Chapter 5 व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ

Textbook Questions and Answers

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
ई-व्यवसाय और पारम्परिक व्यवसाय में कोई तीन अन्तर बताइए। 
उत्तर:
ई-व्यवसाय और पारम्परिक व्यवसाय में अन्तर-
1. निर्माण में आसानी-ई-व्यवसाय की स्थापना या निर्माण आसान होता है, जबकि पारम्परिक व्यवसाय का निर्माण करना मुश्किल होता है। 

2. भौतिक उपस्थिति-ई-व्यवसाय में व्यवसायियों की भौतिक उपस्थिति आवश्यक नहीं होती है, जबकि पारम्परिक व्यवसाय में भौतिक उपस्थिति अनिवार्य होती है।

3. प्रचालन लागत-ई-व्यवसाय में प्रचालन लागत कम आती है; क्योंकि इसमें भौतिक सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती है, जबकि पारम्परिक व्यवसाय में अधिप्राप्ति और संग्रहण, उत्पाद, विपणन और वितरण सुविधाओं में निवेश से सम्बन्धित स्थायी दायित्वों के कारण लागत ऊँची आती है। 

प्रश्न 2. 
बाह्यस्त्रोतीकरण किस प्रकार व्यवसाय की नई पद्धति का प्रतिनिधित्व करता है? 
उत्तर:
बाह्यस्रोतीकरण की सहायता से व्यवसाय में अभूतपूर्व सफलता मिलने लगी है; क्योंकि इस पद्धति में व्यवसायी अपने पास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य ही रखते हैं। अन्य कार्यों को उन लोगों को करने के लिए सौंप देते हैं, को करने में उन्हें विशेषज्ञता हासिल होती है। इस प्रकार बाह्यस्त्रोतीकरण से न केवल व्यावसायिक कार्य समय पर पूरा हो जाता है, साथ ही मितव्ययता के साथ सम्पन्न हो जाता है। इसके अतिरिक्त बाह्यस्रोतीकरण से समाज के विभिन्न वर्गों को रोजगार मिलता है और उपभोक्ताओं को समय पर उच्च क्वालिटी की सेवाएँ भी प्राप्त हो जाती हैं। बाह्यस्रोतीकरण की सहायता से व्यवसायी अपने सीमित समय व धन को, उत्कृष्ट कुशलता और प्रभावपूर्णता के लिए केवल कुछ ही चीजों में लगा सकते हैं। 

प्रश्न 3. 
ई-व्यवसाय के किन्हीं दो अनुप्रयोगों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
ई-व्यवसाय के अनुप्रयोग-
1. ई-अधिप्राप्ति-ई-व्यवसाय में व्यावसायिक फर्मों के मध्य इन्टरनेट आधारित विक्रय लेन-देन सम्बद्ध होते हैं, जिसमें विपरीत नीलामी जो कि अकेले क्रेता, व्यवसायी और उनके विक्रेताओं के मध्य ऑनलाइन व्यापार को आसान बनाती है और अंकीय बाजार स्थलों (डिजिटल मार्केट प्लेस), जो कि विक्रेताओं एवं क्रेताओं के मध्य ऑनलाइन व्यापार को सुगम बनाते हैं, भी सम्मिलित होते हैं। 

2. ई-बोली या ई-नीलामी-बहुत-सी खरीददारी वेबसाइटों पर अपने आप मूल्य प्रस्तुत करने की सुविधा होती है ताकि आप वस्तुओं और सेवाओं के लिए बोली लगा सकें (जैसे कि एयरलाइन टिकटें)। इसमें ई-निविदाएँ भी शामिल होती हैं, इसमें कोई भी अपना निविदा मूल्य ऑनलाइन प्रस्तुत कर सकता है। 

प्रश्न 4. 
बाह्यस्रोतीकरण में शामिल नैतिक सरोकार कौनसे हैं? 
उत्तर:
बाह्यस्रोतीकरण में शामिल नैतिक सरोकार-एक जूता कम्पनी जो अपनी लागत को कम करने के लिए अपने उत्पादन का बाह्यस्त्रोतीकरण ऐसे विकासशील देश को करती है जहाँ बाल श्रमिकों/औरतों से कारखानों में कार्य करवाया जाता हो; जबकि अपने देश में वह ऐसा बाल श्रम पर रोक लगाने वाले सख्त कानून की वजह से नहीं कर सकती है तो क्या ऐसे देशों में जहाँ बाल-श्रम गैर-कानूनी नहीं है या फिर वहाँ कानून कमजोर है, लागत कम करने का यह तरीका नैतिक है? इस प्रकार कार्य का बाह्यस्रोतीकरण उन देशों को करना है जहाँ लिंग और मजदूरी के आधार पर . भेदभाव किया जाता है। क्या यह नैतिक है? 

प्रश्न 5. 
ई-व्यवसाय में डाटा संग्रहण एवं प्रसारण जोखिमों का वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
ई-व्यवसाय में डाटा संग्रहण एवं प्रसारण जोखिम-डाटा चाहे कम्प्यूटर प्रणाली में संग्रहित हो या फिर मार्ग में हों, अनेक जोखिमों से आरक्षित होते हैं। महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ कुछ स्वार्थी उद्देश्यों या सिर्फ मजाक के लिए चोरी अथवा संशोधित कर ली जाती हैं। इसे ‘वायरस’ और ‘हैकिंग’ का नाम दिया गया है। वायरस एक प्रोग्राम है जो कि अपनी पुनरावृत्ति इसकी कम्प्यूटर प्रणाली पर करता रहता है। कम्प्यूटर वायरस का प्रभाव क्षेत्र स्क्रीन प्रदर्शन में मामूली छेड़छाड़ से लेकर कार्यप्रणाली में बाधा तक, लक्षित डाटा फाइलों को क्षति तक तथा समूची प्रणाली को क्षति तक हो सकता है।

एंटी वायरस प्रोग्रामों की स्थापना एवं समय-समय पर उनके नवीनीकरण और फाइलों एवं डिस्कों की एंटी वायरस द्वारा जाँच आपकी डाटा फाइलों, फोल्डरों और कम्प्यूटर प्रणाली को वायरस के हमले से बचाती है। प्रसारण के द्वारा भी डाटा अवरुद्ध हो सकते हैं। यह भी एक जोखिम है। इसके लिए क्रिप्टोग्राफी (कूटलेखन विधि) का प्रयोग किया जा सकता है। क्रिप्टोग्राफी से आशय सूचना बचाव की उस कला से है, जिसमें उसे एक अपठनीय प्रारूप (साइबर उद्धरण) में बदल दिया जाता है। केवल वही व्यक्ति जिसके पास पासवर्ड होता है, सन्देश को स्पष्ट कर सामान्य उद्धरण में बदल सकता है। 

दीर्घउत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
ई-व्यवसाय और बाह्यस्रोतीकरण को व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ क्यों कहा जाता है? इन प्रवृत्तियों की बढ़ती महत्ता के लिए उत्तरदायी कारकों का विवेचन कीजिए। 
उत्तर:
विगत कुछ वर्षों में व्यवसाय करने के तरीकों में अनेक मूलभूत परिवर्तन हुए हैं। इन्हें ‘व्यवसाय की उभरती पद्धतियाँ’ नाम दिया गया है। इनमें से एक है व्यवसाय का अंकीयकरण (इलेक्ट्रोनिक्स से एक शब्द)-जिसे इलेक्ट्रॉनिक व्यवसाय भी कहा जाता है और, द्वितीय है बाह्यस्त्रोतीकरण। 

व्यवसाय की ये नई पद्धतियाँ नया व्यवसाय नहीं हैं वरन् यह तो व्यवसाय करने के नये तरीके हैं, जिनके कई कारण हैं। एक गतिविधि के रूप में व्यवसाय का उद्देश्य वस्तुओं एवं सेवाओं के रूप में उपयोगिता एवं मूल्य का सृजन होता है जिन्हें आम उपभोक्ता एवं व्यावसायिक क्रेता अपनी आवश्यकता एवं इच्छा-पूर्ति के लिए खरीदते हैं। इसी प्रकार व्यवसाय प्रक्रियाओं को उन्नत करने के प्रयास में चाहे वह क्रय और उत्पादन, विपणन, वित्त अथवा मानव संसाधन हों, व्यवसाय प्रबन्धक और व्यवसाय चिन्तक हमेशा कार्य करने के लिए नये एवं बेहतर तरीकों को विकसित करने में लगे रहते हैं।

व्यावसायिक संस्थाओं को अच्छी गुणवत्ता, कम मूल्य, तीव्र सुपुर्दगी और अच्छी ग्राहक सेवा के लिए ग्राहकों की बढ़ती माँग और बढ़ते प्रतिस्पर्धी दबाव को सफलतापूर्वक झेलने के लिए अपनी उपयोगिता, सृजन एवं मूल्य सुपुर्दगी क्षमताओं को मजबूत बनाना आवश्यक होता है। इसके अलावा उभरती तकनीकों से लाभ प्राप्त करने की इच्छा से भी यही तात्पर्य है कि एक गतिविधि के रूप में व्यवसाय लगातार विकसित हो। ई-व्यवसाय और बाह्यस्त्रोतीकरण इसमें अत्यधिक योगदान कर रहा है। 

संजीव पास बुक्स ई-व्यवसाय को ऐसे उद्योग, व्यापार और वाणिज्य के संचालन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसमें कम्प्यूटर नेटवर्क (तन्त्र) का प्रयोग किया जाता है। व्यावसायिक संस्थाएँ इन्टरनेट (निजी और अधिक सुरक्षित नेटवर्क) का प्रयोग अपने आन्तरिक कार्यों के अधिक प्रभावी एवं कुशल प्रबन्धन के लिए करती हैं। 

बाह्यस्रोतीकरण सामान्यतः व्यवसाय की गैर-मुख्य और बाद में कुछ मुख्य गतिविधियों को तृतीय पक्ष विशेषज्ञों को उनके अनुभव, निपुणता, कार्यकुशलता और यहाँ तक कि निवेश से लाभान्वित होने की विचार से किया जाता है। 

ई-व्यवसाय तथा बाह्यस्त्रोतीकरण के बढ़ते हुए महत्त्व के कारण- 
1.विशिष्टता-व्यवसाय करने के तरीके लगातार बदलते जा रहे हैं। प्रतिदिन उत्पादन के तरीकों में नव प्रवर्तन होता है। अतः यह जरूरी हो जाता है कि ग्राहकों को सन्तुष्ट करने के लिए उत्पादन में नई तकनीकों का प्रयोग किया जाये जिससे विशिष्टता का लाभ भी प्राप्त हो सके। 

2. बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा-आज वैश्वीकरण के युग में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा ने व्यवसायी को यह सोचने के लिए. विवश कर दिया है कि वह न केवल उच्च किस्म की वस्तुओं का निर्माण करे वरन् उनकी कीमत भी कम होनी चाहिए। उनमें नयापन होना चाहिए। यह सब केवल ई-व्यवसाय तथा बाह्यस्रोतीकरण के द्वारा ही अधिक सम्भव है। 

3. अंकीय प्रणाली का प्रादुर्भाव-आज कम्प्यूटर ने व्यावसायिक क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रान्ति ला दी है। इन्टरनेट ने तो सम्पूर्ण विश्व को एक गाँव में बदल दिया है। अतः आज का व्यवसायी ई-व्यवसाय की सहायता से सम्पूर्ण विश्व की आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है। 

4. उत्कृष्टता-बाह्यस्रोतीकरण दो प्रकार से व्यावसायिक संस्थाओं को उत्कृष्टता प्राप्त करने में सहायक होता है। एक, संस्था उन गतिविधियों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती है, जिनमें वह सीमित मात्रा में ध्यान केन्द्रित करने के कारण अच्छा कर सकती है और दूसरा, वह अपनी शेष बची हुई गतिविधियों को उन लोगों को प्रदान कर, जो कि उनके निष्पादन में सर्वश्रेष्ठ हैं, अपनी क्षमताओं में विस्तार द्वारा भी उत्कृष्टता हासिल कर सकती है। 

5. कम लागत-व्यावसायिक संस्थाएँ अपनी गतिविधियों को ई-व्यवसाय तथा बाह्यस्त्रोतीकरण की सहायता से कम लागत में सम्पन्न कर सकती हैं। 

6. उद्यमशीलता, रोजगार एवं निर्यात को प्रोत्साहन-ई-व्यवसाय तथा बाह्यत्रोतीकरण देश में उद्यमशीलता, रोजगार एवं निर्यात को प्रोत्साहन देने में सहायक हो रहे हैं। 

प्रश्न 2. 
ऑनलाइन व्यापार में सम्मिलित कदमों का विस्तृत वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
ऑनलाइन व्यापार में सम्मिलित कदम 
प्रचालन के आधार पर, कोई भी ऑनलाइन लेन-देनों में तीन अवस्थाओं की कल्पना कर सकता है-

उपर्युक्त प्रथम दो अवस्थाओं में सूचना का प्रवाह सम्मिलित है। सूचनाओं का आदान-प्रदान पारम्परिक व्यवसाय में भी होता है किन्तु उसमें समय एवं लागत प्रमुख बाधा होती हैं। आमने-सामने बातचीत के पक्षकार के पास जाने के लिए यात्रा करनी पड़ेगी जिसके लिए यात्रा प्रयत्न, अधिक समय और लागत की जरूरत होती है। टेलीफोन द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान करने में दोनों पक्षकारों की एक-साथ उपस्थिति होनी आवश्यक हो जाती है। यदि डाक द्वारा सूचना का प्रसारण होता है तो यह भी एक महंगी प्रक्रिया एवं समय लेने वाला कार्य है। इन्टरनेट सूचना का प्रसारण के लिए ऐसे चौथे माध्यम के रूप में आता है जो कि उपरोक्त सभी समस्याओं से मुक्त है। इन्टरनेट के माध्यम से व्यवसाय करना ही ऑन-लाइन लेन-देन कहलाता है। इस प्रकार के लेन-देन करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनानी होती है-
 
1. पंजीकरण-ऑनलाइन खरीददारी से पूर्व व्यक्ति को एक पंजीकरण फॉर्म भरकर ऑनलाइन विक्रेता के पास पंजीकरण करवाना होता है। यहाँ पंजीकरण का तात्पर्य यह है कि आपका ऑनलाइन विक्रेता के पास एक खाता है। ‘पासवर्ड’ आपके खाते के उपखण्डों से सम्बन्धित अन्य विभिन्न विवरणों में से एक है जिन्हें ऑनलाइन लेन-देन के लिए भरना पड़ता है, और ‘शॉपिंग कार्ट’ आपके संकेत शब्द के सुरक्षक होते हैं। 

2. आदेश प्रसारित करना-‘शॉपिंग कार्ट’ (खरीददारी गाड़ी/ट्राली) में आप किसी भी वस्तु को चुन सकते हैं और छोड़ भी सकते हैं। शॉपिंग कार्ट’ उन सबका ऑनलाइन अभिलेख होता है जिन्हें आपने ऑनलाइन भण्डार (स्टोर) पर करते समय चुना होगा। जैसे आप वास्तविक स्टोर में से अपनी गाड़ी या ट्राली में वस्तुएँ रख सकते हैं और फिर उससे निकालकर ले जा सकते हैं। ठीक उसी प्रकार आप ऑनलाइन खरीददारी करते समय कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करने के बाद कि आप क्या खरीदना चाहते हैं, आप बाहर निकलकर अपने भुगतान विकल्पों को चुन सकते हैं। 

3. भुगतान तन्त्र-ऑनलाइन लेन-देन की प्रक्रिया के इस चरण में माल के क्रय करने के पश्चात् उसके भुगतान की व्यवस्था की जाती है। भुगतान अनेक विधियों से किया जा सकता है- 
(1) सुपुर्दगी के समय नकद-इसमें ऑनलाइन आदेशित वस्तुओं के लिए नकद में भुगतान वस्तुओं की भौतिक सुपुर्दगी के समय किया जाता है। 

(2) चैक-ऑनलाइन विक्रेता ग्राहक के पास से चैक लेने का इन्तजार कर सकता है। वस्तु की सुपुर्दगी चैक की वसूली के बाद की जा सकती है। 

(3) नेट बैंकिंग हस्तान्तरण-आजकल बैंक अपने ग्राहकों को इन्टरनेट पर कोषों के इलेक्टॉनिक हस्तान्तरण की सुविधा प्रदान करते हैं। जिसमें आई.एम.पी.एस., एन.ई.एफ.टी. (NEFT) और आर.टी.जी.एस. (RTGS) सम्मिलित हैं। इस स्थिति में क्रेता लेन-देन की एक निश्चित राशि ऑनलाइन विक्रेता के खाते में हस्तान्तरित कर सकता है जो कि इसके बाद माल की सुपुर्दगी की व्यवस्था करता है। जो कि इसके बाद वस्तुओं की सुपुर्दगी की व्यवस्था करता है। 

(4) क्रेडिट और डेबिट कार्ड-क्रेडिट कार्ड (प्लास्टिक मुद्रा) ऑनलाइन लेन-देन में सर्वाधिक लोकप्रिय प्रयुक्त किया जाने वाला माध्यम है। लगभग 95 प्रतिशत ऑनलाइन इनके द्वारा ही कार्यान्वित होते हैं। क्रेडिट कार्ड अपने धारक को उधार खरीदने की सुविधा प्रदान करते हैं, कार्ड-धारक पर बकाया राशि कार्ड जारीकर्ता बैंक अपने ऊपर ले लेता है और बाद में लेन-देन में प्रयुक्त इस राशि को विक्रेता के ‘जमा’ में हस्तान्तरित कर देता है। क्रेता का खाता भी इस राशि से ‘नाम’ कर दिया जाता है। डेबिट कार्ड धारक को उस सीमा तक खरीददारी करने की अनुमति प्रदान करता है, जिस राशि तक उसके खाते में धन-राशि उपलब्ध होती है। जिस क्षण कोई लेन-देन किया जाता है, भुगतान के लिए बकाया राशि इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इसके कार्ड से घट जाती है। 

(5) अंकीय (डिजीटल) नकद-यह इलेक्ट्रॉनिक मुद्रा का एक रूप है जिसका अस्तित्व केवल साइबर स्थान (स्पेस) में ही होता है। इस तरह की मुद्रा के कोई वास्तविक भौतिक गुण नहीं होते हैं, परन्तु यह वास्तविक मुद्रा को इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप में प्रस्तुत करने में सक्षम होती है। सर्वप्रथम आपको बैंक में इस राशि का भुगतान (चैक, ड्राफ्ट इत्यादि द्वारा) करना होगा, जो कि उस अंकीय नकद के समतुल्य होगी, जिसे आप अपने पक्ष में जारी करवाना चाहते हैं। तत्पश्चात् ई-नकद में लेन-देन करने वाला बैंक आपको एक विशेष सॉफ्टवेयर भेजेगा जो कि आपको, बैंक में स्थित अपने खाते से अंकीय नकद निकासी की अनुमति प्रदान करेगा। तब आप अंकीय कोषों का प्रयोग वेबसाइट पर क्रय करने में कर सकते हैं। इस भुगतान प्रणाली द्वारा इन्टरनेट पर क्रेडिट कार्ड संख्याओं के प्रयोग सम्बन्धी सुरक्षा समस्याओं के दूर करने की आशा की जा सकती है। 

प्रश्न 3. 
बाह्यस्त्रोतीकरण की आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिए एवं इसकी सीमाओं का विवेचन कीजिए। 
उत्तर:
बाह्यस्त्रोतीकरण की आवश्यकता 
बाह्यस्रोतीकरण उस दीर्घावधि अनुबन्ध प्रदान करने की प्रक्रिया को कहा जाता है जिसमें सामान्यत: व्यवसाय की द्वितीयक (गैर-मुख्य) और बाद में कुछ मुख्य गतिविधियों को आबद्ध अथवा तृतीय पक्ष विशेषज्ञों को उनके अनुभव, निपुणता, कार्यकुशलता और यहाँ तक कि निवेश से लाभान्वित होने के विचार से किया जाता है। बाह्यस्रोतीकरण की आवश्यकता के प्रमुख कारण निम्नलिखित गिनाये जा सकते हैं- 

1. ध्यान केन्द्रित करना-आज के समय में व्यावसायिक संस्थाएँ अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए कुछ क्षेत्रों, जिनमें उनके पास विशिष्ट क्षमताएँ एवं सामर्थ्य उपलब्ध हैं, में ध्यान केन्द्रित कर अन्य बची हुई गतिविधियों को अपने बाह्यस्त्रोतीकरण साझेदार को सौंपने की महत्ता को महसूस कर रही हैं। आज उत्पादकता अथवा मूल्य-सृजन के लिए एक व्यवसाय अनेकों प्रक्रियाओं में संलग्न रहता है। अतः उसे अपने आपको परिभाषित या पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार बाह्यस्रोतीकरण व्यवसाय के कार्यक्षेत्र को सीमित करने, उन्हें अपना ध्यान और संसाधनों की बेहतर कार्यकुशलता और प्रभावपूर्णता के लिए केन्द्रित करने में सहायक होता है। 

2. उत्कृष्टता की खोज-बाह्यस्त्रोतीकरण दो प्रकार से व्यावसायिक संस्थाओं को उत्कृष्टता प्राप्त करने में सहायक होता है। प्रथम, संस्था उन गतिविधियों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती है जिनमें वह सीमित मात्रा में ध्यान केन्द्रित करने के कारण अच्छा कर सकती है और द्वितीय, वह अपनी बाकी बची हुई गतिविधियों की संविदा उन लोगों को प्रदान कर, जो कि उनके निष्पादन में सर्वश्रेष्ठ है, अपनी क्षमताओं में विस्तार करके भी उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती उत्कृष्टता की खोज में न केवल यह जानना आवश्यक है कि आपको किस पर ध्यान केन्द्रित करना है वरन् यह भी कि आप दूसरों से अपने लिए क्या करवाना चाहते हैं। 

3. लागत की कमी-वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता न केवल वैश्विक गुणवत्ता वरन् वैश्विक प्रतिस्पर्धी कीमतों को भी आवश्यक बना देती है। प्रतिस्पर्धी दबाव के कारण जब कीमतें कम हो रही हों तो संस्था के लिए अपना अस्तित्व और लाभदेयता बनाये रखने का एकमात्र तरीका लागत में कमी करना होता है। श्रम-विभाजन और विशिष्टीकरण न केवल गुणवत्ता में सुधार लाते हैं. अपितु लागत में भी कमी लाते हैं। ऐसा बाह्यस्रोतीकरण साझेदारों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लाभ के कारण होता है। क्योंकि ये एक जैसी सेवा अन्य अनेक संगठनों को प्रदान करते हैं। विभिन्न देशों में उत्पादन के साधनों की कीमत में अन्तर भी लागतों में कमी लाने वाला एक प्रमुख कारण है।

4. गठबन्धन द्वारा विकास-जिस सीमा तक आप दूसरों की सेवाएँ ग्रहण करेंगे उस सीमा तक आपकी विनिवेश/निवेश की जरूरतें कम हो जायेंगी, क्योंकि अन्य लोगों ने आपके लिए उन गतिविधियों में निवेश किया है। यहाँ तक कि यदि आप अपने बाह्यस्त्रोतीकरण साझेदार के व्यवसाय में हिस्सेदारी चाहेंगे तब भी आप न केवल उसके द्वारा आपको उपलब्ध करवायी गई कम लागत एवं उत्कृष्ट गुणवत्ता सेवाओं का लाभ प्राप्त करेंगे अपितु उसके द्वारा किये गये सम्पूर्ण व्यवसाय से हुए लाभ में भी हिस्सेदारी से लाभान्वित होंगे। इस तरह आप तीव्र गति से विस्तार कर पायेंगे। क्योंकि निवेश योग्य कोषों की एक धनराशि के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में व्यवसाय सृजित होंगे। इसके अतिरिक्त वित्तीय प्रतिफलों के अलावा बाह्यस्रोतीकरण अन्तर-संगठन जानकारी में हिस्सेदारी और सम्मिलित अधिगम को भी सुगम बनाता है। 

5. आर्थिक विकास को प्रोत्साहन-बाह्यस्रोतीकरण, देश की भौगोलिक सीमाओं से बाहर बाह्यस्रोतीकरण अतिथेय/मेजबान देशों (अर्थात् वह देश जहाँ से बाह्यस्रोतीकरण किया गया है) में उद्यमशीलता, रोजगार एवं निर्यात को प्रोत्साहन देता है। उदाहरण के लिए भारत में अकेले सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में उद्यमशीलता, रोजगार और निर्यात में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। इस कारण जहाँ तक सॉफ्टवेयर विकास एवं सूचना प्रौद्योगिकी जन्य सेवाओं में वैश्विक बाह्यस्रोतीकरण का सम्बन्ध है, हम निर्विवाद रूप से अग्रणी हैं। 

बाह्यत्रोतीकरण की सीमाएँ
बाह्यस्रोतीकरण की कुछ प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं- 
1. गोपनीयता के अभाव में हानि-बाह्यस्रोतीकरण बहुत-सी महत्त्वपूर्ण सूचना एवं जानकारी की हिस्सेदारी पर निर्भर करता है। यदि बाह्यस्रोतीकरण साझेदार गोपनीयता नहीं बरतता है या वह इसे प्रतिस्पर्धियों को पहुँचा देता है तो यह उस पक्ष को काफी नुकसान पहुँचा सकता है जिसने अपनी प्रक्रियाओं का बाह्यत्रोतीकरण करवाया है। 

2. परिश्रम (स्वेट) खरीददारी-व्यावसायिक संस्थाएँ जो बाह्यस्रोतीकरण करवाती हैं, अपनी लागतें कम करने के लिए मेजबान देशों की निम्न मानव संसाधन लागत का अधिक से अधिक लाभ उठाने की कोशिश करती हैं । ज्यादातर यह देखा गया है कि जिस कार्य का बाह्यस्रोतीकरण किया जाता है वह इस प्रकार का घटक अथवा कार्य होता है जो कि एक बेलोच निर्धारित प्रक्रिया या पद्धति के अनुपालन के लिए आवश्यक कौशल से परे बाह्यस्रोतीकरण साझेदार के . सामर्थ्य एवं क्षमताओं में बहुत अधिक वृद्धि नहीं करता है। इस तरह बाह्यस्रोतीकरण कराने वाली संस्था जिसे देखने का प्रयत्न करती है, वह ‘चिंतन कौशल’ के विकास के बजाय ‘कार्य कौशल’ होता है। 

3. नैतिक सरोकार-एक जूता कम्पनी जो अपनी लागत कम करने के लिए अपने उत्पादन का बाह्यस्त्रोतीकरण। ऐसे विकासशील देश को करती है जहाँ बाल श्रमिकों/औरतों से कारखाने में कार्य करवाया जाता हो जबकि अपने देश में वह ऐसा बाल-श्रम पर रोक लगाने वाले सख्त कानून की वजह से नहीं कर सकती है तो क्या ऐसे देशों में जहाँ बाल श्रम गैर-कानूनी नहीं है या फिर वहाँ कानून कमजोर है, लागत कम करने का यह तरीका नैतिक है? इस प्रकार कार्य का बाह्यस्रोतीकरण उन देशों को करना है जहाँ लिंग के आधार पर मजदूरी के आधार पर भेदभाव किया जाता है, क्या नैतिक है? 

4. गृह देशों में विरोध-विपणन, उत्पादन, शोध एवं विकास तथा सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सेवाओं की करण की सीमाएँ संविदाएँ बाहर देने पर रोजगार एवं नौकरियाँ बाहर जाती हैं। फलतः गृह देश (अर्थात् वह देश जहाँ से नौकरियाँ बाहर भेजी गई हैं) में विरोध पनप सकता है। विशेषकर उस समय जब देश बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त हो। 

प्रश्न 4. 
फर्म से ग्राहक कॉमर्स के प्रमुख पहलुओं का विवेचन कीजिए। 
उत्तर: 
फर्म से ग्राहक कॉमर्स
फर्म से ग्राहक (व्यवसाय से ग्राहक) लेन-देनों में एक सिरे पर व्यावसायिक फर्म होती है तो दूसरे सिरे पर इसके ग्राहक होते हैं। इस समय जो बात मस्तिष्क में आती है वह है ऑनलाइन खरीददारी, परन्तु यह समझना चाहिए कि विक्रय, विपणन प्रक्रिया का परिणाम है और विपणन की शुरुआत उत्पाद को बेचने के लिए प्रस्तुत करने से बहुत पहले हो जाती है और उत्पाद की बिक्री के बाद तक चलती रहती है। इस प्रकार फर्म से ग्राहक कॉमर्स में विपणन गतिविधियों जैसे गतिविधियों को पहचानना, संवर्द्धन और कभी-कभी उत्पादों की ऑनलाइन सुपुर्दगी (उदाहरण के लिए संगीत एवं फिल्में) का विस्तृत क्षेत्र सम्मिलित होता है। ई-कॉमर्स इन गतिविधियों को बहुत कम लागत परन्तु तीव्र गति से सुगम बनाता है।

उदाहरण के लिए ए.टी.एम. ने धन की निकासी को तेज बना दिया है। आजकल ग्राहक भी यह चाहते हैं कि उन पर व्यक्तिगत ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्हें न केवल ऐसी उत्पाद विशेषताएँ चाहिए जो कि उनकी जरूरतों के अनुसार हों वरन् उन्हें सुपुर्दगी की सहूलियत और अपनी इच्छानुसार भुगतान की सुविधा भी चाहिए। ई-कॉमर्स के प्रादुर्भाव से यह सब किया जा सकता है। 

इसके साथ ही ई-कॉमर्स का फर्म से ग्राहक रूप एक व्यवसाय के लिए हर समय अपने ग्राहकों के सम्पर्क में रहना सम्भव बनाता है। कम्पनियाँ यह जानने के लिए कि कौन क्या खरीद रहा है और ग्राहक सन्तुष्टि का स्तर क्या है, ऑनलाइन सर्वेक्षण करवा सकती हैं। 

फर्म से ग्राहक, व्यवसाय से ग्राहक तक का एकतरफा आवागमन है। परन्तु यह भी ध्यान में रहना चाहिए कि इसका परिणाम, ग्राहक से फर्म कॉमर्स भी एक सच्चाई है जो ग्राहकों को इच्छानुसार खरीददारी की स्वतन्त्रता उपलब्ध कराती है। ग्राहक कम्पनियों द्वारा स्थापित कॉल सेंटरों का प्रयोग कर किसी भी समय बिना किसी अतिरिक्त लागत के निःशुल्क फोन पर अपनी शंकाओं का समाधान एवं शिकायतें दर्ज करा सकते हैं। इस प्रक्रिया की मुख्य बात यह है कि इन कॉल सेंटरों अथवा हैल्प लाइनों की स्थापना स्वयं करने की आवश्यकता नहीं होती है, वरन् इनका बाह्यस्रोतीकरण किया जा सकता है। 

प्रश्न 5. 
व्यवसाय करने की इलेक्ट्रॉनिक पद्धति की सीमाओं की विवेचना कीजिए। क्या ये सीमाएँ इसके कार्यक्षेत्र को प्रतिबन्धित करने के लिए काफी हैं? अपने उत्तर के लिए तर्क दीजिए। 
उत्तर: 
ई-व्यवसाय (इलेक्ट्रॉनिक पद्धति) की सीमाएँ 
व्यवसाय करने की इलेक्ट्रॉनिक पद्धति की कुछ प्रमुख सीमाएँ निम्नलिखित हैं- 
1. अल्प मानवीय स्पर्श-यह सही है कि ई-व्यवसाय आधुनिक हो सकता है परन्तु इसमें अन्तर-व्यक्ति . पारस्परिक सम्पर्क की गर्माहट का अभाव होता है। इस सीमा के कारण यह उन उत्पाद श्रेणियों जिनमें उच्च वैयक्तिक स्पर्श की आवश्यकता होती है जैसे कि वस्त्र, प्रसाधन इत्यादि के व्यवसाय के लिए अपेक्षाकृत कम उपयुक्त विधि है क्योंकि इनमें व्यक्तिगत सम्पर्क की अधिक आवश्यकता होती है।

2. आदेश प्राप्ति/प्रदान और आदेश पूरा करने की गति के मध्य समरूपता का अभाव-सूचना माउस को क्लिक करने मात्र से ही प्रवाहित हो सकती है, परन्तु वस्तुओं की भौतिक सुपुर्दगी में समय ले ही लेती है। यह असमरूपता ग्राहक के सब्र पर भारी पड़ सकती है। कई बार तकनीकी कारणों से वेबसाइट खुलने में असामान्य रूप से अधिक समय ले सकती है। यह बात भी प्रयोगकर्ता को हतोत्साहित कर सकती है। 

3. ई-व्यवसायों के पक्षों में तकनीकी क्षमता और सामर्थ्य की आवश्यकता-ई-व्यवसाय में सभी पक्षों की कम्प्यूटर के संसार से उच्च कोटि के परिचय की आवश्यकता होती है और यही आवश्यकता समाज में विभाजन, जिसे कि अंकीय-विभाजन कहा जाता है, के लिए उत्तरदायी होती है, जिसमें समाज का अंकीय तकनीक से परिचितता और अपरिचितता के आधार पर विभाजन हो जाता है। 

4. पक्षकारों की अनामता और उन्हें ढूँढ़ पाने की अक्षमता के कारण जोखिम में वृद्धि होना-इंटरनेट लेन देन साइबर व्यक्तियों के बीच होते हैं। ऐसे में पक्षों की पहचान सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है। यहाँ तक कि कोई यह भी नहीं जान सकता है कि पक्षकार किस स्थान से प्रचालन कर रहे हैं। यह जोखिम भरा होता है, इसलिए इन्टरनेट लेन-देन भी जोखिम-भरा है। इसमें अप्रतिरूपण (किसी अन्य का आपके नाम पर लेन-देन करना) और गुप्त सूचनाओं के बाहर निकलने, जैसे कि क्रेडिट कार्ड विवरण जैसे अतिरिक्त खतरे भी हो सकते हैं। तत्पश्चात् वायरस और हैकिंग की समस्या भी हो सकती है। 

5. जन-प्रतिरोध-नई तकनीक के साथ समायोजन की प्रक्रिया एवं कार्य करने के तरीके तनाव एवं असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। इसके परिणामस्वरूप लोग संस्था के ई-व्यवसाय के प्रवेश की योजना का विरोध कर सकते हैं। 

6. नैतिक पतन-आजकल कम्पनियाँ आपके द्वारा प्रयोग की गई कम्प्यूटर फाइलों, आपके ई-मेल खातों, वेबसाइट जिन पर आप जाते हैं और ऐसी अन्य जानकारियों के लिए एक विशेष सॉफ्टवेयर जैसे इलेक्ट्रॉनिक आई का प्रयोग करते हैं। क्या यह नैतिक है?

ई-व्यवसाय की उपर्युक्त सीमाओं के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि अधिकतर सीमाएँ अब उबरने की प्रक्रिया में हैं। निम्न स्पर्श की समस्या से छुटकारा पाने के लिए वेबसाइट अब ज्यादा जीवंत होती जा रही हैं। संचार तकनीक, इन्टरनेट के द्वारा संचार की गति एवं गुणवत्ता में लगातार वृद्धि कर रही है। अंकीय विभाजन से उबरने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। अन्त में यह कहा जा सकता है कि ई-व्यवसाय यहाँ बना रहेगा और व्यवसायों, शासन और अर्थव्यवस्थाओं को नया आकार प्रदान करेगा।

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