Chapter 4 नियोजन

Textbook Questions and Answers

अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
योजना कैसे दिशा प्रदान करती है ?
उत्तर:
योजना पहले से बताती है कि क्या किया जाना है। यह लक्ष्यों और उद्देश्यों को प्राप्त करने को परिभाषित करता है। योजना में बताए गए ये लक्ष्य और उद्देश्य प्रबंधकों को दिशा प्रदान करते हैं कि उन्हें प्राप्त करने के लिए क्या कार्रवाई की जानी है। नियोजन किसी संगठन के वांछित लक्ष्यों के प्रति सुचारु संचालन सुनिश्चित करता है। 

प्रश्न 2. 
एक कंपनी अगली वित्तीय वर्ष के अंत तक बाजार में प्रमुख स्थिति बनाए रखने के लिए अपनी वर्तमान बाजार हिस्सेदारी को 10 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहती है। बिक्री प्रबंधक रजनी से एक प्रस्ताव तैयार करने के लिए कहा गया है, जो इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उपलब्ध विकल्पों की रूपरेखा तैयार करेंगी। उनकी रिपोर्ट में निम्नलिखित विकल्प जैसे-नए बाजारों में प्रवेश, ग्राहकों के उत्पाद पेशकश का विस्तार, विक्रय प्रोत्साहन के लिए छूट या विज्ञापन गतिविधियों के लिए बजट में वद्धि के रूप में बिक्री संवर्धन तकनीक का उपयोग आदि शामिल थे। रजनी ने नियोजन प्रक्रिया का कौन-सा कदम उठाया? 
उत्तर:
सुश्री रजनी ने जो नियोजन प्रक्रिया का प्रदर्शन किया है, वह ‘कार्रवाई के वैकल्पिक पाठ्यक्रमों की पहचान’ है।

प्रबंधन द्वारा निर्धारित उद्देश्यों को कार्य करने और प्राप्त करने के कई तरीके हैं। रजनी ने कार्रवाई के सभी संभावित वैकल्पिक पाठ्यक्रमों को सूचीबद्ध किया है जिसका उपयोग बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।

प्रश्न 3. 
नियमों को योजना क्यों माना जाता है?
उत्तर:
नियमों को योजना इसलिए माना जाता है क्योंकि इनमें न तो कोई समझौता होता है और न ही कोई परिवर्तन, जब तक कि कोई नीति संबंधी निर्णय न लिया जाए। “नियमों’ एवं ‘योजना’ दोनों ही प्रकृति में बहुत समान हैं।

प्रश्न 4. 
राम स्टेशनरी मार्ट ने केवल ई-ट्रांसफर द्वारा सभी भुगतान करने का निर्णय लिया है। राम स्टेशनरी मार्ट द्वारा अपनाई गई योजना के प्रकार की पहचान करें।
उत्तर:
राम स्टेशनरी ने ई-ट्रांसफर द्वारा सभी भुगतान करने की एक भुगतान ‘नीति’ को अपनाया है। एक नीति एक सामान्य कथन है जिसका उद्देश्य संगठन के प्रयासों को एक विशेष दिशा में प्रसारित करना है।

प्रश्न 5. 
क्या बदलते वातावरण में नियोजन कार्य करता है? अपने उत्तर को औचित्य देने का एक कारण दें।
उत्तर:
नहीं, बदलते वातावरण में नियोजन सही काम नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि एक कपड़ा निर्माण कंपनी रेशम शर्ट के उत्पादन को बढाने की योजना बना रही है। लेकिन समय के साथ, बाजार की माँग सूती शर्ट की ओर बढ़ गई । इस प्रकार, इस मामले में कंपनी की पिछली योजना विफल हो जाती है और उसे माँग में परिवर्तन को पूरा करने के लिए अपनी योजनाओं को संशोधित करना चाहिए ताकि प्रतिस्पर्धा का सामना बेहतर तरीके से किया जा सके। 

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
योजना की परिभाषा में मुख्य पहलू क्या है?
उत्तर:
नियोजन का अर्थ-नियोजन प्रबन्ध के आधारभूत कार्यों में से एक है। इसका अर्थ पहले से यह निश्चित करना है कि भविष्य में क्या करना है तथा कैसे करना है? नियोजन, हम कहाँ खड़े हैं तथा हमें कहाँ पहुँचना है ? इन दोनों के बीच में सेतु का कार्य करता है। इसकी आवश्यकता उस समय पड़ती है जब किसी एक क्रिया को पूरा करने के लिए अनेक विकल्प विद्यमान हैं। अतः नियोजन से तात्पर्य उद्देश्यों का निर्धारण करना तथा इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समुचित कार्यविधियों को विकसित करने से है। ये सभी प्रबन्धकीय निर्णयों तथा कार्यवाहियों को दिशानिर्देश प्रदान करते हैं। अतः नियोजन पूर्व-निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विवेकपूर्ण मार्ग सुलभ कराते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि नियोजन से तात्पर्य उद्देश्यों तथा लक्ष्यों का निर्धारण तथा उन्हें प्राप्त करने के लिए एक कार्यविधि का निरूपण करने से है कि क्या करना है तथा कैसे करना है, दोनों से सम्बन्धित है।

प्रश्न 2. 
यदि योजना में भविष्य के लिए विवरण तैयार करना शामिल है, तो यह सफलता सुनिश्चित क्यों नहीं करता है?
उत्तर:
नियोजन में भविष्य का विस्तृत विवरण आलिप्त होता है तो भी यह भविष्य की सफलता को आवश्यक नहीं बताता, क्योंकि नियोजन पूर्वानुमानों पर आधारित होता है। यदि पूर्वानुमान सत्य हो जायें तो नियोजन सफलतापूर्वक उद्देश्य प्राप्ति के पथ पर आगे बढ़ जाता है; परन्तु यदि पूर्वानुमान गलत सिद्ध हो जायें तो नियोजन केवल एक खर्चीली पद्धति बन कर रह जाती है। इसके अतिरिक्त नियोजन रचनात्मकता के तत्त्व को भी कम कर देता है। नियोजन का कार्य शीर्ष स्तरीय प्रबन्ध के द्वारा ही किया जाता है, शेष स्तर तो इन योजनाओं को क्रियान्वित ही करते हैं, ये अपनी इच्छानुसार कार्य नहीं कर सकते हैं। इस तरह से मध्यम व निम्न स्तर के प्रबन्धकों की पहल-क्षमता तथा सृजनात्मकता दब कर रह जाती है। ऐसी दशा में इन लोगों को आकस्मिक स्थितियों का सामना करने में कठिनाई होती है।

प्रश्न 3. 
व्यापार संगठनों द्वारा किस प्रकार के रणनीतिक निर्णय किये जाते हैं ?
उत्तर:
व्यूह-रचना प्रबन्धन के नियोजन कार्य का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व मानी जाती है। यह व्यावसायिक संस्थान की रूपरेखा प्रस्तुत करती है और संगठन के लम्बे समय के लिए लिये जाने वाले निर्णयों तथा निर्णयन में सम्बन्ध स्थापित करती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्यूह-रचना एक व्यापक योजना है जो व्यावसायिक संगठन के उद्देश्यों को पूरा करती है।।

जब कभी एक व्यूह-रचना तैयार की जाती है तो व्यावसायिक पर्यावरण को ध्यान में रखना आवश्यक होता है। आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, तकनीकी तथा वैधिक पर्यावरण में परिवर्तन संगठन की व्यूह-रचना को प्रभावित करते हैं। व्यावसायिक व्यूह-रचना प्रायः व्यवसाय की पहचान को बनाने में सहायक होती है। बड़ी व्यूह-रचना के निर्णयों में, क्या व्यवसाय उसी कार्यशैली पर चालू रहेगा? या वर्तमान व्यवसाय के साथ कार्य करने की कोई नई विधि अपनायेगा या उसी बाजार में प्रभावशाली स्थान प्राप्त करने का प्रयत्न करेगा, सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 4. 
योजना रचनात्मकता को कम कर देती है। टिप्पणी करें।
उत्तर:
योजना नवाचार को बढ़ावा देती है। कई बार कर्मचारी योजनाओं का निरूपण ही नहीं करते वे केवल आज्ञा पालन करते हैं। नियोजन की रचना शीर्ष स्तरीय प्रबंधन के द्वारा की जाती है। एक बार योजना तैयार हो जाने के बाद, प्रबंधक इसे बदल नहीं सकता है। यह कठोरता बाधा पैदा करती है जब अप्रत्याशित बदलाव आते हैं और इस तरह रचनात्मकता कम हो जाती है। 

प्रश्न 5. 
वर्ष 2018 में रिलायंस जियो की प्रतिस्पर्धा से निपटने के प्रयास में, भारती एयरटेल ने ₹149 की प्रीपेड योजना शुरू की, जिसमें प्रति दिन 3जी/4जी स्पीड पर दो जी.बी. डेटा की पेशकश करने का निर्णय लिया गया। इस उदाहरण में योजना के किस प्रकार को दर्शाया गया है। इसके आयामों को भी बताएँ।
उत्तर:
भारती एयरटेल ने एक रणनीति अपनाई है। कारोबारी माहौल को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई जाती है। रणनीति में तीन आयाम शामिल हैं :

प्रश्न 6. 
योजना के प्रकार बताएँ कि क्या वे एकल उपयोग या स्थायी योजना है- 
(i) एक प्रकार की योजना जो एक नियंत्रण उपकरण के रूप में भी कार्य करती है। (बजट) 
(ii) अनुसंधान और विश्लेषण पर आधारित योजना, जो शारीरिक और तकनीकी कार्यों से संबद्ध है। (विधि)
उत्तर:
(i) बजट-एक प्रकार की योजना जो एक नियंत्रण उपकरण के रूप में भी कार्य करती है। एक बजट एक एकल-उपयोग की जाने वाली योजना है जो एक समय परियोजना या घटना के लिए विकसित की जाती है। 

(ii) विधि-अनुसंधान और विश्लेषण पर आधारित योजना, जो शारीरिक और तकनीकी कार्यों से संबद्ध है। विधि एक स्थायी योजना है क्योंकि इसका उपयोग उन गतिविधियों के लिए किया जाता है जो नियमित रूप से समय पर होती है। 

निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
ऐसा क्यों है कि संगठन हमेशा अपने सभी उद्देश्यों को पूरा करने में सक्षम नहीं होते हैं ?
उत्तर:
चाहे कोई व्यावसायिक संगठन हो या गैरव्यावसायिक संगठन, सभी प्रकार के संगठनों में नियोजन जरूरी होता है। कुछ लोगों का मत है कि नियोजन भविष्य के बारे में पूर्वानुमानों पर आधारित होता है और । भविष्य के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। इसलिए वे नियोजन को एक बेकार की प्रक्रिया मानते हैं। वास्तव में, नियोजन के साथ कई आलोचनाएँ, सीमाएँ एवं समस्याएँ जुड़ी हुई हैं जिनके कारण व्यावसायिक संगठन सदैव अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सफल नहीं हो पाता है। अतः यदि नियोजन को सफल एवं उद्देश्यपूर्ण बनाना है तो प्रबन्धकों को नियोजन की कठिनाइयों अथवा सीमाओं से अवगत होना चाहिए। ये सीमाएँ निम्नलिखित हैं-

1. नियोजन दृढ़ता उत्पन्न करता है-व्यावसायिक संस्था की योजनाएँ भविष्य में कार्य करने की विधि निर्धारित करती हैं। प्रबन्धक पूर्व निर्धारित योजनाओं में परिवर्तन करने की अवस्था में नहीं होते हैं। नियोजन में इस प्रकार की दृढ़ताएँ अनेक मुश्किलें पैदा कर देती हैं। प्रबन्धकों को बदलते हुए हालात में उनसे सहयोग करने के लिए कुछ छूट अवश्य दी जानी चाहिए।

2. परिवर्तनशील वातावरण में नियोजन प्रभावी नहीं रहता–नियोजन की एक सीमा यह भी है कि नियोजन परिवर्तनशील वातावरण में प्रभावी नहीं रहता। क्योंकि नियोजन प्रत्येक चीज का पूर्व ज्ञान नहीं रख सकता। वातावरण में बहुत से घटक सम्मिलित होते हैं; जैसे-आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, कानूनी तथा तकनीकी आदि। इन सब में परिवर्तन होते ही रहते हैं। इन परिवर्तनों का प्रभाव नियोजन में रुकावटें पैदा करता ही है।

3. नियोजन रचनात्मकता को कम करता हैनियोजन एक ऐसी क्रिया है जिसकी रचना उच्च प्रबन्धन के द्वारा की जाती है। मध्यस्तरीय तथा निम्नस्तरीय प्रबन्धक इन योजनाओं को कार्यान्वित करते हैं। ये प्रबन्धक उच्च प्रबन्धकों द्वारा निर्धारित योजनाओं में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। इन्हें अपनी इच्छानुसार कार्य करने की भी स्वतन्त्रता नहीं होती है। इसीलिए यह कहा जाता है कि नियोजन मध्यम एवं निम्नस्तरीय प्रबन्धकों की रचनात्मकता को कम कर देते हैं।

4. नियोजन में भारी लागत आती है-कई विचारकों के द्वारा नियोजन की इस आधार पर आलोचना की जाती है कि नियोजन किये जाने से संस्था को भारी लागत वहन करनी पड़ती है। यह धन के रूप में या समय के रूप में हो सकती है। उदाहरण के लिए, परिशुद्धता की जाँच में बहुत अधिक लागत आती है। विस्तृत योजनाओं के तैयार करने के लिए अनेक प्रकार की सूचनाओं, तथ्यों, आँकड़ों आदि की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही कई बार यह भी पता नहीं लग पाता कि जितना इन योजनाओं पर खर्च किया जा रहा है उन्हें उतना लाभ प्राप्त नहीं होता। इसके साथ ही नियोजन की व्यवहार्यता को परखने के लिए बहुत से आकस्मिक व्यय करने पड़ते हैं।

5. नियोजन समय नष्ट करने वाली प्रक्रिया हैकभी-कभी नियोजन कार्य के अन्तर्गत योजनाओं को तैयार करने में समय इतना लग जाता है कि उनको लागू करने के लिए समय ही नहीं बच पाता।

6. नियोजन सफलता का आश्वासन नहीं हैसामान्यतया प्रबन्धकों की यह प्रवृत्ति होती है कि वे पहले से जाँची, परखी गई सफल योजनाओं पर ही भरोसा करते हैं। लेकिन यह हमेशा उचित नहीं रहता है कि कोई योजना जो पहले सफल हो चुकी है वह आगे भी सफल होगी। इसके अतिरिक्त दूसरे अनजान तत्त्व भी होते हैं जिनका ध्यान रखा जाना आवश्यक होता है। इस प्रकार का आत्म-सन्तोष तथा झूठी सुरक्षा का भाव सफलता के बजाय असफलता ही देता है।

प्रश्न 2. 
योजना प्रक्रिया में प्रबंधन द्वारा उठाए गए कदम क्या हैं?
उत्तर:
नियोजन प्रक्रिया 
एक औद्योगिक संस्था में प्रबन्धक को नियोजन प्रक्रिया के अन्तर्गत निम्नलिखित कदमों का अनुसरण करना चाहिए-
1. उद्देश्यों का निर्धारण-सर्वप्रथम नियोजन प्रक्रिया के अन्तर्गत उद्देश्यों का निर्धारण किया जाना चाहिए। ये उद्देश्य पूरे संगठन तथा प्रत्येक विभाग के लिए निर्धारित किये जाने चाहिए। इसके साथ ही सभी विभागों की इकाइयों को तथा कर्मचारियों को उद्देश्यों का स्पष्टीकरण भी होना चाहिए। इन उद्देश्यों की जानकारी प्रत्येक इकाई तथा सभी स्तर के कर्मचारियों को हो जानी चाहिए। प्रबन्धकों को उद्देश्यों के निर्धारण प्रक्रिया में अपने विचार भी देने चाहिए तथा सहयोग भी।

2. आधार विकसित करना-उद्देश्य निर्धारण के साथ ही प्रबन्धक को इस चरण में भविष्य के विषय में कुछ आधार या अवधारणाएँ बना लेनी चाहिए। यही अवधारणाएँ या मान्यताएँ आधार कहलाती हैं। क्योंकि अवधारणाएँ ही वे भौतिक आधार हैं जिन पर योजनाएँ तैयार की जाती हैं। ये भौतिक आधार पूर्वानुमान, वर्तमान योजना या नीतियों के विषय में कोई भूतकालीन सूचना हो सकती है। आधार विकसित करने में पूर्वानुमान महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि यह सूचनाएँ एकत्रित करने की तकनीक है। एक सफल नियोजन के लिए यथार्थ पूर्वानुमान लगाया जाना आवश्यक है।

3. कार्यवाही की वैकल्पिक विधियों की पहचान करना-नियोजन प्रक्रिया के इस चरण में कार्यवाही की वैकल्पिक विधियों की पहचान की जाती है। कार्यवाही करने तथा लक्ष्यों को प्राप्त करने की अनेक विधियाँ हो सकती हैं। जो भी कार्यविधि हाथ में ली जाये वह जानीपहचानी तथा स्पष्ट होनी चाहिए। कभी-कभी नये कार्य के लिए भी अधिक व्यक्तियों को उनमें विचार के लिए सम्मिलित करते हुए सोचा जा सकता है। यदि परियोजना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है तो संगठन के सदस्यों में परिचर्चा करके अधिक महत्त्वपूर्ण विकल्प के विषय में विचार किया जाना चाहिए।

4. विकल्पों का मूल्यांकन करना-नियोजन प्रक्रिया के इस चरण में प्रत्येक विकल्प के गुण व दोषों की जानकारी प्राप्त की जानी चाहिए। एक ही विकल्प के कई रूप हो सकते हैं जिनकी आपस में तुलना करनी चाहिए। प्राप्त किये जाने वाले उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक विकल्प के पक्ष एवं विपक्ष के दोनों पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। विकल्पों का मूल्यांकन उनकी सम्भाव्यता तथा परिणामों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

5. विकल्पों का चुनाव करना-विकल्पों का मूल्यांकन किये जाने के बाद ही सर्वोत्तम योजना या विकल्प ही स्वीकृत किया जाना चाहिए तथा उसी को लागू किया जाना चाहिए। एक आदर्श योजना ही वास्तव में सर्वाधिक साध्य, लाभकारी तथा कम-से-कम विपरीत परिणामों वाली होती है और उसे ही चुना जाना चाहिए। कभी-कभी किसी एक सर्वोत्तम विकल्प को चुनने की अपेक्षा कुछ योजनाओं का सम्मिश्रण (संयोजन) भी चुना जा सकता है।

6. योजना को लागू करना-नियोजन प्रक्रिया के इस चरण में योजना को लागू करने का कार्य किया जाता है। यह वह कार्य है जो वांछनीय है। उदाहरणार्थ, यदि योजना अधिक उत्पादन करने के लिए है तो अधिक श्रम तथा अधिक मशीनों की आवश्यकता होगी। इस कदम की पूर्ति के लिए कार्य करने तथा मशीनें क्रय करने के लिए और अधिक बड़े संगठन की आवश्यकता होगी।

7. अनुवर्तन-यह देखना कि योजनाएं लागू की गईं या नहीं तथा निर्धारित अनुसूची के अनुसार कार्य चल रहा है या नहीं, यह भी नियोजन प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण चरण है। इस चरण में प्रबन्धक योजना के क्रियान्वयन पर निगरानी रखते हैं तथा कार्य-परिणामों की योजना के लक्ष्यों से तुलना करते हैं। कार्य-निष्पादन में आने वाली समस्याओं की जानकारी प्राप्त की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर योजना में संशोधन भी किया जाता है।

प्रश्न 3. 
बाजार में अन्य नए और मौजूदा खिलाड़ियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते एक ऑटो कंपनी सी लिमिटेड को बाजार हिस्सेदारी में गिरावट की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इसके प्रतियोगी बड़े पैमाने पर उपभोक्ताओं के लिए कम मूल्य वाले मॉडल पेश कर रहे हैं जो मूल्य संवेदनशील हैं। सी लिमिटेड को एहसास हुआ कि भविष्य में बाजार में बने रहने के लिए तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है। गुणवत्ता वाले जागरूक उपभोक्ताओं के लिए, सी लिमिटेड ने अतिरिक्त सुविधाओं और नई तकनीकी प्रगति के साथ नए मॉडल पेश करने की योजना बनाई। कंपनी ने प्रबंधन के सभी स्तरों के प्रतिनिधियों के साथ एक टीम बनाई। यह टीम उपरोक्त रणनीति को लागू करने के लिए संगठन द्वारा अपनाए गए कदमों को समझेगी और निर्धारित करेगी। ऊपर दी गई स्थिति में चिन्हांकित योजना की विशेषताओं की व्याख्या करें। (संकेत-योजना व्यापक है, योजना भविष्य है और योजना एक मानसिक व्यायाम है)।
उत्तर:
सी लिमिटेड को भविष्य में बाजार में बने रहने के लिए निम्नलिखित योजना की विशेषताओं को ध्यान में रखना चाहिए-
1. नियोजन का केन्द्र-बिन्दु लक्ष्य-प्राप्ति होना चाहिए-प्रत्येक प्रबन्धक चाहे वह संस्था में किसी भी स्तर पर कार्य करे, नियोजन करते समय उसे यह ध्यान में रखना चाहिए कि नियोजन सदैव लक्ष्य-प्राप्ति के लिए होना चाहिए। नियोजन की उपयोगिता तब नहीं रह जाती है, जबकि वह संस्था के पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहयोग नहीं करता है।

2. नियोजन प्रबन्ध का प्राथमिक कार्य होना चाहिए-प्रबन्धकों को संगठनात्मक कार्यों को करने से पूर्व नियोजन को सदैव सर्वोपरि रखना चाहिए। क्योंकि नियोजन प्रबन्ध के सभी कार्यों के लिए एक आधार प्रदान करता है। निर्धारित नियोजित ढाँचे के अन्तर्गत ही समस्त प्रबन्धकीय कार्यों की निष्पत्ति की जाती है।

3. नियोजन अविरत होना चाहिए-प्रबन्धकों को नियोजन करते समय यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि नियोजन अविरत कार्य है अर्थात् इस कार्य में निरन्तरता बनी रहनी चाहिए; क्योंकि एक योजना पूरी हो जाने के पश्चात् दूसरी योजना की आवश्यकता हो जाती है। 

4. नियोजन में निर्णय रचना निहित है-प्रबन्धकों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि नियोजन निश्चित रूप से विभिन्न विकल्पों तथा क्रियाओं में से सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव करता है। यदि केवल एक ही सम्भावित लक्ष्य या केवल एक ही कार्य करने की विधि हो तो नियोजन की कोई आवश्यकता ही नहीं है; क्योंकि वहाँ कोई अन्य विकल्प नहीं है। किन्तु वास्तविक जीवन में प्रत्येक क्रिया का विकल्प उपलब्ध होता है। अतः नियोजन प्रत्येक विकल्प का पूर्ण परीक्षण तथा मूल्यांकन करने के उपरान्त ही उनमें से किसी एक सर्वोत्तम विकल्प का चुनाव करता है।

5. नियोजन एक मानसिक अभ्यास है-नियोजन के लिए अटकलबाजी अथवा इच्छाजनित धारणा की अपेक्षा तार्किक तथा नियमित विचारधारा की आवश्यकता होती है। अतः इस बात का अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि नियोजन के लिए सोच क्रमानुसार तथा तत्त्वों एवं पूर्वानुमानों के विश्लेषण पर आधारित होनी चाहिए।

6. नियोजन भविष्यवादी है-नियोजन चूंकि भविष्य के लिए किया जाता है, अतः एक नियोजन की सफलता के लिए भविष्य को ध्यान में रखना बहुत ही आवश्यक है। इस हेतु सही-सही पूर्वानुमान करके नियोजन किया जाना चाहिए।

7. नियोजन सर्वव्यापी है-यह न तो उच्च स्तरीय प्रबंधन का और न ही किसी विशेष विभाग का अनन्य कार्य है, लेकिन नियोजन का क्षेत्र विभिन्न स्तरों तथा विभिन्न विभागों में भिन्न होता है। नियोजन संस्थानों के सभी विभागों तथा प्रबंधन के सभी स्तरों पर वांछनीय होता है।

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