Chapter 4 मानो हि महतां धनम्

Textbook Questions and Answers

प्रश्न: 1. 
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तरं संस्कृतेन देयम् 
(क) ‘मानो हि महतां धनम्’ इत्ययं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् संकलितः ? 
उत्तरम् : 
‘मानो हि महतां धनम्’ इत्ययं पाठः महाभारत ग्रन्थात् संकलितः। 

(ख) विदुरा कुत्र विश्रुता आसी?
उत्तरम् : 
विदुरा राजसंसत्सु विश्रुता आसीत्। 

(ग) विदुरायाः पुत्रः केन पराजितः अभवत् ? 
उत्तरम् : विदुरायाः पुत्रः सिन्धुराजेन पराजितः अभवत्। 

(घ) कः स्त्री पुमान् वा न भवति? 
उत्तरम् : 
मानवाः यस्य महदद्भुतम् वृत्तं न जल्पन्ति यश्च राशिवर्धनमात्रं सः नैव स्त्री न पुनः पुमान् भवति। 

(ङ) कः अमात्यानां हर्ष न आदधाति ? 
उत्तरम् : 
यः आत्मनः प्रियसुखं न जहाति सः अमात्यानां हर्षं न आदधाति। 

(च) अपुत्रया मात्रा किं आभरणकृत्यं न भवति? 
उत्तरम् : 
अपुत्रया मात्रा पुत्रोपेक्षणम् आभरणकृत्यं न भवति। 

(छ) कस्य जीवितम् अर्थवत् भवति? 
उत्तरम् : 
यं आश्रित्य सर्वभूतानि जीवन्ति, तस्य जीवितम् अर्थवत्। 

प्रश्न: 2. 
‘यः आत्मन:… अचिरेण सः’ अस्य श्लोकस्य आशयं हिन्दी भाषया स्पष्टी कुरुत। 
उत्तरम् : 
हिन्दी भाषा में आशय-इस श्लोक का आशय यह है कि जो व्यक्ति अपनी सुख-सुविधा को त्याग कर सफलता अथवा समृद्धि की आशा करता है ऐसा व्यक्ति शीघ्र ही अपने मंत्रियों की प्रसन्नता की वृद्धि करता है। भाव यह है कि त्याग के बिना सफलता संभव नहीं है। 

प्रश्न: 3. 
रिक्तस्थानम् पूर्तिः विधेया – 
(क) विदुरा ओरसपुत्र …………….। 
उत्तरम् : 
विदुरा ओरसपुत्रं जगहें। 

(ख) हे कापुरुष …………………… मा शेष्व। 
उत्तरम् : 
हे कापुरुष एवं पराजितः मा शेष्व। 

(ग) त्वत्कृते स्वयमेव मग्नं ………………….. उद्भावय। 
उत्तरम् :
त्वत्कृते स्वयमेव मग्नं कुलम् उद्भावय। 

(घ) यः प्रियसुखे. श्रियम् मृगयते। 
उत्तरम् : 
यः प्रियसुखे हित्वा श्रियम् मृगयते। 

(ङ) मामपश्यन्त्याः… अपि सर्वथा किम्? 
उत्तरम् : 
मामपश्यन्त्याः पृथिव्या अपि सर्वथा किम्? 

(च) सर्वभूतानि…………. यमाजीवन्ति। 
उत्तरम् : 
सर्वभूतानि संजय यमाजीवन्ति। 

(छ) स यथावत् …………….. चकार। 
उत्तरम् : 
स यथावत् अनुशासनं तथा तत् सर्वं चकार। 

प्रश्न: 4. 
अधोलिखितानां शब्दानां विलोमान् लिखत विश्रुता, सत्या, अधर्मज्ञम्, अमित्रान्, कापुरुषः, अचिरेण, आसाद्य। 
उत्तरम् :  
शब्दाः – विलोम शब्दाः

  • विश्रुता = अविश्रुता
  • सत्या = असत्या
  • अधर्मज्ञम् = धर्मज्ञम्
  • अमित्रान् = मित्रान् 
  • कापुरुषः = वीरपुरुषः
  • अचिरेण = चिरेण
  • आसाद्य = अनासाद्य 

प्रश्नः 5.
पञ्चभिः वाक्यैः विदुरायाः चरित्रम् वर्णयत् 
उत्तरम् :  

  1. विदुरा क्षात्रधर्मरता आसीत्। 
  2. सा दीर्घदर्शिनी श्रुतवाक्या चासीत्।
  3. सा राजसंसत्सु विश्रुता आसीत्। 
  4. सा बहुश्रुता आसीत्। 
  5. सा सत्यवादिनी आसीत्। 

प्रश्नः 6. 
यमाजीवन्तिः ………………………………… जीवितमर्थवत्-अस्य श्लोकस्य अन्वयं लिखत। 
उत्तरम् : 
अन्वयः – सञ्जय! सर्वभूतानि यम् पुरुषम् पक्वम् द्रुमम् इव आसाद्य आजीवन्ति तस्य जीवितम् अर्थवत्।

प्रश्नः 7. 
अधोलिखितपदानां संस्कृत वाक्येषु प्रयोगं कुरुत विश्रुता, शयानम्, द्विषताम्, गतिम्, पक्वम्, क्षिप्तः। 
उत्तरम् : 

  1. विश्रुता-विदुरा राजसभासु विश्रुता आसीत्। 
  2. शयानम्-सा शयानम् पुत्रं निनिन्द। 
  3. द्विषताम्-रामः द्विषताम् हर्षवर्धनः आसीत्। 
  4. गतिम्-भाग्यस्य गतिं कोऽपि न जानाति। 
  5. पक्वम्-पक्वं फलं खादेत्। 
  6. क्षिप्त:-धनुषा क्षिप्तः अयं शरः। 

Important Questions and Answers

संस्कृतभाषया उत्तरम् दीयताम् – 

प्रश्न: 1. 
महतां किं धनम्? 
उत्तरम् : 
मानो हि महतां धनमस्ति। 

प्रश्नः 2. 
क्षात्रधर्मरता का आसीत? 
उत्तरम् : 
क्षात्रधर्मरता विदुरा आसीत्। 

प्रश्न: 3. 
विदुरा कं जगहे? 
उत्तरम् : 
विदुरा ओरसपुत्रं जगहें । 

प्रश्न: 4.
द्विषतां हर्षवर्धनम् कः आसीत्? 
उत्तरम् : 
द्विषतां हर्षवर्धनम् विदुरायः पुत्र आसीत् । 

प्रश्न: 5. 
विदुरा स्वपुत्रं किं उक्तवती?
उत्तरम् : 
विदुरा स्वपुत्रं उक्तवती-‘हे कापुरुष! उत्तिष्ठ एवं पराजितः मा शेष्व।’ 

प्रश्नः 6. 
विदुरयानुसारेण कः लोके कीर्तिं लभते? 
उत्तरम् : 
विदुरयानुसारेण यः मानवः स्वबाहुबलमाश्रित्य अभ्युज्जीवति सः लोके कीर्तिं लभते। 

प्रश्नः 7. 
वाक्यसायकैः प्रणुन्नः सः किमिव क्षिप्तः? 
उत्तरम् : 
वाक्यसायकैः प्रणुन्नः सः सदश्व इव क्षिप्तः। 

प्रश्न: 8. 
‘मानो हि महतां धनम्’ पाठे विदुरया स्वपुत्राय किं उपदिष्टम? 
उत्तरम् :
‘मानो हि महतां धनम्’ पाठे विदुरया स्वपुत्राय कायरतां विहाय स्व स्वाभिमानं पुनः प्राप्तुं उपदिष्टम्। 

प्रश्न: 9.
परत्र शुभां गतिं कः लभते? 
उत्तरम् : 
यः स्वबाहुबलमाश्रित्य अभ्युज्जीवति परत्र सः शुभां गतिं प्राप्नोति।

प्रश्न: 10. 
विदुरायाः पुत्रस्य किं नाम आसीत्? 
उत्तरम् : 
विदुरायाः पुत्रस्य सञ्जयः नाम आसीत्। 

प्रश्न: 11. 
दीर्घदर्शिनी श्रुतवाक्या का आसीत्? 
उत्तरम् : 
दीर्घदर्शिनी श्रुतवाक्या विदुरा आसीत्। 

प्रश्न: 12. 
निर्मानो बन्धुशोकदः कस्य विशेषणे स्तः? 
उत्तरम् : 
निर्मानो बन्धुशोकदः सञ्जयस्य विशेषणे स्तः।

 Summary and Translation in Hindi

पद्यांशों का अन्वय, सप्रसङ्ग हिन्दी-अनुवाद/व्याख्या एवं सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या कुन्ती उवाच – 

1. क्षात्रधर्मरता …………………………………… बहश्रुता॥1॥ 

अन्वयः – क्षात्रधर्मरता, दीर्घदर्शिनी, राज संसत्सु विश्रुता श्रुतवाक्या, बहुश्रुता विदुरा धन्या॥ 

कठिन-शब्दार्थ :

  • क्षात्रधर्मरता = क्षत्रिय धर्म में लीन। 
  • दीर्घदर्शिनी = भविष्य का चिन्तन करने वाली। 
  • विश्रुता = प्रसिद्ध।
  • राजसंसत्सु = राज्य सभाओं में। 
  • श्रुतवाक्या = न्याय पारंगत, निपुण। 
  • बहुश्रुता = विदुषी। 

प्रसंग – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती’ के प्रथम भाग के ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। मूलतः यह पाठ महर्षि वेदव्यास विरचित ‘महाभारत’ नामक ग्रन्थ के उद्योग-पर्व से संकलित किया गया है। इसमें कुन्ती द्वारा विदुरा के चारित्रिक वैशिष्ट्य पर प्रकाश डाला गया है- 

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – कुन्ती ने कहा-क्षात्र धर्म का पालन करने वाली, भविष्य के संदर्भ में चिन्तन-मनन करने वाली, राज्य सभाओं में प्रसिद्ध, न्याय पारंगत अथवा निपुण विदुषी विदुरा धन्य है। 

विशेष – यहाँ विदुरा की चारित्रिक विशेषताओं को दर्शाया गया है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्गः – प्रस्तुत श्लोकः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘शाश्वती’ प्रथम भागस्य ‘मानो हि महतां धनम्’ इतिशीर्षक पाठाद् उद्धृतः। मूलरूपेण अयं पाठः महाभारतस्य उद्योगपर्वात् संकलितः। अस्मिन् श्लोके विदुरायाः चरित्र विषये कुन्त्या निगदितम् 

संस्कृत-व्याख्या – क्षात्रधर्मरता = क्षात्रस्य धर्मः, क्षात्रधर्मः तस्मिन् रता = क्षात्रधर्मरता = क्षात्रधर्म तल्लीना, दीर्घदर्शिनी = दीर्घ द्रष्टुम् शीलं यस्याः सा = भविष्यस्य चिन्तनकत्री, राजसंसत्सु = राज्ञः संसत्सु = राजसभासु, विश्रुता = प्रसिद्धा, बहुश्रुता = बहुश्रुतं यस्या सा = विदुषी, श्रुतवाक्या = श्रुतानि वाक्यानि यया सा, न्यायप्रवीणा, धन्या = धन्यवादार्हा, विदुरा = एतन्नाम्नी क्षत्रिया आसीत्।। 

विशेषः –

  1. अस्मिन् श्लोके विदुरायाः चारित्रिक विशेषताः प्रस्तुता। 
  2. अस्मिन् पद्ये अनुष्टुप् छन्द वर्तते। 
  3. व्याकरणात्मक – टिप्पणी-क्षात्रधर्मरता-क्षत्रियाणां धर्मरता या सा (बहुव्रीहि समास)। विश्रुता-वि + श्रु + क्त + टाप्। श्रुतवाक्या-श्रुतं वाक्यं येन सा (बहुव्रीहि)। राजसंसत्सु-राज्ञां संसत्सु (ष. तत्पु.)। 

2. विदुरा नाम वै सत्या ………………………………………………… द्विषतां हर्षवर्धनम्॥ 

अन्वयः – विदुरा नाम सत्या सिन्धुराजेन निर्जितम् शयानम् दीनचेतसम् अनन्दनम् अधर्मज्ञम् द्विषतां हर्षवर्धनम् औरसं पुत्रं जगहें।। 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • सत्या = सत्य भाषण करने वाली। 
  • निर्जितम् = पराजित, हारे हुये। 
  • शयानम् = लेटे हुये, शयन करते हुये। 
  • दीनचेतसम् = उदास हृदय वाले। 
  • अनन्दनम् = दूसरों को अप्रसन्न करने वाले। 
  • अधर्मज्ञम् = धर्म को न जानने वाले।
  • द्विषताम् = शत्रुओं के। 
  • हर्षवर्धनम् = हर्ष को बढ़ाने वाले। 
  • औरसम् = सगे (बेटे) की। 
  • जगहें = निन्दा की। 

प्रसंग – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती’ के प्रथम भाग के ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। इसमें विदुरा द्वारा अपने पुत्र की निन्दा का वर्णन किया गया है – 

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – निश्चय ही विदुरा नाम वाली, सत्य भाषण करने वाली माता ने सिन्धुराज से पराजित, सोते हुये, उदास मन वाले, दूसरों को अप्रसन्न करने वाले, धर्म को न जानने वाले, शत्रुओं को प्रसन्न करने वाले अपने पुत्र की निन्दा की। 

विशेष – यहाँ विदुरा के क्षात्रधर्म, सत्यवादिता एवं कर्त्तव्यनिष्ठा को दर्शाया गया है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या – 

प्रसङ्गः – श्लोकोऽयं अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘मानो हि महतां धनम्’ इति पाठात् उद्धृतः। मूलतः अयं पाठः महर्षिः वेदव्यास विरचितस्य ‘महाभारत’ ग्रन्थस्य उद्योगपर्वतः संकलितोऽस्ति। अस्मिन् श्लोके विदुरया स्वकीयपुत्रस्य निन्दायाः वर्णनं कृतम् 

संस्कृत-व्याख्या – वै = निश्चयमेव, विदुरा नाम = विदुरानाम्नी सत्या = सत्यवादिनी, सिन्धुराजेन = सिन्धुदेशस्य राज्ञा, निर्जितम् = पराजितम्, शयानम् = स्वपन्तम्, दीनचेतसम् = खिन्न हृदयम्, अनन्दनम् = असुखदम्, अधर्मज्ञम् = न धर्मविदम्, द्विषताम् = शत्रूणाम्, हर्षवर्धनम् = प्रसन्नतां संवर्धकम्, औरसं पुत्रम् = स्वकीयं पुत्रम्, जगहें = अनिन्दत्, निन्दा कृतवान्॥ 

व्याकरणात्मक-टिप्पणी – 

(i) निर्जितम्-निर् + जि + क्त। शयानम्-शीङ् + शानच्। दीनचेतसम्-दीनं चेतः यस्य स (ब. व्री.)। अधर्मज्ञम्-न धर्मं जानाति (नञ् तत्पु.)। हर्षवर्धनम्-हर्ष वर्धयति तम्। 
(ii) अस्मिन् श्लोके अनुष्टुप् छन्दः। 

3. उत्तिष्ठ हे कापुरुष …………………………………. बन्धु शोकदः॥ .

अन्वयः – हे कापुरुष ! सर्वान् अमित्रान् नन्दयन् निर्मानः बन्धु शोकदः एवं पराजितः, मा शेष्व, उत्तिष्ठ। 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • हे कापुरुष! = हे कायर पुरुष! 
  • अमित्रान् = शत्रुओं को। 
  • नन्दयन् = प्रसन्न करते हुये। 
  • निर्मानः = सम्मान रहित। 
  • बन्धुशोकदः = बन्धुओं को शोक प्रदान करने वाला। 
  • मा शेष्व = मत सोओ। 
  • उत्तिष्ठ = उठो। 

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। प्रस्तुत श्लोक में विदुरा अपने पुत्र को कायरता त्यागने एवं उत्साहपूर्वक उठकर आगे बढ़ने हेतु प्रेरित कर रही है – 

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – हे कायर पुरुष! (अपने) सम्पूर्ण शत्रुओं को हर्षित करते हुये, सम्मान रहित, बन्धु बान्धवों को शोक प्रदान करने वाले, पराजित (तुम) इस प्रकार मत सोओ, उठो। 

विशेष – भाव यह है कि तुम शत्रुओं से भय का त्याग करके पराक्रम दिखलाओ। यहाँ विदुरा के वीरोचित उद्गार व्यक्त हुए हैं। वह अपने पुत्र को कायरता छोड़कर वीरोचित शत्रुओं से युद्ध करने की प्रेरणा देती है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या – 

प्रसङ्गः – पूर्ववत्। अस्मिन् श्लोके विदुरा स्वपुत्रं कथयति –

संस्कृत-व्याख्या – हे कापुरुष! = हे कायर पुरुष! निर्मानोः = निर्गतो मानो यस्य सः = सम्मान रहितः, बन्धु शोकदः = बन्धुभ्यः शोकं ददाति यः सः बन्धु शोकदः = भ्रात्रेभ्यः शोकदाता, सर्वान् = अखिलान्, अमित्रान् = शत्रून्, नन्दयन् = प्रसन्नं कुर्वन, एवं = इत्थम्, पराजितः = पराजितो भूत्वा, मा शेष्व = शयनं मा कुरु। उत्तिष्ठ = निद्रां विहाय उत्तिष्ठ। 

व्याकरणात्मक-टिप्पणी – 

  1. कापुरुष-कुत्सितः पुरुषः (कर्मधारय समास)। शेष्वैवं-शेष्व + एवम् (वृद्धि सन्धि)। पराजितः-परा + जि + क्त। नन्दयन्-नन्द् + शतृ। निर्मानः-निर्गतः मानः यस्मात् सः (ब. व्री.)। शोकदः-शोकं ददाति (उपपद)। 
  2. अस्मिन् श्लोके अनुष्टुप् छन्दः। 
  3. अस्मिन् श्लोके विदुरा स्वपुत्रं कायरतां त्यक्तुं प्रेरयति। 

4. उद्भावयस्व वीर्यं वा ……………………………….. हि जीवसि॥ 

अन्वयः – पुत्र! धर्मम् अग्रतः कृत्वा वीर्यं वा उद्भावयस्व, तां ध्रुवाम् वा गतिं गच्छ। हि किं निमित्तम् जीवसि ॥ 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • उद्भावयस्व = प्रकट करो, ज्ञात करो। 
  • वीर्यम् = वीरता को। 
  • अग्रतः = आगे। 
  • ध्रुवाम् = अटल, स्थिर। 
  • निमित्तम् = हेतु, कारण। 

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। विदुरा अपने पुत्र से कह रही है – 

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – हे पुत्र! धर्म को आगे करके या तो वीरता को प्रकट करो अथवा उस अटल या निश्चित गति को प्राप्त करो। निश्चय ही तुम किस कारण जी रहे हो? अर्थात् इस प्रकार का जीवन जीना व्यर्थ है।

विशेष – यहाँ विदुरा के वीरोचित स्वाभिमान को दर्शाया गया है। वह अपने पुत्र को क्षत्रियोचित धर्म का पालन करते हुए युद्ध के लिए प्रेरित करती है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्ग – अयं श्लोकः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘मानो हि महतां धनम्’ इति पाठात् उद्धृतः। पाठोऽयं मूलतः महर्षि वेदव्यास विरचितस्य महाभारतस्य उद्योगपर्वतः संकलितः। अत्र विदुरा स्वपुत्रं शौर्यं प्रदर्शनार्थं प्रेरयति 

संस्कृत-व्याख्या – पुत्र! = हे तनय ! धर्मम् = क्षत्रियधर्मं वीरताम्, अग्रतः = पुरतः, कृत्वा = विधाय, वीर्यं वा = शौर्यं वा, उद्भावयस्व = प्रकटय, तां ध्रुवां = तां निश्चितां, गतिं वा = मृत्युं वा गच्छ = प्राप्नुहि । हि = यतः, किं निमित्तम् = केन प्रयोजनेन जीवसि = प्राणान् धारयसि॥ 

व्याकरणात्मक-टिप्पणी – 

(i) उद्भावयस्य-लोट् लकार, म.पु., एकवचन, गतिम्-गम् + क्तिन्। 
(ii) अस्मिन् श्लोके अनुष्टुप् छन्दः। 

5. कुरु सत्त्वं ……………………………………… स्वयमेव हि॥

अन्वयः – स्वयम् एव सत्त्वम् मानम् च कुरु, आत्मनः पौरुषम् विद्धि, हि तत्कृते मग्नम् कुलम् उद्भावय ।। 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • सत्त्वम् = पराक्रम, वीरता। 
  • पौरुषम् = पुरुषत्व। 
  • विद्धि = जानो। 
  • मग्नम् = डूबे हुये। 
  • त्वत्कृते = तुम्हारे लिए।
  • उद्भावय = प्रकट करो। 

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इस श्लोक में विदुरा अपने पुत्र को कह रही है – 

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – हे पुत्र! तुम स्वयं ही अपने पराक्रम एवं वीरता को व्यक्त करो, अपना सम्मान प्रकट करो एवं अपने पौरुष को जानो क्योंकि तुम्हारे ही कारण यह वंश अथवा कुल डूब रहा है। अतः तुम अपने पुरुषार्थ को प्रकट करो। अपने कुल की मर्यादा को समझो। 

विशेष – यहाँ माता विदुरा द्वारा अपने पराजित पुत्र सञ्जय को पराक्रम एवं वीरता प्रकट करने हेतु अत्यन्त वीरोचित उद्बोधन दिया गया है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्गः – श्लोकोऽयं अस्माकं पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती’ प्रथम भागस्य ‘मानो हि महतां धनम्’ इति पाठात् उद्धृतः। पाठोऽयम् मूलतः महर्षि वेदव्यास विरचितस्य महाभारतस्य उद्योगपर्वतः संकलितः। अस्मिन् श्लोके माता विदुरा स्वकीयं पराजितम् पुत्रं सञ्जयं प्रति उद्बोधयति-

संस्कृत-व्याख्या – (हे पुत्र!) स्वयम् एव = स्वकीयमेव, सत्त्वं = शक्तिवैशिष्ट्यम्, मानम् च = स्वाभिमानम् सम्मानम् च, कुरु = विधेहि। आत्मनः = स्वस्य, पौरुषम् = पुरुषार्थम्, विद्धि = जानीहि, हि = यतः, त्वत्कृते = तव कारणात्, मग्नम्, निमग्नम्, कुलम् = वंशम्, अन्वयम् वा, उद्भावय = उन्नतं कुरु।

व्याकरणात्मक-टिप्पणी – 

(i) पौरुषम्-पुरुष + अण्। मग्नम् = माञ् + क्त। मानम्-मन् + घञ्। 
(ii) अस्मिन् पद्ये अनुष्टुप् छन्दः वर्तते। 

6. यस्य वृत्तंन ………………………………….. पुनः पुमान्॥ 

अन्वयः – मानवाः यस्य महत् अद्भुतम् राशिवर्धन मात्रम् वृत्तं न जल्पन्ति, सः न एव स्त्री, न पुनः पुमान् (अस्ति)॥ 

कठिन-शब्दार्थ :

वृत्तम् = वृत्तान्त को। 
महत् अद्भुतम् = अत्यन्त विचित्र। 
जल्पन्ति = कहते हैं, बोलते हैं। 
राशिवर्धन मात्रम् = मात्र संख्या बढ़ाने वाले।
पुमान् = पुरुष। 

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। विदुरा अपने पुत्र को सम्बोधित करते हुये कह रही है – 

हिन्दी अनुवा अनवाद/व्याख्या – मनुष्य जिसके अत्यन्त विचित्र, मात्र संख्या बढ़ाने वाले वृत्तान्त को नहीं कहते हैं, वह न तो स्त्री है और न फिर पुरुष ही है। भाव यह है कि जिस पुरुष के वृत्तान्त को लोग मात्र संख्या बढ़ाने वाला समझते हैं, वह अत्यन्त अद्भुत वृत्त वाला व्यक्ति न तो स्त्री कहलाने योग्य है और न ही पुरुष। 

विशेष – यहाँ प्रख्यात चरित्र वाले मनुष्य का ही जीवन सार्थक एवं मनुष्य कहलाने का अधिकारी कहा गया है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्ग: – अयं श्लोकः ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठाद् उद्धृतः। अस्मिन् श्लोके विदुरा स्वपुत्रं कथयति। संस्कत-व्याख्या-मानवाः = मनुष्याः, महददभुतम् = अति आश्चर्यज नवाः = मनुष्याः, महददभुतम् = अति आश्चर्यजनकम्, यस्य = जनस्य, वृत्तं = चरित्रम्, न जल्पन्ति = न कथयन्ति। राशिवर्धन मात्रं = संख्यायां वृद्धिकर्ता, सः = मानवः, नैव स्त्री = न तु नारी वर्तते, न पुनः पुमान् = न पुरुष! अस्ति। तस्य गणना न तु स्त्रीषु न च पुरुषेषु कर्तुं शक्यते। 

व्याकरणात्मक-टिप्पणी – 

(i) मानवः-मनु + अण् (बहुवचन)। नैव-न + एव (वृद्धि सन्धि)। जलपन्ति जल्पम् धातु लट् लकार प्र. पु. ब. वचन। 
(ii) अस्मिन् स्लोके अनुष्टुप् छन्दः। 

7. यः आत्मनः …………………………………………….. सा।
 
अन्वयः – यः आत्मनः प्रियं सुखं हित्वा श्रियम् मृगयते, अथो सः अचिरेण अमात्यानाम् हर्षं आदधाति॥ 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • हित्वा = छोड़कर। 
  • श्रियम् = शोभा, लक्ष्मी, वृद्धि। 
  • मृगयते = खोजता है। 
  • अचिरेण = शीघ्र ही। 
  • अमात्यानाम् = मंत्रियों के लिए। 
  • आदधाति = धारण करता है। 

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इस श्लोक में विदुरा अपने पुत्र को कह रही है-  

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – जो अपने प्रिय सुख को छोड़कर शोभा अथवा लक्ष्मी को खोजता है, वह शीघ्र ही अपने मंत्रियों को हर्ष पहुँचाता है अर्थात् वह राजा अपने मंत्रियों के लिए प्रसन्नता उत्पन्न करता है। 

विशेष – यहाँ विदुरा के द्वारा धन-सम्पत्ति की अपेक्षा स्वकर्तव्य-पालन को श्रेष्ठ दर्शाया गया है तथा क्षत्रिय धर्म से विमुख राजा की स्थिति को प्रकट किया गया है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या – 

प्रसङ्गः – श्लोकोऽयं ‘मानो हि महतां धनम्’ इति शीर्षकपाठाद् उद्धृतः। अस्मिन् श्लोके अमात्यानां कः शीघ्रं हर्ष आदधाति इति प्रस्तुतम्। 

संस्कृत-व्याख्या – यः = यः मानवः नृपो वा, आत्मनः = स्वस्य, प्रियसुखे = प्रियं च सुखं च इति प्रियसुखे, हित्वा = विहाय, श्रियम् = लक्ष्मी, मृगयते = लक्ष्म्यर्थं प्रयासं करोति, सः = नृपः, अमात्यानाम् = स्वमन्त्रीणाम्, अचिरेण = शीघ्रं, हर्ष = प्रसन्नतां, आदधाति = उत्पन्नं करोति। भावोऽयं यत् तस्य राज्ञः अमात्याः प्रसन्नाः भवन्ति यः खलु स्वस्वार्थं विहाय परेषां कृते परिश्रमं करोति। 

विशेषः : 

(i) अस्मिन् श्लोके अनुष्टुप् वृत्तं वर्तते। 
(ii) व्याकरण-प्रियसुखम्-प्रियं च तत् सुखम् च (कर्मधारय)। हित्वा-हा + क्त्वा। अचिरेण-न चिरेण (नब् तत्पु.)। 

8. पुत्रः उवाच किं नु ते …………………………………………………….. जीवितेन वा किम्॥ 

अन्वयः – नु सर्वथा माम् अपश्यन्त्याः पृथिव्याः अपि ते किम्, ते आभरणकृत्यम् किम्, भोगैः जीवितेन वा किम्॥ कठिन-शब्दार्थ : अपश्यन्ताः = न देखते हुये। आभरणकृत्यम् = आलंकारिक कार्य । जीवितेन = जीवन से। 

प्रसंग – प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती’ भाग प्रथम के ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। मूलत: यह पाठ वेदव्यासजी द्वारा विरचित ‘महाभारत’ के उद्योग पर्व से संकलित किया गया है। इस श्लोक में पुत्र अपनी माता विदुरा को उसकी बातों का उत्तर देते हुये कह रहा है –

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – पुत्र ने कहा – निश्चय ही सर्वथा मुझको न देखते हुये तुम्हारी पृथ्वी का क्या लाभ? तुम्हारे आलंकारिक कार्य भी क्या? अर्थात् उनसे भी क्या प्रयोजन! भोगों से क्या अथवा इस जीवन से क्या? अर्थात् इन सबसे क्या लाभ? 

विशेष – यहाँ विदुरा के पुत्र द्वारा भौतिक सुख-साधनों की सार्थकता जीवित रहने पर ही मानते हुए जिज्ञासा प्रकट की गई है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या 

प्रसङ्गः – अयं श्लोकः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘मानो हि महतां धनम्’ इति पाठात् उद्धृत् । मूलरूपेण अयं पाठः महर्षि वेदव्यास रचितस्य महाभारतस्य उद्योगपर्वतः संकलितोऽस्ति। अस्मिन् श्लोके विदुरायाः पुत्रः सञ्जयः स्वमातरं कथयति 

संस्कृत-व्याख्या-नु = निश्चयेन, सर्वथा = सम्पूर्णतः, माम् = मा सञ्जयम्, अपश्यन्त्याः = नेक्षमाणामाः, पृथिव्याः = अपि वसुधायाः अपि, ते = तुभ्यम्, किम् = किं प्रयोजनम् । ते = तुभ्यम्, आभरणकृत्यम् = आलंकारिकैः कार्यैः किम् = किं प्रयोजनम्, भोगैः = विषयाणां भोगैः, किम् = किं प्रयोजनम्, जीवितेन = जीवनेन प्राणधारणेन वा, किम् = किं प्रयोजनम् किमपि न इत्याशयः।

व्याकरणात्मक-टिप्पणी – अपश्यन्त्याः-न पश्यन्त्याः (नञ् तत्पु.)। पश्यन्त्याः -दृश् + शतृ (षष्ठी एकवचन)। सर्वथा-सर्व + थाल्। आभरण-आ + भृ + ल्युट्। कृत्यम्-कृ + क्यप्। 

9. माता उवाच यमाजीवन्ति पुरुष …………………………………….. जीवितमर्थवत्॥ 

अन्वयः – संजय! सर्वभूतानि यम् पुरुषम् पक्वम् द्रुमम् इव आसाद्य आजीवन्ति, तस्य जीवितम् अर्थवत् (भवति)॥ 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • सर्वभूतानि = सब प्राणी। 
  • आजीवन्ति = आश्रय लेते हैं। 
  • पक्वम् = पका हुआ। 
  • दुमम् = वृक्ष को। 
  • आसाद्य = पाकर।
  • जीवितम् = जीवन। 
  • अर्थवत् = सार्थक, सफल। 

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसमें माता विदुरा अपने पुत्र संजय द्वारा उठाये गये प्रश्नों का उत्तर देती है –

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – माता ने कहा – हे (पुत्र) संजय! (संसार के) सभी प्राणी जिस पुरुष को पके हुये वृक्ष के समान प्राप्त कर उसका आश्रय ग्रहण करते हैं, उसका जीवन सफल होता है।

विशेष – यहाँ विदुरा ने परोपकारी एवं स्वाभिमानी व्यक्ति के ही जीवन को सार्थक माना है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्गः – अस्मिन् श्लोके माता विदुरा स्वपुत्राय संजयाय कथयति 

संस्कृत-व्याख्या – संजय! = हे पुत्र संजय! यम् पुरुषम् = मानवम्, सर्वभूतानि = अखिल प्राणिनः, आजीवन्ति = आश्रयन्ते, पक्वंद्रुममिव = परिपक्वं वृक्षं यथा, आसाद्य = प्राप्य, तस्य = प्राणिनः, जीवितम् = जीवनम्, अर्थवत् = अर्थवान् सार्थकं वा वर्तते।। 

विशेष :

  1. श्लोकस्य भावोऽयं यत् यस्य मानवस्य जीवनं परेषां कृते वर्तते तस्य एव जीवनं सार्थकमस्ति । 
  2. व्याकरण-सर्वभूतानि-सर्वाणि च तानि भूतानि (कर्मधारय)। पक्वम्-पच् + क्त। आसाद्य-आङ् + सद् + ल्यप् । अर्थवत्-अर्थ + मतुप् । 
  3. अस्मिन् श्लोके अनुष्टुप् छन्दः वर्तते। 
  4. ‘पक्वम् द्रुमम् इव’ अत्र उपमा अलंकारः।

10. स्व बाहुबलमाश्रित्य ………………………………………. शुभां गतिम्॥ 

अन्वयः-यः मानवः स्वबाहुबलम् आश्रित्य अभ्युज्जीवति सः लोके कीर्तिं लभते, परत्र च शुभाम् गतिम् (लभते) ॥ 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • बाहुबलम् = भुजाओं के बल को।
  • आश्रित्य = आश्रय लेकर। 
  • अभ्युज्जीवति = जीवित रहता है। 
  • कीर्तिम् = यश को। 
  • परत्र = परलोक में। 
  • शभाम = शभ, उत्तम। 

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसमें माता विदुरा अपने पुत्र संजय को समझाते हुये कह रही है –  

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – जो मनुष्य अपनी भुजाओं की शक्ति का सहारा लेकर जीवित रहता है, वह इस लोक में यश को प्राप्त करता है तथा परलोक में श्रेष्ठ गति (सद्गति) को प्राप्त करता है।
 
विशेष – विदुरा के अनुसार पराक्रमी व्यक्ति ही इस लोक में यश एवं परलोक में परम गति को प्राप्त करता है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्गः – अयं श्लोकः अस्माकं पाठ्यपुस्तकस्य ‘शाश्वती’ प्रथम भागस्य ‘मानो हि महतां धनम्’ इतिशीर्षक पाठाद् उद्धृतः। अत्र माता विदुरा स्वपुत्रं संजयम् कथयति 

संस्कृत-व्याख्या – यः मानवः = यः मनुष्यः, स्वबाहुबलम् = स्वकीय पुरुषार्थं, आसाद्य = प्राप्य, अभ्युज्जीवति = संसारे जीवनयापनं करोति, सः = सः मानवः, लोके = अस्मिन् संसारे कीर्तिं = यशः, लभते = प्राप्नोति, परत्र च = परलोके च, शुभाम् = शोभनां श्रेष्ठां वां गतिम् प्राप्नोति। 

विशेषः :

  1. श्लोकस्य भावोऽयं यत् अस्मिन् संसारे तस्यैव मानवस्य जीवनं सार्थकं यः खलु पुरुषार्थी वर्तते, स्व बाहुबलमाश्रित्य जीवति। सः न केवलं अस्मिन् लोके यशः प्राप्नोति अपितु परलोकेऽपि तस्य गतिः श्रेष्ठा भवति। 
  2. व्याकरण-आश्रित्य-आङ् + श्रि + ल्यप्। कीर्तिम्-कृ + क्तिन्। गतिम्-गम् + क्तिन्। 
  3. अस्मिन् श्लोके अनुष्टुप् छन्दः। 

11. कुन्ती उवाच सदश्व इव ………………………………………….. यथावदनशासनम॥ 

अन्वयः – सः वाक्यसायकैः क्षिप्तः सत् अश्व इव प्रणुन्नः यथावत् अनुशासनम् तथा तत् सर्वम् चकार ॥ 

कठिन-शब्दार्थ : 

  • वाक्यसायकैः = वाणी के बाणों से। 
  • क्षिप्तः = फेंका गया। 
  • सदश्व = अच्छा घोड़ा।
  • प्रणुन्नः = प्रेरित किया हुआ। 
  • चकार = किया। 
  • अनुशासनम् = आदेश, आज्ञा।

प्रसंग – यह श्लोक ‘मानो हि महतां धनम्’ पाठ का अन्तिम पद्य है। मूलतः यह वेदव्यासजी द्वारा विरचित ‘महाभारत’ के उद्योग पर्व के 134वें अध्याय से संकलित है। यहाँ कुन्तीं विदुरा के पुत्र संजय के विषय में अपनी बात कह रही है –

हिन्दी अनुवाद/व्याख्या – कुन्ती ने कहा-वह (संजय) (अपनी माता विदुरा के) वाणी के बाणों से फेंके गये अच्छे घोड़े के समान प्रेरित किया गया । जैसा माता ने उसे उपदेश या आदेश दिया, उसने वैसा ही सब कुछ किया। अर्थात् कायरता को छोड़कर स्वाभिमानपूर्वक रहना प्रारंभ किया। 

व प्रेरक वचनों का उसके पुत्र सञ्जय पर पड़े प्रभाव को दर्शाया गया है. वह अपनी कायरता को त्यागकर स्वाभिमानी जीवन जीने को तत्पर हो जाता है। 

सप्रसङ्ग संस्कृत-व्याख्या –

प्रसङ्ग: – अयं श्लोकः ‘मानो हि महतां धनम्’ इति पाठस्य अन्तिमं पद्यमस्ति। अस्मिन् श्लोके कुन्ती स्वविचारान् प्रकटयति 

संस्कृत-व्याख्या – सः = विदुरापुत्र सञ्जयः, सदश्व इव = श्रेष्ठ घोटक यथा, क्षिप्तः वाक्य सायकैः = वाण्याः सायकैः बाणैः, प्रणुन्न = प्रेरितः सन्, यथावदनुशासनम् = येन प्रकारेण, अनुशासनम् = अनुशासितम् आज्ञा प्रदत्तम्, तथा = तेन प्रकारेण, तत् सर्वं चकार = कृतवान् । भावोऽयं यत् यथा माता विदुरा आज्ञा दत्तवती तथा सर्वं पुत्रः सञ्जयः कृतवान्॥ 

व्याकरणात्मक-टिप्पणी – 

(i) क्षिप्तः-क्षिप् + क्त। प्रणुन्नः = प्रम + नुद् + क्त। तच्चकार-तत् + चकार (श्चुत्व)। 
(ii) अस्मिन् श्लोके अनुष्टुप् छन्दः। उपमाऽलंकारः। 

Chapter 4 मानो हि महतां धनम्