ जड़ों के संवहनी ऊतकों में परिवहनित होते हैं तो जल भी इसी प्रक्रिया का अनुसरण (अपनी विभव प्रवणता से) करता है तथा जाइलम के अंदर दाब बढ़ाता है। यह धनात्मक दाब ही मूलदाब कहलाता है और तने में कम ऊंचाई तक जल को ऊपर भेजने के लिये उत्तरदायी होता है। मूलदाब को देखने के लिये एक छोटा – सा नरम तने वाला पौधा चुनें और जिस दिन वातावरण पर्याप्त आर्द्रतापूर्ण हो, उस दिन प्रात:काल के समय तने के नीचे तिज दिशा में उसे तीखे ब्लेड से काट दें। हम जल्द ही देखेंगे कि उस कटे हुए तने पर द्रव की कुछ माशा ऊपर की ओर उठ जाती है। 


यह द्रव सकारात्मक मूल दाब के कारण आता है। यदि आप उस तने में एक रबर की पतली नली चढ़ा दें तो आप स्राव की दर माप सकते हैं और सावित द्रव के कारकों की संरचना जान सकते हैं। मूल दाय का प्रभाव राधि तथा प्रात:काल के समय भी देखा जा सकता है, जब वाष्पीकरण की प्रक्रिया कम होती है और अतिरिक्त जल घास के तिनकों की नोक पर विशेष छिद्रों से सावित जल बूंदों के रूप में लटकने लगता है। इस प्रकार द्रव के रूप में जल का क्षय बिन्दुस्राव (Gutation) कहलाता है।
जल परिवहन की कुल क्रिया में मूलदाय केवल एक साधारण दाब ही प्रदान कर पाता है। उच्च वृक्षों में जल के चलन में इसकी कोई बड़ी भूमिका नहीं होती है। मूलदाय का व्यापक योगदान जाइलम में पानी के अणुओं को निरंतर कड़ी के रूप में स्थापित रखने में हो सकता है जो कि प्रायः वायोत्सर्जन के द्वारा पैदा किये गये बृहत् तनावों के कारण टूटती रहती है। अधिकांश जल को परिवहन करने में मूल दाब का कोई अर्थ नहीं है। अधिकतर पौधों को आवश्यकता वाष्पोत्सर्जनित खिंचाव से पूरी हो जाती है।

प्रश्न 11. 
पादपों में जल परिवहन हेतु वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल की व्याख्या करें। वाष्पोत्सर्जन क्रिया को कौन-सा कारक प्रभावित करता है, पादपों के लिये कौन उपयोगी है?
उत्तर:
प्राणियों की भांति पौधों में परिसंचरण तंत्र नहीं होता है, इसके बावजूद जाइलम के माध्यम से जल का ऊपरी बहाव पर्याप्त उच्च दर से, लगभग 15 मीटर प्रति घण्टे तक हो सकता है। यह गति कैसे होती है? आज तक यह एक पहेली बनी हुई है। पौधों के द्वारा पानी ऊपर की ओर धकेला जाता है या फिर ऊपर से खींचा जाता है। अधिकतर शोधकत्ता सहमत हैं कि पौधों द्वारा पानी मुख्यतः वींचा आता है और इसकी संचालन शक्ति पत्तियों में वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया का परिणाम है। इसे जल परिवहन का संसंजन-तनाव वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull): प्राणियों की जैसे पौधों में परिसंचरण तंत्र नहीं होता है। इसके बावजूद भी पौधों में जाइलम के माध्यम से जल का ऊपरी बहाव पर्याप्त उच्च दर से, लगभग 15 मीटर प्रति घण्टे की दर से हो सकता है। अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना है पौधों के द्वारा जल को खींचा जाता है और इसकी संचालन शक्ति पत्तियों में वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया द्वारा होती है। इसे जल परिवहन का संसंजन तनाव वाष्पोत्सर्जन खिंचाव मॉडल (Cohesion Tension Transpiration Pull Model) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। 

वाष्योत्सर्जन खिंचाव एवं संसंजन तनाव सिद्धान्त (Transpiration Pull and Cohesion Tension Theory): इस सिद्धान्त को डिक्सन एवं जौली (Dixon and Jolly, 1894) ने प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त के अनुसार ऊँचे – ऊँचे वृक्षों में रसारोहण निम्न तथ्यों पर आधारित है:
(अ) वाष्पोत्सर्जनाकर्षण या वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull)
(ब) जल का संसंजन बला (Cohesive Force of Water)

(अ) वाष्पोत्सर्जनाकर्षण या वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpiration Pull): पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं की कोशिका भित्तियों से वाष्पोत्सर्जन के कारण जल का वाष्पन होता है जिसके फलस्वरूप इन कोशिकाओं की परासरण सांद्रता तथा विसरण दाब न्यूनता (DPD) अधिक हो जाती है जिससे इन कोशिकाओं में पानी की कमी हो जाती है। इस कमी को पूरा करने के लिए जल पत्तियों के जाइलम से खिंचकर परासरण द्वारा पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं (mesophyll cells) में प्रवेश करता है। पौधों में अधिक वाष्पोत्सर्जन होने पर पानी जाइलम वाहिनियों द्वारा उतने ही अधिक बल से ऊपर खिंचने लगता है। इस प्रकार वाष्पोत्सर्जन के कारण जाइलम द्रव्य पर एक तनाव (Tension) उत्पन्न हो जाता है। चूंकि यह वाष्पोत्सर्जन के कारण उत्पन्न होता है इसलिए इसे वायोत्सर्जनाकर्षण (Transpiration Pull) कहा है। पानी के इस स्तम्भ (column) को जो जड़ से लेकर तने और पत्तियों तक फैला रहता है, वाष्योत्सर्जन धारा (Transpiration stream) कहते हैं। जल वाष्पोत्सर्जनाकर्षण या वाष्पोत्सर्जन खिंचाव द्वारा ही ऊपर की ओर चढ़ता है



(ब) जल का संसंजन बल (Cohesive Force of Water): जल के अणुओं के मध्य हाइड्रोजन बन्ध (H – bonds) होते हैं। जिसके फलस्वरूप उनमें परस्पर आकर्षण (Mutual Attraction) होता है और ये आपस में जुड़े रहते हैं। जल के अणुओं के इस गुण को संसंजक बल कहते हैं। जल के अणुओं का संसंजक बल इतना अधिक होता है कि ये अणु जाइलम में पानी की एक अखण्ड धारा (Continuous Water Column) के रूप में जुड़ जाते हैं। यह धारा अणुओं के मध्य अत्यधिक आकर्षण के कारण आसानी से टूट नहीं पाती।

पत्तियों की सतह से हो रहे वाष्पोत्सर्जन के कारण पत्तियों के जाइलम में उपस्थित जल पर तनाव उत्पन्न हो जाता है। यह तनाव पर्णवृन्त (petiole) तथा तने के जाइलम के पानी से होता हुआ जड़ों के जाइलम में उपस्थित पानी तक पहुंच जाता है जिससे जल एक अखण्ड स्तम्भ के रूप में ऊपर की ओर पौधों की चोटी तक खिंचता है। इस क्रिया में जाइलम वाहिनियाँ (vessels) एवं वाहिनिकाएँ (trachieds) केवल एक नरनी के रूप में कार्य करती हैं जिनमें होकर जल ऊपर चढ़ता है।
कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार हवा के बुलबुले (air bubbles) जाइलम में प्रवेश कर जाते हैं जो जाइलम में जल स्तम्भ की सततता या अखण्डता को तोड़ सकते हैं और रसारोहण की प्रभावी क्रियाविधि में अवरोध उत्पन्न कर सकते हैं परन्तु इसके लिए यह बताया गया है कि पौधों में अनेक जाइलम वाहिनियाँ होती हैं। इनमें से कुछ में बुलबुले होने पर भी सम्पूर्ण जाइलम में उपस्थित पानी के स्तम्भ की अखण्डता पर प्रभाव नहीं पड़ता और इस प्रकार कुछ बुलबुले होने पर भी जाइलम में जल का प्रवाह निरन्तर बना रहता है।

प्रश्न 12. 
पादपों में जाइलम रसारोहण के लिये जिम्मेदार कारकों की व्याख्या करो।
उत्तर:
जाइलम रस का वाष्पोत्सर्जित रूप से ऊपर चढ़ना मुख्य रूप से जल के निम्न भौतिक गुणों पर निर्भर करता है:

जल की ये विशिष्टतायें उसे उच्च तन्य सामर्थ्य प्रदान करती हैं, जैसे एक कोशिकात्व खिंचाव शक्ति से प्रतिरोध की क्षमता तथा उच्च कोशिकात्व अर्थात् किसी पतली नलिका से चढ़ने की क्षमता। पौधों में कोशिकाव को लघु व्यास वाले वाहिकीय तत्व, जैसे-ट्रैकीड एवं वाहिका तत्व से भी सहायता मिलती है। वाष्पोत्सर्जन द्वारा पैदा किया गया बल जल को जाइलम के आकार के स्तम्भ में 130 मीटर की ऊँचाई तक खींचने के लिये पर्याप्त होता है।

प्रश्न 13. 
पादपों में खनिजों के अवशोषण के दौरान अंतस्त्वचा की आवश्यक भूमिका क्या होती है?
उत्तर:
सभी कोशिकाओं की भांति अंतस्त्वचा में भी कोशिका की झिल्ली में अनेक परिवहन प्रोटीन पाए जाते हैं। वे कुछ विलेय को झिल्ली के आर – पार आने – जाने देते हैं परन्तु अन्य को नहीं। अंतस्त्वचा की कोशिकाओं के परिवहन प्रोटीन नियंत्रण बिंदु होते हैं, जहाँ पौधे विलेय की मात्रा एवं प्रकार को जाइलम में पहुंचाते हैं तथा समायोजित करते हैं। मूल अंतस्त्वचा में सुबेरिन की पट्टी होने के कारण एक दिशा में ही सक्रिय परिवहन करने की क्षमता होती है।

प्रश्न 14. 
जाइलम परिवहन एकदिशीय तथा फ्लोयम परिवहन द्विदिशीय होता है। व्याख्या करें।
उत्तर:
आहार मुख्यतः शर्करा वाहिका ऊतक के फ्लोयम द्वारा उद्गम से कुंड की ओर परिवहनित किया जाता है। सामान्यतः स्रोत के पौधे का वह हिस्सा माना जाता है जहां आहार संश्लेषित होता है, जैसे कि पत्तियाँ और कुंड (sink)। यह वह भाग है जहां भोजन एकत्रित होता है। परन्तु यह स्रोत और कुंड अपनी भूमिकाएं मौसम एवं जरूरत के अनुसार बदल भी सकते हैं। जड़ों में एकत्र की गई शर्करा बसंत के आरम्भ में आहार का स्रोत बन जाती है। इस समय पादपों पर नई कलियां कुंड का काम करती हैं। प्रकाश – संश्लेषण साधनों की वृद्धि एवं परिवर्धन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है। चूंकि स्रोत और कुंड का सम्बन्ध परिवर्तनशील है, अत: गति की दिशा ऊपर या नीचे की ओर अर्थात् दोतरफा हो सकती है। जाइलम के साथ यह विपरीत है, जहाँ गति सदैव नीचे से ऊपर की ओर एक दिशा में होती है। यद्यपि, वाष्पोत्सर्जन का जल एकतरफा प्रवाह करता है परन्तु फ्लोएम के रस में भोजन का परिवहन सभी दिशाओं में हो सकता है जब तक स्रोत और कुंड शर्करा का उपयोग संग्रहण तथा अपादान में सक्षम हो। फ्लोयम रस में मुख्यतः जल और शकरा होती है, परन्तु अन्य शर्करायें, हार्मोन तथा अमीनो अम्ल आदि भी पलोयम के द्वारा स्थानान्तरित होते हैं। फ्लोयम में स्थानान्तरण द्विदिशीय होता है।

प्रश्न 15. 
पादपों में शर्करा के स्थानान्तरण के दाब प्रवाह परिकल्पना की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
दाब प्रवाह या सामूहिक प्रवाह परिकल्पना (Pressure Flow or Combined or Mass Flow Hypothesis)
इस परिकल्पना का प्रतिपादन मुन्च (Munch, 1930) ने किया था। परिकल्पना के अनुसार खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण, सांद्रता प्रवणता (Concentration Gradient) के अनुरूप, उनके स्रोत अथवा निर्माण के स्थान से उनके उपयोग के स्थान तक फ्लोयम द्वारा ही होता है। प्रकाश – संश्लेषण में बना हुआ कार्बोहाइड्रेट पत्तियों के पर्णमध्योतक (Mesophyll) की कोशिकाओं में एकत्रित होता है। यह सुक्रोस के रूप में बदल जाता है और कोशिकाओं की परासरण सांद्रता बढ़ा देता है।

फलस्वरूप पास वाली जाइलम की कोशिकाओं से पानी पर्णमध्योतक की कोशिकाओं में आने लगता है और उनका स्फीति दाब (Turgor Pressure) बढ़ जाता है, परन्तु उपभोग केन्द्र अथवा जड़ की कोशिकाओं में सुक्रोस कम होने के कारण स्फीति दाब भी कम रहता है। इस प्रकार स्रोत (पर्णमध्योतक) और उपभोग केन्द्र (जड़ की कोशिकायें) के बीच स्फीति दाब का अन्तर अथवा स्फीति दाब प्रवणता (gradient) उत्पन्न हो जाती है। इस कारणवश खाद्य पदार्थ, सुक्रोस के घोल के रूप में पत्ती से जड़ की ओर जाने लगता है। इस स्थानान्तरण को द्रव्यमान प्रवाह (Mass Flow) कहा जाता है। सुक्रोस जड़ों में पहुँचने के पश्चात् मण्ड में बदल जाता है और पानी पुनः जाइलम द्वारा ऊपर की ओर प्रवाहित हो जाता है।

प्रकाश – संश्लेषण में जैसे ही ग्लूकोज बनता है, उसे शर्करा में बदल दिया जाता है। अब यह शर्करा सखी कोशिकाओं (Companion Cells) में तथा बाद में सक्रिय परिवहन द्वारा सजीव फ्लोयम चालनी नलिका कोशिका में संचरित होती है। इससे फ्लोयम में अतिपरासारी अवस्था पैदा हो जाती है। निकटवर्ती जाइलम का जल परासरण के द्वारा फ्लोयम में चला जाता है। जब पलोयम में परासरणी दाब बनता है तो फ्लोयम रस निम्न दाब के क्षेत्र में चला जाता है अर्थात् कुंड या संग्रहण क्षेत्र में चला जाता है। संग्रहण क्षेत्रों में शर्करा स्टार्च या सेलुलोज में बदल जाती है। इसमें सक्रिय परिवहन होता है। इन क्षेत्रों में जैसे ही शर्करा, स्टार्च में बदलती है तो परासरणी दाब घटने के कारण जल फ्लोयम से बाहर चला जाता है। सारांश यह है कि फ्लोयम शर्कराओं का परिवहन स्रोत से प्रारम्भ होता है, जहाँ शर्कराओं को एक चालनी नलिका में सक्रिय परिवहन द्वारा डाला जाता है। इस कारण फ्लोयम में जल विभव प्रवणता उत्पन्न होती है जिससे फ्लोयम में सामूहिक प्रवाह सुलभता से होता है।


फ्लोयम ऊतक में चालनी नलिका कोशिका (sieve tube cell) होती हैं। ये लम्बी होती हैं तथा इनकी अन्तिम भित्ति में छिद्र होते हैं, जिसे चालनी पट्टिका (sieve plate) कहते हैं। कोशिकाद्रव्यी तन्तु चालनी पट्टिका के छिद्र में प्रवेशित होती है तथा सतत (continuous) तन्तु बनाती है। जैसे ही द्रवस्थैतिक दबाव फ्लोयम के चालनी नलिका में बढ़ता है दाब प्रवाह शुरू हो जाता है तथा द्रव (रस) फ्लोयम से चलन करता है। इस बीच कुंड पर आने वाले शर्करा को फ्लोयम से सक्रिय रूप से तथा शर्करा के रूप में बाहर किया जाता है। फ्लोयम में विलेय की क्षति से एक उच्च जल विभव पैदा होता है और पानी अन्त में जाइलम के पास आ जाता है।

भोजन के परिवहन में होने वाले ऊतक को पहचानने के लिए गर्डलिंग (girdling) प्रयोग किया गया। पेड़ के स्तम्भ पर छाल का एक वलय (ring) फ्लोयम तक सावधानीपूर्वक हटाया जाता है। नीचे की ओर भोजन की गति न होने के कारण वलय की ऊपर की छाल कुछ सप्ताह पश्चात् फूल जाती है। अत: इससे ज्ञात होता है कि भोजन के स्थानान्तरण हेतु फ्लोयम ऊतक उत्तरदायी होती है तथा परिवहन की दिशा ऊपर से नीचे एकदिशीय होती है।

प्रश्न 16. 
वाष्पोत्सर्जन के दौरान रक्षक द्वार कोशिका खलने एवं बंद होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
रंध्र का बंद होना व खुलना रक्षक कोशिकाओं के स्कीति (lurgor) में बदलाव से होता है। प्रत्येक रक्षक कोशिका की आंतरिक भित्ति रंध्र छिद्र की तरफ अधिक मोदी एवं तन्यतापूर्ण होती है। रंध्र को घेरे दो रक्षक कोशिकाओं में जब स्फीति दाब बढ़ता है तो पतली बाहरी भित्तियाँ बाहर की ओर उभरती हैं और अंदरूनी भित्ति को अर्थचन्द्राकार स्थिति में आने को मजबूर करती हैं तथा रन्ध्र छिद्र खल जाते हैं। रंध्र छिद्र के खुलने में रक्षक कोशिका की भित्तियों में उपस्थित सूक्ष्म सूत्राभ (microfibril) भी सहायता करते हैं। सेल्यूलोस सूक्ष्म सूत्राभ का अभिविन्यास अरीय क्रम में होता है न कि अनुदैर्घ्य क्रम से, जो रंध्र छिद्र को आसानी से खोलता है। पानी की कमी होने पर जब रक्षक कोशिका की स्फीति समाप्त होती है (या जल तनाव खत्म होता है) तो तन्य आंतरिक भित्तियाँ पुनः अपनी मूल स्थिति में जाती हैं, तब रक्षक कोशिकाएँ ढीली पड़ जाती हैं और रंध्र छिद्र बंद हो जाते हैं। सामान्य तौर पर एक पृष्वाधारी (द्विबीजपत्री) पत्ती के निचली और अधिक संख्या में रन्ध्र होते हैं जबकि एक द्विपावीय (एकबीजपत्री) पत्ती में रंधों की संख्या दोनों तरफ लगभग बराबर होती है।

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