Chapter 6 व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व एवं व्यावसायिक नैतिकता

Textbook Questions and Answers

लघूत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व से क्या तात्पर्य है? यह कानूनी उत्तरदायित्व से किस प्रकार भिन्न है? 
उत्तर:
व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व से तात्पर्य-व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व से तात्पर्य उन नीतियों का अनुसरण करना, उन निर्णयों को लेना अथवा उन कार्यों को करना है जो समाज के लक्ष्यों एवं मूल्यों की दृष्टि से वांछनीय हैं। दूसरे शब्दों में, व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व से तात्पर्य समाज की आकांक्षाओं एवं इच्छाओं को समझना एवं मान्यता देना, इसकी सफलता के लिए योगदान देने का निश्चय करना साथ ही अपने लाभ कमाने के हित को ध्यान में रखना है। 

सामाजिक उत्तरदायित्व तथा कानूनी उत्तरदायित्व में भिन्नता-

प्रश्न 2. 
वातावरण क्या है? वातावरण प्रदूषण क्या है? 
उत्तर:
वातावरण का अर्थ-वातावरण या पर्यावरण के अन्तर्गत मनुष्य के आस-पास के प्राकृतिक एवं मानव निर्मित दोनों वातावरण को ही सम्मिलित किया जाता है। ये वातावरण प्राकृतिक संसाधनों में भी हैं और जो मानव-जीवन के लिए उपयोगी होता है। इन संसाधनों को प्राकृतिक संसाधन भी कहा जा सकता है, जिसमें भूमि, जल, हवा, वनस्पति तथा कच्चा माल इत्यादि सम्मिलित हैं। मानव निर्मित संसाधन जैसे सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक-आर्थिक संस्थान तथा मनुष्य इत्यादि। 

वातावरण प्रदूषण का अर्थ-वातावरण प्रदूषण वह होता जिससे भौतिक, रासायनिक तथा जैविक लक्षणों द्वारा हवा, भूमि तथा जल में बदलाव आता है। प्रदूषण मानव जीवन के लिए हानिकारक तथा अन्य जीवों को नष्ट करने वाला होता है। यह जीवन स्तर को गिराता है तथा सांस्कृतिक विरासतों को भी हानि पहुंचाता है। 

प्रश्न 3. 
व्यावसायिक नैतिकता क्या है? व्यावसायिक नैतिकता के आधारभूत तत्वों को बतलाइये। 
उत्तर:
व्यावसायिक नैतिकता-व्यावसायिक नैतिकता का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यावसायिक उद्देश्य, चलन तथा तकनीक से है, जो समाज के साथ-साथ चलन में रहते हैं। इस दृष्टि से एक व्यावसायिक इकाई को चाहिए कि वह सही मूल्य वसल करे, सही तोल कर दे, ग्राहकों से सदभावनापूर्ण व्यवहार करे। वस्तुतः नैतिकता में मानवीय कार्यों का यह निश्चित करने के लिए आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाता है कि वे सत्य एवं न्याय दो महत्त्वपूर्ण मानदण्डों के आधार पर सही हैं या गलत।

व्यावसायिक नैतिकता के आधारभूत तत्त्व-

प्रश्न 4. 
संक्षेप में समझाइये 
(क) वायु प्रदूषण 
(ख) जल प्रदूषण तथा 
(ग) भूमि प्रदूषण। 
उत्तर:
(क) वायु प्रदूषण-वायु-प्रदूषण वह है जब बहुत से तत्व मिलकर वायु की गुणवत्ता को कम कर देते हैं। मोटर वाहनों द्वारा छोड़ा गया मोनोऑक्साइड तथा कारखानों से निकला हुआ धुआँ वायु प्रदूषण फैलाता है। 

(ख) जल प्रदूषण-पानी मुख्यतः रसायन एवं कचरा के ढलाव से प्रदूषित हो जाता है। वर्षों से व्यवसायों, कारखानों एवं शहरों का कूड़ा-करकट नदियों एवं झीलों में बिना इसके परिणामों की परवाह किये फेंका जाता रहा है। इससे भी जल प्रदूषित हुआ है। जल प्रदूषण मानव जीवन के लिए एक गम्भीर चेतावनी है। 

(ग) भूमि प्रदूषण-भूमि प्रदूषण का कारण कचरे को भूमि के अन्दर गाड़ देने से होता है। इसके कारण भूमि की गुणवत्ता तो नष्ट होती ही है, भूमि की उर्वरा शक्ति अर्थात् उपजाऊपन भी कम हो जाता है। इस प्रकार का प्रदूषण भी मानव जाति के लिए काफी नुकसानदायक हो गया है। 

प्रश्न 5. 
व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व के मुख्य क्षेत्र क्या हैं? 
उत्तर:
व्यवसाय के सामाजिक उत्तरदायित्व के मुख्य क्षेत्र- 
1. आर्थिक उत्तरदायित्व-व्यावसायिक संस्था चूंकि एक आर्थिक इकाई है अतः इसका सबसे पहला उत्तरदायित्व उपभोक्ता वस्तुओं एवं सेवाओं का समाज को उपलब्ध कराकर तथा लाभ पर विक्रय कर सुलभ कराना है, जिसकी समाज को आवश्यकता है। 

2. कानूनी उत्तरदायित्व-प्रत्येक व्यवसाय का यह भी सामाजिक उत्तरदायित्व है कि वह देश में बनाये हुए सभी कानूनों का पालन करे क्योंकि ये कानून समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हैं। कानून का पालन करने वाला उपक्रम सामाजिक उत्तरदायित्व का पालन करने वाला माना जाता है। 

3. नैतिक उत्तरदायित्व-नैतिक उत्तरदायित्व में वह व्यवहार सम्मिलित है जिसकी समाज को व्यवसाय से अपेक्षा होती है। जैसे किसी भी वस्तु या उत्पाद का विज्ञापन करते समय धार्मिक भावनाओं का आदर किया जाना चाहिए। 

4. विवेकशील उत्तरदायित्व-यह पूर्ण रूप से स्वैच्छिक एवं बाध्यपूर्ण उत्तरदायित्व है जिसे व्यवसाय अपनाते हैं। उदाहरणार्थ शिक्षण संस्थाओं के लिए दान देना अथवा बाढ़ या भूकम्प पीड़ितों की सहायता करना यह विवेकशील उत्तरदायित्व के अन्तर्गत ही आता है। 

प्रश्न 6. 
कंपनी अधिनियम-2013 के अनुसार निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व को परिभाषित करें। 
उत्तर:
निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व का अभिप्राय कम्पनियों की भूमिका से है जो निरन्तर विकास की कार्यसूची तथा आर्थिक प्रगति, सामाजिक प्रगति व पर्यावरण संरक्षण की सन्तुलित धारणा को अपरिहार्य बनाकर निभा सकती है। निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व की कोई सार्वभौमिक स्वीकृत परिभाषा नहीं है। वर्तमान में अस्तित्व में प्रत्येक परिभाषा व्यवसायों के समाज पर प्रभाव तथा उनसे समाज की अपेक्षाओं को आधार बताती हैं । कम्पनी अधिनियम, 2013 में यह उल्लेख है कि निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रावधान उन कम्पनियों पर लागू होते हैं जिनका वार्षिक टर्नओवर 1000 करोड़ रुपया या अधिक है अथवा शुद्ध मूल्य 500 करोड़ रुपया या अधिक है अथवा शुद्ध लाभ 5 करोड़ रुपया या अधिक है। 

यथार्थ में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व एक प्रबन्ध अवधारणा है जिसके द्वारा कम्पनियाँ सामाजिक तथा पर्यावरणीय सरोकारों को व्यवसाय प्रचलनों से एकीकृत करती है तथा उनके हितधारियों से बातचीत करती है। निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व की विचारधारा कम्पनी की आर्थिक, पर्यावरणीय तथा सामाजिक आवश्यकताओं के बीच सन्तुलन स्थापित करती है तथा साथ ही अंशधारकों एवं हितधारकों की अपेक्षाओं का पता लगाती है और उन्हें पूरा करती है। 

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1. 
सामाजिक उत्तरदायित्व के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
सामाजिक उत्तरदायित्व के पक्ष एवं विपक्ष में तर्क 
पक्ष में तर्क-
1. अस्तित्व एवं विकास के लिए-व्यवसाय का अस्तित्व वस्तुओं एवं सेवाओं के मानव जाति की सन्तुष्टि के लिए उपलब्ध कराने पर निर्भर करता है। यथार्थ में व्यवसाय की उन्नति एवं विकास तभी सम्भव है जबकि समाज को वस्तुएँ एवं सेवाएँ नियमित रूप से उपलब्ध होती रहें। अतः एक व्यावसायिक संस्था द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा ही उसके अस्तित्व एवं विकास के लिए औचित्य प्रदान करती है। 

2. फर्म का दीर्घकालीन हित-व्यावसायिक फर्म या संस्था तभी अधिकतम लाभ कमा सकती है जबकि उसका सर्वप्रथम लक्ष्य समाज की सेवा करना हो। यदि कोई फर्म सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता करती है तो जनता (कर्मचारी, उपभोक्ता, अंशधारी, सरकारी अधिकारीगण इत्यादि) की धारणा भी उसके पक्ष में विकसित हो जाती है। 

3. सरकारी विनियमन से बचाव-व्यवसायी के दृष्टिकोण से सरकारी विनियमों का पालन करना अवांछित है क्योंकि वे स्वतन्त्रता को सीमित करते हैं। अतः यह विश्वास किया जाता है कि व्यवसायी वर्ग स्वेच्छा से सामाजिक उत्तरदायित्वों को स्वीकार करके सरकारी विनियमन से बच सकते हैं तथा नये कानून बनाने की आवश्यकता में कमी करने में सहायता कर सकते हैं। 

4. समाज का रख-रखाव-वे व्यक्ति जो यह सोचते हैं कि उन्हें वह सब कुछ व्यवसाय से नहीं मिल रहा है जो निश्चय ही उन्हें मिलना चाहिए। वे दूसरी असामाजिक गतिविधियों का सहारा ले सकते हैं। इससे व्यवसाय के हितों को ठेस लगती है। अतः यह अति आवश्यक है कि व्यावसायिक संगठन सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर जागरूक हों और उन्हें स्वीकार करें। 

5. व्यवसाय में संसाधनों की उपलब्धता-व्यावसायिक संस्थाओं के बहुमूल्य वित्तीय एवं मानवीय संसाधन होते हैं जिनका उपयोग प्रभावशाली ढंग से समस्याओं के समाधान में किया जा सकता है। अतः समाज के पास यह एक अच्छा अवसर है कि वह खोज करे कि ये संसाधन किस प्रकार सहायक हो सकते हैं। सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा इसमें सहायक होती है। 

6. समस्याओं का लाभकारी अवसरों में रूपान्तरण-यह तर्क भी है कि व्यवसाय अपने गौरवपूर्ण इतिहास से जोखिम भरी परिस्थितियों को लाभकारी सौदों में बदलने से केवल समस्याओं को ही नहीं सुलझाते बल्कि प्रभावपूर्ण ढंग से चुनौतियों को स्वीकार करते हैं।

7. व्यापारिक गतिविधियों के लिए बेहतर वातावरण-सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा व्यापारिक गतिविधियों के लिए बेहतर वातावरण उपलब्ध कराती है। जो व्यावसायिक इकाई लोगों के जीवन की गुणवत्ता के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील है उसे अपना व्यवसाय चलाने के लिए परिणामस्वरूप अच्छा समाज मिलेगा। 

8. सामाजिक समस्याओं के लिए व्यवसाय उत्तरदायी-वर्तमान में व्यवसायों ने स्वयं कुछ सामाजिक उत्तरदायित्वों को या तो पैदा किया है या उन्हें स्थायी बनाया है। उदाहरणार्थ पर्यावरण प्रदूषण, असुरक्षित कार्य स्थल, सरकारी संस्थानों में भ्रष्टाचार तथा विभेदात्मक रोजगार प्रवृत्ति ऐसे उदाहरण हैं अतः व्यवसाय का यह नैतिक कर्त्तव्य है कि वह समाज को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाले तत्वों का सामना करे न कि उन्हें समाधान के लिए अन्य व्यक्तियों पर छोड़ दे। 

विपक्ष में तर्क- 
1. अधिकतम लाभ उद्देश्य पर अतिक्रमण-व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता है। अतः ऐसी स्थिति में सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करने की बात इस उद्देश्य के विपरीत ही है। वास्तव में सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह भी प्रभावी ढंग से तभी किया जा सकता है जब लाभ अधिकतम हो। 

2. उपभोक्ताओं पर भार-यह भी तर्क दिया जा सकता है कि प्रदूषण नियन्त्रण तथा वातावरण संरक्षण अत्यन्त खर्चीले उपाय हैं जिन्हें अपनाने में अत्यधिक खर्चा करना पड़ता है। ऐसी दशा में व्यवसायी इस तरह के बोझ को मूल्यों में वृद्धि करके उपभोक्ताओं पर ही डालने का प्रयास करते हैं। अतः सामाजिक उत्तरदायित्व के नाम पर उपभोक्ता से अधिक मूल्य वसूल करना सर्वथा अनुचित ही है। 

3. सामाजिक दक्षता में कमी-वास्तविकता यह है कि व्यवसायियों को सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की न तो कोई समझ होती है और न ही उन्हें कोई प्रशिक्षण दिया जाता है। अतः यह तर्क दिया जाता है कि सामाजिक समस्याओं का निदान अन्य विशेषज्ञ एजेन्सियों द्वारा कराया जाना चाहिए। 

4. विशाल जन-समर्थन का अभाव-सामान्यतया जनता सामाजिक कार्यक्रमों में उलझना पसन्द नहीं करती है। अतः कोई भी व्यावसायिक संस्था जनता के विश्वास के अभाव एवं सहयोग के बिना सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में सफलतापूर्वक कार्य नहीं कर सकती। 

प्रश्न 2. 
उन शक्तियों का वर्णन कीजिये जो व्यावसायिक उद्यमों की सामाजिक जिम्मेदारियों को बढ़ाने के लिए उत्तरदायी हैं। 
उत्तर:
व्यावसायिक उद्यमों की सामाजिक जिम्मेदारियों को बढ़ाने के लिए उत्तरदायी शक्तियाँ 
व्यावसायिक उद्यमों की सामाजिक जिम्मेदारियों को बढ़ाने के लिए उत्तरदायी शक्तियाँ या ताकतें निम्नलिखित हैं- 
1. सार्वजनिक नियमन की आशंका-प्रजातान्त्रिक देश में सरकारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे समाज के सभी वर्गों की समान रूप से सुरक्षा करेगी। जब व्यावसायिक संगठन सामाजिक उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से कार्य नहीं करते हैं तो जनता की सुरक्षा के लिये सार्वजनिक विनियमनों को लागू किये जाने की कार्यवाही की जाती है। इसी सार्वजनिक नियमन की आशंका के कारण व्यावसायिक उद्यम सामाजिक उत्तरदायित्व को अपनाते हैं। 

2. श्रम आन्दोलनों का दबाव-आधुनिक समय में श्रमिक अधिक शिक्षित एवं संगठित तथा अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हुए हैं। श्रमिक संगठन सम्पूर्ण विश्व में श्रमिकों के हित में अधिक कार्य कर रहे हैं। बढ़ती हुई श्रमिक संगठनों की ताकत ने भी उद्योगपतियों को श्रमिकों के हित में कार्य करने के लिए बाध्य किया है। 

3. उपभोक्ताओं की जागरूकता-शिक्षा के विकास, बाजार में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा तथा जन-सम्पर्क के साधनों ने आज उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक एवं सशक्त बना दिया है। इसीलिए व्यवसायियों ने ग्राहकोन्मुखी नीतियाँ बनाने एवं उनका पालन करना शुरू कर दिया है। 

4. व्यवसायियों के लिए सामाजिक मानकों का विकास-आज कोई भी व्यवसायी अपने मनमाने ढंग से या मनमाने मूल्य पर वस्तुओं एवं सेवाओं का विक्रय नहीं कर सकता है। नवीनतम सामाजिक मानकों के विकसित हो जाने से विधिसंगत नियमों का पालन करते हुए व्यवसायी समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। कोई भी व्यवसाय समाज से अलग नहीं हो सकता, समाज ही व्यवसाय को स्थायी एवं उन्नतिशील बनाता है। यह केवल सामाजिक मानकों के आधार पर ही सम्भव हो सकता है। 

5. व्यावसायिक शिक्षा का विकास-व्यावसायिक शिक्षा के विकास ने समाज को सामाजिक उद्देश्यों के प्रति और अधिक जागरूक बना दिया है। आज शिक्षा के प्रसार ने समाज के विभिन्न वर्गों को अधिक समझदार बना दिया है। फलतः आज समाज के सभी वर्ग अपने हितों को अच्छी तरह से पहचानते हैं। 

6. सामाजिक हित तथा व्यावसायिक हितों का सम्बन्ध-आज व्यावसायिक उपक्रमों ने यह सोचना शुरू कर दिया है कि सामाजिक हित तथा व्यावसायिक हित एक-दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। यह धारणा कि व्यवसाय का विकास केवल समाज के शोषण से ही सम्भव है, पुरानी हो चुकी है। इसका स्थान इस विचारधारा ने ले लिया है कि व्यवसाय दीर्घकाल तक तभी चल सकते हैं जब वे समाज की सेवा भली-भाँति करें। अर्थात् वे अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को अधिक से अधिक निभायें। 

7. पेशेवर एवं प्रबन्धकीय वर्ग का विकास-विशिष्ट प्रबन्धन संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों ने पेशेवर एवं प्रबन्धकीय शिक्षा प्रदान कर एक विशिष्ट वर्ग को जन्म दिया है। इस विशिष्टि वर्ग अर्थात पेशेवर प्रबन्धक का स्पष्ट मत है कि व्यवसाय के सफलतापूर्वक संचालन के लिए केवल लाभ अर्जित करने की अपेक्षा समाज के विविध हितों में अधिक रुचि लेनी चाहिए। 

उपरोक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य सामाजिक एवं आर्थिक बल आपस में मिलकर व्यवसाय को एक सामाजिक-आर्थिक क्रिया का रूप देते हैं। यह सामाजिक-आर्थिक क्रिया व्यवसाय को लाभ कमाने के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभाने पर भी जोर देती है। 

प्रश्न 3. 
“व्यवसाय निश्चित रूप से एक सामाजिक संस्था है न कि केवल लाभ कमाने की क्रिया।” व्याख्या कीजिए। 
उत्तर:
व्यवसाय समाज का अभिन्न अंग है। समाज से अलग रहकर व्यवसाय के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है । व्यवसाय के लिए धनोत्पादन के साधन समाज ही प्रदान करता है। समाज के लोगों द्वारा तथा समाज के लिए और समाज में रहकर ही व्यवसाय किया जा सकता है। इसीलिए कहा जाता है कि व्यवसाय का सामाजिक उत्तरदायित्व ही समाज की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं एवं इच्छाओं को पूरा करना है। जो व्यवसाय केवल लाभ कमाने के उद्देश्य, से किया जाता है वह लम्बे समय तक स्थायी नहीं रह सकता है। सेवा भावना व्यावसायिक सफलता की कुंजी मानी जाती है। सेवा भावना को महत्त्व देने वाला व्यवसाय ही स्थायी रह सकता है।

आज के समय में समाज के साधनों का व्यापक हित की दृष्टि से उपयोग नहीं करके केवल अधिकाधिक लाभ कमाना, धन-संग्रह करने का उद्देश्य रखने वाला व्यवसाय कभी सफल नहीं हो सकता। जिस प्रकार जीवन के लिए भोजन अनिवार्य है परन्तु भोजन ही जीवन का ध्येय नहीं है ठीक इसी प्रकार व्यवसाय भी निश्चित रूप से एक सामाजिक संस्था है, न कि केवल लाभ कमाने की क्रिया। हेनरी फोर्ड ने ठीक ही कहा है कि “केवल धन के पीछे भागते रहना ही व्यवसाय नहीं है।” व्यवसाय तो निश्चित रूप से एक सामाजिक संस्था है। व्यवसाय के कुछ उद्देश्य, जो उसे सामाजिक हित के लिए निभाने चाहिए, वे निम्नलिखित हैं- 

1. उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति-वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन एवं वितरण करना व्यवसाय का मुख्य कार्य होता है। अतः प्रत्येक व्यवसायी का समाज के हित में यह दायित्व है कि वह सही समय पर, सही स्थान पर, सही मात्रा में तथा सही कीमत पर वस्तुएँ एवं सेवाएँ उपलब्ध कराये। 

2. श्रमिकों के साथ उचित व्यवहार-श्रमिक एवं कर्मचारी किसी भी व्यवसाय की अमूल्य निधि होती है। इनकी सन्तुष्टि पर ही व्यवसाय की सफलता निर्भर करती है। अतः व्यवसायियों को अपने श्रमिकों एवं कर्मचारियों के साथ न केवल न्यायोचित कार्य करना चाहिए वरन् उनके अधिकतम हित में भी कार्य करना चाहिए। 

3. विनियोजकों को उचित प्रतिफल-आज कोई भी व्यवसाय बिना पूँजी के नहीं चल सकता है। पर्याप्त पूँजी के अभाव में व्यवसाय का अस्तित्व स्थिर नहीं रह सकता है। स्वयं व्यवसायी भी पर्याप्त मात्रा में अपने व्यवसाय के विकास एवं विस्तार के लिए पर्याप्त पूँजी की व्यवस्था नहीं कर पाता। व्यवसायी अपनी इस कमी को विनियोजकों के माध्यम से दूर कर सकता है। विनियोजक भी व्यवसाय में पूँजी तब ही लगायेंगे जबकि उन्हें उनकी आशा के अनुरूप लाभ मिले। व्यवसायी को इन विनियोजकों को अधिक से अधिक प्रतिफल प्रदान करके अपने दायित्व को निभाना चाहिए। 

4. समुदाय के हितों की पूर्ति-व्यवसाय जब समाज में रहकर किया जाता है तो स्थानीय समुदाय को व्यवसाय द्वारा प्रदत्त अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। समुदाय अनेक तकलीफें (प्रदूषण, भीड़-भाड़, गन्दगी, शोर इत्यादि) झेलता है। अतः व्यवसायी को चाहिए कि वह स्थानीय समुदाय के हितों को ध्यान में रखे और इसके प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभायें। 

सार रूप में यह कहा जा सकता है कि व्यवसाय निश्चित रूप से एक सामाजिक संस्था है न कि केवल लाभ कमाने की क्रिया। 

प्रश्न 4. 
व्यावसायिक इकाइयों को प्रदूषण नियन्त्रण उपायों को अपनाने की क्यों आवश्यकता है? 
उत्तर:
व्यावसायिक इकाइयों को प्रदूषण नियन्त्रण उपायों को अपनाने की आवश्यकता 
मानव जाति तथा अन्य जीव-धारियों के लिए वायु, जल तथा हवा अत्यन्त आवश्यक तत्त्व हैं। इनके बिना जीवन . की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। इन जीवनदायी तत्त्वों को कितनी क्षति पहुँचती है, यह इस बात पर अधिक निर्भर करती है कि यहाँ प्रदूषण कितना और किस प्रकार का है। प्रदूषण फैलाने वाले तत्त्वों को कितनी म दिया गया है तथा हमारे माध्यम प्रदूषण स्रोत से कितनी दूर हैं। अत्यधिक प्रदूषण से वायु मनुष्य के लिए साँस लेने में हानिकारक हो सकती है, पानी पीने योग्य नहीं रहता है, भूमि उपजाऊ नहीं होकर विषैले पदार्थ उगलने वाली बन जाती है। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि प्रदूषण रोकने के लिए कुछ आवश्यक कदम उठाये जायें ताकि मानव जीवन ही नहीं सम्पूर्ण विश्व सुखी एवं सम्पन्न भी रह सके। संक्षेप में, प्रदूषण नियन्त्रण की आवश्यकता निम्न कारणों से है- 

1. स्वास्थ्य सम्बन्धी आशंकाओं को कम करना-हमारे समाज में मृत्यु के प्रमुख कारणों में कैंसर, हृदय एवं फेफड़ों से सम्बन्धित बीमारियाँ मुख्य हैं। ये बीमारियाँ मुख्य रूप से वातावरण में दूषित तत्त्वों के कारण होती हैं। प्रदूषण नियन्त्रण उपाय ऐसी बीमारियों की भयंकरता को ही नहीं रोकते, बल्कि मानव जीवन को सुखी बनाने में भी सहायक होते हैं तथा स्वस्थ जीवन जीने का सुअवसर प्रदान करते हैं। 

2. दायित्वों की जोखिम को कम करना-ऐसा हो सकता है कि व्यावसायिक इकाइयों को विषाक्त गैस आदि से पीड़ित कर्मचारियों को क्षतिपूर्ति करने के लिए उत्तरदायी बना दिया जाये जिन्होंने प्रदूषण फैलाया है। अतः यह जरूरी है कि इन दायित्वों की जोखिमों को कम करने के लिए कारखानों एवं भवनों के अन्य भागों में प्रदूषण नियन्त्रण उपकरण स्थापित किये जायें।

3. लागत में बचत-एक प्रभावी प्रदूषण नियन्त्रण कार्यक्रम उत्पादन लागत को कम करने के लिए भी आवश्यक है। यह उस समय अधिक आवश्यक है, जब उत्पादन इकाई, अपनी उत्पादन क्रिया में अधिक कचरा छोड़ रही हो। इस स्थिति में कचरे तथा मशीन की सफाई में अधिक खर्चा करना पड़ेगा। इस होने वाले अधिक खर्चे को प्रदूषण नियन्त्रण उपकरणों का उपयोग करके ही कम किया जा सकता है। 

4. सार्वजनिक-छवि में सधार-आज के समय में जनता वातावरण की गुणवत्ता अर्थात इसके प्रदषण रहित होने के बारे में अधिक जागरूक है। जब एक व्यावसायिक संस्था वातावरण को अच्छा बनाने का उत्तरदायित्व स्वयं ग्रहण कर लेती है तो उस संस्था की सार्वजनिक प्रतिष्ठा एक सार्वजनिक कर्त्तव्यनिष्ठ उद्यम के रूप में उभरती है। 

5. अन्य सामाजिक हित/लाभ-प्रदूषण नियन्त्रण की आवश्यकता इस रूप में भी अधिक है कि इससे बहुत से. लाभ/हित प्राप्त होते है जैसे स्पष्ट दृश्यता, स्वच्छ इमारते, उच्च कोटि का जीवन-स्तर तथा प्राकृतिक उत्पादों की शुद्ध रूप में उपलब्धता सम्भव होना।। 

प्रश्न 5. 
वातावरण को प्रदूषित होने के खतरों से बचाने के लिए एक उद्यम क्या-क्या उपाय कर सकता है? 
उत्तर:
पर्यावरण को नष्ट होने से बचाने का उत्तरदायित्व सभी पक्षों का है। चाहे वह स्वयं सरकार का हो, व्यावसायिक उद्यम हो, उपभोक्ता हो, कर्मचारी हो या समाज के अन्य सदस्य, सभी को इसे प्रदूषित होने से बचाने के लिए कुछ-न-कुछ अवश्य करना चाहिए। खतरनाक प्रदूषित उत्पादों पर रोक लगाने के लिए सरकार कानून बना सकती है। उपभोक्ता, कर्मचारी तथा समाज के सदस्य ऐसे उत्पादों के उपभोग को बन्द कर सकते हैं। व्यावसायिक इकाइयों का यह सामाजिक उत्तरदायित्व है कि वे केवल प्रदूषण-जनित बातों पर ही ध्यान केन्द्रित न करें बल्कि पर्यावरण संसाधनों की सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी अपने ऊपर लें।

व्यावसायिक इकाइयाँ धन की सृजनकर्ता, रोजगार प्रदान करने वाली तथा भौतिक एवं मानवीय संसाधनों को सम्भालने वाली संस्थाएँ हैं। वे यह भी समझती हैं कि प्रदूषण नियन्त्रण से सम्बन्धित समस्याओं को कैसे सुलझाया जा सकता है। वे उत्पादन प्रक्रिया में परिवर्तन करके संयंत्रों के रूप में बदलाव करके, घटिया किस्म के कच्चे माल के स्थान पर उच्च कोटि के कच्चे माल का प्रयोग करके, प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहायता प्रदान कर सकती है। 

संक्षेप में, वातावरण को प्रदूषित होने के खतरों से बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं- 

प्रश्न 6. 
व्यावसायिक नैतिकता के विभिन्न तत्त्वों की व्याख्या कीजिए। 
उत्तर:
व्यावसायिक नैतिकता के तत्त्व व्यावसायिक नैतिकता के कुछ प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं- 
1. उच्चस्तरीय प्रबन्ध की प्रतिबद्धता-उच्चस्तरीय प्रबन्ध को नैतिकता के व्यवहार के सम्बन्ध में संगठन को समझाने में अपनी निर्णायक भूमिका होती है। अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी तथा अन्य उच्चस्तरीय प्रबन्धकों को निश्चित रूप से तथा दृढ़तापूर्वक नैतिकता के व्यवहार के लिए वचनबद्ध होना चाहिए। उन्हें संगठन के मूल्यों के विकास तथा अनुरक्षण के लिए सदैव अपना नेतृत्व अवरुद्ध गति से प्रदान करते रहना चाहिए। 

2. परिणामों का मापन-यद्यपि यह काफी मुश्किल है कि नैतिक कार्यक्रमों की माप की जाये लेकिन फिर भी फर्म या व्यावसायिक संस्था कुछ मानक स्थापित करके ऐसा कर सकती है। भविष्य की कार्यवाही के विषय में उच्चस्तरीय प्रबन्धक तथा कर्मचारियों की टीम इस विषय में वाद-विवाद कर सकते हैं। 

3. सामान्य संहिता का प्रकाशन-वे उद्यम जिनके पास प्रभावी नैतिक कार्यक्रम हैं वे सभी संगठनों के लिए नैतिक सिद्धान्तों को लिखित प्रलेखों के रूप में परिभाषित करते हैं जिन्हें ‘संहिता’ या ‘कोड’ कहा जाता है। इसमें कुछ नैतिक मूल्यों जैसे आधारभूत ईमानदारी, कानून-पालन, उत्पादन सुरक्षा एवं कोटि, कार्यस्थल पर सुरक्षा हितों का टकराव, नियोजन विधियाँ, बाजार की उचित विक्रय प्रणाली तथा वित्तीय प्रतिवेदन आदि के विषय में कानूनी प्रकाशन होने इत्यादि को सम्मिलित करते हैं। 

4. अनुपालन तन्त्र की स्थापना-यह निश्चित करने के लिए कि वास्तविक निर्णय तथा कार्यों का निरूपण फर्म के नैतिक स्तरों के अनुसार किया जाता है, उचित अनुपालन तन्त्र की स्थापना की जानी चाहिए। जैसे प्रशिक्षण के समय नैतिकतापूर्ण व्यवहार करना, भर्ती तथा भाड़े पर श्रम लेने के लिए नैतिक मूल्यों की ओर ध्यान देना तथा अनैतिक कार्यों के बारे में कर्मचारियों को सूचित करना। 

5. प्रत्येक स्तर पर कर्मचारियों को सम्मिलित करना-व्यवसाय को नैतिकता का वास्तविक रूप देने के लिए कर्मचारियों को प्रत्येक स्तर पर सम्मिलित किया जाना चाहिए जिससे कि उनकी सम्बद्धता नैतिक कार्यक्रमों में भी हो सके। संस्था की नैतिकता सम्बन्धी नीतियों के निर्धारण में कर्मचारियों को सम्मिलित करके उनके रुझान एवं विचारों का भी मूल्यांकन करना चाहिए। 

प्रश्न 7. 
कंपनी अधिनियम, 2013 के अनुसार निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व रूपरेखा की व्याख्या करें। 
उत्तर:
कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व रूपरेखा 
1. निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व-कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 में बड़ी कम्पनियों पर निगमीय सामाजिक दायित्व डाला गया है ताकि देश के आर्थिक-सामाजिक उत्थान एवं विकास में उनकी सक्रिय साझेदारी सुनिश्चित की जा सके। कम्पनी अधिनियम, 2013 के अनुसार प्रत्येक ऐसी कम्पनी जिसकी कुल क्षमता 500 करोड़ रुपया या अधिक हो या सकल उत्पाद एक हजार करोड़ रुपये से अधिक हो या वित्तीय वर्ष में कुल लाभ 5 करोड़ रुपये से अधिक हो, अपने निदेशक मण्डल की तीन या अधिक निदेशकों की एक निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व समिति (CSR समिति) का गठन करेगी और इनमें से कम से कम एक स्वतन्त्र संचालक होना । 

2. निदेशकों की रिपोर्ट में व्यक्त करना-कम्पनी द्वारा बनायी गई इस समिति के गठन की जानकारी कम्पनी निदेशक मण्डल की रिपोर्ट में देनी होगी। 

3. समिति के कार्य-सी.एस.आर. समिति के मुख्य कार्य निम्नलिखित होंगे- 

4. निदेशक मण्डल द्वारा कार्यवाही-निदेशक मण्डल सी.एस.आर. समिति द्वारा की गई सिफारिशों पर विचार करेगा, इससे सम्बन्धित नीति का अनुमोदन करेगा तथा अपनी रिपोर्ट में निर्धारित तरीके से इस नीति को प्रकट करेगा तथा कम्पनी की वेबसाइट पर डलवायेगा। साथ ही निदेशक मण्डल यह सुनिश्चित करेगा कि कम्पनी की नीति में सम्मिलित क्रियाकलाप कम्पनी द्वारा किये जायें। 

5. खर्च करना-कम्पनी को अपने प्रत्येक वित्तीय वर्ष के ठीक पहले के तीन वर्ष के औसत शु द्र लाभों का कम से कम 2 प्रतिशत निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्वों पर खर्च करना होगा। 

6. स्थानीय क्षेत्र को प्राथमिकता-कम्पनी निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नीति के अन्तर्गत किये जाने वाले कार्यों में उस स्थानीय क्षेत्र को प्राथमिकता देगी जिस क्षेत्र में कार्यरत होगी। 

7. असफलता का उल्लेख-यदि कोई कम्पनी कम से कम 2 करोड़ रुपया खर्च करने में असफल रहती है तो उसे अपने निदेशक मण्डल की रिपोर्ट में इसका उल्लेख करना होगा। 

8. शुद्ध लाभ की गणना-निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) की गतिविधियों पर खर्च की जाने वाली राशि के शुद्ध लाभ की गणना इस कम्पनी अधिनियम की धारा 196 के अनुसार की जायेगी। 

9. अन्य प्रावधान-निगमीय सामाजिक उत्तरदायित्व नियम, 2014 के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं-

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