Chapter 2 प्रबन्ध के सिद्धान्त

RBSE Class 12 Business Studies प्रबन्ध के सिद्धान्त Textbook Questions and Answers

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
प्रबंध के सिद्धांतों को क्यों लचीला माना जाता है?
उत्तर:
प्रबंध के सिद्धांतों को इसलिए लचीला माना जाता है क्योंकि यह कठोर नहीं होते हैं। इनका संबंध मानवीय व्यवहार से है जिनको परिस्थिति की माँग के अनुसार उपयोग में लाया जाता है। यह सिद्धांत अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अलगअलग होते हैं।

प्रश्न 2. 
समय अध्ययन के मुख्य उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
समय अध्ययन का मुख्य उद्देश्य विशेष कार्य को पूरा करने के लिए मानक समय का निर्धारण करना है, कर्मियों की संख्या का निर्धारण, उपयुक्त प्रेरक योजनाओं को तैयार करना एवं श्रम लागत का निर्धारण करना है।

प्रश्न 3. 
उस सिद्धांत का नाम दें जो ‘सहयोग, न कि व्यक्तिवाद’ का विस्तार है।
उत्तर:
‘सहयोग, न कि व्यक्तिवाद’, ‘सहयोग, न कि टकराव’ के सिद्धांत का विस्तार है। प्रबंधकों और श्रमिकों के बीच सहयोग होना चाहिए।

प्रश्न 4. 
थकान के कोई दो कारण बताइए जो कर्मचारी के प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।
उत्तर:

  • लंबे कार्य के घंटे, 
  • अपने अधिकारी से संबंधों में माधुर्य की कमी।

प्रश्न 5. 
एक कठोर भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से जाने के बाद सनकलाल और गगन ने वेल्स लिमिटेड में अपना कॅरियर शुरू किया। चूंकि उनके पास कोई पूर्व-कार्य अनुभव नहीं था, इसलिए फर्म ने स्वयं को साबित करने के लिए उन्हें एक वर्ष देने का फैसला किया। वेल्स लिमिटेड के इस प्रबंधन सिद्धांत का नाम बताएँ।
उत्तर:
वेल्स लिमिटेड के इस प्रबंधन का सिद्धांत ‘कर्मचारियों की उपयुक्तता’ है। कर्मचारियों का चयन उचित एवं कठोर प्रक्रिया द्वारा किया जाना चाहिए। उन्हें परिणाम दिखाने के लिए उचित समय दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 6. 
कुशल और अक्षम श्रमिकों को अलग करने के लिए टेलर द्वारा किस तकनीक का उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
कुशल और अक्षम श्रमिकों को अलग करने के लिए टेलर द्वारा विभेदात्मक पारिश्रमिक प्रणाली उपयोग की जाती है। 

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
‘आदेश की एकता’ का सिद्धान्त किस प्रकार प्रबंधन के लिए उपयोगी है ? संक्षेप में बताएँ।
उत्तर:
‘आदेश की एकता’ का सिद्धान्त यह बतलाता है कि किसी भी औपचारिक संगठन में कार्यरत व्यक्ति को एक ही अधिकारी से आदेश लेने चाहिए एवं उसे उसी के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। क्योंकि यदि इस सिद्धान्त का उल्लंघन होता है तो इससे अधिकार प्रभावहीन हो जाते हैं। यदि एक से अधिक उच्चाधिकारियों से एक ही समय पर आदेश मिलेंगे तो कर्मचारी भ्रम में पड़ जायेंगे और यह निश्चित नहीं कर पायेंगे कि पहले किसका कार्य करें? साथ ही उसे अपने उत्तरदायित्व से बचने के भी अवसर मिल जायेंगे। अतः भ्रम से बचने के लिए एक समय में एक ही अधिकारी से आदेश प्राप्त होने चाहिए। इस प्रकार यह सिद्धान्त प्रबन्ध में विरोधाभासी आदेशों को दूर करने में सहायता करता है।

प्रश्न 2. 
वैज्ञानिक प्रबन्धन को परिभाषित करें। किन्हीं तीन सिद्धान्तों के बारे में बताएँ।
उत्तर:
वैज्ञानिक प्रबन्ध की परिभाषा-एफ.डब्ल्यू. टेलर के अनुसार, “वैज्ञानिक प्रबन्ध यह जानने की कला है कि आप श्रमिकों से क्या कराना चाहते हैं और फिर यह देखना कि वे उसको सर्वोत्तम ढंग से एवं कम-से-कम लागत पर करें।”

वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त 
1. विज्ञान पद्धति, न कि अंगूठा टेक नियम-इस सिद्धान्त के अनुसार प्रबन्ध के क्षेत्र में वैज्ञानिक पद्धति को लागू किया जाना चाहिए जो अध्ययन एवं विश्लेषण के द्वारा विकसित की गई हो। प्रबन्ध को केवल अनुमानों, तीर एवं तुक्का आदि को ही नहीं अपनाना चाहिए।

2. सहयोग, न कि टकराव-टेलर ने इस बात पर जोर दिया कि सामूहिक क्रियाओं में टकराव व मतभेद के स्थान पर आपस में सहयोग स्थापित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।

3. सहयोग, न कि व्यक्तिवाद-यह सिद्धान्त यह बतलाता है कि व्यक्तिवाद के स्थान पर श्रम एवं प्रबन्ध में पूर्ण रूप से सहयोग होना चाहिए। दोनों को समझना चाहिए कि दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता है।

प्रश्न 3. 
यदि कोई संगठन भौतिक एवं मानव संसाधनों के लिए उचित स्थान प्रदान नहीं करता है, तो यह कौनसे सिद्धांत का उल्लंघन है? इसके परिणाम क्या हैं?
उत्तर:
यदि कोई संगठन भौतिक एवं मानव संसाधनों के लिए उचित स्थान प्रदान नहीं करता है तो ऐसी स्थिति में हेनरी फेयोल द्वारा प्रतिपादित ‘व्यवस्था’ नामक सिद्धान्त का उल्लंघन हुआ है। क्योंकि यह सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि अधिकतम कार्यकुशलता के लिए लोग एवं सामान उचित समय पर उचित स्थान पर होने चाहिए। इस प्रकार यह सिद्धान्त वास्तव में किसी संगठन में व्यक्तियों की और वस्तुओं की व्यवस्था का सिद्धान्त है। यदि प्रत्येक चीज अपने निश्चित स्थान पर है तथा प्रत्येक व्यक्ति उचित स्थान पर है तो संगठन में लगे हुए भौतिक एवं मानव संसाधनों का कुशलतापूर्वक एवं अधिक उपयोग हो सकेगा।

प्रश्न 4. 
प्रबन्ध के सिद्धान्तों के महत्त्व के संबंध में किन्हीं चार बिन्दुओं की व्याख्या करें।
उत्तर:
प्रबन्ध के सिद्धान्त का महत्त्व
1. प्रबन्धकों को वास्तविकता का उपयोगी सूक्ष्म ज्ञान प्रदान करना-प्रबन्ध के सिद्धान्त प्रबन्धकों को वास्तविकता का उपयोगी सूक्ष्म ज्ञान प्रदान करते हैं। इससे उनकी प्रबन्धकीय स्थिति एवं परिस्थितियों के सम्बन्ध में ज्ञान, योग्यता एवं समझ में वृद्धि होगी। वस्तुतः प्रबन्ध के सिद्धान्त उनकी प्रबन्ध क्षमता में वृद्धि करते हैं।

2. संसाधनों का अधिकतम उपयोग एवं प्रभावी प्रशासन-प्रबन्ध के सिद्धान्तों की सहायता से प्रबन्धक अपने निर्णयों एवं कार्यों में कारण :एवं परिणाम के सम्बन्ध का पूर्वानुमान लगा सकते हैं। इससे गलतियों से शिक्षा ग्रहण करने की नीति में होने वाली क्षति से बचा जा सकता है। प्रबन्ध के सिद्धान्त, प्रबन्ध में स्वेच्छाचार की सीमा निर्धारित करते हैं। इससे संसाधनों का अधिकतम उपयोग एवं प्रभावी प्रशासन सम्भव होता है।

3. वैज्ञानिक निर्णय-प्रबन्ध के सिद्धान्त विचारपूर्ण एवं वैज्ञानिक निर्णय लेने में सहायता करते हैं। ये तर्क पर जोर देते हैं, न कि आँख मूंद कर विश्वास करने पर। 

4. प्रबन्ध प्रशिक्षण, शिक्षा एवं अनुसन्धानप्रबन्ध के सिद्धान्त प्रबन्ध विषय के ज्ञान के मूलाधार हैं। इनका उपयोग प्रबन्ध के प्रशिक्षण, शिक्षा एवं अनुसन्धान के आधार के रूप में किया जाता है।

प्रश्न 5. 
‘सोपान श्रृंखला’ और ‘समतल सम्पर्क’ के सिद्धान्त की व्याख्या करें।
उत्तर:
‘सोपान श्रृंखला’ एवं ‘समतल सम्पर्क सिद्धान्त’-किसी भी संगठन में उच्चतम पद से निम्नतम पद तक की औपचारिक अधिकार रेखा को ‘सोपान श्रृंखला’ कहते हैं। फेयोल के मतानुसार संगठन में सोपान श्रृंखला के सिद्धान्त का पालन किया जाना चाहिए। उनके इस सिद्धान्त के अनुसार संगठन में अधिकार एवं सम्पर्क की श्रृंखला होनी चाहिए जो ऊपर से नीचे तक होनी चाहिए तथा उसी के अनुसार प्रबन्धक एवं अधीनस्थ होने चाहिए।

फेयोल का मत था कि औपचारिक सम्प्रेषण में सामान्यतः सोपान श्रृंखला का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। लेकिन यदि कोई आकस्मिक स्थिति है तो समतल सम्पर्क के द्वारा सम्पर्क साधा जा सकता है। यह सम्पर्क स्थापित करने का छोटा मार्ग है। इसका प्रावधान इसलिए किया गया है कि सम्प्रेषण में देरी नहीं हो। व्यवहार में कम्पनी में कोई श्रमिक सीधा मुख्य कार्यकारी से सम्पर्क नहीं कर सकता है, केवल आकस्मिक परिस्थितियों में ही एक श्रमिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी से सम्पर्क कर सकता है।’

प्रश्न 6. 
एक प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट में शीर्ष स्तर पर कार्यरत उत्पादन प्रबंधक श्री राठौर फर्म के लिए कच्चे माल का आदेश देने की जिम्मेदारी रखते हैं। वित्तीय वर्श 2017-18 के लिए आपूर्तिकर्ता पर निर्णय लेने के दौरान, उन्होंने फर्म के सामान्य सप्लायर की बजाय प्रति यूनिट की उच्च कीमत पर अपने चचेरे भाई को ऑर्डर दिया, जो ऑर्डर के लिए दरों को कम करने के इच्छुक थे। यहाँ प्रबंधक के द्वारा किस सिद्धांत का उल्लंघन किया गया?
उत्तर:
श्री राठौर द्वारा उल्लिखित प्रबंधन का सिद्धांत ‘सामूहिक हितों के लिए व्यक्तिगत हितों का समर्पण’ है। इस सिद्धांत के अनुसार, संगठन के हितों को कर्मचारी विशेष के हितों की तुलना में प्राथमिकता देनी चाहिए। एक संगठन के व्यक्तियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अनेक व्यक्तिगत हित किसी भी तरह के संगठनात्मक हितों को प्रभावित नहीं करते हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
टेलर द्वारा दिए गए वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्तों की व्याख्या करें।
उत्तर:
टेलर के वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त
टेलर के द्वारा बतलाये गये वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्त निम्नानुसार हैं-
1. विज्ञान पद्धति, न कि अंगूठा टेक नियमटेलर का यह सिद्धान्त इस बात पर बल देता है कि प्रबन्ध के क्षेत्र में वैज्ञानिक पद्धति को अपनाया जाना चाहिए। प्रबन्ध को लकीर का फकीर बनकर काम की पुरानी पद्धतियों को ही नहीं अपनाते रहना चाहिए वरन् हर समय नये-नये प्रयोगों द्वारा नवीनतम पद्धतियों की खोज करके अपने काम को सरल बनाना चाहिए। टेलर का विश्वास था कि अधिकतम कार्यक्षमता प्राप्त करने की केवल एक ही सर्वोत्तम विधि होती है। इस पद्धति को अध्ययन एवं विश्लेषण द्वारा विकसित किया जा सकता है। इसे ‘अंगूठा टेक नियम’ के स्थान पर लागू किया जाना चाहिए।

2. सहयोग, न कि टकराव-उत्पादन की कारखाना प्रणाली में प्रबन्धक, मालिक एवं श्रमिक के बीच की कड़ी होते हैं। प्रबन्धक एवं श्रमिकों के बीच संघर्ष की सम्भावना बनी रहती है। टेलर ने यह पाया कि इस संघर्ष या टकराव से किसी को लाभ नहीं पहुँचता है। अतः उसने प्रबन्ध एवं श्रमिकों के बीच पूरी तरह से सहयोग पर जोर दिया। दोनों को यह समझना चाहिए कि दोनों का ही महत्त्व है। इस स्थिति को पाने के लिए टेलर ने प्रबन्धक एवं श्रमिक दोनों में सम्पूर्ण मानसिक क्रान्ति का आह्वान किया। इसका अर्थ था कि प्रबन्धक एवं श्रमिक दोनों की सोच में बदलाव आना चाहिए। टेलर के मतानुसार, वैज्ञानिक प्रबन्ध इस दृढ़ विश्वास पर – आधारित है कि दोनों के हित समान हैं, दोनों की समृद्धि के बिना एक-दूसरे की समृद्धि नहीं हो सकती है।

3. सहयोग, न कि व्यक्तिवाद-टेलर ने व्यक्तिवाद के स्थान पर श्रम एवं प्रबन्ध में पूर्ण रूप से सहयोग पर बल दिया। उनके अनुसार श्रम एवं प्रबन्ध में प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग होना चाहिए। दोनों को समझना चाहिए कि दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि प्रबन्ध को श्रमिकों के रचनात्मक सुझावों पर ध्यान देना चाहिए। यदि उनके सुझाव से लागत में पर्याप्त कमी आती है तो उन्हें इसका पुरस्कार मिलना चाहिए। उनकी प्रबन्ध में भागीदारी होनी चाहिए और जब भी कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया जाये तो श्रमिकों को विश्वास में लेना चाहिए। श्रमिकों को भी चाहिए कि वे हड़ताल न करें तथा प्रबन्ध से अनुचित माँग नहीं करें।

4. प्रत्येक व्यक्ति का उसकी अधिकाधिक क्षमता एवं समृद्धि के लिए विकास-वैज्ञानिक प्रबन्ध कर्मचारियों के विकास को मान्यता देता है। टेलर के अनुसार वैज्ञानिक तरीके से कार्य करने के परिणामस्वरूप जो श्रेष्ठतम पद्धति विकसित की जाये उसको सीखने के लिए कर्मचारियों का प्रशिक्षण आवश्यक था। टेलर का विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति का चयन वैज्ञानिक रीति से होना चाहिए तथा जो कार्य उसे सौंपा जाये, वह उसकी शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक योग्यताओं के अनुसार होना चाहिए। कर्मचारियों की कार्यक्षमता में वृद्धि के लिए उनको प्रशिक्षण मिलना चाहिए।

प्रश्न 2. 
फेयोल द्वारा दिए गए प्रबन्ध के निम्नलिखित सिद्धान्तों की उदाहरण सहित व्याख्या करें-
(क) निर्देश की एकता, 
(ख) समता, 
(ग) सहयोग की भावना, 
(घ) व्यवस्था, 
(ङ) केन्द्रीकरण एवं विकेन्द्रीकरण, 
(च) पहल-क्षमता। 
उत्तर:
फेयोल के प्रबन्ध के सिद्धान्त
(क) निर्देश की एकता-यह सिद्धान्त यह बतलाता है कि एक योजना के लिए एक प्रबन्धक होना चाहिए। एकसे कार्यों को एक योजना के अन्तर्गत लाया जाना चाहिए। एक ही कार्य को विभिन्न व्यक्तियों से सम्बन्धित करने से कर्मचारियों की क्रियाओं में समन्वय स्थापित नहीं किया जा सकता और उनमें भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार गतिविधियों के प्रत्येक समूह जिनके उद्देश्य समान हैं उनका ‘एक ही अध्यक्ष एवं एक ही योजना’ होनी चाहिए। उदाहरण के लिए एक कम्पनी कार एवं स्कूटर का निर्माण कर रही है। इसके लिए उसे दो अलगअलग विभाग बनाने चाहिए। प्रत्येक विभाग की अपनी प्रभारी योजना एवं संसाधन होने चाहिए।

(ख) समता का सिद्धान्त-फेयोल के द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त के अनुसार जहाँ तक सम्भव हो कर्मचारियों के साथ समानता का एवं निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। प्रबन्धकों के श्रमिकों के प्रति व्यवहार में यह सिद्धान्त दयाभाव एवं न्याय पर जोर देता है । फेयोल ने यदा-कदा बल प्रयोग को अनियमित नहीं माना, उनका कहना था सुस्त व्यक्तियों के साथ सख्ती से व्यवहार करना चाहिए जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति के पास यह सन्देश पहुँचे कि प्रबन्ध की दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति बराबर है। किसी भी व्यक्ति के साथ लिंग, भाषा, धर्म, जाति, विश्वास अथवा राष्ट्रीयता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। आज व्यवहार में यह देखने को मिलता है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में विभिन्न राष्ट्रीयता के लोग भेदभाव रहित वातावरण में साथ-साथ कार्य करते हैं। इन कम्पनियों में प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति के समान अवसर प्राप्त होते हैं।

(ग) सहयोग की भावना-फेयोल के इस सिद्धान्त के अनुसार प्रबन्ध को कर्मचारियों में एकता एवं पारस्परिक सहयोग की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। प्रबन्ध को विशेष रूप से बड़े संगठनों में सामूहिक कार्य करने को बढ़ावा देना चाहिए क्योंकि सहयोग के अभाव में उद्देश्यों को प्राप्त करना कठिन हो जायेगा। सहयोग की भावना के पोषण के लिए प्रबन्धक को कर्मचारियों से पूरी बातचीत में ‘मैं’ के स्थान पर ‘हम’ का प्रयोग करना चाहिए। इससे समूह के सदस्यों में पारस्परिक विश्वास एवं अपनेपन की भावना का विकास होगा।

(घ) व्यवस्था-फेयोल द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था का सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकतम कार्यकुशलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति एवं सामान उचित समय पर एवं उचित स्थान पर होने चाहिए। इस प्रकार यह सिद्धान्त यह कहता है कि “प्रत्येक चीज (प्रत्येक व्यक्ति) के लिए एक स्थान तथा प्रत्येक चीज अपने स्थान पर होनी चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति एवं चीज के लिए जो स्थान निश्चित है वह उसी स्थान पर है तो व्यवसाय में कोई व्यवधान पैदा नहीं होगा।”

(ङ) केन्द्रीकरण एवं विकेन्द्रीकरण-निर्णय लेने का अधिकार यदि केन्द्रित है तो इसे केन्द्रीकरण कहेंगे जबकि अधिकार यदि एक से अधिक व्यक्तियों को सौंप दिये जाते हैं तो इसे ‘विकेन्द्रीकरण’ कहेंगे। फेयोल के मतानुसार, अधीनस्थों का विकेन्द्रीकरण के माध्यम से अन्तिम अधिकारों को अपने पास रखने में सन्तुलन बनाये रखने की आवश्यकता है। केन्द्रीकरण किस सीमा तक रहेगा यह कम्पनी के कार्यों की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। सामान्यतया बड़े संगठनों में विकेन्द्रीकरण अधिक होता है। उदाहरण के लिए, भारत में गाँवों में पंचायतों को गाँवों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा अधिकार प्रदान किये गये हैं। यह विकेन्द्रीकरण का उत्तम उदाहरण रहा है।

(च) पहल-क्षमता-फेयोल की मान्यता है कि कर्मचारियों के सुधार के लिए अपनी योजनाओं के विकास एवं उनको लागू करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। यहाँ पहल-क्षमता का आशय है-स्वयं अभिप्रेरण की दिशा में पहला कदम उठाना। प्रबन्ध को पहल-क्षमता को प्रोत्साहित करना चाहिए। पहल-क्षमता का यह तात्पर्य नहीं है कि अपने आपको सबसे अलग दिखाने के लिए कम्पनी की स्थापित रीति-नीति के विरुद्ध कार्य किया जाये। एक अच्छी कम्पनी वह मानी जाती है जिसमें कर्मचारियों को सुझाव देने के लिए प्रेरित किया जाये तथा उन सुझावों को पुरस्कृत किया जाये जिनके कारण लागत एवं समय की बचत हो सके।

प्रश्न 3. 
टेलर द्वारा अनुमोदित ‘कार्यात्मक फोरमैनशिप’ की तकनीक और ‘मानसिक क्रान्ति’ की अवधारणा की व्याख्या करें।
उत्तर:
कार्यात्मक फोरमैनशिप की तकनीक फ्रेडरिक डब्ल्यू. टेलर कार्यात्मक फोरमैनशिप तकनीक के जन्मदाता माने जाते हैं। यह तकनीक पूर्ण रूप से विशिष्टीकरण के सिद्धान्त पर आधारित है। कारखाना प्रणाली में कार्यात्मक फोरमैनशिप वह पद्धति है जिसके प्रत्यक्ष सम्पर्क में श्रमिक प्रतिदिन आते हैं। फोरमैन ही निम्नतम स्तर पर प्रबन्धक और उच्च श्रेणी का श्रमिक होता है। यह, वह केन्द्र-बिन्दु होता है जिसके चारों तरफ पूरा उत्पादन, नियोजन, क्रियान्वयन एवं नियन्त्रण घूमता है। टेलर ने फोरमैन की भूमिका के निष्पादन के सुधार पर जोर दिया। उन्होंने एक अच्छे फोरमैन की योग्यताओं की सूची तैयार की लेकिन यह अनुभव किया कि कोई भी व्यक्ति उन्हें पूरा नहीं कर सकता है। इसलिए उन्होंने आठ व्यक्तियों के माध्यम से क्रियात्मक फोरमैनशिप का सुझाव दिया। टेलर ने नियोजन एवं उसके क्रियान्वयन को अलग-अलग रखने की सिफारिश की। कारखाना प्रबन्धक के अधीन योजना अधिकारी एवं उत्पादन अधिकारी रखे। उन्होंने नियोजन अधिकारी के अधीन चार कर्मचारी रखने का सुझाव दिया-निर्देशन कार्ड क्लर्क, कार्यक्रम लिपिक, समय एवं लागत क्लर्क एवं कार्यशाला अनुशासक। ये चार विशेषज्ञ क्रमशः कर्मचारी, कर्मचारियों के लिए निर्देश तैयार करेंगे, उत्पादन का कार्यक्रम तैयार करेंगे, समय एवं लागत सूची तैयार करेंगे एवं अनुशासन सुनिश्चित करेंगे।

उत्पादन अधिकारी के अधीन गतिनायक, टोली नायक, मरम्मत नायक एवं निरीक्षक नायक विशेषज्ञ रखने का सुझाव दिया। ये क्रमशः कार्य समय ठीक से तैयार करने, श्रमिकों द्वारा मशीन उपकरणों को कार्य के योग्य रखने एवं कार्य की गुणवत्ता की जाँच करने के लिए उत्तरदायी होते हैं। 

यथार्थ में, क्रियात्मक फोरमैनशिप श्रम-विभाजन एवं विशिष्टीकरण के सिद्धान्त का निम्नतम स्तर तक विस्तार है। टेलर का सुझाव था कि प्रत्येक श्रमिक को उत्पादन कार्य अथवा सम्बन्धित प्रक्रिया के इन आठ फोरमैनों अर्थात् विशेषज्ञों से आदेश लेने चाहिए। इसमें प्रत्येक विशेषज्ञ को उसकी अपनी योग्यतानुसार कार्य सौंपा जाता है। 

मानसिक क्रान्ति-मानसिक क्रान्ति का अर्थ प्रबन्धक वर्ग एवं श्रमिक वर्ग की मानसिक स्थिति में बदलाव लाने से है। ऐसा किये जाने से श्रमिक संगठन भी हड़ताल करने की नहीं सोचेंगे और प्रबन्धक भी श्रमिकों के हितों के बारे में सोचेंगे। प्रबन्धक एवं श्रमिक दोनों की सोच में बदलाव आने अर्थात् मानसिक क्रान्ति आने से उनमें सहयोग की भावना प्रबल होती है जो एक-दूसरे के लिए हितकारी है। सामान्यतया यह देखा जाता है कि प्रबन्धकों एवं श्रमिकों के हितों में टकराव की वजह से झगडे की स्थिति उत्पन्न होती है और लाभ का बँटवारा होता है। प्रबन्धक चाहते हैं कि अधिक लाभ उन्हें प्राप्त हो और श्रमिक चाहते हैं कि उन्हें अधिक लाभ मिलना चाहिए। यहीं से मानसिक क्रान्ति का जन्म होता है। टेलर का कहना है कि दोनों को लाभ के बँटवारे की बजाय लाभों में बढ़ोतरी की बात सोचनी चाहिए। यदि ऐसा सम्भव हो जाये तो उत्पादन में वृद्धि होगी, लाभों में वृद्धि होगी और संगठन का विकास एवं विस्तार होगा। जापानियों की कार्य-संस्कृति इस स्थिति का उत्कृष्ट उदाहरण है। वहाँ प्रबन्धकों एवं श्रमिकों के बीच कुछ भी नहीं छिपा होता है। दोनों एक-दूसरे के हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करते हैं।

प्रश्न 4. 
वैज्ञानिक कार्य अध्ययन की निम्नलिखित की चर्चा करें-
(क) समय अध्ययन 
(ख) गति अध्ययन
(ग) थकान अध्ययन 
(घ) कार्य-विधि अध्ययन 
(ङ) सरलीकरण और कार्य का मानकीकरण। 
उत्तर:
वैज्ञानिक कार्य-अध्ययन की तकनीकें
(क) समय अध्ययन-समय अध्ययन भलीभाँति परिभाषित कार्य को पूरा करने के लिए मानक समय का निर्धारण करता है। इसमें कार्य के प्रत्येक घटक के लिए समय मापन विधियों का प्रयोग किया जाता है। समय अध्ययन का उद्देश्य कर्मियों की संख्या का निर्धारण, उपयुक्त प्रत्येक योजनाओं को तैयार करना एवं श्रम लागत का निर्धारण करना है। उदाहरणार्थ, बारबार अवलोकन से यह तय किया गया कि एक उत्पाद तैयार करने के लिए एक कर्मचारी का मानक समय 20 मिनट है। इस प्रकार से एक घण्टे में वह तीन उत्पाद तैयार करता है। यदि एक श्रमिक एक पारी में 8 घण्टे कार्य करता है जिसमें से एक घण्टा विश्राम का निकाल दिया जाये तो सात घण्टे में श्रमिक कुल 21 उत्पाद तैयार करेगा। अब यह एक श्रमिक का मानक कार्य हुआ।

(ख) गति अध्ययन-गति अध्ययन में व्यक्तियों एवं मशीनों द्वारा काम के दौरान की जाने वाली विभिन्न मुद्राओं की गति जैसे उठाना, रखना, पकड़ना, दबाना, घुमाना, जोड़ना आदि का गहन अध्ययन करके अनावश्यक हरकतों से समाप्त किया जाता है। इतना ही नहीं, इसमें अनावश्यक हरकतों को न्यूनतम करने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार कार्य करने के तरीकों में सुधार करके कार्य-कुशलता में अत्यधिक वृद्धि की जा सकती है। उदाहरण के लिए, टेलर एवं उसके सहयोगी फ्रेंक गिलबर्थ ने ईंटें बनाने की चेष्टाओं को 18 से घटाकर 5 तक कर दिया। टेलर व उसके सहयोगी ने यह दिखला दिया कि इस प्रक्रिया को अपनाने से उत्पादकता में चार गुणा वृद्धि हो गई। टेलर ने अपने गति अध्ययन में विभिन्न मुद्राओं की पहचान करने के लिए स्टॉप वॉच, विभिन्न चिह्नों एवं रंगों का प्रयोग किया।

(ग) थकान अध्ययन-कोई भी व्यक्ति जब कार्य करता है तो कार्य करते-करते वह शारीरिक एवं मानसिक रूप से थकान अनुभव करने लगता है। थकान अध्ययन किसी कार्य को पूरा करने के लिए आराम के अन्तराल की अवधि एवं बारम्बारता का निर्धारण करता है। थकान के कई कारण हो सकते हैं जैसे लम्बे कार्य के घण्टे, अनुपयुक्त एवं अरुचिकर कार्य करना, अपने अधिकारी से सम्बन्धों में माधुर्य की कमी अथवा कार्य की खराब परिस्थितियाँ आदि। थकान अध्ययन के अन्तर्गत थकान करने वाले विभिन्न घटकों का पता लगा कर उनमें सुधार लाने का प्रयत्न किया जाता है। टेलर ने अनेक प्रयोग किये और यह सिद्ध किया कि श्रमिकों को एक निश्चित समय तक काम करने के बाद आराम दिया जाना जरूरी है। आराम के समय में वे पुनः तरोताजा हो जाते हैं और पूरी कुशलता के साथ कार्य करने लग जाते हैं।

(घ) कार्य-विधि अध्ययन-कार्य-विधि अध्ययन का उद्देश्य कार्य को करने की सर्वश्रेष्ठ पद्धति को ढूँढ़ना है। किसी कार्य को करने की अनेक पद्धतियाँ हो सकती हैं। टेलर ने अपने कार्य-विधि अध्ययन के माध्यम से कई क्रियाओं को एक-साथ जोड़ने की अवधारणा का निर्माण किया। कार्य-विधि अध्ययन प्रक्रिया का उद्देश्य उत्पादन लागत को न्यूनतम रखना तथा ग्राहक को अधिकतम गुणवत्ता एवं सन्तुष्टि प्रदान करना है। इसके लिए प्रक्रिया चार्ट एवं परिचालन अनुसन्धान आदि का प्रयोग किया जा सकता है। इस अध्ययन में ही परिचालन क्रियाओं, कर्मचारियों का स्थान, मशीन एवं कच्चा माल आदि का क्रम निर्धारित किया जाता है।

(ङ) सरलीकरण और कार्य का मानकीकरणटेलर ने अपने वैज्ञानिक प्रबन्ध में कार्य के सरलीकरण पर भी जोर दिया था। उनके अनुसार सरलीकरण का अर्थ व्यर्थ किस्मों, आकार एवं आयामों को समाप्त करना होता है, अर्थात् इसमें उत्पादन की अनावश्यक अनेकताओं या बाधाओं को समाप्त किया जाता है। क्योंकि कार्य का सरलीकरण किये जाने से श्रम, मशीन एवं उपकरणों की लागत की बचत होती है। इससे माल को स्टॉक में कम रखने, ‘उपकरणों के अधिकतम व सम्पूर्ण उपयोग एवं आवर्त में वृद्धि सम्भव होती है।

टेलर ने प्रमापीकरण का भी अत्यधिक समर्थन किया था। उसके अनुसार अंगूठा टेक नियम के स्थान पर उत्पादन पद्धतियों के विश्लेषण के लिए वैज्ञानिक पद्धति को अपनाना चाहिए। सर्वश्रेष्ठ प्रणाली को प्रमाप के विकास के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है तथा उसमें और अधिक सुधार किया जा सकता है। प्रमापीकरण प्रक्रिया, कच्चा माल, समय, उत्पाद, मशीनरी, कार्यपद्धति अथवा कार्य की शर्तों का हो सकता है। ऐसे मानक मापदण्ड होते हैं, जिनका उत्पादन के दौरान पालन करना होता है।

प्रश्न 5. 
टेलर और फेयोल के योगदान के बीच विभिन्नताओं पर चर्चा करें।
उत्तर:
टेलर एवं फेयोल के योगदान में अन्तर एफ. डब्ल्यू. टेलर तथा हेनरी फेयोल का प्रबन्ध- जगत् में अविस्मरणीय योगदान है। दोनों का योगदान प्रबन्धकों द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले कार्यों में आधार का कार्य करता है। अधिकांश विचारक इस बात से सहमत हैं कि इन प्रबन्धशास्त्रियों का योगदान एक-दूसरे का पूरक है। फिर भी हम निम्न बिन्दुओं की सहायता से इनके योगदान में अन्तर कर सकते हैं-

1. परिप्रेक्ष्य स्तर-टेलर ने कारखाने में कर्मशाला स्तर पर अर्थात् श्रमिकों के लिए श्रेष्ठतम कार्य-पद्धति की रचना करने, दिन का उचित कार्य करने, विभेदात्मक मजदूरी प्रणाली अपनाने एवं क्रियात्मक फोरमैनशिप के रूप में कार्य करने में क्रान्ति लाने में योगदान दिया, जबकि हेनरी फेयोल ने यह स्पष्ट किया कि उच्च स्तर पर प्रबन्धक का क्या कार्य है एवं इसे पूरा करने के लिए किन-किन सिद्धान्तों का पालन किया जाना चाहिए?

2. आदेश की एकता-टेलर ने संगठन में आदेश की एकता के सिद्धान्त को महत्त्वपूर्ण नहीं माना था क्योंकि उन्होंने क्रियात्मक फोरमैनशिप में एक श्रमिक को आठ विशेषज्ञों से आदेश प्राप्त करने पर जोर दिया था, जबकि फेयोल आदेश की एकता के सिद्धान्त के कट्टर समर्थक थे। उनके अनुसार एक कर्मचारी को एक समय में एक ही अधिकारी से आदेश प्राप्त होने चाहिए।

3. रचना का आधार-टेलर का प्रबन्ध-जगत् में योगदान अवलोकन एवं प्रयोगों पर आधारित था, जबकि फेयोल का योगदान व्यक्तिगत अनुभव एवं परीक्षण पर आधारित था।

4. प्रयोजनीयता-टेलर का वैज्ञानिक प्रबन्ध सिद्धान्त विशिष्ट स्थितियों में उपयुक्त माना गया, जबकि हेनरी फेयोल के प्रबन्ध के सिद्धान्तों की उपयुक्तता सार्वभौमिक मानी गई।

5. केन्द्र ( फोकस)-टेलर का पूरा ध्यान श्रमिकों की उत्पादकता में वृद्धि करने पर था और इसीलिए उन्होंने इसके लिए विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया तथा विभिन्न प्रयोग किये। हेनरी फेयोल का पूरा ध्यान कुल प्रशासन में सुधार लाने पर था और इसीलिए उन्होंने प्रशासन (प्रबन्ध) के चौदह सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया।

6. व्यक्तित्व-टेलर एक मैकेनिकल इंजीनियर थे. जबकि फेयोल एक खनन इंजीनियर एवं प्रबन्ध विषय के सिद्धान्तकार थे।

7. अभिव्यक्ति सिद्धान्त-टेलर ने वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया और इसीलिए उन्हें वैज्ञानिक प्रबन्ध का जनक व पितामह माना जाता है, जबकि फेयोल ने सामान्य प्रबन्ध के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए प्रबन्ध के कार्यों एवं औद्योगिक क्रियाओं को वर्गीकृत किया और इसीलिए उन्हें ‘सामान्य प्रबन्ध का जनक’ कहा जाता है।

प्रश्न 6. 
समकालीन व्यावसायिक पर्यावरण में टेलर और फेयोल के योगदान की प्रासंगिकता पर चर्चा करें।
उत्तर:
समकालीन व्यावसायिक पर्यावरण में एफ.डब्ल्यू. टेलर तथा हेनरी फेयोल का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
टेलर के योगदान की प्रासंगिकता-टेलर द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक प्रबन्ध वर्तमान समय में सार्वभौमिक रूप से उपयोगी नहीं है क्योंकि इसे व्यावहारिक रूप में उपयोग में लाये जाने से कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वैज्ञानिक प्रबन्ध की विधियाँ अधिक खर्चीली भी होती हैं। विभेदात्मक पारिश्रमिक प्रणाली के अपनाने से श्रमिकों में असन्तोष व्याप्त रहता है। यथार्थ में, वैज्ञानिक प्रबन्ध के सिद्धान्तों को कुछ ही संगठनों में लागू कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं किन्तु सभी संगठनों में प्रयोग कर आशातीत परिणाम प्राप्त हों, यह जरूरी नहीं है।

फेयोल के योगदान की प्रासंगिकता-फेयोल द्वारा प्रतिपादित प्रबन्ध के सिद्धान्त प्रबन्ध की समस्याओं पर विस्तृत रूप से लागू होते हैं तथा आज इनका प्रबन्ध की सोच पर गहरा प्रभाव पड़ा है। लेकिन जिसे बदले हुए पर्यावरण में आज व्यवसाय किया जा रहा है, उसमें इन सिद्धान्तों की व्याख्या बदल गई है।

सिद्धान्त का नामतबअब
कार्य विभाजनकर्मचारियों के कार्य रूपांकन में सामान्यीकरण।कर्मचारियों के कार्य रूपांकन में विशिष्टता।
अधिकार एवं उत्तरदायित्वप्रबन्धकों को अधिकार प्राप्त हैं।कर्मचारियों के पास शक्तियाँ हैं।
अनुशासनऔपचारिक नियन्त्रण।अनौपचारिक, समान।
आदेश की एकताअधीनस्थ कर्मचारी केवल एक उच्च अधिकारी को रिपोर्ट करते थे।कई प्रबन्धकों को रिपोर्ट की जाती है।
निर्देश की एकताकार्यों की एक योजना एवं एक प्रबन्धक होता था।कार्यों की कई योजनाएं होती हैं, जिसमें कई प्रबन्धक होते हैं।
व्यक्तिगत हित का सामान्य हित के लिए समर्पणकर्मचारी संगठन के प्रति समर्पित थे।संगठन कर्मचारियों के प्रति तथा कर्मचारी संगठन के प्रति समर्पित हैं।
कर्मचारियों का पारिश्रमिक (प्रतिफल)न्यायोचित पारिश्रमिक (प्रतिफल) भुगतान प्रणाली।निष्पादन आधारित कर्मचारियों का पारिश्रमिक, प्रतिफल प्रणाली।
केन्द्रीकरणनिर्णय ऊपर लिया जाता था जो नीचे स्तर पर जाता था।कार्य का उपयुक्त तथा तदर्थ निर्णय लिया जाता है।
सोपान श्रृंखलासोपानिक, औपचारिक सम्प्रेषण माध्यम।कम औपचारिक।
व्यवस्थानियन्त्रण हेतु आन्तरिक सूचना प्रणाली लागू थी।समन्वय हेतु आन्तरिक सूचना प्रणाली है।
समतादयालुता के द्वारा प्रतिबद्धता प्राप्त करना।स्वामित्व भावना से प्रतिबद्धता प्राप्त करना।
कर्मचारियों के कार्यकालकर्मचारियों को प्रशिक्षण एवं संगठन में टिके रहने के लिए प्रोत्साहित करना।कर्मचारियों का निरन्तर प्रशिक्षण एवं विकास पर जोर।
पहल-क्षमताप्रबन्धक नये-नये विचारों पर गौर कर उनका क्रियान्वयन करते थे।कर्मचारी नये-नये विचार लाते हैं तथा उनका क्रियान्वयन कराते हैं।
सहयोग की भावनाकर्मचारियों में उच्च मनोबल बनाये रखना अनिवार्य था।कर्मचारियों का मनोबल बनाये रखना उतना अनिवार्य नहीं है।

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
भसीन लिमिटेड खाद्य प्रसंस्करण के व्यवसाय में है और अपने उत्पादों को एक लोकप्रिय ब्रांड के तहत बेच रही है। अच्छी गुणवत्ता और उचित मूलयों के कारण हाल ही में इसका कारोबार बढ़ रहा था। इसके अलावा संसाधित खाद्य सामग्री के लिए बाजार में काम करने वाले अधिक लोग बढ़ रहे थे। नई प्रवृत्ति पर नए व्यापार भी बढ़ रहे थे। अपनी बाजार हिस्सेदारी को बनाए रखने के लिए कंपनी ने अपने मौजूदा कर्मचारियों को ओवरटाइम पर काम करने का निर्देश दिया। लेकिन इसके परिणामस्वरूप कई समस्याएँ उत्पन्न हुईं। काम के बढ़ते दबाव के कारण श्रमिकों की दक्षता में कमी आई। कभी-कभी अधीनस्थों को एक से अधिक वरिष्ठों के लिए काम करना पड़ा जिसके परिणामस्वरूप दक्षता में गिरावट आई। पहले एक उत्पाद पर काम कर रही डिवीजनों को दो या दो से अधिक उत्पादों पर काम करने के लिए कहा गया। इसके परिणामस्वरूप काम का दोहराव और क्षति हुई। मजदूरों में अनुशासनहीनता की भावना बढ़ने लगी। श्रमिकों को धोखा महसूस हो रहा था। उत्पादों की गुणवत्ता में गिरावट शुरू हो रही थी और बाजार हिस्सेदारी घटने के कगार पर थी। वास्तव में कंपनी ने आवश्यक बुनियादी ढाँचे के बिना परिवर्तन लागू किए थे।
(क) प्रबंधन के सिद्धांतों (हेनरी फेयोल द्वारा दिए गए 14 में से) की पहचान करें जिनका कंपनी द्वारा उल्लंघन किया जा रहा था।
(ख) संक्षेप में इन सिद्धांतों की व्याख्या करें।
(ग) कंपनी के पुराने गौरव को पुनः प्राप्त करने के लिए उपरोक्त सिद्धांतों के संबंध में कंपनी प्रबंधन को क्या कदम उठाने चाहिए?
(उपरोक्त प्रश्न 1 से संबद्ध अतिरिक्त जानकारी) भसीन लिमिटेड के प्रबंधन ने अब अपनी कमियों को महसूस किया। स्थिति को सुधारने और पुनर्गठन योजना के लिए उन्होंने प्रबंधन परामर्शदाता ‘मुक्ति कंसल्टेंट्स’ को नियुक्त किया। मुक्ति कंसल्टेंट्स ने भसीन लिमिटेड का अध्ययन किया और निम्नलिखित परिवर्तनों की सिफारिश की-
(i) कंपनी को उत्पादन के संबंध में वैज्ञानिक प्रबंधन शुरू करना चाहिए।
(ii) मार्ग, निर्धारण, प्रेषण और प्रतिक्रियाओं सहित उत्पादन योजना लागू की जाये।
(iii) योजना को संचालन प्रबंधन से अलग करने के लिए ‘कार्यात्मक फोरमैनशिप’ को लाया जाना चाहिए।
(iv) संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करने के लिए ‘कार्य अध्ययन’ किया जाना चाहिए।
(v) दक्षता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए सभी गतिविधियों का ‘मानकीकरण’ लागू किया जाना चाहिए।
(vi) श्रमिकों को प्रेरित करने के लिए ‘विभेदक दर प्रणाली’ लागू की जानी चाहिए।
(उपरोक्त प्रश्न 1 के भाग ‘ग’ के उत्तर के रूप में उपर्युक्त परिवर्तन भी लागू किए जाने चाहिए) यह उम्मीद की गई कि ये परिवर्तन कंपनी के कामकाज में अनुकूल बदलाव ला सकेंगे।
(क) क्या आपको लगता है कि सलाहकारों द्वारा अनुशंसित वैज्ञानिक प्रबंधन की शुरुआत का सकारात्मक परिणाम होगा?
(ख) कंपनी को बदलावों को लागू करने के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
(ग) प्रश्न में बिन्दु (i) से (vi) के अंतर्गत दी गई प्रत्येक तकनीक के संबंध में अपना अलग-अलग उत्तर दें।
उत्तर:
प्रबंध के जिन सिद्धांतों का उल्लंघन ‘भसीन’ लिमिटेड ने किया वे निम्नलिखित हैं-
(1) कार्य विभाजन का सिद्धांत 
(2) अनुशासन का सिद्धांत 
(3) आदेश की एकता का सिद्धांत 
(4) निर्देश की एकता का सिद्धांत 
(5) व्यवस्था का सिद्धांत 
उपर्युक्त सिद्धांतों का संक्षिप्त विवेचन निम्नानुसार है।

(1) कार्य विभाजन का सिद्धान्त-‘भसीन’ कम्पनी में जो लोग एक उत्पाद पर लगे थे, अब उन्हें दो या दो से अधिक उत्पादों पर कार्य करना पड़ रहा है। अर्थात् इसमें कार्य विभाजन के सिद्धान्त का उल्लंघन हुआ है। परिणामस्वरूप कर्मचारियों की कार्यक्षमता एवं गुणवत्ता में कमी आयी है। कार्य-विभाजन का सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि कार्य को छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर कर्मचारियों को सौंपा जाना चाहिए जिससे इनकी कार्यक्षमता बनी रहे। इससे कम्पनी को विशिष्टीकरण का लाभ प्राप्त होगा और कार्य अधिक कुशलता से सम्पन्न किया जा सकेगा। इस सिद्धान्त के नहीं अपनाये जाने से कम्पनी में उत्पादों के उत्पादन में अनावश्यक देरी होगी तथा सामग्री आदि का भी अपव्यय होगा।

(2) अनुशासन का सिद्धान्त-‘भसीन’ लिमिटेड कम्पनी में अनुशासन के सिद्धान्त का भी उल्लंघन हुआ है। दो या दो से अधिक उत्पादों को एक साथ बनाने की जल्दी में कम्पनी में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गईं और कर्मचारियों में अनुशासनहीनता फैल गई। इससे कम्पनी में एकता एवं सहयोग की भावना समाप्त होने लग गई।

फेयोल द्वारा बतलाये गये इस सिद्धान्त के अनुसार कम्पनी में कार्य करने के लिए आवश्यक नियम एवं नौकरी की शर्तों के पालन करने से ही अनुशासन के द्वारा प्रत्येक स्तर पर अच्छे पर्यवेक्षक, स्पष्ट एवं सन्तोषजनक समझौते एवं दण्ड के न्यायोचित विधान सम्भव हैं। अतः कम्पनी को अपनी पुरानी शान को वापस लाने के लिए अनुशासनात्मक वातावरण का निर्माण करना होगा। यह तभी सम्भव हो सकेगा जबकि कम्पनी अनुशासन के सिद्धान्त का कट्टरता से पालन करे।

(3) आदेश की एकता का सिद्धान्त-कम्पनी में अधीनस्थ कर्मचारियों को एक से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों के लिए कार्य करना पड़ता था फलतः अनुशासन में कमी आने के साथ-साथ कार्यकुशलता में कमी आयी। क्योंकि कर्मचारियों को यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी जवाबदेही किसके प्रति है और किस अधिकारी के आदेश का पालन पहले करना है। आदेश की एकता के सिद्धान्त के अनुसार संगठन में प्रत्येक कर्मचारी या अधीनस्थ को केवल एक ही अधिकारी से आदेश प्राप्त होने चाहिए। यदि कम्पनी में इस सिद्धान्त का पालन किया जाये तो अधीनस्थों को आदेश की अवहेलना करने का बहाना नहीं मिलेगा, जवाबदेही भी बनी रहेगी, इससे कम्पनी में कार्यकुशलता भी बनी रहेगी। आदेश की एकता के सिद्धान्त की अवहेलना होते ही भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है और अधिकारियों के आदेश प्रभावहीन हो जाते हैं, अनुशासनहीनता आने लगती है। अत: कम्पनी के प्रबन्ध को आदेश की एकता के सिद्धान्त का सख्ती से पालन करना चाहिए।

(4) निर्देश की एकता का सिद्धान्त-कम्पनी ने अल्प अवधि में बाजार में अपनी हिस्सेदारी को बनाये रखने के लिए अपने वर्तमान कार्यबल को अतिरिक्त समय कार्य करने के आदेश दिये। जो विभाग एक उत्पाद में लगे थे अब उन्हें दो या दो से अधिक उत्पादों में कार्य करना पड़ रहा था, इससे निर्देश की एकता के सिद्धान्त का उल्लंघन होने लगा। फलतः कम्पनी में कार्यरत कर्मचारियों में अनुशासनहीनता आने लगी और उनके प्रयासों में समन्वय का अभाव रहने लंगा। निर्देश की एकता के सिद्धान्त के अनुसार संगठन की सभी इकाइयों या विभागों को समन्वित एवं केन्द्रित प्रयत्नों के माध्यम से समान उद्देश्यों की ओर आगे बढ़ना चाहिए। एक अधिकारी के पास एक ही योजना या काम होना चाहिए। अर्थात् गतिविधियों के प्रत्येक समूह जिसके उद्देश्य समान हैं उनका एक ही अध्यक्ष एवं एक ही योजना होनी चाहिए। इससे ही कम्पनी में विभिन्न गतिविधियों में एकता एवं समन्वय को सुनिश्चित किया जा सकता है और कम्पनी अपनी पुरानी शान को वापस प्राप्त कर सकती है।

(5) व्यवस्था का सिद्धान्त-कम्पनी में व्यवस्था के सिद्धान्त का भी उल्लंघन हुआ जिसके कारण कर्मचारियों की कार्यकुशलता में कमी आयी तथा अतिव्यापन एवं बर्बादी हुई। व्यवस्था का सिद्धान्त यह बतलाता है कि अधिकतम कार्यकुशलता के लिए व्यक्तियों एवं चीज (वस्तु) उचित समय पर तथा उचित स्थान पर होनी चाहिए। क्योंकि यदि कम्पनी या संस्था में ऐसा नहीं होगा तो अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी तथा संस्था को अपनी पुरानी स्थिति को वापस प्राप्त करने में अत्यधिक कठिनाई आयेगी। अत: कम्पनी को पुराने गौरव को प्राप्त करने के लिए व्यवस्था के सिद्धान्त का भी पालन करना चाहिए।

हाँ, परामर्शदाता ने वैज्ञानिक प्रबन्ध को लागू करने का जो सुझाव दिया है वह उचित है। कारखाने की उत्पादन क्षमता एवं श्रमिकों की कार्यकुशलता में वृद्धि करने के लिए वैज्ञानिक प्रबन्ध सर्वश्रेष्ठ है। संस्था में वैज्ञानिक प्रबन्ध को प्रभावी ढंग से लाग किये जाने से ही कम्पनी को इच्छित परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। किन्तु वैज्ञानिक प्रबन्ध को लागू करने के लिए जो परिवर्तन लागू किये जाने हैं उनके प्रभावी क्रियान्वयन में कम्पनी को निम्न सावधानियाँ बरती जानी आवश्यक हैं-

  • कार्य नियोजन में कार्य का वर्गीकरण उन लोगों के बीच किया जाना चाहिए जो उत्पादन प्रक्रिया, समय लागत आदि के विषय में अनुभवी हों, दक्ष हों और पर्याप्त ज्ञान रखने वाले हों।
  • उत्पादन का कार्य उन लोगों को दिया जाना चाहिए जिनके पास उन कार्यों को करने की विशेषज्ञता हो, विशिष्ट ज्ञान हो।
  • संस्था में कार्य करने वाले व्यक्तियों के पास आवश्यक बुद्धि, शिक्षा, चातुर्य, स्थिरता, निर्णय, विशिष्ट ज्ञान, शारीरिक दक्षता एवं ऊर्जा, ईमानदारी तथा अच्छा स्वास्थ्य होना चाहिए।
  • संस्था के प्रत्येक कार्य एवं गतिविधि के मानकीकरण की आवश्यकता है अर्थात् इनके लिए प्रमाप निर्धारित कर लिये जाने चाहिए।
  • संस्था में बेकार किस्मों, आकार तथा आयामों को समाप्त किया जाना चाहिए तथा कार्य का सरलीकरण किया जाना आवश्यक है। सरलीकरण में उत्पादन की अनावश्यक अनेकताओं को समाप्त करना, माल स्टॉक में कम रखना, उपकरणों का सम्पूर्ण उपयोग एवं आवर्त में वृद्धि सम्मिलित हैं।
  • विभिन्न प्रकार की मुद्राओं की गति जो किसी विशेष प्रकार के कार्य को करने के लिए की जाती है, का अध्ययन कर अनावश्यक चेष्टाओं को समाप्त किया जाना चाहिए।
  • प्रत्येक कर्मचारी के कार्य के दौरान थकान का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। यह अध्ययन किसी कार्य को पूरा करने के लिए आराम के अन्तराल की अवधि एवं बारम्बारता का निर्धारण करता है। यदि समय-समय पर आराम मिलता है तो व्यक्ति आन्तरिक बल पुनः प्राप्त कर लेगा तथा पूर्व क्षमता से कार्य कर सकेगा।

Chapter 2 प्रबन्ध के सिद्धान्त