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पाठ-परिचय – प्रस्तुत पाठ में एक रोचक कथा के माध्यम से प्रेरणा दी गई है कि परिश्रम और लगन से | कठिन से भी कठिन कार्य को सरलता से सम्पन्न किया जा सकता है।

पाठ के कठिन-शब्दार्थ-

  • लीनः = संलग्न, तल्लीन। 
  • वाञ्छति = चाहता/चाहती है। 
  • कोऽपि (कः + अपि) = कोई भी। 
  • आनय = लाओ। 
  • अहह = कष्टसूचक अव्यय। 
  • आः = पीड़ासूचक अव्यय। 
  • आनेतुम् = लाने के लिए। 
  • निर्गच्छति = निकलता है। 
  • इतस्ततः (इतः + ततः) = इधर-उधर। 
  • धराम् = पृथ्वी को। 
  • प्राप्स्यति = पाएगा। 
  • व्यथाम् = दुःख को। 
  • सद्यः = तत्काल, तुरन्त। 
  • अर्पय = दे दो। 
  • उद्घाटयति = खोलता है। 
  • दशति = डसती है, काटती है। 
  • अत्युच्चैः (अति + उच्चैः) = बहुत जोर से। 
  • चीत्करोति = चिल्लाता है।

पाठ के गद्यांशों का हिन्दी अनुवाद एवं पठित-अवबोधनम् – 

1. अजीजः सरलः परिश्रमी ………………………’अहह! आः!’ च इति।” 

हिन्दी-अनुवाद – अजीज सरल स्वभाव वाला और परिश्रमी था। वह स्वामी (मालिक) की ही सेवा में लीन (संलग्न) रहता था। एक बार वह घर जाने के लिए छुट्टी (अवकाश) चाहता था। स्वामी चतुर था। उसने सोचा”अजीज के समान कोई दूसरा कार्य में कुशल नहीं है। यह अवकाश का भी वेतन लेगा।” ऐसा सोचकर स्वामी कहता है कि-“मैं तुम्हें अवकाश का और वेतन का सम्पूर्ण धन दूंगा, परन्तु इसके लिए तुम दो वस्तुएँ लाओ – ‘अरे!’ और ‘ओह! ” 

पठित-अवबोधनम् – 

निर्देश: – उपर्युक्तं गद्यांशं पठित्वा एतदाधारितप्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत

प्रश्ना :
(क) अजीज: कस्य सेवायां लीनः आसीत्? (एकपदेन उत्तरत)
(ख) स्वामी कीदृशः आसीत्? (एकपदेन उत्तरत) 
(ग) अजीज: गृहं गन्तुं किं वाञ्छति स्म? (पूर्णवाक्येन उत्तरत) 
(घ) ‘तुभ्यम्’ इत्यत्र का विभक्तिः ?
(ङ) ‘चतुरः’ इति विशेषणपदस्य विशेष्यपदं किम्? 
उत्तराणि : 
(क) स्वामिनः।
(ख) चतुरः।
(ग) अजीजः गृहं गन्तुम् अवकाशं वाञ्छति स्म।
(ङ) स्वामी।

2. एतत् श्रुत्वा अजीजः वस्तुद्वयम् …………………………………. समीपे आगच्छति। 

हिन्दी-अनुवाद – यह सुनकर अजीज दो वस्तुएँ लाने के लिए निकलता है। वह इधर-उधर घूमता है। लोगों से पूछता है। आकाश को देखता है। पृथ्वी से प्रार्थना करता है। परन्तु सफलता प्राप्त नहीं करता है। (वह) सोचता है’परिश्रम का धन वह प्राप्त नहीं कर सकेगा।’ कहीं पर (उसे) एक बुढ़िया (वृद्धा) मिलती है। वह उसको सारी पीड़ा सुनाता है। वह सोचने लगी-‘स्वामी अजीज के लिए धन देना नहीं चाहता है।’ वह उससे कहती है-“मैं तुमको दो वस्तुएँ देती हूँ।” परन्तु दोनों ही बहुमूल्य हैं। वह प्रसन्न होकर स्वामी के पास आ गया। 

पठित-अवबोधनम् – 

प्रश्ना:
(क) अजीजः किम् आनेतुं निर्गच्छति? (एकपदेन उत्तरत) : 
(ख) सः कान् पृच्छति? (एकपदेन उत्तरत) 
(ग) अजीजः किं चिन्तयति? (पूर्णवाक्येन उत्तरत) 
(घ) ‘इतस्ततः’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।
(ङ) ‘सः जनान् ……………….।” इत्यत्र क्रियापदं किम्? 
उत्तराणि : 
(क) वस्तुद्वयम्।
(ख) जनान्। 
(ग) अजीजः चिन्तयति यत् “परिश्रमस्य धनं सः नैव प्राप्स्यति।” 
(घ) इतः + ततः।
(ङ) पृच्छति।

3. अजीजं दृष्ट्वा स्वामी ……………….पूर्ण धनं ददाति। 

हिन्दी-अनुवाद – अजीज को देखकर स्वामी आश्चर्यचकित हो गया। स्वामी धीरे-धीरे पेटी को खोलता है। पेटी में दो छोटे-छोटे पात्र थे। पहले वह एक छोटे पात्र को खोलता है। अचानक एक मधुमक्खी निकलती है, और उसके हाथ को डसती है। स्वामी जोर से बोला-“अरे रे!” (उसके बाद उसने) दूसरे छोटे पात्र को खोला। (उसमें से) एक अन्य मक्खी निकली। वह (स्वामी के) मस्तक पर डसती है। पीड़ा से युक्त स्वामी बहुत जोर से चिल्लाता है”ओह!”। अजीज (परीक्षा में सफल हो गया था। स्वामी ने उसे अवकाश का और वेतन का पूरा धन दे दिया। 

पठित-अवबोधनम् – 

प्रश्ना :
(क) कम् दृष्ट्वा स्वामी चकितः भवति? (एकपदेन उत्तरत) 
(ख) पेटिकायां किम् आसीत्? (एकपदेन उत्तरत) 
(ग) प्रथम स्वामी किम् उद्घाटयति? (पूर्णवाक्येन उत्तरत) 
(घ) ‘मधुमक्षिका’ इत्यस्य विशेषणं किम्?
(ङ) ‘स्वामी ………………….. वदति।’ अत्र उचितम् अव्ययपदं किम्? 
उत्तराणि : 
(क) अजीजम्।
(ख) लघुपात्रद्वयम्। 
(ग) प्रथम स्वामी एकं लघुपात्रम् उद्घाटयति। 
(घ) एका।
(ङ) उच्चैः।

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