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Chapter 5 मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया

In Text Questions and Answers

गतिविधि-पृष्ठ 108

प्रश्न 1. 
कल्पना कीजिए आप मार्कोपोलो हैं। चीन में आपने प्रिंट का कैसा संसार देखा, यह बताते हुए एक चिट्ठी लिखिए।
उत्तर:
चीन में प्रिंट के संसार को देखकर मैं निम्नलिखित प्रकार से चिट्ठी लिखंगा-
विश्व में मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन में विकसित हुई। यह छपाई हाथ से होती थी। लगभग 594 ई. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लाक या तख्ती पर कागज को रगड़कर पुस्तकें छापी जाने लगी थीं। इस तकनीक के अन्तर्गत पतले, छिद्रित कागज के दोनों ओर छपाई सम्भव नहीं थी। इसलिए पारम्परिक चीनी पुस्तक ‘एकार्डियन’ शैली में, किनारों को मोड़ने के बाद सिलकर बनाई जाती थी। इन पुस्तकों पर सुलेखन कार्य भी किया जाता था। 

चर्चा करें-पृष्ठ 113

प्रश्न 2. 
छपाई से विरोधी विचारों के प्रसार को किस तरह बल मिलता था? संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
छापेखाने के आविष्कार से विचारों के व्यापक प्रचार-प्रसार और वाद-विवाद को प्रोत्साहन मिला। छापे हुए लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग तथा आम जनता धर्म तथा अन्य विषयों की अलग-अलग व्याख्या से परिचित होने लगी। स्थापित सत्ता के विचारों से असहमत होने वाले लोग भी अब अपने विचारों को छापकर उन्हें फैला सकते थे। इस तरह विरोधी विचारों के प्रसार को बल मिलता था।

छपी हुई पुस्तकों को लेकर अनेक लोगों के मन में आशंकाएँ एवं डर थे। उन्हें यह आशंका थी कि न जाने इन पुस्तकों का सामान्य लोगों के मस्तिष्क पर क्या प्रभाव हो। उन्हें यह भय था कि यदि छपी हुई पुस्तकों, समाचार-पत्रों आदि पर कोई नियन्त्रण नहीं होगा, तो लोगों में विद्रोहात्मक एवं अधार्मिक विचार विकसित होंगे। धर्मगुरुओं, सम्राटों एवं अनेक लेखकों और कलाकारों की मान्यता थी कि ऐसा होने पर ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जायेगी।

चर्चा करें-पृष्ठ 116

प्रश्न 3. 
कुछ इतिहासकार ऐसा क्यों मानते हैं कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रान्ति के लिए जमीन तैयार की?
उत्तर:
[नोट-इसके उत्तर के लिए अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नों में निबन्धात्मक प्रश्न संख्या 5 का उत्तर देखें।] 

गतिविधि-पृष्ठ 118

प्रश्न 4. 
चित्र 13 (पाठ्यपुस्तक में) को देखें। ऐसे विज्ञापनों का लोगों के मन पर क्या असर पड़ता होगा? क्या आपको लगता है कि छपी हुई चीज को देखकर हर व्यक्ति की एक जैसी प्रतिक्रिया होती है?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक के चित्र 13 में इंग्लैंड के एक रेलवे स्टेशन पर लगे विज्ञापन और सूचनाएं दर्शाए गए हैं। ऐसे विज्ञापनों का लोगों के मन पर बहुत असर पड़ता होगा। लोग इसमें प्रदर्शित वस्तुओं को खरीदने हेतु प्रेरित होते होंगे।

नहीं, हमें नहीं लगता कि छपी हुई चीज को देखकर हर व्यक्ति की एक जैसी प्रतिक्रिया होती है। कुछ लोग इन चीजों को स्वीकारते हैं तो कुछ लोग इन चीजों को नकारते हैं। लोग चीजों की अपने-अपने तरीके से व्याख्या भी करते हैं।

Textbook Questions and Answers

संक्षेप में लिखें

प्रश्न 1. 
निम्नलिखित के कारण दें-
(क) वुड ब्लॉक प्रिंट या तख्ती की छपाई यूरोप में 1295 के बाद आई। 
(ख) मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की। 
(ग) रोमन कैथोलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबन्धित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी।
(घ) महात्मा गांधी ने कहा कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस और सामूहिकता के लिए लड़ाई है।
उत्तर:
(क) वुड ब्लॉक प्रिंट या तख्ती की छपाई यूरोप में 1295 के बाद आई-वुड ब्लॉक प्रिंट या काठ की तख्ती वाली छपाई की तकनीक चीन में विद्यमान थी। मार्कोपोलो नामक एक महान खोजी यात्री चीन में काफी समय तक रहा। 1295 ई. में वह वापस इटली लौटा । वह अपने साथ तख्ती की छपाई की तकनीक लाया। अतः 1295 के बाद यूरोप में भी वुड ब्लॉक प्रिंट की तकनीक अपनाई जाने लगी।

(ख) मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की—मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में था। उसने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी 95 स्थापनाएँ लिखीं। इसकी एक छपी हई प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाजे पर टांगी गई। इसमें मार्टिन लूथर ने चर्च को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी। लूथर के लेख बड़ी संख्या में छापे गए। बहुत सारे लोगों ने इन लेखों को पढ़ा। इसके परिणामस्वरूप कैथोलिक चर्च का विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेन्ट धर्म सुधार आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। मार्टिन लूथर द्वारा किए गए न्यू टेस्टामेन्ट के अनुवाद की 5000 प्रतियाँ कुछ ही सप्ताहों में बिक गईं और तीन महीने के अन्दर ही उसका दूसरा संस्करण निकालना पड़ा।
मुद्रण के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हुए मार्टिन लूथर ने कहा था, “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा उपहार है।”

(ग) रोमन कैथोलिक चर्च ने सोलहवीं सदी के मध्य से प्रतिबन्धित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी-छपे हुए लोकप्रिय साहित्य के बल पर कम शिक्षित लोग धर्म की अलग-अलग व्याख्याओं से परिचित हुए। इटली के एक किसान मेनोकियो ने अपने क्षेत्र में उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन किया और उन पुस्तकों के आधार पर उसने बाइबिल के नये अर्थ लगाने शुरू कर दिए। उसने ईश्वर और सृष्टि के बारे में ऐसे विचार व्यक्त किये जिनसे रोमन कैथोलिक चर्च क्रुद्ध हो गया। अतः ऐसे धर्म-विरोधी विचारों का दमन करने के लिए रोमन चर्च ने इन्क्वीजीशन नामक धर्म अदालत की स्थापना की। इन्क्वीजीशन ने अनेक धर्म-विरोधियों को कठोर दण्ड दिये। मेनोकियो को भी मृत्युदण्ड दिया गया। रोमन चर्च ने प्रकाशकों तथा पुस्तक विक्रेताओं पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिए और 1558 ई. से प्रतिबन्धित पुस्तकों की सूची रखनी आरम्भ कर दी।

(घ) महात्मा गांधी ने कहा कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस और सामूहिकता के लिए लड़ाई है-1922 में गांधीजी ने कहा था कि वाणी की स्वतन्त्रता, प्रेस की स्वतन्त्रता, सामूहिकता की स्वतन्त्रता स्वराज के लिए अनिवार्य तत्व हैं। उनका कहना था कि स्वराज की लड़ाई दरअसल अभिव्यक्ति, प्रेस और सामूहिकता की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई है। भारत सरकार अब जनमत को व्यक्त करने और बचाने के इन तीन शक्तिशाली उपकरणों को दबाने का प्रयास कर रही है। स्वराज की लड़ाई सबसे पहले तो इन संकटग्रस्त स्वतन्त्रताओं की लड़ाई है।

प्रश्न 2. 
छोटी टिप्पणी में इनके बारे में बताएँ-
(क) गुटेनबर्ग प्रेस 
(ख) छपी किताब को लेकर रैस्मस के विचार 
(ग) वर्नाक्युलर या देशी प्रेस एक्ट।
उत्तर:
(क) गुटेनबर्ग प्रेस- योहान गेटुन्बर्ग ने 1448 में एक प्रिंटिंग मशीन का मॉडल बनाया जिसे बाद में गुटेन्बर्ग प्रेस कहा गया। इसमें गुटेनबर्ग ने मुद्रण के क्षेत्र में नए आविष्कार किए। इस प्रेस में स्क्रू से लगा एक हैंडल होता था। हैंडल की मदद से स्क्रू घुमाकर प्लाटेन को गीले कागज़ पर दबा दिया जाता था। गुटेनबर्ग ने रोमन वर्णमाला के तमाम 26 अक्षरों के लिए टाइप बनाए। इसमें यह प्रयास किया गया कि इन्हें इधर-उधर ‘मूव’ कराकर या घुमाकर शब्द बनाए जा सकें। यही कारण है कि इसे ‘मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन’ के नाम से जाना गया और अगले 300 सालों तक यही छपाई की बुनियादी तकनीक रही।

(ख) छपी किताब को लेकर रैस्मस के विचार- इरैस्मस एक प्रसिद्ध धर्मसुधारक था। वह लातिन का प्रसिद्ध विद्वान था। उसने कैथोलिक धर्म में व्याप्त कुरीतियों, भ्रष्टाचार तथा निरंकुशवादी प्रवृत्तियों की कटु आलोचना की और प्रोटेस्टेन्ट धर्म सुधार आन्दोलन के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

छपी किताबों को लेकर इरैस्मस बहुत आशंकित था। उसने 1508 में एडेजेज में प्रिंट के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा था कि पुस्तकें भिनभिनाती मक्खियों की भाँति हैं, जो दुनिया के हर कोने में पहुँच जाती हैं। यद्यपि कुछ पुस्तकें जानने योग्य कोई एकाध बात ही बताती हैं, परन्तु उनका अधिकांश हिस्सा तो विद्वानों के लिए हानिकारक ही है। इरैस्मस के अनुसार छपी पुस्तकें बेकार हैं क्योंकि अच्छी चीजों की अति भी हानिकारक ही है। अतः इन पुस्तकों से दूर ही रहना चाहिए। मुद्रक लोग बकवास, मूर्खतापूर्ण, सनसनीखेज, धर्म-विरोधी, अज्ञानतापूर्ण और षड्यन्त्रकारी पुस्तकें छापते हैं । इन पुस्तकों की संख्या इतनी अधिक है कि मूल्यवान और उपयोगी साहित्य का मूल्य नहीं रह गया है।

(ग) वर्नाक्युलर या देशी प्रेस एक्ट-1878 ई. में लार्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित किया। इसके द्वारा देशी भाषाओं में छपने वाले समाचार-पत्रों पर कठोर सेंसर लगा दिया गया। इस प्रकार सरकार को देशी भाषाओं के समाचार-पत्रों में छपी रपट तथा सम्पादकीय को सेंसर करने का अधिकार मिल गया।

सेंसर के तहत यदि किसी रिपोर्ट को सरकार-विरोधी माना जाता था, तो पहले उस समाचार-पत्र को चेतावनी दी जाती थी। यदि उस चेतावनी पर उचित ध्यान नहीं दिया जाता था, तो उस समाचार-पत्र को जब्त किया जा सकता था और छपाई की मशीनों को छीना जा सकता था।

प्रश्न 3. 
उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का इनके लिए क्या मतलब था-
(क) महिलाएँ 
(ख) गरीब जनता 
(ग) सुधारक।
उत्तर:
(क) उन्नीसवीं सदी में भारत में मुद्रण-संस्कृति के प्रसार का महिलाओं के लिए अभिप्राय-

  • उन्नीसवीं सदी में छपी हुई पुस्तकों में महिलाओं के जीवन तथा उनकी भावनाओं को स्पष्टता तथा गहनता से व्यक्त किया जाने लगा।
  • मध्यवर्गीय परिवारों में महिलाएँ पढ़ने में पहले की अपेक्षा अधिक रुचि लेने लगीं। उन्नीसवीं सदी के मध्य में छोटे-बड़े शहरों में स्कूल खुलने लगे, तो उदारवादी माता-पिता पुत्रियों को स्कूलों में भेजने लगे।
  • कई स्त्रियाँ पत्रिकाओं में लेखिकाओं के रूप में काम करने लगीं। पत्रिकाओं ने नारी-शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। 
  • हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों सम्प्रदायों की महिलाओं में जागरूकता आई।
  • अनेक महिलाओं ने महिलाओं की दयनीय स्थिति पर लिखा तथा महिलाओं की शिक्षा, विधवा जीवन, विधवा-विवाह जैसे विषयों पर लेख लिखे गए।

(ख) मुद्रण संस्कृति के प्रसार का गरीब जनता के लिए अभिप्राय-गरीब जनता की पहुँच से किताबें बहुत दूर थीं, क्योंकि उनका मूल्य अत्यधिक होता था। किन्तु मुद्रण संस्कृति के प्रसार के कारण बड़े पैमाने पर पुस्तकें छपने लगीं। उन्नीसवीं शताब्दी में शहरों में पुस्तकें इतनी सस्ती हो गई थीं कि चौक-चौराहों पर बिकने लगी थीं। इसके परिणामस्वरूप गरीब लोग भी इन्हें सरलता से खरीद सकते थे। बीसवीं सदी के आरम्भ से शहरों तथा कस्बों में सार्वजनिक पुस्तकालय खुलने लगे थे जहाँ गरीब लोग भी जाकर पुस्तकें पढ़ सकते थे।

(ग)मुद्रण संस्कृति के प्रसार का सुधारकों के लिए अभिप्राय समाज-सुधारकों ने छपी हुई पुस्तकों के माध्यम से समाज में फैली हुई कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने जाति प्रथा, ऊँच-नीच, छुआछूत आदि का प्रबल विरोध किया और शिक्षा, सामाजिक समानता, शिक्षा के प्रसार, धार्मिक सहिष्णुता का समर्थन किया। समाज-सुधारकों ने अपनी पुस्तकों, पत्रिकाओं आदि के द्वारा मजदूरों को शिक्षित किये जाने तथा उन्हें मिल-मालिकों के द्वारा किये जाने वाले शोषण से बचाने पर बल दिया। उन्होंने मजदूरों में व्याप्त कुरीतियों जैसे नशाखोरी, निरक्षरता आदि के उन्मूलन पर बल दिया और उनमें राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार किया। 

चर्चा करें

प्रश्न 1. 
अठारहवीं सदी के यूरोप में कुछ लोगों को क्यों ऐसा लगता था कि मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अन्त और ज्ञानोदय होगा?
उत्तर:
मुद्रण संस्कृति से निरंकुशवाद का अन्त और ज्ञानोदय होना-अठारहवीं सदी के मध्य तक यूरोप के लोगों की इस धारणा के पीछे निम्नलिखित कारण थे-
(1) निरंकुशवाद और आतंकपूर्ण शासन से मुक्ति दिलाना- यूरोपवासियों का विश्वास था कि पुस्तकें दुनिया बदल सकती हैं । वे निरंकुशवाद तथा आतंकपूर्ण शासन से समाज को मुक्ति दिला सकती हैं और ऐसे समाज का निर्माण कर सकती हैं जिसमें विवेक और बुद्धि का राज होगा। फ्रांस के प्रसिद्ध उपन्यासकार लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए ने कहा था कि “छापाखाना प्रगति का सबसे शक्तिशाली उपकरण है। इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जायेगा।”

(2) ज्ञान का प्रसार- 18वीं सदी में पुस्तकों के अध्ययन से लोगों में ज्ञान का प्रसार हुआ और उन्हें समाज, धर्म, संस्कृति तथा राजनीति के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। उनकी रूढ़ियों तथा अन्धविश्वास समाप्त हुए और उन्हें एक स्वस्थ तथा प्रगतिशील समाज के निर्माण की प्रेरणा प्राप्त हुई।

(3) मद्रण संस्कृति में अगाध विश्वास- ज्ञानोदय को लाने तथा निरंकुशवाद के आधार को नष्ट करने में छापेखाने की भूमिका के महत्व को स्वीकार करते हुए मर्सिए ने घोषित किया, “हे निरंकुशवादी शासको, अब तुम्हारे काँपने का समय आ गया है। आभासी लेखक की कलम के जोर के आगे तुम हिल उठोगे।”

प्रश्न 2. 
कुछ लोग किताबों की सुलभता को लेकर चिन्तित क्यों थे? यूरोप और भारत से एक-एक उदाहरण लेकर समझाएँ।
उत्तर:
कुछ लोग पुस्तकों की सुलभता को लेकर चिंतित भी थे क्योंकि-

  • वे मानते थे कि पुस्तकों में लिखा हुआ पढ़ने से लोग बागी हो जायेंगे, सत्ता का विरोध करेंगे तथा विरोध करने के लिए वे छपाई का दुरुपयोग करेंगे।
  • धर्मगुरुओं में यह भ्रम था कि इससे लोग अधार्मिक प्रवृत्ति के हो जायेंगे; धर्म के प्रति उनका लगाव कम हो जायेगा और वे अनुशासनहीन हो जायेंगे।
  • कुछ का यह मानना था कि इससे महिलाएं अपना स्वाभाविक काम छोड़कर पढ़ी हुई बातों का अनुसरण करने लगेंगी, जिससे सामाजिक अव्यवस्था फैल जाएगी।

यूरोप से उदाहरण- छपी हुई पुस्तकों के आधार पर कुछ लोग बाइबिल के नये अर्थ लगाने लगे तथा कैथोलिक चर्च की कटु आलोचना करने लगे। इससे कैथोलिक चर्च बड़ा क्रुद्ध हुआ और उसने धर्म-विरोधी विचारों का दमन करने के लिए ‘इन्क्वीजीशन’ (धर्म अदालत) की स्थापना की। इन्क्वीजीशन ने धर्म-विरोधी विचार प्रकट करने वाले इटली के निवासी मेनोकियो को मृत्यु-दण्ड दिया। कैथोलिक चर्च ने प्रकाशकों तथा पुस्तक-विक्रेताओं पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये तथा 1558 ई. से प्रतिबन्धित पुस्तकों की सूची रखने लगा।

भारत से उदाहरण- ब्रिटिश सरकार मुद्रण संस्कृति के प्रसार से चिन्तित थी। पुस्तकों, समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं में छपने वाली सामग्री से चिन्तित होकर ब्रिटिश सरकार ने भारतीय प्रेस पर कठोर नियन्त्रण लगाने का निश्चय कर लिया।

अतः 1878 में भारत सरकार ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित किया। इसके द्वारा सरकार ने भारतीय भाषाओं में छपने वाले समाचार-पत्रों पर कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए। 

प्रश्न 3. 
उन्नीसवीं सदी में भारत में गरीब जनता पर मुद्रण संस्कृति का क्या असर हुआ?
अथवा 
प्रिन्ट एवं गरीब जनता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 
उत्तर:
उन्नीसवीं सदी में भारत में गरीब जनता पर हुए मुद्रण संस्कृति का निम्नलिखित असर हुआ-

  • गरीबों के लिए पुस्तकें उपलब्ध होना-मुद्रण संस्कृति के प्रसार के कारण उन्नीसवीं शताब्दी में शहरों में पुस्तकें इतनी सस्ती हो गई थीं कि गरीब लोग भी इन्हें सरलता से खरीद सकते थे।
  • सार्वजनिक पुस्तकालय मुद्रण संस्कृति के प्रभावस्वरूप शहरों तथा कस्बों में सार्वजनिक पुस्तकालय भी खुले।
  • मजदूरों के शोषण का विरोध-उद्योगपति मिल-मजदूरों का शोषण करते थे। कारखानों में मजदूरों से बहुत अधिक काम लिया जाता था परन्तु उन्हें वेतन बहुत कम दिया जाता था। लेकिन 1938 में कानपुर के एक मजदूर काशी बाबा ने ‘छोटे और बड़े सवाल’ लिख और छापकर मजदूरों के शोषण पर प्रकाश डाला।
  • सामाजिक सुधारों को प्रोत्साहन-बंगलौर के सूती मिल-मजदूरों ने स्वयं को शिक्षित करने के विचार से पुस्तकालय स्थापित किये। इसकी प्रेरणा उन्हें मुम्बई के मिल-मजदूरों से प्राप्त हुई थी। समाज सुधारकों ने इन प्रयासों को संरक्षण दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मजदूरों में नशाखोरी की प्रवृत्ति कम हो, उनमें साक्षरता तथा राष्ट्रवाद का प्रसार हो।
  • जाति-भेद विरोधी विचारों का प्रसार-उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में जातिभेद के बारे में विभिन्न प्रकार की पुस्तिकाओं और निबन्धों में लिखा जाने लगा। 

प्रश्न 4. 
मुद्रण संस्कृति ने भारत में राष्ट्रवाद के विकास में क्या मदद की?
अथवा 
मुद्रण संस्कृति ने 19वीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रवाद के विकास में किस प्रकार सहायता की? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत में राष्ट्रवाद के विकास में मुद्रण संस्कृति का योगदान-भारत में राष्ट्रवाद के विकास में मुद्रण संस्कृति ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। यथा-

  • भारतीय समाचार-पत्रों ने राष्ट्रवाद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन समाचार-पत्रों ने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी और अन्यायपूर्ण नीतियों, रंगभेद की नीति, आर्थिक शोषण की नीति आदि की कटु आलोचना की तथा भारतीयों में देशभक्ति और राष्ट्रीय भावनाओं का प्रसार किया।
  • भारतीय भाषाओं में छपी हुई पुस्तकों ने भी भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में सहयोग दिया। आनंद मठ, भारत की दुर्दशा आदि रचनाओं ने देशवासियों में राष्ट्रीय भावना का प्रसार किया।
  • मुद्रण संस्कृति के माध्यम से शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ जिससे लोगों में राष्ट्रीयता की भावना ने सकारात्मक रूप ले लिया।
  • मुद्रण संस्कृति के विकास से नये विचारों का प्रचार-प्रसार हुआ तथा धर्मांधता पर नये सिरे से विचार किया जाने लगा।
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