Chapter 15 पर्यावरणशुद्धि (गद्य – भारती)

पाठ-सारांश

पर्यावरण का स्वरूप-अन्य प्राणियों की भाँति मनुष्य ने भी प्रकृति की गोद में जन्म लिया है। प्रकृति के तत्त्व उसको चारों ओर से घेरे हुए हैं। इन्हीं प्राकृतिक तत्त्वों को पर्यावरण कहा जाता है। मिट्टी, जल, वायु, वनस्पति, पशु, पक्षी, कीड़े, मकोड़े आदि जीवाणु पर्यावरण के अंग हैं।.विकास के लिए उतावलापन दिखाते हुए मानव ने पर्यावरण के प्रति जो अनाचार किया है, उससे पर्यावरण अत्यधिक असन्तुलित हो गया है। जिन कारणों से पर्यावरण का असन्तुलन हुआ है, वे कारण निम्नलिखित हैं

वनस्पति का विनाश-वनों में वनस्पति का अमित भण्डार भरा हुआ है। वनों से मानव को लकड़ी, ओषधि, फल-फूल आदि बहुत-सी दैनिक उपयोग की वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। वृक्ष सूर्य की गर्मी को रोकते हैं, वायु को शुद्ध करते हैं, भूमि के कटाव को रोकते हैं तथा वर्षा कराते हैं। इनकी पत्तियों से खाद बनती है। लकड़ी के लोभ से मनुष्य ने असंख्य वृक्षों को काट डाला है। वृक्षों के अभावु  में वनों की मिट्टी बह जाती है, जिससे भूमि की उर्वरता नष्ट हो जाती है। भूस्खलन से खेत-के-खेत जमीन में धंस जाते हैं। नदियाँ उथली हो जाती हैं, जिसके कारण बाढ़ का संकट उपस्थित हो जाता है। |

वृक्षों के अनेक उपकार-प्राणवायु के उत्पादन में वृक्षों का महान् योगदान है। वृक्ष विषाक्त वायु के विष तत्त्व को पीकर स्वास्थ्य के लिए लाभदायक प्राणवायु को उत्पन्न करते हैं। हमारे पूर्व ऋषि-मुनियों ने वनों में योग और अध्यात्म की साधना की है। वृक्ष सूर्य की गर्मी को दूर करते हैं, वातावरण में आर्द्रता उत्पन्न करते हैं, अपने पत्तों को गिराकर खाद बनाते हैं, भूक्षरण को रोकते हैं। इस प्रकार वे मानव मन के लिए महान् उपकारी हैं। मनुष्य उनको काटकर अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारता है। एक वृक्ष अपने पचास वर्ष के जीवन में मनुष्य का पच्चीस लाख रुपये का उपकार करता है, लेकिन मानव सौ या हजार रुपये की लकड़ी प्राप्त करने के लिए उसे काटकर अपनी ही हानि करता है।

वायु का प्रदूषण-एक ओर तो मानव वायु-प्रदूषण के निवारक वृक्षों को काट रहा है, दूसरी ओर वायु-प्रदूषण के कारणों को उत्पन्न कर रहा है। फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकला हुआ धुआँ, खनिजों के अणु, रसायनों के अंश और दुर्गन्धयुक्त वायु वातावरण को दूषित करते हैं। तेल से चालित वाहनों के तेल मिले हुए धुएँ से वायु दूषित होती है। दूषित वायु में श्वास लेने से फेफड़ों का कार्यभार बढ़ जाता है और वायु को शुद्ध करने के लिए उन्हें अधिक कार्य करना पड़ता है। वायु-प्रदूषण को रोकने के लिए अधिकाधिकं वृक्ष लगाने चाहिए, लकड़ी के कोयलों का कम-से-कम प्रयोग, डीजल से चलने वाले वाहनों के स्थान पर विद्युत से चलने वाले वाहनों का प्रयोग करना चाहिए।

ध्वनि-प्रदूषण-रेलगाड़ियों, मोटरों, बड़ी-बड़ी मशीनों, लाउडस्पीकरों, तेज वाद्यों की आवाज से ध्वनि का प्रदूषण होता है। नगरों में ध्वनि-प्रदूषण की बड़ी समस्या है। ध्वनि-प्रदूषण से बहरापन और कानों के अनेक दूसरे दोष उत्पन्न होते हैं। मस्तिष्क में अनेक दोष उत्पन्न होकर पागलपन तक हो जाता है। ध्वनि-प्रदूषण को रोकने के लिए लाउडस्पीकरों का अनावश्यक प्रयोग रोकना चाहिए तथा मशीनों में ध्वनिशामक यन्त्र (साइलेन्सर) का प्रयोग करना चाहिए। पेड़ों के लगाने और संवर्द्धन से भी ध्वनि की सघनता कम हो जाती है।

पशु-पक्षियों से पर्यावरण में सन्तुलने-सभी पशु-पक्षी पर्यावरण के सन्तुलन में सहायक होते हैं। सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक पशु हरिण आदि की वृद्धि को सीमित कर देते हैं; सर्प, अजगर आदि चूहों और खरगोशों को खाते हैं। पक्षी बीजों को इधर-उधर बिखेर देते हैं, जिससे विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों का स्वयमेव विकास होता रहता है। जीवो जीवस्य भोजनम्’ इस प्राकृतिक नियम के अनुसार हिंसक पशु, तृणभक्षी पशुओं को खाकर पर्यावरण का सन्तुलन बनाये रखते हैं।

जल-प्रदूषण-मनुष्य ने जीवन के लिए परमोपयोगी जल को अपने अविवेक से दूषित कर दिया है। गंगा-यमुना जैसी नदियों में बड़े नगरों का अपशिष्ट फेंका जाता है। पशुओं और मनुष्यों के शव तथा विषैला रासायनिक जल उनमें बहाया जाता है, जिससे जल विषाक्त और अपेय हो जाता है तथा अनेक रोगाणु जल में पलने लगते हैं। सरकार ने जल के प्रदूषण को दूर करने के लिए प्राधिकरण की स्थापना की है, लेकिन जनता के सहयोग के बिना इस कार्य में सफलता सम्भव नहीं है।

ताप का प्रदूषण-मानव की अनेक क्रियाओं से उत्पन्न ताप भी पर्यावरण दूषित करता है; जैसे-उद्योगशालाओं का ताप, वातावरण के ताप को बढ़ाता है। पक्की ईंटों के मकान, वर्कशॉप और, सड़कें ताप को स्वयं में संचित करती हैं और स्वयं से सम्बद्ध वातावरण को ताप प्रदान कर पर्यावरण को असन्तुलित करती हैं, जिसका मानव के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

पर्यावरण के असन्तुलन को रोकने के उपाय-आज के युग में पर्यावरण के प्रदूषण की समस्या समाज और सरकार दोनों के लिए ही चिन्तनीय सिद्ध होती जा रही है। इसके रोकने का एकमात्र साधन वृक्षारोपण ही है; क्योंकि वृक्षों की सघनता ताप को नियन्त्रित करती है। मनुष्य को प्राणवायु वृक्षों से ही प्राप्त होती है; अतः मानवों के कल्याण के लिए अधिकाधिक वृक्ष लगाये जाने चाहिए।

शोंगद्यां का ससन्दर्भ अनुवाद

(1) यथान्ये प्राणिनस्तथैव मनुष्योऽपि प्रकृत्याः क्रोडे जनुरधत्तः। प्रकृत्या एव तत्त्वजातं सर्वमपि परितः आवृत्य संस्थितम्। अतः कारणात् तत्पर्यावरणमित्युच्यते। मनुष्येण स्वबुद्ध्याः प्रभावेण जीवनमुन्नेतुं प्रयतमानेन नानाविधा आविष्काराः कृताः। बहुविधं सौविध्यं सौ फर्यं चाधिगतं किन्तु विकासस्य प्रक्रियायां नैको उपलब्धीः प्राप्तवता तेन यद् हारितं तदपि अन्यूनम्। मृत्स्ना-जल-वायु-वनस्पति-खग-मृग-कीट-पतङ्ग-जीवाणव इति पर्यावरणस्य घटकाः विद्यन्ते। विकासहेतवे क्षिप्रकारिणा मानवेन तान् प्रति विहितेनातिचारेण प्राकृतिकपर्यावरणस्य सन्तुलनमेव नितरां दोलितम्।

शब्दार्थ
क्रोडे = गोद में।
जनुः = जन्म।
अधत्तः = धारण किया है।
परितः = चारों ओर।
आवृत्य = घेरकर।
उन्नेतुम् = उन्नत बनाने के लिए।
सौविध्यं = सुविधा।
सौर्यम् = सरलता।
अधिगतम् = प्राप्त किया।
नैका = अनेक।
हारितम् = खोया।
अन्युनम् = बहुत।
मृत्स्ना : मिट्टी।
घटकाः = इकाइयाँ।
क्षिप्रकारिणा = शीघ्रता करने वाले।
विहितेनातिचारेण = किये गये अत्याचार से।
नितराम् = अत्यधिक।
दोलितम् = विचलित कर दिया।

सन्दर्भ
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत गद्य-भारती’ के ‘पर्यावरणशुद्धिः शीर्षक पाठ से उद्धृत है।
[संकेत-इस पाठ के शेष गद्यांशों के लिए भी यही सन्दर्भ प्रयुक्त होगा।]

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में पर्यावरण का स्वरूप और मानव से उसके घनिष्ठ सम्बन्धों को बताते हुए मानव द्वारा पर्यावरण को असन्तुलित करने का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
जिस प्रकार दूसरे प्राणियों ने, उसी प्रकार मनुष्य ने भी प्रकृति की गोद में जन्म धारण किया। प्रकृति ही, जो तत्त्व समूह है, उसको भी चारों ओर से घेरकर स्थित है। इस कारण से इसे पर्यावरण कहा जाता है। मनुष्य ने अपनी बुद्धि के प्रभाव से जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करते हुए नाना प्रकार के आविष्कार किये। बहुत तरह की सुविधा और सरलता प्राप्त की, किन्तु विकास की प्रक्रिया में अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त करते हुए उसने जो खोया है, वह भी कम नहीं है। मिट्टी, जल, वायु, वनस्पति, पक्षी, पशु, कीड़े, पतंगे, जीवाणु ये पर्यावरण के अंग (इकाईयाँ) हैं। विकास के लिए शीघ्रता करने वाले मानव ने उनके प्रति किये गये अत्याचार से प्राकृतिक पर्यावरण के सन्तुलन को अत्यधिक हिला दिया। |

(2) सर्वाधिकोऽत्ययस्तु वनस्पतीनां जातः। एकपदे एव बहुलाभलोभी मानवो वनानि च क्रर्ति तथा प्रवृत्तो यदधुना वनानां सुमहान् भाग उच्छिन्नः। वनेभ्यो मनुष्यः काष्ठम्, ओषधीः, फलानि, पुष्पाणि एवंविधानि बहूनि वस्तूनि दैनन्दिनजीवनोपयोगीनि प्राप्नोति, किन्तु काष्ठस्य लोभाद् असङ्ख्या हरिता वृक्षा कर्तिताः। मन्ये पर्वतानां पक्षी एव छिन्नाः। येन तेषां मृत्स्ना वर्षाजलेन बलात् प्रबाह्यपनीयते। पर्वतप्रदेशीयभूप्रदेशानामुर्वरत्वं तु विनश्यत्येवं भूस्खलनेन केदाराः अपि लुप्ता भवन्ति, धनजनहानिर्भवति। ग्रामा अपि ध्वंस्यन्ते। वर्षाजलेन नीता मृत्स्ना नदीनां तलमुत्थलं करोति। येन जलप्लावनानि भवन्ति। जनया महांस्त्रास उत्पद्यते।।

शब्दार्थ
अत्ययः = हानि।
एकपदे एव = एक बार में ही।
च कर्तितुम् = अधिक मात्रा में ।
काटने के लिए।
तथा प्रवृत्तो = ऐसा लगा।
उच्छिन्नः = कट गया है।
दैनन्दिनजीवनोपयोगीनि = दैनिकें जीवन के लिए उपयोगी।
कर्तिताः = काटे,गये।
पक्षाः = पंख।
प्रवाह्य = बहाकर।
अपनीयते = दूर ले जायी जाती है।
उर्वरत्वं = उर्वरता, उपजाऊ शक्ति।
भूस्खलनेन = भूमि के खिसकने सै।
केदाराः = खेतों की क्यारियाँ।
ध्वंस्यन्ते = नष्ट कर दिये जाते हैं।
तलमुत्थलम् = तल को उथला।
जलप्लावनानि = बाढ़े।
महांस्त्रास = महान् भय।
उत्पद्यते = उत्पन्न होता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में वनों से लाभ एवं उनके काटने से होने वाली हानियाँ बतायी गयी हैं।

अनुवाद
सबसे अधिक हानि तो वनस्पतियों की हुई है। एक बार में ही बहुत लाभ के लोभी मानवों ने वनों को ऐसा काटना शुरू किया कि आज वनों का बहुत बड़ा भाग कट चुका है। मनुष्य वनों से लकड़ी, ओषधियाँ, फल, फूल इसी प्रकार की बहुत-सी दैनिक जीवन के उपयोग की वस्तुएँ प्राप्त करता है, किन्तु लकड़ी के लोभ से असंख्य हरे वृक्ष काट डाले गये हैं। मैं समझता हूँ, पर्वतों के पंख ही काट डाले, जिससे उनकी मिट्टी को वर्षा का जल बलपूर्वक दूर बहाकर ले जाता है। पहाड़ी प्रदेशों के भू-भागों की उपजाऊ शक्ति तो नष्ट हो ही रही है, भूमि के खिसकने से खेत भी समाप्त हो जाते हैं ।

तथा धन और जन की हानि होती है। गाँव भी नष्ट हो रहे हैं। वर्षा के जल से बहाकर ले जायी गयी मिट्टी दियों के तल को उथला कर देती है, जिससे बाढ़ आ जाती हैं तथा मनुष्य के लिए भारी भय पैदा हो जाता है।

(3) एततु सर्वे जानन्त्येव यत् प्राणवायु (ऑक्सीजनेति प्रसिद्धम् ) विना मनुष्यः कतिपयक्षणपर्यन्तमेव जीवितुं शक्नोति। प्राणवायोरुत्पादने वृक्षाणां महान् योगः केन विस्मर्यते। विषाक्तवायोर्विषतत्त्वं नीलकण्ठ इव स्वयं पायं पायं, मानवस्याकारणसुहृदो वृक्षास्तस्य कृते निर्मलं स्वास्थ्यकरं प्राणवायुं समुत्पाद्यन्ति। प्राणायामेन प्राणानां नियमनस्य योगमार्गः,आध्यात्मिकसाधना च वनानां मध्य एवास्माकं पूर्वजैर्महर्षिभिः यद् अनुत्रियते स्म तदस्मादेव कारणात्। प्रत्येकं वृक्षः एका महती प्रयोगशालेव भवति। एष सूर्यस्य तापं हरति, वायुमालिन्यमपनयति, वाष्पोत्सर्गेण वातावरणे आर्द्रतां जनयति, प्रतिवर्षं निजपत्राणि निपात्य उर्वरकमुत्पादयति भूक्षरणं निरुणद्धि, जलवर्षणे कारणं च भवति। एवं स मनुजस्य महानुपकारी भवति तथाविधमुयकारिणमपि मनुष्य उच्छिनत्ति, किन्नासी स्वपादे एवं कुठारं प्रयुनक्ति।

शब्दार्थ
प्राणवायु = ऑक्सीजन।
विस्मर्यते = भुलाया जाता है।
विषाक्तवायोर्विषतत्त्वं (विषाक्तवायोः + विषतत्त्वम्) = जहरीली वायु के विषैले तत्त्व को।
नीलकण्ठः = शिव।
पायंपायं = पी-पीकर।
प्राणायाम = देवगुणों का मन से पाठ करते हुए साँस रोकना।
नियमन = नियन्त्रण करना।
अनुस्रियते स्म = आश्रय (अनुसरण) किया जाता था।
अपनयति = दूर करता है।
वाष्पोत्सर्गेण = भाप निकालने के द्वारा।
आर्द्रताम् =-गीलापन।
निपात्य = गिराकर।
उर्वरकम् = खाद।
निरुणद्धि = रोकता है।
उच्छिनत्ति = नष्ट करता है।
स्वपादे एवं कुठारं प्रयुनक्ति = अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मारता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में वृक्षों के महान् योगदान और उपकार का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
यह सभी जानते ही हैं कि ऑक्सीजन (प्राणवायु) के बिना मनुष्य कुछ क्षणों तक ही जीवित रह सकता है। ऑक्सीजन के उत्पन्न करने में वृक्षों के महान् योग को कोई नहीं भूल सकता है। विषाक्त (विषैली) वायु के विष-तत्त्व को शिव के समान पी-पीकर मनुष्य के बिना कारण के मित्र वृक्ष उसके लिए साफ, स्वास्थ्यकारी प्राणवायु (ऑक्सीजन) को पैदा करते हैं। प्राणायम से प्राणों के नियमन का योगमार्ग और वनों के मध्य ही आध्यात्मिक साधना हमारे पूर्वज महर्षियों द्वारा जो अनुसरण की गयी थी, वह भी इसी कारण है। प्रत्येक वृक्ष एक बड़ी प्रयोगशाला के समान होता है। यह सूर्य की गर्मी का हरण करता है, हवा की गन्दगी को दूर करता है, भाप छोड़ने से वातावरण में नमी उत्पन्न करता है, प्रत्येक वर्ष अपने पत्ते गिराकर खाद उत्पन्न करता है, पृथ्वी के कटाव को रोकता है और जल बरसाने में कारण बनता है। इस प्रकार वह मनुष्य का बड़ा उपकारी होता है, इस तरह के उपकारी को भी मनुष्य काटता है। क्या वह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी नहीं चलाता है? |

(4) एको वृक्षः स्वपञ्चाशद्वर्षजीवनकाले मानवजातेः पञ्चविंशतिलक्षरूप्यक- परिमाणाय लाभाय कल्पते, तस्मात्प्राप्तस्योर्वरकस्यैव मूल्यं पञ्चदशलक्षथरिमितं भवति, वायुशुद्धीकरणं पञ्चलक्षरूप्यकतुल्यं, प्रोटीनोत्पादन-माईताजननं वर्षासाहय्यमिति त्रितयमपि पञ्चलक्षरूप्यकार्तम्। एतत्सर्वमपि कलिकाताविश्वविद्यालयीयेन डॉ० टी० एम० दासाभिधानेन वैज्ञानिकेन सुतरां विवेच्य प्रतिपादितमास्ते। तथामहिमानं तरुं निपात्य लुब्धो मानवः किं प्राप्नोति? शतं सहस्त्रं वा रूप्यकाणाम्। सत्यम्, अल्पस्य हेतोर्बहातुमिच्छन्नसौ प्रथमश्रेणीको विचारमूढे एव। पर्यावरणरक्षणायापरपर्यायाय आत्मरक्षणाय मनुष्येणेयं मूढता यथा सत्वरं त्यक्ता स्यात् तथैव वरम्।

शब्दार्थ
पञ्चाशद् = पचास।
कल्पते = समर्थ होता है।
तुल्यम् = बराबर।
रूप्यकाम् = रुपये मूल्य के बराबर।
सुतराम् = अच्छी तरह से।
विवेच्य = विवेचन करके।
लुब्धो = लालची।
अल्पस्य हेतोर्बहुहातुमिच्छन् = थोड़े-से के लिए बहुत छोड़ने की इच्छा करता हुआ।
विचारमूढ = मूर्ख।
यथासत्वरम् = जितना जल्दी।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में वृक्ष का उसके जीवनकाल में लाभ रुपयों में आँककर मनुष्य को. उसके महत्त्व का यथार्थ ज्ञान कराया गया है।

अनुवाद
एक वृक्ष अपने पचास वर्ष के जीवनकाल में मानव-जाति का पचीस लाख रुपयों के बराबर लाभ करने में समर्थ होता है। उससे प्राप्त खाद का मूल्य ही पन्द्रह लाख रुपयों के बराबर होता है। वायु को शुद्ध करना पाँच लाख रुपयों के बराबर, प्रोटीन उत्पन्न करना, नमी पैदा करना, वर्षा में सहायता करना तीनों ही पाँच लाख रुपयों के मूल्य के बराबर होता है। यह सब कलकता ‘ विश्वविद्यालय के डॉ० टी० एम० दास नाम के वैज्ञानिक ने अच्छी तरह विवेचन करके सिद्ध किया है। ऐसी महिमा वाले वृक्ष को गिराकर लालची मनुष्य क्या प्राप्त करता है? सौ यो हजार रुपये। वास्तव में थोड़े-से लाभ के लिए बहुत छोड़ने की इच्छा करता हुआ वह प्रथम श्रेणी का मूर्ख है, जो सोचने-समझने में असमर्थ है। पर्यावरण की रक्षा के लिए, दूसरे शब्दों में आत्मरक्षा के लिए, मनुष्य इस मूर्खता को जितना जल्दी छोड़ दे, उतना ही अच्छा है।

(5) एवमेकतो मनुष्यो वायुप्रदूषणनिवारकाणां वृक्षाणां हत्यां विदधाति अपरतश्च विविधैः प्रकारैः स्वयं वायुप्रदूषणस्य कारणान्युत्तरोत्तरमाविष्करोति। उद्योगशालाभ्यो निस्सृता धूमाः,खनिजाणवः, रासायनिकाः, लवाः, पूतिगन्धा वायवो वातावरणं दूषयन्तः प्राणवायुं विशेषतो विकारयन्ति। प्रत्यहं तैलतश्चालितवाहनानां सङ्ख्या सुरसाया मुखमिव परिवर्धते विषमयं तैलधूममुद्गिरभिस्तैरपि वायुरतिशयेन विक्रियते। दूषितवायौ श्वसनाद् अस्मत्फुस्फुसकार्यभारः प्रवर्धते, येन तत्रत्यरोगा हृदयरोगाश्च जायन्ते। अतिप्रदूषितवायोः शुद्धीकरणे पादपैरपि अत्यधिकं कार्यं करणीयं भवति तत्राक्षमत्वात्तेऽपि रुग्णा जायन्ते। एवं वायुप्रदूषणं दुष्चक्रं निरोधातीतं गच्छति। वृक्षाणां प्राचुर्येणारोपणं काष्ठेङ्गालानां न्यूनतमः प्रयोगः पेट्रोलडीजलादितैलवाहनानां स्थाने विद्युद्वाहनानामुपयोगः प्रदूषणरहितशक्तिसाधनानां विकासः, इत्येवं प्रायैरुपायैरिदमुपरोद्धं शक्यते।।

शब्दार्थ
एकतो = एक ओर।
विदधाति = करता है।
आविष्करोति = उत्पन्न करता है।
निस्सृताः = निकले हुए।
लवाः = अंश।
पूतिगन्धाः = दूषित गन्ध वाली।
विकारयन्ति = दूषित करती हैं।
प्रत्यहम् = प्रतिदिन।
सुरसायाः मुखमिव = सुरसा के मुख के समान।
परिवर्धते = बढ़ता है।
उद्गिरभिः = उगलने वाले।
विक्रियते = दूषित की जाती है।
फुफ्फुस कार्यभारः = फेफड़ों पर कार्य का भार।
दुष्चक्रम् = दूषित चक्र।
निरोधातीतम् = नियन्त्रण से बाहर।
आरोपणम् = जमाना, लगाना।
काष्ठेङ्गालानाम् = लकड़ी के कोयलों का।
उपरोधुं शक्यते = रोका जा सकता है।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में वायु को प्रदूषित करने वाले कारणों, उनसे होने वाले रोगों और प्रदूषण को रोकने के उपायों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
इस प्रकार एक ओर मनुष्य वायु के प्रदूषण को रोकने वाले वृक्षों की हत्या करता है, दूसरी ओर स्वयं अनेक प्रकार से वायु प्रदूषण के कारणों को लगातार उत्पन्न कर रहा है। फैक्ट्रियों से निकले धुएँ, खनिजों के अणु, रासायनिक अंश, दूषित गन्ध वाली हवाएँ वातावरण को दूषित करती हुई विशेष रूप से प्राणवायु (ऑक्सीजन) को दूषित करती हैं। प्रतिदिन तेल से चलने वाले वाहनों की संख्या सुरसा के मुख के समान बढ़ रही है। विषैले तेल के धुएँ को उगलते हुए उनसे भी वायु अत्यधिक रूप से दूषित की जा रही है। दूषित हवा में श्वास लेने से हमारे फेफड़ों पर कार्य का बोझ बढ़ जाता है, जिससे वहाँ (फेफड़ों) के रोग और हृदय रोग उत्पन्न होते हैं। अत्यन्त दूषित वायु को शुद्ध करने में वृक्षों को भी अधिक काम करना पड़ता है, उसको करने में असमर्थ होने के कारण (वे भी) बीमार हो जाते हैं। इस प्रकार वायु के प्रदूषण का दुष्चक्र नियन्त्रण से बाहर हो जाता है। वृक्षों को अधिक मात्रा में लगाना, लकड़ी के कोयलों का कम-से-सम प्रयोग, पेट्रोल, डीजल आदि तेल से चलने वाले वाहनों की जगह बिजली से चलने वाले वाहनों का उपयोग, प्रदूषण के रहित शक्ति के साधनों का विकास। इस प्रकार के उपायों से इसे रोका जा सकता है।

(6) कोलाहलेनापि पर्यावरणे बहवो दोषी उत्पद्यन्ते, रेलयानानां, मोटरवाहनानां, उद्योगशालासु बृहतां यन्त्राणां, यत्र तत्र सर्वत्र अवसरेऽनवसरे ध्वनिविस्तारकयन्त्रण, उत्सवेषु अतिमुखरवाद्यानां च घोषः, जनसम्मर्दकलकलेन मिलितो महान् कोलाहलः सम्पद्यते। विशेषतो नगरेषु ध्वनिप्रदूषणं महती समस्या। अतिकोलाहलेन श्रवणदोषस्तदनं बाधिर्यं च सम्पद्यते। नैतावतैव मुक्तिः , मस्तिष्कदोषा अपि अनेन उत्पाद्यन्ते यच्चरमापरिणतिरुन्मादो भवति। रक्तचापरोगोऽपि पदं निदधाति येन हृदयं रुग्णं जायते। अस्याः समस्यायाः समाधानार्थं ध्वनिविस्तारकयन्त्राणामनावश्यकः प्रयोग रोधनीयः, यन्त्राणां कोलाहलो नव-नव साइलेन्सराणामाविष्कारेण उपलब्धानां च सम्यगनिवार्यप्रयोगेण परिहरणीयः। कोलाहलदोषान् जनसामान्यं सम्बोध्य तद्विरुद्धं जनाः प्रशिक्षणीया जनमतं च प्रवर्तितव्यम्। ,अत्रापि वनस्पतीनामारोपणेन, संवर्धनेन रक्षणेन च सुखकराः परिणामाः कलयितुं शक्याः । एवं खलु दृश्यते यद् वृक्षाणां द्वादशव्यामपरिणाहमिता राजयः कोलाहलस्य सघनतां प्रकामं न्यूनयन्ति। अतः सर्वत्रापि राजपथमभितः, मध्ये-मध्ये चोपनगराणां वनस्पतयः आरामश्च आरोपणीयाः।

शब्दार्थ
उत्पद्यन्ते = उत्पन्न होते हैं।
बृहताम् = बड़े।
अवसरेऽनवसरे = समय-बेसमय
अतिमुखर = तेज आवाज वाले।
घोषः = ध्वनि।
जनसम्पर्दकलकलेन = जन-समूह के कोलाहल से।
सम्पद्यते = उत्पन्न होता है।
महती = बड़ी।
तदनु = उसके बाद।
बाधिर्यम् = बहरापन।
नैतावतैव = इतने से ही नहीं।
चरमपरिणतिः = अन्तिम परिणाम।
उन्मादः = पागलपन।
रक्तचापरोगः = ब्लडे प्रेशर की बीमारी।
पदं निदधाति = स्थान बना लेता है।
रोधनीयः = रोकना चाहिए।
नव-नव साइलेन्सराणामाविष्कारेण = नये-नये ध्वनिशामक यन्त्रों के आविष्कार से।
परिहरणीयः = दूर करना चाहिए।
बोध्य = समझाकर।
प्रशिक्षणीया = प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
प्रवर्तितव्ययम् = प्रवर्तन करना चाहिए।
वनस्पतीनां आरोपणेन = वनस्पतियों के लगाने से।
कलयितुं शक्याः = प्राप्त किये जा सकते हैं।
द्वादशव्यामपरिणाहमिताः = बारह चौके अर्थात् अड़तालीस हाथ की लम्बाई के बराबर।
राजयः = पंक्तियाँ।
प्रकामम् = अधिक।
न्यूनयन्ति = कम करती हैं।
राजपथम् अभितः = राजमार्ग के दोनों ओर।
उपनगराणाम् = क्षेत्रों या मुहल्लों के।
आरामाः = बगीचे, उपवन।
आरोपणीयाः = लगाने चाहिए।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में ध्वनि-प्रदूषण के कारणों, उससे उत्पन्न रोगों और प्रदूषण की रोकथाम के उपायों का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
शोर से ही पर्यावरण में बहुत-से दोष उत्पन्न होते हैं। रेलगाड़ियों, मोटर सवारियों, फैक्ट्रियों में बड़ी-बड़ी मशीनों का, जहाँ-तहाँ सब जगह समय-बेसमय पर लाउडस्पीकरों का और उत्सवों में अत्यन्त तेज बजने वाले बाजों का शब्द, लोगों की भीड़ के कोलाहल से मिला हुआ बहुत शोर उत्पन्न हो जाता है। विशेष रूप से नगरों में ध्वनि के प्रदूषण की अत्यधिक समस्या है। अत्यधिक शोर से सुनने में कमी और उसके बाद बहरापन उत्पन्न हो जाता है। इतने से ही छुटकारा नहीं है, मस्तिष्क की गड़बड़ियाँ भी इसके द्वारा पैदा कर दी जाती हैं, जिसका अन्तिम परिणाम पागलपन होता है। ब्लड प्रेशर की बीमारी भी घर कर लेती है, जिससे हृदय रुग्ण हो जाता है। इस समस्या को सुलझाने के लिए लाउडस्पीकरों का अनावश्यक प्रयोग रोका जाना चाहिए। मशीनों के शोर को भी नये-नये ध्वनिशामक यन्त्रों (साइलेन्सरों) के आविष्कारों से प्राप्त साधनों के उचित और अनिवार्य प्रयोग से रोकना चाहिए। जनसाधारण को शोर की खराबियों को समझाकर, उसके विरुद्ध लोगों को प्रशिक्षित करना चाहिए और जनमत जाग्रत करना चाहिए। इसमें भी वनस्पतियों के लगाने, बढ़ाने और रक्षा करने से सुखद परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं। निश्चय ही ऐसा देखा जाता है कि अड़तालीस हाथ की लम्बाई के बराबर वृक्षों की पंक्तियाँ शोर के घनेपन को अत्यधिक कम कर देती हैं; अतः सभी जगह सड़क के दोनों ओर तथा मोहल्लों के बीच-बीच में वनस्पतियाँ और उपवन लगाये जाने चाहिए।

(7) खगमृगाणां मांसादिलोभिना मानवेन एतादृशी जाल्मता अङ्गीकृता यदधुना तेषां नैकाः प्रजातयो लुप्ता एव, वस्तुतः सर्वेऽपि पशुपक्षिणः पर्यावरणसन्तुलननिर्वाहे यथायोगमुपकारका भवन्ति। सिंहव्याघ्रादयो मांसभक्षका हरिणादीनां वृद्धि परिसमयन्ति। आशीविषाजगरादयो मूषकशशकादीनां भक्षणेन कृषिकराणां सुहृद् एव। पक्षिणो बीजानां विकिरणं कुर्वन्ति, कीटपतङ्गादयः पुष्पाणां प्रजननक्रियायां सहायका भवन्ति येन फलानि बीजानि चोत्पद्यन्ते। पशुपक्षिणां पुरीषेण भूमिरुर्वरा भवति येन वनस्पतीनां विकासो भवति।’जीवो जीवस्य भोजनम्’ इति प्रकृतिनियमस्यानुसारं पक्षिणः कीटपतङ्गान् , केऽपि हिंस्राः पशवश्च तृणचरान् भक्षयन्तः पर्यावरणसन्तुलनं स्वत एव विदधति, तत्रं मनुष्यकृतो लोभप्रवर्तितो हस्तक्षेपो विकारमेवोत्पादयति, स्वैर वधो विध्वंसमेव जनयति।

शब्दार्थ
खगमृगाणां = पक्षियों और पशुओं का।
जाल्मता = नीचता।
परिसीमयन्ति = सीमित कर देते हैं।
आशीविष = सर्प।
कृषिकराणां = किसानों के।
विकिरणम् = बिखेरना।
पुरीषेण = विष्ठा से।
विदधति = करते हैं।
स्वैरं = ब्रिना रोक-टोक के।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में पर्यावरण के सन्तुलन में पशु-पक्षियों के योगदान का वर्णन किया गया

अनुवाद
पशु-पक्षियों के मांस आदि के लोभी मानव ने ऐसी नीचता स्वीकार कर रखी है कि आजकल उनकी अनेक प्रजातियाँ समाप्त प्राय ही हैं। वास्तव में सभी पशु-पक्षी पर्यावरण के सन्तुलन के निर्वाह में शक्ति के अनुसार उपकार करने वाले होते हैं। सिंह, व्याघ्र आदि,मांसभक्षी जीव हिरन आदि की वृद्धि को सीमित कर देते हैं। सर्प, अजगर आदि चूहे, खरगोश आदि को खाने के कारण किसानों के मित्र ही हैं। पक्षी बीजों को बिखेर देते हैं। कीड़े, पतंगे आदि फूलों की प्रजनन-क्रिया में ।

सहायक होते हैं, जिससे फल और बीज उत्पन्न होते हैं। पशु-पक्षियों के मल (विष्ठा) से भूमि उपजाऊ ‘होती है, जिससे वनस्पतियों का विकास होता है। ‘जीव, जीव का भोजन है, इस प्रकृति के नियम के अनुसार पक्षी, कीड़े और पतंगों को और कुछ हिंसक पशु घास खाने वाले पशुओं को खाते हुए पर्यावरण का सन्तुलन स्वयं ही करते हैं। उसमें मनुष्यों के द्वारा किया गया लोभ से प्रेरित हस्तक्षेप गड़बड़ी ही उत्पन्न करता है। बुद्धिहीन वध (बिना रोक-टोक के किया गया) विध्वंस को ही उत्पन्न करता है।

(8) मनुजस्यातिचारो नैतावता परिसमाप्यते नास्ति।. जलं यद्धि जीवनयात्यावश्यकत्वज्जीवनमेव कथ्यते तदपि मनुजस्याविवेकेन दूषितम्। गङ्गायमुनासदृशीषु स्वादुपवित्रपेयसलिलासु नदीषु तटीयतटस्थनगराणां मलमूत्रादिकं सर्वप्रकारकं मालिन्यं नदीषु निंपात्यते। औद्योगिक विषमयरसायनदूषितजलं तासु निपात्यते। नराणां पशूनां च शवास्तत्र प्रवाह्यन्ते। सर्वमेतदतिभीतिकरं प्रदूषणं कुरुते। जलं तथा विषाक्तं जायते यन्मत्स्या अपि म्रियन्ते। तथाविधं जलं मानवानां स्नान-पानादिजनितं रोगमेव प्रकुरुते। यतस्तत्र रोगकारकस्तद्वाहकाश्च जीवाणवः परमं पोषमाप्नुवन्ति। सौभाग्येन सम्प्रति शासेन गङ्गाप्रदूषणनिवारकं प्राधिकरणं घटितं। एष खलु प्रारम्भ एव। अन्यासां नदीनां शोधनाय जलोपलब्धेरन्यान्यपि साधनानि विशोधयितुं च लोकस्य रुचिरुत्साहनीया। जनतायाः स्वयं साहाय्येन विना न अभीप्सितं प्राप्तुं शक्यते।

शब्दार्थ
मनुजस्यातिचारः = मनुष्य का अत्याचार।
नैतावती = इतने से नहीं।
परिसमाप्यते = समाप्त होना।
स्वादुपवित्रपेयसलिलासु = स्वादिष्ट, पवित्र और पीने योग्य जल वाली में।
मालिन्यं = मैला, गन्दगी।
निपात्यते. = गिराया जाता है।
प्रवाह्यन्ते = बहाये जाते हैं।
भीतिकरम् = भय उत्पन्न करने वाले।
विषाक्तम् = विषैला।
पोषम् आप्नुवन्ति = पोषण प्राप्त करते हैं।
सम्प्रति = इस समय।
घटितम् = बनाया गया है।
अभीप्सितम् = इच्छित लक्ष्य। |

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश’ में मानव द्वारा जल को दूषित करने एवं उससे उत्पन्न हानि का वर्णन किया गया है।

अनुवाद
मनुष्य का अत्याचार यहीं तक समाप्त नहीं होता है। जल को जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक होने के कारण जीवन ही कहा जाता है, वह भी मनुष्य की मूर्खता से दूषित हो गया है। गंगा, यमुना जैसी स्वादिष्ट, पवित्र, पीने योग्य जल वाली नदियों में उनके किनारे पर स्थित नगरों की मल-मूत्र आदि सब प्रकार की गन्दगी डाल दी जाती है। उद्योगों का विषैले रसायनों से दूषित जल उनमें डाल दिया जाता है। मनुष्यों और पशुओं के शव उनमें बहा दिये जाते हैं। यह सब अत्यन्त भयानक प्रदूषण कर देता है। जल इतना विषैला हो जाता है कि मछलियाँ भी मर जाती हैं। इस प्रकार का जल मानवों के स्नान और पीने आदि के रोग को ही उत्पन्न करता है; क्योंकि उसमें रोग उत्पन्न करने वाले और उनको (रोग को) लाने वाले जीवाणु खूब पुष्ट हो जाते हैं। सौभाग्य से अब सरकार ने गंगा के प्रदूषण को रोकने वाला प्राधिकरण बनाया है। यह तो प्रारम्भ ही है। दूसरी नदियों को शुद्ध करने के लिए और जल-प्राप्ति के दूसरे भी साधनों को शुद्ध करने के लिए लोगों की रुचि को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। जनता की स्वयं सहायता के बिना इच्छित लक्ष्य प्राप्त होना असम्भव है।

(9) मानवस्य विविधक्रियाभिरुत्पन्नस्तापोऽपि पर्यावरणं दूषयति। परमाणुपरीक्षणैर्महती तापविकृतिर्निष्पाद्यतेऽन्ये च मानवप्राणहरा दोषा उत्पाद्यन्ते। उद्योगशालानां तापोऽपि वातावरणस्य तापं वर्धयति। ग्रीमष्काले पक्वेष्टिकासीमेण्टकङ्क्रीट-निर्मितानि भवनानि, कार्यशालाः, राजमार्गा एवंविधानि चान्यानि लौहनिर्माणानि तापमात्मसात्कृत्य संरक्षन्ति यस्य मानवजीवनेऽस्वास्थ्यकरः प्रभावो भवति। अत्रापि वनस्पतयो मानवस्य त्राणं चर्कर्तुं प्रभवः सन्ति। तेषां यथाप्रसरं सघनमारोपणं तापं नियमयत्येव। प्रतिव्यक्ति सार्धत्रयोदशकिलोपरिमितः प्राणवायुः स्वस्थजीवनयापेक्षते, तस्यैकमात्रं प्राकृतिक स्रोतस्तु वनस्पतिजातम्। अतएवमेव मुहुर्मुहुरनुरुध्यते यन्यानवेनात्मकल्यणाय अधिकाधिकं वृक्षा आरोपणीयाः। समयश्च कार्यों यत्प्रत्येक व्यक्तिरेकं वृक्षमवश्यमारोप्य वर्धयिष्यति, रक्षयिष्यत्यन्यांश्च तथाकर्तुं प्रवर्तयिष्यतीति।।

शब्दार्थ
दूषयति = दूषित करता है।
निष्पाद्यते = की जाती है।
पक्वेष्टिका = पक्की ईंट।
तापम् आत्मसात्कृत्य = गर्मी को अपने में मिलाकर।
त्राणम् = रक्षा।
चर्कर्तुम् = बार-बार करने के लिए।
प्रभवः = समर्थ।
नियमयत्येव = नियमित ही करता है।
अपेक्षते = आवश्यकता है।
वनस्पतिजातम् = वृक्षों का समूह।
अनुरुध्यते = अनुरोध किया जाता है।
आरोपणीयाः = लगाने |
चाहिए। समयः = निश्चय, प्रतिज्ञा।
प्रवर्तयिष्यति = प्रेरित करेगा।

प्रसंग
प्रस्तुत गद्यांश में तोप के प्रदूषण, उससे उत्पन्न हानियों एवं उनको दूर करने के उपाय बताये गये हैं।

अनुवाद
मानव की विविध क्रियाओं से उत्पन्न ताप भी पर्यावरण को दूषित करता है। एएमाणु के परीक्षणों से ताप में बड़ा विकार उत्पन्न किया जाता है, जिससे मनुष्य के प्राणघातक अन्य दोष उत्पन्न होते हैं। उद्योगशालाओं का ताप भी वातावरण के ताप को बढ़ाता है। ग्रीष्म ऋतु में पक्की ईंटों, सीमेंट, कंक्रीट से बने हुए घर, कार्यशालाएँ, सड़कें और इस प्रकार के अन्य लोहे से निर्मित स्थान ताप को अपने में समेटकर रखते हैं, जिसका मानव के जीवन पर अस्वास्थ्यकारी प्रभाव होता है। इसमें भी वनस्पतियाँ मानव की बार-बार रक्षा करने में समर्थ हैं। उनका (वनस्पतियों का) उचित प्रसार और अधिक घनत्व में रोपना ताप को रोकता है। प्रत्येक व्यक्ति को साढ़े तेरह किलो भार के बराबर प्राणवायु की स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यकता होती है। उसका एकमात्र प्राकृतिक स्रोत तो वनस्पतियाँ हैं; अतः ऐसा बार-बार अनुरोध किया जाता है कि मानव को अपने कल्याण के लिए अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाने चाहिए और प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति एक वृक्ष अवश्य लगाकर बढ़ाएगा, रक्षा करेगा और ऐसा करने के लिए दूसरों को भी प्रेरित करेगा।

लघु उत्तरीय प्ररन

प्ररन 1 
विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों और मनुष्य पर पड़ने वाले उनके दुष्परिणामों को समझाइए।।
उत्तर
विभिन्न प्रकार के प्रदूषण और मनुष्य पर पड़ने वाले उनके दुष्परिणामों का विवरण इस प्रकार है

(क) वायु-प्रदूषण-कारखानों की चिमनियों से निकलते धुएँ, खनिजों के अणु, रसायनों के अंश, तेल-चालित वाहनों के तेल मिले धुएँ और दुर्गन्धयुक्त वायु वातावरण को दूषित करते हैं। दूषित वायु में साँस लेने से फेफड़ों पर कार्यभार बढ़ जाता है, जिससे मनुष्य सॉस सम्बन्धी बीमारियों का शिकार हो जाता है।

(ख) ध्वनि-प्रदूषण-रेलगाड़ियों, मोटरों, बड़ी-बड़ी मशीनों, तेज वाद्यों की आवाज से ध्वनि का प्रदूषण होता है। ध्वनि-प्रदूषण से बहरापन और कानों के अनेक दोषों के साथ-साथ मस्तिष्क में विकार उत्पन्न हो जाता है, जिससे मनुष्य पागल हो सकता है।

(ग) जल-प्रदूषण-गंगा, यमुना आदि नदियों में महानगरों की गन्दगी, पशुओं-मनुष्यों के शव, रासायनिक जल आदि बहाये जाने के कारण जल विषाक्त और अपेय तो हो ही गया है, साथ ही इसमें अनेक रोगाणु भी पलने लगे हैं।

(घ) ताप-प्रदूषण-मानव की अनेक क्रियाओं; यथा-पारमाणविक; आदि के द्वारा वातावरण का ताप बढ़ता है। पक्की ईंटों-कंकरीट के आवासीय वे कार्य-परिसर, सड़कें आदि स्वयं में ताप को संचित करती हैं। इसका भी मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।

प्ररन 2 
‘पर्यावरणशुद्धिः पाठ के आधार पर निम्नलिखित पर प्रकाश डालिए
(क) पर्यावरण का आशय,(ख) पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार, (ग) प्रदूषण को रोकने के उपाय। |
उत्तर
(क) पर्यावरण का आशय-सभी जीवधारियों की भाँति मनुष्य ने भी प्रकृति की गोद में जन्म लिया है। प्रकृति के तत्त्व-मिट्टी, जल, वायु, वनस्पति आदि उसको चारों ओर से घेरे हुए हैं। इन्हीं प्राकृतिक तत्त्वों को पर्यावरण कहा.जाता है।

(ख) पर्यावरण प्रदूषण के प्रमुर-पर्यावरण प्रदूषण के निम्नलिखित चार प्रकार हैं(अ) वायु प्रदूषण (ब) ध्वनि-प्रदूषण(स) जल-प्रदूषण और (द) ताप-प्रदूषण।।
[संकेत-विस्तार के लिए प्रश्न सं० 1 देखिए।]

(ग) प्रदूषण को रोकने के उपाय—सभी प्रकार के प्रदूषणों को रोकने का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपाय अधिकाधिक वृक्षारोपण है। वृक्ष विषाक्त वायु के विष-तत्त्व को पीकर स्वास्थ्य के लिए लाभदायक प्राणवायु को उत्पन्न करते हैं। वायु-प्रदूषण को दूर करने में वृक्षों का महान् योगदान है। वृक्षारोपण करने और उनका भली-भाँति संवर्द्धन करने से ध्वनि की सघनता अर्थात् ध्वनि-प्रदूषण कम होता है। जल-प्रदूषण को रोकने में भी अप्रत्यक्ष रूप से वृक्षारोपण का अत्यधिक योगदान है। वृक्ष वातावरण में आर्द्रता उत्पन्न करते हैं, अपने पत्तों को गिराकर खाद बनाते हैं तथा भू-क्षरण को रोकते . हैं। वृक्षों के माध्यम से ही पृथ्वी के गर्भ में जल का संचय होता है, जो मानव के लिए अत्यधिक उपयोगी है। वृक्ष सूर्य की गरमी को दूर करते हैं। अनेकानेक कारणों से वातावरण का जो ताप बढ़ता है, उसे वृक्षों की सघनता नियन्त्रित कर देती है।। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि एकमात्र वृक्षारोपण ही अनेक प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में सहायक है। सरकार के साथ-साथ सामान्य जनता का सक्रिय सहयोग इस कार्य में अत्यधिक सहायक सिद्ध होगा।