Chapter 5 फ्रांसीसी क्रान्ति–कारण तथा परिणाम (अनुभाग – एक).

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस की क्रान्ति के कारण लिखिए। किन प्रमुख दार्शनिकों ने इसे प्रभावित किया ?
        या
फ्रांस की क्रान्ति के समय फ्रांस की राजनीतिक तथा सामाजिक दशाओं का वर्णन कीजिए।
        या
फ्रांसीसी क्रान्ति (1789) के कारणों और परिणामों की विवेचना कीजिए। (2013)
        या
1789 के फ्रांस की क्रान्ति के एक सामाजिक तथा एक आर्थिक कारण का उल्लेख कीजिए। [2013]
        या
फ्रांसीसी क्रान्ति के किन्हीं तीन कारणों को स्पष्ट कीजिए। उनका क्या प्रभाव पड़ा ? [2013]
        या
फ्रांस की क्रान्ति के दो आर्थिक कारणों का उल्लेख कीजिए। [2016]
        या
फ्रांसीसी क्रान्ति के कारणों का विस्तार से वर्णन कीजिए। (2017, 18)
उत्तर
अठारहवीं सदी में फ्रांस में स्वेच्छाचारी और निरंकुश शासकों की सड़ी-गली पुरातन व्यवस्था चल रही थी। इस व्यवस्था को पुरातन व्यवस्था का नाम इसलिए दिया गया था क्योंकि यह प्राचीन तानाशाही साम्राज्यवादी व्यवस्था का ही एक अंग थी। फ्रांस का तत्कालीन तानाशाह शासक लुई सोलहवाँ एवं उसकी विवेकहीन रानी इस व्यवस्था के पक्षधर थे। इसी पुरातन व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से फ्रांस में सन् 1789 ई० में क्रान्ति का उदय हुआ। यह क्रान्ति एक ऐसी बाढ़ थी, जो अपने साथ अधिकांश बुराइयों को बहाकर ले गयी।

फ्रांस की क्रान्ति के कारण

फ्रांस की क्रान्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –
(1) राजनीतिक कारण

  1. राजाओं की मनमानी – फ्रांस के राजा स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश थे। वे राजा के ‘दैवी अधिकारों में विश्वास करते थे और स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे। इसलिए वे जनता के प्रति अपना कोई कर्तव्ये नहीं समझते थे।
  2. राजाओं द्वारा अपव्यय – राजा जनता पर नये-नये कर लगाते रहते थे तथा करों के रूप में वसूली हुई धनराशि को मनमाने ढंग से विलासिता के कार्यों पर व्यय करते थे। राजा जनता की खून-पसीने की कमाई का अपव्यय कर रहे थे। जनता यह बात सहन न कर सकी।
  3. व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अभाव – राजा के दरबारियों के पास अधिकार-पत्र’ होते थे जिन पर राजा की मोहर लगी होती थी। दरबारी जिसे कैद करना चाहते, उसका नाम अधिकार-पत्र पर लिख देते थे। इस प्रकार न जाने कितने लोगों को फ्रांस की जेलों में रहना पड़ा।
  4. प्रान्तों में असमानता – फ्रांस के भिन्न-भिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न प्रकार के कानून प्रचलित थे। फिर धनी-निर्धन वर्ग के लिए अलग-अलग कानून थे। इससे जनता को बहुत अधिक परेशानियाँ उठानी पड़ रही थीं तथा उनमें असन्तोष भी पनप रहा था।
  5. उच्च वर्ग के विशेष अधिकार – फ्रांस में कुलीन वर्ग तथा कैथोलिक चर्च के पादरियों को विशेष अधिकार मिले हुए थे, जिनके द्वारा वे आम जनता पर अनेक अत्याचार करते थे।
  6. सेना में असन्तोष – साधारण सैनिकों के लिए उन्नति के द्वार बन्द थे, जिस कारण सेना में असन्तोष भी फ्रांस की राज्य-क्रान्ति का एक कारण बना।
  7. अमेरिका का स्वाधीनता संग्राम – अमेरिका के स्वाधीनता संग्राम का फ्रांस की जनता पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उस संग्राम में लफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना ने भी भाग लिया था। इससे फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने सशक्त प्रेरणा प्राप्त की।

(2) सामाजिक कारण
फ्रांस की सामाजिक दशा बड़ी खराब थी। वहाँ का समाज निम्नलिखित तीन वर्गों में बँटा हुआ था

  1. पादरी वर्ग – इस वर्ग में कैथोलिक चर्च के उच्च पादरी आते थे। उन दिनों चर्च फ्रांस में एक अलग राज्य के समान था। चर्च की अपनी सरकार तथा कर्मचारी थे। चर्च को लोगों पर कर लगाने के साथ और भी अधिकार प्राप्त थे। उच्च पादरियों का जीवन भोग-विलास से परिपूर्ण था।
  2. कुलीन वर्ग – इस वर्ग में बड़े-बड़े सामन्त, उच्च सरकारी अधिकारी तथा राजपरिवार के सदस्य सम्मिलित थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे, जिनके द्वारा वे जनता का शोषण करते थे। इसे जनता से बेगार व भेंट लेने का अधिकार था। जनसाधारण का इस वर्ग के प्रति भारी आक्रोश ही क्रान्ति का प्रमुख कारण बना।
  3. जनसाधारण वर्ग – इस वर्ग में मजदूर, कृषक, सामान्य शिक्षित वर्ग तथा सामान्य जनता आती थी। इसे वर्ग के शिक्षित लोगों को भी शासन में भाग लेने का अधिकार नहीं था, जबकि धनी वर्ग के कम शिक्षित व्यक्तियों को यह अधिकार प्राप्त था। इसी कारण क्रान्ति प्रारम्भ होते ही जनसाधारण ने क्रान्ति का जोरदार समर्थन किया।

(3) आर्थिक कारण

  1. जनता का आर्थिक शोषण – लम्बे तथा खर्चीले युद्धों, राजदरबार की शान-शौकत तथा उच्च वर्ग के विलासप्रिय जीवन हेतु धन प्राप्त करने के लिए आम जनता तथा कृषकों की आय का 80 से 92 प्रतिशत तक करों के रूप में ले लिया जाता था। करों के ऐसे भारी बोझ से जनता कराह उठी।
  2. उच्च वर्ग करों से मुक्त – फ्रांस में उच्च वर्ग तथा पादरियों पर कोई कर नहीं लगाया जाता था, जबकि आम जनता करों के भारी बोझ से दबी जा रही थी।
  3. विलासी और अपव्ययी राजदरबार – फ्रांस के राजा बड़े ही विलासी और अपव्ययी थे। वे सरकारी धन को पानी की तरह बहाते थे। फलस्वरूप राजकोष खाली हो गया था और फ्रांस पर ऋण का बोझ दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था।
  4. अमेरिका को वित्तीय सहायता – फ्रांस ने इंग्लैण्ड से बदला लेने के लिए अमेरिका को सैनिक तथा वित्तीय सहायता दी। इससे फ्रांस की आर्थिक दशा और खराब हो गयी।

(4) दार्शनिकों का प्रभाव
रूसो, मॉण्टेस्क्यू तथा वॉल्टेयर जैसे महान् दार्शनिकों-विचारकों ने फ्रांस के निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक बुराइयों का ज्ञान कराया। इन दार्शनिकों के क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित होकर फ्रांस की जनता में एक बौद्धिक जागृति फैल गयी और यहाँ के निवासी न्याय, स्वतन्त्रता और समानता की स्थापना के लिए प्रयत्नशील हो गये।

(5) तात्कालिक कारण
सन् 1788 ई० में फ्रांस के अनेक भागों में भीषण अकाल पड़ा। लोग भूख से तड़प-तड़प कर मरने लगे। राजकोष की बिगड़ी हुई दशा सुधारने के लिए लुई 16वें ने नये करों का प्रावधान किया। इन करों को ‘पार्लेमां’ (पार्लमेण्ट) ने मंजूरी नहीं दी। उसने सुझाव दिया कि उन्हें एताजेनेरो’ (स्टेट्स जनरल) की सहमति से लागू किया जाए। ‘एताजेनेरो’ के अधिवेशन के दौरान मतदान से सम्बन्धित बात पर विवाद पैदा हो गया। गतिरोध जारी ही था कि लुई 16वें ने भावी तनाव को नियन्त्रित करने के उद्देश्य से सेना एकत्र करने के आदेश दे दिये। इससे पेरिस की जनता भड़क उठी। उसने युद्ध सामग्री एकत्रित की और बास्तोल के किले पर आक्रमण कर दिया।
[संकेत – परिणाम के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 का उत्तर देखें।

प्रश्न 2.
फ्रांस की राष्ट्रीय सभा के कार्यों एवं उसके प्रभावों पर प्रकाश डालिए।
        या
नेशनल असेम्बली या राष्ट्रीय सभा की उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
फ्रांस में पहले सामन्ती सभा स्टेट्स जनरल थी। इसमें तीन वर्गों का प्रतिनिधित्व था, जिनके पृथक्-पृथक् अधिवेशन होते थे। सन् 1789 ई० में नये कर लगाने की अनुमति लेने की दृष्टि से इसका अधिवेशन किया गया। तीनों वर्गों का पृथक्-पृथक् अधिवेशन हुआ। मजदूर बहुसंख्यक वर्ग ने नये कर लगाने का विरोध किया। इस पर राजा तथा विशेष वर्ग ने सभा भंग करनी चाही। जनता वर्ग ने टेनिस कोर्ट के निकट एक सभा की तथा उसे राष्ट्रीय सभा घोषित किया। राजा ने सेना बुलाकर राष्ट्रीय महासभा को भंग करने का पुन: प्रयास किया, परन्तु वह सफल न हो सका। राजा को राष्ट्रीय महासभा को मान्यता देनी पड़ी। राष्ट्रीय महासभा ने अपने लगभग दो वर्षों (1789-91) के कार्यकाल में बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य किये और फ्रांस में सदियों से चली आ रही दूषित संस्थाओं का नामोनिशान मिटा दिया।

राष्ट्रीय महासभा के कार्य

राष्ट्रीय महासभा के निम्नलिखित प्रमुख कार्य थे –

  1. राष्ट्रीय महासभा ने 4 अगस्त, 1789 ई० को सामन्तों तथा पादरियों के विशेषाधिकारों को समाप्त करने के लिए कई प्रस्ताव पास किये।
  2. राष्ट्रीय महासभा ने 27 अगस्त, 1789 ई० को मानव तथा नागरिकों के अधिकारों की घोषणा की, जिसके अनुसार कानून की दृष्टि में सभी व्यक्ति समान थे।
  3. राष्ट्रीय महासभा ने उन सभी लोगों की सम्पत्ति जब्त कर ली, जो फ्रांस छोड़कर विदेश चले गये थे।
  4. राष्ट्रीय महासभा ने यह कानून बनाया कि किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी सहायता के दण्डित नहीं किया जा सकता अथवा कैदी नहीं बनाया जा सकता।
  5. यदि राजा किसी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं करेगा तो भी तीन बार विधानसभा में पारित होने पर वह कानून का रूप ले लेगा।
  6. राष्ट्रीय महासभा ने चर्च द्वारा कर लेने पर रोक लगा दी तथा चर्च की सम्पत्ति भी जब्त कर ली।
  7. राष्ट्रीय महासभा ने 6 फरवरी, 1790 ई० में धार्मिक मठों को बन्द करवा दिया।
  8. राष्ट्रीय महासभा ने जुलाई, 1790 ई० में पादरियों पर अंकुश लगाने के लिए एक पादरी विधान बनाया। इसके अनुसार फ्रांस के पादरियों को रोम के पोप की अधीनता से मुक्त कर दिया गया। उनकी नियुक्ति तथा वेतन की व्यवस्था कर दी गयी।
  9. राष्ट्रीय महासभा ने देश को 83 प्रान्तों, प्रान्त को कैण्टनों और कैण्टनों को कम्यूनों में बाँटकर एकसमान शासन-व्यवस्था लागू की।
  10. राष्ट्रीय महासभा ने देश में स्थापित प्राचीन न्यायालयों को भंग करके फौजदारी और दीवानी के न्यायालय स्थापित किये। उसने न्यायाधीशों की नियुक्ति और कार्यावधि निश्चित कर दी।
  11. राष्ट्रीय महासभा ने 30 सितम्बर, 1791 ई० को देश के लिए एक संविधान बनाकर स्वयं को भंग कर दिया।

राष्ट्रीय महासभा का प्रभाव

राष्ट्रीय महासभा के महत्त्वपूर्ण कार्यों के निम्नलिखित प्रभाव पड़े –

  1. शासन की निरंकुशता का अन्त हो गया, जिससे वहाँ गणतन्त्र की स्थापना हो गयी।
  2. कुलीन वंश के विशेषाधिकारों का अन्त हो गया।
  3. राजा-रानी की स्वेच्छाचारिता पर रोक लग गयी।
  4. चर्च के विशेषाधिकार समाप्त होने से जनता का शोषण रुक गया।
  5. क्रान्ति-विरोधियों को गुलोटीन नामक मशीन से फाँसी दे दी गयी।
  6. दास-प्रथा समाप्त हो गयी।
  7. सामन्तवाद का अन्त करके साम्यवाद की स्थापना की गयी।
  8. प्रजातन्त्र का मार्ग प्रशस्त हो गया।

इस प्रकार फ्रांस की महासभा ने दो वर्ष के समय में ही फ्रांस के तूफानी वातावरण के मध्य इतने महत्त्वपूर्ण कार्य कर डाले, जो विश्व में अनेक व्यवस्थापिकाएँ अनेक वर्षों में भी करने में सफल न हो सकीं। राष्ट्रीय महासभा का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य फ्रांस में प्राचीन दूषित शासन-व्यवस्था का अन्त करना था।

प्रश्न 3.
फ्रांस की क्रान्ति का फ्रांस तथा विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा ? उदाहरण सहित प्रस्तुत कीजिए।
        या
फ्रांस की क्रान्ति का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों पर किस प्रकार पड़ा ? [2009]
        या
विश्व को फ्रांस की राज्य क्रान्ति की क्या देन है ? किन्हीं दो की चर्चा कीजिए। [2009]
        या
फ्रांस की क्रान्ति के महत्व पर प्रकाश डालिए। [2014]
उत्तर
फ्रांस की क्रान्ति (1789 ई०) विश्व इतिहास की युगान्तकारी (महत्त्वपूर्ण) घटना थी। इस क्रान्ति के फ्रांस तथा विश्व पर बड़े दूरगामी प्रभाव पड़े, जो निम्नलिखित हैं –

  1. फ्रांस की क्रान्ति के फलस्वरूप यूरोप में निरंकुश शासन का लगभग अन्त हो गया।
  2. फ्रांस की क्रान्ति की देखा-देखी यूरोप के अन्य देशों में भी क्रान्तियाँ हुईं।
  3. फ्रांस की क्रान्ति से प्रेरित होकर अन्य राज्यों के शासकों ने शासन-व्यवस्था में अनेक सुधार किये तथा । जन-कल्याण के कार्य प्रारम्भ किये।
  4. यूरोपीय देशों में लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों का प्रसार हुआ।
  5. समानता, स्वतन्त्रता तथा बन्धुत्व के सिद्धान्तों ने विश्व की राजनीति में हलचल मचा दी।
  6. इंग्लैण्ड में लोकतन्त्रीय आन्दोलन को बल मिला, जिससे वहाँ संसदीय सुधारों का ताँता लग गया।
  7. अमेरिका महाद्वीप के अनेक देशों ने पुर्तगाल तथा स्पेन के उपनिवेशों को समाप्त करके गणतन्त्र स्थापित कर लिये।
  8. संसार के अनेक राष्ट्रों में वयस्क मताधिकार का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।
  9. फ्रांस की क्रान्ति ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा को जन्म दिया और लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  10. इस क्रान्ति ने सदियों से चली आ रही यूरोप की पुरातन सामन्ती व्यवस्था का अन्त कर दिया।
  11. फ्रांस के क्रान्तिकारियों द्वारा की गयी ‘मानव और नागरिकों के जन्मजात अधिकारों की घोषणा (27 अगस्त, 1789 ई०) मानव-जाति की स्वाधीनता के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण है।
  12. इस क्रान्ति ने इंग्लैण्ड, आयरलैण्ड तथा अन्य यूरोपीय देशों की विदेश-नीति को प्रभावित किया।
  13. कुछ विद्वानों के अनुसार फ्रांस की क्रान्ति समाजवादी विचारधारा का स्रोत थी, क्योंकि इसने समानता का सिद्धान्त प्रतिपादित कर समाजवादी व्यवस्था का मार्ग भी खोल दिया था।
  14. इस क्रान्ति के फलस्वरूप फ्रांस ने कृषि, उद्योग, कला, साहित्य, राष्ट्रीय शिक्षा तथा सैनिक गौरव के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व प्रगति की।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांस के राजकोष के रिक्त होने के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर
फ्रांस के राजकोष के रिक्त होने के दो कारण निम्नलिखित हैं

  1. राजाओं द्वारा अपव्यय – राजा जनता पर नये-नये कर लगाते रहते थे तथा करों के रूप में वसूली गयी धनराशि को मनमाने ढंग से विलासिता के कार्यों पर खर्च करते थे। लुई चौदहवें ने 10 करोड़ की लागत से अपना शानदार महल बनवाया था। जिसमें 18 हजार व्यक्ति रहते थे। राजाओं ने जनता की खून- पसीने की कमाई को भोग-विलास में खर्च करके राजकोष को खाली कर दिया था।
  2. उच्च वर्गों की करों से मुक्ति – तत्कालीन राज्य में जो वर्ग कर चुकाने की स्थिति में थे, उन पर क़र नहीं लगाये जाते थे। उच्च वर्ग के लोग; जैसे-पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग। ये लोग शासन को किसी प्रकार का कोई कर नहीं देते थे। उसके स्थान पर जनता का शोषण करते तथा उनसे वसूली गयी रकम से ऐश करते थे। गरीब जनता, जिसे खाने के लिए दो वक्त की रोटी नहीं थी वो कर कहाँ से देती। इस प्रकार कर-वसूली कम होना, खर्च अधिक होना ही राजकोष के खाली होने का प्रमुख कारण था।

प्रश्न 2.
जनसाधारण वर्ग की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर
जनसाधारण वर्ग में मजदूर, कृषक, सामान्य शिक्षित तथा सामान्य जनता आती थी। इन लोगों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी क्योंकि इनसे भरपूर काम तो लिया जाता था लेकिन मजदूरी नहीं दी जाती थी। अगर कोई श्रमिक या मजदूर अस्वस्थ हो जाता था तो भी से अपने निश्चित घण्टों तक कार्य करना पड़ता था। अगर वह काम करने की स्थिति में नहीं होता था तो उसके साथ बेरहमी का व्यवहार किया जाता था।

जनसाधारण वर्ग के लोगों को शिक्षित होने पर भी शासन कार्य में भाग लेने का अधिकार नहीं दिया गया था। इस प्रकार न जाने कितनी प्रतिभाएँ अपने अस्तित्व को अँधरे में ही विलीन कर देती थीं, जबकि कुलीन वर्ग या पादरी वर्ग के लोग कम शिक्षित होने पर भी शासन-कार्य में भाग लेने के लिए अधिकृत होते थे। इस वर्ग की जनसंख्या 95 प्रतिशत थी।

राजाओं, राजदरबारियों, सामन्तों आदि के भोग-विलासपूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए जनता पर तरह-तरह के कर लगाये जाते थे तथा करों की वसूली बड़ी निर्दयता से की जाती थी। कृषकों की आय का 80 से 92 प्रतिशत तक भाग करों के रूप में लिया जाता था। इस प्रकार करों के बोझ से आम जनता कराह रही थी।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि फ्रांस के जनसाधारण वर्ग की स्थिति बहुत ही दयनीय थी।

प्रश्न 3.
फ्रांस की क्रान्ति को प्रेरणा देने वाले तत्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
फ्रांस की जनता में रोष और असन्तोष तो पहले से ही विद्यमान था। वह जल्दी-से-जल्दी महँगाई, बेरोजगारी और करों के बोझ से मुक्ति चाहती थी। अब क्रान्ति के लिए मात्र प्रेरणा की आवश्यकता थी; अत: वहाँ की क्रान्ति को निम्नलिखित तत्त्वों ने प्रेरणा दो –

  1. अमेरिका की सफल क्रान्ति के पश्चात् लोकतन्त्र की स्थापना।
  2. बुद्धिजीवियों एवं तर्कशास्त्रियों द्वारा विचारों में परिवर्तन होना।
  3. नवीन विचारधाराओं का प्रचलन एवं पुरानी प्रथाओं पर प्रहार।
  4. रूसो द्वारा राजा के विशेषाधिकारों का विरोध और लोकमत को सर्वोच्चता देना।
  5. मॉण्टेस्क्यू द्वारा कुलीनों तथा दैवी अधिकारों से मुक्त जनता के सहयोग पर आधारित लोकतन्त्र की रूपरेखा प्रस्तुत करना।

प्रश्न 4.
फ्रांस में 14 जुलाई को राष्ट्रीय दिवस क्यों मनाया जाता है ?
उत्तर
पेरिस के निकट बास्तोल नामक स्थान पर फ्रांस के प्राचीन राजाओं द्वारा बनाया गया एक दुर्ग स्थित था। 14 जुलाई, 1789 ई० को बास्तोल के दुर्ग के फाटक को तोड़कर क्रान्तिकारियों की एक भीड़ ने सभी कैदियों को मुक्त कर दिया, जिससे फ्रांस की क्रान्ति तेजी से शहरों, कस्बों और गाँवों में फैल गयी। यह घटना फ्रांस में निरंकुश शासन के पतन की श्रृंखला की पहली कड़ी थी, क्योंकि उस समय बास्तोल का दुर्ग राजाओं की निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता के प्रतीक रूप में माना जाता था। इसीलिए 14 जुलाई; जिस दिन बास्तोल के दुर्ग का पतन हुआ था; फ्रांस में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रश्न 5.
नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांस के पुनर्निर्माण के लिए क्या प्रयास किया था ? या नेपोलियन कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध है ? (2011)
उत्तर
नेपोलियन फ्रांस में डाइरेक्टरी का प्रधान था। बाद में वह अपनी वीरता तथा योग्यता के बल पर फ्रांस का तानाशाह बन बैठा। उसने ऑस्ट्रिया, प्रशा तथा रूस को पराजित किया था। वह इंग्लैण्ड को भी हराना चाहता था, किन्तु इंग्लैण्ड की शक्तिशाली नौसेना के कारण वह ऐसा नहीं कर सका। नेपोलियन ने अपनी शक्ति को बढ़ाकर फ्रांस के यश को चारों ओर फैलाया था। अपने शासनकाल में उसने अभूतपूर्व विजय-श्रृंखलाओं का निर्माण किया था, जिसे देखकर सम्पूर्ण यूरोप आतंकित हो उठा था। अपनी आश्चर्यजनक विजयों से उसने फ्रांस की जनता का हृदय जीत लिया था। उसने 10 नवम्बर, 1799 ई० को डाइरेक्टरी को भंग कर स्वयं को फ्रांस का प्रथम कांसल निर्वाचित करवा लिया। सन् 1799 ई० से 1804 ई० तक उसने फ्रांस में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किये। उसने कानूनों का संहिताकरण किया जो नेपोलियन कोड के नाम से जाना जाता है। उसके शासनकाल में फ्रांस यूरोप का सबसे समृद्ध और शक्तिशाली देश बन गया था। यूरोप के मित्र-राष्ट्रों ने 18 जून, 1815 ई० में नेपोलियन को वाटरलू नामक स्थान पर परास्त कर सेण्ट हेलेना द्वीप पर जीवन के अन्त तक कैद रखा।

प्रश्न 6.
फ्रांसीसी राज्य-क्रान्ति पर किन दार्शनिकों के विचारों का प्रभाव पड़ा है।
        या
फ्रांस की क्रान्ति के दो दार्शनिकों का परिचय दीजिए। [2010]
        या
उन दार्शनिकों व विचारकों के नाम लिखिए जिनके विचारों से प्रभावित होकर जनता ने फ्रांस में क्रान्ति की। (2009)
        या
रूसो कौन था ? उसके महत्व पर प्रकाश डालिए)
        या
फ्रांस की क्रान्ति में खसो का क्या महत्त्व (योगदान) है ?
उत्तर
फ्रांस की राज्य-क्रान्ति पर उसके जिन दार्शनिकों के विचारों का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा था, उनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है –

1. मॉण्टेस्क्यू – मॉण्टेस्क्यू एक महान् विचारक तथा लेखक था। वह गणतन्त्रीय लोकतन्त्र का समर्थक था। राजा के दैवी अधिकार के सिद्धान्त की उसने कटु शब्दों में आलोचना की। इंग्लैण्ड की शासनपद्धति का उस पर गहरा प्रभाव पड़ा और वैसी ही शासन-पद्धति वह फ्रांस में भी स्थापित करना चाहता था। उसके विचारों से फ्रांस की क्रान्ति को अत्यन्त प्रेरणा मिली। ‘दस्पिरिट ऑफ लॉज’ नामक अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ में उसने अपने सिद्धान्तों की विस्तृत व्याख्या की है।

2. वॉल्टेयर – वॉल्टेयर एक प्रसिद्ध विचारक तथा लेखक था। इसके विचारों से फ्रांस की क्रान्ति को बड़ा प्रोत्साहन मिला। वह जनकल्याणकारी निरंकुश शासन की स्थापना करना चाहता था। उसने चर्च की बुराइयों की कटु शब्दों में निन्दा करते हुए उसे ‘बदनाम वस्तु’ घोषित किया। फ्रांस के सुधारवादी आन्दोलन में उसने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

3. रूसो – रूसो अठारहवीं शताब्दी का एक उच्चकोटि का दार्शनिक था। ‘सोशल कॉण्ट्रैक्ट’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ उसी की देन है। उसका विचार था कि राजा को जनभावनाओं के अनुकूल कार्य करने चाहिए। फ्रांस की क्रान्ति को प्रोत्साहित करने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

फ्रांस के लोग रूसो, मॉण्टेस्क्यू तथा वॉल्टेयर जैसे महान् दार्शनिकों और लेखकों दिदरो, क्वेसेन के विचारों से प्रभावित होकर स्वतन्त्रता की माँग करने लगे थे। इन विचारकों ने फ्रांस के निवासियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बुराइयों का ज्ञान कराया। इन दार्शनिकों के क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित होकर फ्रांस की जनता हृदय से इन बुराइयों को उखाड़ फेंकने के लिए उद्यत हो उठी। इस प्रकार फ्रांस में बौद्धिक जागृति फैल गयी और यहाँ के निवासी न्याय, स्वतन्त्रता और समानता की स्थापना के लिए प्रयत्नशील हो गये।

प्रश्न 7.
फ्रांस की राज्य-क्रान्ति से सम्बन्धित टेनिस कोर्ट की सभा तथा बास्तोल जेल को तोड़ने की घटनाओं का वर्णन कीजिए। इनका क्या प्रभाव पड़ा ?
        या
बास्तील के पतन के क्या कारण थे ? इसका क्या परिणाम हुआ ? (2012)
उत्तर
फ्रांस की राज्य-क्रान्ति में टेनिस कोर्ट की सभा तथा बास्तोल जेल के पतन का विशेष महत्त्व है। इन दोनों घटनाओं का वर्णन निम्नवत् है –

1. टेनिस कोर्ट की सभा – फ्रांस को अपने चिर प्रतिद्वन्द्वी इंग्लैण्ड़ से लगातार युद्ध करने पड़ रहे थे, जिससे राजकोष खाली होता जा रहा था। फ्रांस के राजा लुई सोलहवें ने 1789 ई० में पुरानी सामन्ती सभा ‘स्टेट्स जनरल’ का अधिवेशन इस आशय से बुलाया कि वह नये कर लगाने की अनुमति दे देगी। इस सभा का पिछले 175 वर्षों से कोई अधिवेशन नहीं हुआ था। ‘स्टेट्स जनरल’ में तीनों वर्गों का प्रतिनिधित्व था, जिसमें तीसरा वर्ग बहुसंख्यक था। तीनों वर्गों का पृथक्-पृथक् अधिवेशन होता था। जनता ने करों का कड़ा विरोध करते हुए सभी वर्गों के सम्मिलित अधिवेशन की माँग की। राजा तथा कुलीन वर्ग ने इसका विरोध किया। तीसरा वर्ग, जनता वर्ग ने तब पास के टेनिस कोर्ट में एक सभा आयोजित की तथा इसे राष्ट्रीय सभा घोषित किया और संविधान बनाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी। इसी घटना को इतिहास में टेनिस कोर्ट की सभा के नाम से जाना जाता है। यह प्रत्यक्ष विद्रोह की पहली चिंगारी थी, जिसमें राजा को जनता के समक्ष झुकना पड़ा। यह जनवर्ग की भारी विजय थी। राजा को एक सप्ताह बाद ही नेशनल असेम्बली (राष्ट्रीय महासभा) को मान्यता देनी पड़ी।

2. बास्तील का पतन – जून, 1789 ई० में राष्ट्रीय महासभा को मान्यता मिलने के बाद इसके होने वाले अधिवेशन की गतिविधियों पर पूरे फ्रांस की नजरें टिकी हुई थीं। इसी बीच जुलाई में पेरिस में यह अफवाह फैल गयी कि राजा विदेशी सेना की सहायता से देशभक्तों और क्रान्तिकारियों को कत्ल करने की योजना बना चुका है। 11 जुलाई को सम्राट ने वित्त मन्त्री नेकर को पदच्युत कर दिया। इस घटना ने जनता में पनप रही आशंका को दृढ़ कर दिया। इस पर पेरिस की जनता उत्तेजित हो उठी और तोड़-फोड़ करने लगी। 12 जुलाई, 1789 ई० को पेरिस में हो रहे उपद्रवों की सूचना पाकर बहुत-से सशस्त्र लुटेरे भी नगर में आ गये और उन्होंने सवंत्र लूट-मार, तोड़-फोड़ तथा आतंक फैलाना प्रारम्भ कर दिया। 14 जुलाई को क्रान्तिकारियों की एक भीड़ ने बास्तोल के दुर्ग पर हमला बोल दिया और दुर्ग-रक्षक देलोने की हत्या करके वहाँ पर वन्द कैदियों को रिहा कर दिया तथा वहाँ पर रग्वे हथियार लूटकर दुर्ग को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। यह घटना फ्रांस में निरंकुश शासन के पतन की पहली घटना थी, क्योंकि उस समय बास्तोल का दुर्ग राजाओं की निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता का प्रतीक माना जाता था। इस घटना का बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व है। इसीलिए 14 जुलाई को दिन फ्रांस में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। इन दोनों घटनाओं ने फ्रांस में क्रान्ति का स्वरूप बदल दिया। प्रतिक्रियावादी सामन्त तथा पादरी फ्रांस छोड़ने की तैयारी करने लगे, किसानों ने सामन्तों को लूटना आरम्भ कर दिया और प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश का उल्लंघन क्रान्ति का पर्याय बन गया।

प्रश्न 8.
1789 में फ्रांस की राष्ट्रीय सभा द्वारा की गई तीन प्रमुख घोषणाओं का वर्णन कीजिए। [2015]
उत्तर
फ्रांस की राष्ट्रीय सभा द्वारा की गई तीन प्रमुख घोषणाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा – राष्ट्रीय सभा ने 27 अगस्त, 1789 ई० को मानव और नागरिकों के अधिकारों की घोषणा की जिसके अनुसार कानून की दृष्टि में सभी व्यक्ति समान थे।
  2. विशेषाधिकारों की समाप्ति – 4 अगस्त, 1789 ई० को राष्ट्रीय सभा ने सामन्तीय विशेषाधिकारों की समाप्ति के लिए प्रस्ताव पारित किये।
  3. चर्च द्वारा सम्पत्ति संग्रह पर रोक – 10 अक्टूबर, 1789 ई० को राष्ट्रीय सभा ने कानून बनाकर चर्च द्वारा सम्पत्ति संग्रह पर रोक लगा दी और चर्च की सम्पूर्ण जायदाद को छीनकर नीलाम कर दिया गया तथा इस आय को राष्ट्रीय आय में सम्मिलित कर लिया गया। अब चर्च किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार का कर नहीं लगायेगी।

प्रश्न 9.
फ्रांस की क्रान्ति में ‘टेनिस कोर्ट की शपथ’ का क्या महत्त्व है? इसके कारण और परिणाम पर प्रकाश डालिए। [2016]
उत्तर
स्टेट्स जनरल फ्रांस की प्राचीन संसद थी जिसमें तीन सदन थे अर्थात् तीन वर्गों का प्रतिनिधित्व था। प्रत्येक वर्ग का अलग-अलग अधिवेशन होता था। 1614 ई० के बाद अब तक इसका कोई अधिवेशन नहीं हुआ था। स्टेट्स जनरल के सदस्यों की कुल संख्या 1214 थी जिसमें 308 पादरी वर्ग के, 285 कुलीन वर्ग के और 621 जनसाधारण वर्ग के सदस्य थे। राजा ने धन की कमी को पूरा करने के लिए इस आशा से 1789 ई० में इसका अधिवेशन बुलाया कि वह नया कर लगाने की अनुमति दे देगी। जनता वर्ग ने करों का विरोध किया और संयुक्त अधिवेशन की माँग की। राजा तथा दरबारी वर्ग ने इसका विरोध किया तथा सभा को भंग करना चाहा। जनता वर्ग ने सभी से हटने से इंकार कर दिया। इसी बीच बैठक में तृतीय सदन क्या है?’ के प्रश्न पर हंगामा होने लगा। फ्रांस के प्रसिद्ध विधिवेत्त ‘एबीसीएज’ ने एक पुस्तिका वितरित की जिसमें लिखा था-”तृतीय सदन ही राष्ट्र का पर्याय है किन्तु देश की सरकार ने उसकी पूर्णतया उपेक्षा कर रखी है।” 6 मई, 1789 ई० को तीनों वर्गों के सदस्यों ने अलग-अलग भवनों में बैठक की। जनसाधारण वर्ग का नेतृत्व ‘मिराबो’ ने ग्रहण किया।

टेनिस कोर्ट की शपथ – फ्रांस के तत्कालीन राजा लुई सोलहवाँ ने सामन्तों, कुलीनों व. पादरियों के दबाव में आकर साधारण वर्ग के सभा भवन को बन्द करा दिया तथा इस वर्ग को सभा स्थगित रखने का आदेश दिया। राजा ने इस आदेश के विरोध में तृतीय सदन (वर्ग) के सभी सदस्य भवन के निकट स्थित टेनिस कोर्ट के मैदान में एकत्रित हो गये तथा तृतीय वर्ग के नेता मिराबो’ की अध्यक्षता में शपथ ग्रहण की जिसमें संकल्प लिया गया कि “हम यहाँ से उस समय तक नहीं हटेंगे, जब तक हम देश के लिए संविधान का निर्माण नहीं कर लेंगे, भले ही हमारे विरुद्ध संगीनों से ही क्यों न काम लिया जाए।” फ्रांस के इतिहास में यह संकल्प ‘टेनिस कोर्ट की शपथ के नाम से विख्यात है। तृतीय सदन के सदस्यों की इस घोषणा से लुई सोलहवाँ भयभीत हो गया और उसने 27 जून, 1789 ई० को तीनों सदनों की संयुक्त बैठक (अधिवेशन) की अनुमति दे दी तथा स्टेट्स जनरल को राष्ट्रीय सभा की मान्यता प्रदान की। इस सभा ने 9 जुलाई, 1789 ई०को संविधान सभा का कार्यभार ग्रहण कर लिया।

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फ्रांसीसी क्रान्ति कब प्रारम्भ हुई ?
उत्तर
पहली फ्रांसीसी क्रान्ति जून, 1789 ई० में आरम्भ हुई। जुलाई, 1830 ई० में फ्रांस में पुन: क्रान्ति का विस्फोट हुआ तथा फरवरी, 1848 ई० में फ्रांस में अन्तिम क्रान्ति हुई।

प्रश्न 2.
फ्रांस की क्रान्ति के दो कारण लिखिए।
उत्तर
फ्रांस की क्रान्ति के दो कारण निम्नलिखित हैं

  1. राजाओं की मनमानी तथा
  2. उच्च वर्ग के विशेष अधिकार।

प्रश्न 3.
फ्रांस की प्राचीन संसद का क्या नाम था ? [2017]
उत्तर
फ्रांस की प्राचीन संसद का नाम ‘स्टेट्स जनरल’ था।

प्रश्न 4.
क्रान्ति प्रारम्भ होने के समय फ्रांस का राजा कौन था ?
उत्तर
क्रान्ति प्रारम्भ होने के समय फ्रांस का राजा लुई सोलहवाँ था।

प्रश्न 5.
उस सभा का नाम लिखिए जिसके बुलाने से फ्रांस में क्रान्ति का विस्फोट हुआ।
उत्तर
सामन्ती सभा ‘स्टेट्स जनरल के अधिवेशन बुलाने के साथ ही फ्रांस में क्रान्ति का विस्फोट हो गया।

प्रश्न 6.
रूसो कौन था ? उसने कौन-सी पुस्तक लिखी ? [2011,12]
उत्तर
रूसो फ्रांस का एक महान् दार्शनिक, लेखक और शिक्षाशास्त्री था। उसने ‘सोशल कॉण्ट्रेक्ट’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना की।

प्रश्न 7.
नेपोलियन का पतन कब और कहाँ हुआ ?
        या
नेपोलियन बोनापार्ट की पराजय कहाँ हुई थी ?
उत्तर
नेपोलियन बोनापार्ट का पतन सन् 1815 ई० में ‘वाटर लू’ के युद्ध में हुआ।

प्रश्न 8.
फ्रांस की क्रान्ति के दो दार्शनिकों के नाम लिखिए। [2010]
        या
फ्रांस की क्रान्ति में भूमिका निभाने वाले दो दार्शनिकों के नाम लिखिए। (2015)
उत्तर

  1. रूसो तथा
  2. वॉल्टेयर, फ्रांस की क्रान्ति के दो दार्शनिक थे।

प्रश्न 9.
फ्रांस का राष्ट्रीय पर्व कब मनाया जाता है ?
उत्तर
फ्रांस का राष्ट्रीय पर्व 14 जुलाई को मनाया जाता है।

प्रश्न 10.
स्टेट्स जनरल की राष्ट्रीय महासभा को मान्यता कब दी गयी ?
उत्तर
स्टेट्स जनरल की राष्ट्रीय महासभा को सन् 1789 ई० में मान्यता दी गयी।

प्रश्न 11.
फ्रांस की क्रान्ति के दो आर्थिक कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर
फ्रांस की क्रान्ति के दो आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं –

  1. उच्च वर्ग की कर” से मुक्ति तथा
  2. विलासी एवं अपव्ययी राजदरबार।

प्रश्न 12.
फ्रांस की क्रान्ति के दो परिणाम लिखिए। [2017, 18]
उत्तर
फ्रांस की क्रान्ति के दो परिणाम निम्नलिखित हैं

  1. इस क्रान्ति ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा और लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
  2. फ्रांसीसी क्रान्ति ने मानव-जाति को स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व का नारा प्रदान किया।

प्रश्न 13.
फ्रांस की राज्य क्रान्ति से पहले होने वाली दो राज्य क्रान्तियों के नाम लिखिए। [2014]
उत्तर

  1. इंग्लैण्ड की क्रान्ति।
  2. अमेरिका की क्रान्ति।

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. फ्रांस की प्राचीन संसद का नाम था

(क) डायट
(ख) स्टेट्स जनरल
(ग) राष्ट्रीय सभा सभा
(घ) डाइरेक्टरी

2. फ्रांस की क्रान्ति कब प्रारम्भ हुई? [2014, 18]

(क) 1889 ई० में
(ख) 1689 ई० में
(ग) 1789 ई० में
(घ) 1779 ई० में

3. फ्रांस की क्रान्ति का तात्कालिक कारण था (2015, 18)

(क) स्टेट्स जनरल का अधिवेशन
(ख) दार्शनिकों की भूमिका
(ग) आर्थिक तंगी
(घ) सम्राट् की निरंकुशता

4. फ्रांस में समाज के तीसरे वर्ग (जनसामान्य) का प्रतिशत था

(क) 5
(ख) 25
(ग) 75
(घ) 95

5. 1789 ई० की राज्य-क्रान्ति के समय फ्रांस का शासक था

(क) चार्ल्स प्रथम
(ख) लुई सोलहवाँ
(ग) लुई फिलिप
(घ) लुई अठारहवाँ

6. रूसो कौन था?

(क) राजा
(ख) जनरल
(ग) दार्शनिक
(घ) सैनिक

7. फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने मानव के मौलिक अधिकारों के घोषणा-पत्र को कब जारी किया?

(क) 15 अगस्त, 1789 ई० में
(ख) 27 अगस्त, 1789 ई० में
(ग) 30 अगस्त, 1789 ई० में
(घ) 24 अक्टूबर, 1789 ई० में

8. फ्रांस में आतंक के शासन का संस्थापक कौन नहीं था?

(क) दान्ते
(ख) डॉ० मारा
(ग) रॉब्सपियरे
(घ) मीराबो

9. मित्र राष्ट्रों ने नेपोलियन को ‘वाटर लू’ नामक स्थान पर किस वर्ष परास्त किया? [2012]

(क) 1789 ई० में
(ख) 1792 ई० में
(ग) 1815 ई० में
(घ) 1830 ई० में

10. रूसो की पुस्तक का नाम है|

(क) दे स्प्रिट ऑफ ब्याज
(ख) सोशल कॉन्ट्रेक्ट
(ग) दास कैपिटल
(घ) द प्रिन्स

11. किस तिथि को बस्तील का पतन हुआ था? [2011, 14]

(क) 4 जुलाई, 1789 ई०
(ख) 14 जुलाई, 1789 ई०
(ग) 14 सितम्बर, 1789 ई०
(घ) 24 अगस्त, 1789 ई०

12. निम्न में से कौन-सी क्रान्ति ‘टेनिस कोर्ट की सभा’ से सम्बन्धित थी? (2010)

(क) रूस की क्रान्ति
(ख) इंग्लैण्ड की क्रान्ति
(ग) फ्रांस की क्रान्ति
(घ) अमेरिका की क्रान्ति

13. ‘स्पिरिट ऑफ लॉज’ नामक पुस्तक का लेखक कौन था? (2015, 18)

(क) रूसो
(ख) लॉक
(ग) मॉण्टेस्क्यू
(घ) मैकियावली

14. नेपोलियन बोनापार्ट की अन्तिम पराजय कहाँ हुई? [2016]

(क) वाटर लू में
(ख) रूस में
(ग) ऑग्ट्रिया में
(घ) प्रशा में

15. महान दार्शनिक वाल्टेयर ने किस देश की क्रान्ति को प्रभावित किया था? [2016]

(क) अमेरिका
(ख) इंग्लैण्ड
(ग) रूस
(घ) फ्रांस

उत्तरमाला