Chapter 2 धर्म-सुधार आन्दोलन–खोजें एवं आविष्कार (अनुभाग – एक).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्म-सुधार आन्दोलन के कुछ प्रमुख कारणों पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
       या
यूरोप में प्रोटेस्टेण्ट धर्म-सुधार आन्दोलन के कारणों का वर्णन कीजिए। [2014]
उत्तर
धर्म-सुधार आन्दोलन के प्रमुख कारण धर्म-सुधार आन्दोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

1. चर्च के सिद्धान्तों के विरुद्ध असन्तोष – मध्यकाल के अन्तिम चरण में रोमन कैथोलिक चर्च के अन्दर ही कुछ मूलभूत सिद्धान्तों के विरुद्ध असन्तोष बढ़ रहा था। कुछ लोग यह मानने लगे थे कि रोमन कैथोलिक चर्च ईसा के उपदेशों, भावनाओं एवं मान्यताओं से दूर हट चुका है। इसलिए चर्च को ईसाई धर्म के ईश्वर-नियुक्त अभिभावक के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इन सुधारकों ने कहा कि ईसाई सिद्धान्तों का एकमात्र प्रामाणिक स्रोत धर्मग्रन्थ है, न कि संगठित चर्च के निर्णय एवं परम्पराएँ। उन्होंने ईसाई धर्म में मनुष्य और ईश्वर के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्धों पर जोर देना शुरू किया। फलतः पेशेवर पादरी और रोमन कैथोलिक चर्च के संस्कारों का महत्त्व घटने लगा।

2. चर्च में व्याप्त बुराइयाँ – धर्म-सुधार आन्दोलन का दूसरा प्रमुख कारण चर्च के अन्तर्गत व्याप्त बुराइयाँ थीं, जो 15वीं एवं 16वीं सदी में पैदा हो गयी थीं। पादरियों की अज्ञानता और विलासिता, चर्च के पदों एवं सेवाओं की बिक्री (सिमोनी), सम्बन्धियों के बीच चर्च के लाभकारी पदों का बँटवारा (नेपोटिज्म) तथा एक पादरी द्वारा एक से अधिक पद रखे रहना (प्लुरेलिज़म) यह सभी असन्तोष एवं शिकायत के कारण थे। पापी-से-पापी व्यक्ति भी चर्च को पैसे देकर अपने पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकता था। सच्चे धर्मात्मा एवं श्रद्धालु लोगों को ये बातें बुरी लगती थीं। वे यह नहीं समझ पाते थे कि जो व्यक्ति पाप करते हैं, उन्हें ईश्वर पैसा लेकर कैसे छोड़ देगा?

3. आर्थिक कारण – आर्थिक कारणों ने नि:सन्देह धर्म-सुधार आन्दोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभायी। उस समय तक पश्चिमी यूरोप के देशों में राष्ट्रीय राज्य कायम हो चुके थे। राजाओं को सेना व प्रशासन का खर्च चलाने के लिए अधिक धन की आवश्यकता थी। पादरियों द्वारा वसूला जाने वाला कर’ रोम चला जाता था। इसके अतिरिक्त पादरी वर्ग धनी होते हुए भी करों से मुक्त था। राजा चाहते थे कि राज्य का शासन चलाने के लिए चर्च पर कर लगाया जाए। वाणिज्य-व्यापार के कारण जब मुद्रा-प्रधान अर्थव्यवस्था कायम हुई तब कर्ज लेने की प्रथा जोरों से चल पड़ी। परन्तु चर्च की मान्यता थी कि कर्ज लेना पाप है। अत: चर्च के सिद्धान्त व्यापार की प्रगति में बड़े बाधक थे। इसलिए व्यापारी एक ऐसा धर्म चाहते थे जो उनके कार्यों का समर्थन करे।

4. चर्च द्वारा किसानों का शोषण – चर्चशोषित किसानों का असन्तोष भी धर्म-सुधार आन्दोलन का कारण था। चर्च स्वतः ही एक बड़ा सामन्त था। भू-अनुदान के रूप में उसके पास बहुत अधिक भूमि का स्वामित्व था। किसान चर्च के कर से पिसते जा रहे थे। पादरी, सामन्त-प्रथा एवं किसानों (कम्मियों) के शोषण का समर्थन करते थे। इसलिए जाग्रत किसान उनसे नाराज थे और कभी-कभी विद्रोह भी कर देते थे।

5. धर्म के प्रति कट्टरवादिता – पुनर्जागरण के कारण चर्च और उसके प्रधान पोप के विरुद्ध विद्रोह की भावना और बलवती हो उठी। चर्च सम्भवत: नवीन विचारधारा का सबसे जबरदस्त विरोधी था। वह नहीं चाहता था कि पुराने विश्वासों और रूढ़ियों को उखाड़कर नये सिद्धान्तों की स्थापना हो। परन्तु मुद्रण (प्रिण्टिग) कला के विकास से धार्मिक ग्रन्थों को पढ़कर एवं विचारकों के विचार जानकर लोगों को पता चल गया कि ईसाई धर्म का सच्चा स्वरूप क्या है तथा बीच के काल में जो अन्धविश्वास प्रविष्ट हो गये हैं वे पादरी वर्ग के निहितार्थों के कारण हुए थे। अत: इससे धर्म का स्वरूप विकृत हो गया था। वे इस बात का प्रयत्न करने लगे कि धर्म का प्राचीन रूप पुनः प्रतिष्ठित हो।

निष्कर्ष – सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक चर्च के विरुद्ध धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और बौद्धिक असन्तोष चरम सीमा तक पहुँच चुका था। विद्रोह के लिए केवल एक सक्रिय नेता और विस्फोट के लिए एक घटना की आवश्यकता थी। प्रोटेस्टेण्ट धर्म-सुधार तीन विशिष्ट परन्तु सम्बद्ध आन्दोलनों-लूथरवाद, काल्विनवाद और ऐंग्लिकनवाद से मिलकर संघटित हुआ। मार्टिन लूथर का विद्रोह धर्म-सुधार की शुरुआत थी।

प्रश्न 2. लूथरवाद तथा काल्विनवाद का विस्तृत वर्णन कीजिए।
       या
धर्म-सुधार आन्दोलन में लूथर का क्या योगदान था ?
       या
मार्टिन लूथर किंग पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर

लूथरवाद

मार्टिन लूथर का जन्म 10 नवम्बर, 1483 ई० में जर्मनी के आइसलेवन नामक शहर में हुआ था। इसके पिता हेन्स लूथर एक खान में मजदूरी किया करते थे। मार्टिन लूथर की 62 वर्ष की अवस्था में 18 फरवरी, 1546 ई० को आइसलेवन में मृत्यु हो गयी।

मार्टिन लुथर ने धर्मशास्त्र का अध्ययन किया था। उसका विश्वास था कि ईसा मसीह में अटूट विश्वास के द्वारा मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर सकता है। उसने अनुभव किया कि पूजा, प्रायश्चित्त, बानगी, प्रार्थना, आध्यात्मिक ध्यान और क्षमा-पत्रों (इण्डल्जेन्स) की खरीद से पाप से मुक्ति नहीं पायी जा सकती। उसने क्षमा-पत्रों की बिक्री के औचित्य को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि क्षमा-पत्र के द्वारा मनुष्य चर्च के लगाये दण्ड से मुक्त हो सकता है, किन्तु मृत्यु के पश्चात् वह ईश्वर के लगाये दण्ड से छुटकारा नहीं पा सकता और ने अपने पाप के फल से बच सकता है। उसके विचारों ने तहलका मचा दिया। उसके समर्थकों की संख्या बढ़ने लगी।

लूथर के विचारों से पोप को घबराहट हुई। पोप ने उसे धर्मच्युत कर दिया। इस समय तक सारे जर्मनी में सामाजिक एवं धार्मिक खलबली पैदा हो चुकी थी। बहुत-से राजा चर्च से नाराज थे। इसलिए वे लूथर का समर्थन करने लगे।

लूथर के विचार बहुत सुगम थे। उसने ईसा और बाइबिल की सत्ता स्वीकार की जबकि पोप और चर्च की दिव्यता और निरंकुशता को नकार दिया। उसने बताया कि चर्च का अर्थ रोमन कैथोलिक या कोई अन्य विशिष्ट संगठन नहीं बल्कि ईसा में विश्वास करने वाले लोगों का समुदाय है। उसने पोप, कार्डिनल और बिशप के पदानुक्रम को समाप्त करने की माँग की। मठों और पादरियों के ब्रह्मचर्य को समाप्त करने का विचार उसने रखा। उसके ये विचार अत्यधिक लोकप्रिय हुए।

धर्म के प्रश्न को लेकर जर्मनी के राज्य दो दलों में बँट गये-लूथर के समर्थक ‘प्रोटेस्टेण्ट’ कहलाये और उसके विरोधी ‘कैथोलिक’। प्रोटेस्टेण्ट, सुधारवादी थे और कैथोलिक प्राचीन धर्म के अनुयायी। प्रोटेस्टेण्ट धर्म उत्तरी जर्मन राज्यों, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन और बाल्टिक राज्यों में तेजी से फैल गया।

काल्विनवाद

प्रोटेस्टेण्ट धर्म की स्थापना में लूथर के बाद फ्रांस के ‘काल्विन’ का ही नाम आता है। इनका जन्म 10 जुलाई, 1509 ई० को फ्रांस में हुआ था। इन्होंने लूथर के विचारों को पढ़कर 24 वर्ष की आयु में प्रोटेस्टेण्ट धर्म को अपना लिया। उनका विचार था कि ईसाई धर्म को समझने के लिए ईसा के विचार को समझना आवश्यक है। उनका कहना था कि आचार-विचार का पालन कड़ाई से होना चाहिए।

काल्विन के सिद्धान्तों का आधार ईश्वर की इच्छा की सर्वोच्चता थी। ईश्वर की इच्छा से ही सब कुछ होता है, इसलिए मनुष्य की मुक्ति न कर्म से हो सकती है न आस्था से, वह तो केवल ईश्वर के अनुग्रह से ही हो सकती है। मनुष्य के पैदा होते ही यह तय हो जाता है कि उसका उद्धार होगा या नहीं। इसे ही पूर्व नियति का सिद्धान्त’ (Doctrine of Predestiny) कहते हैं।

काल्विन के इस सिद्धान्त ने उसके अनुयायियों, विशेषकर व्यापारियों में नवीन उत्साह, आत्मविश्वास एवं दैविक प्रेरणा का संचार किया। अत: यह स्पष्ट है कि काल्विन के धर्म को व्यापारियों का समर्थन इसलिए मिला; क्योंकि उसके सिद्धान्तों से उनके व्यापार को बड़ा लाभ हुआ; उदाहरणस्वरूप-स्कॉट, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज। वास्तव में “19वीं शताब्दी के सर्वहारा के लिए जो कार्य कार्ल मार्क्स ने किया, वही 16वीं शताब्दी के मध्यम वर्ग के लिए काल्विन ने।

काल्विन तत्कालीन पूँजीवादी विकास का समर्थक था। उसने व्यापारियों और मध्यम वर्ग के लोगों के समर्थन से अपने धर्म को मजबूत किया। उसने इस बात पर भी जोर दिया कि पूँजी के लिए सूद (ब्याज) लेना उतना
ही ठीक है, जितना कि ज़मीन के लिए मालगुजारी। व्यापार में मुनाफे को वह उचित समझता था। काल्विन को इन विचारों के कारण व्यापारी वर्ग का समर्थन प्राप्त हुआ। अतएव वाणिज्य- व्यापार पर से धार्मिक प्रतिबन्धों के हट जाने से इनका तेजी से विकास हुआ। 27 मई, 1564 ई० को इनकी मृत्यु हो गयी। वैसे तो आधुनिक युग में भौगोलिक खोजों के कारण वाणिज्य, व्यवसाय और अन्ततः पूँजीवादी व्यवस्था का उदय हो चुका था, परन्तु बौद्धिक पुनर्जागरण एवं धर्म-सुधार आन्दोलन ने समुद्र यात्रा और अन्वेषण की इच्छा को और भी तेज कर दिया।

सदियों से एशिया कई अत्यन्त कीमती वस्तुओं के लिए यूरोप का स्रोत था। इन वस्तुओं में रेशम सिल्क, सूती कपड़े, कालीन, जवाहरात और मसाले जैसे माल सम्मिलित थे। ये वस्तु या तो यूरोप में मिलती नहीं थीं या यूरोपीय वस्तुओं से बेहतर होती थीं। मिर्च, दालचीनी, लौंग, अदरक, जायफल जैसे मसाले बहुत महत्त्वपूर्ण थे, जिनका प्रयोग दवा बनाने, मांस सुरक्षित रखने और सॉस इत्यादि बनाने में होता था।

प्रश्न 3.
15वीं सदी में नए स्थलों की खोज के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों का वर्णन कीजिए। [2013]
       या
15वीं शताब्दी में नवीन व्यापारिक मार्गों की खोज क्यों हुई ?
       या
15वीं तथा 16वीं शताब्दी में नए प्रदेशों की खोजों के लिए उत्तरदायी कारणों को बताइए।
       या
15वीं तथा 16वीं शताब्दी में नए समुद्री माग की खोज के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर
नए स्थानों की खोज-यात्राएँ
मानव जिज्ञासु प्राणी है। जिज्ञासा की भावना ने ही उसे नये देशों व स्थानों की खोज हेतु प्रेरणा दी। 15वीं सदी के अन्तिम वर्षों और 16वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में यूरोप के साहसी नाविकों ने जोखिम उठाते हुए लम्बी-लम्बी यात्राएँ करके नवीन देशों की खोज करने में सफलता अर्जित की। इसीलिए पुनर्जागरण काल को ‘खोजों का काल भी कहा जाता है। भौगोलिक खोजों के लिए सर्वप्रथम पुर्तगाली और स्पेनिश नाविक आगे आये। बाद में इंग्लैण्ड, फ्रांस, हॉलैण्ड और जर्मनी के नाविक भी खोज-अभियान में जुट गये। इस काल में खोजी यात्राओं के लिए कतिपय अनुकूल परिस्थितियाँ थीं, जिनके कारण सुगमता से खोजी अभियान प्रारम्भ हुआ।

1. तुर्को द्वारा कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार – 1453 ई० में तुर्को द्वारा कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार कर लिये जाने के फलस्वरूप पश्चिम और पूर्व के बीच व्यापारिक मार्ग यूरोपियनों के लिए बन्द हो गये। पुर्तगाल और स्पेन को भारत और इण्डोनेशिया के साथ व्यापार से पर्याप्त लाभ होता था और पुर्तगाली तथा स्पेन के लोग इस लाभ को छोड़ने के लिए तैयार न थे, अत: पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध बनाये रखने के लिए उन्होंने नये जलमार्गों का पता लगाया।

2. वैज्ञानिक आविष्कार – आधुनिक युग में दिशासूचक यन्त्र (कुतुबनुमा) का आविष्कार हुआ और इस यन्त्र के आविष्कार ने समुद्री यात्राओं को सुगम और सुरक्षित बना दिया। इस काल में मजबूत जहाजों का भी निर्माण हुआ जो समुद्री यात्रा के समय तूफान, हवा आदि से अपेक्षाकृत सुरक्षित थे।

3. सम्राट् हेनरी का योगदान – पुर्तगाल का शासक हेनरी, नाविक हेनरी (HenrytheNavigator) के नाम से प्रसिद्ध है। वह स्वयं तो एक नाविक नहीं था, किन्तु उसने भौगोलिक अन्वेषणों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये। उसने नाविकों का एक प्रशिक्षण केन्द्र (स्कूल) स्थापित किया और खोजी यात्राओं को प्रोत्साहित किया। पोत निर्माताओं को आवश्यक सुविधाएँ प्रदान कीं और लम्बी दूरी की यात्राओं के लिए उपयुक्त पोत निर्माण करने की सलाह दी। हेनरी द्वारा स्थापित यह केन्द्र नाविकों और वैज्ञानिकों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। इस प्रकार सम्राट् हेनरी ने ऐसी परम्परा विकसित की, जिसके फलस्वरूप खोजी यात्री न केवल उत्साहित हुए, वरन् उन्हें आवश्यक सुविधाएँ भी प्राप्त हुईं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नवीन व्यापारिक मार्गों की तलाश में किन नये देशों की खोज हुई ? इसका व्यापार पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर
नवीन व्यापारिक मार्गों की तलाश में अग्रलिखित नये देशों की खोज हुई –

1. उत्तमाशा अन्तरीप की खोज – सन् 1486 ई० में बालोमियो डियाज अफ्रीका के दक्षिणी तट पर पहुँचा, जिसे उसने ‘तूफानों का अन्तरीप’ नाम दिया। बाद में पुर्तगाल के शासक ने इसका नाम ‘उत्तमाशा अन्तरीप’ (Cape of Good Hope) रख दिया।

2. अमेरिका तथा पश्चिमी द्वीपसमूह की खोज – स्पेन का नाविक कोलम्बस, 1492 ई० में तीन समुद्री जहाजों को लेकर एक नयी भूमि पर पहुँचा। पहले वह समझा कि यह भारत भूमि ही है, परन्तु वास्तव में यह ‘नयी दुनिया’ थी। बाद में इटली का एक नाविक अमेरिगो भी यहीं पर पहुँचा। उसी के नाम पर इसका नाम ‘अमेरिका’ पड़ा।

3. न्यूफाउण्डलैण्ड तथा लेब्रेडोर की खोज – सन् 1497 ई० में जॉन कैबेट इंग्लैण्ड के राजा हेनरी सप्तम की सहायता के लिए पश्चिमी समुद्र की ओर निकला। वह उत्तरी अटलाण्टिक महासागर को पार कर कनाडा के समुद्र तट पर पहुँच गया और उसने ‘न्यूफाउण्डलैण्ड’ की खोज की।

4. भारत के समुद्री मार्ग की खोज – यूरोप और भारत के मध्य समुद्री मार्ग की खोज पुर्तगाली नाविक वास्को-डि-गामा ने की थी।

5. ब्राजील की खोज – सन् 1501 ई० में पुर्तगाली नाविक कैब्रेल ने एक नये देश ‘ब्राजील की खोज की।

6. मैक्सिको तथा पेरू की खोज – सन् 1519 ई० में स्पेनिश नाविक कोटिस ने ‘मेक्सिको की तथा सन् 1531 ई० में पिज़ारो ने ‘पेरू’ की खोज की।

7. अफ्रीका महाद्वीप की खोज – इस महाद्वीप की खोज का श्रेय मार्टन स्टैनली तथा डेविड . लिविंग्स्टन को प्राप्त है।

8. पृथ्वी की प्रथम परिक्रमा – पुर्तगाली नाविक मैगलेन तथा उसके साथियों ने सन् 1519 ई० में समुद्र द्वारा पृथ्वी की प्रथम परिक्रमा करके यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी गोल है तथा उसकी परिक्रमा सुगमता से की जा सकती है।
नवीन व्यापारिक मार्गों की खोज से व्यापार पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े

  1. भौगोलिक खोजों के परिणामस्वरूप भारत जाने का छोटा और नया मार्ग खुल गया।
  2. नये व्यापारिक मार्गों की खोज के कारण विश्व के व्यापार में तेजी के साथ वृद्धि होने लगी।
  3. यूरोप में बड़े-बड़े व्यापारिक केन्द्रों का विकास होने लगा और इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन तथा पुर्तगाल देश धनी और शक्तिशाली होने लगे।
  4. यूरोपीय देशों में अपने उपनिवेश बनाने और अपना साम्राज्य बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हो गयी।
  5. यूरोप के शरणार्थी अमेरिका में आकर बसने लगे और वहाँ पर अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास करने लगे।

प्रश्न 2.
ज्विग्ली पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर
हुल्द्रिख ज्विंग्ली का जन्म सन् 1484 में स्विट्जरलैण्ड के एक कृषक परिवार में हुआ था। इन्होंने “आर्किटेलीस’ (1522), “सत्य तथा मिथ्या पर भाष्य’ (1525) नामक पुस्तकें लिखी थीं। 11 अक्टूबर, 1531 ई० को कैपेल नामक स्थान पर इनकी मृत्यु हो गयी।

कैथोलिक चर्च का विरोध करने वाला मार्टिन लूथर अकेला नहीं था। स्विट्जरलैण्ड में ज्विग्ली भी नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन कर रहा था। ज्विंग्ली 1506 ई० में ग्लेरस में स्थानीय पुरोहित के पद पर आसीन हुआ। जहाँ उसने ग्रीक, हिब् ग्रीक तथा चर्च प्रवर्तकों का अध्ययन प्रारम्भ किया। 1519 ई० में वह ज्यूरिख के गिरजाघर का उद्देशक चुना गया और उसने अपने उन प्रवचनों को प्रारम्भ किया जो धर्म-सुधार आन्दोलन के जन्मदाता सिद्ध हुए।

प्रश्न 3.
वास्कोडिगामा किस प्रकार भारत पहुँचा ?
उत्तर
सन् 1498 ई० में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा अपने राजा से आर्थिक सहायता पाकर अपने जहाजी बेड़े के साथ अफ्रीका के पश्चिमी तट से होता हुआ उत्तमाशा अन्तरीप पहुँचा। वहाँ से उसने हिन्द महासागर में प्रवेश किया; फिर उत्तर की ओर से वह जंजीबार होता हुआ पूर्व की ओर बढ़ा। वहाँ से वह भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट राज्य में पहुँचा।

प्रश्न 4.
धर्म-सुधार आन्दोलन के प्रमुख परिणाम की विवेचना कीजिए। (2015)
उत्तर

धर्म-सुधार आन्दोलन के प्रमुख परिणाम

धर्म-सुधार आन्दोलन को यूरोप पर व्यापक प्रभाव पड़ा, यथा –

  1. कैथोलिक धर्म में सुधार।
  2. प्रोटेस्टेण्ट धर्म का उदय (जन्म)।
  3. इंग्लैण्ड का विकास।
  4. शासक वर्ग की शक्ति में वृद्धि।
  5. पोप की शक्ति का पतन।
  6. राजकीय सम्पत्ति एवं शक्ति में वृद्धि।
  7. गिरजाघरों में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का प्रयास।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन कब शुरू हुआ ?
उत्तर
यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन की शुरुआत सोलहवीं शताब्दी में की गयी।

प्रश्न 2.
यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन किसके विरुद्ध हुए ? (2017)
उत्तर
यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन चर्च के विरुद्ध हुए।

प्रश्न 3.
मुद्रण कला के विकास से धर्म-सुधार आन्दोलन पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर
मुद्रण कला के विकास से पुस्तकों की संख्या में वृद्धि हुई जिससे सामान्य जनता के लिए शिक्षा के द्वार खुल गये। शिक्षा के प्रसार से लोगों का ज्ञान बढ़ा तथा उनकी तर्कशक्ति का विकास हुआ।

प्रश्न 4.
मार्टिन लूथर कहाँ का निवासी था ?
उत्तर
मार्टिन लूथर जर्मनी का निवासी था।

प्रश्न 5.
लूथर के समर्थक किस नाम से जाने जाते थे ?
उत्तर
लूथर के समर्थक प्रोटेस्टेण्ट के नाम से जाने जाते थे।

प्रश्न 6.
कुस्तुनतुनिया नगर का क्या महत्त्व था ?
उत्तर
मध्यकाल में कुस्तुनतुनिया शिक्षा एवं कला का प्रमुख केन्द्र था।

प्रश्न 7
व्यापारिक मार्गों की खोज में कौन-सा देश अग्रणी था ?
उतर
व्यापारिक मार्गों की खोज में पुर्तगाल देश विश्व का सबसे अग्रणी देश था।

प्रश्न 8
सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार किसने किया ?
उत्तर
सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार जेड जॉनसन ने सन् 1590 ई० में किया।

प्रश्न 9
अमेरिका की खोज किसने एवं कब की ?
उत्तर
अमेरिका की खोज कोलम्बस ने 1492 ई० में की थी।

प्रश्न 10
वास्कोडिगामा कौन था ? उसने किस वर्ष भारत आने के जलमार्ग की खोज की ? (2012, 18)
या
यूरोप से भारत पहुँचने के लिए समुद्री मार्ग की खोज किसने की थी? वह किस देश का निवासी था? (2015, 18)
या
वास्कोडिगामा किस देश का नाविक था? (2011)
उत्तर
वास्कोडिगामा पुर्तगाल का निवासी था। उसने 1498 ई० में भारत आने के जलमार्ग की खोज की थी।

प्रश्न 11
यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन के दो प्रमुख नेताओं के नाम लिखिए। (2015, 16)
उत्तर
मार्टिन लूथर तथा काल्विन।

प्रश्न 12
कोलम्बस किस देश का निवासी था?
उत्तर
कोलम्बस स्पेन (जेनेवा) का निवासी था।

प्रश्न 13
भौगोलिक खोजों के तीन प्रभावों का उल्लेख कीजिए। (2016)
उत्तर

  1. यूरोप में बड़े-बड़े व्यापारिक केन्द्रों का विकास होने लगा और इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन तथा पुर्तगाल जैसे देश धनी और शक्तिशाली होने लगे।
  2. यूरोपीय देशों में अपने उपनिवेश बनाने और अपना साम्राज्य बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हो गयी।
  3. यूरोप के शरणार्थी अमेरिका में जाकर बसने लगे और वहाँ पर अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास करने लगे।

बहु विकल्पीय प्रशन

1. यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन का उद्देश्य था

(क) यूरोपीय लोगों को धार्मिक बनाना
(ख) पादरी वर्ग को और अधिक शक्तिशाली बनाना
(ग) तत्कालीन धर्म एवं चर्च में सुधारवादी परिवर्तन करना
(घ) रोमन कैथोलिक चर्च को प्रतिष्ठित करना

2. मार्टिन लूथर द्वारा चलाये गये आन्दोलन का क्या नाम था ? [2012, 13, 17]

(क) कैथोलिक
(ख) प्यूरीटन
(ग) डेसबेटेरियन्स
(घ) प्रोटेस्टेण्ट

3. मार्टिन लूथर ने धर्म-सुधार आन्दोलन किस देश से प्रारम्भ किया था ? (2012]

(क) इटली
(ख) जर्मनी
(ग) फ्रांस
(घ) हॉलैण्ड

4. समुद्री मार्ग से सर्वप्रथम भारत पहुँचने वाला विदेशी व्यक्ति कौन था ? [2011, 13, 17]

(क) मैगलेन
(ख) वास्कोडिगामा
(ग) कोलम्बस
(घ) सर फ्रांसिसस ड्रेम

5. भारत आने के लिए जलमार्ग की खोज की

(क) कोलम्बस ने
(ख) अल्बुकर्क ने
(ग) डी० अल्मोडा ने
(घ) वास्कोडिगामा ने

6. वास्कोडिगामा कालीकट बन्दरगाह पर पहुँचा

(क) सन् 1488 ई० में
(ख) सन् 1494 ई० में
(ग) सन् 1498 ई० में
(घ) सन् 1598 ई० में

7. ‘सेन्ट पॉल’ गिरजाघर स्थित है [2012]

(क) रोम में
(ख) स्पेन में
(ग) जर्मनी में
(घ) लन्दन में

8. प्रोटेस्टेण्ट आन्दोलन का नेतृत्व किसने किया? [2013]
       या
प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय की स्थापना किसने की? [2013]

(क) दान्ते ने
(ख) सर टॉमस मूर ने
(ग) मार्टिन लूथर ने
(घ) जूलियस द्वितीय ने

9. फ्रांसिस ड्रेक की प्रसिद्धि का कारण था, उसके द्वारा (2013)

(क) उत्तमाशा की खोज
(ख) कुतुबनुमा का आविष्कार
(ग) फिलीपीन्स में उपनिवेश की स्थापना
(घ) समुद्री मार्ग से विश्व की परिक्रमा

10. निम्न में से किसने रोमन कैथोलिक धर्म की तीव्र आलोचना की? [2014]

(क) मार्टिन लूथर
(ख) इग्नेशियस लायोला
(ग) दान्ते
(घ) इरास्मस रास्मस

11. महान धर्म सुधारक मार्टिन लूथर किस देश का निवासी था? [2014]

(क) जर्मनी
(ख) इंग्लैण्ड
(ग) फ्रांस
(घ) स्पेन

12. बार्थोलोमियो डियाज ने निम्न में से किसकी खोज की थी? [2014]

(क) उत्तमाशा अन्तरीप की
(ख) ब्राजील की
(ग) पेरू की।
(घ) फिलीपीन द्वीप समूह की

13. जर्मनी में धर्म-सुधार आन्दोलन के प्रणेता थे – [2015]

(क) ज्विगली
(ख) काल्विन
(ग) राजा फिलिप
(घ) मार्टिन लूथर

14. प्रोटेस्टेण्ट धर्म सुधारक काल्विन किस देश का नागरिक था? [2016]

(क) स्कॉटलैण्ड
(ख) स्विट्जरलैण्ड
(ग) फ्रांस
(घ) स्पेन

15. कैथोलिक चर्च के विरुद्ध आवाज उठाने वाला धर्म-सुधारक ज्विग्ली किस देश का निवासी था? (2017)

(क) जर्मनी
(ख) स्विट्जरलैण्ड
(ग) फ्रांस
(घ) स्पेन

16. नई दुनिया की खोज की (2017)

(क) वास्को-डि-गामा ने
(ख) मैगलेन ने
(ग) केल्विन ने
(घ) कोलम्बस ने

उत्तरमाला

UP Board Solutions for Class 10 Social Science Chapter 2 धर्म-सुधार आन्दोलन–खोजें एवं आविष्कार 1

Chapter 2 धर्म-सुधार आन्दोलन–खोजें एवं आविष्कार (अनुभाग – एक).