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Chapter 7 उसकी माँ

Textbook Questions and Answers

Chapter 7 उसकी माँ

प्रश्न 1. 
क्या लाल का व्यवहार सरकार के विरुद्ध षड्यंत्रकारी था ? 
उत्तर : 
लाल की विचारधारा को देखकर यह स्पष्ट होता है कि वह षड्यंत्रकारी नहीं था अपितु सच्चा देशभक्त था। सरकार ने उसे षड्यंत्रकारी मानते हुए फाँसी की सजा दे दी। जमींदार चाचा से बात करते हुए उसने कहा कि उसके विचार स्वतंत्र हैं। वह, देश की दुरवस्था पर उबल उठता है। वह कट्टर राज-विद्रोही है। उसने अपनी कल्पना बताई कि जो व्यक्ति समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता हो, उसका सर्वनाश हो जाएगा। उसने निर्भीक होकर कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वह षड्यंत्र, विद्रोह और हत्या भी करेगा। स्पष्ट है कि वह षड्यंत्रकारी नहीं था। 

प्रश्न 2. 
पूरी कहानी में जानकी न तो शासन-तंत्र के समर्थन में है न विरोध में, किन्तु लेखक ने उसे केन्द्र में ही नहीं रखा बल्कि कहानी का शीर्षक बना दिया। क्यों ? 
उत्तर : 
कहानी में आदि से अन्त तक जानकी का व्यक्तित्व और कृतित्व ही छाया रहता है। वह एक सच्ची माँ थी। वह लाल के मित्रों को सच्चा स्नेह देती थी। जो लाल को देती थी। उसके मित्र भी उसे माँ कहकर ही पुकारते। एक मित्र ने तो उसे भारत माता का रूप बना दिया। वह जेल में डाले गए लाल और उसके साथियों के लिए खाना ले जाती। वह सभी लड़कों को घर पर भी बड़े प्यार से खिलाती। वह वकीलों से मिलती और उन्हें निर्दोष बताती। लाल की मृत्यु के बाद उसका अन्तिम पत्र जमींदार के पास लेकर आई। उसे सुनकर जमींदार की पत्नी तो रोने लगी लेकिन जानकी भावहीन आँखों से उसे देखती रही। एक वीरांगना माँ की तरह उसने पत्र सुनकर आँसू नहीं बहाए। किन्तुं सच्ची माँ होने के कारण उसने पुत्र के साथ ही अपने प्राण भी त्याग दिए। वास्तव में वह कहानी की मुख्य पात्र है। इस कारण लेखक ने उसे कहानी का शीर्षक बना दिया। 

प्रश्न 3. 
चाचा जानकी तथा लाल के प्रति सहानुभूति तो रखता है किन्तु वह डरता है। यह डर किस प्रकार का है और क्यों है ? 
उत्तर :
जमींदार को लाल 'चाचा' से सम्बोधित करता था। लाल के पिता रामनाथ लेखक की जमींदारी के मैनेजर थे। इस कारण लाल और उसकी माँ जानकी के प्रति जींदार की सहानुभूति थी। वह चाहता था कि लाल राज-विद्रोह के चक्कर में न पड़े। लाल के गिरफ्तार होने के बाद उसने जानकी से मिलना बन्द कर दिया था। वह जमींदार था और सरकार विरोधी नहीं बनना चाहता था। उसे डर था कि कहीं उसकी जमींदारी न छीन ली जाए। उसकी जानकी से बहुत सहानुभूति थी। परंतु एक विद्रोही की माँ होने के कारण वह उससे दूर ही रहना चाहता था। उसे अपनी सुख-सुविधाओं के छिनने का डर था। उसे यह भी डर था कि कहीं उसे षड्यंत्रकारियों का हितैषी समझकर गिरफ्तार न कर लिया जाए। 

प्रश्न 4. 
इस कहानी में तरह की मानसिकताओं का संघर्ष है, एक का प्रतिनिधित्व लाल करता है और दूसरे का उसका चाचा। आपकी नजर में कौन सही है ? तर्कसंगत उत्तर दीजिए। 
उत्तर : 
कहानी में दो तरह की मानसिकता के संघर्ष को दिखाया है। एक तत्कालीन राजसत्ता का विरोधी है दूसरा सत्ता भक्त है। कहानी का युवक पात्र लाल राजविद्रोही है। लाल के चाचा राजसत्ता के पक्षधर हैं, सरकार के चाटुकार हैं। लाल स्वतंत्र विचारधारा का है। उसके सभी साथी भी उसकी विचारधारा के हैं। वह देश की दुरवस्था पर उबल पड़ता है। वह अपने को राजविद्रोही बताता है। उसने चाचा से कहा कि जो व्यक्ति समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता हो, उसका सर्वनाश होना चाहिए। दुष्ट व्यक्ति-नाशक, राष्ट्र के सर्वनाश करने वालों का वह साथ देने को तैयार है। 

लाल ने चाचा से स्पष्ट कह दिया कि 'मैं और आप दो भिन्न सिरों पर हैं। वह षड्यंत्र, विद्रोह और हत्या करने को तैयार है।' चाचा जमींदार है और किसी भी परिस्थिति में सरकार का विरोध करने को तैयार नहीं है। वह सुविधा भोगी है और चाटुकार है। वह राजसत्ता के तलवे चाटने को तैयार है। चाचा पुलिस सुपरिंटेंडेंट से कहता है-"हम तो सात पुश्तों से सरकार के फरमाबरदार हैं।" चाचा तत्कालीन सरकार को धर्मात्मा, विवेकी और न्यायप्रिय बताता है। वह जानकी और लाल के प्रति सहानुभूति तो दिखाता है पर उनका साथ देने को तैयार नहीं है। उसे अपनी जमींदारी छिनने का डर है। 

हम लाल के समर्थक हैं। हमारी दृष्टि में देश प्रधान है, देश की स्वतंत्रता प्रधान है, गलामी और स्वार्थान्धता स्वीकार नहीं है। हम शोषणकारी सरकार का विरोध करना चाहते हैं। लाल भी दुष्ट, व्यक्ति-नाशक राष्ट्र का सर्वनाश चाहता था। लाल की मानसिकता देश और राष्ट्रहित में थी। हम उसी के समर्थक हैं।

प्रश्न 5. 
उन लड़कों ने कैसे सिद्ध किया कि जानकी सिर्फ माँ नहीं भारतमाता है ? कहानी के आधार पर उसका चरित्र-चित्रण कीजिए। 
उत्तर : 
लाल के मित्रों में एक साथी बड़ा हँसोड़ था, खूब तगड़ा और बली था। उस हँसोड़ लड़के ने ही जानकी को भारत माता बताया था। उसका मानना था भारत माँ जानकी की तरह बूढ़ी है। भारत माता का हिमालय माँ का उच्च भाल जैसा है जो सफेद बर्फ से ढका है। जानकी के माथे की दो गहरी लकीरें हिमालय से निकलने वाली गंगा-यमुना नदियाँ हैं। जानकी माँ की नासिका विंध्याचल पर्वत है और ठोढ़ी कन्याकुमारी की तरह है। माँ के केशों को आगे कंधे पर डालकर उसे वर्मा बना दिया। इस प्रकार उसने जानकी माँ को भारत माता बना दिया। 

प्रश्न 6. 
विद्रोही की माँ से संबंध रखकर कौन अपनी गरदन मुसीबत में डालता ? इस कथन के आधार पर उस शासन-तंत्र और समाज-व्यवस्था पर प्रकाश डालिए। 
उत्तर : 
'सुख के सब साथी दुःख में न कोई' कथन पूर्णतः सत्य है। सभी को अपने स्वार्थ की चिंता रहती है। कहानी 'उसकी माँ' में इसे भलीभाँति स्पष्ट किया गया है। लाल का पिता चाचा की जमींदारी का मैनेजर था। उसने जमींदार के पास रुपए जमा भी कराए थे। जमींदार की उस परिवार के प्रति सहानुभूति थी। किन्तु लाल के पकड़े जाने पर वह उनसे दूर रहने लगा। उसने उनसे सम्बन्ध ही तोड़ दिया। जानकी अकेली ही उनके लिए लड़ती रही

कहानी में शासन तंत्र की क्रूरता को दिखाया है। शासन कर्ता अन्याय करते हैं, पर विरोधियों और जनता के मुँह पर ताला लगा देते हैं। तत्कालीन शासन व्यवस्था ने लाल और उसके साथियों पर अनेक दोषारोपण किये पर किसी ने उसका विरोध नहीं किया। लाल और उसके साथियों की पैरवी करने के लिए कोई वकील तैयार नहीं हुआ। प्रशासन की कठोरता और अपने ऊपर दोष न लगे, इसलिए कोई सामने नहीं आया। 

समाज-व्यवस्था में भी दोष था। लाल के पकड़े जाने के बाद शहर या मुहल्ले का कोई व्यक्ति डर के कारण मिलने नहीं आया। लेखक का भी उनके प्रति अपा प्रेम था, पर वह भी दूर रहा। उसने कहा-"कौन अपनी गरदन मुसीबत में डालता, विद्रोही की माँ से सम्बन्ध रखकर।" स्पष्ट है 'बनी के सब साथी हैं बिगड़ी का कोई नहीं। 

प्रश्न 7. 
चाचा ने लाल का पेंसिल-खचित नाम पुस्तक की छाती पर से क्यों मिटा डालना चाहा ? 
उत्तर : 
चाचा ने पुस्तक से लाल के नाम को दो कारणों से मिटाना चाहा। चाचा का लाल के प्रति अपार स्नेह था परन्तु जब-जब चाचा मेजिनी की पुस्तक खोलता और उस पर लाल का नाम देखता तो लेखक को दुःख होता, उसके प्रति स्नेह उत्पन्न होता। उसकी माँ और पिता की याद आती उसे लाल की विद्रोही बातें याद आतीं। दूसरी ओर उसे सरकार का डर था। पुलिस सुपरिटेंडेंट का कथन याद आ जाता जिससे लेखक ने उस परिवार से सावधान और दूर रहने के लिए कहा था। कहीं सरकार यह सोच कर कि लेखक का लाल के परिवार से सम्बन्ध है उसे भी षड्यंत्र में शामिल न मान ले और जमींदारी चली जाए। इसलिए लेखक ने पुस्तक से लाल का नाम मिटा दिया। उसे खतरे की संभावना थी। 

प्रश्न 8. 
भारत माता की छवि या धारणा आपके मन में किस प्रकार की है ? 
उत्तर : 
हमारे देश में प्राचीन समय से ही धरती (जन्म भूमि) के प्रति माता का भाव रहा है। 'माता भूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्याः' (भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।) जो 'भारत माता' जन्म देने वाली माता की भी माता है, उसके प्रति श्रद्धा की भावना हमारा स्वाभाविक और परम पावन कर्तव्य है। मेरे मन में भी भारत माता की यही छवि और धारणा है। मैं भारत माता का पुत्र हूँ। उसकी प्राकृतिक शोभा, उसका गर्व प्रदायक इतिहास, उसका अनुपम भूगोल, सभी मुझे प्राणों से भी प्यारे हैं। भारत के कोटि-कोटि जन मेरे भाई-बहिन है। भारत माँ की सेवा और सुरक्षा में यदि मेरा यह नश्वर शरीर काम आ जाए, इससे बढ़कर मेरे लिए सौभाग्य की और क्या बात हो सकती है ? 

राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की निम्नलिखित पंक्तियों में प्रदर्शित भारत माता की छवि ही, मेरे मन में समाई हुई है नीलांबर परिधान हरितपट पर सुंदर है। नदियाँ प्रेम प्रवाह, मेखला रत्नाकर है। करते अभिषेक पयोद हैं बलिहारी इस वेश की। हे मातृ भूमि तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की॥ 

प्रश्न 9. 
जानकी जैसी भारतमाता हमारे बीच बनी रहे, इसके लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के संदर्भ में विचार कीजिए। 
उत्तर : 
जानकी 'उसकी माँ' कहानी की सर्वप्रमुख पात्र है। उसके चारित्रिक गुण पाठक पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। वह एक आदर्श माँ ही नहीं बल्कि भारत माता की वात्सल्यमयी, जीती-जागती प्रतिमूर्ति है। एक आदर्श माता में जो गुण होने चाहिए, वे सभी जानकी में विद्यमान हैं। वह सरल हृदय माता है। लाल का ही नहीं बल्कि उसके सभी सहपाठियों का मंगल चाहती है। उनको सजा हो जाने पर वह जेल में खाना पहुँचाती है। वकीलों के चक्कर काटती है। अपना सब कुछ बच्चों को सजा से बचाने में दाव पर लगा देती है। लाल के पत्र को सुनकर भी वह विलाप नहीं करती बल्कि ऐसी हृदय विदारक घटना को मौन भाव से सहन कर जाती है। अपनी संतान को देश के लिए बलिदान कर देती है। 

आज भी देश को जानकी जैसी माताओं की आवश्यकता है। ऐसी स्वाभिमानिनी वात्सल्यमयी माताएँ देश को तभी प्राप्त हो सकती हैं जब हमारा राष्ट्र नारियों का सम्मान करने और उन्हें अच्छे संस्कार देने की परंपरा बनाए रखे। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' की भावना के पीछे यही यथार्थ बात छिपी हुई है। जब बेटियाँ सुरक्षित रहेंगी और सुशिक्षित बनेंगी, तो देश की भावी पीढ़ियाँ भी स्वाभिमानी देशभक्त और आत्मबलिदानी बनेंगी। 'भारत माता' पुनः संसार में अपना भव्य गौरव प्राप्त करेंगी। 

प्रश्न 10. 
निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए 
(क) “पुलिस वाले केवल संदेह पर भले आदमियों के बच्चों को त्रास देते हैं, मारते हैं, सताते हैं। यह अत्याचारी पुलिस की नीचता है। ऐसी नीच शासन-प्रणाली को स्वीकार करना अपने धर्म को, कर्म को, आत्मा को, परमात्मा को भुलाना है। धीरे-धीरे घुलाना-मिटाना है।" 
उत्तर : 
आशय-जानकी ने चाचा से कहा कि वे लड़के जो मुँह में आता है बक देते हैं। उस दिन वे कह रहे थे कि पुलिस वाले शक के आधार पर ही भले आदमियों के बच्चों को डराते हैं, धमकाते हैं और मारते हैं। वे पहले अच्छी तरह छानबीन नहीं करते और व्यर्थ में सन्देह करके उन्हें पकड़ लेते हैं। व्यर्थ में सताते हैं। यह क्रूर और अत्याचारी पुलिस की अमानवीय व्यवस्था है। ऐसे अत्याचारी शासन को सहन करना और विरोध न करने का अर्थ है धर्म, कर्म, आत्मा और परमात्मा को भूलना। जो धर्म में विश्वास करेगा वह शासन के अत्याचार को सहन नहीं करेगा। जो शासन धर्म से डरेगा, परमात्मा में विश्वास करेगा वह ऐसे अत्याचार नहीं करेगा। ऐसे अत्याचारी, धर्म विरोधी शासन का विरोध न करना अपने को मिटाना है। अपने अस्तित्व को खोना है। 

(ख) चाचाजी, नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है जो सँवारा गया है, वह बिगड़ेगा ही। हमें दुर्बलता के डर से अपना कना चाहिए। कर्म के समय हमारी भजाएँ दर्बल नहीं, भगवान की सहस्र भजाओं की सखियाँ हैं।" आशय-चाचा जी ने लाल को समझाया कि सरकार के हाथ लम्बे होते हैं। तुम उनसे पंगा नहीं ले सकते। तुम्हारे पास ताकत नहीं है, शक्ति नहीं है, तुम्हें मिटना पड़ेगा। लाल ने साहस के साथ चाचाजी से कहा कि प्रकृति का नियम है, जो अंकुरित हुआ वह मिटेगा। 

जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है, विकास के पीछे विनाश है। साहसी व्यक्ति जिसमें लगन है वह रुकावटों और विरोधों को देखकर पीछे नहीं हटता। अपने को दुर्बल समझकर अपना काम नहीं रोकना चाहिए। हमें करणीय कार्य करते रहना चाहिए। कर्म करते समय अपनी भुजाओं को कमजोर नहीं समझना चाहिए। हिम्मत से कार्य करने पर हमारी भुजाएँ भगवान की भुजाएँ बन जाती हैं। अर्थात् दृढ़ता से कर्म करने पर हमारी भुजाओं में भगवान की सी शक्ति आ जाती है। अतः विनाश की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। मिटना एक दिन सबको है। 

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