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Chapter 12 विद्याधनम्

पाठ-परिचय – प्रस्तुत पाठ में कुल चार श्लोक हैं जिनमें विद्यारूपी धन का महत्त्व बतलाया गया है।

पाठ के श्लोकों का अन्वय तथा हिन्दी भावार्थ –

  1. नचौरहार्यं न च राजहार्य ……………………………………….. विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।

अन्वयः – विद्याधनं न चौरहार्यम्, च न राजहार्यम्, न भ्रातृभाज्यं च न भारकारि। (तत् तु) व्यये कृते नित्यम् एव वर्धत, (तत्) सर्वधनप्रधानम्।

हिन्दी भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में विद्यारूपी धन की महिमा बताते हुए कहा गया है कि विद्या रूपी धन को न तो चोर चुरा सकते हैं, न राजा छीन सकता है, न भाई-बन्धु बाँट सकते हैं और न ही यह भार बढ़ाता है। अपितु विद्याधन को खर्च करने पर बढ़ता ही है अर्थात् विद्या दूसरों को देने पर निरन्तर बढ़ती है। इस प्रकार वह सभी धनों में श्रेष्ठ

  1. विद्या नाम नरस्य …………………………………………. विद्या-विहीनः पशुः।।

अन्वयः – विद्या नाम नरस्य अधिकं रूपम्, प्रच्छन्नगुप्तं धनं (वर्तते)। विद्या भोगकरी, यशः सुखकरी (तथा) विद्या गुरुणां गुरुः (अस्ति)। विदेशगमने विद्या बन्धुजनः, विद्या परा देवता (च वर्तते)। राजसु विद्या पूज्यते, न तु धनं (पूज्यते), विद्या-विहीनः पशुः (भवति)।

हिन्दी भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में विद्या के महत्त्व को बतलाते हुए कहा गया है कि विद्या ही मनुष्य का वास्तविक सौन्दर्य है, वही उसका गुप्त-धन है। विद्या समस्त भोगों को, यश को एवं सुख को प्रदान करती है। वह गुरुओं की भी गुरु है। विदेश में विद्या ही बन्धु है तथा वही परम देवता है। राजा लोग भी विद्या की ही पूजा करते हैं। धन की नहीं। विद्या से रहित मनुष्य को साक्षात् पशु माना जाता है।

  1. केयूराः न विभूषयन्ति ………………………………………………… वाग्भूषणं भूषणम्॥

अन्वयः – केयूराः पुरुषं न विभूषयन्ति, न च चन्द्रोज्ज्वला हाराः, न च स्नानम्, न विलेपनम्, न कुसुमम्, न च अलंकृता मूर्धजाः (पुरुषं विभूषयन्ति)। एका वाणी पुरुषं समलङ्करोति, या संस्कृता धार्यते। अखिलभूषणानि क्षीयन्ते, वाग्भूषणं सततं भूषणम्।

हिन्दी भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में सुसंस्कृत वाणी को ही मनुष्य का वास्तविक आभूषण बतलाते हुए कहा गया है कि मनुष्य की शोभा न तो बाजूबन्द धारण करने से, न ही चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार से, न स्नान करने से, न ही चन्दन, पुष्प तथा सुसज्जित वेणी धारण करने से होती है, अपितु संस्कारयुक्त वाणी से ही मनुष्य की शोभा होती है। अन्य सभी आभूषण तो नष्ट हो जाते हैं किन्तु वाणी रूपी आभूषण हमेशा आभूषण ही बना रहता है।

  1. विद्या नाम नरस्य ………………………………………… विद्याधिकारं कुरु॥

अन्वयः – विद्या नाम नरस्य अतुला कीर्तिः, सा भाग्यक्षये च आश्रयः, कामदुधा धेनुः, विरहे च रतिः, तृतीयं नेत्रं च (वर्तते)। (सा) सत्कारायतनम्, कुलस्य च महिमा (तथा च) रत्नैः विना भूषणम् (अस्ति)। तस्माद् अन्यं सर्वविषयम् उपेक्ष्य विद्याधिकारं कुरु।

हिन्दी भावार्थ – प्रस्तुत श्लोक में विद्या के महत्त्व एवं गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि विद्या से मनुष्य की कीर्ति फैलती है, बुरे दिनों में सहारा मिलता है, समस्त इच्छाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनु के समान है, विरह काल में रति तथा तृतीय नेत्र के समान है। वह सम्मान देने वाली एवं कुल की महिमा है। विद्या रत्नों के बिना भी शोभा बढ़ाने वाली है। अतः अन्य विषयों को छोड़कर मनुष्य को विद्या-अर्जन करना चाहिए।

पाठ के कठिन-शब्दार्थ :

चौरहार्यम् = चोरों के द्वारा चुराने योग्य।
राजहार्यम् = राजा के द्वारा छीनने योग्य।
भ्रातृभाज्यम् = भाइयों के द्वारा बाँटने योग्य।
भारकारि = भार बढ़ाने वाली।
प्रच्छन्नगुप्तम् = अत्यन्त गुप्त।
भोगकरी = भोग का साधन उपलब्ध कराने वाली।
परा = सबसे बड़ी।
राजसु = राजाओं में।
केयूराः = बाजूबन्द।
चन्दोज्ज्वला (चन्द्र + उज्ज्वला) = चन्द्रमा के समान चमकदार।
विलेपनम् = शरीर पर लेप करने योग्य सुगन्धित-द्रव्य (चन्दन, केसर आदि)।
नालङ्कृता (न + अलङ्कृता) = नहीं सजाया हुआ।
मूर्धजाः = वेणी, चोटी।
वाण्येका (वाणी + एका) = एकमात्र वाणी।
समलङ्करोति = अच्छी तरह सुशोभित करती है।
संस्कृता = संस्कारयुक्त (परिष्कृत)।
धार्यते = धारण की जाती है।
क्षीयन्तेऽखिलभूषणानि (क्षीयन्ते + अखिलभूषणानि) = सम्पूर्ण आभूषण नष्ट हो जाते हैं।
भाग्यक्षये = अच्छे दिन बीत जाने पर।
आश्रयः = सहारा।
कामदुधा = इच्छानुसार फल देने वाली।
सत्कारायतनम् सम्मान का केन्द्र या समूह।
रत्तैर्विना = रत्नों से रहित।
विद्याधिकारम् = विद्या पर अधिकार।
तस्मादन्यमुपेक्ष्य (तस्मात् + अन्यम् + उपेक्ष्य) = अत: दूसरे सबको छोड़कर।

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