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शिरीष के फूल

हजारी प्रसाद द्विवेदी

शिरीष के फूल

अभ्यास

पाठ के साथ

  1. लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?

उत्तर कालजयी का अर्थ है-काल के समक्ष भी विजयी रहने वाला। शिरीष का पेड़ अवधूत की भाँति वसंत के आगमन से लेकर भाद्रपद मास तक बिना किसी बाधा के पुष्पित होता रहता है। जब ग्रीष्म ऋतु में सारी पृथ्वी धुआँरहित अग्निकुंड की भाँति बन जाती है, लू के कारण हृदय सूखने लगता है, तो ऐसा लगता है कि शिरीष का पेड़ कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता के मंत्र का प्रचार कर रहा है। वह संसार के समस्त प्राणियों को धैर्यशील, चिंतारहित, कर्त्तव्यशील बने रहने के लिए प्रेरित करता है। इसी कारण लेखक ने इसे संन्यासी की तरह माना है।

  1. 'हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है'-प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर सज्जनों की परिभाषा देते हुए कहा जाता है कि वे वज्र से भी अधिक कठोर तथा पुष्प से भी अधिक कोमल होते हैं। हृदय की कोमलता वास्तव में ऐसा भाव है, जो हर समय बाहरी स्वभाव को कोमल नहीं रहने देता। जैसे शिरीष के फूल के विषय में कालिदास का कहना है कि शिरीष का फूल केवल भौंरों के पदों का कोमल दबाव सहन कर सकता है, लेकिन हजारी प्रसाद द्विवेदी ने महसूस किया कि शिरीष का फूल इतना मजबूत होता है कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ता तथा बाह्य रूप से कालजयी अवधूत कहलाता है। शिरीष के आधार पर यह कहना उचित ही है कि हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी अनिवार्य हो जाती है।

  1. द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल तथा संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।

उत्तर 'शिरीष के फूल' द्विवेदी जी का उत्कृष्ट निबंध है। इसके माध्यम से लेखक हमें यह बताना चाहता है कि जिस प्रकार शिरीष का फूल; लू, गर्मी, आँधी, और असामान्य शुष्क मौसम में खिलकर सौंदर्य बिखेरता है, उसी प्रकार हमें भी संसार के आक्षेप, अपमान एवं कपटपूर्ण व्यवहार के बीच संघर्ष के साथ जीना चाहिए। हमारी जिजीविषा भी ऐसी हो कि जब कहीं से भी पोषण और नमी न मिल सके, तब हम अपनी आत्मा से पोषण पा सकें। नवागंतुकों के साथ भी जीवनयापन करने की हिम्मत रख सकें। हमारे भीतर विकट समय में भी सुकोमल सौंदर्य बनाए रखने की क्षमता होनी चाहिए।

  1. 'हाय, वह अवधूत आज कहाँ है'? ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?

उत्तर 'हाय, वह अवधूत कहाँ है?' निबंध की अंतिम पंक्ति है। इसमें लेखक राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के विषय में अपने विचार व्यक्त करता है कि वे शिरीष की भाँति थे। लेखक का मानना है कि प्रेरणादायी और आत्मविश्वास रखने वाले लोग अब नहीं रहे। अब केवल देह को प्राथमिकता देने वाले लोग रह गए हैं। ऐसे लोगों में आत्मविश्वास बिल्कुल नहीं है। ऐसे लोग शरीर को महत्त्व देते हैं, मन को नहीं। लेखक ने शिरीष के फूल के माध्यम से वर्तमान सभ्यता को स्पष्ट किया है।

  1. कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिरप्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय-एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ।

उत्तर कवि अथवा साहित्यकार के लिए अनासक्त योगी की स्थिरप्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय-दोनों आवश्यक हैं। साहित्यकार को ईमानदारी से भावाभिव्यक्ति करनी होती है। उसके हृदय में किसी के प्रति भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए। बिना वजह ही हम अपने चारों ओर एक घेरा बना लेते हैं, जिससे हम आगे नहीं बढ़ पाते। खासकर साहित्य-रचना में यह घेरा बाधक होता है। मगर दूसरी ओर लेखक में यदि प्रेमी का हृदय न हो तो साहित्य-रचना हो ही नहीं सकती। लेखक के अनुसार इन दोनों सद्गुणों का संतुलित समावेश ही एक अच्छे साहित्यकार को जन्म देता है। साहित्यकार का आदर्श है-प्रेमी की भाँति विदग्ध होकर संसार में रहना, पर किसी के प्रति भी आसक्त न होना। साहित्य कर्म के लिए यह मानदंड निश्चय ही बहुत ऊँचा है। इस मानदंड पर खरे उतरने वाले साहित्यकार कालजयी होते हैं। वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसी, सूर, जयशंकर प्रसाद जैसे कवि। प्रेमचंद व द्विवेदी जी जैसे गद्यकार ऐसी कसौटी पर खरे उतरने के कारण ही कालजयी हैं। कालिदास द्वारा रचित 'मेघदूतम्' काव्य उनके अनासक्त योगी तथा 'अभिज्ञानशाकुंतलम् में दुष्यंत को आकर्षित करने के लिए शकुंतला का सौंदर्य वर्णन उनके विदग्ध प्रेमी हृदय को दर्शाता है। यदि ये दोनों विशेषताएँ कालिदास में नहीं होतीं तो वे इस प्रकार की रचनाएँ कर सकने में समर्थ नहीं होते।

  1. सर्वग्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रही स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर शिरीष पुष्प का चित्रण, वर्णन और विशेषताओं का उल्लेख करते हुए आचार्य द्विवेदी ने शिरीष को जहाँ एक ओर लू, आँधी जैसे विषम वातावरण में विकसित और प्रफुल्लित होने वाला फूल बताया है, वहीं उसे कालजयी अवधूत की भी संज्ञा दी है। हजारी प्रसाद द्विवेदी मानते हैं कि कालदेवता तेजी से कोड़े चला रहे हैं, जिससे जीर्ण-दुर्बल झड़ रहे हैं, लेकिन ऊर्ध्वमुखी टिक जाते हैं, वही तो शिरीष हैं।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मनुष्य को समयानुसार परिवर्तन करते रहना चाहिए। मृत्यु तो अवश्यंभावी है। जो लोग समय के साथ चलते हैं, नए को स्वीकार करते हुए बढ़ते रहते हैं, उनको समाज अपना अंग मानता है। काल के कोड़ों से वे

बचे रहते हैं। लेकिन जो एक स्थान पर डटे रहते हैं, उनको समाज भी पुराना, जीर्ण-क्षीण समझकर अस्वीकार कर देता है। काल भी उन्हें लील जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने व्यवहार में जड़ता को त्यागकर नित परिवर्तित हो रही परिस्थितियों में अपनी गतिशीलता को बनाए रखें। जरा (वृद्धावस्था) और मृत्यु अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य है, जिसे सभी को स्वीकार करना चाहिए।

  1. आशय स्पष्ट कीजिए

(क) दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।

(ख) जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?... मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तों, तो फक्कड़ बनो।

(ग) फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई उंगुली है। वह इशारा है।

उत्तर (क) समय निरंतर गतिशील है और समय की गतिशीलता के साथ मनुष्य के जीवन में भी निरंतर परिवर्तन आते हैं। जो समय की गतिशीलता व जीवन की परिवर्तनशीलता की अनदेखी करते हैं वे मूर्ख होते हैं। समय की गतिशीलता के साथ जो स्थान परिवर्तन करता रहता है वही इसकी मार से बचा रह सकता है। यहाँ पर लेखक ने ऐसे व्यक्तियों की ओर संकेत किया है जो अपने स्थान पर तब तक जमे रहते हैं। जब तक नयी पीढ़ी उन्हें धकिया कर बाहर न निकाल दे। इसलिए हमें समय की गति को पहचानकर उसके अनुरूप आचरण करना चाहिए। परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। जड़ता मृत्यु का प्रतीक है अर्थात् प्रगति की अवरोधक है।

(ख) लेखक के अनुसार कवि की सर्वप्रथम विशेषता है उसका समदर्शी दृष्टिकोण, आसक्ति रहित फक्कड़ जीवन शैली। जो अवधूत के समान नहीं हो सकता उसे कवि नहीं कहा जा सकता। कवि में मस्ती व समरसता का गुण होना आवश्यक है तभी वह जनकल्याण के कार्यों को संपन्न कर सकता है। वह निजी स्वार्थ नहीं बल्कि परमार्थ के लिए सोचता, लिखता व करता है।

(ग) लेखक अपनी पंक्तियों के माध्यम से फल तथा पेड़ों के उगने व खिलने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध करना चाहता है। लेखक के अनुसार पेड़ व फल केवल प्राकृतिक सौंदर्य में वृद्धि करने के उपादान नहीं हैं बल्कि जीवन के इस सत्य की

ओर भी संकेत करते हैं कि कोई वस्तु स्वयं में पूर्ण नहीं है क्योंकि इनका स्रष्टा कोई और है। उसी के अनुसार यह संसार चलता है। इसलिए सृष्टि के इस सत्य को जानो, समय की गति को पहचानो व उसी के अनुरूप परिवर्तित होते जाओ और उस परमपिता को प्राप्त करने हेतु प्रयत्नशील रहो।

पाठ के आस-पास

  1. शिरीष के पुष्प को 'शीतपुष्प' भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गर्मी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी?

उत्तर शिरीष शीतपुष्प है जो ज्येष्ठ की प्रचंड गर्मी में खिलता है। इसलिए इसे शीतपुष्प भी कहा जाता है। जब ज्येष्ठ मास में सारी धरती अग्निकुंड की भाँति जल रही होती है, उस समय शिरीष ही मात्र ऐसा वृक्ष है, जो पुष्पित, पल्लवित और शीतलता प्रदान करता है। संभवतः इसके द्वारा शीतलता प्रदान करने की विशेषता के कारण ही इसके फूल को 'शीतपुष्प' कहा गया होगा।

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