Chapter 3 व्यावसायिक पर्यावरण

Textbook Questions and Answers

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
व्यापार वातावरण को परिभाषित करें।
उत्तर:
व्यापार वातावरण से तात्पर्य सभी व्यक्ति, संस्थान एवं अन्य शक्तियों की समग्रता से है जो व्यावसायिक उद्यम से बाहर हैं लेकिन इसके परिचालन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

प्रश्न 2. 
व्यापार वातावरण की समझ कैसे व्यापार के प्रदर्शन को बेहतर करने में सहायक होती है ?
उत्तर:
संगठन जो अपने व्यावसायिक वातावरण का सावधानीपूर्वक अध्ययन करते हैं और तदनुसार उपयुक्त योजनाओं और नीतियों को अपनाते हैं, वे लंबे समय में अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने में सक्षम होते हैं।

प्रश्न 3. 
उदाहरण देकर समझाएँ कि एक व्यापारिक फर्म व्यापार वातावरण का गठन करने वाले कई अंतर संबंधित कारकों के भीतर काम करती है।
उत्तर:
व्यावसायिक संगठन एक जटिल वातावरण में काम करते हैं जिसमें कई परस्पर और गतिशील स्थितियाँ होती हैं। उदाहरण के लिए ए बी सी लिमिटेड एक ऑटोमोबाइल कंपनी है। इसका प्रदर्शन निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है-
आर्थिक : वैश्विक मंदी।
सामाजिक : ग्राहकों के जीवन स्तर में सुधार के कारण लोगों की बदलती आदतें। 
तकनीकी : उन्नत प्रौद्योगिकी जो विनिर्माण में स्वचालन के लिए अग्रणी है।
कानूनी : ऑटोमोबाइल पर 28% GST लगाया गया।

प्रश्न 4. 
कृष्णा फर्निशर्स मार्ट ने वर्ष 1954 में अपना परिचालन शुरू किया। परिचालन में अपने मूल डिजाइन और दक्षता के कारण कृष्णा फर्निशर्स बाजार में अग्रणी साबित हुआ। उनके उत्पादों की बाजार में लगातार माँग थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने क्षेत्र में नए प्रवेशकों की वजह से अपनी बाजार हिस्सेदारी में कमी देखी। फर्म ने अपने परिचालनों की समीक्षा करने का फैसला किया। उन्होंने पाया कि प्रतिस्पर्धा को पूरा करने के लिए उन्हें बाजार के रुझानों का अध्ययन और विश्लेषण करने की आवश्यकता होगी और फिर उत्पादों को डिजाइन और विकसित करना होगा। कृष्णा फर्निशर्स मार्ट के संचालन पर कारोबारी माहौल में बदलाव के किन्हीं दो प्रभावों की सूची बनाएँ।
उत्तर:
कृष्णा फर्निशर्स स्मार्ट के संचालन पर कारोबारी माहौल में बदलाव के प्रभाव हैं :

  • बाजार उन्मुखीकरण 
  • बढ़ी हुई प्रतियोगिता एवं परिवर्तन के लिए आवश्यकता।

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
व्यावसायिक उद्यमों के लिए व्यापारिक वातावरण को समझना क्यों महत्त्वपूर्ण है ? टिप्पणी करें।
उत्तर:
व्यावसायिक उद्यमों के लिए व्यापारिक वातावरण को समझना क्यों महत्त्वपूर्ण है-
व्यावसायिक उद्यम का अपने पर्यावरण के तथ्य एवं शक्तियों के मध्य अस्तित्व है। वहीं यह सुरक्षित रहता है एवं इसका विकास होता है। अलग-अलग इकाइयाँ इन शक्तियों को बदलने अथवा इन पर नियन्त्रण के लिए या तो बहुत थोड़ा कुछ कर सकती हैं अथवा फिर कुछ नहीं कर सकती हैं। व्यावसायिक संस्थाएँ या तो इनके अनुरूप कार्य करें अथवा अपने आपको इनके अनुरूप ढाल लें। व्यवसाय के प्रबन्धक यदि पर्यावरण को भली-भाँति समझते हैं तो यह अपनी इकाइयों से बाहर की शक्तियों की न केवल पहचान एवं उनका मूल्यांकन कर सकेंगे बल्कि उनके प्रतिकार स्वरूप आचरण भी कर सकेंगे। यथार्थ में, पर्यावरण अनेक प्रकार के घटकों से मिलकर बनता है। इसमें होने वाला प्रत्येक परिवर्तन व्यावसायिक उद्यम को प्रभावित करता है। यह एक ऐसा ढाँचा तैयार करता है जिसके अन्तर्गत तथा जिसके नियमों का पालन करते हुए व्यावसायिक उद्यम को कार्य सम्पन्न करना होता है। इसके अभाव में व्यावसायिक उद्यमों की सफलता संदिग्ध ही बनी रहती है। अतः व्यावसायिक उद्यमों को सफलता की ओर अग्रसर होने के लिए अपने पर्यावरण को समझना अत्यन्त अनिवार्य है।

प्रश्न 2. 
निम्नलिखित की व्याख्या करें-
(क) उदारीकरण 
(ख) निजीकरण 
(ग) वैश्वीकरण।
उत्तर:
(क) उदारीकरण-उदारीकरण से तात्पर्य उन सभी क्रियाओं से है, जिनके द्वारा किसी देश के आर्थिक विकास एवं सुधार में बाधक आर्थिक नीतियों, नियमों एवं प्रशासकीय नियन्त्रणों को समाप्त या ढीला किया जाता है तथा आर्थिक विकास में सहायक नीतियों एवं नियमों को अपनाया जाता है।

(ख) निजीकरण-स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक उपक्रमों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया था परन्तु धीरे-धीरे यह महसूस किया गया कि यदि अर्थव्यवस्था में विकास की गति को तीव्र करना है तो निजीकरण को प्रोत्साहन देना होगा। फलतः सार्वजनिक उपक्रमों के महत्त्व को काफी सीमा तक कम किया गया तथा कई सार्वजनिक उपक्रमों को पूरी तरीके से अथवा आंशिक रूप से निजी उपक्रमों के हाथों में सौंप दिया गया है। इसी प्रयास को निजीकरण कहा जाता है।

(ग) वैश्वीकरण-वैश्वीकरण का अर्थ है-विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं का एकजुट हो जाना जिससे एक सम्मिलित वैश्विक अर्थव्यवस्था का उदय होगा। अन्य शब्दों में, वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाता है ताकि सम्पूर्ण विश्व में कर्मचारियों, व्यक्तियों, पूँजी, तकनीक, माल, संचार आदि का आवागमन सुलभ हो सके तथा सम्पूर्ण विश्व एक ही अर्थव्यवस्था एवं एक ही बाजार के रूप में कार्य कर सके।

प्रश्न 3. 
व्यवसाय और उद्योग पर सरकारी नीति परिवर्तन के प्रभाव की संक्षेप में चर्चा करें।
उत्तर:
सरकारी नीति के व्यवसाय एवं उद्योग पर प्रभाव-

  • भारतीय व्यावसायिक संस्थाओं के लिए प्रतियोगिता में वृद्धि हुई है। विशेष रूप से सेवा उद्योग में जैसे दूरसंचार, बैंक सेवा, बीमा सेवा इत्यादि।
  • ग्राहकों की उद्यमियों से अपेक्षाएँ अत्यधिक बढ़ गई हैं।
  • नयी तकनीक के कारण मशीन, प्रक्रिया उत्पाद एवं सेवाओं में सुधार सम्भव हआ है। तेजी से बदलता प्रौद्योगिक पर्यावरण छोटी फर्मों के सामने कठिन चुनौतियाँ पैदा करता है।
  • बाजार शक्तियों के अधिक उग्र होने के कारण उद्यमों को अपने प्रचालन में निरंतर संशोधन करना होगा।
  • मानव संसाधन के विकास की आवश्यकता अनुभव हुई है।
  • व्यावसायिक उद्यमी अब पहले बाजार का अध्ययन करते हैं तत्पश्चात् उसके अनुरूप ही वस्तुओं का उत्पादन करते हैं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने यह समझ लिया है कि यदि इन्हें अपने अस्तित्व में रहना है एवं विकास करना है तो उन्हें और कुशल होना होगा। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संसाधन जुटाने होंगे।

प्रश्न 4. 
राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय (एन.डी.एल.) केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक.पायलट परियोजना है। यह परियोजना एकल खिड़की सुविधा के माध्यम से शिक्षा संसाधनों के वर्चुअल भंडार के ढाँचे को विकसित करने की दिशा में काम करती है। यह शोधकर्ताओं सहित सभी शिक्षार्थियों को प्रत्येक स्तर पर निःशुल्क समर्थन प्रदान करती है। व्यापारिक वातावरण के संबंधित घटक की विवेचना करें।
उत्तर:
कारोबारी/व्यापारिक वातावरण पर प्रकाश डाला गया-
तकनीकी आयाम-‘यह एकल-खिड़की खोज सुविधा के साथ सीखने के संसाधनों के आभासी भंडार का एक ढाँचा विकसित करने की दिशा में काम करता है।’

सामाजिक आयाम-‘यह शोधकर्ताओं, जीवन भर सीखने वालों और विभिन्न प्रकार से सीखने वाले निःशुल्क सहित सभी शैक्षणिक स्तरों को सहायता प्रदान करता है।’

प्रश्न 5. 
ब्याज दरों, निजी संपत्ति और अचल – संपत्ति पर विमुद्रीकरण के प्रभाव की विवेचना करें।
उत्तर:
विमुद्रीकरण का प्रभाव:
ब्याज दर-नकद लेनदेन में गिरावट आई, बैंक जमा में वृद्धि हुई और वित्तीय बचत में वृद्धि हुई।
निजी संपत्ति-घोषित किया गया क्योंकि कुछ उच्च मूल्य वाले नोट वापस नहीं किए गए थे। 
अचल संपत्ति-संपत्ति की कीमतों में गिरावट आई। 

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
आप व्यापारिक वातावरण को कैसे परिभाषित करेंगे? उदाहरण के साथ, सामान्य और विशिष्ट वातावरण के बीच अंतर बताएँ।
उत्तर:
व्यावसायिक पर्यावरण से आशय- व्यावसायिक पर्यावरण से तात्पर्य सभी व्यक्ति, संस्थान एवं अन्य शक्तियों की समग्रता से है जो व्यावसायिक उद्यम से बाहर हैं, लेकिन इसके परिचालन को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

एक लेखक ने इसको इस प्रकार से प्रस्तुत किया है, “यदि संपूर्ण जगत को लें और उसमें से संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले उप-समूह को अलग कर दें तो, जो शेष रह जाता है वह पर्यावरण कहलाता है।”

अतः आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, तकनीकी एवं अन्य शक्तियाँ जो व्यवसाय से हटकर कार्य करती हैं, पर्यावरण के भाग हैं।

व्यावसायिक पर्यावरण की निम्न विशेषताएँ हैं-

  • बाह्य शक्तियों की समग्रता 
  • विशिष्ट एवं साधारण शक्तियाँ 
  • आंतरिक संबंध 
  • गतिशील प्रकृति 
  • अनिश्चितता 
  • जटिलता
  • तुलनात्मकता

विशिष्ट एवं साधारण पर्यावरण-
व्यावसायिक पर्यावरण को निम्न दो भागों में बाँटा जा सकता है-
1. विशिष्ट पर्यावरण-विशिष्ट पर्यावरण से तात्पर्य ऐसे पर्यावरण से है जिसके अन्तर्गत उन घटकों को सम्मिलित किया जाता है जिनसे व्यवसाय का नजदीकी सम्बन्ध होता है तथा ये घटक प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करते हैं। ये घटक इस प्रकार हैं-ग्राहक, निवेशक प्रतियोगी एवं आपूर्तिकर्ता इन्हें सूक्ष्म वातावरण या पर्यावरण के नाम से भी जाना जाता है।

2. साधारण पर्यावरण-साधारण पर्यावरण से तात्पर्य ऐसे वातावरण से है जिसके अन्तर्गत उन घटकों को सम्मिलित किया जाता है जिनका व्यवसाय के साथ दूर का सम्बन्ध होता है। इन घटकों की मुख्य विशेषता यह है कि वे एक ही समय पर लगभग सभी व्यावसायिक इकाइयों को प्रभावित करते हैं। ये घटक हैं राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी एवं विधिक। इन्हें समष्टि पर्यावरण घटकों के नाम से भी जाना जाता है।

प्रश्न 2. 
तर्क दीजिए कि एक व्यवसायी की सफलता अपने वातावरण से कैसे प्रभावित होती है ? 
उत्तर:
व्यवसायी की सफलता पर पर्यावरण का प्रभाव 
व्यावसायिक पर्यावरण गतिशील होता है। व्यावसायिक पर्यावरण में परिवर्तन अनिवार्य रूप से होता है। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि प्रबन्धक व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों के प्रति क्या नीति अपनाते हैं अर्थात् इन्हें महत्त्व देते हैं या नहीं। यदि प्रबन्धक चाहते हैं कि उनका व्यवसाय लम्बे समय तक चले तथा उसका द्रुत गति से विकास हो तो व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों को महत्त्व देना होगा। प्रबन्धकों के सामने यह भी चुनौती रहती है कि वे इन परिवर्तनों का सामना करने एवं उनसे लाभ उठाने के लिए क्या करें? इस सम्बन्ध में यह तर्क दिया जा सकता है कि प्रबन्धकों को व्यावसायिक पर्यावरण के विभिन्न घटकों का विश्लेषण करना चाहिए और उनसे प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर ही नियोजन किया जाना चाहिए।

सामान्यतया व्यावसायिक वातावरण के परिवर्तनों का विश्लेषण करने के लिए प्रबन्धक SWOT विश्लेषण की सहायता लेते हैं। यहाँ SWOT का अर्थ है-
S = Strengths (सुदृढ़ता या शक्तियाँ या गुण) 
W = Weaknesses (कमियाँ या अवगण) 
O = Opportunities (अवसर)
T = Threats (संकट या खतरे)

व्यावसायिक प्रबंधक व्यावसायिक पर्यावरण के महत्त्व एवं इसके संबंध में ज्ञान की निम्न बिन्दुओं के आधार पर विवेचना करते हैं-
1. संभावनाओं/अवसरों की पहचान करने एवं पहल करने के लाभ-यह सकारात्मक बाह्य रूझान अथवा परिवर्तन है जो किसी भी फर्म के परिचालन में सहायक होंगे। यदि अवसर की प्रारंभ में ही पहचान हो जाती है तो कोई भी व्यावसायिक कर्म अपने प्रतियोगियों से पहले ही इसका लाभ उठा सकती है।

2. खतरे की पहचान एवं समय से पहले चेतावनी में सहायक-यह बाह्य वातावरण एवं परिवर्तन है जो फर्म के परिचालन में बाधक होते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई भारतीय फर्म यह पाती है कि एक विदेशी बहुराष्ट्रीय इकाई भारतीय बाजार में कोई पूरक वस्तु लेकर आती है तो यह समय से पहले चेतावनी है।

3. उपयोगी संसाधनों का दोहन-पर्यावरण व्यवसाय संचालन के विभिन्न संसाधनों का स्रोत है। व्यावसायिक उद्यम किसी भी प्रकार की गतिविधियों में लिप्त हो वह अपने पर्यावरण से वित्त, मशीनें, कच्चा माल, बिजली एवं पानी आदि विभिन्न संसाधनों को जुटाते हैं जो इसके आगत हैं।

4. तीव्रता से हो रहे परिवर्तनों का सामना करना-परिवर्तन उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि इसकी गति । बाजार में उथल-पुथल, ब्रांड के प्रति कम आकर्षण, बाजार का वर्ग अथवा उपवर्गों में विभाजन, ग्राहकों की बढ़ती हुई माँगें, तकनीकी में तीव्रता से हो रहे परिवर्तन एवं उत्कृष्ट वैश्विक प्रतियोगिता का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए प्रबंधकों को पर्यावरण को समझना चाहिए एवं उसकी जाँच करनी चाहिए तथा उचित कार्यवाही विकसित करनी चाहिए।

5. नियोजन एवं नीति निर्धारण में सहायतापर्यावरण व्यावसायिक उद्यम के लिए अवसर भी है तथा खतरा भी। इसकी समझ एवं इसका विश्लेषण करके निर्णय लेने (नीति संबंधित) के लिए भविष्य के मार्ग निर्धारण (नियोजन) अथवा दिशा-निर्देश का आधार बन सका है। उदाहरण के लिए बाजार में नयी फर्मों के प्रवेश के कारण उद्यम विचार करेगा कि इस स्थिति से कैसे निपटा जाए।

6. निष्पादन में सुधार-अंत में पर्यावरण के संबंध में जानना इससे जुड़ा है कि क्या इसका उद्यम के परिचालन पर वास्तव में कोई प्रभाव पड़ेगा? हाँ इससे उद्यम के परिचालन में अंतर आएगा। उद्यम का भविष्य पर्यावरण में जो घटित हो रहा है उससे घनिष्टता से जुड़ा है। उद्यम वे होते हैं जो न केवल अपने वर्तमान निष्पादन में सुधार लाते हैं बल्कि बाजार में दीर्घकाल तक सफल रहते हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि व्यावसायिक पर्यावरण में व्यावसायिक संस्था के कार्य को प्रभावित करने की क्षमता है और जो उद्यम अपने को व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले परिवर्तन के अनुसार नहीं ढालते उन्हें बाजार छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है।

प्रश्न 3. 
व्यापार वातावरण के विभिन्न आयामों के बारे में उदाहरण सहित बताएँ।
उत्तर:
व्यावसायिक पर्यावरण के विभिन्न आयाम 
व्यावसायिक पर्यावरण के आयाम अथवा समष्टि पर्यावरण के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं-
1. राजनैतिक पर्यावरण-राजनैतिक पर्यावरण में देश में सामान्य स्थिरता एवं शांति तथा चुनी गई सरकार के प्रतिनिधियों का व्यवसाय के प्रति विशिष्ट दृष्टिकोण जैसी राजनैतिक परिस्थितियाँ सम्मिलित हैं। राजनैतिक स्थिरता देश की अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घ-अवधि परियोजनाओं में निवेश के लिए व्यवसायियों में आत्मविश्वास पैदा करती है। राजनैतिक अस्थिरता इस विश्वास को खण्डित कर सकती है। इसी प्रकार से सरकारी अधिकारियों का व्यवसाय के प्रति दृष्टिकोण का व्यवसाय पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

2. आर्थिक पर्यावरण-व्यावसायिक पर्यावरण के विभिन्न घटकों या तत्त्वों में आर्थिक वाताव का भी विशेष महत्त्व है। ब्याज की दर, मूल्य वृद्धि दर, लोगों की खर्च करने योग्य आय में परिवर्तन, शेयर बाजार सूचकांक एवं रुपये का मूल्य साधारण पर्यावरण अर्थात् समष्टि पर्यावरण के कुछ आर्थिक तत्त्व हैं जो व्यावसायिक उद्यम में प्रबन्ध के कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं। लघु अवधि एवं दीर्घ अवधि के लिए ब्याज की दर उत्पाद एवं सेवाओं की माँग को प्रभावी ढंग से प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए निर्माण का कार्य कर रही कम्पनियों तथा ऑटोमोबाइल विनिर्माता में नीचे दीर्घ अवधि की दरें अधिक लाभप्रद हैं क्योंकि इससे उपभोक्ताओं द्वारा घर एवं वाहन खरीदने के लिए, ऋण लेकर व्यय में वृद्धि हो रही है। इसी प्रकार देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के कारण लोगों की आय में वृद्धि होती है जिससे वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है। उच्च दर की मूल्य वृद्धि का सामान्यतः व्यावसायिक उद्यमों पर दबाव पड़ता है क्योंकि इससे व्यवसाय की विभिन्न लागतों में वृद्धि होती है जैसे कच्चा माल, मशीनें, कर्मचारियों की मजदूरी आदि।

3. सामाजिक पर्यावरण-सामाजिक पर्यावरण में सामाजिक शक्तियाँ सम्मिलित हैं, जैसे-रीति-रिवाज, मूल्य, सामाजिक बदलाव, व्यवसाय से समाज की अपेक्षाएँ आदि। उदाहरण के लिए भारत में दीपावली, होली, ईद, क्रिसमिस, गुरुपर्व जैसे त्यौहारों का मनाना कई कम्पनियों, मिठाई की दुकानों, दर्जी एवं अन्य सम्बद्ध व्यवसायों को सार्थक वित्तीय अवसर प्रदान करता है।

भारत में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, सामाजिक न्याय, समान अवसर एवं राष्ट्रीय एकता प्रमुख मूल्यों के उदाहरण हैं जिन्हें हम सभी सँजोकर रखना चाहते हैं। व्यवसाय के सन्दर्भ में यह मूल्य बाजार में चयन की छूट, समाज के प्रति व्यवसाय के उत्तरदायित्व एवं रोजगार के समान अवसरों को जन्म देते हैं। सामाजिक बदलाव से व्यवसाय को विभिन्न अवसर मिलते हैं एवं खतरे होते हैं। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य एवं फिटनेस शहरी लोगों में लोकप्रिय हो रहा है। इससे जैविक खाद्य पदार्थ, डायट पेय पदार्थ, जिम, मिनरल वाटर एवं भोजन के पूरक जैसे पदार्थों की माँग पैदा हो गई है।

4. विधिक पर्यावरण-इसमें सरकार द्वारा पारित विभिन्न विधेयक, सरकारी अधिकारियों द्वारा जारी प्रशासनिक आदेश, न्यायालयों के फैसले, राज्य अथवा स्थानीय प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर नियुक्ति, विभिन्न कमीशन एवं एजेन्सियों के निर्णय सम्मिलित हैं। प्रबन्ध के लिए देश के कानून का पालन करना अनिवार्य है। इसीलिए व्यवसाय के श्रेष्ठ परिचालन के लिए सरकार द्वारा पास किये गये नियमों का पर्याप्त ज्ञान अपेक्षित है, कानूनों का पालन नहीं करने पर व्यावसायिक संस्थाएँ मुसीबत में फंस सकती हैं। विधिक पर्यावरण के प्रभाव को उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए सरकारी नियमों के उदाहरण से समझाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सिगरेट के विज्ञापन में तथा इनके डिब्बों पर संवैधानिक चेतावनी “सिगरेट का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।”

5. प्रौद्योगिकीय पर्यावरण इसमें वैज्ञानिक एवं नवीनता से जुड़ी वे शक्तियाँ सम्मिलित हैं जो कि वस्तु एवं सेवाओं के उत्पादन के नये तरीके तथा व्यवसाय परिचालन की नयी पद्धतियाँ एवं तकनीक उपलब्ध कराती हैं। उदाहरण के लिए वर्तमान में कम्प्यूटर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स में प्रौद्योगिकीय प्रगति ने कंपनियों द्वारा अपने उत्पादों के विज्ञापन के तरीकों को बदल दिया गया है।

प्रश्न 4. 
भारत सरकार ने 8 नवंबर, 2016 को विमुद्रीकरण की घोषणा की जिसके परिणामस्वरूप उसी आधी रात में ₹ 500 और ₹ 1,000 के नोट बैध मुद्रा नहीं रह गए। घोषणा के बाद भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ₹ 500 और ₹ 2,000 मूल्य के नए मुद्रा नोट जारी किए गए। इस कदम के परिणामस्वरूप प्वाइंट ऑफ सेल मशीन, ई-वेल्ट्स, डिजिटल कैश और कैशलेस लेन-देन के अन्य तरीकों के बारे में जागरूकता में काफी वृद्धि हुई। इसके अलावा मौद्रिक लेन-देन और प्रकटीकरण में पारदर्शिता में वृद्धि के कारण कर संग्रह के रूप में सरकारी राजस्व में वृद्धि हुई।
(क) उपरोक्त संदर्भ में व्यापारिक पर्यावरण के आयामों का आकलन करें।
(ख) विमुद्रीकरण की विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
ऊपर दिए गए व्यापारिक पर्यावरण के आयाम अग्र हैं : 

  • राजनैतिक आयाम-‘भारत सरकार ने 8 नवंबर, 2016 की आधी रात से ₹ 500 और ₹ 1000 के नोटों के विमुद्रीकरण की घोषणा की।”
  • कानूनी आयाम-‘नतीजतन, मौजूदा ₹ 500 और ₹ 1,000 के पुराने नोट उस तारीख से अवैध हो गए।’
  • प्रौद्योगिकी आयाम-‘पॉइंट ऑफ सेल मशीनों, ई-वॉलेट्स, डिजिटल कैश और कैशलेस लेनदेन के अन्य तरीकों के बारे में जागरूकता बढ़ने के कारण इस कदम में पर्याप्त वृद्धि हुई।’

विमुद्रीकरण-विमुद्रीकरण भ्रष्टाचार को रोकता है, आतंकी गतिविधियों हेतु प्रयुक्त होने वाले उच्च मूल्य वर्ग के नकली नोटों को रोकता है तथा विशेष रूप से काले धन के संचय को रोकता है जो आय द्वारा बनाई गई है एवं अधिकारियों के समक्ष घोषित नहीं की गई है। 

  • कर प्रशासन का माप-काला धन धारकों कों अपनी गैर-अभिलेखित संपत्ति की घोषणा करनी थी और जुर्माने की दर से कर भुगतान करना था।
  • कर अपवंचन से बचने के उपाय-यह संकेत देना कि सरकार कर चोरी को स्वीकार नहीं करेगी।
  • वित्तीय प्रणाली में बचत को मापने का उपाय-बैंकों में पैसा जमा करके।
  • वित्तीय बचत बढाने और कर चोरी को कम करने के लिए-‘कैश-लेस’ या ‘कैश-लाइट’ अर्थव्यवस्था बनाये।

प्रश्न 5. 
औद्योगिक नीति, 1991 के तहत सरकार द्वारा कौन-से आर्थिक परिवर्तन शुरू किए गए थे? व्यापार और उद्योग पर इनका क्या प्रभाव रहा?
उत्तर:
सन् 1991 की औद्योगिक नीति के अन्तर्गत सरकार ने आर्थिक सुधारों के अंग के रूप में निम्नलिखित आर्थिक परिवर्तन प्रारम्भ किये-

  • सरकार ने अनिवार्य लाइसेन्सिंग के वर्ग में उद्योगों की संख्या घटाकर 6 कर दी।
  • कई सार्वजनिक क्षेत्र के लिये निश्चित उद्योगों को मुक्त कर दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को सामरिक महत्त्व के चार उद्योगों तक ‘सीमित कर दिया गया।
  • विनिवेश को कई सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक उद्यमों में लागू कर दिया गया।
  • विदेशी पूँजी की नीति को उदार बनाया गया। कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को 100 प्रतिशत की छूट दे दी गई।
  • विदेशी कम्पनियों के साथ प्रौद्योगिकी समझौतों के लिए स्वचल की छूट दे दी गई।
  • भारत में विदेशी निवेश के प्रवर्तन एवं उसके प्रचालन के लिए विदेशी निवेश प्रवर्तन बोर्ड एफ. आई. पी. बी. की स्थापना की गई।
  • बड़े औद्योगिक घरानों की औद्योगिक इकाइयों के विकास एवं विस्तार के रास्ते की रुकावटों को दूर करने के लिये उपयुक्त कदम उठाये गये।
  • लघु उद्योगों को विभिन्न प्रकार की सहायता का आश्वासन दिया गया।

सार रूप में, नई औद्योगिक नीति लाइसेंस प्रणाली के बंधन से उद्योगों को मुक्त करना चाहती थी (उदारीकरण), सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को बड़ी मात्रा में कम करना चाहती थी (निजीकरण) तथा भारत के औद्योगिक विकास में विदेशी निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन देना चाहती है (वैश्वीकरण)।

सन् 1991 की औद्योगिक नीति के अन्तर्गत सरकार ने उपर्युक्त जो आर्थिक परिवर्तन शुरू किये उनका व्यवसाय एवं उद्योग की व्यावसायिक इकाइयों के कार्यों पर समुचित प्रभाव पड़ा है। सरकार की नीतियों में परिवर्तन के कारण भारतीय निगमित क्षेत्र के सामने निम्न आर्थिक चुनौतियाँ आ गई हैं-

  • भारतीय व्यावसायिक संस्थाओं के लिए विदेशी संस्थाओं से प्रतिस्पर्धा में वृद्धि हुई है विशेष रूप से सेवा उद्योग जैसे दूर संचार, हवाई सेवा, बैंक सेवा, बीमा इत्यादि।
  • आज बाजार में बढ़ी हुई प्रतियोगिता ग्राहकों को श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली वस्तु एवं सेवाओं के खरीदने में बहुत अधिक चयन के अवसर प्रदान करती है।
  • प्रतियोगिता में वृद्धि फर्मों को बाजार में टिके रहने एवं बढ़ने के नये-नये तरीकों के विकास के लिए बाध्य करती है। नयी तकनीक के कारण मशीन, प्रक्रिया उत्पाद एवं सेवाओं में सुधार सम्भव हुआ है।
  • सन् 1991 के पश्चात् बाजार शक्तियाँ उग्र हो गई हैं, परिणामस्वरूप उद्यमों को अपने प्रचालन में निरन्तर संशोधन करना होगा।
  • भारतीय उद्यम अपर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारियों के कारण लम्बे समय से हानि उठा रहा है। इसलिए मानव संसाधनों के विकास की आवश्यकता है।
  • अब व्यावसायिक इकाइयाँ पहले बाजार का अध्ययन करती हैं और उसके अनुरूप ही वस्तुओं का उत्पादन करती हैं।
  • अब सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ने यह समझ लिया कि यदि इन्हें अस्तित्व में रहना है एवं विकास करना है तो उन्हें और अधिक कुशल होना होगा तथा इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपने संसाधन जुटाने होंगे।

प्रश्न 6. 
निम्नलिखित की आवश्यक विशेषताएँ क्या हैं-
(क) उदारीकरण 
(ख) निजीकरण 
(ग) वैश्वीकरण।
उत्तर:
(क) उदारीकरण के लक्षणउदारीकरण के मुख्य लक्षण निम्नलिखित गिनाये जा सकते हैं-

  • अधिकांश उद्योगों में लाइसेंस की आवश्यकता को समाप्त करना।
  • व्यावसायिक कार्यों के पैमाने के सम्बन्ध में निर्णय लेने की स्वतन्त्रता होती है।
  • वस्तु एवं सेवाओं के स्थानान्तरण में प्रतिबन्ध हटा लिये जाते हैं।
  • वस्तु एवं सेवाओं के मूल्यों के निर्धारण की स्वतन्त्रता रहती है।
  • करों की दरों में कमी की नीति अपनायी जाती है तथा अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक प्रतिबन्ध हटा लिये जाते हैं।
  • आयात एवं निर्यात प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाता है। ,
  • भारत में विदेशी पूँजी तथा प्रौद्योगिकी को आकर्षित करने का प्रयत्न किया जाता है।

(ख) निजीकरण के लक्षण-निजीकरण के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित बतलाये जा सकते हैं-

  • निजीकरण में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित उद्योगों में से अधिक से अधिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया जाता है।
  • वर्तमान सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को पूरी तरह या उसके एक हिस्से को निजी क्षेत्र को बेच दिया जाता है।
  • निजीकरण की आवश्यकता मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के अकुशल होने के कारण ही होती है।
  • निजीकरण के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था की कुशलता में वृद्धि होती है, प्रतियोगिता बढ़ती है तथा उत्पादन की गुणवत्ता तथा विविधता में वृद्धि होती है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का स्वामित्व एवं प्रबन्ध सरकार के स्थान पर निजी क्षेत्र का होने लगता है।
  • निजीकरण की स्थिति में देश के कुल निवेश में निजी क्षेत्र के निवेश का भाग अधिक होता है।
  • निजीकरण की दशा में उद्योग-धन्धों में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं के बराबर होता है।

(ग) वैश्वीकरण के लक्षण-वैश्वीकरण के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित बतलाये जा सकते हैं-

  • वैश्वीकरण में एक देश की अर्थव्यवस्था का अन्य देशों की अर्थव्यवस्था से जुड़ाव रहता है। 
  • वैश्वीकरण में सभी राष्ट्रों के बीच माल एवं सेवाओं का स्वतन्त्र प्रवाह होता है तथा स्वतन्त्र व्यापार की बाधाओं को समाप्त किया जाता है। 
  • सभी राष्ट्रों के बीच पूँजी एवं तकनीक का स्वतन्त्र प्रवाह बना रहता है।
  • सम्पूर्ण विश्व में कर्मचारियों, व्यक्तियों, पूँजी, तकनीक, माल, संचार आदि का आवागमन सुलभ होता
  • सम्पूर्ण विश्व एक ही अर्थव्यवस्था एवं एक ही बाजार के रूप में कार्य करता है।
  • वैश्वीकरण में व्यावसायिक संस्थाओं का आकार बहुत बड़ा रहता है; क्योंकि व्यावसायिक क्षेत्र कुछ ही देश नहीं होकर अनेक देश होते हैं।
  • वैश्वीकरण की स्थिति में देश में उत्पादन क्षमता का निर्धारण केवल बाजार शक्तियों के द्वारा ही होता है।
  • वैश्वीकरण में स्वदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों का विकास होता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर सरकारी नियन्त्रण कम रहता है तथा आयातों और निर्यातों से सम्बन्धित उदार नीति अपनायी जाती है।
  • वैश्वीकरण में विदेशी निवेश पर से प्रतिबन्ध हटाया जाता है तथा उसे आकर्षित करने के लिए सरकार द्वारा कई प्रकार की रियायतें दी जाती हैं।
  • सरकारी नीति विदेशी पूँजी प्रवाह पर से प्रतिबन्धों को कम करने तथा विदेशी बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं की स्थापना के लिए अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।

Chapter 3 व्यावसायिक पर्यावरण