Chapter 21 तंत्रिकीय नियंत्रण एवं समन्वय

Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित संरचनाओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए
(अ) मस्तिष्क 
(ब) नेत्र 
(स) कर्ण।
उत्तर:
(अ) मस्तिष्क (Brain): तीन झिल्लियों द्वारा ढका होता है जिन्हें क्रमशः ड्यूरामेटर (Duramater), अरेनाइड (Arachnoid) एवं पायामेटर (Piamater) कहते हैं। मस्तिष्क को तीन भागों में विभाजित किया गया है:

1. अग्रमस्तिष्क (Fore Brain): प्रमस्तिष्क, थेलेमस और हाइपोथेलेमस से बना होता है। प्रमस्तिष्क लंबवत् दो अर्धगोलार्डों में विभक्त होता है, जो कार्पस कैलोसम से जुड़े रहते हैं। अनमस्तिष्क का महत्वपूर्ण भाग हाइपोथेलेमस शरीर के तापक्रम, खाने और पीने आदि क्रियाओं का नियन्त्रण करता है। प्रमस्तिष्क गोलाद्धों का आंतरिक भाग और संगठित गहराई में स्थित संरचनाएं मिलकर जटिल संरचना बनाते हैं, जिसे लिम्बिक तंत्र कहते हैं और यह सूंघने, प्रतिवर्ती क्रियाओं, लैंगिक व्यवहार के नियंत्रण, मनोभावों की अभिव्यक्ति और अभिप्रेरण से सम्बन्धित होता है।

2. मध्यमस्तिष्क: यह अनमस्तिष्क के थेलेमसाहाइपोथेलेमस तथा पश्च मस्तिष्क के पोंस के बीच स्थित होता है। मध्य मस्तिष्क का ऊपरी भाग चार लोबनुमा उभारों का बना होता है जिन्हें कार्पोरा क्वाड्रीजिमीना कहते हैं। मध्य मस्तिष्क ग्राही व एकीकरण तथा एकीकृत दृष्टि तन्तु तथा श्रवण अंतर क्रियाओं से सम्बन्धित है।

3. पश्चमस्तिष्क: पश्च मस्तिष्क पोस, अनुमस्तिष्क और मेड्यूला का बना होता है। पोस रेशेनुमा पथ का बना होता है जो कि मस्तिष्क के विभिन्न भागों को आपस में जोड़ते हैं। अनुमस्तिष्क की सतह विलगित होती है जो न्यूरॉन्स को अतिरिक्त स्थान प्रदान करती है। मेड्यूला ऑब्लांगेटा मेरुरज्जु से जुड़ा होता है। मेड्यूला ऑब्लांगेटा में श्वसन, हृदय परिसंचारी प्रतिवर्तन और पाचक रसों के स्राव के नियंत्रण केन्द्र होते हैं।

(ब) नेत्र (Eye): मनुष्य में एक जोड़ी नेत्र खोपड़ी में स्थित अस्थि गर्तिक, जिसे नेत्र कोटर कहते हैं। नेत्र कोटर/ गोलक की दीवारें तीन परतों से बनी होती हैं। कार्निया को छोड़कर बाहरी परत स्केलेरा (शुक्ल पटल) है। स्केलेरा के भीतर की ओर मध्य परत कॉरोइड कहलाती है। आंतरिक परत रेटिना (Retina) कहलाती है। यह तीन परतों की बनी होती है:

प्रकाशग्राही कोशिकाएं दो प्रकार की होती हैं जिन्हें क्रमश: शलाका और शंकु कहते हैं। इन कोशिकाओं में प्रकाश संवेदी प्रोटीन प्रकाश वर्णक पाए जाते हैं। दिन – रात की दृष्टि (फोटोपिक दृष्टि) शंकु का कार्य तथा स्कोटोपिक दृष्टि शलाका का कार्य है। प्रकाश रेटिना से प्रवेश कर लैंस तक पहुंचता है और रेटिना पर वस्तु की छवि बनाती है। रेटिना में उत्पन्न आवेगों को मस्तिष्क के दृष्टि वल्कट भाग तक दुक तन्त्रिका द्वारा भेजा जाता है। जहां पर तंत्रिकीय आवेगों का विश्लेषण होता है और रेटिना पर बनने वाली छवि को पहचाना जाता है।

(स) कर्ण (Ear): मनुष्य के कर्ण को तीन भागों में विभाजित किया गया है:

बाहा कर्ण पिन्ना तथा बाह्य श्रवण गुहा से बना होता है। मध्य कर्ण तीन अस्थिकाओं से बना होता है, जिन्हें क्रमश: मैलियस, इन्कस और स्टेपीज कहते हैं। द्रव्य से भरा अन्तःकर्ण लोबरिंथ का घुमावदार भाग कोक्लिया कहलाता है। कोक्लिया दो झिल्लियों बेसिलर झिल्ली और राजइनर्स झिल्ली द्वारा तीन कक्षों में विभाजित किया जाता है। ऑर्गन ऑफ कॉर्टाई आधारीय झिल्ली द्वारा तीन कक्षों में विभाजित किया जाता है। ऑर्गन ऑफ कॉटाई आधारीय झिल्ली पर स्थित होता है और इसमें पाई जाने वाली रोम कोशिकाएँ श्रवण ग्राही की तरह कार्य करती हैं।

कर्ण ड्रम (Ear drum) में उत्पन्न कम्पन कर्ण अस्थिकाओं और अंडाकार खिड़की द्वारा द्रव से भरे अन्तःकर्ण तक भेजे जाते हैं, जहाँ वे आधारीय झिल्ली में एक तरंग उत्पन्न करती है। आधारीय झिल्ली में होने वाली गति रोम कोशिकाओं को मोड़ती है और टेक्टोरियल झिल्ली के विरुद्ध दबाव उत्पन्न करते हैं। फलस्वरूप तंत्रिका आवेग उत्पन्न होते हैं और अभिवाही तन्तुओं द्वारा मस्तिष्क के श्रवण वल्कुट तक भेजे जाते हैं। अन्तःकर्ण में भी कोक्लिया के ऊपर जटिल तन्त्र होता है और शरीर का संतुलन और सही स्थिति को बनाए रखने में हमारी मदद करता है।

प्रश्न 2. 
निम्नलिखित की तुलना कीजिए
(अ) केन्द्रीय तन्त्रिका तंत्र और परिधीय तंत्रिका तंत्र 
(ब) स्थिर विभव और सक्रिय विभव 
(स) कॉरोइड और रेटिना।
उत्तर:
(अ) केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र और परिधीय तंत्रिका तंत्र में तुलना:

केन्द्रीय तन्त्रिका तंत्र (CNS)

परिधीय तत्रिका तंत्र (PNS)

1. मस्तिष्क (Brain) व मेरुरज्जु (Spinal cord) मिलकर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का निर्माण करते हैं।

मस्तिष्क से निकलने वाली कपाल (Spinal Nerves) तथा मेरुरज्जु से निकलने वाली मेरु तन्त्रिकायें (Spinal nerves) मिलकर परिधीय तत्रिका तंत्र का निर्माण करती हैं।

2. इस तन्निका तन्त्र को मानव की इच्छा के अधीन होने के कारण ऐच्छिक तन्त्रिका तंत्र या केन्द्रीय तन्त्रिका तब कहते हैं।

स्नायुमण्डल के बाहरी भाग में घनों के समान स्नायु तार होते हैं जो केन्द्रीय तंत्र को शरीर के विभिन्न भागों से मिलाते हैं।

3. इस तन्त्र की सहायता से विभिन्न प्रकार की संवेदना ग्रहण की जाती है तथा अपनी इच्छानुसार हाथ – पैर चलाते हैं और विवेक से कार्य करते हैं।

ये स्नायु बाहर से उत्तेजनाओं को केन्द्र या केन्द्र से बाहर पहुँचाने का कार्य करते हैं।

(ब) स्थिर विभव और सक्रिय विभव में तुलना:

स्थिर विभव (Resting Potential)

सक्रिय विभव (Action Potential)

1. विश्राम की स्थिति में सन्विका को ध्रुवीय तन्त्रिका कहते हैं। ध्रुवीय स्थिति में तन्त्रिका झिल्ली के बाहरी ओर धनात्मक आवेश. तथा अन्दर की ओर ऋणात्मक आवेश पाया जाता है।

तविका को पर्याप्त उद्दीपन मिलने पर एक्सोलेमा की पारगम्यता में। परिवर्तन होता है। इस स्थिति में Na+ भीतर प्रवेश करते हैं जिससे तन्त्रिका तन्तु बाहर से ऋण आवेशित (-ve) तथा अन्दर से धनावेशित (+ve) हो जाता है। इसे विधुवीय (diepolarised) अवस्था कहते हैं।

2. विश्राम की अवस्था में तन्धिका झिल्ली पर पाये जाने वाले विभव को विश्रान्ति विभव/स्थिर विभव (Resting Potential) कहते हैं।

विध्रुवीय अवस्था में तन्त्रिका झिल्ली पर उपस्थित विभव को कार्य विभव/सक्रिय विभव (Action Potential) कहते हैं।

3. विश्राम की स्थिति में न्यूरॉन एक्सोलिमा पर विराम कला विभव का मान – 70 से – 85 mv होता है।

एक्सॉन पर तन्त्रिका आवेग की उपस्थिति के समय उपस्थित सक्रिय कला विभव (Membrane action potential) का मान +30mv होता है।


(स) कॉरोइड और रेटिना में तुलना:

कॉरोइड (Choroid)

रेटिना (Retina)

1. यह नेत्र गोलक का मध्य स्तर है।

रेटिना नेत्र गोलक का सबसे भीतरी स्तर है।

2. यह स्तर कोमल संयोजी ऊतक की बनी होती है।

यह नेत्र गोलक का सबसे पतला व कोमल संवेदी स्तर है।

3. इस स्तर में रक्त कोशिकाओं का घना जाल होता है।

जबकि इस स्तर में कॉरोइड स्तर की तुलना में कम होता है।

4. इस स्तर की संरचना सरल होती है।

जबकि इसकी संरचना जटिल होती है।

5. इस स्तर का उद्भव मीसोडर्म से होता है।

जबकि इस स्तर का उद्भव एक्टोडर्म से होता है।

6. इस स्तर पर प्रतिबिम्ब नहीं बनता है।

रेटिना स्तर पर प्रतिबिम्ब बनता है।

7. यह इकहरी परत है।

जबकि रेटिना तीन परतों से मिलकर बनी होती है।

8. रक्तक पटल से निर्मित आइरिस प्रकाश की मात्रा का नियन्त्रण करती है।

रेटिना में स्थित प्रकाशग्राही कोशिकाएं (शलाका एवं शंकु) रात्रि में व मन्द प्रकाश एवं तेज प्रकाश व विभिन्न रंगों को देखने में सहायक हैं।


प्रश्न 3. 
निम्नलिखित प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए 
(अ) तंत्रिका तंतु की झिल्ली का ध्रुवीकरण
(ब) तन्त्रिका तंतु की झिल्ली का विधूवीकरण 
(स) तंत्रिका तंतु के समांतर आवेगों का संचरण 
(द) रासायनिक सिनेप्स द्वारा तंत्रिका आवेग का संवहन।
उत्तर:
(अ) तंत्रिका तंतु की झिल्ली का ध्रुवीकरण: प्रत्येक तन्त्रिका विश्राम काल में धुव्रित अवस्था में होती है। जिसके बाहर धनात्मक आवेश पाया जाता है तथा भीतर की ओर ऋणात्मक आवेश पाया जाता है। बाहर की तरफ Na+ भीतर की तुलना में 10 – 12 गुणा अधिक होते हैं। यह कार्बनिक आयनों के कारण होता है। विश्राम अवस्था के विभव को विश्रान्ति काल विभव कहते हैं। यह – 70 mv से – 86 mv होता है।

(अ) ध्रुवित प्रावस्था: विश्राम अवस्था में एक्सॉन झिल्ली K+ के लिए Na+ की तुलना में 20 गुना अधिक पारगम्य होती है। इसके कारण Na+ के अन्दर जाने की तुलना में K+ का बाहर विसरण द्वारा अधिक होता है। इसमें साम्यता बनाये रखने के लिए सोडियम पम्प कार्य करता है। इस समय तीन Na+ को बाहर की ओर व दो K+ को भीतर की ओर पम्प किया जाता है।

(ब) तन्त्रिका तंतु की झिल्ली का विध्रुवीकरण: उद्दीपित होने पर एक्सोलेमा की पारगम्यता में परिवर्तन आ जाता है। Na+ भीतर प्रवेश करते हैं व K+ बाहर निकलते हैं लेकिन Na+ का अन्तप्रवाह K+ के बहिप्रवाह से अधिक होता है। जिसके फलस्वरूप तन्विका तन्तु बाहर की तरफ ऋणावेशित एवं भीतर की तरफ धनात्मक हो जाते हैं। इसे विधुवित अवस्था कहते हैं।

(स) तंत्रिका तंतु के समांतर आवेगों का संचरण: सक्रिय विभव अन्य भागों के लिए उद्दीपन का कार्य करता है। जैसे ही विधुवण तरंग तन्त्रिका तन्तु पर आगे की तरफ संचरित होती है तो पिछले भागों में उद्दीपन का प्रभाव समाप्त होकर तन्त्रिका तन्तु पुनः वित्रान्ति अवस्था में लौट आती है। इस क्रिया में K+ बाहर आते हैं तथा Na+ पुनः बाहर की तरफ को भेजे जाते हैं। इस अवस्था को पुनः धुवण कहते हैं।

धुवीकरण, विधुवीकरण व पुनर्भुवीकरण क्रमबद्ध रूप से होते हैं। माइलिन आच्छद तन्तुओं में संचरण अधिक तीव्र होता है क्योंकि यह पर्व सन्धि से पर्व सन्धि पर संचरित होता है। इसे साल्टेटोरियल आवेग संचरण कहते हैं।

(द) रासायनिक सिनेप्स द्वारा तंत्रिका आवेगों का संवहन: सिनेप्स दो प्रकार के होते हैं, विद्युत सिनेप्स एवं रासायनिक सिनेप्स। रासायनिक सिनेप्स पर, पूर्व एवं पश्च सिनेप्टिक न्यूरोन्स की झिल्लियाँ द्रव से भरे अवकाश द्वारा पृथक् होती हैं जिसे सिनेप्टिक दरार कहते हैं। सिनेप्सिस द्वारा आवेगों के संचरण में न्यूरोट्रांसमीटर (तंत्रिका संचारी) कहलाने वाले रसायन सम्मिलित होते हैं। तंधिकाक्ष के छोर पर स्थित तंत्रिका संचारी अणुओं से भरी होती है। जब तक आवेग तंत्रिकाक्ष के छोर तक पहुंचता है। यह सिनेष्टिक पुटिका की गति को झिल्ली की और उत्तेजित करता है, जहां वे प्लाज्मा झिल्ली के साथ जुड़कर तंत्रिका संचारी अणुओं को सिनेप्टिक दरार में मुक्त कर देते हैं । मुक्त किये गये तंत्रिका संचारी अणु पश्च सिनेप्टिक झिल्ली पर स्थित विशिष्ट ग्राहियों से जुड़ जाते हैं। इस जुड़ाव के फलस्वरूप आयन चैनल खुल जाते हैं और उसमें आयनों के आगमन से पश्च सिनेप्टिक झिल्ली पर नया विभव उत्पन्न हो जाता है। उत्पन्न हुआ नया विभव उत्तेजक या अवरोधक हो सकता है।

प्रश्न 4. 
निम्नलिखित का नामांकित चित्र बनाइए
(अ) न्यूरॉन 
(ब) मस्तिष्क 
(स) नेत्र
(द) कर्ण। 
उत्तर:
(अ) न्यूरॉन का चित्र

(ब) मस्तिष्क का चित्र

(स) नेत्र का चित्र

(द) कर्ण का चित्र

प्रश्न 5. 
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए
(अ) तंत्रीय समन्वयन 
(ब) अग्रमस्तिष्क 
(स) मध्यमस्तिष्क
(द) पश्च मस्तिष्क 
(ध) रेटिना
(य) कर्ण अस्थिकाएं 
(र) काक्लिया 
(ल) ऑर्गन ऑफ कॉर्टाई। 
उत्तर:
(अ) तंत्रीय समन्वयन (Neural Coordination): समन्वयता एक ऐसी क्रियाविधि है, जिसके द्वारा दो या अधिक अंगों में क्रियाशीलता बढ़ती है व एक दूसरे अंगों के कार्यों में मदद मिलती है, उदाहरणार्थ जब हम शारीरिक व्यायाम करते हैं तो पेशियों के संचालन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ जाती है। ऑक्सीजन की आवश्यकता में भी वृद्धि हो जाती है। ऑक्सीजन की अधिक आपूर्ति के लिए श्वसन दर, हृदय स्पंदन दर एवं वृक्क वाहिनियों में रक्त प्रवाह की दर बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है।

जब शारीरिक व्यायाम बंद कर देते हैं तो तंत्रिकीय क्रियाएं, फुफ्फुस, हृदय, रुधिर वाहिनियों, वृक्क व अन्य अंगों के कार्यों में समन्वय स्थापित हो जाता है। हमारे शरीर में तंत्रिका तन्त्र एवं अन्तःस्रावी तंत्र सम्मिलित रूप से अन्य अंगों की क्रियाओं में समन्वय करते हैं तथा उन्हें एकीकृत करते हैं, जिससे सभी क्रियाएं एक साथ संचालित होती रहती हैं। तन्त्रिकीय तन्त्र ऐसे व्यवस्थित जाल तंत्र गठित करता है, जो त्वरित समन्वय हेतु बिंदु दर बिंदु जुड़ा रहता है। अंतःस्रावी तंत्र हार्मोनों द्वारा रासायनिक समन्वय बनाता है।

(ब) अग्रमस्तिष्क (Forebrain): अन मस्तिष्क निम्न भागों से मिलकर बना होता है:
(1) प्रमस्तिष्क (Cerebrum): यह पूरे मस्तिष्क के अस्सी प्रतिशत भाग का निर्माण करता है। अनुलम्ब विदर की सहायता से दो भागों में विभाजित होता है जिन्हें क्रमश: दायां व बायां प्रमस्तिष्क गोलार्ध कहते हैं। दोनों प्रमस्तिष्क गोलार्ध कास केलोसम द्वारा जुड़े होते हैं।

घ्राण मस्तिष्क (Rhinecephalon): यह गंध से सम्बन्धित क्षेत्र है। प्रमस्तिष्क गोलार्थों के वे सभी क्षेत्र जो प्राण सम्बन्धी अनुक्रिया से सम्बन्धित हैं, संयुक्त रूप से घ्राण मस्तिष्क बनाते हैं। प्रत्येक प्रमस्तिष्क गोलार्ध के अग्र ललाटीय पाली में धंसा एकएक घ्राण पिण्ड ताथा घ्राण मार्ग पाये जाते हैं।

(2) अग मस्तिष्क पश्च (Diencephalon): यह प्रमस्तिष्क एवं मध्य मस्तिष्क के बीच स्थित होता है। इसे थैलामेन सेफैलोन कहते हैं। यह छोटा एवं अग्र मस्तिष्क का पश्च भाग है। इसके दो भाग होते हैं:

  1. एपीथेलेमस (Epithalamus): अनमस्तिष्क पश्च की गुहा (तृतीय गुहा) को एपीथेलेमस कहते हैं। इसमें एक रक्तक जालक होता है। इसकी मध्य रेखा में पीनियल ग्रन्थि होती है जो मिलैटोनिन हार्मोन का लावण करती है। थैलेमिक केन्द्रक स्थित होता है, जो धूसर द्रव्य से निर्मित होता है।
  2. थैलेमस (Thalarmus): यह डाइऐनसेफेलोन की ऊपरी पावं दीवारें बनाते हैं एवं डाइऐनसेफेलोन का 80% भाग बनाता है। यह अण्डाकार एवं दो मोटी पालियों के रूप में होता है।

(3) हाइपोथेलेमस (Hypothalamus): डाइऐनसेफेलोन की पावं दीवारों का निचला भाग तथा इसकी गुहा का फर्श बनाता है। यह मस्तिष्क के अधर से दिखाई देती है।

(स) मध्य मस्तिष्क (Mid Brain): यह छोटा और मस्तिष्क का संकुचित भाग है। यह मध्य मस्तिष्क अग्र मस्तिष्क के थेलेमस/हाइपोथेलेमस तथा पश्च मस्तिष्क के पास के बीच स्थित होता है। एक नाल प्रमस्तिष्क तरल नलिका (Cerebral aquaduct) मध्य मस्तिष्क से गुजरती है। पश्च भाग में चार उभार पाये जाते हैं जिन्हें ओप्टिक पाली या कोलिकुलस कहते हैं। चारों उभारों को संयुक्त रूप से कार्पोरा क्वाड्रीजेमिना कहते हैं।

(द) पश्च मस्तिष्क (Hind Brain) इसके तीन भाग होते हैं:

  1. अनुमस्तिष्क (Cerebellum): यह तीन पिण्डों का बना होता है (दो पाय पिण्ड और एक वर्मिस)। दोनों पार्श्व पिण्ड बड़े गोलनुमा हो जाते हैं इसलिए इन्हें पाय पिण्डों को अनुमस्तिष्क गोलार्ध कहते हैं। वर्मिस केन्द्रीय भाग होता है। इसके अन्तिम सिरे पर एक जोड़ी प्लोक्यूलोनोड्यूलर पिण्ड (Plocculonodular Lobe) पाये जाते हैं। इससे तीन अनुमस्तिष्क वृन्त निकलते हैं। ऊपरी अनुमस्तिष्क वृन्त मध्य मस्तिष्क से जुड़ता है, मध्य अनुमस्तिष्क वृन्त पोन्स से जुड़ता है तथा निचला अनुमस्तिष्क मेड्यूला ऑब्लांगेटा से जुड़ता है।
  2. पोन्स (Pons): यह मध्य मस्तिष्क के नीचे एवं मेड्यूला ऑब्लांगेटा के ऊपर स्थित होता है, जो अनुमस्तिष्क की दोनों पालियों को जोड़ता है।
  3. मेड्यूला ऑब्लांगेटा (Medulla Oblongata): यह मस्तिष्क का पश्च भाग होता है जो नलिकाकार एवं बेलनाकार होता है। इसमें पाई जाने वाली गुहा को IVth निलय या मेटासील कहते हैं। मेड्यूला का निचला छोर मेरुरज्जु में समाप्त होता है। मध्यमस्तिष्क, पोन्स व मेडुला तीनों एक अक्ष पर स्थित होते हैं जिन्हें बेन स्टेम (Brain Stem) कहते हैं।

(ध) रेटिना या दृष्टि पटल (Retina): यह नेत्र गोलक की भित्ति का सबसे भीतरी स्तर होता है। यह नेत्र गोलक के पश्च भाग में स्थित होता है एवं कोरॉएड स्तर को ढके रहता है। रेटिना दो प्रमुख स्तरों की बनी होती है-बाहर का रंगा स्तर (Pigment Layer) तथा भीतरी अपेक्षाकृत मोटा संवेदी स्तर (Sensory Layer)।

रंगा स्तर (Pigment Layer): यह स्तर चपटी एवं रंगा कणिकायुक्त कोशिकाओं का एकाकी स्तर होता है। यह स्तर आइरिस की पुतली तक फैला होता है। संवेदी स्तर केवल सिलियरी काय तक फैला रहता है तथा बाहर से भीतर की ओर तीन परतों में बंटा होता है

(1) प्रकाशग्राही कोशिका (Photoreceptor cells): यह परत लम्बी-लम्बी संवेदी कोशिकाओं की बनी होती है। ये कोशिकाएँ परत में खडी स्थिति में होती हैं। परत की कोशिकाएँ दो प्रकार की होती है। इनमें से कुछ अपेक्षाकृत लम्बी होती हैं तथा रंगा स्तर से लगी रहती हैं, इन्हें शलाकायें (Rods) कहते हैं। इसके विपरीत अधिकांश कोशिकाएँ अपेक्षाकृत चौड़ी तथा कुछ चपटी होती हैं तथा इनके नुकीले सिरे रंगा स्तर तक पहुंच नहीं पाते हैं। इन्हें शंक (Cones) कहते हैं।

प्रत्येक शलाका एवं शंकु का भीतरी सिरा पतला होकर एक महीन तन्त्रिका तन्तु में विभेदित होता है जो शीघ्र शाखान्वित होकर इस स्तर की दूसरी परत के तन्तुओं से साइनेप्सीस बनाता है। शलाकाओं (Rods) द्वारा प्रकाश एवं अन्धकार के भेद का ज्ञान होता है। इसके विपरीत शंकुओं (Cones) द्वारा रंगभेद का ज्ञान होता है। इस परत की कोशिकाओं में भी कुछ कणिकाएँ होती हैं।

(2) द्विधुवीय तन्त्रिका कोशिका परत (Bipolar Neuronic Layer): द्विध्रुवीय न्यूरॉन की परत अनेक द्विध्रुवीय (Bipolar) तन्त्रिका कोशिकाओं की बनी होती है। इन न्यूरॉन के डैण्ड्राइट (Dendrites) शरनाकाओं एवं शंकुओं के तन्तुओं से अनेक साइनेप्सीस बनाते हैं। इसी प्रकार इन तन्त्रिका कोशिकाओं के एक्सॉन (Axons) संवेदी स्तर की तीसरी गुच्छिकीय परत के तन्त्रिका तन्तुओं से साइनेप्सीस (Synapses) बनाते हैं।

(3) गुच्छिकीय परत (Ganglionic layer): यह परत भी द्विध्रुवीय न्यूरॉन की बनी होती है। परन्तु यहाँ तन्त्रिका कोशिकाएँ अपेक्षाकृत बड़ी होती हैं। इन न्यूरॉन के बाहर डैण्ड्राइट ऊपरी परत के एक्सॉन से साइनेप्सीस (Synapses) बनाते हैं तथा भीतरी अपेक्षाकृत लम्बे एक्सॉन नेत्र-गोलक के आधार भाग में केन्द्रित होकर दृक-तन्त्रिका (Optic Nerve) के तन्तुओं में स्वयं परिवर्तित हो जाते हैं तथा गोलक को बंध कर बाहर निकलते हैं। इस आधार भाग को अन्ध बिन्दु (Blind Spot) कहते हैं, क्योंकि इस स्थान पर गोलक की परतों का अभाव होता है तथा यह भाग प्रतिबिम्ब बनाने में सहयोग नहीं देता है।

(य) कर्ण अस्थियाँ (Ear bones) ये मध्य कर्ण में पाई जाती हैं जो निम्न हैं:
(1) मैलियस (Malleus): यह अस्थिका बाहर कर्ण पटह की ओर स्थित होती है। यह सबसे बड़ी (Large) हथौड़ेनुमा (Hammer shaped) होती है। मैलियस अस्थिका जबड़े की आर्टिकुलर (Articular) अस्थि के रूपान्तरण से बनती है। इसका बाहरी संकरा सिरा कर्ण परह (Tympanic Membrane) से तथा भीतरी चौड़ा सिरा इन्कस (Incus) से जुड़ा रहता है।

(2) इन्कस (Incus): यह क्वॉड्रेट (Quadrate) अस्थि के रूपान्तरण से बनती है। इसका आकार निहाई (Anvil) के समान होता है। इसका बाहरी चौड़ा सिरा मैलियस से तथा भीतरी सिरा स्टेपीज (Stapes) से जुड़ा रहता है।

(3) स्टेपीज (Stapes): यह हायोमैन्डिबुलर (Hyomandibular) अस्थि के रूपान्तरण से बनती है। इसका आकार घोड़े की जीन की रकाब (Stirrup) के समान होता है। इसके बीच एक त्रिकोणाकार बड़ा छिद्र होता है। यह एक ओर से इन्कस तथा दसरी ओर से फेनेस्ट्रा ओवेलिस (Fenestra Ovalis) पर मड़ी झिल्ली से लगी रहती है। उपर्युक्त तीनों कर्ण अस्थिकाएँ लिगामेन्ट (Ligaments) द्वारा कर्ण गुहा में जमी रहती हैं।

(र) काँक्लिया (Cochlea): सैक्युलस के पार्श्व अधर सतह से एक लम्बी कुण्डलित स्प्रिंगनुमा रचना विकसित होती है जिसे कोक्लिया की नली या कोक्लिया (Cochlear Duct or Cochlea) कहते हैं। इस नली की प्रत्येक कुण्डली के बीच में लिगामेर या तन्तु स्थित रहते हैं जिनसे इसकी विशिष्ट कुण्डलाकार आकृति का नियमन किया जाता है।
कोक्लिया की नली चारों ओर से अस्थि कोश द्वारा घिरी रहती है। कोक्लिया की नली राइसनर की कला (Reissner’s Membrane) तथा आधार कला (Basement Membrane) द्वारा तीन गुहाओं में विभाजित रहती है

स्केला वेस्टीब्यूलाई तथा स्केला टिम्पेनाई में पेरिलिम्फ (Perilymph) भरा रहता है किन्तु ये दोनों गुहाएँ एक – दूसरे से एक छिद्र द्वारा सम्बद्ध रहती हैं जिसे हेलीकोटीमा (Helicotrema) कहा जाता है।

(ल) ऑर्गन ऑफ कॉटाई (Organ of Corti) ऑर्गन ऑफ कॉर्टाई: बेसिलर कला के एपिथिलियम स्तर पर मध्य रेखा की पूरी लम्बाई पर एक संवेदी अनुलम्ब उभार के रूप में पाया जाता है। इसमें अवलम्बी कोशिकाओं (Supporting Cells) व स्तम्भ संवेदी कोशिकाओं (Coluinnar Sensory Cells) की तीन पंक्तियाँ बाहर की ओर व एक पंक्ति भीतर की ओर होती है। स्तम्भ संवेदी कोशिकाओं व अवलम्बी कोशिकाओं के बीच कुछ रिक्त स्थान पाये जाते हैं। इन रिक्त स्थानों में पाये जाने वाले द्रव को कार्टिलिम्फ (Cortilymph) कहते हैं।

अवलम्बी कोशिकाएं निम्न तीन प्रकार की होती हैं:

स्तम्भ संवेदी कोशिका के स्वतन्त्र सिरों पर रोम पाये जाते हैं। इन्हें स्टीरियोसिलिया (Stereocilia) कहते हैं। इन कोशिकाओं के अधर तल पर श्रवण तन्त्रिका (Auditory Nerve) की शाखायें पायी जाती हैं। यहां पायी जाने वाली शाखा को कॉक्लियर शाखा कहते हैं। कॉरटाई के अंग के ऊपर एक टेक्टोरियल झिल्ली (Tactorial Membrane) पायी जाती है। यह एक तन्तुमय झिल्ली है। संवेदी कोशिकाओं के स्वतन्त्र सिरे इस टेक्टोरियल झिल्ली में धंसे रहते हैं।

प्रश्न 6. 
निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ दीजिए
(अ) सिनेप्टिक संचरण क्रियाविधि 
(ब) देखने की प्रक्रिया 
(स) श्रवण की प्रक्रिया।
उत्तर:
(अ) सिनेप्टिक संचरण क्रियाविधि (Mechanism of Synaptic transmission): तन्त्रिका आवेगों का एक न्यूरोन से दूसरे न्यूरोन तक संचरण सिनेप्सिस द्वारा होता है। एक सिनेप्स का निर्माण पूर्व सिनैष्टिक न्यूरोन तथा पश्च सिनेप्टिस न्यूरॉन की झिल्ली द्वारा होता है, जो कि सिनेप्टिक दरार द्वारा विभक्त हो भी सकती है या नहीं भी। सिनेप्स दो प्रकार के होते हैं:

विद्युत सिनेप्स पर पूर्व और पश्च सिनेप्टिक न्यूरॉन की झिल्लियाँ एक – दूसरे के समीप होती हैं। एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक विद्युत धारा का प्रवाह सिनेप्सिस से होता है। विद्युतीय सिनेप्सिस से आवेग का संचरण, एक तंत्रिकाक्ष से आवेग के संचरण के समान होता है। विद्युतीयसिनेप्सिस से आवेग का संचरण, रासायनिक सिनेप्सिस के संचरण की तुलना में अधिक तीव्र होता है।

(ब) देखने की प्रक्रिया (Mechanism of Vision): वैज्ञानिकों के अनुसार शलाकाओं एवं शंकुओं में प्रकाश की किरणों द्वारा उद्दीपन उत्पन्न करना एक रासायनिक घटना है क्योंकि शलाकाओं में उपस्थित वर्णक एक रासायनिक पदार्थ एक रोडोप्सिन होता है किन्तु यह दो घटकों अर्थात् आप्सिन (Opsin) तथा रेटिनीन (Retinine) से बना होता है। आप्पिन के प्रोटीन को स्कोटोप्सिन (Scotopsin) भी कहते हैं परन्तु रेटिनीन नामक वर्णक वास्तव में विटामिन A का ऐल्डिहाइड यौगिक होता है। जब किसी वस्तु से प्रकाश किरणे चलकर रेटिना पर पड़ती हैं तो शलाका कोशिकाओं में उपस्थित रोडोप्सिन विघटित होकर रेटिनीन व आप्सिन में बदल जाता है। फलस्वरूप ऑप्सिन की संरचना में बदलाव आता है तथा यह झिल्ली की पारगम्यता में बदलाव लाता है।

इसके फलस्वरूप विभवान्तर प्रकाशग्राही कोशिकाओं (Photo receptor cells) में संचरित होता है। यह एक संकेत उत्पन्न करता है जो कि गुच्छिका कोशिकाओं (Ganglion cells) में द्विध्रुवीय कोशिकाओं (Bipolar cells) द्वारा सक्रिय विभव (Action potentials) उत्पन्न करता है। इन सक्रिय विभव को दुक तंत्रिका (Optic nerve) द्वारा प्रमस्तिष्क के दृष्टि वल्कुट (Cortex) भाग में भेज दिया जाता है। जहाँ पर तंत्रिका आवेगों का विश्लेषण किया जाता है और छवि (Image) को पूर्व स्मृति एवं अनुभव के आधार पर पहचाना जाता है।

(स) श्रवण की प्रक्रिया (Mechanismof Hearing): इसका प्रमुख श्रेय कारटाई के अंग को जाता है। बाह्य वातावरण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें बाह्य कर्ण द्वारा एकत्रित होकर कर्ण पटह से टकराती हैं। कर्ण पटह के इस कम्पन को मध्यकर्ण में स्थित तीनों अस्थियाँ फेनेस्ट्रा ओवेलिस के ऊपर स्थित झिल्ली को पहुंचाती हैं। स्टेपीज के कम्पन को स्केला वैस्टीब्यूलाई में स्थित पेरीलिम्फ में पहुंचा देता है। इस कारण कम्पन वेग अनुसार पेरीलिम्फ का दबाव कभी घरता है, कभी बढ़ता है।

इस परिवर्तन के फलस्वरूप राइसनर कला में कम्पन उत्पन्न हो जाते हैं, ठीक इसी समय स्कैला टिम्गेनाई (Scala Tympani) में दबाव बढ़ने से आधार कला (Basilar Membrane) में भी कम्पन होता है। इस तरह राइसनर तथा अधार कला के कम्पन से कोरटाई अंग की संवेदी कोशिकाएँ भी कम्पित हो उठती हैं। इन्हीं संवेदी कोशिकाओं से कम्पन प्रेरणाएँ प्राप्त कर श्रवण तन्त्रिका मस्तिष्क को पहुंचाती हैं। जहाँ इन कम्पनों का विश्लेषण कर मनुष्य ध्वनि को सुनने व समझने में सक्षम हो पाता है।

प्रश्न 7.
(अ) आप किस प्रकार किसी वस्तु के रंग का पता लगाते हैं?
(ब) हमारे शरीर का कौनसा भाग शरीर का संतुलन बनाये रखने में मदद करता है?
(स) नेत्र किस प्रकार रेटिना पर पड़ने वाले प्रकाश का नियमन करता है?
उत्तर:
(अ) दृष्टि शंकुओं (Cones) के थाहरी रोडोप्सिन के स्थान पर बैंगनी – सी रंगा (Visual Violet Pigment) होती है जिसे आयोडाप्सिन (lodopsin) कहते हैं। आयोडाप्सिन में रंगा पदार्थ तो रेटिनीन ही होता है लेकिन प्रोटीन घटक फोटोप्सिन (Photopsin) होता है। यह रंगा तीन प्रकाश व वस्तुओं के रंगभेद को ग्रहण करता है। अनुमानतः तीन प्राथमिक रंगों (Primary Colours) लाल, हरा व नीले से सम्बन्धित तीन प्रकार के शंकु (Cones) पाये जाते हैं। इन तीन प्रकार के शंकुओं में तीन अलग-अलग प्रकार के वर्णकों के विविध उद्दीपन से रंगों के विभिन्न मिश्रणों का ज्ञान जन्तुओं को होता है।

(ब) कर्ण के दोहरे कार्य में देह संतुलन एवं श्रवण क्रिया सम्मिलित रहती है किन्तु इसका प्राथमिक कार्य देह सन्तुलन ही माना गया है:
संतुलन क्रिया (Equilibrium or Balancing): संतुलन का कार्य यूट्रिकुलस, सैक्यूलस व अर्धवृत्ताकार नलिकाओं द्वारा किया जाता है। जन्तुओं में दो प्रकार की संतुलन संवेदनायें पायी जाती हैं:
1. स्थैतिक संतुलन (Static Balance): इस प्रकार का संतुलन आराम की स्थिति में देखा जा सकता है। इस संतुलन का सम्बन्ध मुख्यतया गुरुत्व (Gravity) के परिप्रेक्ष्य में शरीर की स्थिति से है व विशेषतया सिर की स्थिति से है। शरीर व खास तौर से सिर की स्थिति में होने वाले परिवर्तनों का ज्ञान, यूट्रिकुलस व सैक्यूलस के श्रवणकूटों के द्वारा किया जाता है। श्रवणकूटों (Cristae) के संवेदी रोम आटोकोनिया द्वारा संवेदित होते हैं। यहाँ से श्रवण तन्त्रिका के तन्तु इस संवेदना को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं। फिर यहां के चालक तन्तुओं (Motor Fibres) द्वारा उत्पन्न प्रतिक्रिया की प्रेरणा शरीर की कंकाल पेशियों को भेजी जाती है। रेल अथवा मोटर के धक्के, लिफ्ट द्वारा चढ़ने अथवा उतरते समय हम इस संवेदना से प्रभावित होते हैं।

2.  गतिज संतुलन (Dynamic Balance): गतिज संतुलन शरीर की गतिमान अवस्था से सम्बन्धित है। यह संतुलन अर्धवृत्ताकार नलिका के एम्पुला में पाये जाने वाले क्रिस्ट द्वारा प्राप्त होता है। शरीर की गति के साथ एम्पुला के एन्डोलिम्फ में तरंगें उत्पन्न होती हैं। इससे कुपुला हिलकर संवेदी कोशिकाओं को उत्तेजित कर देता है। यहाँ से संवेदनायें मस्तिष्क तक पहुँचाई जाती हैं। मस्तिष्क टाँगों की पेशियों को संतुलन हेतु प्रेरित करता है।

(स) आइरिस के मध्य में एक बड़ा छिद्र पाया जाता है जिसे पुतली या तारा (Pupil) कहते हैं। आइरिस पर अरेखित अरीय प्रसारी (Radial dilator) पेशियाँ फैली रहती हैं जिसके संकुचन से पुतली का व्यास बढ़ता है एवं आइरिस पर पायी जाने वाली वर्तुल स्फिंक्टर (Circular Sphincter) पेशियाँ संकुचन द्वारा पुतली के व्यास को कम करती हैं। अत: आइरिस कैमरे के डायाफ्राम की भांति अपने छिद्र को आवश्यकतानुसार घटा-बढ़ाकर गोल में (रेटिना) में जाने वाले प्रकाश की मात्रा का नियमन करती है।

प्रश्न 8.
(अ) सक्रिय विभव उत्पन्न करने में Na की भूमिका का वर्णन दीजिए।
(ब) सिनेप्स पर न्यूरोट्रांसमीटर मुक्त करने में Ca+ की भूमिका का वर्णन कीजिए।
(स) रेटिना पर प्रकाश आवेग उत्पन्न होने क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
(द) अंतः कर्ण में ध्वनि द्वारा तंत्रिका आवेग उत्पन्न होने की क्रियाविधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(अ) उद्दीपित होने पर एक्सोलेमा की पारगम्यता में परिवर्तन हो जाता है, Na+ भीतर प्रवेश करते हैं जिसके कारण तन्त्रिका तन्तु बाहर की तरफ ऋणावेशित एवं भीतर की तरफ धनात्मक हो जाते हैं। इसे विधवित अवस्था (Depolarized Stage) कहते हैं। इस दौरान उत्पन्न विभव को सक्रिय विभव (Action Potential) कहते हैं। यह + 30mV तक होता है। यह सक्रिय विभव अन्य भागों के उद्दीपन का कार्य करता है।

(ब) सिनेप्स (Synapse) पर आवेग के द्वारा डेन्ड्राइट्स के अन्तस्थ सिरे पर बटन कुछ रासायनिक पदार्थों, जैसे – एसीटाइलकोलिन का स्रावण करते हैं। इन्हें रासायनिक उद्दीपक न्यूरोझमर (Chemical Stimulators or Neurophumor) कहते हैं। ये न्यूरोझमर के कारण Ca++ ऊतक द्रव्य से घुण्डियों में पहुंचते हैं जिसके प्रभाव से ऐसीटायलकोलीन मुक्त होकर पश्च साइनेप्टिक न्यूरॉन की कला की पारगम्यता को प्रभावित करता है। फलस्वरूप पुनः विद्युती सम्पोषण हो जाता है। शीघ्र ही एसीटिलकोलीन एस्टरेज नामक एन्जाइम ऊतक से बनता है जो ऐसीट्राइबलकोनन का विघटन कर ऐसीटेट तथा कोलीन में कर देता है और तन्त्रिका आवेग का प्रसारण हो जाता है। 

(स) किसी वस्तु से निकली प्रकाश की किरणें नेत्र में प्रवेश करती हैं तो कैमरे के निगेटिव की तरह वस्तु की उलटी व छोटी प्रतिमूर्ति (Image) नेत्र के रेटिना पर पड़ती है। रेटिना की संवेदी कोशिकाएं संवेदित होती हैं और दूक तन्त्रिका इस संवेदना को मस्तिष्क में पहुंचा देती है। यहीं पर जन्तु को वस्तु का वास्तविक (Positive) दृष्टि ज्ञान हो जाता है। कार्निया, तेजोजल व लेन्स वस्तु से आयी किरणों का लगभग पूर्ण अपवर्तन (Refraction) कर देते हैं। परिणामस्वरूप रेटिना पर उलटी प्रतिमूर्ति पड़ती है। कैमरे में प्रकाश किरणों का पूर्ण अपवर्तन लेन्स करता है। इससे वस्तु की उलटी प्रतिमूर्ति प्रकाश रसायनी प्लेट (Photochemical Plate) पर पड़ती है। आँखों की आइरिस कैमरे के डायफ्राम (Diaphragm) के समान पुतली के व्यास को प्रकाश के अनुसार घटाने-बढ़ाने का कार्य करती है। नेत्रों में प्रकाश किरणें पड़ती हैं। इस प्रकार जब किरणें मन्द होती हैं तो आइरिस सिकुड़कर तारे को बड़ा कर देती है और अधिक किरणें रेटिना पर पड़ती हैं।

(द) श्रवण – क्रिया (Mechanism of Hearing): इसका प्रमुख श्रेय कॉरटाई के अंग को जाता है। बाह्य वातावरण से उत्पन्न ध्वनि तरंगें बाह्य कर्ण द्वारा एकत्रित होकर कर्ण पटह से टकराती हैं। कर्ण परह के इस कम्पन को मध्यकर्ण में स्थित तीनों अस्थियाँ फेनेस्ट्रा ओवेलिस के ऊपर स्थित झिल्ली को पहुँचाती हैं। स्टेपीज के कम्पन को स्केला वैस्टीब्यूलाई में स्थित पेरीलिम्फ में पहुंचा देता है। इस कारण कम्पन वेग अनुसार पेरीलिम्फ का दबाव कभी घटता है, कभी बढ़ता है।

इस परिवर्तन के फलस्वरूप राइसनर कला में कम्पन उत्पन्न हो जाते हैं, ठीक इसी समय स्कैला टिम्पेनाई (Scala Tympani) में दबाव बढ़ने से आधार कला (Basilar Membrane) में भी कम्पन होता है। इस तरह राइसनर तथा आधार कला के कम्पन से कोरटाई अंग की संवेदी कोशिकाएँ भी कम्मित हो उठती हैं। इन्हीं संवेदी कोशिकाओं से कम्पन प्रेरणाएं प्राप्त कर श्रवण तन्त्रिका मस्तिष्क को पहुंचाती हैं। जहाँ इन कम्पनों का विश्लेषण कर मनुष्य ध्वनि को सुनने व समझने में सक्षम हो पाता है।

प्रश्न 9. 
निम्न के बीच अंतर बताइए
(अ) आच्छादित और अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष 
(ब) हुमाक्ष्य और तंत्रिकाक्ष 
(स) शलाका और शंकु 
(द) घेलेमस और हाइपोथेलेमस 
(य) प्रमस्तिष्क और अनुमस्तिष्क।
उत्तर:
(अ) आच्छादित और अनाच्छादित तत्रिकाक्ष में अंतर (Differences between Myelinated Axon and Nonmyelinated Axon) 

आच्छादित तन्त्रिकाक्ष (Myelinated Axon)

अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष (Nonmyelinated Axon)

1. ऐसे न्यूरोन जिनमें मायलिन आवरण पाया जाता है उसे आच्छादित तन्निकाक्ष अथवा मेडयूलेटेड अथवा माइलिनेटेड न्यूरोन कहते हैं।

ऐसे न्यूरोन जिनमें मायलिन आवरण अनुपस्थित होता है उन्हें अनाच्छादित तन्त्रिकाक्ष अथवा नोनमेडयूलेटेड न्यूरोन कहते हैं।

2. इनका रंग सफेद होता है।

इनका रंग धूसर (Gray) होता है।

3. इसलिए में श्वेत न्यूरोन (White Neuron) भी कहते हैं।

इसलिए इन्हें धसर न्यरोन (Grav Neuron) भी कहते हैं।

4. तंत्रिकाक्ष (न्यूरोन) के चारों ओर श्वान कोशिकायें (Schwann Cells) पायी जाती हैं जो मायलिन आवरण (Mylin Sheath) बनाती हैं।

तन्त्रिकाक्ष (न्यूरोन) के चारों ओर श्वान कोशिकायें (Schwann Cells) पायी जाती हैं लेकिन मायलिन आवरण नहीं बनाती हैं।

5. आच्छादी तत्रिका तंतु मेस व कपाल तन्त्रिकाओं में पाये जाते हैं। 

जबकि अनाच्छादित तत्रिका तंतु सामान्यतः स्वायत्त तथा कायिक तत्रिका

6. यह अनाचादित तनिकाक्ष की तुलना में तत्रिका संचरण (Transmission) की गति बढ़ा देते हैं।

तन्त्र में पाये जाते हैं।


(ब) गुमाक्ष्य और तन्त्रिकाक्ष में अंतर (Differences between Dendrites and Axon) 

दुमाक्ष्य (Dendrites)

तन्त्रिकाक्ष (Axon)

1. कोशिकाय (Cyton) से कई शाखाएं निकलती हैं जिन्हें द्रुमाक्ष्य (Dendrites) कहते हैं।

कोशिकाकाय से केवल एक लम्बा प्रवर्ध निकलता है जिसे तन्त्रिकाक्ष (Axon) कहते हैं।

2. कम लम्बाई के पतले सूक्ष्म प्रवर्ध होते हैं।

जबकि ये द्रुमाक्ष्य की तुलना में आकार में बड़े व मोटे होते हैं।

3. द्रमाक्ष्य में निसेल न्यल (Nissal eranules) पायी जाती है। 

जबकि तन्तिकाक्ष में निसेल ग्रेन्यूल (Nissal granules) का अभाव होता है।

4. यह तन्त्रिका आवेग (Nerve impluse) को कोशिकाकाय (Cyton) की ओर लाते हैं।

जबकि तन्विकाक्ष तन्त्रिका आवेग (Nerve impluse) को कोशिकाकाय (Cyton) से दूर सिनेप्स पर अथवा तन्त्रिकीय पेशी संधि पर पहुंचाते हैं।

5. द्रुमाक्ष्य को अभिवाही (Afferent) प्रवर्ध कहा जाता है।

जबकि तंत्रिकाक्ष (Axon) को अपवाही (Efferent) प्रवर्ध कहा जाता है।

6. ये बाह्य वातावरणी उद्दीपनों (External stumuli) को ग्रहण कर आवेगों में परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं।

जबकि एक्सान (तनिकाय) में यह क्षमता नहीं होती है।


(स) शलाका और शंकु में अन्तर (Differences between Rods and Cones) 

शलाका (Rods)

शंकु (Cones)

1. ये आकार में पतली, लम्बी व बेलनाकार होती हैं।

शंकु छोटे व मोटे मुग्दाकार होते हैं।

2. शलाकाएं संख्या में अधिक होती हैं।

जबकि ये शलाकाओं की तुलना में कम होती हैं।

3. शलाकाओं में रोडोप्सीन (Rohdopsin) नामक वर्णक पाया जाता है।

जबकि शंक में आयोडोपिान (lodopsin) नामक वर्णक पाया जाता हैं।

4. यह रात्रि में व मंद प्रकाश में देखने में सहायक होती है।

शंकु तेज प्रकाश में विभिन्न रंगों को देखने में सहायक होती है।

5. इसे फोटोप्टिक दृष्टि (Photoptic Vision) कहते हैं।

इसे स्कोटोप्टिक दृष्टि (Scotoptic Vision) कहते हैं।

6. मनुष्य के नेत्र में 115 मिलियन शलाकाएँ पाई जाती हैं। 

जबकि मनुष्य के नेत्र में 6.5 मिलियन शंकु पाई जाती हैं।’

7. रेटिना के फोबिया सेन्ट्रालिस में शलाका कोशिकाएँ नहीं पायी जाती हैं।

फोबिया सेन्ट्रालिस में सिर्फ शंकु कोशिकाएँ पाई जाती हैं।

8. शलाका का लावण शलाका कोशिकाओं द्वारा होता है।

शंकु का निर्माण शंकु कोशिकाओं द्वारा होता है।

(द) थैलेमस और हाइपोथैलेमस में अंतर (Differences between Thalamus and Hypothalamus) 

थैलेमस (Thalamus)

हाइपोथैलेमस (Hypothalamus)

1. यह प्रमस्तिष्क से घिरा रहता है।

यह थैलेमस के आधार पर स्थित होता है।

2. इसमें डाइएनसिफैलॉन की पाय दीवारों के ऊपरी भाग आते हैं। यह धूसर द्रव्य से बने मोटे पिण्डों के रूप में होता है।

इसमें डाइएनसिफैलॉन की पार्श्व दीवारों का अधर भाग आता है।

3. इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के छोटे – छोटे समूह अर्थात् थैलमी केन्द्रक (Thalamic nuclei) होते हैं। यह चार मुख्य भागों में बंटा रहता है।

इसमें तन्त्रिका कोशिकाओं के लगभग एक दर्जन बड़े-बड़े केन्द्रक (Nuclei) होते हैं।

4. यह ताप, पीड़ा, स्पर्श, कम्पन, श्रवण, दृष्टि आदि संवेदी सूचनाओं के पुनः प्रसारण केन्द्र का काम करता है।

यह भूख, प्यास, परितृप्ति, क्रोध, निद्रा, उत्साह, भोग-विलास आदि

(य) प्रमस्तिष्क और अनुमस्तिष्क में अंतर (Differences between Cerebrum and Cerebellum)

प्रमस्तिष्क (Cerebrum)

अनुमस्तिष्क (Cerebellum)

1. यह अग्रमस्तिष्क का मुख्य भाग है।

यह पश्चमस्तिष्क का मुख्य भाग होता है।

2. यह दाएं – बाएँ प्रमस्तिष्क गोलाडौँ (Cerebral hemisphere) से बना होता है। ये परस्पर, कॉर्पस कैलोसम से बंधे रहते हैं।

यह दाएं-बाएँ दो अनुमस्तिष्क गोलार्ड (Cerebel-lar hemispheres) से बना होता है। ये परस्पर वर्मिस (Vermis) द्वारा जुड़े रहते हैं।

3. प्रमस्तिष्क गोलार्ड की गुहा पावं वेन्ट्रिकल (Lateral ventricle) कहलाती है।

यह ठोस होता है।

4. प्रमस्तिक बुद्धि, इच्छा शक्ति, ऐचिाक क्रियाओं, ज्ञान, स्मृति, वाणी, चिन्तन आदि का केन्द्र होता है।

अनुमस्तिष्क शरीर की भंगिमा (Posture) तथा सन्तुलन को बनाए रखता है। पेशीय क्रियाओं का समन्वय करता है।

प्रश्न 10. 
(अ) कर्ण का कौनसा भाग ध्वनि की पिच का निर्धारण करता है?
(ब) मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक विकसित भाग कौनसा है?
(स) केन्द्रीय तन्त्रिका तंत्र का कौनसा भाग मास्टर क्लॉक की तरह कार्य करता है?
उत्तर:
(अ) काँक्लिया 
(ब) प्रमस्तिष्क 
(स) हाइपोथेलेमस।

प्रश्न 11. 
कशेरुकी के नेत्र का वह भाग जहां से दूकतंत्रिका रेटिना से बाहर निकलती है, क्या कहलाता है?
(अ) फोबिया 
(ब) आइरिस 
(स) अंधबिंदु 
(द) ऑप्टिक काएज्मा (चाक्षुष काएमा)।
उत्तर:
(स) अंध बिंदु (Blind spot)।

प्रश्न 12. 
निम्न में भेद स्पष्ट कीजिए
(अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका
(ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण
(स) एक्विअस ह्यूमर ( नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्यूमर ( काचाभ द्रव)
(द) अंध बिंदु एवं पीत बिंदु। 
(य) कपालीय तन्त्रिकाएं एवं मेरु तन्त्रिकाएँ।
उत्तर:
(अ) संवेदी तन्त्रिका एवं प्रेरक तन्त्रिका में भेद (Differences between Sensory and Motor Nerves): 

संवेदी तन्धिका (Sensory Nerves)

प्रेरक तन्त्रिका (Motor Nerves)

1. ऐसी तन्त्रिकाएँ जो तस्विकीय आवेग को संवेदी अंगों से मस्तिष्क की ओर ले जाती हैं, उन्हें संवेदी तन्त्रिकाएँ कहते हैं। 

ऐसी तन्त्रिकाएं जो तन्त्रिकीय आवेग को मस्तिष्क से अथवा मेरुरज्णु से अपवाहक अंगों (Effector ograns) तक ले जाती हैं, उन्हें चालक या प्रेरक तन्त्रिकाएँ कहते हैं।

2. ये अभिवाही प्रकृति की होती हैं।

जबकि ये अपवाही प्रकृति की होती हैं।

3. ये एकधुवीय (Unipolar) होती हैं।

ये बहुध्रुवीय (multipolar) होती हैं।

4. उदा.- प्राण तत्रिकाएँ (Olfactory nerves)।

उदा.-अपचालक तबिकाएं (Abducens nerves)।

(ब) आच्छादित एवं अनाच्छादित तत्रिका तन्तु में आवेग संचरण में भेद (Differences between Conduction of Nerve Impulse in Myelinated and Non-myelinated Nerve Fibre):  

आच्छादित तत्रिका तन्तु में आवेग संचरण (Myelinated Nerve Fibre)

अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु में आवेग संचरण (Non-myelinated Nerve Fibre)

1. आच्छादित तन्विका तन्तु में आवेग का वेग अधिक होता है। 

जबकि अनाच्छादित तन्त्रिका तन्त में आवेग का वेग कम होता है।

2. आच्छादित तत्रिका तन्तु से तात्पर्य है कि यह माइलिन आवरण द्वारा आच्छादित होते हैं।

अनाच्छादित तन्त्रिका तन्तु से तात्पर्य है कि ये माइलिन आवरण द्वारा आच्छादित नहीं होते हैं।

(स) एक्विअस हमर ( नेत्रोद) एवं विट्रियस ह्यूमर (काचाभ द्रव) में भेद (Differences between Aqueous Humour and Vitreous Humour):

एक्विअस घूमर ( नेत्रोद) (Aqueous Humour)

विदियंस घूमर (काचाभ द्रव) (Vitreous Humour)

1. कार्निया व लेन्स के बीच के भाग को जलीय कक्ष (Aqueous Chamber) कहते हैं।

लैन्स व रेटीना (Retina) के बीच पाई जाने वाली गुहा को काचाभ द्रव कक्ष (Vitreous chamber) कहते हैं।

2. जलीय कक्ष (Aqueous Chamber) में एक जल के समान तरल पदार्थ पाया जाता है जिसे एक्विअस घूमर (Aqueous humour) कहते हैं।

काचाभ द्रव कक्ष (Vitreous Chamber) में जैली या एल्ब्यूमिन सदृश द्रव्य पाया जाता है जिसे काचाभ द्रव अथवा विट्रियस घूमर (Vitreous humour) कहते हैं।

3. इसका स्रावण सिलियरी काय द्वारा किया जाता है। 

इसका सावन रेटिना के द्वारा आँख के विकास के दौरान होता है।

4. यह लगातार रक्त द्वारा अवशोषित होकर पुनः प्रतिस्थापित होता रहता है।

यह अवशोषित या प्रतिस्थापित नहीं होता है।


(द) अंध बिंदु एवं पीत बिंदु में भेद (Differences between Blind Spot and Yellow Spot):

अंध बिंदु (Blind Spot)

पीत बिंदु (Yellow Spot)

1. रेटिना से दुक तन्निका (Optic nerve) के निकलने के स्थान को अंध बिंदु (Blind Spot) कहते हैं।

दृष्टि अक्ष पर स्थित रेटिना के भाग को पीत बिंद (Yellow Spot) कहते है।

2. इसमें शंकु (Cones) एवं शलाकाओं (Rodes) का अभाव होता है।

जबकि इसमें केवल शंकु (Cones) पाये जाते हैं।

3. इस पर कोई किसी प्रकार का प्रतिविम्ब नहीं बनता है।

इस पर सर्वाधिक स्पष्ट प्रतिबिम्ब का निर्माण होता है।

4. इसमें वर्णक नहीं पाये जाते हैं।

इसमें पीले वर्णक पाये जाते हैं।

5. यहाँ पर गर्त नहीं पाया जाता है।

यहाँ पर एक उभरा हुआ गर्त पाया जाता है जिसका मध्य बिन्दु फोबिया सेन्ट्रेलिस कहलाता है।

6. अंध बिन्दु पर नेत्र आवरण नहीं पाया जाता है।

पीत बिन्दु पर नेत्र आवरण पाया जाता है।

(य) कपालीय तन्त्रिकाएँ एवं मेरु तन्त्रिकाएँ में भेद (Differences between Cranial Nerves and Spinal Nerves):

कपालीय तन्त्रिकाएं (Cranial Nerves)

मेरु तन्त्रिकाएं (Spinal Nerves)

1. मस्तिष्क से निकलने वाली तन्त्रिकाओं को कपालीय तत्रिकाएँ (Cranial nerves) कहते हैं।

मेरुरज्जु से निकलने वाली तन्त्रिकाओं को मेरु तन्त्रिकाएँ (Spinal nerves) कहते हैं।

2. मनुष्य में 12 जोड़ी कपाल तन्त्रिकाएं पाई जाती हैं।

मनुष्य में 31 जोड़ी मेरु तन्त्रिकाएं पाई जाती हैं।

3. कपाल तन्त्रिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं:

  • संवेदी (Sensory)
  • प्रेरक (Motor)
  • मिश्रित (Mixed)

जबकि मेरु तन्त्रिकाएं केवल मिश्रित (Mixed) प्रकार की होती हैं।

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