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Chapter 12 उपभोक्ता संरक्षण

RBSE Class 12 Business Studies उपभोक्ता संरक्षण Textbook Questions and Answers

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
किस उपभोक्ता अधिकार के अंतर्गत एक व्यापारिक फर्म को उपभोक्ता शिकायत कक्ष स्थापित करना आवश्यक है?
उत्तर:
उपभोक्ता अधिकार जो एक व्यापारिक फर्म को उपभोक्ता शिकायत कक्ष स्थापित करता है, उसे ‘शिकायत का अधिकार’ कहा जाता है। इस अधिकार के तहत उसे शिकायत दर्ज कराने तथा उसकी सुनवाई का अधिकार है।

प्रश्न 2. 
कृषि उत्पादों के लिए कौन-सा गुणवत्ता प्रमाणीकरण चिन्ह उपयोग किया जाता है ?
उत्तर:
कृषि उत्पादों के लिए गुणवत्ता प्रमाणीकरण चिह्न जो उपयोग किया जाता है, उसे ‘एगमार्क’ कहते हैं जो कि कृषि विपणन का एक संक्षिप्त नाम है।

प्रश्न 3. 
राज्य आयोग में दायर किए जा सकने वाले मामलों का अधिकार क्षेत्र क्या है ?
उत्तर:
राज्य आयोग में दायर किये जा सकने वाले मामलों का अधिकार क्षेत्र 20 लाख रुपये से अधिक हो, लेकिन 1 करोड़ से अधिक न हो।

प्रश्न 4. 
सी.पी.ए. के तहत उपभोक्ताओं को उपलब्ध दो राहत बताएँ।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (सी.पी.ए.) के तहत उपभोक्ताओं को उपलब्ध राहते हैं-

  • दोषपूर्ण वस्तुओं को हटाना 
  • अनुचित व्यापार क्रियाओं को रोकना।

प्रश्न 5. 
उत्पाद मिश्र के घटक का नाम दें, जो ग्राहकों को सूचना का अधिकार का प्रयोग करने में मदद करता है।
उत्तर:
उत्पाद मिश्र का घटक जो ग्राहकों को सूचना का अधिकार का प्रयोग करने में मदद करता है, उसे वस्तुओं का गुणवत्ता मानक कहा जाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा में भारत सरकार द्वारा पारित विभिन्न अधिनियमों पर संक्षिप्त चर्चा करें।
उत्तर:
उपभोक्ता के हितों की रक्षा में सहायता करने के लिए भारत सरकार ने निम्नलिखित कानून बनाये हैं-

  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986; 
  • प्रसंविदा अधिनियम, 1982; 
  • वस्तु विक्रय अधिनियम, 1930; 
  • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1995; 
  • कृषि उत्पाद (श्रेणीकरण एवं चिन्हांकन) अधिनियम, 1937; 
  • खाद्य मिलावट अवरोध अधिनियम, 1954; 
  • माप-तौल मानक अधिनियम, 1976%; 
  • ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999; 
  • प्रतियोगिता अधिनियम, 2002; 
  • भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 1986।

प्रश्न 2. 
उपभोक्ता के दायित्व क्या हैं?
उत्तर:
उपभोक्ता के दायित्व- 

  • बाजार में उपलब्ध विभिन्न वस्तु एवं सेवाओं के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी रखना। 
  • केवल मानक वस्तुओं को ही खरीदें तथा बिजली के सामान पर ‘ISI’ चिह्न, खाद्य उत्पादों पर ‘FPO’ तथा आभूषणों पर ‘हॉलमार्क’ देखें। 
  • वस्तु एवं सेवाओं से जुड़ी जोखिमों के सम्बन्ध में अवगत हों तथा निर्माता के दिशा-निर्देशों का पालन करें। 
  • वस्तु पर लगे लेबल को ध्यान से पढ़ें और उनके मूल्य, शुद्ध वजन एवं उपभोग करने योग्य तिथि की जानकारी प्राप्त करें।
  • अपनी दृढ़ता का परिचय दें।
  • वस्तुओं एवं सेवाओं के लेन-देन में ईमानदारी बरतें। 
  • कानून सम्मत वस्तुओं एवं सेवाओं को ही खरीदें तथा अनावश्यक कालाबाजारी, जमाखोरी जैसे अनुचित आचरणों को निरुत्साहित करें। 
  • वस्तु एवं सेवाओं को खरीदने पर उनकी नकद रसीद प्राप्त करें। 
  • यदि क्रय की गई वस्तुओं अथवा सेवाओं की गुणवत्ता में कोई कमी हो तो उचित उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करायें। 
  • उपभोक्ता परिषद् का गठन करें। 
  • पर्यावरण को स्वच्छ रखें, उसे दूषित होने से बचायें।

प्रश्न 3. 
उपभोक्ता अदालत में शिकायत कौन दर्ज कर सकता है?
उत्तर:
किसी भी उपयुक्त उपभोक्ता फोरम के समक्ष शिकायत निम्न के द्वारा की जा सकती है-

  • कोई भी उपभोक्ता; 
  • कोई भी पंजीकृत उपभोक्ता; 
  • केन्द्रीय सरकार या कोई भी राज्य सरकार;
  • उन अनेक समान हित रखने वाले उपभोक्ताओं की ओर से कोई एक या एक से अधिक उपभोक्ता; एवं
  • किसी मृतक उपभोक्ता के कानूनी उत्तराधिकारी अथवा प्रतिनिधि।

प्रश्न 4. 
एफ.एस.एस.ए.आई. (भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) ने होटलों और अन्य खाद्य दुकानों को प्रस्तावित किया कि वे अपनी व्यंजन सूची में प्रत्येक खाद्य सामग्री में प्रयोग किए जाने वाले तेल/वसा का विवरण दें। इस प्रस्ताव के द्वारा किस उपभोक्ता अधिकार को सशक्त किया जा रहा है? नाम बताएँ और व्याख्या करें।
उत्तर:
इस प्रस्ताव के द्वारा सूचना का अधिकार’ को सशक्त किया जा रहा है। इस अधिकार में उपभोक्ता को उस वस्तु के संबंध में पूरी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है जिसका वह क्रय करना चाहता है। जिसमें उसके घटक, निर्माण तिथि, मूल्य, मात्रा, उपयोग के लिए दिशा-निर्देश आदि सम्मिलित हैं। इसी कारण भारत में कानूनन निर्माताओं को सभी सूचनाएँ उत्पाद के पैकेज एवं लेबल पर देनी होती हैं।

प्रश्न 5. 
सी.पी.ए. के अनुसार उपभोक्ता कौन है?
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम या सी.पी.ए. के अनुसार उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो वस्तुओं को खरीदता है, उनका उपयोग करता है अथवा उपभोग करता है या फिर सेवाओं का लाभ उठाता है। वह प्रतिफल के बदले सेवाओं को भाड़े पर प्राप्त करता है या उपयोग करता है, जिसका भुगतान कर दिया हो अथवा करने का वचन दिया हो। इसमें ऐसी सेवाओं से लाभान्वित होने वाला व्यक्ति भी सम्मिलित है, जिसने पहले वाले व्यक्ति की अनुमति से सेवाओं का उपयोग किया है। 

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
व्यापार के दृष्टिकोण से उपभोक्ता संरक्षण के महत्व की व्याख्या करें। 
उत्तर:
व्यापार की दृष्टि से उपभोक्ता संरक्षण का महत्त्व-
1. व्यवसाय का दीर्घ आवधिक हित-आज का जागरूक व्यवसायी इस बात से भली-भाँति परिचित हो चुका है कि उपभोक्ता की सन्तुष्टि या संरक्षण दी गई अवधि में उन्हीं के हित में है। क्योंकि यदि उपभोक्ता सन्तुष्ट हो तो वह न केवल माल खरीदेगा बल्कि मिलनेजुलने वालों को भी कहेगा।

व्यवसाय समाज के संसाधनों का उपभोग करता है-समाज के अधिकार वाले संसाधनों का उपभोग व्यवसाय करता है। इसलिए ऐसे उत्पादों की आपूर्ति एवं उन सेवाओं को प्रदान करने का दायित्व व्यवसाय का ही है जो जनता के हित में है।

सामाजिक उत्तरदायित्व-उपभोक्ता व्यवसाय में हित रखने वाले बहुत से समूहों में से एक महत्त्वपूर्ण समूह है और दूसरे हित रखने वाले समूहों के समान इनके हितों का भी ध्यान रखना आवश्यक है।

नैतिक औचित्य-उपभोक्ता के हितों का ध्यान रखना तथा उनका किसी भी प्रकार का शोषण न करना व्यवसाय का नैतिक कर्त्तव्य भी है।

सरकारी हस्तक्षेप-यदि कोई व्यवसाय समाज का शोषण कर रहा है तो उसमें सरकारी हस्तक्षेप एवं सरकारी कार्यवाही बढ़ जाती है। इससे व्यवसाय की छवि व मान-सम्मान को ठेस पहुँचती है। इसीलिए उचित यही रहेगा कि व्यावसायिक संगठन स्वेच्छा से ग्राहकों के हितों का ध्यान रखें।

प्रश्न 2. 
उपभोक्ता के अधिकारों और दायित्वों की व्याख्या करें।
उत्तर:
उपभोक्ता के अधिकार
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 में उपभोक्ताओं के निम्नलिखित 6 अधिकार बतलाये गये हैं-
1. सुरक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार उपभोक्ता को उन वस्तु एवं सेवाओं के विरुद्ध संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है जो उसके जीवन एवं स्वास्थ्य के लिए खतरा है या खतरा पहुँचा सकते हैं। उदाहरण के लिए जो बिजली के उपकरण सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं हैं, गम्भीर रूप से चोट पहुंचा सकते हैं इसलिए उपभोक्ताओं को शिक्षित किया जाता है कि वे आई.एस.आई. (ISI) मार्का बिजली के उपकरणों का ही उपयोग करें। यह अधिकार निर्माताओं को भी उत्पाद की गुणवत्ता के मानदण्डों को पूरा करने के लिए बाध्य करता है।

2. सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुसार प्रत्येक उपभोक्ता को उस वस्तु के सम्बन्ध में पूरी जानकारी या सूचना प्राप्त करने का अधिकार है जिसको वह क्रय कर रहा है या क्रय करना चाहता है। इस सूचना या जानकारी में वस्तु के घटक, निर्माण तिथि, बिक्री का मूल्य, मात्रा, उपयोग की समय सीमा, उपयोग के लिए दिशा-निर्देश आदि।

3. चयन का अधिकार-उपभोक्ता के इस अधिकार के अन्तर्गत उपभोक्ता को प्रतियोगी मूल्य पर उपलब्ध विभिन्न उत्पादों में से चयन करने का अधिकार है। इसका तात्पर्य यह है कि विपणनकर्ताओं को अलगअलग गुणवत्ता, ब्रांड मूल्य एवं आकार की वस्तुओं को बाजार में विक्रय हेतु लाना चाहिए तथा उपभोक्ता को इनमें से अपनी पसन्द की वस्तु के चयन का अधिकार होना चाहिए। 

4. शिकायत का अधिकार-उपभोक्ता यदि किसी वस्तु एवं सेवा से सन्तुष्ट नहीं है तो उसे उपयुक्त उपभोक्ता मंच पर शिकायत करने का अधिकार है तथा उसकी सुनवाई कराने का अधिकार है। इस अधिकार के प्रभाव के कारण ही आज कई समझदार व्यावसायिक संस्थाओं ने अपने स्वयं के शिकायत एवं उपभोक्ता सेवा कक्ष स्थापित किये हुए हैं। कई उपभोक्ता संगठन भी उपभोक्ताओं की सहायता करते हैं।

5. क्षतिपूर्ति का अधिकार-यदि वस्तु अथवा सेवा अपेक्षा के अनुरूप नहीं निकलती तो उपभोक्ता का उससे मुक्ति पाने का अधिकार भी होता है। अधिनियम में उपभोक्ता को कई प्रकार से क्षतिपूर्ति करवाने का प्रावधान किया हुआ है जैसे वस्तु को बदल देना, उत्पाद के दोषों को दूर करना, हानि अथवा क्षति पहुँचने पर उसकी क्षतिपूर्ति करवाना।

6. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार उपभोक्ता को पूरे जीवन ज्ञान प्राप्ति एवं पूरी सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। उसे इसका ज्ञान होना चाहिए कि यदि वस्तु अथवा सेवा आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं है तो उसकी किस प्रकार से क्षतिपूर्ति की जायेगी तथा उसके क्या अधिकार होंगे?

उपभोक्ता के दायित्व 
एक उपभोक्ता के न केवल कुछ अधिकार ही होते हैं वरन् उसके कुछ उत्तरदायित्व भी होते हैं जो निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • जानकारी रखना-उपभोक्ता का यह उत्तरदायित्व है कि वह बाजार में उपलब्ध विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के सम्बन्ध में पर्याप्त आवश्यक जानकारी रखे जिससे कि वह अपने उपयोग के लिए श्रेष्ठ वस्तु का चयन कर सके।
  • मानक वस्तुओं को खरीदना-उपभोक्ता का उत्तरदायित्व यह भी है कि वह केवल मानक वस्तुओं को ही खरीदे क्योंकि किसी भी वस्तु पर मानक का चिह्न लगा हुआ है तो यह उसकी गुणवत्ता का विश्वास दिलाता
  • जोखिमों के सम्बन्ध में जानना व दिशानिर्देशों का पालन करना-उपभोक्ता का यह भी उत्तरदायित्व है कि वह वस्तु एवं सेवा से जुड़ी जोखिमों के सम्बन्ध में जाने, निर्माता के दिशा-निर्देशों का पूर्ण रूप से पालन करे तथा उत्पाद का उपयोग करते समय इनका अवश्य ध्यान रखे। 
  • लेबल को ध्यान से पढ़ना-उपभोक्ता को चाहिए कि.वह वस्तु के मूल्य, शुद्ध वजन, उत्पादन एवं उपयोग करने योग्य अन्तिम तिथि की सूचना के लिए वस्तु पर लगे लेबल को ध्यान से पढ़े।
  • दृढ़ता का परिचय देना-उपभोक्ता का यह भी उत्तरदायित्व बनता है कि उसके साथ सही व्यवहार हो रहा है या नहीं, इसकी जानकारी रखे तथा दृढ़ता का परिचय दे।
  • ईमानदारीपूर्ण व्यवहार करना-उपभोक्ता को चाहिए कि वे वस्तुएँ एवं सेवाओं को खरीदते समय ईमानदारी बरतें।
  • अनुचित आचरण को निरुत्साहित करनाउपभोक्ता केवल कानून-सम्मत वस्तुओं एवं सेवाओं को खरीदें तथा कालाबाजारी, जमाखोरी जैसी अनुचित प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करें।
  • नकद प्राप्ति रसीद माँगना-उपभोक्ता का यह भी उत्तरदायित्व है कि वस्तु या सेवा को खरीदने पर उसका भुगतान करने पर नकद रसीद भी प्राप्त करे।
  • शिकायत करना-यदि उपभोक्ता की राय में क्रय की गई वस्तुएँ एवं सेवाएँ गुणवत्ता की दृष्टि से उपयुक्त नहीं हैं तो उसकी उचित उपभोक्ता मंच पर शिकायत अवश्य करे।
  • उपभोक्ता परिषद् का गठन-उपभोक्ताओं को मिलकर उपभोक्ता परिषद् का गठन करना चाहिए जिससे कि ये परिषदें उपभोक्ता के हितों को सुरक्षित रखने में सक्रिय रूप से भाग लें।
  • पर्यावरण का ध्यान रखना-उपभोक्ताओं का यह भी दायित्व है कि वे पर्यावरण का पूरा ध्यान रखें। उसे प्रदूषित होने से बचायें।

प्रश्न 3. 
उपभोक्ता संरक्षण के उद्देश्य को किन विभिन्न तरीकों से हासिल किया जा सकता है? इस संबंध में उपभोक्ता संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण के उद्देश्य की प्राप्ति के विभिन्न तरीके 
निम्नलिखित ऐसे कई तरीके या साधन हैं जिनके द्वारा उपभोक्ता संरक्षण के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है-
1. व्यवसाय द्वारा स्वयं नियमन-वर्तमान प्रतिस्पर्धी युग में विकसित व्यावसायिक संस्थाएँ यह समझती हैं कि यदि वे उपभोक्ताओं को भली-भाँति सेवा प्रदान करेंगी तो यह आगे चलकर उनके हित में ही रहेगा क्योंकि उपभोक्ता ऐसी संस्थाओं को सहयोग करेंगे। इसके साथ ही सामाजिक उत्तरदायित्व को महत्त्व देने वाली व्यावसायिक संस्थाएँ अपने ग्राहकों से लेन-देन करते समय नैतिक मानक एवं व्यवहार का पालन करती हैं। कई व्यावसायिक फर्मों ने अपने ग्राहकों की समस्याओं एवं शिकायतों के समाधान के लिए अपने स्वयं के उपभोक्ता सेवा एवं शिकायत कक्षों की स्थापना की है।

2. व्यावसायिक संगठन या संघ-भारत में व्यापार, वाणिज्य एवं व्यवसाय संगठनों जैसे भारतीय वाणिज्य एवं औद्योगिक महासंघ (FICCI) एवं भारतीय उद्योगों का संगठन (CII) ने अपनी आचार संहिता बनायी हुई है जिनमें अपने सदस्यों के लिए दिशा-निर्देश होते हैं कि वे अपने ग्राहकों से कैसे व्यवहार करें।

3. उपभोक्ता जागरूकता-एक जागरूक उपभोक्ता जो अपने अधिकार, उपलब्ध राहत एवं उत्तरदायित्वों के सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी रखता है वह इस स्थिति में होगा कि किसी भी प्रकार के अनुचित आचरण अथवा अवांछनीय रूप से शोषण के विरुद्ध अपनी अवाज उठा सके।

4. उपभोक्ता संगठन-उपभोक्ता संगठन उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के सम्बन्ध में शिक्षित करने तथा उन्हें संरक्षण प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह संगठन व्यावसायिक इकाइयों को अनुचित आचरण एवं उपभोक्ताओं के शोषण से दूर रहने के लिए बाध्य कर सकते हैं।

5. सरकार-सरकार भी विभिन्न कानून बनाकर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा कर सकती है। भारत में सरकार द्वारा बनाये गये ऐसे कई कानून हैं जो उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान करते हैं। भारत सरकार ने तो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनाया हुआ है जो उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान करने में सहायक हो रहा है। इस अधिनियम में उपभोक्ताओं की शिकायतों को दूर करने के लिए त्रि-स्तरीय तन्त्र की स्थापना का प्रावधान किया हुआ है। 

उपभोक्ता संगठन एवं NGOs की भूमिका
1. उपभोक्ता को शिक्षित करना-उपभोक्ता संगठन एवं NGOs विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम, सेमीनार एवं कार्यशालाओं का आयोजन कर जन साधारण को उपभोक्ताओं के अधिकारों के सम्बन्ध में शिक्षित कर रहे

2. प्रकाशनों का प्रकाशन करना-उपभोक्ता संगठन एवं NGOs उपभोक्ता की समस्याओं, कानूनी रिपोर्ट देना, राहत तथा उपभोक्ता के हित में कार्यों के सम्बन्ध में ज्ञान प्रदान करने के लिए पाक्षिक एवं अन्य प्रकाशनों का प्रकाशन कर रहे हैं।

3. उपभोक्ता उत्पादों की जाँच करना तथा उनके परिणामों को प्रकाशित करना-उपभोक्ता संगठन एवं NGOs प्रतियोगी ब्रांडों के गुणों की तुलनात्मक जाँच के लिए प्रमाणित प्रयोगशालाओं में उपभोक्ता उत्पादों की जाँच करवाने का कार्य कर रहे हैं तथा उपभोक्ताओं के लाभ के लिए इनके परिणामों को प्रकाशित करा रहे हैं।

4. अनुचित व्यापारिक व्यवहारों के प्रति उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित करना-ये संगठन बेईमान, शोषणकर्ता, मिलावटियों एवं अनुचित व्यापारिक क्रियाएँ करने वाले विक्रेताओं का प्रतिवाद करने एवं उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं। 

5. सहायता प्रदान करना-उपभोक्ता संगठन एवं NGOs सहायता प्रदान कर, कानूनी सलाह देकर, कानूनी निदान के लिए उपभोक्ता को कानूनी सहायता प्रदान कर रहे हैं।

6. शिकायत दर्ज कराना-उपभोक्ता संगठन व गैर-सरकारी संगठन उपभोक्ताओं की ओर से उपयुक्त उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज कराने का कार्य कर रहे हैं। 

7. जन-साधारण के हित में मुकदमा करने की पहल करना-उपभोक्ता संगठन तथा गैर-सरकारी संगठन उपभोक्ता अदालतों में किसी व्यक्ति के हित में नहीं बल्कि जन साधारण के हित में मुकदमा करने में पहल कर रहे हैं।

प्रश्न 4. 
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत उपभोक्ताओं को उपलब्ध निवारण तंत्र की व्याख्या करें।
उत्तर:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अन्तर्गत उपभोक्ताओं को उपलब्ध निवारण तन्त्र-
I. जिला फोरम-उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अनुसार राज्य सरकार अपने राज्य के प्रत्येक जिले में एक ‘उपभोक्ता विवाद निवारण मंच’ अर्थात् जिला मंच स्थापित करती है। इसमें एक प्रधान तथा दो अन्य सदस्य होते हैं जिनमें से एक महिला होनी चाहिए। इन सभी की नियुक्ति सम्बन्धित राज्य सरकार द्वारा की जाती है। शिकायत किसी भी सम्बन्धित जिला मंच के पास की जा सकती है यदि वस्तुओं एवं सेवाओं का मूल्य क्षतिपूर्ति के दावे की राशि सहित 20 लाख रुपये से अधिक नहीं है।

शिकायत उपभोक्ता द्वारा, किसी भी मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संघ द्वारा, जिला मंच की अनुमति से एक या अधिक उपभोक्ताओं द्वारा अथवा केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा व्यक्तिगत हैसियत से या सामान्य उपभोक्ताओं के प्रतिनिधि की हैसियत से प्रस्तुत की जा सकती है। शिकायत प्राप्ति के पश्चात् जिला मंच शिकायत को उस पक्ष को भेजेगा जिसके विरुद्ध शिकायत की गई है। यदि आवश्यक हुआ तो वस्तु या उसके नमूने को परीक्षण हेतु प्रयोगशाला को भेजा जा सकेगा। जिला मंच प्रयोगशाला से प्राप्त जाँच रिपोर्ट को ध्यान में रखकर तथा सम्बन्धित विरोधी पक्षकार का तर्क सुनकर आदेश पारित करेगा। यदि पीड़ित पक्षकार जिला फोर्म के आदेश से सन्तुष्ट नहीं है तो वह आदेश पारित होने के तीस दिन के भीतर राज्य कमीशन के समक्ष अपील कर सकता है।

II. राज्य आयोग (राज्य कमीशन)-उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार प्रत्येक राज्य सरकार अपने राज्य में उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग अर्थात् राज्य आयोग की स्थापना कर सकती है। इस राज्य आयोग में एक प्रधान तथा कम-से-कम दो सदस्य जिनमें एक महिला होने चाहिए। इनकी नियुक्ति सम्बन्धित राज्य सरकार करती है। उपयुक्त राज्य आयोग को शिकायत की जा सकती है यदि वस्तु एवं सेवाओं का मूल्य क्षतिपूर्ति के दावे की राशि सहित 20 लाख रुपये से अधिक हो लेकिन एक करोड़ रुपये से कम हो। जिला मंच के आदेश के विरुद्ध अपील राज्य आयोग से की जा सकती है और राज्य आयोग उस अपील की सुनवायी कर आवश्यक आदेश देता है।

राज्य आयोग शिकायत प्राप्ति के पश्चात् शिकायत को उस पक्षकार को भेजता है जिसके विरुद्ध शिकायत की गई है। यदि आवश्यक हुआ तो वस्तु अथवा उसका नमूना प्रयोगशाला में परीक्षण हेतु भेजा जाता है। राज्य आयोग प्रयोगशाला की जाँच रिपोर्ट का अध्ययन कर तथा विरोधी पक्षकार के पक्ष को सुनकर आदेश पारित करता है। यदि पीडित पक्षकार राज्य आयोग के आदेश से सन्तुष्ट नहीं है तो वह आदेश के पश्चात् 30 दिन के भीतर राष्ट्रीय आयोग के समक्ष अपील कर सकता है। 

III. राष्ट्रीय आयोग (राष्ट्रीय कमीशन)राष्ट्रीय आयोग भारत में उपभोक्ता विवादों को हल करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक सर्वोच्च संस्था है। यह एक स्वतन्त्र वैधानिक संस्था है। केन्द्रीय सरकार ने अधिसूचना जारी करके राष्ट्रीय आयोग की स्थापना की है। राष्ट्रीय आयोग का एक प्रधान होता है तथा कम-सेकम चार अन्य सदस्य होते हैं जिनमें एक महिला होनी चाहिए। इनकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाती है। राष्ट्रीय आयोग में शिकायत तभी की जा सकती है जबकि वस्तु एवं सेवाओं का मूल्य क्षतिपूर्ति के दावे की राशि सहित एक करोड़ रुपये से अधिक हो।

राष्ट्रीय आयोग के समक्ष राज्य आयोग के आदेश के विरुद्ध अपील की जा सकती है। राष्ट्रीय आयोग शिकायत प्राप्त होने के तुरन्त पश्चात् शिकायत को विरोधी पक्षकार को भेजेगा। यदि आवश्यक हुआ तो वस्तु अथवा उसके नमूने को परीक्षण के लिए प्रयोगशाला में भेजेगा। प्रयोगशाला से जाँच रिपोर्ट प्राप्त करने के पश्चात् उसका अध्ययन कर तथा विरोधी पक्षकार के पक्ष को सुनकर आवश्यक आदेश प्रसारित करेगा।

राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित आदेश उसके मूल अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि विरोधी पक्षकार राष्ट्रीय आयोग के निर्णय से सन्तुष्ट नहीं है तो वह इसकी अपील उच्चतम न्यायालय में कर सकता है। उच्चतम न्यायालय को अपील राष्ट्रीय आयोग द्वारा आदेश प्रसारित करने के 30 दिन के भीतर की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय चाहे तो इस अपील की अवधि को बढ़ा भी सकता है।

प्रश्न 5. 
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और संवर्धन में उपभोक्ता संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:
उपभोक्ता संगठनों और गैर-सरकारी संगठनों ने उपभोक्ता हितों की रक्षा और बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित कार्य किये हैं-

  • प्रशिक्षण कार्यक्रम, सेमीनार एवं कार्यशालाओं का आयोजन कर जनसाधारण को उपभोक्ताओं के अधिकारों के संबंध में शिक्षित करना।
  • उपभोक्ता की समस्याओं, कानूनी रिपोर्ट देना, राहत तथा हित में कार्यों के संबंध में ज्ञान प्रदान करने के लिए पाक्षिक एवं अन्य प्रकाशनों का प्रकाशन करना।
  • प्रतियोगी ब्रांड के गुणों की तुलनात्मक जाँच के लिए प्रमाणित प्रयोगशालाओं में उपभोक्ता उत्पादों की जाँच कराना तथा उपभोक्ताओं के लाभ के लिए इनके परिणामों को प्रकाशित करना।
  • बेईमान, शोषणकर्ता एवं अनुचित व्यापारिक क्रियाएँ करने वाले विक्रेताओं का प्रतिवाद करना एवं उनके विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित करना।
  • सहायता प्रदान कर, कानूनी सलाह देकर कानूनी निदान के लिए उपभोक्ता को कानूनी सहायता प्रदान करना।
  • उपभोक्ताओं की ओर से उपयुक्त उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज कराना।
  • उपभोक्ता अदालतों में किसी व्यक्ति के हित में नहीं बल्कि जनसाधारण के हित में मुकदमा करने में पहल करना।

प्रश्न 6. 
श्रीमती माथुर ने जनवरी, 2018 में एक कपड़ा धुलाई की दुकान में जैकेट भेजा। जैकेट की कीमत ₹4,500 थी। उन्होंने पहले भी शाइन ड्राई क्लीनर्स को अपना जैकेट ड्राईक्लीन के लिए भेजा था और जैकेट को अच्छी तरह से साफ भी किया गया था। हालांकि, इस बार उन्होंने देखा कि उनके जैकेट में सफेद निशान थे। ड्राई क्लीनर को सूचित करने के बाद, श्रीमती माथुर को एक पत्र प्राप्त हुआ जो जैकेट पर आए सफेद धब्बों की पुष्टि करता था जो जैकेट को ड्राईक्लीन करने के बाद आए थे। उन्होंने ड्राई क्लीनर से कई बार सम्पर्क किया और अपने सफेद धब्बों वाले जैकेट के लिए मुआवजे का अनुरोध किया लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।
उपभोक्ता अदालत के हस्तक्षेप पर, शाइन ड्राई क्लीनर्स धब्बेदार जैकेट के लिए श्रीमती माथुर को ₹2,500 की क्षतिपूर्ति करने पर सहमत हुआ।
(i) पहली बार श्रीमती माथुर द्वारा किस अधिकार का प्रयोग किया गया था?
(ii) उस अधिकार की नाम सहित व्याख्या करें जिसने श्रीमती माथुर को मुआवजे का लाभ उठाने में मदद की।
(iii) उपर्युक्त मामले में श्रीमती माथुर द्वारा कौन-सी उपभोक्ता उत्तरदायित्व पूरा किया गया?
(iv) उपभोक्ताओं द्वारा ग्रहण किए जाने वाले कोई अन्य दो उत्तरदायित्व बताएँ।
उत्तर:
(i) श्रीमती माथुर द्वारा प्रयोग किया गया अधिकार ‘क्षतिपूर्ति का अधिकार’ है।
(ii) श्रीमती माथुर को मुआवजे का लाभ उठाने में जिस अधिकार ने मदद की, वह ‘क्षतिपूर्ति का अधिकार’ है। इस अधिकार के तहत उपभोक्ता को वस्तु को बदल देना, उत्पाद के दोषों को दूर करना, हानि अथवा क्षति पहुँचने पर उसकी पूर्ति करना आदि शामिल हैं।
(iii) श्रीमती माथुर ने खरीदे जाने वाले सामान और सेवाओं की गुणवत्ता में कमी पाए जाने की स्थिति में एक उपयुक्त उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करने की उपभोक्ता की जिम्मेदारी को पूरा किया। 
(iv) ग्राहकों द्वारा ग्रहण की जाने वाली अन्य दो जिम्मेदारियों में शामिल हैं-
(a) केवल वही सामान खरीदना जो अच्छी गुणवत्ता के हों और जिनका मानकीकरण हो। इसमें खरीदी हुई वस्तुओं पर आवश्यक गुणवत्ता आश्वासन के निशान की जाँच शामिल है। इसमें ज्वैलरी के लिए हॉलमार्क, इलेक्ट्रिकल सामान के लिए आईएसआई मार्क शामिल हो सकते हैं।
(b) लेबल को सही ढंग से जाँचें ताकि विनिर्माण और समाप्ति की तारीखों, वास्तविक वजन, सामग्री और
अधिकतम खुदरा मूल्य आदि पर उचित जानकारी हो। 

परियोजना-
1. अपने शहर के एक उपभोक्ता संगठन का भ्रमण करें। इसके द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों को सूचीबद्ध करें।
2. समाचार-पत्रों से कुछ उपभोक्ता मामलों और इन पर आए निर्णयों की कतरनें एकत्र करें।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

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